नागर खण्ड · अध्याय 96
दशरथ-शनैश्चर संवाद का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.96.1)
सूत उवाच॥ एवं तस्मिन्गते भूपे ह्यजापाले रसातलम्॥ तत्पुत्रश्चाभवद्राजा मंत्रिभिस्तु पुरस्कृतः
sūta uvāca evaṁ tasmingate bhūpe hyajāpāle rasātalam tatputraścābhavadrājā maṁtribhistu puraskṛtaḥ
सूत जी ने कहा — इस प्रकार जब राजा अजापाल रसातल को चले गए, तब उनका पुत्र मंत्रियों द्वारा राजा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।
श्लोक 2 (skanda.6.96.2)
यो नित्यमगमत्स्वर्गे वासवं रमते सदा॥ शनैश्चरो जितो येन रोहिणीं परिभेदयन्
yo nityamagamatsvarge vāsavaṁ ramate sadā śanaiścaro jito yena rohiṇīṁ paribhedayan
वह नित्य स्वर्ग जाकर सदा इंद्र के साथ आनंद करता था, और उसी ने शनैश्चर को, जो रोहिणी नक्षत्र को भेदने जा रहा था, पराजित किया।
श्लोक 3 (skanda.6.96.3)
गृहे यस्य स्वयं विष्णुर्भूत्वा चैव चतुर्विधः॥ रावणस्य विनाशार्थं जन्म चक्रे प्रहर्षितः
gṛhe yasya svayaṁ viṣṇurbhūtvā caiva caturvidhaḥ rāvaṇasya vināśārthaṁ janma cakre praharṣitaḥ
उसी के घर में स्वयं विष्णु ने चतुर्विध रूप धारण कर, रावण के विनाश के लिए अत्यंत हर्षपूर्वक जन्म लिया।
श्लोक 4 (skanda.6.96.4)
तेनागत्यात्र सत्क्षेत्रे तोषितो मधुसूदनः॥ प्रासादं शोभनं कृत्वा ततश्चैव प्रतिष्ठितः
tenāgatyātra satkṣetre toṣito madhusūdanaḥ prāsādaṁ śobhanaṁ kṛtvā tataścaiva pratiṣṭhitaḥ
उसने इस पवित्र क्षेत्र में आकर मधुसूदन विष्णु को प्रसन्न किया, और उनके लिए एक सुंदर प्रासाद बनाकर उन्हें वहाँ प्रतिष्ठित किया।
श्लोक 5 (skanda.6.96.5)
तस्यापि विश्रुता वापी स्वयं तेन विनिर्मिता॥ राजवापीति लोकेऽस्मिन्विख्यातिं परमां गता
tasyāpi viśrutā vāpī svayaṁ tena vinirmitā rājavāpīti loke'sminvikhyātiṁ paramāṁ gatā
उसके द्वारा स्वयं निर्मित की गई एक विख्यात बावड़ी भी है, जो इस लोक में "राजवापी" के नाम से परम प्रसिद्धि को प्राप्त हुई है।
श्लोक 6 (skanda.6.96.6)
तस्यां यः कुरुते श्राद्धं संप्राप्ते पञ्चमीदिने॥ प्रेतपक्षे विशेषेण स नरः स्यात्सतां प्रियः
tasyāṁ yaḥ kurute śrāddhaṁ saṁprāpte pañcamīdine pretapakṣe viśeṣeṇa sa naraḥ syātsatāṁ priyaḥ
जो कोई उस पर पितृपक्ष में विशेष रूप से पंचमी के दिन श्राद्ध करता है, वह मनुष्य सज्जनों को प्रिय होता है।
श्लोक 7 (skanda.6.96.7)
ऋषय ऊचुः॥ कथं तेन जितः सौरी रोहिणीशकटं च यत्॥ भिंदानस्तोषितस्तेन कथं नारायणो वद
ṛṣaya ūcuḥ kathaṁ tena jitaḥ saurī rohiṇīśakaṭaṁ ca yat bhiṁdānastoṣitastena kathaṁ nārāyaṇo vada
ऋषियों ने कहा — उसने शनि को किस प्रकार पराजित किया, जो रोहिणी के शकट को भेदने जा रहा था, और उसने नारायण को किस प्रकार प्रसन्न किया — यह हमें बताइए।
