नागर खण्ड · अध्याय 91
अग्नितीर्थ की उत्पत्ति का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.91.1)
सूत उवाच॥ एवमुक्त्वा स भगवान्विरराम पितामहः॥ संतोष्य पावकं क्रुद्धं स्वयमेव द्विजोत्तमाः
sūta uvāca evamuktvā sa bhagavānvirarāma pitāmahaḥ saṁtoṣya pāvakaṁ kruddhaṁ svayameva dvijottamāḥ
सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ द्विजो! ऐसा कहकर वे भगवान पितामह (ब्रह्मा) क्रुद्ध हुए अग्नि को स्वयं शांत करके मौन हो गए।
श्लोक 2 (skanda.6.91.2)
ततः सर्वैः सुरैः सार्धं शक्रविष्णुशिवादिभिः॥ जगाम ब्रह्मलोकं च देवास्ते च निजं पदम्
tataḥ sarvaiḥ suraiḥ sārdhaṁ śakraviṣṇuśivādibhiḥ jagāma brahmalokaṁ ca devāste ca nijaṁ padam
तत्पश्चात् इंद्र, विष्णु, शिव आदि समस्त देवताओं के साथ वे ब्रह्मलोक को गए, और वे देवता भी अपने-अपने स्थान को चले गए।
श्लोक 3 (skanda.6.91.3)
पावकोऽपि द्विजेंद्राणामग्निहोत्रेषु संस्थितः॥ हविर्जग्राह विधिवद्वसोर्द्धारोद्भवं तथा
pāvako'pi dvijeṁdrāṇāmagnihotreṣu saṁsthitaḥ havirjagrāha vidhivadvasorddhārodbhavaṁ tathā
अग्निदेव भी श्रेष्ठ ब्राह्मणों के अग्निहोत्र-यज्ञों में पुनः स्थित होकर विधिपूर्वक हवि ग्रहण करने लगे, तथा वसु की धारा से उत्पन्न हुए तेज को भी उन्होंने धारण किया।
श्लोक 4 (skanda.6.91.4)
एवं तत्र समुद्भूतमग्नितीर्थमनुत्तमम्॥ यत्र स्नातो नरः प्रातर्मुच्यते दिनजादघात्
evaṁ tatra samudbhūtamagnitīrthamanuttamam yatra snāto naraḥ prātarmucyate dinajādaghāt
इस प्रकार वहाँ उत्पन्न हुआ वह अनुपम अग्नितीर्थ है, जहाँ प्रातःकाल स्नान करने वाला मनुष्य उस दिन के पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 5 (skanda.6.91.5)
अथ संप्रस्थितान्दृष्ट्वा तान्देवान्स्वाश्रमं प्रति॥ गजेंद्रशुकमण्डूकास्ते प्रोचुर्दुःखसंयुताः
atha saṁprasthitāndṛṣṭvā tāndevānsvāśramaṁ prati gajeṁdraśukamaṇḍūkāste procurduḥkhasaṁyutāḥ
तब उन देवताओं को अपने-अपने आश्रमों की ओर प्रस्थान करते देखकर गजेंद्र, शुक और मण्डूक दुःख से युक्त होकर बोले।
श्लोक 6 (skanda.6.91.6)
युष्मत्कृते वयं शप्ताः पावकेन सुरेश्वराः॥ तस्माज्जिह्वाकृतेऽस्माकमुपायश्चिंत्यतामपि
yuṣmatkṛte vayaṁ śaptāḥ pāvakena sureśvarāḥ tasmājjihvākṛte'smākamupāyaściṁtyatāmapi
"हे सुरेश्वरो! आप ही के कारण हम अग्निदेव द्वारा शापित हुए हैं; अतः हमारी जिह्वा के लिए भी कोई उपाय सोचा जाए।"
श्लोक 7 (skanda.6.91.7)
देवा ऊचुः॥ विपरीतापि ते जिह्वा यथान्येषां गजोत्तम॥ कार्यक्षमा न संदेहो भविष्यति विशेषतः
devā ūcuḥ viparītāpi te jihvā yathānyeṣāṁ gajottama kāryakṣamā na saṁdeho bhaviṣyati viśeṣataḥ
देवताओं ने कहा — "हे गजश्रेष्ठ! यद्यपि तुम्हारी जिह्वा दूसरों के समान न होकर विपरीत रहेगी, फिर भी वह निःसंदेह अपने कार्य में समर्थ रहेगी, विशेष रूप से।"
श्लोक 8 (skanda.6.91.8)
तथा यूयं नरेन्द्राणां मंदिरेषु व्यवस्थिताः॥ बहु मानसमायुक्ता मृष्टान्नं भक्षयिष्यथ
tathā yūyaṁ narendrāṇāṁ maṁdireṣu vyavasthitāḥ bahu mānasamāyuktā mṛṣṭānnaṁ bhakṣayiṣyatha
"इसके साथ ही, राजाओं के भवनों में स्थित रहकर तुम बड़े सम्मान के साथ स्वादिष्ट भोजन खाओगे।"
श्लोक 9 (skanda.6.91.9)
यथा च शुक ते जिह्वा कृता मंदा हविर्भुजा॥ तथापि भूमिपालानां शंसनीया भविष्यति
yathā ca śuka te jihvā kṛtā maṁdā havirbhujā tathāpi bhūmipālānāṁ śaṁsanīyā bhaviṣyati
"हे शुक! यद्यपि हविभोक्ता अग्नि ने तुम्हारी जिह्वा को मंद बना दिया है, फिर भी वह राजाओं द्वारा प्रशंसनीय होगी।"
श्लोक 10 (skanda.6.91.10)
श्रीमतां च तथान्येषामस्मदीयप्रसादतः॥ त्वं च मंडूक यत्तेन विजिह्वो वह्निना कृतः॥ तद्भविष्यति ते शब्दो विजिह्वस्यापि दीर्घगः
śrīmatāṁ ca tathānyeṣāmasmadīyaprasādataḥ tvaṁ ca maṁḍūka yattena vijihvo vahninā kṛtaḥ tadbhaviṣyati te śabdo vijihvasyāpi dīrghagaḥ
"और हमारी कृपा से समृद्ध जनों तथा अन्य लोगों द्वारा भी तुम्हारी वाणी सम्मानित होगी। और हे मण्डूक! चूँकि उस अग्नि ने तुम्हें जिह्वाविहीन बना दिया है, इसलिए जिह्वारहित होते हुए भी तुम्हारा शब्द दूर तक पहुँचने वाला होगा।"
श्लोक 11 (skanda.6.91.11)
एवमुक्त्वाऽथ ते देवाः स्वस्थानं प्रस्थितास्ततः॥ तेषामनुग्रहं कृत्वा कृपया परया युता
evamuktvā'tha te devāḥ svasthānaṁ prasthitāstataḥ teṣāmanugrahaṁ kṛtvā kṛpayā parayā yutā
ऐसा कहकर वे देवता, उन पर परम कृपापूर्वक अनुग्रह करके, तत्पश्चात् अपने-अपने स्थान को चले गए।