नागर खण्ड · अध्याय 95
अजापालेश्वरी माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.95.1)
सूत उवाच॥ अथान्यापि च तत्रास्ति देशकामप्रदा नृणाम्॥ अजापालेन भूपेन स्थापिता पापनाशनी
sūta uvāca athānyāpi ca tatrāsti deśakāmapradā nṛṇām ajāpālena bhūpena sthāpitā pāpanāśanī
सूत जी ने कहा — वहाँ एक और देवी हैं, जो मनुष्यों को मनोवांछित फल देने वाली और पापनाशिनी हैं, जिन्हें राजा अजापाल ने स्थापित किया था।
श्लोक 2 (skanda.6.95.2)
तां च शुक्लचतुर्दश्यामजापालेश्वरीं नरः॥ यो वै पूजयते भक्त्या धूपपुष्पानुलेपनैः॥ स प्राप्नोतीप्सितान्कामान्दुर्लभा सर्वमानवैः
tāṁ ca śuklacaturdaśyāmajāpāleśvarīṁ naraḥ yo vai pūjayate bhaktyā dhūpapuṣpānulepanaiḥ sa prāpnotīpsitānkāmāndurlabhā sarvamānavaiḥ
जो मनुष्य शुक्ल चतुर्दशी को उस अजापालेश्वरी देवी की भक्तिपूर्वक धूप, पुष्प और अनुलेपन से पूजा करता है, वह उन अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त करता है, जो सामान्यतः सभी मनुष्यों के लिए दुर्लभ हैं।
श्लोक 3 (skanda.6.95.3)
तस्या देव्याः प्रसादेन सत्यमेतन्मयोदितम्॥ अजापालो महीपालः पुराऽऽसीत्संमतः सताम्
tasyā devyāḥ prasādena satyametanmayoditam ajāpālo mahīpālaḥ purā''sītsaṁmataḥ satām
उस देवी की कृपा से यह कथा प्रसिद्ध है, और मैं तुम्हें सत्य कह रहा हूँ — पूर्वकाल में अजापाल नामक राजा थे, जो सज्जनों द्वारा सम्मानित थे।
श्लोक 4 (skanda.6.95.4)
हितकृत्सर्वलोकस्य यथा माता यथा पिता॥ तेन राज्यं समासाद्य पितृपैतामहं शुभम्
hitakṛtsarvalokasya yathā mātā yathā pitā tena rājyaṁ samāsādya pitṛpaitāmahaṁ śubham
वे माता-पिता के समान समस्त प्रजा का हित करने वाले थे। उन्होंने अपने पिता और पितामह से प्राप्त शुभ राज्य को प्राप्त कर...
श्लोक 5 (skanda.6.95.5)
चिंतितं मनसा पश्चात्स्वयमेव महात्मना॥ मया तत्कर्म कर्तव्यं यदन्यैरिह भूमिपैः॥ न कृतं न करिष्यंति ये भविष्यन्त्यतः परम्
ciṁtitaṁ manasā paścātsvayameva mahātmanā mayā tatkarma kartavyaṁ yadanyairiha bhūmipaiḥ na kṛtaṁ na kariṣyaṁti ye bhaviṣyantyataḥ param
...उस महात्मा राजा ने बाद में स्वयं अपने मन में विचार किया — "मुझे वह कार्य करना चाहिए, जो इस पृथ्वी पर अन्य किसी राजा ने न कभी किया है, और न भविष्य में होने वाले राजा कभी करेंगे।"
श्लोक 6 (skanda.6.95.6)
एष एव परो धर्मो भूपतीनामुदाहृतः॥ यत्प्रजापालनं शश्वत्तासां च सुखसंस्थितिः
eṣa eva paro dharmo bhūpatīnāmudāhṛtaḥ yatprajāpālanaṁ śaśvattāsāṁ ca sukhasaṁsthitiḥ
"राजाओं का यही सर्वोच्च धर्म कहा गया है — प्रजा का निरंतर पालन करना और उनकी सुखपूर्वक स्थिति बनाए रखना।"
श्लोक 7 (skanda.6.95.7)
यथायथा करं भूपास्ता मां गृह्णंति लोलुपाः॥ तथातथा मनःक्षोभो हृदये संप्रजायते
yathāyathā karaṁ bhūpāstā māṁ gṛhṇaṁti lolupāḥ tathātathā manaḥkṣobho hṛdaye saṁprajāyate
"जैसे-जैसे लोभी राजा उनसे कर ग्रहण करते हैं, वैसे-वैसे मेरे हृदय में मानसिक व्यथा उत्पन्न होती है।"
श्लोक 8 (skanda.6.95.8)
न करेण विना भूपा हस्त्यश्वादिबलं च यत्॥ शक्नुवंति परित्रातुं पादातं च विशेषतः
na kareṇa vinā bhūpā hastyaśvādibalaṁ ca yat śaknuvaṁti paritrātuṁ pādātaṁ ca viśeṣataḥ
"कर के बिना राजा गजबल, अश्वबल आदि सेना का, और विशेष रूप से पैदल सेना का, भरण-पोषण करने में समर्थ नहीं होते।"
श्लोक 9 (skanda.6.95.9)
विना तेन स गम्यः स्यान्नीचानामपि सत्वरम्॥ एतस्मात्कारणाद्भूपाः करं गृह्णंति लोकतः
vinā tena sa gamyaḥ syānnīcānāmapi satvaram etasmātkāraṇādbhūpāḥ karaṁ gṛhṇaṁti lokataḥ
"उसके बिना राजा शीघ्र ही नीच शत्रुओं द्वारा भी पराजित हो सकता है; इसी कारण राजा लोगों से कर ग्रहण करते हैं।"
श्लोक 10 (skanda.6.95.10)
तस्मान्मया विनाप्याशु नागैश्चैव नरैस्तथा॥ तपः शक्त्या प्रकर्तव्यं राज्यं निहतकण्टकम्
tasmānmayā vināpyāśu nāgaiścaiva naraistathā tapaḥ śaktyā prakartavyaṁ rājyaṁ nihatakaṇṭakam
"इसलिए मुझे शीघ्र ही हाथियों और मनुष्यों की सेना के बिना, केवल तपःशक्ति से ही अपने राज्य को कण्टकरहित बनाना चाहिए।"
श्लोक 11 (skanda.6.95.11)
करानगृह्णता तेन लोकान्रंजयता सदा॥ अन्येषां भूमिपालानां विशेषेण महात्मनाम्
karānagṛhṇatā tena lokānraṁjayatā sadā anyeṣāṁ bhūmipālānāṁ viśeṣeṇa mahātmanām
"कर ग्रहण न करते हुए भी मुझे सदा प्रजा को प्रसन्न रखना चाहिए, विशेषतः अन्य महात्मा राजाओं से भी बढ़कर।"
