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नागर खण्ड · अध्याय 94

लोहयष्टि माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 93अध्याय-सूचीअध्याय 95

श्लोक 1 (skanda.6.94.1)

सूत उवाच॥ तथान्या लोहयष्टिस्तु तस्मिन्क्षेत्रेऽतिशोभना॥ मुक्ता परशुरामेण भंक्त्वा निजकुठारकम्

sūta uvāca tathānyā lohayaṣṭistu tasminkṣetre'tiśobhanā muktā paraśurāmeṇa bhaṁktvā nijakuṭhārakam

सूत जी ने कहा — उस क्षेत्र में एक और अत्यंत सुंदर लोहयष्टि है, जिसे परशुराम ने अपने कुठार को तोड़कर वहाँ छोड़ा था।

श्लोक 2 (skanda.6.94.2)

तां दृष्ट्वा मानवः सम्यगुपवासपरायणः॥ मुच्यते हि स्वकात्पापात्तत्क्षणाद्विजसत्तमाः

tāṁ dṛṣṭvā mānavaḥ samyagupavāsaparāyaṇaḥ mucyate hi svakātpāpāttatkṣaṇādvijasattamāḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! उसका दर्शन करने वाला मनुष्य, यदि सम्यक् उपवासपरायण हो, तो वह उसी क्षण अपने पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.6.94.3)

ऋषय ऊचुः॥ कुतः परशुरामेण भंक्त्वा निजकुठारकम्॥ निर्मिता लोहयष्टिः सा तत्रोत्सृष्टा च सा कुतः

ṛṣaya ūcuḥ kutaḥ paraśurāmeṇa bhaṁktvā nijakuṭhārakam nirmitā lohayaṣṭiḥ sā tatrotsṛṣṭā ca sā kutaḥ

ऋषियों ने कहा — किस कारण परशुराम ने अपने कुठार को तोड़कर वह लोहयष्टि बनाई, और वह वहाँ किस कारण छोड़ी गई?

श्लोक 4 (skanda.6.94.4)

सूत उवाच॥ यदा रामो ह्रदं कृत्वा तर्पयित्वा निजान्पितॄन्॥ गतामर्षो द्विजेन्द्राणां दत्त्वा यज्ञे वसुन्धराम्

sūta uvāca yadā rāmo hradaṁ kṛtvā tarpayitvā nijānpitṝn gatāmarṣo dvijendrāṇāṁ dattvā yajñe vasundharām

सूत जी ने कहा — जब परशुराम ने एक सरोवर बनाकर अपने पितरों को तर्पण दिया, और यज्ञ में सम्पूर्ण पृथ्वी श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दान करके अपने क्रोध को शांत कर लिया...

श्लोक 5 (skanda.6.94.5)

ततः संप्रस्थितो हृष्टो धृत्वा मनसि सागरम्॥ स्नानार्थं तं समादाय कुठारं भास्करप्रभम्

tataḥ saṁprasthito hṛṣṭo dhṛtvā manasi sāgaram snānārthaṁ taṁ samādāya kuṭhāraṁ bhāskaraprabham

...तब वह प्रसन्नतापूर्वक, मन में समुद्र का ध्यान करते हुए, स्नान के लिए वहाँ प्रस्थान कर गया, अपने सूर्य के समान तेजस्वी कुठार को साथ लेकर।

श्लोक 6 (skanda.6.94.6)

तदा स मुनिभिः प्रोक्तः सर्वैस्तत्क्षेत्रवासिभिः॥ वांछद्भिस्तु हितं तस्य सदा शमपरायणैः

tadā sa munibhiḥ proktaḥ sarvaistatkṣetravāsibhiḥ vāṁchadbhistu hitaṁ tasya sadā śamaparāyaṇaiḥ

तब उस क्षेत्र में रहने वाले, सदा शांतिपरायण तथा उसका सदा हित चाहने वाले सभी मुनियों ने उससे कहा।

श्लोक 7 (skanda.6.94.7)

रामराम महाभाग यद्धारयसि पाणिना॥ शस्त्रं पूर्णे प्रतिज्ञोऽपि तन्न युक्तं भवेत्तव

rāmarāma mahābhāga yaddhārayasi pāṇinā śastraṁ pūrṇe pratijño'pi tanna yuktaṁ bhavettava

