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नागर खण्ड · अध्याय 90

वसोर्धारा-माहात्म्य-वर्णन

अध्याय 89अध्याय-सूचीअध्याय 91

श्लोक 1 (skanda.6.90.1)

ऋषय ऊचुः। अग्नितीर्थं त्वया प्रोक्तं ब्रह्मतीर्थं च यत्पुरा ॥ न तयोः कथितोत्पत्तिर्माहात्म्यं च महामते

ṛṣaya ūcuḥ agnitīrthaṁ tvayā proktaṁ brahmatīrthaṁ ca yatpurā na tayoḥ kathitotpattirmāhātmyaṁ ca mahāmate

ऋषिगण बोले -- हे महामते, आपने पहले जो अग्नितीर्थ और ब्रह्मतीर्थ बताए थे, उन दोनों की उत्पत्ति और माहात्म्य नहीं बताया।

श्लोक 2 (skanda.6.90.2)

तस्माद्विस्तरतो ब्रूहि एकैकस्य पृथक्पृथक् ॥ न वयं तृप्तिमापन्नाः शृण्वतस्ते वचोऽमृतम्

tasmādvistarato brūhi ekaikasya pṛthakpṛthak na vayaṁ tṛptimāpannāḥ śṛṇvataste vaco'mṛtam

अतः प्रत्येक का पृथक्-पृथक् विस्तार से वर्णन कीजिए; आपकी अमृतमयी वाणी सुनते-सुनते भी हमें तृप्ति नहीं होती।

श्लोक 3 (skanda.6.90.3)

सूत उवाच। अत्र वः कीर्तयिष्यामि कथां पातकनाशिनीम् ॥ अग्नितीर्थसमुद्भूतां सर्वसौख्यावहां शुभाम्

sūta uvāca atra vaḥ kīrtayiṣyāmi kathāṁ pātakanāśinīm agnitīrthasamudbhūtāṁ sarvasaukhyāvahāṁ śubhām

सूत जी बोले -- अब मैं तुम्हें अग्नितीर्थ से उत्पन्न, समस्त पापों का नाश करने वाली, सर्वसुखदायी, शुभ कथा सुनाऊँगा।

श्लोक 4 (skanda.6.90.4)

सोमवंशसमुद्भूतः प्रतीपो नाम भूपतिः ॥ पुरासीच्छौर्यसंपन्नो ब्रह्मज्ञानविचक्षणः

somavaṁśasamudbhūtaḥ pratīpo nāma bhūpatiḥ purāsīcchauryasaṁpanno brahmajñānavicakṣaṇaḥ

पूर्वकाल में सोमवंश में उत्पन्न प्रतीप नाम का एक राजा था, जो शौर्यसंपन्न और ब्रह्मज्ञान में निपुण था।

श्लोक 5 (skanda.6.90.5)

तस्य पुत्रद्वयं जज्ञे सर्वलक्षणलक्षितम् ॥ देवापिः प्रथमस्तत्र द्वितीयः शंतनुर्द्विजाः

tasya putradvayaṁ jajñe sarvalakṣaṇalakṣitam devāpiḥ prathamastatra dvitīyaḥ śaṁtanurdvijāḥ

हे द्विजो, उसके दो पुत्र उत्पन्न हुए, जो सभी शुभ लक्षणों से युक्त थे -- पहला देवापि और दूसरा शन्तनु।

श्लोक 6 (skanda.6.90.6)

अथो शिवपदं प्राप्ते प्रतीपे नृपसत्तमे ॥ तपोऽर्थं राज्यमुत्सृज्य देवापिर्नियर्यौ वनम्

atho śivapadaṁ prāpte pratīpe nṛpasattame tapo'rthaṁ rājyamutsṛjya devāpirniyaryau vanam

जब वह श्रेष्ठ राजा प्रतीप शिवपद (मृत्यु) को प्राप्त हुआ, तब देवापि तप के लिए राज्य त्यागकर वन को चला गया।

श्लोक 7 (skanda.6.90.7)

ततश्च मंत्रिभिः सर्वैः शंतनुस्तस्य चानुजः ॥ पितृपैतामहे राज्ये सत्वरं सन्नियोजितः

tataśca maṁtribhiḥ sarvaiḥ śaṁtanustasya cānujaḥ pitṛpaitāmahe rājye satvaraṁ sanniyojitaḥ

तब उसके छोटे भाई शन्तनु को सभी मंत्रियों ने शीघ्र ही पिता-पितामह के राज्य पर बिठा दिया।

श्लोक 8 (skanda.6.90.8)

एतस्मिन्नंतरे शक्रो न ववर्ष क्रुद्धाऽन्वितः ॥ यावद्द्वादशवर्षाणि तस्मि न्राज्यं प्रशासति

etasminnaṁtare śakro na vavarṣa kruddhā'nvitaḥ yāvaddvādaśavarṣāṇi tasmi nrājyaṁ praśāsati

इसी बीच इन्द्र क्रोधित होकर बारह वर्षों तक वर्षा नहीं बरसाते रहे, जब तक वह राज्य का शासन करता रहा।

श्लोक 9 (skanda.6.90.9)

अतः कृच्छ्रं गतः सर्वो लोकः क्षुत्परिपीडितः ॥ चामुंडासदृशो जातो यो न मृत्युवशंगतः

ataḥ kṛcchraṁ gataḥ sarvo lokaḥ kṣutparipīḍitaḥ cāmuṁḍāsadṛśo jāto yo na mṛtyuvaśaṁgataḥ

इससे संपूर्ण लोक भारी संकट में पड़ गया, भूख से पीड़ित हो गया; जो मृत्यु के वश में नहीं गया, वह भी चामुण्डा-सदृश (कंकाल-जैसा) हो गया।

श्लोक 10 (skanda.6.90.10)

संत्यक्ताः पतिभिर्नार्यः पुत्राश्च पितृभिर्निजैः ॥ मातरश्च तथा पुत्रैर्लोकेष्वन्येषु का कथा

saṁtyaktāḥ patibhirnāryaḥ putrāśca pitṛbhirnijaiḥ mātaraśca tathā putrairlokeṣvanyeṣu kā kathā

पत्नियाँ पतियों द्वारा त्याग दी गईं, पुत्र अपने ही पिताओं द्वारा, तथा माताएँ भी पुत्रों द्वारा त्याग दी गईं; अन्य लोगों की तो बात ही क्या कहें।