श्लोक 12 (skanda.6.95.12)
एवं चित्ते समाधाय वसिष्ठं मुनिपुंगवम्॥ पुरोधसं समाहूय ततः प्रोवाच सादरम्
evaṁ citte samādhāya vasiṣṭhaṁ munipuṁgavam purodhasaṁ samāhūya tataḥ provāca sādaram
मन में ऐसा निश्चय करके उन्होंने अपने पुरोहित, मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ को बुलाकर आदरपूर्वक कहा।
श्लोक 13 (skanda.6.95.13)
अत्र भूमितले विप्र सर्वेषां तीर्थमुत्तमम्॥ अल्पकालेन सन्तुष्टिं यत्र याति महेश्वरः॥ वासुदेवोऽथवा ब्रह्मा ह्येतच्छीघ्रं वदस्व मे
atra bhūmitale vipra sarveṣāṁ tīrthamuttamam alpakālena santuṣṭiṁ yatra yāti maheśvaraḥ vāsudevo'thavā brahmā hyetacchīghraṁ vadasva me
"हे विप्र! इस भूतल पर सबसे उत्तम वह तीर्थ कौन-सा है, जहाँ अल्प समय में ही महेश्वर, वासुदेव अथवा ब्रह्मा प्रसन्न हो जाते हैं? यह मुझे शीघ्र बताइए।"
श्लोक 14 (skanda.6.95.14)
येनाहं सर्वलोकस्य हितार्थं तप आददे॥ न स्वार्थं ब्राह्मणश्रेष्ठ सत्येनात्मानमालभे
yenāhaṁ sarvalokasya hitārthaṁ tapa ādade na svārthaṁ brāhmaṇaśreṣṭha satyenātmānamālabhe
"हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! जिससे मैं समस्त प्रजा के हित के लिए तपस्या ग्रहण करूँ, अपने स्वार्थ के लिए नहीं — मैं सत्यपूर्वक अपनी शपथ लेता हूँ।"
श्लोक 15 (skanda.6.95.15)
वसिष्ठ उवाच॥ तिस्रः कोट्योर्धकोटी च तीर्थानामिह भूतले॥ संति पार्थिवशार्दूल प्रभावसहितानि च
vasiṣṭha uvāca tisraḥ koṭyordhakoṭī ca tīrthānāmiha bhūtale saṁti pārthivaśārdūla prabhāvasahitāni ca
वसिष्ठ ने कहा — "हे राजाओं में श्रेष्ठ! इस भूतल पर साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं, जो सभी अपने-अपने प्रभाव से युक्त हैं।"
श्लोक 16 (skanda.6.95.16)
अष्टषष्टिस्तथा राजन्क्षेत्राणामस्ति भूतले॥ येषां सांनिध्यमभ्येति सर्वदैव महेश्वरः
aṣṭaṣaṣṭistathā rājankṣetrāṇāmasti bhūtale yeṣāṁ sāṁnidhyamabhyeti sarvadaiva maheśvaraḥ
"हे राजन्! इसके साथ ही भूतल पर अड़सठ क्षेत्र हैं, जहाँ महेश्वर सदा साक्षात् उपस्थित रहते हैं।"
श्लोक 17 (skanda.6.95.17)
तथा सर्वे सुरास्तुष्टा ब्रह्मविष्णु शिवादयः॥ परं सिद्धिप्रदं शीघ्रं मानुषाणां महीपते
tathā sarve surāstuṣṭā brahmaviṣṇu śivādayaḥ paraṁ siddhipradaṁ śīghraṁ mānuṣāṇāṁ mahīpate
"और हे राजन्! ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि सभी देवता वहाँ प्रसन्न रहते हैं, जो मनुष्यों को शीघ्र ही परम सिद्धि प्रदान करने वाला है।"
श्लोक 18 (skanda.6.95.18)
हाटकेश्वरदेवस्य क्षेत्रं पातकनाशनम्॥ देवानामपि सर्वेषां तुष्टिं गच्छति चंडिका
hāṭakeśvaradevasya kṣetraṁ pātakanāśanam devānāmapi sarveṣāṁ tuṣṭiṁ gacchati caṁḍikā
"देव हाटकेश्वर का यह क्षेत्र समस्त पापों का नाश करने वाला है, जहाँ देवी चण्डिका भी सभी देवताओं को संतुष्ट करती हैं।"
श्लोक 19 (skanda.6.95.19)
शीघ्रमाराधिता सम्यक्छ्रद्धायुक्तैर्नरैर्भुवि॥ तस्मात्तत्क्षेत्रमासाद्य तां देवीं श्रद्धयान्वितः॥ आराधय महाभाग द्रुतं सिद्धिमवाप्स्यसि
śīghramārādhitā samyakchraddhāyuktairnarairbhuvi tasmāttatkṣetramāsādya tāṁ devīṁ śraddhayānvitaḥ ārādhaya mahābhāga drutaṁ siddhimavāpsyasi
"पृथ्वी पर श्रद्धायुक्त मनुष्यों द्वारा सम्यक् रूप से आराधना किए जाने पर वह शीघ्र प्रसन्न होती हैं। अतः हे महाभाग! उस क्षेत्र में जाकर श्रद्धापूर्वक उस देवी की आराधना करो, तुम्हें शीघ्र सिद्धि प्राप्त होगी।"
श्लोक 20 (skanda.6.95.20)
एवमुक्तः स तेनाथ गत्वा तत्क्षेत्रमुत्तमम्॥ प्रतिष्ठाप्य च देवीं तां पूजयामास भक्तितः
evamuktaḥ sa tenātha gatvā tatkṣetramuttamam pratiṣṭhāpya ca devīṁ tāṁ pūjayāmāsa bhaktitaḥ
इस प्रकार कहे जाने पर वह राजा उस उत्तम क्षेत्र में जाकर, उस देवी को वहाँ प्रतिष्ठित कर, भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करने लगे।
श्लोक 21 (skanda.6.95.21)
ब्रह्मचर्यपरो भूत्वा शुचिर्व्रतपरायणः॥ नियतो नियताहारस्त्रिकालं स्नानमाचरन्
brahmacaryaparo bhūtvā śucirvrataparāyaṇaḥ niyato niyatāhārastrikālaṁ snānamācaran
वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, पवित्र और व्रतपरायण होकर, नियमपूर्वक तथा नियमित आहार लेते हुए, त्रिकाल स्नान करते रहे।
श्लोक 22 (skanda.6.95.22)
एवमाराध्यतस्तत्र गन्धपुष्पानुलेपनैः॥ पूजापरस्य सा देवी तस्य तुष्टिं ततो गता