"हे राम, राम! हे महाभाग! तुम अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण कर चुके हो, फिर भी हाथ में जो यह शस्त्र धारण किए हुए हो, वह तुम्हारे लिए उचित नहीं है।"

श्लोक 8 (skanda.6.94.8)

अनेन करसंस्थेन तव कोपः कथंचन॥ न यास्यति शरीरस्थस्तस्मादेनं परित्यज

anena karasaṁsthena tava kopaḥ kathaṁcana na yāsyati śarīrasthastasmādenaṁ parityaja

"जब तक यह हाथ में रहेगा, तब तक तुम्हारे शरीर में स्थित क्रोध किसी प्रकार भी शांत नहीं होगा; अतः इसे त्याग दो।"

श्लोक 9 (skanda.6.94.9)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा ततो रामः कृतांजलिः॥ प्रोवाच विनयोपेतः प्रहसंस्तान्द्विजोत्तमान्

teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā tato rāmaḥ kṛtāṁjaliḥ provāca vinayopetaḥ prahasaṁstāndvijottamān

उनका यह वचन सुनकर परशुराम ने हाथ जोड़कर, विनयपूर्वक मुस्कुराते हुए उन श्रेष्ठ द्विजों से कहा।

श्लोक 10 (skanda.6.94.10)

कुठारश्चैव विप्रेंद्रा रुद्रतेजोद्भवेन च॥ लोहेन निर्मितः पूर्वमक्षयो विश्वकर्मणा

kuṭhāraścaiva vipreṁdrā rudratejodbhavena ca lohena nirmitaḥ pūrvamakṣayo viśvakarmaṇā

"हे विप्रेंद्रो! यह अक्षय कुठार पूर्वकाल में रुद्र के तेज से उत्पन्न लोहे से विश्वकर्मा द्वारा बनाया गया था।"

श्लोक 11 (skanda.6.94.11)

तदहं संपरित्यज्य कथमेनं द्विजोत्तमाः॥ क्षत्त्रधर्मपरोऽप्येवं प्रगच्छामि दिगंतरम्

tadahaṁ saṁparityajya kathamenaṁ dvijottamāḥ kṣattradharmaparo'pyevaṁ pragacchāmi digaṁtaram

"हे श्रेष्ठ द्विजो! भला मैं क्षत्रियधर्म में सदा तत्पर रहते हुए भी, इसे त्यागकर किस प्रकार दूसरे प्रदेश को चला जाऊँ?"

श्लोक 12 (skanda.6.94.12)

यदि चैनं मया मुक्तं कुठारं च द्विजोत्तमाः॥ ग्रहीष्यति परः कश्चिन्मम वध्यो भविष्यति

yadi cainaṁ mayā muktaṁ kuṭhāraṁ ca dvijottamāḥ grahīṣyati paraḥ kaścinmama vadhyo bhaviṣyati

"और हे श्रेष्ठ द्विजो! यदि मेरे द्वारा त्यागे गए इस कुठार को कोई अन्य पुरुष ग्रहण कर लेगा, तो वह मेरे द्वारा वध्य होगा।"

श्लोक 13 (skanda.6.94.13)

नापराधमिमं शक्तः सोढ़ुं चाहं कथंचन॥ अपि ब्राह्मणमुख्यस्य जनस्यान्यस्य का कथा

nāparādhamimaṁ śaktaḥ sor̤huṁ cāhaṁ kathaṁcana api brāhmaṇamukhyasya janasyānyasya kā kathā

"मैं इस अपराध को किसी भी प्रकार सहन करने में समर्थ नहीं हूँ, चाहे वह श्रेष्ठ ब्राह्मण ही क्यों न हो, फिर अन्य साधारण जन की तो बात ही क्या!"

