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नागर खण्ड · अध्याय 97

दशरथ द्वारा तपस्या हेतु उद्योग का वर्णन

अध्याय 96अध्याय-सूचीअध्याय 98

श्लोक 1 (skanda.6.97.1)

सूत उवाच॥ ततः प्रभृति नो मन्दो रोहिणीशकटं द्विजाः॥ भिनत्ति वचनात्तस्य राज्ञो दशरथस्य च

sūta uvāca tataḥ prabhṛti no mando rohiṇīśakaṭaṁ dvijāḥ bhinatti vacanāttasya rājño daśarathasya ca

सूत जी ने कहा — हे द्विजो! तभी से मन्द राजा दशरथ के उस वचन के कारण रोहिणी के शकट को कभी नहीं भेदते।

श्लोक 2 (skanda.6.97.2)

तद्वृत्तांतं समाकर्ण्य तस्य शक्रः प्रहर्षितः॥ भूपालं तं समभ्येत्य ततश्चोवाच सादरम्

tadvṛttāṁtaṁ samākarṇya tasya śakraḥ praharṣitaḥ bhūpālaṁ taṁ samabhyetya tataścovāca sādaram

उस वृत्तांत को सुनकर इंद्र अत्यंत प्रसन्न हुए, और उस राजा के पास जाकर आदरपूर्वक बोले।

श्लोक 3 (skanda.6.97.3)

अत्यद्भुततरं कर्म त्वयैतत्पृथिवीपते॥ संसाधितं यदन्येन मनसापि न चिन्त्यते

atyadbhutataraṁ karma tvayaitatpṛthivīpate saṁsādhitaṁ yadanyena manasāpi na cintyate

"हे राजन्! तुमने यह अत्यंत अद्भुत कार्य सिद्ध किया है, जिसे अन्य कोई मन में भी सोच नहीं सकता।"

श्लोक 4 (skanda.6.97.4)

अत एव हि संतुष्टिः सञ्जाताद्य तवोपरि॥ वरं मत्तो गृहाणाद्य तदभीष्टं हृदि स्थितम्

ata eva hi saṁtuṣṭiḥ sañjātādya tavopari varaṁ matto gṛhāṇādya tadabhīṣṭaṁ hṛdi sthitam

"इसी कारण आज मुझे तुम्हारे प्रति अत्यंत संतोष हुआ है; आज मुझसे वह वर माँगो, जो तुम्हारे हृदय में स्थित हो।"

श्लोक 5 (skanda.6.97.5)

राजोवाच॥ त्वया सह सुरश्रेष्ठ मैत्री संप्रार्थयाम्यहम्॥ शाश्वती सर्वकृत्येषु परमां लोकसंस्थिताम्

rājovāca tvayā saha suraśreṣṭha maitrī saṁprārthayāmyaham śāśvatī sarvakṛtyeṣu paramāṁ lokasaṁsthitām

राजा ने कहा — "हे देवश्रेष्ठ! मैं आपसे सम्पूर्ण कार्यों में सदा साथ रहने वाली, लोक में परम स्थिर एक शाश्वत मैत्री की कामना करता हूँ।"

श्लोक 6 (skanda.6.97.6)

इन्द्र उवाच॥ एवं भवतु राजेंद्र त्वया सह सदा मम॥ संपत्स्यते सदा मैत्री वसोरिव च शाश्वती

indra uvāca evaṁ bhavatu rājeṁdra tvayā saha sadā mama saṁpatsyate sadā maitrī vasoriva ca śāśvatī

इंद्र ने कहा — "हे राजेंद्र! ऐसा ही हो। तुम्हारे साथ मेरी यह मैत्री सदा वसु के समान शाश्वत बनी रहेगी।"

श्लोक 7 (skanda.6.97.7)

त्वया सदैव मे पार्श्वे सभायां देवसंनिधौ॥ आगन्तव्यं विशेषेण येन मैत्री प्रवर्धते

tvayā sadaiva me pārśve sabhāyāṁ devasaṁnidhau āgantavyaṁ viśeṣeṇa yena maitrī pravardhate

