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नागर खण्ड · अध्याय 92

ब्रह्मकुण्ड माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 91अध्याय-सूचीअध्याय 93

श्लोक 1 (skanda.6.92.1)

सूत उवाच॥ अग्नितीर्थस्य माहात्म्यमेतद्वः परिकीर्तितम्॥ ब्रह्मकुंडसमुत्पत्तिरधुना श्रूयतां द्विजाः

sūta uvāca agnitīrthasya māhātmyametadvaḥ parikīrtitam brahmakuṁḍasamutpattiradhunā śrūyatāṁ dvijāḥ

सूत जी ने कहा — हे द्विजो! अग्नितीर्थ का यह माहात्म्य मैंने तुम्हें बता दिया; अब ब्रह्मकुण्ड की उत्पत्ति सुनो।

श्लोक 2 (skanda.6.92.2)

यदा संस्थापितो ब्रह्मा मार्कंडेन महात्मना॥ तदा विनिर्मितं तत्र कुण्डं शुचिजलान्वितम्

yadā saṁsthāpito brahmā mārkaṁḍena mahātmanā tadā vinirmitaṁ tatra kuṇḍaṁ śucijalānvitam

जब महात्मा मार्कण्डेय द्वारा वहाँ ब्रह्मा की स्थापना की गई, तब वहाँ पवित्र जल से युक्त एक कुण्ड का निर्माण किया गया।

श्लोक 3 (skanda.6.92.3)

प्रोक्तं च कार्तिके मासि कृत्तिकास्थे निशाकरे॥ सम्यग्भीष्मव्रतं कृत्वा स्नात्वात्र सलिले शुभे

proktaṁ ca kārtike māsi kṛttikāsthe niśākare samyagbhīṣmavrataṁ kṛtvā snātvātra salile śubhe

और यह कहा गया कि कार्तिक मास में, चंद्रमा के कृत्तिका नक्षत्र में स्थित होने पर, भीष्मव्रत का सम्यक् पालन करके इस पवित्र जल में स्नान करके...

श्लोक 4 (skanda.6.92.4)

पूजयिष्यति यो देवं पद्मयोनिं ततः परम्॥ स शूद्रोऽपि तनुं त्यक्त्वा ब्रह्मयोनौ प्रयास्यति

pūjayiṣyati yo devaṁ padmayoniṁ tataḥ param sa śūdro'pi tanuṁ tyaktvā brahmayonau prayāsyati

...और तत्पश्चात् कमल से उत्पन्न देव ब्रह्मा की पूजा करेगा, वह शूद्र भी अपना शरीर त्यागकर ब्रह्मयोनि (ब्राह्मण-जन्म) को प्राप्त होगा।

श्लोक 5 (skanda.6.92.5)

ब्राह्मणोऽपि यदि स्नानं तत्र कुण्डे करिष्यति॥ कृत्वा भीष्मव्रतं सम्यग्ब्रह्मलोकं प्रयास्यति

brāhmaṇo'pi yadi snānaṁ tatra kuṇḍe kariṣyati kṛtvā bhīṣmavrataṁ samyagbrahmalokaṁ prayāsyati

यदि ब्राह्मण भी उस कुण्ड में स्नान करेगा और भीष्मव्रत का सम्यक् पालन करेगा, तो वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होगा।

श्लोक 6 (skanda.6.92.6)

एवं प्रवदतस्तस्य मार्कंडेयस्य सन्मुनेः॥ श्रुतं तत्सकलं वाक्यं पशुपालेन केनचित्

evaṁ pravadatastasya mārkaṁḍeyasya sanmuneḥ śrutaṁ tatsakalaṁ vākyaṁ paśupālena kenacit

इस प्रकार कहते हुए उस सन्मुनि मार्कण्डेय की सम्पूर्ण बात किसी गोपाल (चरवाहे) ने सुन ली।

श्लोक 7 (skanda.6.92.7)

ततः श्रद्धाप्रयुक्तेन तेन तद्भीष्मपंचकम्॥ यथावद्विहितं सम्यक्कार्तिके मासि संस्थिते

tataḥ śraddhāprayuktena tena tadbhīṣmapaṁcakam yathāvadvihitaṁ samyakkārtike māsi saṁsthite