श्लोक 14 (skanda.6.94.14)

तथापि नास्ति ते शांतिर्मुक्तेऽप्यस्मिन्द्विजोत्तमाः॥ गृहीतेऽपि च युष्माभिस्तस्माद्रक्ष्यः प्रयत्नतः

tathāpi nāsti te śāṁtirmukte'pyasmindvijottamāḥ gṛhīte'pi ca yuṣmābhistasmādrakṣyaḥ prayatnataḥ

"हे श्रेष्ठ द्विजो! तथापि, इसे त्यागे जाने पर भी मुझे शांति नहीं मिलेगी, चाहे इसे तुम स्वयं ग्रहण भी कर लो; अतः इसे प्रयत्नपूर्वक सुरक्षित रखना होगा।"

श्लोक 15 (skanda.6.94.15)

ब्राह्मणा ऊचुः॥ यद्येवं त्वं महाभाग रक्षार्थं संप्रयच्छसि॥ अस्माकं तत्र भंक्त्वाशु पिंडं कृत्वा समर्पय

brāhmaṇā ūcuḥ yadyevaṁ tvaṁ mahābhāga rakṣārthaṁ saṁprayacchasi asmākaṁ tatra bhaṁktvāśu piṁḍaṁ kṛtvā samarpaya

ब्राह्मणों ने कहा — "हे महाभाग! यदि तुम इसे इस प्रकार रक्षा के लिए हमें सौंप रहे हो, तो इसे शीघ्र तोड़कर एक ठोस पिण्ड बनाकर हमें अर्पित करो।"

श्लोक 16 (skanda.6.94.16)

येन रक्षामहे सर्वे परमं यवमाश्रिताः॥ न च गृह्णाति वा कश्चिद्गते कालांतरेऽपि च

yena rakṣāmahe sarve paramaṁ yavamāśritāḥ na ca gṛhṇāti vā kaścidgate kālāṁtare'pi ca

"जिससे हम सब उस पर पूर्ण रूप से यत्नपूर्वक उसकी रक्षा कर सकें, और आगे कभी भविष्य में भी कोई इसे उठा न सके।"

श्लोक 17 (skanda.6.94.17)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा रामः शस्त्रभृतां वरः॥ चक्रे लोहमयीं यष्टिं तं भंक्त्वा स कुठारकम्

teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā rāmaḥ śastrabhṛtāṁ varaḥ cakre lohamayīṁ yaṣṭiṁ taṁ bhaṁktvā sa kuṭhārakam

उनका यह वचन सुनकर शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ परशुराम ने उस कुठार को तोड़कर उससे एक लोहे की यष्टि बना दी।

श्लोक 18 (skanda.6.94.18)

ततः स ब्राह्मणेंद्राणामर्पयामास सादरम्॥ रक्षार्थं भार्गवश्रेष्ठो विनयावनतः स्थितः

tataḥ sa brāhmaṇeṁdrāṇāmarpayāmāsa sādaram rakṣārthaṁ bhārgavaśreṣṭho vinayāvanataḥ sthitaḥ

तत्पश्चात् भृगुवंशियों में श्रेष्ठ परशुराम ने विनयपूर्वक झुककर उसे आदरपूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मणों को रक्षार्थ अर्पित कर दिया।

श्लोक 19 (skanda.6.94.19)

ब्राह्मणा ऊचुः॥ लोहयष्टिमिमां राम त्वत्कुठारसमुद्भवाम्॥ वयं संरक्षयिष्यामः पूजयिष्याम एव हि

brāhmaṇā ūcuḥ lohayaṣṭimimāṁ rāma tvatkuṭhārasamudbhavām vayaṁ saṁrakṣayiṣyāmaḥ pūjayiṣyāma eva hi

ब्राह्मणों ने कहा — "हे राम! तुम्हारे कुठार से उत्पन्न इस लोहयष्टि की हम सुरक्षा करेंगे और इसकी पूजा भी करेंगे।"

श्लोक 20 (skanda.6.94.20)

यथा शक्तिमयी कीर्तिः स्कन्दस्यात्र प्रतिष्ठिता॥ लोहयष्टिमयी तद्वत्तव राम भविष्यति

yathā śaktimayī kīrtiḥ skandasyātra pratiṣṭhitā lohayaṣṭimayī tadvattava rāma bhaviṣyati

"जिस प्रकार यहाँ शक्तिरूप में स्कंद की कीर्ति प्रतिष्ठित है, हे राम! उसी प्रकार यह लोहयष्टि तुम्हारी कीर्ति के रूप में प्रतिष्ठित होगी।"