"तुम्हें सदा देवताओं की उपस्थिति में मेरी सभा में मेरे निकट आते रहना चाहिए, जिससे यह मैत्री विशेष रूप से बढ़ती रहे।"

श्लोक 8 (skanda.6.97.8)

एवमुक्त्वा सहस्राक्षो जगाम त्रिदिवालयम्॥ राजापि चागतो हर्म्ये स्वकीये हर्षसंयुतः

evamuktvā sahasrākṣo jagāma tridivālayam rājāpi cāgato harmye svakīye harṣasaṁyutaḥ

ऐसा कहकर सहस्राक्ष इंद्र स्वर्गलोक को चले गए, और राजा भी हर्षयुक्त होकर अपने भवन को लौट आया।

श्लोक 9 (skanda.6.97.9)

रक्षयित्वा जगत्सर्वं शनैश्चर कृताद्भयात्॥ अप्राप्यां प्राप्य संकीर्तिं स्तूयमानस्तु बन्दिभिः

rakṣayitvā jagatsarvaṁ śanaiścara kṛtādbhayāt aprāpyāṁ prāpya saṁkīrtiṁ stūyamānastu bandibhiḥ

शनैश्चर द्वारा उत्पन्न भय से सम्पूर्ण जगत की रक्षा करके, और अन्य किसी के लिए दुर्लभ ऐसी कीर्ति को प्राप्त कर, वह भाटों द्वारा स्तुति किया जाने लगा।

श्लोक 10 (skanda.6.97.10)

ततः प्रभृति नित्यं स सन्ध्याकाल उपस्थिते॥ सायाह्नं संविधायाथ याति शक्रस्य मंदिरे

tataḥ prabhṛti nityaṁ sa sandhyākāla upasthite sāyāhnaṁ saṁvidhāyātha yāti śakrasya maṁdire

तभी से वह नित्य संध्याकाल आने पर अपनी सांध्य क्रियाएँ पूर्ण करके इंद्र के भवन को जाने लगा।

श्लोक 11 (skanda.6.97.11)

तत्र स्थित्वा चिरं श्रुत्वा गंधर्वाणां मनोहरम्॥ गीतं दृष्ट्वा च नृत्यं च तानादिविहितं शुभम्

tatra sthitvā ciraṁ śrutvā gaṁdharvāṇāṁ manoharam gītaṁ dṛṣṭvā ca nṛtyaṁ ca tānādivihitaṁ śubham

वहाँ चिरकाल तक रुककर वह गंधर्वों का मनोहर गीत सुनता, और स्वर-ताल आदि से युक्त शुभ नृत्य देखता।

श्लोक 12 (skanda.6.97.12)

विचित्रार्थाः कथाः श्रुत्वा देवर्षीणां मुखाच्च्युताः॥ स्वयं च कीर्तयित्वाथ प्रयाति निजमंदिरम्

vicitrārthāḥ kathāḥ śrutvā devarṣīṇāṁ mukhāccyutāḥ svayaṁ ca kīrtayitvātha prayāti nijamaṁdiram

देवर्षियों के मुख से निकली विचित्र अर्थों वाली कथाएँ सुनकर, और स्वयं भी कीर्तन करके, तत्पश्चात् वह अपने भवन को लौट जाता।

श्लोक 13 (skanda.6.97.13)

विमानवरमारुह्य हंसबर्हिणनादितम्॥ मनोहरपताकाभिः समंताच्च विभूषितम्

vimānavaramāruhya haṁsabarhiṇanāditam manoharapatākābhiḥ samaṁtācca vibhūṣitam

वह हंस और मयूरों की ध्वनि से गूँजते हुए, और चारों ओर से मनोहर पताकाओं से सुशोभित एक उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर जाता था।

श्लोक 14 (skanda.6.97.14)

