नागर खण्ड · अध्याय 93
गोमुख तीर्थ माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.93.1)
सूत उवाच॥ अथान्यदपि तत्रास्ति गोमुखाख्यं सुशोभनम्॥ यद्गोवक्त्रात्पुरा लब्धं सर्वपातकनाशनम्
sūta uvāca athānyadapi tatrāsti gomukhākhyaṁ suśobhanam yadgovaktrātpurā labdhaṁ sarvapātakanāśanam
सूत जी ने कहा — वहाँ एक और अत्यंत सुंदर तीर्थ है, जिसे गोमुख कहा जाता है, जो पूर्वकाल में गौ के मुख से प्रकट हुआ और सब पापों का नाश करने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.6.93.2)
पुरासीदत्र गोपालः कश्चित्कुष्ठसमावृतः॥ चमत्कारपुरं विप्र अतीव क्षामतां गतः
purāsīdatra gopālaḥ kaścitkuṣṭhasamāvṛtaḥ camatkārapuraṁ vipra atīva kṣāmatāṁ gataḥ
पूर्वकाल में यहाँ कुष्ठरोग से ग्रस्त कोई गोपाल था, हे विप्र! जो चमत्कारपुर में अत्यंत दुर्बलता को प्राप्त हो गया था।
श्लोक 3 (skanda.6.93.3)
कस्यचित्त्वथ कालस्य तेन मार्गेण गोकुलम्॥ मध्याह्नसमये प्राप्तं चंद्रे चित्रासमन्वितः
kasyacittvatha kālasya tena mārgeṇa gokulam madhyāhnasamaye prāptaṁ caṁdre citrāsamanvitaḥ
किसी समय, जब चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में था, मध्याह्न के समय उसी मार्ग से उसकी गायों का समूह वहाँ पहुँचा।
श्लोक 4 (skanda.6.93.4)
एकादश्यां तृषार्त्तं च भास्करे वृषसंस्थिते॥ एकयापि ततो धेन्वा तृणस्तम्बमतीव हि॥ नीलमालोकितं तत्र दूरादेत्य प्रहर्षिता
ekādaśyāṁ tṛṣārttaṁ ca bhāskare vṛṣasaṁsthite ekayāpi tato dhenvā tṛṇastambamatīva hi nīlamālokitaṁ tatra dūrādetya praharṣitā
एकादशी के दिन, जब सूर्य वृष राशि में स्थित था, प्यास से व्याकुल एक गाय ने दूर से एक अत्यंत हरे-भरे घास के गुच्छे को देखा और अत्यंत प्रसन्न होकर वहाँ आई।
श्लोक 5 (skanda.6.93.5)
दन्तैर्द्रुतं समुत्पाट्य यावदाकर्षति द्विजाः॥ तावत्तज्जडमार्गेण तोयधारा विनिर्गता
dantairdrutaṁ samutpāṭya yāvadākarṣati dvijāḥ tāvattajjaḍamārgeṇa toyadhārā vinirgatā
हे द्विजो! ज्योंही उसने अपने दांतों से उसे शीघ्रता से उखाड़कर खींचा, त्योंही उस जड़ के मार्ग से जलधारा फूट निकली।
श्लोक 6 (skanda.6.93.6)
अथास्वाद्य तृणं तस्मात्तृषार्ता च शनैःशनैः॥ पपौ तोयं सुविश्रब्धा सुस्वादु क्षीरसंनिभम्
athāsvādya tṛṇaṁ tasmāttṛṣārtā ca śanaiḥśanaiḥ papau toyaṁ suviśrabdhā susvādu kṣīrasaṁnibham
फिर उस घास को चखकर, प्यास से व्याकुल वह गाय धीरे-धीरे, निश्चिंत होकर, दूध के समान स्वादिष्ट उस जल को पीने लगी।
श्लोक 7 (skanda.6.93.7)
तस्या वेगेन तत्तोयं पिबन्त्यास्तत्रभूतले॥ गर्ता जाता सुविस्तीर्णा सलिलेन समावृता
tasyā vegena tattoyaṁ pibantyāstatrabhūtale gartā jātā suvistīrṇā salilena samāvṛtā