तत्पश्चात् श्रद्धायुक्त होकर उसने कार्तिक मास आने पर उस भीष्मपंचक व्रत का यथाविधि सम्यक् पालन किया।

श्लोक 8 (skanda.6.92.8)

ततश्च कृत्तिकायोगे पूर्णिमायां यथाविधि॥ संपूज्य पद्मजं पश्चात्पूजितः पुरुषोत्तमः

tataśca kṛttikāyoge pūrṇimāyāṁ yathāvidhi saṁpūjya padmajaṁ paścātpūjitaḥ puruṣottamaḥ

और कृत्तिका-योग में, पूर्णिमा को, विधिपूर्वक कमलजन्मा ब्रह्मा की पूजा करके, तत्पश्चात् पुरुषोत्तम विष्णु की भी पूजा की।

श्लोक 9 (skanda.6.92.9)

ततः कालविपाकेन स पंचत्वमुपागतः॥ ब्राह्मणस्य गृहे जातः पुरेऽत्रैव द्विजोत्तमाः॥ जातिस्मरः प्रभायुक्तः पितृमातृप्रतुष्टिदः

tataḥ kālavipākena sa paṁcatvamupāgataḥ brāhmaṇasya gṛhe jātaḥ pure'traiva dvijottamāḥ jātismaraḥ prabhāyuktaḥ pitṛmātṛpratuṣṭidaḥ

तत्पश्चात् समय के परिपाक से वह मृत्यु को प्राप्त हुआ, और हे श्रेष्ठ द्विजो! इसी नगर में एक ब्राह्मण के घर जन्म लिया — पूर्वजन्म का स्मरण रखने वाला, तेजयुक्त, तथा माता-पिता को संतोष देने वाला।

श्लोक 10 (skanda.6.92.10)

एवं प्रगच्छतस्तस्य वृद्धिं तत्र पुरोत्तमे॥ पितृमातृसमुद्भूतो यादृक्स्नेहो व्यवस्थितः

evaṁ pragacchatastasya vṛddhiṁ tatra purottame pitṛmātṛsamudbhūto yādṛksneho vyavasthitaḥ

इस प्रकार उस श्रेष्ठ नगर में बड़ा होते हुए उसके प्रति, माता-पिता से उत्पन्न होने वाला जैसा स्नेह होता है, वैसा ही स्नेह बना रहा।

श्लोक 11 (skanda.6.92.11)

अन्यदेहोद्भवे वापि तस्य शूद्रेपरिस्थितः॥ स तस्य धनसंपन्नः सदैव कुरुते द्विजः

anyadehodbhave vāpi tasya śūdreparisthitaḥ sa tasya dhanasaṁpannaḥ sadaiva kurute dvijaḥ

उसके पूर्व शरीर से उत्पन्न हुए, शूद्र-रूप में स्थित उस पिता के प्रति, धन-संपन्न वह ब्राह्मण सदा उपकार करता रहा।

श्लोक 12 (skanda.6.92.12)

उपकारप्रदानं च यत्किंचित्तस्य संमतम्॥ अन्यस्मिन्दिवसे शूद्रः स पिता पूर्वजन्मनः॥ तस्य पञ्चत्वमापन्नः संप्राप्ते चायुषः क्षये

upakārapradānaṁ ca yatkiṁcittasya saṁmatam anyasmindivase śūdraḥ sa pitā pūrvajanmanaḥ tasya pañcatvamāpannaḥ saṁprāpte cāyuṣaḥ kṣaye

जो कुछ भी उपकार उसे अभीष्ट होता, वह देता रहा। एक दिन उसका पूर्वजन्म का वह शूद्र पिता आयु का क्षय होने पर मृत्यु को प्राप्त हो गया।

श्लोक 13 (skanda.6.92.13)

अथ तस्य महाशोकं स कृत्वा तदनंतरम्॥ चकार प्रेतकार्याणि निःशेषाणि प्रभक्तितः

atha tasya mahāśokaṁ sa kṛtvā tadanaṁtaram cakāra pretakāryāṇi niḥśeṣāṇi prabhaktitaḥ

तब उसके लिए महान शोक करके, उसके पश्चात् उसने अत्यंत भक्तिपूर्वक उसके सम्पूर्ण प्रेतकार्य (अंत्येष्टि-संस्कार) संपन्न किए।

श्लोक 14 (skanda.6.92.14)