evamārādhyatastatra gandhapuṣpānulepanaiḥ pūjāparasya sā devī tasya tuṣṭiṁ tato gatā
इस प्रकार वहाँ गंध, पुष्प और अनुलेपन से पूजा में तत्पर रहने वाले उस राजा से वह देवी प्रसन्न हो गईं।
श्लोक 23 (skanda.6.95.23)
देव्युवाच॥ परितुष्टास्मि ते वत्स व्रतेनानेन नित्यथः॥ बलिपूजाविधानेन विहितेनामुना स्वयम्
devyuvāca parituṣṭāsmi te vatsa vratenānena nityathaḥ balipūjāvidhānena vihitenāmunā svayam
देवी ने कहा — "हे वत्स! मैं तुम्हारे इस निरंतर व्रत से, तथा तुम्हारे द्वारा स्वयं विधिपूर्वक की गई इस बलि-पूजा से अत्यंत संतुष्ट हूँ।"
श्लोक 24 (skanda.6.95.24)
तद्ब्रूहि येन ते सर्वं प्रकरोमि हृदि स्थितम्॥ सद्य एव महीपाल त्रिदशैरपि दुर्लभम्
tadbrūhi yena te sarvaṁ prakaromi hṛdi sthitam sadya eva mahīpāla tridaśairapi durlabham
"अतः वह बताओ, जिससे हे राजन्! मैं तुम्हारे हृदय में स्थित सम्पूर्ण अभिलाषा को तत्काल पूर्ण कर दूँ, चाहे वह देवताओं के लिए भी दुर्लभ क्यों न हो।"
श्लोक 25 (skanda.6.95.25)
राजोवाच॥ लोकानां हितकामेन मयैतद्व्रतमाहृतम्॥ येन तेषां भवेत्सौख्यं मत्प्रसादादनुत्तमम्
rājovāca lokānāṁ hitakāmena mayaitadvratamāhṛtam yena teṣāṁ bhavetsaukhyaṁ matprasādādanuttamam
राजा ने कहा — "मैंने प्रजा के हित की कामना से यह व्रत धारण किया है, जिससे मेरे प्रसाद से उन्हें अनुपम सुख प्राप्त हो।"
श्लोक 26 (skanda.6.95.26)
तस्माद्देहि महाभागे ज्ञानयुक्तानि भूरिशः॥ ममास्त्राणि विचित्राणि स्वैरगाणि समन्ततः
tasmāddehi mahābhāge jñānayuktāni bhūriśaḥ mamāstrāṇi vicitrāṇi svairagāṇi samantataḥ
"अतः हे महाभागे! मुझे ज्ञानयुक्त, अनेक प्रकार के, स्वेच्छा से सर्वत्र संचरण करने वाले विचित्र अस्त्र प्रदान कीजिए।"
श्लोक 27 (skanda.6.95.27)
यानि जानंति भूपृष्ठे मम पार्श्वे स्थितान्यपि॥ अपराधं सदा लोके परदारादि यत्कृतम्
yāni jānaṁti bhūpṛṣṭhe mama pārśve sthitānyapi aparādhaṁ sadā loke paradārādi yatkṛtam
"जो अस्त्र मेरे निकट रहते हुए भी पृथ्वी पर होने वाले अपराध को जान लें — जैसे परस्त्रीगमन आदि जो लोक में किया जाता हो।"
श्लोक 28 (skanda.6.95.28)
अनुरूपं ततस्तस्य पातकस्य विनिग्रहम्॥ प्रकुर्वंति मिथो येन न तेषां संकरो भवेत्
anurūpaṁ tatastasya pātakasya vinigraham prakurvaṁti mitho yena na teṣāṁ saṁkaro bhavet
"और उस पाप के अनुरूप ही उसका दण्ड स्वयं दे दें, जिससे परस्पर वर्णसंकर आदि दोष उत्पन्न न हो।"
श्लोक 29 (skanda.6.95.29)
मंत्रग्रामं तथा देवि मम देहि पृथग्विधम्॥ निग्रहं व्याधिसत्त्वानां येन शीघ्रं करोम्यहम्
maṁtragrāmaṁ tathā devi mama dehi pṛthagvidham nigrahaṁ vyādhisattvānāṁ yena śīghraṁ karomyaham
"हे देवि! इसके साथ ही मुझे विभिन्न प्रकार का मंत्रसमूह भी दीजिए, जिससे मैं रोगकारक जीवों का शीघ्र निग्रह कर सकूँ।"
श्लोक 30 (skanda.6.95.30)
येन स्युर्मनुजाः सर्वे मम राज्ये सुखान्विताः॥ नीरोगाः पुष्टिसंपन्ना भयशोकविवर्जिताः
yena syurmanujāḥ sarve mama rājye sukhānvitāḥ nīrogāḥ puṣṭisaṁpannā bhayaśokavivarjitāḥ
"जिससे मेरे राज्य में समस्त मनुष्य सुखी, नीरोग, पुष्टिसम्पन्न तथा भय-शोक से रहित हो सकें।"
श्लोक 31 (skanda.6.95.31)
नाहं देवि करिष्यामि हस्त्यश्वरथसंग्रहम्॥ यतस्तेषां भवेत्पुष्टिर्वित्तैर्वित्तं करैर्भवेत्॥ गृहीतैः सर्वलोकानां तस्मात्तन्न ममेप्सितम्
nāhaṁ devi kariṣyāmi hastyaśvarathasaṁgraham yatasteṣāṁ bhavetpuṣṭirvittairvittaṁ karairbhavet gṛhītaiḥ sarvalokānāṁ tasmāttanna mamepsitam
"हे देवि! मैं हाथी, घोड़े, रथ आदि का संग्रह नहीं करूँगा, क्योंकि उनके पोषण के लिए धन चाहिए, और वह धन प्रजा से लिए गए कर से ही प्राप्त होता है; अतः वह मुझे अभीष्ट नहीं है।"
श्लोक 32 (skanda.6.95.32)
श्रीदेव्युवाच॥ अत्यद्भुततरं कर्म त्वयैतत्पृथिवीपते॥ प्रारब्धं यन्न केनापि कृतं न च करिष्यति
śrīdevyuvāca atyadbhutataraṁ karma tvayaitatpṛthivīpate prārabdhaṁ yanna kenāpi kṛtaṁ na ca kariṣyati
श्रीदेवी ने कहा — "हे राजन्! तुमने यह अत्यंत अद्भुत कार्य आरंभ किया है, जो न तो किसी ने कभी किया है, न कोई करेगा।"
श्लोक 33 (skanda.6.95.33)
तथाप्येवं करिष्यामि तव दास्यामि कृत्स्नशः॥ ज्ञानयुक्तानि शस्त्राणि मंत्रग्रामं च तादृशम्
tathāpyevaṁ kariṣyāmi tava dāsyāmi kṛtsnaśaḥ jñānayuktāni śastrāṇi maṁtragrāmaṁ ca tādṛśam