उस जल को वेगपूर्वक पीते रहने के कारण वहाँ भूतल पर एक विशाल गड्ढा बन गया, जो जल से भर गया।
श्लोक 8 (skanda.6.93.8)
ततोऽन्याः शतशो गावः पपुस्तोयं मुनिर्मलम्॥ तृषार्त्तास्तद्द्विजश्रेष्ठाः पीयूषरससंनिभम्
tato'nyāḥ śataśo gāvaḥ papustoyaṁ munirmalam tṛṣārttāstaddvijaśreṣṭhāḥ pīyūṣarasasaṁnibham
हे श्रेष्ठ द्विजो! तत्पश्चात् प्यास से व्याकुल सैकड़ों अन्य गायों ने भी अमृत के समान स्वादिष्ट उस निर्मल जल को पिया।
श्लोक 9 (skanda.6.93.9)
यथायथा गता गावस्तत्र तोयं पिबंति ताः॥ सा गर्ता वक्त्रसंस्पर्शाद्वृद्धिं याति तथा तथा
yathāyathā gatā gāvastatra toyaṁ pibaṁti tāḥ sā gartā vaktrasaṁsparśādvṛddhiṁ yāti tathā tathā
जैसे-जैसे वहाँ जाकर गायें उस जल को पीती गईं, वैसे-वैसे उनके मुखों के स्पर्श से वह गड्ढा बढ़ता गया।
श्लोक 10 (skanda.6.93.10)
ततश्च गोकुले कृत्स्ने जाते तृष्णाविवर्जिते॥ गोपालोऽपि तृषार्तस्तु तस्मिंस्तोये विवेश च
tataśca gokule kṛtsne jāte tṛṣṇāvivarjite gopālo'pi tṛṣārtastu tasmiṁstoye viveśa ca
और जब सम्पूर्ण गोकुल की प्यास बुझ गई, तब प्यास से व्याकुल वह गोपाल भी उस जल में उतर गया।
श्लोक 11 (skanda.6.93.11)
अंगं प्रक्षाल्य पीत्वापो यावन्निष्क्रामति द्रुतम्॥ तावत्पश्यति गात्रं स्वं द्वादशार्कसमप्रभम्
aṁgaṁ prakṣālya pītvāpo yāvanniṣkrāmati drutam tāvatpaśyati gātraṁ svaṁ dvādaśārkasamaprabham
अपने अंगों को धोकर और जल पीकर ज्यों ही वह शीघ्रता से बाहर निकला, त्यों ही उसने अपने शरीर को बारह सूर्यों के समान तेजस्वी देखा।
श्लोक 12 (skanda.6.93.12)
ततो विस्मयमापन्नो गत्वा स्वीयं निकेतनम्॥ वृतांतं कथयामास लोकानां पुरतोऽखिलम्
tato vismayamāpanno gatvā svīyaṁ niketanam vṛtāṁtaṁ kathayāmāsa lokānāṁ purato'khilam
तब आश्चर्यचकित होकर वह अपने घर गया और लोगों के समक्ष सम्पूर्ण वृत्तांत सुनाया।
श्लोक 13 (skanda.6.93.13)
तृणस्तम्बं यथा धेन्वा तत्रोत्पाट्य प्रशक्तितः॥ यथा विनिर्गतं तोयं यथा तेनावगाहितम्
tṛṇastambaṁ yathā dhenvā tatrotpāṭya praśaktitaḥ yathā vinirgataṁ toyaṁ yathā tenāvagāhitam
कि किस प्रकार गाय ने अपनी शक्ति से वहाँ उस घास के गुच्छे को उखाड़ा था, किस प्रकार जल निकला था, और किस प्रकार उसने उसमें स्नान किया था।
श्लोक 14 (skanda.6.93.14)
तद्दृष्ट्वा मानवाः सर्वे गत्वा दिव्यं जलं च तत्॥ व्याधिग्रस्ता विशेषेण स्नानं चक्रुः समाहिताः
taddṛṣṭvā mānavāḥ sarve gatvā divyaṁ jalaṁ ca tat vyādhigrastā viśeṣeṇa snānaṁ cakruḥ samāhitāḥ
यह सुनकर सभी मनुष्य, विशेष रूप से रोगग्रस्त लोग, वहाँ जाकर एकाग्रचित्त होकर उस दिव्य जल में स्नान करने लगे।
श्लोक 15 (skanda.6.93.15)
भवंति च विनिर्मुक्ता रोगैः पापैश्च तत्क्षणात्॥ अपापाश्च पुनर्यांति तत्क्षणात्त्रिदिवालयम्