श्लोक 11 (skanda.6.90.11)

दैवयोगात्क्वचित्किंचित्कस्यचिद्यदि दृश्यते ॥ सस्यं सिद्धमसिद्धं वा ह्रियते वीर्यतः परैः

daivayogātkvacitkiṁcitkasyacidyadi dṛśyate sasyaṁ siddhamasiddhaṁ vā hriyate vīryataḥ paraiḥ

यदि दैवयोग से कहीं किसी का कुछ भोजन, चाहे पका हो या कच्चा, दिखाई भी दे जाता था, तो उसे दूसरे बलपूर्वक छीन लेते थे।

श्लोक 12 (skanda.6.90.12)

शुष्का महीरुहाः सर्वे तथा ये च जलाशयाः॥ नद्यश्च स्वल्पतोयाश्च गंगाद्या अपि संस्थिताः

śuṣkā mahīruhāḥ sarve tathā ye ca jalāśayāḥ nadyaśca svalpatoyāśca gaṁgādyā api saṁsthitāḥ

समस्त वृक्ष सूख गए, तथा जो भी जलाशय थे और जो नदियाँ थीं, वे अल्प जल वाली हो गईं; गंगा आदि नदियाँ भी उसी दशा को प्राप्त हुईं।

श्लोक 13 (skanda.6.90.13)

एवं वृष्टेः क्षये जाते नष्टे धर्मपथे तथा ॥ लोकेऽस्मिन्नस्थिसंघातैः पूरिते भस्मना वृते

evaṁ vṛṣṭeḥ kṣaye jāte naṣṭe dharmapathe tathā loke'sminnasthisaṁghātaiḥ pūrite bhasmanā vṛte

इस प्रकार वर्षा के क्षीण होने पर, धर्मपथ के भी नष्ट होने पर, यह लोक अस्थियों के ढेरों से भर गया और राख से आच्छादित हो गया।

श्लोक 14 (skanda.6.90.14)

न कश्चिद्यजनं चक्रे न स्वाध्यायं न च व्रतम् ॥ एवमालोक्यते व्योम वृष्ट्यर्थं क्षुत्समाकुलैः

na kaścidyajanaṁ cakre na svādhyāyaṁ na ca vratam evamālokyate vyoma vṛṣṭyarthaṁ kṣutsamākulaiḥ

कोई भी न यज्ञ करता था, न स्वाध्याय, न व्रत; इस प्रकार भूख से व्याकुल लोग वर्षा की आशा में आकाश को ही ताकते रहते थे।

श्लोक 15 (skanda.6.90.15)

एतस्मिन्नेव काले तु विश्वामित्रो महामुनिः ॥ चर्मास्थिशेषसर्वांगो बुभुक्षार्त इतस्ततः

etasminneva kāle tu viśvāmitro mahāmuniḥ carmāsthiśeṣasarvāṁgo bubhukṣārta itastataḥ

इसी समय महामुनि विश्वामित्र, जिनका सारा शरीर केवल चमड़ी और हड्डियों से ही शेष रह गया था, भूख से पीड़ित होकर इधर-उधर भटकने लगे।

श्लोक 16 (skanda.6.90.16)

परिभ्रमंस्ततः प्राप्य कंचिद्ग्रामं निरुद्वसम् ॥ मृतमर्त्योद्भवैव्याप्तमस्थिसंघैः समंततः

paribhramaṁstataḥ prāpya kaṁcidgrāmaṁ nirudvasam mṛtamartyodbhavaivyāptamasthisaṁghaiḥ samaṁtataḥ

इस प्रकार भटकते हुए वे एक निर्जन गाँव में पहुँचे, जो मरे हुए मनुष्यों की हड्डियों के ढेरों से चारों ओर व्याप्त था।

श्लोक 17 (skanda.6.90.17)

अथ तत्र भ्रमन्प्राप्तश्चंडालस्य निवेशनम्॥ शून्ये गोऽस्थिसमाकीर्णे दुर्गंधेन समावृते

atha tatra bhramanprāptaścaṁḍālasya niveśanam śūnye go'sthisamākīrṇe durgaṁdhena samāvṛte

फिर वहाँ घूमते हुए वे एक चाण्डाल के घर पहुँचे, जो सूना, गायों की हड्डियों से भरा और दुर्गन्ध से व्याप्त था।

श्लोक 18 (skanda.6.90.18)

अथापश्यन्मृतं तत्र सारमेयं चिरोषितम् ॥ संशुष्कं गन्धनिर्मुक्तं गृहप्रांते व्यवस्थितम्

athāpaśyanmṛtaṁ tatra sārameyaṁ ciroṣitam saṁśuṣkaṁ gandhanirmuktaṁ gṛhaprāṁte vyavasthitam

वहाँ उन्होंने एक मरे हुए, बहुत समय से पड़े, सूखे हुए, गंधरहित कुत्ते को घर के एक कोने में पड़ा देखा।

श्लोक 19 (skanda.6.90.19)

समादाय ततस्तं च आपद्धर्मपरायणः ॥ प्रक्षाल्य सलिले पश्चात्प्रचकर्त तदा मुनिः

samādāya tatastaṁ ca āpaddharmaparāyaṇaḥ prakṣālya salile paścātpracakarta tadā muniḥ

आपद्धर्म का आश्रय लेकर उसे उठाकर, फिर जल से धोकर, उस मुनि ने उसके टुकड़े कर डाले।

श्लोक 20 (skanda.6.90.20)

ततश्च श्रपयामास सुसमिद्धे हुताशने ॥ क्षुत्क्षामो भोजनार्थाय ततः पाकाग्रमेव च

tataśca śrapayāmāsa susamiddhe hutāśane kṣutkṣāmo bhojanārthāya tataḥ pākāgrameva ca

फिर उसने भूख से क्षीण होकर, भोजन के लिए, उसे भलीभाँति प्रज्वलित अग्नि में पकाया, और सबसे पहला भाग निकाला,

श्लोक 21 (skanda.6.90.21)

समादाय पितॄंस्तर्प्य यावदग्नौ जुहोति सः ॥ तावद्वह्निः परित्यज्य समस्तमपि भूतलम्

samādāya pitṝṁstarpya yāvadagnau juhoti saḥ tāvadvahniḥ parityajya samastamapi bhūtalam