श्लोक 8 (skanda.6.96.8)
सूत उवाच॥ तस्मिञ्छासति धर्मज्ञे स्वधर्मेण वसुन्धराम्॥ अतिसौख्यान्वितो लोकः सर्वदैव व्यजायत
sūta uvāca tasmiñchāsati dharmajñe svadharmeṇa vasundharām atisaukhyānvito lokaḥ sarvadaiva vyajāyata
सूत जी ने कहा — जब वह धर्मज्ञ राजा अपने धर्म के अनुसार पृथ्वी पर शासन करता था, तब सम्पूर्ण प्रजा सदा अत्यंत सुखी रहती थी।
श्लोक 9 (skanda.6.96.9)
बहुक्षीरप्रदा गावः सस्यानि गुणवंति च॥ कामवर्षी च पर्जन्यो यथर्त्तुफलिता द्रुमाः
bahukṣīrapradā gāvaḥ sasyāni guṇavaṁti ca kāmavarṣī ca parjanyo yatharttuphalitā drumāḥ
गायें प्रचुर दूध देने वाली थीं, फसलें उत्तम गुणों से युक्त थीं, वर्षा मनोवांछित रूप से होती थी, और वृक्ष अपनी-अपनी ऋतु के अनुसार फल देते थे।
श्लोक 10 (skanda.6.96.10)
कस्यचित्त्वथ कालस्य दैवज्ञैस्तस्य भूपतेः॥ कथितं रोहिणीभेदं रविपुत्रः करिष्यति
kasyacittvatha kālasya daivajñaistasya bhūpateḥ kathitaṁ rohiṇībhedaṁ raviputraḥ kariṣyati
किसी समय उस राजा को उसके ज्योतिषियों ने बताया कि सूर्यपुत्र शनि रोहिणी नक्षत्र को भेदने वाला है।
श्लोक 11 (skanda.6.96.11)
तस्यानंतरमेवाशु दुर्भिक्षं संभविष्यति॥ अनावृष्टिश्च भविता रौद्रा द्वादश वार्षिकी॥ यया संपत्स्यते सर्वं भूतलं गतमानवम्
tasyānaṁtaramevāśu durbhikṣaṁ saṁbhaviṣyati anāvṛṣṭiśca bhavitā raudrā dvādaśa vārṣikī yayā saṁpatsyate sarvaṁ bhūtalaṁ gatamānavam
"उसके तुरंत पश्चात् ही अकाल पड़ेगा, और बारह वर्ष तक भयंकर अनावृष्टि होगी, जिससे सम्पूर्ण भूतल मनुष्यविहीन हो जाएगा।"
श्लोक 12 (skanda.6.96.12)
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा स राजा कुपितोऽभ्यगात्॥ शनैश्चरं समुद्दिश्य विमानमधिरुह्य च
teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā sa rājā kupito'bhyagāt śanaiścaraṁ samuddiśya vimānamadhiruhya ca
उनका यह वचन सुनकर वह राजा क्रुद्ध होकर एक विमान पर चढ़कर शनैश्चर की ओर चल पड़ा।
श्लोक 13 (skanda.6.96.13)
तस्य तुष्टेन संदत्तं विमानं कामगं पुरा॥ शक्रेण तत्र संतिष्ठञ्छनैश्चरमुपाद्रवत्
tasya tuṣṭena saṁdattaṁ vimānaṁ kāmagaṁ purā śakreṇa tatra saṁtiṣṭhañchanaiścaramupādravat
वह इच्छानुसार गमन करने वाला विमान, जो पूर्वकाल में प्रसन्न होकर इंद्र ने उसे प्रदान किया था, उस पर स्थित होकर वह शनैश्चर की ओर बढ़ा।
श्लोक 14 (skanda.6.96.14)
ततः सूर्यपथं मुक्त्वा ततश्चंद्रस्य पार्थिवः॥ नक्षत्रसरणिं प्राप्य सज्यं कृत्वा महद्धनुः
tataḥ sūryapathaṁ muktvā tataścaṁdrasya pārthivaḥ nakṣatrasaraṇiṁ prāpya sajyaṁ kṛtvā mahaddhanuḥ