bhavaṁti ca vinirmuktā rogaiḥ pāpaiśca tatkṣaṇāt apāpāśca punaryāṁti tatkṣaṇāttridivālayam
और वे उसी क्षण रोगों तथा पापों से मुक्त हो जाते हैं, और पापरहित होकर उसी क्षण स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 16 (skanda.6.93.16)
ततःप्रभृति तत्ख्यातं तीर्थं गोमुखसंज्ञितम्॥ गोमुखाद्भूतले जातं यतश्चैवं द्विजोत्तमाः
tataḥprabhṛti tatkhyātaṁ tīrthaṁ gomukhasaṁjñitam gomukhādbhūtale jātaṁ yataścaivaṁ dvijottamāḥ
हे श्रेष्ठ द्विजो! तभी से वह तीर्थ "गोमुख" के नाम से विख्यात हुआ, क्योंकि वह गौ के मुख से भूतल पर इसी प्रकार प्रकट हुआ था।
श्लोक 17 (skanda.6.93.17)
अथ भीतः सहस्राक्षस्तद्दृष्ट्वा स्वर्गदायकम्॥ अक्लेशेन मनुष्याणां पूरयामास पांसुभिः
atha bhītaḥ sahasrākṣastaddṛṣṭvā svargadāyakam akleśena manuṣyāṇāṁ pūrayāmāsa pāṁsubhiḥ
तब उसे स्वर्गदायक देखकर भयभीत हुए सहस्राक्ष इंद्र ने, मनुष्यों को बिना कष्ट के स्वर्ग प्राप्त होते देख, उसे धूल से भर दिया।
श्लोक 18 (skanda.6.93.18)
ऋषय ऊचुः॥ किं तत्कारणमादिष्टं येन तत्तादृशं जलम्॥ तस्मात्स्थानाद्विनिष्क्रांतं सूतपुत्र वदस्व नः
ṛṣaya ūcuḥ kiṁ tatkāraṇamādiṣṭaṁ yena tattādṛśaṁ jalam tasmātsthānādviniṣkrāṁtaṁ sūtaputra vadasva naḥ
ऋषियों ने कहा — हे सूतपुत्र! वह क्या कारण था, जिससे उस स्थान से वैसा जल प्रकट हुआ? हमें बताइए।
श्लोक 19 (skanda.6.93.19)
सूत उवाच॥ अत्र पूर्वं तपस्तप्तमम्बरीषेण भूभुजा॥ पुत्र शोकाभिभूतेन तोषितो गरुडध्वजः
sūta uvāca atra pūrvaṁ tapastaptamambarīṣeṇa bhūbhujā putra śokābhibhūtena toṣito garuḍadhvajaḥ
सूत जी ने कहा — पूर्वकाल में यहाँ पुत्र के शोक से व्याकुल राजा अम्बरीष ने तपस्या की थी, जिससे गरुड़ध्वज विष्णु प्रसन्न हुए थे।
श्लोक 20 (skanda.6.93.20)
तस्य पुत्रः सुविख्यातः सुवर्चा इति विश्रुतः॥ एको बभूव वृद्धत्वे कथंचिद्द्विजसत्तमाः
tasya putraḥ suvikhyātaḥ suvarcā iti viśrutaḥ eko babhūva vṛddhatve kathaṁciddvijasattamāḥ
हे श्रेष्ठ द्विजो! उसके एक अत्यंत विख्यात पुत्र थे, जो सुवर्चा के नाम से प्रसिद्ध थे, जो उसे किसी प्रकार वृद्धावस्था में प्राप्त हुए थे।
श्लोक 21 (skanda.6.93.21)
पूर्वकर्मविपाकेन स बालोऽपि च तत्सुतः॥ कुष्ठव्याधिसमाक्रांतः पितृमातृसुदुःखदः
pūrvakarmavipākena sa bālo'pi ca tatsutaḥ kuṣṭhavyādhisamākrāṁtaḥ pitṛmātṛsuduḥkhadaḥ
पूर्वजन्म के कर्मों के परिपाक से वह बालक पुत्र भी कुष्ठरोग से ग्रस्त हो गया, जो अपने माता-पिता को अत्यंत दुःख देने वाला था।
श्लोक 22 (skanda.6.93.22)
अथ तत्कामिकं क्षेत्रं स गत्वा पृथिवीपतिः॥ चकार रोगनाशाय स्वपुत्रार्थं महत्तपः