पितरों को तर्पण देने के लिए उसे लेकर, जैसे ही वे उसे अग्नि में होम करने लगे, तभी अग्नि सम्पूर्ण पृथ्वीतल को त्यागकर --

श्लोक 22 (skanda.6.90.22)

गतश्चादर्शनं सद्यः सर्वेषां क्षितिवासिनाम् ॥ चित्ते कोपं समाधाय शक्रस्योपरि भूरिशः

gataścādarśanaṁ sadyaḥ sarveṣāṁ kṣitivāsinām citte kopaṁ samādhāya śakrasyopari bhūriśaḥ

-- तुरन्त ही समस्त पृथ्वीवासियों की दृष्टि से ओझल हो गया, और इन्द्र पर अत्यन्त क्रोध धारण करके --

श्लोक 23 (skanda.6.90.23)

एतस्मिन्नंतरे वह्नौ मर्त्यलोकाद्विनिर्गते ॥ विशेषात्पीडिता लोका येऽवशिष्टा धरातले

etasminnaṁtare vahnau martyalokādvinirgate viśeṣātpīḍitā lokā ye'vaśiṣṭā dharātale

इसी बीच अग्नि के मृत्युलोक से चले जाने पर, जो लोग पृथ्वी पर शेष बचे थे, वे विशेष रूप से पीड़ित हो गए।

श्लोक 24 (skanda.6.90.24)

एतस्मिन्नंतरे देवा ब्रह्मविष्णुपुरः सराः ॥ वह्नेरन्वेषणार्थाय वभ्रमुर्धरणीतले

etasminnaṁtare devā brahmaviṣṇupuraḥ sarāḥ vahneranveṣaṇārthāya vabhramurdharaṇītale

इसी बीच ब्रह्मा और विष्णु को आगे करके सभी देवगण अग्नि की खोज के लिए पृथ्वीतल पर भटकने लगे।

श्लोक 25 (skanda.6.90.25)

अथ तैर्भ्रममाणैश्च प्रदृष्टोऽभूद्गजो महान् ॥ निश्वसन्पतितो भूमौ वह्नितापप्रपीडितः

atha tairbhramamāṇaiśca pradṛṣṭo'bhūdgajo mahān niśvasanpatito bhūmau vahnitāpaprapīḍitaḥ

इस प्रकार भटकते हुए उन्होंने एक विशाल हाथी को देखा, जो अग्नि के ताप से पीड़ित होकर, हाँफते हुए भूमि पर पड़ा था।

श्लोक 26 (skanda.6.90.26)

अथ देवा गजं दृष्ट्वा पप्रच्छुस्त्वरयाऽन्विताः ॥ कच्चित्त्वया स दृष्टोऽत्र कानने पावको गज

atha devā gajaṁ dṛṣṭvā papracchustvarayā'nvitāḥ kaccittvayā sa dṛṣṭo'tra kānane pāvako gaja

तब उस हाथी को देखकर देवगण उतावली से पूछने लगे -- हे गज, क्या तुमने इस वन में अग्नि को देखा है?

श्लोक 27 (skanda.6.90.27)

गज उवाच। वंशस्तंबेऽत्र संकीर्णे संप्रविष्टो हुताशनः ॥ सांप्रतं तेन निर्दग्धः कृच्छ्रादत्राहमागतः

gaja uvāca vaṁśastaṁbe'tra saṁkīrṇe saṁpraviṣṭo hutāśanaḥ sāṁprataṁ tena nirdagdhaḥ kṛcchrādatrāhamāgataḥ

हाथी बोला -- यहाँ इस घने बाँस के झुरमुट में अग्नि प्रविष्ट हुआ है; अभी उसी से जलकर मैं बड़ी कठिनाई से यहाँ आया हूँ।

श्लोक 28 (skanda.6.90.28)

अथ तैर्वेष्टितस्तस्मिन्वंशस्तंबे हुताशनः ॥ देवैर्दत्त्वा गजेंद्रस्य शापं पश्चाद्विनिर्गतः

atha tairveṣṭitastasminvaṁśastaṁbe hutāśanaḥ devairdattvā gajeṁdrasya śāpaṁ paścādvinirgataḥ

तब उन देवताओं द्वारा उस बाँस के झुरमुट को घेर लिए जाने पर, अग्नि उस गजराज को शाप देकर, बाद में वहाँ से निकल गया।

श्लोक 29 (skanda.6.90.29)

यस्मात्त्वयाहमादिष्टो देवानां वारणाधम ॥ तस्मात्तव मुखे जिह्वा विपरीता भविष्यति

yasmāttvayāhamādiṣṭo devānāṁ vāraṇādhama tasmāttava mukhe jihvā viparītā bhaviṣyati

हे वारणाधम! चूँकि तूने मुझे देवताओं को बता दिया, इसलिए तेरे मुख में जिह्वा उलटी हो जाएगी।

श्लोक 30 (skanda.6.90.30)

एवं शप्त्वा गजं शीघ्रं नष्टो वैश्वानरः पुनः ॥ देवाश्चापि तथा पृष्ठे संलग्नास्तद्दिदृक्षया

evaṁ śaptvā gajaṁ śīghraṁ naṣṭo vaiśvānaraḥ punaḥ devāścāpi tathā pṛṣṭhe saṁlagnāstaddidṛkṣayā

इस प्रकार हाथी को शाप देकर अग्नि पुनः शीघ्र ही लुप्त हो गया, और देवगण भी उसे देखने की इच्छा से उसके पीछे लगे रहे।

श्लोक 31 (skanda.6.90.31)

अथ दृष्टः शुकस्तैश्च भ्रममाणैर्महावने ॥ भोभोः शुक त्वया वह्निर्यदि दृष्टो निवेद्यताम्

atha dṛṣṭaḥ śukastaiśca bhramamāṇairmahāvane bhobhoḥ śuka tvayā vahniryadi dṛṣṭo nivedyatām

फिर उस बड़े वन में भटकते हुए उन्होंने एक तोते को देखा, और पूछा -- हे तोते, यदि तुमने अग्नि को देखा हो, तो बताओ।

श्लोक 32 (skanda.6.90.32)

शुक उवाच। योऽयं संदृश्यते दूराच्छमीगर्भे च पिप्पलः ॥ एतस्मिंस्तिष्ठते वह्निरश्वत्थे सुरसत्तमाः