यदायदा स निर्याति शक्रस्थानान्निजालयम्॥ तदातदाऽऽसने तस्य क्रियतेऽभ्युक्षणं सदा

yadāyadā sa niryāti śakrasthānānnijālayam tadātadā''sane tasya kriyate'bhyukṣaṇaṁ sadā

जब-जब वह इंद्र के स्थान से अपने भवन को प्रस्थान करता, तब-तब उसके आसन पर सदा जल का छिड़काव कर दिया जाता था।

श्लोक 15 (skanda.6.97.15)

शक्रादेशात्तदा वेत्ति न स भूपः कथंचन॥ अन्यस्मिन्दिवसे तस्य नारदो मुनिसत्तमः॥ कथयामास तत्सर्वमभ्युक्षणसमुद्भवम्

śakrādeśāttadā vetti na sa bhūpaḥ kathaṁcana anyasmindivase tasya nārado munisattamaḥ kathayāmāsa tatsarvamabhyukṣaṇasamudbhavam

यह इंद्र की आज्ञा से किया जाता था, परंतु वह राजा इस बात को किसी भी प्रकार नहीं जानता था। एक दिन मुनिश्रेष्ठ नारद ने उसे इस जल-सिंचन से संबंधित यह सम्पूर्ण बात बताई।

श्लोक 16 (skanda.6.97.16)

वृत्तांतं तस्य राजर्षेस्तस्यैव गृहमागतः॥ तीर्थयात्रा प्रसंगेन विद्वेषपरिवृद्धये

vṛttāṁtaṁ tasya rājarṣestasyaiva gṛhamāgataḥ tīrthayātrā prasaṁgena vidveṣaparivṛddhaye

तीर्थयात्रा के प्रसंग में उस राजर्षि के घर आकर, विद्वेष बढ़ाने के उद्देश्य से नारद ने यह वृत्तांत सुनाया।

श्लोक 17 (skanda.6.97.17)

तच्छ्रुत्वा नारदेनोक्तं श्रद्धेयमपि भूपतिः॥ न चक्रे हृदयेऽधर्ममात्मानं परिचिंतयन्

tacchrutvā nāradenoktaṁ śraddheyamapi bhūpatiḥ na cakre hṛdaye'dharmamātmānaṁ pariciṁtayan

यह सुनकर, यद्यपि नारद का कहा हुआ विश्वसनीय भी था, फिर भी वह राजा अपने आत्मा का विचार करते हुए अपने हृदय में अधर्म को स्थान नहीं देता था।

श्लोक 18 (skanda.6.97.18)

तथापि कौतुकाविष्टो गत्वा शक्रनिवेशनम्॥ अन्यस्मिन्दिवसे स्थित्वा चिरं तत्र समुत्थितः

tathāpi kautukāviṣṭo gatvā śakraniveśanam anyasmindivase sthitvā ciraṁ tatra samutthitaḥ

फिर भी कुतूहलवश किसी अन्य दिन इंद्र के भवन में जाकर, वहाँ चिरकाल तक रुककर, वह उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 19 (skanda.6.97.19)

अलक्ष्यं वीक्षयामास स्वासनं दूरमास्थितः॥ किंचित्सद्मांतरं प्राप्य कौतूहलसमन्वितः

alakṣyaṁ vīkṣayāmāsa svāsanaṁ dūramāsthitaḥ kiṁcitsadmāṁtaraṁ prāpya kautūhalasamanvitaḥ

वह कुतूहलयुक्त होकर, थोड़ी दूरी पर, भवन के भीतर कुछ आगे जाकर, बिना देखे अपने आसन को दूर से देखने लगा।

श्लोक 20 (skanda.6.97.20)

ततः शक्रसमादेशादुत्थाय सुरकिंकरः॥ प्रोक्षयामास तोयेन पार्थिवस्य तदासनम्

tataḥ śakrasamādeśādutthāya surakiṁkaraḥ prokṣayāmāsa toyena pārthivasya tadāsanam

तत्पश्चात् इंद्र की आज्ञा से उठकर एक देव-सेवक ने जल से उस राजा के आसन को सींच दिया।