atha tatkāmikaṁ kṣetraṁ sa gatvā pṛthivīpatiḥ cakāra roganāśāya svaputrārthaṁ mahattapaḥ
तब वह राजा उस कामद (मनोवांछित फल देने वाले) क्षेत्र में जाकर, अपने पुत्र के रोग के नाश के लिए महान तपस्या करने लगा।
श्लोक 23 (skanda.6.93.23)
ततस्तुष्टिं गतस्तस्य स्वयमेव जनार्दनः॥ प्रदाय दर्शनं वाक्यं ततः प्रोवाच सादरम्
tatastuṣṭiṁ gatastasya svayameva janārdanaḥ pradāya darśanaṁ vākyaṁ tataḥ provāca sādaram
तत्पश्चात् उससे प्रसन्न होकर स्वयं जनार्दन विष्णु ने उसे दर्शन देकर आदरपूर्वक यह वचन कहा।
श्लोक 24 (skanda.6.93.24)
परितुष्टोऽस्मि ते वत्स तस्माच्चित्तेऽभिवांछितम्॥ प्रार्थयस्व प्रयच्छामि वरं पुत्र न संशयः
parituṣṭo'smi te vatsa tasmāccitte'bhivāṁchitam prārthayasva prayacchāmi varaṁ putra na saṁśayaḥ
"हे वत्स! मैं तुझसे संतुष्ट हूँ; इसलिए हे पुत्र! जो तेरे मन में अभिलषित हो, वह वर माँग; मैं उसे निःसंदेह प्रदान करूँगा।"
श्लोक 25 (skanda.6.93.25)
राजोवाच॥ ममायं संमतः पुत्रो ग्रस्तः कुष्ठेन केशव॥ बालोऽपि तत्कुरुष्वास्य कुष्ठव्याधिपरिक्षयम्
rājovāca mamāyaṁ saṁmataḥ putro grastaḥ kuṣṭhena keśava bālo'pi tatkuruṣvāsya kuṣṭhavyādhiparikṣayam
राजा ने कहा — "हे केशव! मेरा यह प्रिय पुत्र, बालक होते हुए भी, कुष्ठरोग से ग्रस्त है; अतः इसके कुष्ठव्याधि का नाश कीजिए।"
श्लोक 26 (skanda.6.93.26)
श्रीभगवानुवाच॥ एष आसीत्पुरा राजा मेघवाहनसंज्ञितः॥ ब्रह्मण्यश्च कृतज्ञश्च सर्वशास्त्रार्थपारगः
śrībhagavānuvāca eṣa āsītpurā rājā meghavāhanasaṁjñitaḥ brahmaṇyaśca kṛtajñaśca sarvaśāstrārthapāragaḥ
श्रीभगवान ने कहा — "यह पूर्वकाल में मेघवाहन नामक राजा था, जो ब्राह्मणभक्त, कृतज्ञ तथा सम्पूर्ण शास्त्रों के अर्थ में पारंगत था।"
श्लोक 27 (skanda.6.93.27)
कस्यचित्त्वथ कालस्य ब्राह्मणोऽनेन घातितः॥ अंतःपुरे निशाकाले प्रविष्टो जारकर्मकृत
kasyacittvatha kālasya brāhmaṇo'nena ghātitaḥ aṁtaḥpure niśākāle praviṣṭo jārakarmakṛta
"किसी समय इसने रात्रि के समय अंतःपुर में प्रवेश करके व्यभिचार करते हुए एक ब्राह्मण को मार डाला था।"
श्लोक 28 (skanda.6.93.28)
अथ पश्यति यावत्स प्रभातेऽभ्युदिते रवौ॥ यज्ञोपवीतसंयुक्तस्तावत्स द्विजरूपधृक्
atha paśyati yāvatsa prabhāte'bhyudite ravau yajñopavītasaṁyuktastāvatsa dvijarūpadhṛk
"फिर जब प्रातःकाल सूर्योदय होने पर उसने देखा, तो उसे ज्ञात हुआ कि वह यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मण-रूपधारी ही था।"
श्लोक 29 (skanda.6.93.29)
अथ तं ब्राह्मणं मत्वा घृणाविष्टः सुदुःखितः॥ गत्वा काशीपुरीं पश्चात्तपश्चक्रे समाहितः
atha taṁ brāhmaṇaṁ matvā ghṛṇāviṣṭaḥ suduḥkhitaḥ gatvā kāśīpurīṁ paścāttapaścakre samāhitaḥ