śuka uvāca yo'yaṁ saṁdṛśyate dūrācchamīgarbhe ca pippalaḥ etasmiṁstiṣṭhate vahniraśvatthe surasattamāḥ

तोता बोला -- हे सुरश्रेष्ठो, जो यह दूर से दिखाई देने वाला, शमी के भीतर उगा हुआ पीपल वृक्ष है, उसी अश्वत्थ में अग्नि स्थित है।

श्लोक 33 (skanda.6.90.33)

अत्रस्थो यः कुलायो म आसीच्छिशुसमन्वितः ॥ संदग्धस्तत्प्रतापेन अहंकृच्छ्राद्विनिर्गतः

atrastho yaḥ kulāyo ma āsīcchiśusamanvitaḥ saṁdagdhastatpratāpena ahaṁkṛcchrādvinirgataḥ

वहाँ स्थित मेरा जो घोंसला था, बच्चों सहित, वह उसी के ताप से जल गया, और मैं भी बड़ी कठिनाई से बच निकला।

श्लोक 34 (skanda.6.90.34)

तच्छ्रुत्वा तैः सुरैः सर्वैः शमीगर्भः स तत्क्षणात् ॥ वेष्टितः पावकोऽप्याशु शुकं शप्त्वा विनिर्गतः

tacchrutvā taiḥ suraiḥ sarvaiḥ śamīgarbhaḥ sa tatkṣaṇāt veṣṭitaḥ pāvako'pyāśu śukaṁ śaptvā vinirgataḥ

यह सुनकर उन सभी देवताओं द्वारा उसी क्षण उस शमी-वृक्ष को घेर लिए जाने पर, अग्नि भी तत्काल तोते को शाप देकर वहाँ से निकल गया।

श्लोक 35 (skanda.6.90.35)

अहं यस्मात्त्वया पाप देवानां संनिवेदितः ॥ तस्माच्छुक न ते वाणी विस्पष्टा संभविष्यति

ahaṁ yasmāttvayā pāpa devānāṁ saṁniveditaḥ tasmācchuka na te vāṇī vispaṣṭā saṁbhaviṣyati

हे पापी! चूँकि तूने मुझे देवताओं को बता दिया, इसलिए हे तोते, तेरी वाणी अस्पष्ट हो जाएगी।

श्लोक 36 (skanda.6.90.36)

एवमुक्त्वा जातवेदा देवादर्शनवांछया ॥ हाटकेश्वरजे क्षेत्रे देवस्य परमेष्ठिनः

evamuktvā jātavedā devādarśanavāṁchayā hāṭakeśvaraje kṣetre devasya parameṣṭhinaḥ

ऐसा कहकर, देवताओं की दृष्टि से बचने की इच्छा से, जातवेदा (अग्नि) परमेष्ठी देव के हाटकेश्वर क्षेत्र में --

श्लोक 37 (skanda.6.90.37)

जलाशयं सुगम्भीरं पूर्वोत्तरदिक्संस्थितम् ॥ दृष्ट्वा तत्र प्रविष्टस्तु निभृतं च समाश्रितः

jalāśayaṁ sugambhīraṁ pūrvottaradiksaṁsthitam dṛṣṭvā tatra praviṣṭastu nibhṛtaṁ ca samāśritaḥ

-- वहाँ उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित एक अत्यन्त गहरे जलाशय को देखकर, उसमें प्रविष्ट होकर, चुपचाप छिप गया।

श्लोक 38 (skanda.6.90.38)

एतस्मिन्नंतरे तत्र मत्स्यकच्छपदर्दुराः ॥ वह्निप्रतापनिर्दग्धा दृश्यंते शतशो मृताः

etasminnaṁtare tatra matsyakacchapadardurāḥ vahnipratāpanirdagdhā dṛśyaṁte śataśo mṛtāḥ

इसी बीच वहाँ अग्नि के ताप से जलकर सैकड़ों मछलियाँ, कछुए और मेंढक मरे हुए दिखाई देने लगे।

श्लोक 39 (skanda.6.90.39)

अथ चैकोऽर्धनिर्दग्ध आयुःशेषेण दर्दुरः ॥ तस्माज्जलाद्विनिष्क्रांतो दृष्टो देवैश्च दूरतः

atha caiko'rdhanirdagdha āyuḥśeṣeṇa darduraḥ tasmājjalādviniṣkrāṁto dṛṣṭo devaiśca dūrataḥ

तब आधा जला हुआ, शेष आयु के बल पर बचा हुआ एक मेंढक उस जल से बाहर निकला, और देवताओं ने उसे दूर से देखा।

श्लोक 40 (skanda.6.90.40)

पृष्टश्च ब्रूहि चेद्भेक त्वया दृष्टो हुताशनः ॥ तदर्थमिह संप्राप्ताः सर्वे देवाः सवासवाः

pṛṣṭaśca brūhi cedbheka tvayā dṛṣṭo hutāśanaḥ tadarthamiha saṁprāptāḥ sarve devāḥ savāsavāḥ

उससे पूछा गया -- हे मेंढक, यदि तुमने अग्नि को देखा हो तो बताओ; इसी हेतु से यहाँ इन्द्र सहित हम सभी देवगण आए हैं।

श्लोक 41 (skanda.6.90.41)

भेक उवाच। अस्मिञ्जलाशये वह्निः सांप्रतं पर्यवस्थितः ॥ तस्यैते जलमध्यस्था मृता भूरिजलोद्भवाः

bheka uvāca asmiñjalāśaye vahniḥ sāṁprataṁ paryavasthitaḥ tasyaite jalamadhyasthā mṛtā bhūrijalodbhavāḥ

मेंढक बोला -- अभी इसी जलाशय में अग्नि निवास कर रहा है; उसी के कारण जल के भीतर रहने वाले, जल में उत्पन्न ये अनेक प्राणी मर गए हैं।

श्लोक 42 (skanda.6.90.42)

अस्माकं निधनं प्राप्तं कुटुम्बं सुरसत्तमाः ॥ अहं कृच्छ्रेण निष्क्रांत एतस्माज्जलसंश्रयात्

asmākaṁ nidhanaṁ prāptaṁ kuṭumbaṁ surasattamāḥ ahaṁ kṛcchreṇa niṣkrāṁta etasmājjalasaṁśrayāt