"फिर भी, मैं ऐसा ही करूँगी; मैं तुम्हें ज्ञानयुक्त शस्त्र तथा वैसा ही मंत्रसमूह पूर्ण रूप से प्रदान करूँगी।"
श्लोक 34 (skanda.6.95.34)
गृह्यन्ते येन ते सर्वे व्याधयोऽपि सुदारुणाः॥ परं सदैव ते रक्ष्या मन्मन्त्रैरपि संयुताः
gṛhyante yena te sarve vyādhayo'pi sudāruṇāḥ paraṁ sadaiva te rakṣyā manmantrairapi saṁyutāḥ
"जिनसे अत्यंत भयंकर रोग भी वश में किए जा सकेंगे; परंतु उन्हें, मेरे मंत्रों से युक्त होते हुए भी, सदा सुरक्षित रखना होगा।"
श्लोक 35 (skanda.6.95.35)
यदि दृष्टिपथात्तुभ्यं क्वचिद्यास्यंति दूरतः॥ मानवान्पीडयिष्यंति चिरात्प्राप्याधिकं ततः
yadi dṛṣṭipathāttubhyaṁ kvacidyāsyaṁti dūrataḥ mānavānpīḍayiṣyaṁti cirātprāpyādhikaṁ tataḥ
"यदि वे किसी प्रकार तुम्हारी दृष्टि से दूर चले जाएँ, तो वे बहुत समय बाद और भी अधिक शक्तिशाली होकर मनुष्यों को पीड़ित करेंगे।"
श्लोक 36 (skanda.6.95.36)
यदा त्वं पृथिवीपाल स्वर्गं यास्यसि भूतलात्॥ तदात्र सलिले स्थाप्या मदग्रे यद्व्यवस्थितम्
yadā tvaṁ pṛthivīpāla svargaṁ yāsyasi bhūtalāt tadātra salile sthāpyā madagre yadvyavasthitam
"हे राजन्! जब तुम इस भूतल से स्वर्ग को प्रस्थान करोगे, तब मेरे समक्ष जो कुछ भी स्थापित है, उसे इसी जल में विसर्जित कर देना।"
श्लोक 37 (skanda.6.95.37)
सर्वे मंत्रास्तथाऽस्त्राणि ममवाक्यादसंशयम्॥ येन स्यात्पूर्ववत्सर्वो व्यवहारो नृपोद्भवः
sarve maṁtrāstathā'strāṇi mamavākyādasaṁśayam yena syātpūrvavatsarvo vyavahāro nṛpodbhavaḥ
"मेरे वचन से निःसंदेह वे सभी मंत्र तथा अस्त्र उसी जल में स्थापित हो जाएँ, जिससे राजा से उत्पन्न होने वाला सम्पूर्ण व्यवहार पूर्ववत् चलता रहे।"
श्लोक 38 (skanda.6.95.38)
सूत उवाच॥ बाढमित्येव तेनोक्ते तत्क्षणाद्द्विजसत्तमाः॥ प्रादुर्भूतानि दिव्यानि तस्यास्त्राणि बहूनि च
sūta uvāca bāḍhamityeva tenokte tatkṣaṇāddvijasattamāḥ prādurbhūtāni divyāni tasyāstrāṇi bahūni ca
सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ द्विजो! राजा द्वारा "ऐसा ही हो" कहते ही तत्क्षण उसके लिए अनेक दिव्य अस्त्र प्रकट हो गए।
श्लोक 39 (skanda.6.95.39)
ज्ञानसंपत्प्रयुक्तानि यादृशानि महात्मना॥ तेन संयाचितान्येव व्याधिमंत्रास्तथैव च
jñānasaṁpatprayuktāni yādṛśāni mahātmanā tena saṁyācitānyeva vyādhimaṁtrāstathaiva ca
वे वैसे ही ज्ञान-सम्पन्न अस्त्र थे, जैसे उस महात्मा राजा ने माँगे थे, और उसी प्रकार व्याधि-निवारक मंत्र भी प्रकट हुए।
श्लोक 40 (skanda.6.95.40)
व्याधयो यैश्च गृह्यंते मुच्यंते स्वेच्छया सदा॥ सुखेन परिपाल्यंते दृष्टिगोचरसंस्थिताः
vyādhayo yaiśca gṛhyaṁte mucyaṁte svecchayā sadā sukhena paripālyaṁte dṛṣṭigocarasaṁsthitāḥ
उनके द्वारा रोग पकड़े जाकर सदा अपनी इच्छा से मुक्त भी कर दिए जाते थे; और वे राजा की दृष्टि के समक्ष रहते हुए सुखपूर्वक संरक्षित रहते थे।
श्लोक 41 (skanda.6.95.41)
ततस्तं सकलं प्राप्य प्रसादं चंडिकोद्भवम्॥ तच्च हस्त्यादिकं सर्वं ब्राह्मणेभ्यो ददौ नृप
tatastaṁ sakalaṁ prāpya prasādaṁ caṁḍikodbhavam tacca hastyādikaṁ sarvaṁ brāhmaṇebhyo dadau nṛpa
तत्पश्चात् चण्डिका से प्राप्त उस सम्पूर्ण प्रसाद को पाकर, राजा ने अपने पूर्व से रखे हाथी आदि सब कुछ भी ब्राह्मणों को दान कर दिया।
श्लोक 42 (skanda.6.95.42)
एकां मुक्त्वा निजां भार्यामेकं दशरथं सुतम्॥ तांश्चापि सकलान्व्याधीन्मंत्रैः संयम्य यत्नतः
ekāṁ muktvā nijāṁ bhāryāmekaṁ daśarathaṁ sutam tāṁścāpi sakalānvyādhīnmaṁtraiḥ saṁyamya yatnataḥ
केवल अपनी एक पत्नी और एक पुत्र दशरथ को छोड़कर शेष सब दान कर दिया। और उन सभी रोगों को भी उसने मंत्रों द्वारा यत्नपूर्वक वश में कर लिया।
श्लोक 43 (skanda.6.95.43)
अजारूपान्स्वयं पश्चाद्यष्टिमादाय रक्षति॥ एवं तस्य नरेन्द्रस्य वर्तमानस्य भूतले
ajārūpānsvayaṁ paścādyaṣṭimādāya rakṣati evaṁ tasya narendrasya vartamānasya bhūtale
उसने उन्हें बकरियों के रूप में परिवर्तित कर दिया, और स्वयं एक छड़ी लेकर उनकी रक्षा करने लगा। इस प्रकार वह राजा भूतल पर रहने लगा।
श्लोक 44 (skanda.6.95.44)
गुप्तोऽपि नापराधः स्यात्कस्यचित्प्रकटः कुतः॥ प्रमादाद्यदि भूलोके कश्चित्पापं समाचरेत्
gupto'pi nāparādhaḥ syātkasyacitprakaṭaḥ kutaḥ pramādādyadi bhūloke kaścitpāpaṁ samācaret
उसके राज्य में किसी का भी अपराध, चाहे वह छिपा हुआ हो, प्रकट हुए बिना नहीं रहता था; यदि पृथ्वी पर कोई प्रमादवश कोई पाप कर बैठता...