"तब उसे ब्राह्मण मानकर, ग्लानि से भरा हुआ और अत्यंत दुःखी होकर, वह काशीपुरी जाकर एकाग्रचित्त होकर तपस्या करने लगा।"
श्लोक 30 (skanda.6.93.30)
राज्ये पुत्रं समाधाय वैराग्यं परमं गतः॥ नियतो नियताहारो भिक्षान्नकृतभोजनः
rājye putraṁ samādhāya vairāgyaṁ paramaṁ gataḥ niyato niyatāhāro bhikṣānnakṛtabhojanaḥ
"अपने पुत्र को राज्य पर स्थापित करके वह परम वैराग्य को प्राप्त हुआ, नियमपूर्वक और नियमित आहार लेते हुए, भिक्षा के अन्न से ही भोजन करता था।"
श्लोक 31 (skanda.6.93.31)
ततः कालेन संप्राप्तो यमस्य सदनं प्रति॥ विपाप्मापि च चिह्नेन युक्तोऽयं पृथिवीपतिः
tataḥ kālena saṁprāpto yamasya sadanaṁ prati vipāpmāpi ca cihnena yukto'yaṁ pṛthivīpatiḥ
"तत्पश्चात् समय आने पर वह राजा यमराज के सदन को प्राप्त हुआ; वह पापरहित होते हुए भी उस हत्या के चिह्न से युक्त था।"
श्लोक 32 (skanda.6.93.32)
ब्रह्मघातोद्भवेनैव बालभावेऽपि संस्थिते॥ येऽत्र कुष्ठसमायुक्ता दृश्यंते मानवा भुवि॥ तैर्नूनं ब्राह्मणाघातो विहितश्चान्यजन्मनि
brahmaghātodbhavenaiva bālabhāve'pi saṁsthite ye'tra kuṣṭhasamāyuktā dṛśyaṁte mānavā bhuvi tairnūnaṁ brāhmaṇāghāto vihitaścānyajanmani
"ब्रह्महत्या से उत्पन्न हुए उस चिह्न के कारण ही यह बाल्यावस्था में भी इससे ग्रस्त है। और जो भी मनुष्य इस भूतल पर कुष्ठरोग से युक्त दिखाई देते हैं, उन्होंने निश्चय ही किसी अन्य जन्म में ब्रह्महत्या की होगी।"
श्लोक 33 (skanda.6.93.33)
हाटकेश्वरजे क्षेत्रे यो गत्वा श्राद्धमाचरेत्॥ पितॄणां चैव सर्वेषामनृणः स प्रजायते
hāṭakeśvaraje kṣetre yo gatvā śrāddhamācaret pitṝṇāṁ caiva sarveṣāmanṛṇaḥ sa prajāyate
"जो कोई हाटकेश्वर क्षेत्र में जाकर श्राद्ध करता है, वह अपने समस्त पितरों के ऋण से मुक्त हो जाता है।"
श्लोक 34 (skanda.6.93.34)
न ब्राह्मणवधाद्बाह्यं कुष्ठव्याधिः प्रजायते॥ एतत्सत्यं विजानीहि वदतो मम भूपते
na brāhmaṇavadhādbāhyaṁ kuṣṭhavyādhiḥ prajāyate etatsatyaṁ vijānīhi vadato mama bhūpate
"हे राजन्! ब्रह्महत्या के अतिरिक्त कुष्ठरोग अन्य किसी कारण से उत्पन्न नहीं होता; मेरे इस कथन को सत्य जानो।"
श्लोक 35 (skanda.6.93.35)
अंबरीष उवाच॥ एतदर्थं सुराधीश मया त्वं पूजितः प्रभो॥ प्रसन्ने त्वयि देवेश नासाध्यं विद्यते भुवि
aṁbarīṣa uvāca etadarthaṁ surādhīśa mayā tvaṁ pūjitaḥ prabho prasanne tvayi deveśa nāsādhyaṁ vidyate bhuvi
अम्बरीष ने कहा — "हे देवाधीश प्रभो! इसी उद्देश्य से मैंने आपकी पूजा की है। हे देवेश! आपके प्रसन्न होने पर इस भूतल पर कुछ भी असाध्य नहीं रहता।"
श्लोक 36 (skanda.6.93.36)
एवमुक्तस्ततस्तेन भगवान्मधुसूदनः॥ पातालजाह्नवीतोयं स सस्मार समाधिना
evamuktastatastena bhagavānmadhusūdanaḥ pātālajāhnavītoyaṁ sa sasmāra samādhinā