हे सुरसत्तमो, हमारा परिवार भी मृत्यु को प्राप्त हो गया है; मैं ही बड़ी कठिनाई से इस जलाशय के आश्रय से निकल पाया हूँ।

श्लोक 43 (skanda.6.90.43)

तच्छ्रुत्वा ते सुराः सर्वे सर्वतस्तं जलाशयम् ॥ वेष्टयित्वा स्थितास्तत्र वह्निर्भेकं शशाप ह

tacchrutvā te surāḥ sarve sarvatastaṁ jalāśayam veṣṭayitvā sthitāstatra vahnirbhekaṁ śaśāpa ha

यह सुनकर वे सभी देवगण उस जलाशय को चारों ओर से घेरकर वहाँ खड़े हो गए; तब अग्नि ने उस मेंढक को शाप दे दिया।

श्लोक 44 (skanda.6.90.44)

यस्माद्भेक त्वया मूढ देवेभ्योऽहं निवेदितः ॥ तस्मात्त्वं भविता नूनं विजिह्वोऽत्र धरातले

yasmādbheka tvayā mūḍha devebhyo'haṁ niveditaḥ tasmāttvaṁ bhavitā nūnaṁ vijihvo'tra dharātale

हे मूर्ख मेंढक! चूँकि तूने मुझे देवताओं को बता दिया, इसलिए तू इस पृथ्वी पर निश्चय ही जिह्वारहित हो जाएगा।

श्लोक 45 (skanda.6.90.45)

एवमुक्त्वा ततः स्थानात्ततो वह्निर्विनिर्गतः ॥ तावत्स ब्रह्मणा प्रोक्तः स्वयमेव महात्मना

evamuktvā tataḥ sthānāttato vahnirvinirgataḥ tāvatsa brahmaṇā proktaḥ svayameva mahātmanā

ऐसा कहकर, अग्नि उस स्थान से निकल गया; तभी उसे स्वयं महात्मा ब्रह्मा ने संबोधित किया।

श्लोक 46 (skanda.6.90.46)

भोभो वह्ने किमर्थं त्वं देवान्दृष्ट्वा प्रगच्छसि ॥ त्वमाद्यश्चैव सर्वेषामेतेषां संस्थितो मुखम्

bhobho vahne kimarthaṁ tvaṁ devāndṛṣṭvā pragacchasi tvamādyaścaiva sarveṣāmeteṣāṁ saṁsthito mukham

हे अग्नि! तुम देवताओं को देखकर क्यों भागते हो? तुम ही तो इन सबके आदि हो, और इन सबके मुख के रूप में स्थित हो।

श्लोक 47 (skanda.6.90.47)

त्वय्याहुतिर्हुता सम्यगादित्यमुपतिष्ठते ॥ आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः

tvayyāhutirhutā samyagādityamupatiṣṭhate ādityājjāyate vṛṣṭirvṛṣṭerannaṁ tataḥ prajāḥ

तुझमें भलीभाँति दी गई आहुति ही सूर्य तक पहुँचती है; सूर्य से वर्षा उत्पन्न होती है, वर्षा से अन्न, और अन्न से प्रजाएँ।

श्लोक 48 (skanda.6.90.48)

तस्माद्धाता विधाता च त्वमेव जगतः स्थितः ॥ संतुष्टे धार्यते विश्वं त्वयि रुष्टे विनंक्ष्यति

tasmāddhātā vidhātā ca tvameva jagataḥ sthitaḥ saṁtuṣṭe dhāryate viśvaṁ tvayi ruṣṭe vinaṁkṣyati

अतः तुम ही जगत् के धाता और विधाता हो; तुम्हारे संतुष्ट रहने पर ही विश्व टिका रहता है, और तुम्हारे रुष्ट होने पर वह नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 49 (skanda.6.90.49)

अग्निष्टोमादिका यज्ञास्त्वयि सर्वे प्रतिष्ठिताः ॥ अथ सर्वाणि भूतानि जीवंति तव संश्रयात्

agniṣṭomādikā yajñāstvayi sarve pratiṣṭhitāḥ atha sarvāṇi bhūtāni jīvaṁti tava saṁśrayāt

अग्निष्टोम आदि सभी यज्ञ तुझमें ही प्रतिष्ठित हैं; तथा समस्त प्राणी भी तेरे ही आश्रय से जीवित रहते हैं।

श्लोक 50 (skanda.6.90.50)

त्वमग्ने सर्वभूतानामन्तश्चरसि सर्वदा ॥ तेनैवान्नं च पानं च जठरस्थं पचत्यलम

tvamagne sarvabhūtānāmantaścarasi sarvadā tenaivānnaṁ ca pānaṁ ca jaṭharasthaṁ pacatyalama

हे अग्नि, तुम सर्वदा समस्त प्राणियों के भीतर विचरण करते हो; उसी के द्वारा उनके पेट में स्थित अन्न और पेय भलीभाँति पचता है।

श्लोक 51 (skanda.6.90.51)

तस्मात्कुरु प्रसादं त्वं सर्वेषां च दिवौकसाम् ॥ कोपस्य कारणं ब्रूहि यतस्त्यक्त्वा प्रगच्छसि

tasmātkuru prasādaṁ tvaṁ sarveṣāṁ ca divaukasām kopasya kāraṇaṁ brūhi yatastyaktvā pragacchasi

अतः तुम समस्त देवताओं पर कृपा करो; और यह बताओ कि किस कारण से क्रुद्ध होकर तुम सबको त्यागकर भाग रहे हो।

श्लोक 52 (skanda.6.90.52)

सूत उवाच। तस्य तद्वचनं श्रुत्वा देवस्य परमेष्ठिनः ॥ प्रोवाच प्रणयात्कोपं कृत्वा नत्वा च पद्मजम्

sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā devasya parameṣṭhinaḥ provāca praṇayātkopaṁ kṛtvā natvā ca padmajam

सूत जी बोले -- परमेष्ठी देव ब्रह्मा का वह वचन सुनकर, अग्नि ने पद्मज को प्रणाम करके, स्नेहवश अपना क्रोध प्रकट करते हुए कहा।

श्लोक 53 (skanda.6.90.53)