श्लोक 21 (skanda.6.97.21)

तद्दृष्ट्वा कोपसंपन्नः स राजाऽभ्येत्य वासवम्॥ प्रोवाच किमिदं शक्र प्रोक्ष्यते यन्ममासनम्

taddṛṣṭvā kopasaṁpannaḥ sa rājā'bhyetya vāsavam provāca kimidaṁ śakra prokṣyate yanmamāsanam

यह देखकर वह राजा क्रोधित होकर इंद्र के पास गया और बोला — "हे शक्र! यह क्या है, कि मेरा आसन इस प्रकार सींचा जा रहा है?"

श्लोक 22 (skanda.6.97.22)

किं मया निहता विप्राः किं वा विप्रसमुद्भवम्॥ शासनं लोपितं किंचित्किं वा विप्रा विनिंदिताः

kiṁ mayā nihatā viprāḥ kiṁ vā viprasamudbhavam śāsanaṁ lopitaṁ kiṁcitkiṁ vā viprā viniṁditāḥ

"क्या मैंने कभी किसी ब्राह्मण की हत्या की है? या क्या मैंने ब्राह्मणों से संबंधित किसी विधान का उल्लंघन किया है? या क्या मैंने कभी ब्राह्मणों की निंदा की है?"

श्लोक 23 (skanda.6.97.23)

किं वा नष्टोऽस्मि संग्रामे दृष्ट्वा शत्रून्समागतान्॥ दैन्यं वा जल्पितं तेषां भयत्रस्तेन चेतसा

kiṁ vā naṣṭo'smi saṁgrāme dṛṣṭvā śatrūnsamāgatān dainyaṁ vā jalpitaṁ teṣāṁ bhayatrastena cetasā

"या क्या मैं युद्धभूमि में शत्रुओं को समक्ष देखकर भाग गया हूँ? या क्या भय से त्रस्त हृदय से मैंने कभी दीनतापूर्ण वचन कहे हैं?"

श्लोक 24 (skanda.6.97.24)

मम राज्येऽथवा शक्र दुर्बलो बलवत्तरैः॥ पीड़्यते वाथ चौराद्यैर्मुष्यते वंचकैस्तथा

mama rājye'thavā śakra durbalo balavattaraiḥ pīr̤yate vātha caurādyairmuṣyate vaṁcakaistathā

"हे शक्र! या क्या मेरे राज्य में कोई दुर्बल व्यक्ति बलवानों द्वारा पीड़ित किया जाता है, अथवा चोरों द्वारा लूटा जाता है, अथवा ठगों द्वारा छला जाता है?"

श्लोक 25 (skanda.6.97.25)

किं वा राज्ये मदीये च जायते योनिविप्लवः॥ संकरो वाथ वर्णानां परित्यक्तविधिक्रमः

kiṁ vā rājye madīye ca jāyate yoniviplavaḥ saṁkaro vātha varṇānāṁ parityaktavidhikramaḥ

"या क्या मेरे राज्य में कहीं वर्णसंकर उत्पन्न होता है, अथवा वर्णों के मध्य ऐसा मिश्रण होता है, जिसमें शास्त्रविधि का त्याग कर दिया गया हो?"

श्लोक 26 (skanda.6.97.26)

किं वा दुर्जनवाक्येन दूषितो दोषवर्जितः॥ दंड्यते मम राज्ये च केनचित्त्रिदशेश्वर

kiṁ vā durjanavākyena dūṣito doṣavarjitaḥ daṁḍyate mama rājye ca kenacittridaśeśvara

"हे देवेश्वर! या क्या मेरे राज्य में किसी निर्दोष व्यक्ति को किसी दुर्जन के वचनों से कलंकित कर, किसी के द्वारा दण्डित किया जाता है?"