इस प्रकार कहे जाने पर भगवान मधुसूदन ने ध्यानपूर्वक पाताल में स्थित गंगाजल का स्मरण किया।
श्लोक 37 (skanda.6.93.37)
सा ध्याता सहसा तेन विष्णुना प्रभविष्णुना॥ कृत्वा तु विवरं सूक्ष्मं विनिष्क्रांताऽथ तत्क्षणात्
sā dhyātā sahasā tena viṣṇunā prabhaviṣṇunā kṛtvā tu vivaraṁ sūkṣmaṁ viniṣkrāṁtā'tha tatkṣaṇāt
सामर्थ्यवान विष्णु द्वारा इस प्रकार ध्यान किए जाने पर वह गंगा तत्क्षण एक सूक्ष्म छिद्र बनाकर वहाँ से निकल आई।
श्लोक 38 (skanda.6.93.38)
ततः प्रोवाच वचनमंबरीषं चतुर्भुजः॥ निमज्जतु सुतस्तेऽत्र सुपुण्ये जाह्नवीजले
tataḥ provāca vacanamaṁbarīṣaṁ caturbhujaḥ nimajjatu sutaste'tra supuṇye jāhnavījale
तत्पश्चात् चतुर्भुज विष्णु ने अम्बरीष से कहा — "तेरा पुत्र इस अत्यंत पवित्र गंगाजल में डूबकी लगाए।"
श्लोक 39 (skanda.6.93.39)
येन कुष्ठविनिर्मुक्तस्तत्क्षणादेव जायते॥ तथा ब्रह्मवधोद्भूतैः पातकैरुपपातकैः
yena kuṣṭhavinirmuktastatkṣaṇādeva jāyate tathā brahmavadhodbhūtaiḥ pātakairupapātakaiḥ
"जिससे वह उसी क्षण कुष्ठरोग से, तथा ब्रह्महत्या से उत्पन्न महापातकों और उपपातकों से भी, मुक्त हो जाएगा।"
श्लोक 40 (skanda.6.93.40)
एतस्मिन्नेव काले तु समानीय सुतं नृपः॥ स्नापयामास तत्तोयैः प्रत्यक्षं शार्ङ्गधन्वनः
etasminneva kāle tu samānīya sutaṁ nṛpaḥ snāpayāmāsa tattoyaiḥ pratyakṣaṁ śārṅgadhanvanaḥ
उसी समय राजा ने अपने पुत्र को लाकर, शार्ङ्गधनुर्धारी विष्णु के समक्ष उस जल से उसे स्नान कराया।
श्लोक 41 (skanda.6.93.41)
ततः स बालकः सद्यः स्नातमात्रो द्विजोत्तमाः॥ कुष्ठव्याधिविनिर्मुक्तो जातो बालार्कसंनिभः
tataḥ sa bālakaḥ sadyaḥ snātamātro dvijottamāḥ kuṣṭhavyādhivinirmukto jāto bālārkasaṁnibhaḥ
हे श्रेष्ठ द्विजो! तत्पश्चात् स्नान करते ही वह बालक तत्काल कुष्ठरोग से मुक्त होकर उदयकालीन सूर्य के समान कांतिमान हो गया।
श्लोक 42 (skanda.6.93.42)
ततः प्रणम्य तं देवं हर्षेण महताऽन्वितः॥ पित्रा समं जगामाथ स्वकीयं भवनं द्विजाः
tataḥ praṇamya taṁ devaṁ harṣeṇa mahatā'nvitaḥ pitrā samaṁ jagāmātha svakīyaṁ bhavanaṁ dvijāḥ
हे द्विजो! तत्पश्चात् उस देव को प्रणाम करके अत्यंत हर्षयुक्त होकर वह अपने पिता के साथ अपने भवन को चला गया।
श्लोक 43 (skanda.6.93.43)
तस्मिन्गते महीपाले सपुत्रे तत्क्षणाद्धरिः॥ तद्रंध्रं पूरयामास यथा नो वेत्ति कश्चन
tasmingate mahīpāle saputre tatkṣaṇāddhariḥ tadraṁdhraṁ pūrayāmāsa yathā no vetti kaścana
राजा के अपने पुत्र सहित चले जाने पर, हरि ने तत्क्षण उस छिद्र को इस प्रकार भर दिया कि उसे कोई न जान सके।
श्लोक 44 (skanda.6.93.44)
एतस्मात्कारणात्पूर्वं तत्तोयं सर्वपापहृत्॥ यद्गोमुखेन भूयोऽपि भूतले प्रकटीकृतम्