अग्निरुवाच। अहं कोपं समाधाय शक्रस्योपरि पद्मज ॥ प्रणष्टो जगदुत्सृज्य यस्मात्तत्कारणं शृणु

agniruvāca ahaṁ kopaṁ samādhāya śakrasyopari padmaja praṇaṣṭo jagadutsṛjya yasmāttatkāraṇaṁ śṛṇu

अग्नि बोले -- हे पद्मज! मैंने इन्द्र पर क्रोध धारण करके जगत् को त्यागकर लुप्त होने का जो कारण है, उसे सुनिए।

श्लोक 54 (skanda.6.90.54)

अनावृष्ट्या महेन्द्रस्य संजातश्चौषधीक्षयः ॥ ततोऽस्म्यहं श्वमांसेन विश्वामित्रेण योजितः

anāvṛṣṭyā mahendrasya saṁjātaścauṣadhīkṣayaḥ tato'smyahaṁ śvamāṁsena viśvāmitreṇa yojitaḥ

महेन्द्र की अनावृष्टि से समस्त औषधियों का नाश हो गया; तब विश्वामित्र ने मुझे कुत्ते के मांस से युक्त कर दिया।

श्लोक 55 (skanda.6.90.55)

एतस्मात्कारणान्नष्टो न कामान्न च संभ्रमात् ॥ अभक्ष्यभक्षणाद्भीतः सत्यमेतन्मयोदितम्

etasmātkāraṇānnaṣṭo na kāmānna ca saṁbhramāt abhakṣyabhakṣaṇādbhītaḥ satyametanmayoditam

इसी कारण से मैं लुप्त हुआ, न तो किसी काम-वासना से और न किसी घबराहट से; अभक्ष्य भक्षण से भयभीत होकर ही -- यह मैंने सत्य कहा है।

श्लोक 56 (skanda.6.90.56)

तच्छ्रुत्वा स चतुर्वक्त्रः शक्रमाह ततः परम् ॥ युक्तमेव शिखी प्राह किमर्थं न च वर्षसि

tacchrutvā sa caturvaktraḥ śakramāha tataḥ param yuktameva śikhī prāha kimarthaṁ na ca varṣasi

यह सुनकर उस चतुर्मुख ब्रह्मा ने फिर इन्द्र से कहा -- अग्निशिखी ने जो कहा, वह उचित ही है। तुमने वर्षा क्यों नहीं की?

श्लोक 57 (skanda.6.90.57)

शक्र उवाच। ज्येष्ठं भ्रातरमुल्लंघ्य शंतनुः पृथिवीपतिः ॥ पितृपैतामहे राज्ये स निविष्टः पितामह

śakra uvāca jyeṣṭhaṁ bhrātaramullaṁghya śaṁtanuḥ pṛthivīpatiḥ pitṛpaitāmahe rājye sa niviṣṭaḥ pitāmaha

इन्द्र बोले -- हे पितामह, राजा शन्तनु ने अपने ज्येष्ठ भाई का उल्लंघन करके पिता-पितामह के राज्य पर अधिकार कर लिया है।

श्लोक 58 (skanda.6.90.58)

एतस्मात्कारणाद्वृष्टिः संनिरुद्धा मया प्रभो ॥ तद्ब्रूहि किं करोम्यद्य त्वं प्रमाणं पितामह

etasmātkāraṇādvṛṣṭiḥ saṁniruddhā mayā prabho tadbrūhi kiṁ karomyadya tvaṁ pramāṇaṁ pitāmaha

हे प्रभो, इसी कारण से मैंने वर्षा को रोक रखा है; अतः हे पितामह, बताइए, अब मुझे क्या करना चाहिए; आप ही प्रमाण हैं।

श्लोक 59 (skanda.6.90.59)

पितामह उवाच। तस्याक्रमस्य संप्राप्तं पापं तेन महीभुजा ॥ उपभुक्तमवृष्ट्याद्य तस्माद्वृष्टिं कुरु द्रुतम्

pitāmaha uvāca tasyākramasya saṁprāptaṁ pāpaṁ tena mahībhujā upabhuktamavṛṣṭyādya tasmādvṛṣṭiṁ kuru drutam

पितामह बोले -- उस अन्याय का जो पाप था, वह उस राजा द्वारा अनावृष्टि के रूप में भोगा जा चुका है; अतः अब शीघ्र वर्षा करो।

श्लोक 60 (skanda.6.90.60)

मद्वाक्याद्याति नो नाशं यावदेतज्जगत्त्रयम् ॥ अकालेनापि देवेन्द्र सस्याभावाद्बुभुक्षया

madvākyādyāti no nāśaṁ yāvadetajjagattrayam akālenāpi devendra sasyābhāvādbubhukṣayā

मेरे इस वचन से यह त्रैलोक्य नष्ट न हो, हे देवेन्द्र, अन्न के अभाव और भूख से, समय से पहले ही।

श्लोक 61 (skanda.6.90.61)

एतस्मिन्नंतरे शक्र आदिदेश त्वरान्वितः ॥ पुष्करावर्तकान्मेघान्वृष्ट्यर्थं धरणीतले

etasminnaṁtare śakra ādideśa tvarānvitaḥ puṣkarāvartakānmeghānvṛṣṭyarthaṁ dharaṇītale

इसी बीच इन्द्र ने शीघ्रतापूर्वक पृथ्वीतल पर वर्षा के लिए पुष्करावर्तक मेघों को आदेश दिया।

श्लोक 62 (skanda.6.90.62)

तेऽपि शक्रसमादेशात्समस्तधरणीतलम् ॥ तत्क्षणात्पूरयामासुर्गर्जन्तो विद्युदन्विताः

te'pi śakrasamādeśātsamastadharaṇītalam tatkṣaṇātpūrayāmāsurgarjanto vidyudanvitāḥ

वे मेघ भी इन्द्र के आदेश से, गरजते हुए और बिजली से युक्त होकर, उसी क्षण सम्पूर्ण पृथ्वीतल को जल से भर दिया।

श्लोक 63 (skanda.6.90.63)

अथाब्रवीत्पुनर्ब्रह्मा देवैः सार्धं हुताशनम् ॥ अग्निहोत्रेषु विप्राणां प्रत्यक्षो भव पावक ॥ सांप्रतं त्वं वरं मत्तः प्रार्थयस्वाभिवांछितम्

athābravītpunarbrahmā devaiḥ sārdhaṁ hutāśanam agnihotreṣu viprāṇāṁ pratyakṣo bhava pāvaka sāṁprataṁ tvaṁ varaṁ mattaḥ prārthayasvābhivāṁchitam