श्लोक 45 (skanda.6.95.45)
तद्रूपो निग्रहस्तस्य तत्क्षणादेव जायते॥ वधं वा यदि वा बंधं क्लेशं चाऽरातिसंभवम्
tadrūpo nigrahastasya tatkṣaṇādeva jāyate vadhaṁ vā yadi vā baṁdhaṁ kleśaṁ cā'rātisaṁbhavam
...तो उसी क्षण उसे उस पाप के अनुरूप दण्ड मिल जाता था — चाहे वह वध हो, बंधन हो, अथवा शत्रु से उत्पन्न कोई क्लेश हो।
श्लोक 46 (skanda.6.95.46)
अदृष्टान्यपि शस्त्राणि तानि कुर्वंति तत्क्षणात्॥ अन्येषां च महीपानां राज्ये गुप्तान्यनेकशः॥ कुर्वन्ति मनुजास्तेषां चक्रे वैवस्वतो ग्रहम्
adṛṣṭānyapi śastrāṇi tāni kurvaṁti tatkṣaṇāt anyeṣāṁ ca mahīpānāṁ rājye guptānyanekaśaḥ kurvanti manujāsteṣāṁ cakre vaivasvato graham
वे अस्त्र, अदृश्य रहते हुए भी, यह कार्य उसी क्षण कर देते थे। और अन्य राजाओं के राज्यों में गुप्त रूप से जो अनेक पाप मनुष्य करते थे, उन सबका ग्रहण यमराज ही करते थे।
श्लोक 47 (skanda.6.95.47)
न तत्र भयसंत्रस्तस्ततः पापसमाचरेत्॥ प्रत्यक्षं वा विशेषेण ज्ञात्वा शस्त्रभयं च तत्
na tatra bhayasaṁtrastastataḥ pāpasamācaret pratyakṣaṁ vā viśeṣeṇa jñātvā śastrabhayaṁ ca tat
वहाँ भय से त्रस्त कोई भी व्यक्ति पाप नहीं करता था, विशेषतः उन अस्त्रों के भय को प्रत्यक्ष रूप से जानकर।
श्लोक 48 (skanda.6.95.48)
ततस्ते पापनिर्मुक्ता लोकाः संशुद्धगात्रकाः॥ रोगेषु निगृहीतेषु प्राप्ताः सुखमनुत्तमम्
tataste pāpanirmuktā lokāḥ saṁśuddhagātrakāḥ rogeṣu nigṛhīteṣu prāptāḥ sukhamanuttamam
तत्पश्चात् वे प्रजाजन पापों से मुक्त और शुद्ध शरीर वाले हो गए, और रोगों के वश में कर लिए जाने पर उन्होंने अनुपम सुख प्राप्त किया।
श्लोक 49 (skanda.6.95.49)
एवं स्थितेषु लोकेषु गतपापामयेषु च॥ प्रयाताः शून्यतां सर्वे नरका ये यमालये
evaṁ sthiteṣu lokeṣu gatapāpāmayeṣu ca prayātāḥ śūnyatāṁ sarve narakā ye yamālaye
इस प्रकार जब सम्पूर्ण प्रजा पापों और रोगों से रहित हो गई, तब यमलोक में स्थित समस्त नरक शून्य हो गए।
श्लोक 50 (skanda.6.95.50)
न कश्चिन्नरकं याति न च मृत्युपथं नरः॥ यथा कृतयुगं तादृक्त्रेतायामपि संस्थितम्
na kaścinnarakaṁ yāti na ca mṛtyupathaṁ naraḥ yathā kṛtayugaṁ tādṛktretāyāmapi saṁsthitam
उस राज्य में न कोई नरक को जाता था, न कोई मनुष्य असामयिक मृत्यु को प्राप्त होता था; त्रेतायुग में भी कृतयुग जैसी स्थिति बनी रही।
श्लोक 51 (skanda.6.95.51)
व्यवहारे ततो नष्टे यमलोकसमुद्भवे॥ स्वर्गेण तुल्यतां प्राप्ते प्राणिभिर्मृत्युवर्जितैः
vyavahāre tato naṣṭe yamalokasamudbhave svargeṇa tulyatāṁ prāpte prāṇibhirmṛtyuvarjitaiḥ
इस प्रकार यमलोक से सम्बंधित व्यवहार समाप्त हो गया, और मृत्युरहित प्राणियों के कारण वह राज्य स्वर्ग के समान हो गया।
श्लोक 52 (skanda.6.95.52)
ततो वैवस्वतो गत्वा ब्रह्मणः सदनं प्रति॥ प्रोवाच दुःखसंपन्नः प्रणिपत्य पितामहम्
tato vaivasvato gatvā brahmaṇaḥ sadanaṁ prati provāca duḥkhasaṁpannaḥ praṇipatya pitāmaham
तत्पश्चात् यमराज ब्रह्मा के सदन में जाकर, दुःखयुक्त होकर, पितामह को प्रणाम कर बोले।
श्लोक 53 (skanda.6.95.53)
अहं पुरा त्वया देव धर्माधर्मदिदृक्षया॥ मानुषाणां समादिष्टो निग्रहानुग्रहं प्रति
ahaṁ purā tvayā deva dharmādharmadidṛkṣayā mānuṣāṇāṁ samādiṣṭo nigrahānugrahaṁ prati
"हे देव! पूर्वकाल में आपने मुझे मनुष्यों के धर्म-अधर्म को देखने की इच्छा से, उनके निग्रह और अनुग्रह के विषय में आदेश दिया था।"
श्लोक 54 (skanda.6.95.54)
अजापालेन भूपेन तत्सर्वं विफलीकृतम्॥ तपःशक्त्या सुरश्रेष्ठ देवीमाराध्य चंडिकाम्
ajāpālena bhūpena tatsarvaṁ viphalīkṛtam tapaḥśaktyā suraśreṣṭha devīmārādhya caṁḍikām
"हे देवश्रेष्ठ! राजा अजापाल ने अपनी तपःशक्ति से देवी चण्डिका की आराधना करके, वह सब कुछ निष्फल कर दिया है।"
श्लोक 55 (skanda.6.95.55)
नाधयो व्याधयस्तत्र न पापानि महीतले॥ कस्यचिद्देव जायंते यथा कृतयुगे तथा
nādhayo vyādhayastatra na pāpāni mahītale kasyaciddeva jāyaṁte yathā kṛtayuge tathā
"हे देव! वहाँ न किसी को मानसिक व्याधि होती है, न शारीरिक रोग, न ही पृथ्वी पर कोई पाप उत्पन्न होता है — वहाँ वैसी ही स्थिति है जैसी कृतयुग में होती थी।"
श्लोक 56 (skanda.6.95.56)
तस्मात्कुरु सुरश्रेष्ठ पुनरेव यथा पुरा॥ मदीयभवने कृत्स्नो व्यवहारः प्रजायते
tasmātkuru suraśreṣṭha punareva yathā purā madīyabhavane kṛtsno vyavahāraḥ prajāyate
"अतः हे देवश्रेष्ठ! ऐसा उपाय कीजिए कि मेरे सदन में पहले जैसा सम्पूर्ण व्यवहार पुनः चलने लगे।"
श्लोक 57 (skanda.6.95.57)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा लोकपितामहः॥ समीप उपविष्टस्य शिवस्याऽऽस्यं व्यलोकयत्
tasya tadvacanaṁ śrutvā brahmā lokapitāmahaḥ samīpa upaviṣṭasya śivasyā''syaṁ vyalokayat
उसका यह वचन सुनकर लोकपितामह ब्रह्मा ने अपने समीप बैठे हुए शिव की ओर देखा।
श्लोक 58 (skanda.6.95.58)
अथाब्रवीत्प्रहस्योच्चैस्त्रिनेत्रश्चतुराननम्॥ अत्यद्भुततमां श्रुत्वा तां वार्तां यमसंभवाम्
athābravītprahasyoccaistrinetraścaturānanam atyadbhutatamāṁ śrutvā tāṁ vārtāṁ yamasaṁbhavām
तब यम की उस अत्यंत आश्चर्यजनक बात को सुनकर, त्रिनेत्रधारी शिव ने उच्च स्वर में हँसते हुए चतुर्मुख ब्रह्मा से कहा।
श्लोक 59 (skanda.6.95.59)
महेश्वर उवाच॥ धर्ममार्गप्रवृत्तस्य सदाचारस्य भूपतेः॥ कथं निवारणं तत्र क्रियते कश्च निग्रहः
maheśvara uvāca dharmamārgapravṛttasya sadācārasya bhūpateḥ kathaṁ nivāraṇaṁ tatra kriyate kaśca nigrahaḥ
महेश्वर ने कहा — "जो राजा धर्म के मार्ग में प्रवृत्त तथा सदाचारी है, उसका निवारण किस प्रकार किया जाए, और उसका निग्रह ही क्या हो सकता है?"