अथ तस्य समालोक्य तादृशं तद्विचेष्टितम्॥ पृष्टः स कौतुकाविष्टैः पितृमातृसुतादिभिः

atha tasya samālokya tādṛśaṁ tadviceṣṭitam pṛṣṭaḥ sa kautukāviṣṭaiḥ pitṛmātṛsutādibhiḥ

तब उसका ऐसा आचरण देखकर, कुतूहल से भरे हुए उसके इस जन्म के माता-पिता, पुत्र आदि ने उससे पूछा।

श्लोक 15 (skanda.6.92.15)

कस्मात्त्वमस्य नीचस्य पशुपालस्य सर्वदा॥ अतिस्नेहसमायुक्तो निःस्पृहस्यापि शंस नः

kasmāttvamasya nīcasya paśupālasya sarvadā atisnehasamāyukto niḥspṛhasyāpi śaṁsa naḥ

"तुम इस नीच पशुपालक के प्रति, जो निःस्पृह भी है, सदा अत्यंत स्नेहयुक्त क्यों रहते हो? हमें बताओ।"

श्लोक 16 (skanda.6.92.16)

तस्यापि प्रेतकार्याणि मृतस्यापि करोषि किम्॥ एतन्नः सर्वमाचक्ष्व न चेद्गुह्यं व्यवस्थितम्

tasyāpi pretakāryāṇi mṛtasyāpi karoṣi kim etannaḥ sarvamācakṣva na cedguhyaṁ vyavasthitam

"और उसके मरने पर भी तुम उसके प्रेतकार्य क्यों करते हो? यदि यह कोई गुप्त बात न हो, तो यह सब हमें बताओ।"

श्लोक 17 (skanda.6.92.17)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा किंचिल्लज्जासमन्वितः॥ तानब्रवीच्छृणुध्वं च कथयिष्याम्यसंशयम्

teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā kiṁcillajjāsamanvitaḥ tānabravīcchṛṇudhvaṁ ca kathayiṣyāmyasaṁśayam

उनका यह वचन सुनकर वह कुछ लज्जायुक्त होकर उनसे बोला — "सुनो, मैं निःसंदेह सब कुछ बताता हूँ।"

श्लोक 18 (skanda.6.92.18)

अहमस्यान्यदेहत्वे पुत्र आसं सुसंमतः॥ पशुपालनकर्मज्ञः प्राणेभ्यो वल्लभः सदा

ahamasyānyadehatve putra āsaṁ susaṁmataḥ paśupālanakarmajñaḥ prāṇebhyo vallabhaḥ sadā

"मैं अपने पूर्व शरीर में इसका पुत्र था, अत्यंत सम्मानित, पशुपालन के कार्य में निपुण, तथा सदा इसे प्राणों से भी अधिक प्रिय था।"

श्लोक 19 (skanda.6.92.19)

कस्यचित्त्वथ कालस्य मार्कंडस्य महामुनेः॥ श्रुतं प्रवदतो वाक्यं ब्रह्मकुण्डसमुद्भवम्

kasyacittvatha kālasya mārkaṁḍasya mahāmuneḥ śrutaṁ pravadato vākyaṁ brahmakuṇḍasamudbhavam

"किसी समय महामुनि मार्कण्ड द्वारा कहे गए ब्रह्मकुण्ड की उत्पत्ति संबंधी वचन मैंने सुने।"

श्लोक 20 (skanda.6.92.20)

कार्तिक्यां कृत्तिकायोगे भीष्मपञ्चककृन्नरः॥ सम्यक्छ्रद्धासमुत्पन्नो योऽत्र स्नानं करिष्यति

kārtikyāṁ kṛttikāyoge bhīṣmapañcakakṛnnaraḥ samyakchraddhāsamutpanno yo'tra snānaṁ kariṣyati

"उन्होंने कहा था कि जो मनुष्य कार्तिकी में कृत्तिका-योग के समय भीष्मपंचक व्रत करके, सम्यक् श्रद्धायुक्त होकर यहाँ स्नान करेगा..."