श्लोक 27 (skanda.6.97.27)

किं वा चौरोऽथ पापो वा गृहीतो दोषवान्स्वयम्॥ मुच्यते द्रव्यलोभेन तथान्यो वा जुगुप्सितः

kiṁ vā cauro'tha pāpo vā gṛhīto doṣavānsvayam mucyate dravyalobhena tathānyo vā jugupsitaḥ

"या क्या पकड़ा गया कोई दोषी चोर अथवा पापी, धन के लोभ से, अथवा कोई अन्य निंदनीय व्यक्ति अपराध से मुक्त कर दिया जाता है?"

श्लोक 28 (skanda.6.97.28)

किंस्विन्मया परित्यक्तः कोऽप्यत्र शरणागतः॥ भयत्रस्तः सुभीतेन प्राणानां त्रिदशाधिप

kiṁsvinmayā parityaktaḥ ko'pyatra śaraṇāgataḥ bhayatrastaḥ subhītena prāṇānāṁ tridaśādhipa

"हे त्रिदशाधिप! क्या मैंने कभी अपने प्राणों के भय से भयभीत होकर, शरण में आए किसी भयत्रस्त व्यक्ति को त्याग दिया है?"

श्लोक 29 (skanda.6.97.29)

कस्य वा पृष्ठमांसानि भक्षितानि मया क्वचित्॥ कच्चिच्च त्रिदशाधीष ब्राह्मणस्य विशेषतः

kasya vā pṛṣṭhamāṁsāni bhakṣitāni mayā kvacit kaccicca tridaśādhīṣa brāhmaṇasya viśeṣataḥ

"हे त्रिदशाधीश! या क्या मैंने कभी किसी की, विशेषतः किसी ब्राह्मण की, पीठ पीछे निंदा की है?"

श्लोक 30 (skanda.6.97.30)

किं वा दानं मया दत्त्वा ब्राह्मणाय महात्मने॥ पश्चात्तापः कृतः पश्चाद्दत्तं चोपेक्षितं च वा

kiṁ vā dānaṁ mayā dattvā brāhmaṇāya mahātmane paścāttāpaḥ kṛtaḥ paścāddattaṁ copekṣitaṁ ca vā

"या क्या किसी महात्मा ब्राह्मण को दान देकर मैंने बाद में उसका पश्चाताप किया है, अथवा दान देकर भी उसकी उपेक्षा की है?"

श्लोक 31 (skanda.6.97.31)

किं वा राज्ये मदीये च दीनानां प्रपतंति च॥ अश्रुपाता दिवारात्रं दुःखितानां समंततः

kiṁ vā rājye madīye ca dīnānāṁ prapataṁti ca aśrupātā divārātraṁ duḥkhitānāṁ samaṁtataḥ

"या क्या मेरे राज्य में दुःखी और दीन लोगों के आँसू दिन-रात, सर्वत्र, बहते रहते हैं?"

श्लोक 32 (skanda.6.97.32)

दैवं वा पैतृकं वापि किं वा कर्म गृहे मम॥ लोपं गच्छति देवेन्द्र क्रियते वा विधिच्युतम्

daivaṁ vā paitṛkaṁ vāpi kiṁ vā karma gṛhe mama lopaṁ gacchati devendra kriyate vā vidhicyutam

"हे देवेंद्र! या क्या मेरे घर में देव-कर्म अथवा पितृ-कर्म का लोप हो जाता है, अथवा वे विधि से च्युत होकर किए जाते हैं?"

श्लोक 33 (skanda.6.97.33)

यत्त्वया क्रियते नित्यं तोयैरभ्युक्षणं मम॥ आसनस्य द्रुतं ब्रूया यत्पापं विहितं मया

yattvayā kriyate nityaṁ toyairabhyukṣaṇaṁ mama āsanasya drutaṁ brūyā yatpāpaṁ vihitaṁ mayā

"आप जो नित्य मेरे आसन को जल से सींचते हैं, उसका कारण मुझे शीघ्र बताइए — मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है?"