फिर सूर्य के मार्ग को पार कर, तत्पश्चात् चंद्रमा के मार्ग को भी छोड़कर, वह राजा नक्षत्रों के मार्ग तक पहुँचा, और अपने विशाल धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई।
श्लोक 15 (skanda.6.96.15)
तत्र बाणं समारोप्य शनैश्चरमुपाद्रवत्॥ प्रोवाच पुरतः स्थित्वा सूर्यपुत्रमधोमुखम्
tatra bāṇaṁ samāropya śanaiścaramupādravat provāca purataḥ sthitvā sūryaputramadhomukham
वहाँ बाण चढ़ाकर वह शनैश्चर की ओर झपटा, और उस नीचे मुख किए हुए सूर्यपुत्र के समक्ष खड़े होकर बोला।
श्लोक 16 (skanda.6.96.16)
त्यजैनं रोहिणीमार्गं सांप्रतं त्वं शनैश्चर॥ मद्वाक्यादन्यथाऽहं त्वां नयिष्यामि यमक्षयम्
tyajainaṁ rohiṇīmārgaṁ sāṁprataṁ tvaṁ śanaiścara madvākyādanyathā'haṁ tvāṁ nayiṣyāmi yamakṣayam
"हे शनैश्चर! अभी इसी क्षण रोहिणी का यह मार्ग त्याग दो; मेरी बात न मानने पर मैं तुम्हें यमलोक पहुँचा दूँगा।"
श्लोक 17 (skanda.6.96.17)
एतेन निशिताग्रेग शरेणा नतपर्वणा॥ दिव्यास्त्रमंत्रयुक्तेन सत्यमेतद्ब्रवीम्यहम्
etena niśitāgrega śareṇā nataparvaṇā divyāstramaṁtrayuktena satyametadbravīmyaham
"इस तीक्ष्ण अग्रभाग वाले, दिव्यास्त्र-मंत्र से युक्त, सुदृढ़ पर्वों वाले इस बाण से — मैं यह सत्य कह रहा हूँ।"
श्लोक 18 (skanda.6.96.18)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तादृग्रौद्रतमं महत्॥ मन्दो विस्मयमापन्नस्ततश्चेदमभाषत
tasya tadvacanaṁ śrutvā tādṛgraudratamaṁ mahat mando vismayamāpannastataścedamabhāṣata
उसकी वह इतनी भयंकर और महान बात सुनकर मंद (शनि) आश्चर्यचकित हो गया, और तत्पश्चात् यह बोला।
श्लोक 19 (skanda.6.96.19)
कस्त्वं ब्रूहि महाभाग मम मार्गं रुणत्सि यः॥ अगम्यं केनचिल्लोके सर्वैरपि सुरासुरैः
kastvaṁ brūhi mahābhāga mama mārgaṁ ruṇatsi yaḥ agamyaṁ kenacilloke sarvairapi surāsuraiḥ
"हे महाभाग! तुम कौन हो जो मेरे उस मार्ग को रोक रहे हो, जो लोक में देवताओं और असुरों में से भी किसी के द्वारा दुर्गम्य है? मुझे बताओ।"
श्लोक 20 (skanda.6.96.20)
राजोवाच॥ अहं दशरथो नाम सूर्यवंशोद्भवो नृपः॥ अजस्य तनयः प्राप्तः कामं वारयितुं क्रुधा
rājovāca ahaṁ daśaratho nāma sūryavaṁśodbhavo nṛpaḥ ajasya tanayaḥ prāptaḥ kāmaṁ vārayituṁ krudhā
राजा ने कहा — "मैं सूर्यवंश में उत्पन्न, अज का पुत्र, दशरथ नामक राजा हूँ, जो क्रोधपूर्वक तुम्हारे इस अभीष्ट कार्य को रोकने आया हूँ।"
श्लोक 21 (skanda.6.96.21)
मंद उवाच॥ न त्वया सह संबंधः कश्चिदस्ति महीपते॥ मम यत्त्वं प्रकोपाढ्यो मन्मार्गं हंतुमिच्छसि
maṁda uvāca na tvayā saha saṁbaṁdhaḥ kaścidasti mahīpate mama yattvaṁ prakopāḍhyo manmārgaṁ haṁtumicchasi
मंद ने कहा — "हे राजन्! मेरा तुमसे कोई संबंध नहीं है; फिर तुम इतने क्रोध से भरकर मेरा मार्ग नष्ट करना क्यों चाहते हो?"