श्लोक 21 (skanda.6.92.21)

दृष्ट्वा पितामहं देवं पूजयित्वा जनार्दनम्॥ स भविष्यति शूद्रोऽपि ब्राह्मणश्चान्यजन्मनि

dṛṣṭvā pitāmahaṁ devaṁ pūjayitvā janārdanam sa bhaviṣyati śūdro'pi brāhmaṇaścānyajanmani

"...और पितामह ब्रह्मा के दर्शन कर जनार्दन विष्णु की पूजा करेगा, वह शूद्र भी अगले जन्म में ब्राह्मण होगा।"

श्लोक 22 (skanda.6.92.22)

तन्मया विहितं सम्यक्स्नात्वा तत्र शुभावहे॥ सुकुण्डे कार्तिके मासि तेन जातोऽस्मि सद्द्विजः

tanmayā vihitaṁ samyaksnātvā tatra śubhāvahe sukuṇḍe kārtike māsi tena jāto'smi saddvijaḥ

"मैंने कार्तिक मास में उस शुभदायक सुन्दर कुण्ड में सम्यक् स्नान करके वह व्रत सम्पन्न किया; इसीलिए मैं सद्ब्राह्मण के रूप में उत्पन्न हुआ हूँ।"

श्लोक 23 (skanda.6.92.23)

चन्द्रोदयस्य विप्रर्षेरन्वये भुवि विश्रुते॥ संस्मरन्पूर्विकां जाति तेन स्नेहो मम स्थितः॥ तस्योपरि महान्नित्यं शूद्रस्यापि निरर्गलः

candrodayasya viprarṣeranvaye bhuvi viśrute saṁsmaranpūrvikāṁ jāti tena sneho mama sthitaḥ tasyopari mahānnityaṁ śūdrasyāpi nirargalaḥ

"मैं भूतल पर विख्यात ऋषि चंद्रोदय के कुल में उत्पन्न हुआ; अपने पूर्वजन्म का स्मरण करने के कारण ही उस शूद्र के प्रति भी मेरा महान और निरंतर स्नेह बना हुआ है।"

श्लोक 24 (skanda.6.92.24)

अतोऽहं कृत्तिकायोगे कार्तिक्यां भक्तिसंयुतः॥ ज्ञात्वा करोमि भीष्मस्य पंचकं व्रतमुत्तमम्

ato'haṁ kṛttikāyoge kārtikyāṁ bhaktisaṁyutaḥ jñātvā karomi bhīṣmasya paṁcakaṁ vratamuttamam

"इसलिए मैं भी कार्तिकी में कृत्तिका-योग के समय, भक्तिपूर्वक तथा इस रहस्य को जानकर, उस उत्तम भीष्मपंचक व्रत का पालन करता हूँ।"

श्लोक 25 (skanda.6.92.25)

सूत उवाच॥ एवं तस्य वचः श्रुत्वा ते चान्ये च द्विजोत्तमाः॥ भीष्मस्य पञ्चकं चक्रुः सम्यक्छ्रद्धासमन्विताः

sūta uvāca evaṁ tasya vacaḥ śrutvā te cānye ca dvijottamāḥ bhīṣmasya pañcakaṁ cakruḥ samyakchraddhāsamanvitāḥ

सूत जी ने कहा — इस प्रकार उसके वचन सुनकर वे और अन्य श्रेष्ठ द्विज भी सम्यक् श्रद्धायुक्त होकर भीष्मपंचक व्रत करने लगे।

श्लोक 26 (skanda.6.92.26)

ततःप्रभृति तत्कुण्डं विख्यातं धरणीतले॥ स्थितमुत्तरदिग्भागे ब्रह्मकुण्डमिति स्मृतम्

tataḥprabhṛti tatkuṇḍaṁ vikhyātaṁ dharaṇītale sthitamuttaradigbhāge brahmakuṇḍamiti smṛtam

तभी से वह कुण्ड, जो उत्तर दिशा में स्थित है, पृथ्वी पर "ब्रह्मकुण्ड" के नाम से विख्यात और स्मृत है।

श्लोक 27 (skanda.6.92.27)

यः स्नानं सर्वदा तत्र ब्राह्मणः प्रकरोति वै॥ स संभवति विप्रेंद्रो जायमानः पुनः पुनः

yaḥ snānaṁ sarvadā tatra brāhmaṇaḥ prakaroti vai sa saṁbhavati vipreṁdro jāyamānaḥ punaḥ punaḥ

जो ब्राह्मण सदा वहाँ स्नान करता है, वह बार-बार जन्म लेते हुए भी सदा श्रेष्ठ ब्राह्मण ही होता है।

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