श्लोक 60 (skanda.6.95.60)
तस्मात्तेन महीपेन यस्मान्मार्गः प्रदर्शितः॥ अपूर्वो धर्मसंभूतः कृतः सम्यङ्महात्मना
tasmāttena mahīpena yasmānmārgaḥ pradarśitaḥ apūrvo dharmasaṁbhūtaḥ kṛtaḥ samyaṅmahātmanā
"इसलिए उस महात्मा राजा ने जो अपूर्व, धर्म से उत्पन्न मार्ग सम्यक् रूप से दिखाया है, वह अभूतपूर्व है।"
श्लोक 61 (skanda.6.95.61)
तन्मयापि यथा चास्य प्रसादः सुरसत्तम॥ अपूर्वः करणीयश्च यथा धर्मो न दुष्यति
tanmayāpi yathā cāsya prasādaḥ surasattama apūrvaḥ karaṇīyaśca yathā dharmo na duṣyati
"हे देवश्रेष्ठ! इसलिए मुझे भी उस पर वैसा ही अपूर्व अनुग्रह करना चाहिए, जिससे उसका धर्म दूषित न हो।"
श्लोक 62 (skanda.6.95.62)
एवमुक्त्वा चतुर्वक्त्रं यमं प्राह ततः शिवः॥ वदायुषोऽस्य यच्छेषमजापालस्य भूपतेः॥ येन तत्समये प्राप्ते तं नयामि निजालयम्
evamuktvā caturvaktraṁ yamaṁ prāha tataḥ śivaḥ vadāyuṣo'sya yaccheṣamajāpālasya bhūpateḥ yena tatsamaye prāpte taṁ nayāmi nijālayam
ऐसा कहकर शिव ने चतुर्मुख ब्रह्मा के समक्ष यह कहते हुए यम से पूछा — "बताओ, राजा अजापाल की शेष आयु कितनी है, जिससे वह समय आने पर मैं उसे अपने धाम को ले जा सकूँ।"
श्लोक 63 (skanda.6.95.63)
यम उवाच॥ पञ्चवर्षसहस्राणि तस्यातीतानि चायुषः॥ तिष्ठंति पञ्चपञ्चाशत्प्रतीक्ष्येऽहं ततः कथम्
yama uvāca pañcavarṣasahasrāṇi tasyātītāni cāyuṣaḥ tiṣṭhaṁti pañcapañcāśatpratīkṣye'haṁ tataḥ katham
यम ने कहा — "उसकी आयु के पाँच हज़ार वर्ष बीत चुके हैं, और पचपन वर्ष शेष हैं। ऐसी स्थिति में मैं और कब तक प्रतीक्षा करूँ?"
श्लोक 64 (skanda.6.95.64)
यावत्कालं सुरश्रेष्ठ शून्ये जाते स्व आश्रये॥ तस्मात्कुरु द्रुतं कंचिदुपायं तद्विनाशने
yāvatkālaṁ suraśreṣṭha śūnye jāte sva āśraye tasmātkuru drutaṁ kaṁcidupāyaṁ tadvināśane
"हे देवश्रेष्ठ! जब तक मेरा अपना निवास-स्थान इस प्रकार शून्य रहेगा, मैं कब तक प्रतीक्षा करूँ? अतः इसके शीघ्र विनाश के लिए कोई उपाय कीजिए।"
श्लोक 65 (skanda.6.95.65)
एवमुक्ते यमेनाथ तं विसृज्य गृहं प्रति॥ व्याघ्ररूपं समास्थाय स्वयं तत्संनिधौ ययौ
evamukte yamenātha taṁ visṛjya gṛhaṁ prati vyāghrarūpaṁ samāsthāya svayaṁ tatsaṁnidhau yayau
यम द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, शिव ने उसे अपने भवन को विदा कर, स्वयं व्याघ्र का रूप धारण कर उस राजा के समीप गए।
श्लोक 66 (skanda.6.95.66)
यत्र संस्थो महीपः स प्रजापालनतत्परः॥ मेघगम्भीरनिर्घोषं गर्जमानो मुहुर्मुहुः
yatra saṁstho mahīpaḥ sa prajāpālanatatparaḥ meghagambhīranirghoṣaṁ garjamāno muhurmuhuḥ
वे बार-बार मेघ के समान गम्भीर गर्जना करते हुए वहाँ पहुँचे, जहाँ वह प्रजापालन में तत्पर राजा स्थित था।
श्लोक 67 (skanda.6.95.67)
अजास्तास्तं च संवीक्ष्य व्याघ्रं रौद्रवपुर्द्धरम्॥ अजापालं समुद्दिश्य संत्रस्ताः शरणं गताः
ajāstāstaṁ ca saṁvīkṣya vyāghraṁ raudravapurddharam ajāpālaṁ samuddiśya saṁtrastāḥ śaraṇaṁ gatāḥ
उस भयंकर रूपधारी व्याघ्र को देखकर वे बकरियाँ भयभीत होकर राजा अजापाल की ओर शरण के लिए दौड़ीं।
श्लोक 68 (skanda.6.95.68)
तस्य यत्नपरस्यापि रक्षमाणस्य भूपतेः॥ अजास्ता व्याघ्ररूपेण शंकरेण प्रभक्षिताः
tasya yatnaparasyāpi rakṣamāṇasya bhūpateḥ ajāstā vyāghrarūpeṇa śaṁkareṇa prabhakṣitāḥ
यत्नपूर्वक उनकी रक्षा करते हुए भी उस राजा के सामने ही, व्याघ्ररूपधारी शंकर ने उन बकरियों को खा डाला।
श्लोक 69 (skanda.6.95.69)
अजानां कदनं दृष्ट्वा ततः स पृथिवीपतिः॥ स्वहस्ताद्यष्टिमुत्सृज्य जग्राह निशितायुधम्
ajānāṁ kadanaṁ dṛṣṭvā tataḥ sa pṛthivīpatiḥ svahastādyaṣṭimutsṛjya jagrāha niśitāyudham
बकरियों का यह संहार देखकर वह राजा अपने हाथ की छड़ी को त्यागकर तीक्ष्ण अस्त्र लेने के लिए दौड़ा।
श्लोक 70 (skanda.6.95.70)
यत्तस्य तुष्टया दत्तं चंडं चंडार्चिषा समम्॥ तच्छस्त्रं च तथान्यानि देवीदत्तानि शंकरः॥ शनैःशनैः प्रजग्राह स्ववक्त्रेण महेश्वरः
yattasya tuṣṭayā dattaṁ caṁḍaṁ caṁḍārciṣā samam tacchastraṁ ca tathānyāni devīdattāni śaṁkaraḥ śanaiḥśanaiḥ prajagrāha svavaktreṇa maheśvaraḥ
जो प्रचण्ड अग्नि के समान वह शस्त्र देवी की प्रसन्नता से उसे प्राप्त हुआ था, उस शस्त्र को तथा देवी द्वारा दिए गए अन्य सभी अस्त्रों को महेश्वर शंकर ने धीरे-धीरे अपने ही मुख से निगल लिया।