तब ब्रह्मा ने देवताओं के साथ फिर अग्नि से कहा -- हे पावक, अब तुम ब्राह्मणों के अग्निहोत्रों में प्रत्यक्ष हो जाओ; अब मुझसे अपना अभीष्ट वर माँगो।

श्लोक 64 (skanda.6.90.64)

अग्निरुवाच। अयं जलाशयः पुण्यो मन्नाम्ना पृथिवीतले ॥ ख्यातिं यातु चतुर्वक्त्र वह्नितीर्थमिति स्मृतम्

agniruvāca ayaṁ jalāśayaḥ puṇyo mannāmnā pṛthivītale khyātiṁ yātu caturvaktra vahnitīrthamiti smṛtam

अग्नि बोले -- हे चतुर्मुख, यह पवित्र जलाशय मेरे ही नाम से पृथ्वीतल पर 'वह्नितीर्थ' के नाम से विख्यात हो और इसी नाम से स्मरण किया जाए।

श्लोक 65 (skanda.6.90.65)

अत्र यः प्रातरुत्थाय स्नात्वा श्रद्धा समन्वितः ॥ अग्निसूक्तं जपित्वा च त्वां प्रपश्यति सादरम् ॥ तस्य तुष्टिस्त्वया कार्या द्रुतं मद्वाक्यतः प्रभो

atra yaḥ prātarutthāya snātvā śraddhā samanvitaḥ agnisūktaṁ japitvā ca tvāṁ prapaśyati sādaram tasya tuṣṭistvayā kāryā drutaṁ madvākyataḥ prabho

यहाँ जो प्रातःकाल उठकर स्नान करके, श्रद्धायुक्त होकर, अग्निसूक्त का जप करके आदरपूर्वक आपका दर्शन करे, हे प्रभो, मेरे इस वचन से आप शीघ्र ही उसे संतुष्ट करें।

श्लोक 66 (skanda.6.90.66)

श्रीब्रह्मोवाच। अत्र यः प्रातरुत्थाय स्नात्वा वै वेदविद्द्विजः ॥ अग्निसूक्तं जपित्वा च वीक्षयिष्यति मां ततः

śrībrahmovāca atra yaḥ prātarutthāya snātvā vai vedaviddvijaḥ agnisūktaṁ japitvā ca vīkṣayiṣyati māṁ tataḥ

श्रीब्रह्मा बोले -- यहाँ जो वेदविद् ब्राह्मण प्रातःकाल उठकर स्नान करके, अग्निसूक्त का जप करके, तब मेरा दर्शन करेगा --

श्लोक 67 (skanda.6.90.67)

अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य सकलं लप्स्यते फलम् ॥ अनेकजन्मजं पापं नाशमेष्यति पावक

agniṣṭomasya yajñasya sakalaṁ lapsyate phalam anekajanmajaṁ pāpaṁ nāśameṣyati pāvaka

-- वह अग्निष्टोम यज्ञ का सम्पूर्ण फल पाएगा; हे पावक, अनेक जन्मों में किया गया उसका पाप भी नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 68 (skanda.6.90.68)

सूत उवाच। एवमुक्त्वा स भगवान्विरराम पितामहः ॥ पावकोऽपि च विप्राणामग्निहोत्रेषु संस्थितः

sūta uvāca evamuktvā sa bhagavānvirarāma pitāmahaḥ pāvako'pi ca viprāṇāmagnihotreṣu saṁsthitaḥ

सूत जी बोले -- ऐसा कहकर वह भगवान् पितामह चुप हो गए, और अग्नि भी ब्राह्मणों के अग्निहोत्रों में पुनः स्थित हो गए।

श्लोक 69 (skanda.6.90.69)

एवं तत्र समुद्भूतं वह्नितीर्थं महाद्भुतम् ॥ तत्र स्नातो नरः प्रातः सर्वपापैः प्रमुच्यते

evaṁ tatra samudbhūtaṁ vahnitīrthaṁ mahādbhutam tatra snāto naraḥ prātaḥ sarvapāpaiḥ pramucyate

इस प्रकार वहाँ यह अत्यन्त अद्भुत वह्नितीर्थ उत्पन्न हुआ; वहाँ प्रातःकाल स्नान करने वाला मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 70 (skanda.6.90.70)

अग्निरुवाच। ममातृप्तस्य लोकेश तावद्द्वादशवत्सरान् ॥ क्षुत्पीडासंवृते मर्त्ये न प्राप्तं कुत्रचिद्धविः

agniruvāca mamātṛptasya lokeśa tāvaddvādaśavatsarān kṣutpīḍāsaṁvṛte martye na prāptaṁ kutraciddhaviḥ

अग्नि बोले -- हे लोकेश, भूख से पीड़ित उस मर्त्यलोक में, मुझ अतृप्त को उन बारह वर्षों तक कहीं भी हवि प्राप्त नहीं हुई।

श्लोक 71 (skanda.6.90.71)

भविष्यंति तथा यज्ञा कालेन महता विभो ॥ संजातैः पशुभिर्भूयः सस्यादैरपरैर्भुवि

bhaviṣyaṁti tathā yajñā kālena mahatā vibho saṁjātaiḥ paśubhirbhūyaḥ sasyādairaparairbhuvi

हे विभो, अब बहुत समय बीतने पर पृथ्वी पर पुनः उत्पन्न हुए पशुओं और अन्न आदि से यज्ञ पुनः होने लगेंगे।

श्लोक 72 (skanda.6.90.72)

श्रीब्रह्मोवाच। अत्र ये ब्राह्मणाः केचिन्निवसंति हुताशन ॥ वसोर्द्धाराप्रदानेन ते त्वां नक्तंदिनं सदा

śrībrahmovāca atra ye brāhmaṇāḥ kecinnivasaṁti hutāśana vasorddhārāpradānena te tvāṁ naktaṁdinaṁ sadā

श्रीब्रह्मा बोले -- हे अग्नि, यहाँ जो भी ब्राह्मण निवास करते हैं, वे वसोर्धारा के दान से रात-दिन सदा तुम्हें --

श्लोक 73 (skanda.6.90.73)