श्लोक 21 (skanda.6.94.21)

भ्रष्टराज्यस्तु यो राजा एनामाराधयिष्यति॥ स्वं राज्यमचिरात्प्राप्य स प्रतापी भविष्यति

bhraṣṭarājyastu yo rājā enāmārādhayiṣyati svaṁ rājyamacirātprāpya sa pratāpī bhaviṣyati

"जो राजा राज्यभ्रष्ट होकर इसकी आराधना करेगा, वह शीघ्र ही अपने राज्य को पुनः प्राप्त कर प्रतापी होगा।"

श्लोक 22 (skanda.6.94.22)

विद्याकृते द्विजो वा यः सदैनां पूजयिष्यति॥ स विद्यां परमां प्राप्य सर्वज्ञत्वं प्रपत्स्यते

vidyākṛte dvijo vā yaḥ sadaināṁ pūjayiṣyati sa vidyāṁ paramāṁ prāpya sarvajñatvaṁ prapatsyate

"जो द्विज विद्या-प्राप्ति के लिए सदा इसकी पूजा करेगा, वह परम विद्या प्राप्त कर सर्वज्ञता को प्राप्त होगा।"

श्लोक 23 (skanda.6.94.23)

अपुत्रो वा नरो योऽथ नारी वा पूजयिष्यति॥ एतां यष्टिं त्वदीयां च पुत्रवान्स भविष्यति

aputro vā naro yo'tha nārī vā pūjayiṣyati etāṁ yaṣṭiṁ tvadīyāṁ ca putravānsa bhaviṣyati

"जो पुत्रहीन पुरुष अथवा स्त्री तुम्हारी इस यष्टि की पूजा करेगी, वह पुत्रवान होगी।"

श्लोक 24 (skanda.6.94.24)

उपवासपरो भूत्वा यश्चैनां पूजयिष्यति॥ आश्विनस्यासिते पक्षे चतुर्दश्यां विशेषतः॥ स प्राप्स्यति सदा कामानभीष्टान्मनसि स्थितान्

upavāsaparo bhūtvā yaścaināṁ pūjayiṣyati āśvinasyāsite pakṣe caturdaśyāṁ viśeṣataḥ sa prāpsyati sadā kāmānabhīṣṭānmanasi sthitān

"जो उपवासपूर्वक इसकी पूजा करेगा, विशेष रूप से आश्विन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को, वह अपने मन में स्थित समस्त अभीष्ट कामनाओं को सदा प्राप्त करेगा।"

श्लोक 25 (skanda.6.94.25)

एवं श्रुत्वा ततो रामस्तेषामेव द्विजन्मनाम्॥ प्रणम्य प्रययौ तूर्णं समुद्रसदनं प्रति

evaṁ śrutvā tato rāmasteṣāmeva dvijanmanām praṇamya prayayau tūrṇaṁ samudrasadanaṁ prati

यह सुनकर परशुराम ने उन्हीं ब्राह्मणों को प्रणाम कर तुरंत समुद्र के निवास की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 26 (skanda.6.94.26)

तेऽपि विप्रास्ततस्तस्याश्चक्रुः प्रासादमुत्तमम्॥ तत्र संस्थाय तां चक्रुस्ततः पूजासमाहिताः

te'pi viprāstatastasyāścakruḥ prāsādamuttamam tatra saṁsthāya tāṁ cakrustataḥ pūjāsamāhitāḥ

तत्पश्चात् उन ब्राह्मणों ने भी उस यष्टि के लिए एक उत्तम प्रासाद बनाया, और वहाँ उसे स्थापित करके एकाग्रचित्त होकर उसकी पूजा करने लगे।

श्लोक 27 (skanda.6.94.27)

प्राप्नुवंति च तत्पार्श्वात्कामानेव हृदि स्थितान्॥ सुस्तोकेनाऽपि कालेन दुर्लभास्त्रिदशैरपि

prāpnuvaṁti ca tatpārśvātkāmāneva hṛdi sthitān sustokenā'pi kālena durlabhāstridaśairapi

और वे उसके निकट से, अत्यंत अल्प समय में ही, अपने हृदय में स्थित उन कामनाओं को प्राप्त कर लेते हैं, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ हैं।

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