श्लोक 71 (skanda.6.95.71)
अस्त्राभावात्ततस्तूर्णं ध्रियमाणेऽपि कांतया॥ द्वंद्वयुद्धेन तं व्याघ्रं योधयामास भूपतिः
astrābhāvāttatastūrṇaṁ dhriyamāṇe'pi kāṁtayā dvaṁdvayuddhena taṁ vyāghraṁ yodhayāmāsa bhūpatiḥ
तत्पश्चात् अस्त्रों के अभाव में, अपनी पत्नी द्वारा शीघ्रता से रोके जाने पर भी, राजा ने उस व्याघ्र से हाथों-हाथ द्वंद्वयुद्ध किया।
श्लोक 72 (skanda.6.95.72)
ततस्तस्यांगसंस्पर्शान्मुक्त्वा व्याघ्रतनुं च ताम्॥ दधार भस्मसंदिग्धां तनुं चन्द्रविभूषिताम्
tatastasyāṁgasaṁsparśānmuktvā vyāghratanuṁ ca tām dadhāra bhasmasaṁdigdhāṁ tanuṁ candravibhūṣitām
तब उसके अंगों के स्पर्श से प्रसन्न होकर शिव ने उस व्याघ्र-शरीर को त्यागकर भस्म से लिप्त, चंद्रमा से विभूषित अपना वास्तविक रूप धारण किया।
श्लोक 73 (skanda.6.95.73)
रुंडमालावरां दिव्यां सखट्वांगां सपन्नगाम्॥ तां दृष्ट्वा स महीपालः सभार्यः प्रणतस्ततः
ruṁḍamālāvarāṁ divyāṁ sakhaṭvāṁgāṁ sapannagām tāṁ dṛṣṭvā sa mahīpālaḥ sabhāryaḥ praṇatastataḥ
मुण्डमाला से युक्त, खट्वांग तथा सर्पों से सुशोभित उस दिव्य रूप को देखकर वह राजा अपनी पत्नी सहित प्रणत हो गया।
श्लोक 74 (skanda.6.95.74)
प्रोवाचाथ स्तुतिं कृत्वा विनयावनतः स्थितः॥ आनंदाश्रुपरिक्लिन्नो हर्षगद्गदया गिरा
provācātha stutiṁ kṛtvā vinayāvanataḥ sthitaḥ ānaṁdāśrupariklinno harṣagadgadayā girā
फिर विनयपूर्वक झुककर, आनंद के अश्रुओं से भीगे हुए, हर्ष से गद्गद वाणी में स्तुति करते हुए वह बोला।
श्लोक 75 (skanda.6.95.75)
राजोवाच॥ अज्ञानाद्यन्मया देव प्रहारास्तव निर्मिताः॥ तिरस्कारस्तथा दत्तस्तत्सर्वं क्षम्यतां विभो
rājovāca ajñānādyanmayā deva prahārāstava nirmitāḥ tiraskārastathā dattastatsarvaṁ kṣamyatāṁ vibho
राजा ने कहा — "हे प्रभो! अज्ञानवश जो प्रहार मैंने आप पर किए, तथा जो तिरस्कार मैंने आपको दिया, हे विभो! वह सब क्षमा कीजिए।"
श्लोक 76 (skanda.6.95.76)
श्रीभगवानुवाच॥ क्षांत एष मया पुत्र तव सर्वः पराभवः॥ परितुष्टेन ते कर्म दृष्ट्वा चैवातिमानुषम्
śrībhagavānuvāca kṣāṁta eṣa mayā putra tava sarvaḥ parābhavaḥ parituṣṭena te karma dṛṣṭvā caivātimānuṣam
भगवान शिव ने कहा — "हे पुत्र! मैंने तुम्हारा वह सब अपराध क्षमा कर दिया है; तुम्हारे अतिमानुषिक कर्म को देखकर मैं परम संतुष्ट हूँ।"
श्लोक 77 (skanda.6.95.77)
यथा कृतं त्वया राज्यं प्रजाः संरक्षिता नृप॥ तथान्यो भूपतिः कश्चिन्न कर्ता न करिष्यति
yathā kṛtaṁ tvayā rājyaṁ prajāḥ saṁrakṣitā nṛpa tathānyo bhūpatiḥ kaścinna kartā na kariṣyati
"हे राजन्! जिस प्रकार तुमने राज्य चलाया और प्रजा की रक्षा की, वैसा कोई अन्य राजा न कभी करने वाला हुआ है, न कभी करेगा।"
श्लोक 78 (skanda.6.95.78)
तस्माद्गच्छ मया सार्धं पाताले पार्थिवोत्तम॥ अनेनैव शरीरेण धर्मपत्न्यानया सह
tasmādgaccha mayā sārdhaṁ pātāle pārthivottama anenaiva śarīreṇa dharmapatnyānayā saha
"हे राजश्रेष्ठ! इसलिए अपनी इस धर्मपत्नी के साथ, इसी शरीर से, मेरे साथ पाताल को चलो।"
श्लोक 79 (skanda.6.95.79)
नातः परं त्वया स्थेयं मर्त्यलोके कथंचन॥ विरुद्धं सर्वदेवानां यतः कर्म त्वदुद्भवम्
nātaḥ paraṁ tvayā stheyaṁ martyaloke kathaṁcana viruddhaṁ sarvadevānāṁ yataḥ karma tvadudbhavam
"अब इसके पश्चात् तुम्हें मृत्युलोक में किसी भी प्रकार नहीं रहना चाहिए, क्योंकि तुमसे उत्पन्न हुआ यह कार्य समस्त देवताओं की व्यवस्था के विरुद्ध जाने वाला है।"
श्लोक 80 (skanda.6.95.80)
राजोवाच॥ एवं देव करिष्यामि गत्वाऽयोध्यां महापुरीम्॥ पुत्रं राज्ये प्रतिष्ठाप्य मंत्रिणां संनिवेद्य च
rājovāca evaṁ deva kariṣyāmi gatvā'yodhyāṁ mahāpurīm putraṁ rājye pratiṣṭhāpya maṁtriṇāṁ saṁnivedya ca
राजा ने कहा — "हे देव! ऐसा ही करूँगा। पहले अयोध्या महापुरी जाकर, अपने पुत्र को राज्य पर प्रतिष्ठित करके तथा मंत्रियों को सूचित करके..."
श्लोक 81 (skanda.6.95.81)
तथाहं देव देव्या च प्रोक्तः संतुष्टया पुरा॥ मन्त्रग्रामो यया दत्तः शस्त्राणि विविधानि च
tathāhaṁ deva devyā ca proktaḥ saṁtuṣṭayā purā mantragrāmo yayā dattaḥ śastrāṇi vividhāni ca
"...और हे देव! पूर्वकाल में जिस संतुष्ट देवी ने मुझे मंत्रसमूह तथा विविध शस्त्र प्रदान किए थे, उन्होंने मुझसे यह भी कहा था..."