श्लोक 22 (skanda.6.96.22)
राजोवाच॥ रोहिणीसंभवं त्वं हि शकटं भेदयिष्यसि॥ सांप्रतं मम दैवज्ञैर्वाक्यमेतदुदाहृतम्
rājovāca rohiṇīsaṁbhavaṁ tvaṁ hi śakaṭaṁ bhedayiṣyasi sāṁprataṁ mama daivajñairvākyametadudāhṛtam
राजा ने कहा — "तुम रोहिणी से उत्पन्न उस शकट को भेदने वाले हो; अभी-अभी मेरे ज्योतिषियों ने यह बात कही है।"
श्लोक 23 (skanda.6.96.23)
तस्मिन्मन्द त्वया भिन्ने न वर्षति शतक्रतुः॥ एतद्वदति दैवज्ञा ज्योतिःशास्त्रविचक्षणाः
tasminmanda tvayā bhinne na varṣati śatakratuḥ etadvadati daivajñā jyotiḥśāstravicakṣaṇāḥ
"हे मन्द! उसके तुम्हारे द्वारा भेदे जाने पर इंद्र वर्षा नहीं करेंगे — यह बात ज्योतिषशास्त्र में निपुण ज्योतिषी कहते हैं।"
श्लोक 24 (skanda.6.96.24)
जाते वृष्टिनिरोधेऽथ जायंतेऽन्नानि न क्षितौ॥ अन्नाभावात्क्षयं यांति ततो भूभितले जनाः
jāte vṛṣṭinirodhe'tha jāyaṁte'nnāni na kṣitau annābhāvātkṣayaṁ yāṁti tato bhūbhitale janāḥ
"और वर्षा रुक जाने पर पृथ्वी पर अन्न उत्पन्न नहीं होंगे; अन्न के अभाव से भूतल पर मनुष्य नष्ट होने लगेंगे।"
श्लोक 25 (skanda.6.96.25)
जनोच्छेदे ततो जाते अग्निष्टोमादिकाः क्रियाः॥ न भवंति धरा पृष्ठे ततः स्यादेव संक्षयः
janocchede tato jāte agniṣṭomādikāḥ kriyāḥ na bhavaṁti dharā pṛṣṭhe tataḥ syādeva saṁkṣayaḥ
"मनुष्यों का उच्छेद होने पर अग्निष्टोम आदि यज्ञीय क्रियाएँ भी पृथ्वी पर नहीं हो पाएँगी, जिससे सम्पूर्ण जगत का ही संक्षय हो जाएगा।"
श्लोक 26 (skanda.6.96.26)
एतस्मात्कारणाद्रुद्धो मार्गस्ते सूर्यसंभव॥ रोहिणीं गंतुकामस्य सत्यमेतन्मयोदितम्
etasmātkāraṇādruddho mārgaste sūryasaṁbhava rohiṇīṁ gaṁtukāmasya satyametanmayoditam
"हे सूर्यपुत्र! इसी कारण, तुम्हारे रोहिणी की ओर जाने के अभिप्राय से चलने वाले इस मार्ग को मैंने रोक दिया है; यह मैंने सत्य ही कहा है।"
श्लोक 27 (skanda.6.96.27)
शनिरुवाच॥ गच्छ पुत्र निजं गेहं ममापि त्वं च रोचसे॥ तुष्टोऽहं तव वीर्येण न त्वन्येन महीपते
śaniruvāca gaccha putra nijaṁ gehaṁ mamāpi tvaṁ ca rocase tuṣṭo'haṁ tava vīryeṇa na tvanyena mahīpate
शनि ने कहा — "हे पुत्र! अपने घर जाओ; तुम मुझे भी पसंद हो। हे राजन्! मैं तुम्हारे पराक्रम से ही प्रसन्न हूँ, अन्य किसी कारण से नहीं।"
श्लोक 28 (skanda.6.96.28)
न केनचित्कृतं कर्म यदेतद्भवता कृतम्॥ न करिष्यति चैवान्यो देवो वा मानवोऽथ वा
na kenacitkṛtaṁ karma yadetadbhavatā kṛtam na kariṣyati caivānyo devo vā mānavo'tha vā
"यह कार्य, जो तुमने किया है, न किसी अन्य ने पहले कभी किया है, और न कोई देवता अथवा मनुष्य आगे कभी करेगा।"
श्लोक 29 (skanda.6.96.29)