etasmātkāraṇātpūrvaṁ tattoyaṁ sarvapāpahṛt yadgomukhena bhūyo'pi bhūtale prakaṭīkṛtam
इसी कारण से पहले भी वह सर्वपापहारी जल विद्यमान था, जो अब गौ के मुख से पुनः भूतल पर प्रकट हुआ।
श्लोक 45 (skanda.6.93.45)
अद्यापि तज्जलस्पर्शात्सुपवित्रो धरातले॥ यः स्नानं सूर्यवारेण कुरुतेऽर्कोदयं प्रति॥ तस्य नाशं द्रुतं यांति गलगंडादिका इह
adyāpi tajjalasparśātsupavitro dharātale yaḥ snānaṁ sūryavāreṇa kurute'rkodayaṁ prati tasya nāśaṁ drutaṁ yāṁti galagaṁḍādikā iha
उस जल के स्पर्श से पवित्र हुई यह भूमि आज भी वैसी ही है; जो कोई रविवार को सूर्योदय के समय यहाँ स्नान करता है, उसके गलगण्ड आदि रोग शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 46 (skanda.6.93.46)
व्याधयोपि महारौद्रा दद्रुपामा समुद्भवाः॥ उपसर्गोद्भवाश्चैव विस्फोटकविचर्चिका
vyādhayopi mahāraudrā dadrupāmā samudbhavāḥ upasargodbhavāścaiva visphoṭakavicarcikā
अत्यंत भयंकर व्याधियाँ जैसे दाद, खुजली से उत्पन्न रोग, उपसर्ग से उत्पन्न रोग, चेचक तथा विचर्चिका भी नष्ट हो जाती हैं।
श्लोक 47 (skanda.6.93.47)
निष्कामस्तु पुनर्मर्त्यो यः स्नानं तत्र भक्तितः॥ कुरुते याति लोकं स देवदेवस्य चक्रिणः
niṣkāmastu punarmartyo yaḥ snānaṁ tatra bhaktitaḥ kurute yāti lokaṁ sa devadevasya cakriṇaḥ
परंतु जो निष्काम मनुष्य भक्तिपूर्वक वहाँ स्नान करता है, वह चक्रधारी देवाधिदेव विष्णु के लोक को प्राप्त होता है।
श्लोक 48 (skanda.6.93.48)
यस्मिन्दिने समानीता सा गंगा तत्र विष्णुना॥ तस्मिन्दिने वृषे सूर्यः स्थितश्चित्रासु चंद्रमाः
yasmindine samānītā sā gaṁgā tatra viṣṇunā tasmindine vṛṣe sūryaḥ sthitaścitrāsu caṁdramāḥ
जिस दिन विष्णु द्वारा वह गंगा वहाँ लाई गई थी, उस दिन सूर्य वृष राशि में और चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में स्थित था।
श्लोक 49 (skanda.6.93.49)
तिथिश्चैकादशी चैव देवदेवस्य शार्ङ्गिणः॥ गोवक्त्रेण तृणस्तंबं यस्मिंश्चैव तु वासरे॥ समाकृष्टं च तत्रैव योग एवं व्यवस्थितः
tithiścaikādaśī caiva devadevasya śārṅgiṇaḥ govaktreṇa tṛṇastaṁbaṁ yasmiṁścaiva tu vāsare samākṛṣṭaṁ ca tatraiva yoga evaṁ vyavasthitaḥ
तिथि एकादशी थी, शार्ङ्गधारी देवाधिदेव की, और जिस दिन गौ के मुख से वह घास का गुच्छा खींचा गया था — यही वह योग वहाँ स्थिर है।
श्लोक 50 (skanda.6.93.50)
तथान्येऽपि दिने तस्मिन्यदि तोयमवाप्य च॥ स्नानं करोति सद्भक्त्या तत्फलं सोऽपि चाप्नुयात्
tathānye'pi dine tasminyadi toyamavāpya ca snānaṁ karoti sadbhaktyā tatphalaṁ so'pi cāpnuyāt
और यदि कोई अन्य दिन भी उस जल को प्राप्त कर श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, तो वह भी वही फल प्राप्त करता है।