श्लोक 82 (skanda.6.95.82)
यदा त्वं त्यजसि प्राज्ञ मर्त्यलोकं सुदुस्त्यजम्॥ तदात्र मामके कुण्डे प्रक्षेप्तव्यानि कृत्स्नशः
yadā tvaṁ tyajasi prājña martyalokaṁ sudustyajam tadātra māmake kuṇḍe prakṣeptavyāni kṛtsnaśaḥ
"...'हे प्राज्ञ! जब तुम इस अत्यंत दुष्त्यज्य मृत्युलोक को त्यागोगे, तब उन सबको यहाँ मेरे कुण्ड में पूर्ण रूप से विसर्जित कर देना।'"
श्लोक 83 (skanda.6.95.83)
तानि चार्पय मे भूयो येनानृण्यं व्रजाम्यहम्॥ तस्या देव्याः सुराधीश त्वत्प्रसादेन सांप्रतम्
tāni cārpaya me bhūyo yenānṛṇyaṁ vrajāmyaham tasyā devyāḥ surādhīśa tvatprasādena sāṁpratam
"अतः हे देवाधीश! उस देवी के प्रति अपना ऋण चुकाने हेतु, मुझे अनुमति दीजिए कि मैं अब आपकी कृपा से उन सबको पुनः उन्हें अर्पित कर दूँ।"
श्लोक 84 (skanda.6.95.84)
एवमुक्तस्ततस्तेन भगवांस्त्रिपुरांतकः॥ आज्ञाप्य तानि सर्वाणि ददौ तत्र द्रुतं गतः
evamuktastatastena bhagavāṁstripurāṁtakaḥ ājñāpya tāni sarvāṇi dadau tatra drutaṁ gataḥ
इस प्रकार कहे जाने पर त्रिपुरांतक भगवान शिव ने आज्ञा देकर, वह वहाँ शीघ्र जाकर वह सब कुछ देवी को अर्पित करा दिया।
श्लोक 85 (skanda.6.95.85)
अब्रवीच्च सुतस्तत्र स्वयं राजा भविष्यति॥ वीर्यौदार्यसमोपेतो वंशस्योद्धरणक्षमः
abravīcca sutastatra svayaṁ rājā bhaviṣyati vīryaudāryasamopeto vaṁśasyoddharaṇakṣamaḥ
और शिव ने कहा — "वहाँ तुम्हारा पुत्र स्वयं राजा होगा, जो पराक्रम और उदारता से युक्त तथा वंश का उद्धार करने में समर्थ होगा।"
श्लोक 86 (skanda.6.95.86)
त्वं चागच्छ मया सार्धमद्यैव मम मंदिरे॥ प्रविश्यात्र जले पुण्ये देवीकुण्डसमुद्भवे
tvaṁ cāgaccha mayā sārdhamadyaiva mama maṁdire praviśyātra jale puṇye devīkuṇḍasamudbhave
"और तुम आज ही मेरे साथ मेरे मंदिर में आओ, और देवीकुण्ड में स्थित इस पुण्य जल में प्रवेश करो।"
श्लोक 87 (skanda.6.95.87)
अद्य माघचतुर्दश्यां शुक्लायामपरोऽपि यः॥ देवीमिमां च संपूज्य जलेऽस्मिन्भक्तिसंयुतः
adya māghacaturdaśyāṁ śuklāyāmaparo'pi yaḥ devīmimāṁ ca saṁpūjya jale'sminbhaktisaṁyutaḥ
"आज माघ मास की शुक्ल चतुर्दशी है; इसके अतिरिक्त भी जो कोई इस देवी की पूजा करके भक्तिपूर्वक इस जल में..."
श्लोक 88 (skanda.6.95.88)
करिष्यति प्रवेशेन प्राणत्यागं नृपोत्तम॥ स च यास्यति यत्रास्ते पाताले हाटकेश्वरः
kariṣyati praveśena prāṇatyāgaṁ nṛpottama sa ca yāsyati yatrāste pātāle hāṭakeśvaraḥ
"...हे राजश्रेष्ठ! प्रवेश कर अपने प्राणों का त्याग करेगा, वह भी वहीं जाएगा, जहाँ पाताल में हाटकेश्वर विराजमान हैं।"
श्लोक 89 (skanda.6.95.89)
स्नानं वा पार्थिवश्रेष्ठ यः करिष्यति मानवः॥ अष्टोत्तरशतं तस्य व्याधीनां न भविष्यति
snānaṁ vā pārthivaśreṣṭha yaḥ kariṣyati mānavaḥ aṣṭottaraśataṁ tasya vyādhīnāṁ na bhaviṣyati
"हे राजश्रेष्ठ! और जो मनुष्य केवल स्नान ही करेगा, उसे एक सौ आठ प्रकार के रोगों में से कोई भी रोग नहीं होगा।"
श्लोक 90 (skanda.6.95.90)
एवमुक्त्वा तमादाय नृपं भार्यासमन्वितम्॥ अजाभिस्ताभिरस्त्रैश्च तैश्चापि परमेश्वरः॥ प्रविवेश जले तस्मिन्देवीकुण्डसमुद्भवे
evamuktvā tamādāya nṛpaṁ bhāryāsamanvitam ajābhistābhirastraiśca taiścāpi parameśvaraḥ praviveśa jale tasmindevīkuṇḍasamudbhave
ऐसा कहकर परमेश्वर शिव उस राजा को उसकी पत्नी, उन बकरियों तथा उन अस्त्रों सहित लेकर देवीकुण्ड से उत्पन्न उस जल में प्रविष्ट हो गए।
श्लोक 91 (skanda.6.95.91)
ततश्च मंदिरं नीतः स्वकीयं द्विजसत्तमाः॥ तेनैव नरदेहेन स कलत्रसमन्वितः
tataśca maṁdiraṁ nītaḥ svakīyaṁ dvijasattamāḥ tenaiva naradehena sa kalatrasamanvitaḥ
हे श्रेष्ठ द्विजो! तत्पश्चात् वह राजा उसी मनुष्य-शरीर में, अपनी पत्नी सहित, अपने मंदिर को ले जाया गया।
श्लोक 92 (skanda.6.95.92)
अद्यापि तिष्ठते तत्र जरामरणवर्जितः॥ पूजयानश्च तं देवं पाताले हाटकेश्वरम्
adyāpi tiṣṭhate tatra jarāmaraṇavarjitaḥ pūjayānaśca taṁ devaṁ pātāle hāṭakeśvaram
आज भी वह वहाँ जरा-मृत्यु से रहित होकर स्थित है, पाताल में उन देव हाटकेश्वर की पूजा करता हुआ।
श्लोक 93 (skanda.6.95.93)
एवं तत्र समुद्भूता सा देवी परमेश्वरी॥ स्थापिता तेन भूपेन श्रद्धापूतेन चेतसा
evaṁ tatra samudbhūtā sā devī parameśvarī sthāpitā tena bhūpena śraddhāpūtena cetasā
इस प्रकार वहाँ उत्पन्न हुई वह परमेश्वरी देवी उस राजा द्वारा श्रद्धा से पवित्र हुए चित्त से स्थापित की गई।