श्लोक 34 (skanda.6.97.34)

इन्द्र उवाच॥ न विद्यते महाराज शरीरे तव पातकम्॥ न राष्ट्रे च कुले गेहे भृत्यवर्गे विशेषतः

indra uvāca na vidyate mahārāja śarīre tava pātakam na rāṣṭre ca kule gehe bhṛtyavarge viśeṣataḥ

इंद्र ने कहा — "हे महाराज! तुम्हारे शरीर में कोई पाप नहीं है, न ही तुम्हारे राष्ट्र, कुल, घर अथवा सेवक-वर्ग में विशेष रूप से कोई दोष है।"

श्लोक 35 (skanda.6.97.35)

परं शृणु प्रवक्ष्यामि यत्ते पापं भविष्यति॥ तेन संप्रोक्ष्यते चैव आसनं सर्वदैव तु

paraṁ śṛṇu pravakṣyāmi yatte pāpaṁ bhaviṣyati tena saṁprokṣyate caiva āsanaṁ sarvadaiva tu

"परंतु सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ, कि तुम्हारे लिए आगे कौन-सा पाप होने वाला है, जिसके कारण तुम्हारा आसन सदा सींचा जाता है।"

श्लोक 36 (skanda.6.97.36)

अपुत्रस्य गतिर्नास्ति न च स्वर्गं प्रपद्यते॥ पैतृकेण नरो ग्रस्तो य ऋणेन सदा नृप

aputrasya gatirnāsti na ca svargaṁ prapadyate paitṛkeṇa naro grasto ya ṛṇena sadā nṛpa

"हे राजन्! पुत्रहीन मनुष्य की कोई सद्गति नहीं होती, न ही वह स्वर्ग को प्राप्त होता है; वह सदा पितृ-ऋण से ग्रस्त रहता है।"

श्लोक 37 (skanda.6.97.37)

द्वेष्यतां याति देवानां पितॄणां च विशेषतः॥ यदा पश्यति पुत्रस्य वदनं पुरुषो नृप

dveṣyatāṁ yāti devānāṁ pitṝṇāṁ ca viśeṣataḥ yadā paśyati putrasya vadanaṁ puruṣo nṛpa

"हे राजन्! ऐसा मनुष्य देवताओं का, और विशेषतः पितरों का, द्वेषपात्र बन जाता है। जब कोई पुरुष अपने पुत्र का मुख देखता है..."

श्लोक 38 (skanda.6.97.38)

आनृण्यं समवाप्नोति पितॄणां स तदा ध्रुवम्॥ स त्वं नैव गतो राजन्नानृण्यं यन्मयोदितम्

ānṛṇyaṁ samavāpnoti pitṝṇāṁ sa tadā dhruvam sa tvaṁ naiva gato rājannānṛṇyaṁ yanmayoditam

"...तभी वह निश्चित रूप से अपने पितरों के ऋण से मुक्त होता है। हे राजन्! तुम अभी तक उस ऋण-मुक्ति को प्राप्त नहीं हुए हो, जो मैंने अभी कही है।"

श्लोक 39 (skanda.6.97.39)

पितॄणां तेन ते नित्यमासनेऽभ्युक्षणं कृतम्॥ तस्माद्यतस्व पुत्रार्थं यदीच्छसि परां गतिम्

pitṝṇāṁ tena te nityamāsane'bhyukṣaṇaṁ kṛtam tasmādyatasva putrārthaṁ yadīcchasi parāṁ gatim

"इसी कारण तुम्हारे पितरों के प्रति उस ऋण के कारण तुम्हारे आसन का नित्य जल से सिंचन किया जाता है। अतः यदि तुम परम गति की इच्छा रखते हो, तो पुत्र-प्राप्ति के लिए प्रयत्न करो।"

श्लोक 40 (skanda.6.97.40)

आत्मानं नरकात्त्रातुं पुंसंज्ञाच्च तथा नृप॥ एवमुक्तः स शक्रेण राजा दशरथस्तदा

ātmānaṁ narakāttrātuṁ puṁsaṁjñācca tathā nṛpa evamuktaḥ sa śakreṇa rājā daśarathastadā

"हे राजन्! अपने आप को नरक से बचाने के लिए, तथा 'पुत्र' शब्द की सार्थकता को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करो।" — इंद्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर राजा दशरथ...