नाहं पश्यामि भूपाल कथंचिदपि तूर्ध्वतः॥ यतो दृष्टिविनिर्दग्धं भस्मसाज्जायतेऽखिलम्
nāhaṁ paśyāmi bhūpāla kathaṁcidapi tūrdhvataḥ yato dṛṣṭivinirdagdhaṁ bhasmasājjāyate'khilam
"हे राजन्! मैं किसी भी प्रकार सीधे ऊपर की ओर नहीं देखता, क्योंकि मेरी दृष्टि से जला हुआ सब कुछ भस्म हो जाता है।"
श्लोक 30 (skanda.6.96.30)
जातमात्रेण बालेन मया पादौ निरीक्षितौ॥ तातस्य सहसा दग्धौ ततोऽहं वारितोंऽबया
jātamātreṇa bālena mayā pādau nirīkṣitau tātasya sahasā dagdhau tato'haṁ vāritoṁ'bayā
"जन्म लेते ही बालक होने पर मैंने अपने पिता के दोनों चरणों को देख लिया था, जो तत्काल जल गए; तब से मेरी माता ने मुझे ऊपर देखने से रोक दिया।"
श्लोक 31 (skanda.6.96.31)
न त्वया पुत्र द्रष्टव्यं किंचिदेव कथंचन॥ प्रमाणं यदि ते धर्मो मातृवाक्यसमुद्भवः
na tvayā putra draṣṭavyaṁ kiṁcideva kathaṁcana pramāṇaṁ yadi te dharmo mātṛvākyasamudbhavaḥ
"'हे पुत्र! अब तुम्हें ऊपर की ओर किसी भी वस्तु को कभी नहीं देखना चाहिए' — यही मेरी माता का वचन था, और मेरे लिए धर्म का प्रमाण उसी मातृ-वाक्य से उत्पन्न है।"
श्लोक 32 (skanda.6.96.32)
तस्मात्त्वया महत्कर्म कृतमीदृक्सुदुष्करम्॥ प्रजानां पार्थिवश्रेष्ठ त्यक्त्वा दूराद्भयं मम
tasmāttvayā mahatkarma kṛtamīdṛksuduṣkaram prajānāṁ pārthivaśreṣṭha tyaktvā dūrādbhayaṁ mama
"इसलिए हे राजश्रेष्ठ! तुमने प्रजा के लिए मेरा भय दूर से ही त्यागकर यह अत्यंत दुष्कर महान कार्य किया है।"
श्लोक 33 (skanda.6.96.33)
तस्मा त्तव कृते नाहं भेदयिष्यामि रोहिणीम्॥ कथंचिदपि भूपाल युगांतररशतेष्वपि
tasmā ttava kṛte nāhaṁ bhedayiṣyāmi rohiṇīm kathaṁcidapi bhūpāla yugāṁtararaśateṣvapi
"अतः तुम्हारे कारण मैं रोहिणी को कभी नहीं भेदूँगा, हे राजन्! सैकड़ों युगों के बीत जाने पर भी किसी भी प्रकार नहीं।"
श्लोक 34 (skanda.6.96.34)
वरं वरय चास्माकं तस्मादद्य भविष्यति॥ हृतत्स्थितं दुर्लभं भूप सर्वेषामिह देहिनाम्
varaṁ varaya cāsmākaṁ tasmādadya bhaviṣyati hṛtatsthitaṁ durlabhaṁ bhūpa sarveṣāmiha dehinām
"अतः आज हमसे कोई वर माँगो; हे राजन्! जो भी तुम्हारे हृदय में स्थित हो, चाहे वह सभी प्राणियों के लिए दुर्लभ ही क्यों न हो, वह पूर्ण होगा।"
श्लोक 35 (skanda.6.96.35)
राजोवाच॥ तव यो वासरे प्राप्ते तैलाभ्यंगं करोति वै॥ तस्याऽन्यदिवसं यावत्पीडा कार्या न च त्वया
rājovāca tava yo vāsare prāpte tailābhyaṁgaṁ karoti vai tasyā'nyadivasaṁ yāvatpīḍā kāryā na ca tvayā
राजा ने कहा — "जो कोई तुम्हारे वार के आने पर तैल-मालिश करता है, उसे तुम अगले शनिवार तक कभी पीड़ा मत देना।"
श्लोक 36 (skanda.6.96.36)
तिलदानं करोत्येवं लोहदानं च यस्तव॥ करोति दिवसे शक्त्या यावद्वर्षं त्वया हि सः