तर्पयिष्यंति सद्भक्त्या ततः पुष्टिमवाप्स्यसि ॥ तेऽपि काम्यैर्मनोऽभीष्टैर्भविष्यंति समन्विताः

tarpayiṣyaṁti sadbhaktyā tataḥ puṣṭimavāpsyasi te'pi kāmyairmano'bhīṣṭairbhaviṣyaṁti samanvitāḥ

-- तुम्हें सद्भक्तिपूर्वक तृप्त करते रहेंगे, जिससे तुम पुष्टि प्राप्त करोगे; और वे भी अपने मन-चाहे इष्ट फलों से युक्त होंगे।

श्लोक 74 (skanda.6.90.74)

संक्रांति समये येषां वसोर्धाराप्रदायिनाम् ॥ भविष्यति क्षुतं वह्ने हूयमाने तवानल

saṁkrāṁti samaye yeṣāṁ vasordhārāpradāyinām bhaviṣyati kṣutaṁ vahne hūyamāne tavānala

हे वह्नि, संक्रान्ति के समय जो वसोर्धारा अर्पित करते हैं, हे अनल, तुझमें आहुति दिए जाते समय जिनकी छींक होगी,

श्लोक 75 (skanda.6.90.75)

तेषां पापं च यत्किंचिज्ज्ञानतोऽज्ञानतः कृतम् ॥ तद्यास्यति क्षयं सर्वमाजन्ममरणांतिकम्

teṣāṁ pāpaṁ ca yatkiṁcijjñānato'jñānataḥ kṛtam tadyāsyati kṣayaṁ sarvamājanmamaraṇāṁtikam

-- उनका जो भी पाप जान-अनजान में किया गया हो, वह सब जन्म से लेकर मृत्यु तक का पाप नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 76 (skanda.6.90.76)

त्वयि तुष्टिं गते पश्चाद्भविष्यति महीपतिः ॥ शिबिर्नाम सुविख्यात उशीनरसमुद्रवः

tvayi tuṣṭiṁ gate paścādbhaviṣyati mahīpatiḥ śibirnāma suvikhyāta uśīnarasamudravaḥ

तुम्हारे संतुष्ट होने के बाद एक राजा उत्पन्न होगा, जो शिबि नाम से सुविख्यात होगा और उशीनर वंश में उत्पन्न होगा।

श्लोक 77 (skanda.6.90.77)

स कृत्वा श्रद्धया युक्तः सत्रं द्वादशवार्षिकम्॥ वसोर्द्धाराप्रदानेन वर्षं त्वां तर्पयिष्यति ॥ कलशस्य च वक्त्रेणाविच्छिन्नेन दिवानिशम्

sa kṛtvā śraddhayā yuktaḥ satraṁ dvādaśavārṣikam vasorddhārāpradānena varṣaṁ tvāṁ tarpayiṣyati kalaśasya ca vaktreṇāvicchinnena divāniśam

वह श्रद्धायुक्त होकर बारह वर्ष का सत्र (यज्ञ) करके, कलश के मुख से अविच्छिन्न रूप से, दिन-रात एक वर्ष तक वसोर्धारा के दान से तुम्हें तृप्त करेगा।

श्लोक 78 (skanda.6.90.78)

ततस्तुष्टिं परां प्राप्य परां पुष्टिमवाप्स्यसि ॥ पूज्यमानो धरापृष्ठे सर्वैर्वेदविदां वरैः

tatastuṣṭiṁ parāṁ prāpya parāṁ puṣṭimavāpsyasi pūjyamāno dharāpṛṣṭhe sarvairvedavidāṁ varaiḥ

तब तुम परम संतोष और परम पुष्टि प्राप्त करोगे, और समस्त वेदज्ञों में श्रेष्ठ लोगों द्वारा पृथ्वी पर पूजित होगे।

श्लोक 79 (skanda.6.90.79)

अद्यप्रभृति यत्किंचित्कर्म चात्र भविष्यति ॥ शांतिकं पौष्टिकं वापि वसोर्द्धारासमन्वितम् ॥ संभविष्यति तत्सर्वं तव तृप्तिकरं परम्

adyaprabhṛti yatkiṁcitkarma cātra bhaviṣyati śāṁtikaṁ pauṣṭikaṁ vāpi vasorddhārāsamanvitam saṁbhaviṣyati tatsarvaṁ tava tṛptikaraṁ param

आज से यहाँ जो भी कर्म होगा, चाहे वह शान्तिक हो या पौष्टिक, वसोर्धारा से युक्त होकर, वह सब तुम्हें परम तृप्ति देने वाला होगा।

श्लोक 80 (skanda.6.90.80)

अपि यद्वैश्वदेवीयं कर्म किंचिद्द्विजन्मनाम् ॥ वसोर्द्धाराविहीनं च निष्फलं संभविष्यति

api yadvaiśvadevīyaṁ karma kiṁciddvijanmanām vasorddhārāvihīnaṁ ca niṣphalaṁ saṁbhaviṣyati

यहाँ तक कि द्विजों का वैश्वदेव कर्म भी, यदि वसोर्धारा से रहित हो, तो वह निष्फल हो जाएगा।

श्लोक 81 (skanda.6.90.81)

यस्माद्भवति संपूर्णं कर्म यज्ञादिकं हि तत् ॥ शांतिकं वैश्वदेवं च पूर्णाहुतिरिहोच्यते

yasmādbhavati saṁpūrṇaṁ karma yajñādikaṁ hi tat śāṁtikaṁ vaiśvadevaṁ ca pūrṇāhutirihocyate

क्योंकि उसी से यज्ञ आदि वह कर्म, चाहे शान्तिक हो या वैश्वदेव, सम्पूर्ण होता है; इसी को यहाँ 'पूर्णाहुति' कहा जाता है।

श्लोक 82 (skanda.6.90.82)

यः सम्यक्छ्रद्धया युक्तो वसोर्द्धारां प्रदास्यति ॥ स कामं मनसा ध्यातं समवाप्स्यति कृत्स्नशः

yaḥ samyakchraddhayā yukto vasorddhārāṁ pradāsyati sa kāmaṁ manasā dhyātaṁ samavāpsyati kṛtsnaśaḥ

जो व्यक्ति भलीभाँति श्रद्धायुक्त होकर वसोर्धारा अर्पित करेगा, वह अपने मन में ध्यान की गई कामना को पूर्णतः प्राप्त करेगा।

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