श्लोक 41 (skanda.6.97.41)

दुःखेन महता युक्तो लज्जयाऽधोमुखः स्थितः॥ आमंत्र्याथ सहस्राक्षं गत्वाऽयोध्यां निजां पुरीम्॥ अमात्यानां निजं राज्यमर्पयामास सत्वरः

duḥkhena mahatā yukto lajjayā'dhomukhaḥ sthitaḥ āmaṁtryātha sahasrākṣaṁ gatvā'yodhyāṁ nijāṁ purīm amātyānāṁ nijaṁ rājyamarpayāmāsa satvaraḥ

...अत्यंत दुःखयुक्त होकर तथा लज्जा से मस्तक झुकाए हुए खड़ा रह गया। तत्पश्चात् इंद्र से विदा लेकर वह अपनी नगरी अयोध्या को गया, और शीघ्र ही अपना राज्य मंत्रियों को सौंप दिया।

श्लोक 42 (skanda.6.97.42)

ततः प्रोवाच तान्सर्वांस्तपः कार्यं मयाऽधुना॥ यावत्पुत्रस्य संप्राप्तिस्तावदेव न संशयः

tataḥ provāca tānsarvāṁstapaḥ kāryaṁ mayā'dhunā yāvatputrasya saṁprāptistāvadeva na saṁśayaḥ

तत्पश्चात् उसने उन सबसे कहा — "मुझे अब तपस्या करनी है, जब तक पुत्र की प्राप्ति न हो जाए, तब तक, इसमें कोई संदेह नहीं।"

श्लोक 43 (skanda.6.97.43)

एतद्राज्यं प्रयत्नेन रक्षणीयं यथाविधि॥ युष्माभिर्मम वाक्येन यावदागमनं मम

etadrājyaṁ prayatnena rakṣaṇīyaṁ yathāvidhi yuṣmābhirmama vākyena yāvadāgamanaṁ mama

"इस राज्य की मेरे वचन के अनुसार तुम्हें प्रयत्नपूर्वक विधिवत् रक्षा करनी है, जब तक कि मैं वापस न लौट आऊँ।"

श्लोक 44 (skanda.6.97.44)

मंत्रिण ऊचुः॥ युक्तमेतन्महाराज पुत्रार्थं यत्समुद्यमः॥ क्रियते पुत्रहीनस्य किं राज्येन धनेन वा

maṁtriṇa ūcuḥ yuktametanmahārāja putrārthaṁ yatsamudyamaḥ kriyate putrahīnasya kiṁ rājyena dhanena vā

मंत्रियों ने कहा — "हे महाराज! यह उचित ही है कि पुत्र के लिए यह उद्यम किया जाए; पुत्रहीन व्यक्ति के लिए राज्य अथवा धन का क्या प्रयोजन है?"

श्लोक 45 (skanda.6.97.45)

वयं रक्षां करिष्यामस्तव राज्ये समंततः॥ निर्वृतिं त्वं समास्थाय कुरु पुत्रकृते तपः

vayaṁ rakṣāṁ kariṣyāmastava rājye samaṁtataḥ nirvṛtiṁ tvaṁ samāsthāya kuru putrakṛte tapaḥ

"हम आपके राज्य की चारों ओर से रक्षा करेंगे; आप निश्चिंत होकर पुत्र-प्राप्ति के लिए तपस्या कीजिए।"

श्लोक 46 (skanda.6.97.46)

कार्तिकेयपुरं गत्वा यत्र पित्रा पुरा तव॥ तपस्तप्तं यथा लब्धा सिद्धिश्च मनसेप्सिता

kārtikeyapuraṁ gatvā yatra pitrā purā tava tapastaptaṁ yathā labdhā siddhiśca manasepsitā

"आप कार्तिकेयपुर जाइए, जहाँ पूर्वकाल में आपके पिता ने तपस्या करके अपनी मनोवांछित सिद्धि प्राप्त की थी।"

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