tiladānaṁ karotyevaṁ lohadānaṁ ca yastava karoti divase śaktyā yāvadvarṣaṁ tvayā hi saḥ
"इसी प्रकार जो कोई तुम्हारे दिन तिल-दान तथा लोह-दान अपनी शक्ति के अनुसार करता है, उसकी तुम्हें एक वर्ष तक रक्षा करनी होगी।"
श्लोक 37 (skanda.6.96.37)
रक्षणीयः सुकृच्छ्रेषु संकटेषु सदैव हि॥ त्वयि गोचरपीडायां संस्थिते चार्कसंभव
rakṣaṇīyaḥ sukṛcchreṣu saṁkaṭeṣu sadaiva hi tvayi gocarapīḍāyāṁ saṁsthite cārkasaṁbhava
"हे सूर्यपुत्र! जब भी तुम उसकी राशि में स्थित होकर पीड़ा दे रहे हो, तब भी उस दुष्कर संकट के समय उसकी सदा रक्षा करनी होगी।"
श्लोक 38 (skanda.6.96.38)
यः कुर्याच्छांतिकं सम्यक्तिलहोमं च भक्तितः॥ वासरे तव संप्राप्ते समिद्भिश्च तथाऽक्षतैः
yaḥ kuryācchāṁtikaṁ samyaktilahomaṁ ca bhaktitaḥ vāsare tava saṁprāpte samidbhiśca tathā'kṣataiḥ
"जो कोई तुम्हारा दिन आने पर भक्तिपूर्वक समिधा और अक्षत सहित सम्यक् शांतिकर्म तथा तिल-हवन करता है..."
श्लोक 39 (skanda.6.96.39)
तस्य सार्धानि वर्षाणि सप्त कार्या प्रयत्नतः॥ त्वया रक्षा महाभाग वरं चेन्मम यच्छसि
tasya sārdhāni varṣāṇi sapta kāryā prayatnataḥ tvayā rakṣā mahābhāga varaṁ cenmama yacchasi
"...हे महाभाग! यदि तुम मुझे वर देना चाहते हो, तो उसकी साढ़े सात वर्षों तक तुम्हें प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी होगी।"
श्लोक 40 (skanda.6.96.40)
सूत उवाच॥ एवमित्येव संप्रोच्य विरराम ततः परम्॥ शनैश्चरो महीपालवचनाद्द्विजसत्तमाः
sūta uvāca evamityeva saṁprocya virarāma tataḥ param śanaiścaro mahīpālavacanāddvijasattamāḥ
सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ द्विजो! "ऐसा ही होगा" कहकर, उस राजा के वचन के अनुसार शनैश्चर तत्पश्चात् मौन हो गए।
श्लोक 41 (skanda.6.96.41)
एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽहं सुविस्तरात्॥ भवद्भिः सूर्यपुत्रस्य राज्ञा दशरथेन हि॥ संवादं रोहिणीभेदे सञ्जातं समुपस्थिते
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'haṁ suvistarāt bhavadbhiḥ sūryaputrasya rājñā daśarathena hi saṁvādaṁ rohiṇībhede sañjātaṁ samupasthite
यह सब मैंने तुम्हें विस्तारपूर्वक बता दिया, जो तुमने मुझसे पूछा था — कि रोहिणी के भेदन का प्रसंग उपस्थित होने पर सूर्यपुत्र शनि और राजा दशरथ के बीच जो संवाद हुआ था, वह सब।
श्लोक 42 (skanda.6.96.42)
यश्चैतत्पठते नित्यं शृणुयाद्यो विशेषतः॥ शनैश्चरकृता पीडा तस्य नाशं प्रगच्छति
yaścaitatpaṭhate nityaṁ śṛṇuyādyo viśeṣataḥ śanaiścarakṛtā pīḍā tasya nāśaṁ pragacchati
जो कोई इसे नित्य पढ़ता है, अथवा विशेष रूप से इसे सुनता है, शनैश्चर द्वारा की गई उसकी पीड़ा नष्ट हो जाती है।