नागर खण्ड · अध्याय 89
श्रीमातुः पादुका-माहात्म्य-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.89.1)
सूत उवाच। एवं तत्र स्थिते नित्यं तस्मिन्मातृगणे द्विजाः ॥ बालकानां क्षयो जज्ञे ब्राह्मणानां गृहेगृहे
sūta uvāca evaṁ tatra sthite nityaṁ tasminmātṛgaṇe dvijāḥ bālakānāṁ kṣayo jajñe brāhmaṇānāṁ gṛhegṛhe
सूत जी बोले -- हे द्विजो, इस प्रकार उस मातृगण के वहाँ सदा स्थित होने पर, ब्राह्मणों के घर-घर में बालकों का क्षय होने लगा।
श्लोक 2 (skanda.6.89.2)
तरुणानां विशेषेण चमत्कारपुरोत्तरे ॥ छिद्रमन्वेषमाणास्ता भ्रमंत्यखिलदेवताः
taruṇānāṁ viśeṣeṇa camatkārapurottare chidramanveṣamāṇāstā bhramaṁtyakhiladevatāḥ
विशेष रूप से चमत्कारपुर के उत्तर भाग में युवकों का, क्योंकि वे सभी देवियाँ छिद्र (अवसर) ढूँढ़ती हुई घूमती रहती थीं।
श्लोक 3 (skanda.6.89.3)
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे ज्ञात्वा छिद्रसमुद्भवम् ॥ विघातं बालकानां च देवताभिर्विनिर्मितम्
tataste brāhmaṇāḥ sarve jñātvā chidrasamudbhavam vighātaṁ bālakānāṁ ca devatābhirvinirmitam
तब उन सभी ब्राह्मणों ने जान लिया कि छिद्र के कारण ही यह बालकों का नाश उन देवियों द्वारा किया जा रहा है।
श्लोक 4 (skanda.6.89.4)
अम्बावृद्धे समासाद्य पूजयित्वा प्रयत्नतः ॥ प्रोचुश्च दुःखसन्तप्ता विनयावनताः स्थिताः
ambāvṛddhe samāsādya pūjayitvā prayatnataḥ procuśca duḥkhasantaptā vinayāvanatāḥ sthitāḥ
वे अम्बा-वृद्धा के पास जाकर, प्रयत्नपूर्वक पूजा करके, दुःख से संतप्त होकर, विनम्रतापूर्वक झुककर बोले।
श्लोक 5 (skanda.6.89.5)
रक्षार्थं सर्वविप्राणां चमत्कारेण भूभुजा ॥ भवद्भ्यां निर्मितः श्रेष्ठः प्रासादोऽयं मनोहरः
rakṣārthaṁ sarvaviprāṇāṁ camatkāreṇa bhūbhujā bhavadbhyāṁ nirmitaḥ śreṣṭhaḥ prāsādo'yaṁ manoharaḥ
सभी ब्राह्मणों की रक्षा के लिए राजा चमत्कार द्वारा आप दोनों का यह श्रेष्ठ, मनोहर मन्दिर बनवाया गया था।
श्लोक 6 (skanda.6.89.6)
ह्रियंते बालका रात्रौ छिद्रं प्राप्य सहस्रशः ॥ युष्मदीयाभिरेताभिर्देवताभिः समन्ततः
hriyaṁte bālakā rātrau chidraṁ prāpya sahasraśaḥ yuṣmadīyābhiretābhirdevatābhiḥ samantataḥ
किन्तु रात्रि में छिद्र पाकर, चारों ओर से, आपकी ही इन देवियों द्वारा सहस्रों बालक हर लिए जाते हैं।
श्लोक 7 (skanda.6.89.7)
प्रसादः क्रियतां तस्माद्ब्राह्मणानां महात्मनाम् ॥ नो चेत्पुरं परित्यज्य यास्यामोऽन्यत्र भूतले
prasādaḥ kriyatāṁ tasmādbrāhmaṇānāṁ mahātmanām no cetpuraṁ parityajya yāsyāmo'nyatra bhūtale
अतः महात्मा ब्राह्मणों पर कृपा कीजिए; अन्यथा हम इस नगर को त्यागकर पृथ्वी पर कहीं और चले जाएँगे।
श्लोक 8 (skanda.6.89.8)
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा ततोंऽबा कृपयान्विता ॥ हत्वा पादप्रहारेण भूमिं चक्रे गुहां ततः
teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā tatoṁ'bā kṛpayānvitā hatvā pādaprahāreṇa bhūmiṁ cakre guhāṁ tataḥ
उनका वह वचन सुनकर, तब कृपायुक्त होकर अम्बा ने पैर के प्रहार से भूमि को मारकर वहाँ एक गुफा बना दी।
श्लोक 9 (skanda.6.89.9)
तस्यां स्वे पादुके न्यस्य ततः प्रोवाच देवताः ॥ सर्वास्ता नतसर्वांगीर्विनयेन समन्विताः
tasyāṁ sve pāduke nyasya tataḥ provāca devatāḥ sarvāstā natasarvāṁgīrvinayena samanvitāḥ
उसमें अपनी दोनों पादुकाएँ रखकर, फिर उसने सर्वांग झुकाए हुए, विनयपूर्वक खड़ी उन सभी देवियों से कहा।
श्लोक 10 (skanda.6.89.10)
इमे मत्पादुके दिव्ये गुहामध्यगते सदा ॥ सर्वाभिः सेवनीये च न गन्तव्यं बहिः क्वचित्
ime matpāduke divye guhāmadhyagate sadā sarvābhiḥ sevanīye ca na gantavyaṁ bahiḥ kvacit
ये मेरी दोनों दिव्य पादुकाएँ सदा इस गुफा के भीतर रहें; तुम सबको इनकी सेवा करनी है, और बाहर कहीं भी नहीं जाना है।
श्लोक 11 (skanda.6.89.11)
या काचिल्लौल्यमास्थाय निष्क्रमिष्यति मोहतः ॥ सा दिव्यभावनिर्मुक्ता शृगाली संभविष्यति
yā kācillaulyamāsthāya niṣkramiṣyati mohataḥ sā divyabhāvanirmuktā śṛgālī saṁbhaviṣyati
जो कोई भी चंचलता के वशीभूत होकर मोहवश बाहर निकलेगी, वह अपने दिव्य भाव से भ्रष्ट होकर सियारिन बन जाएगी।
श्लोक 12 (skanda.6.89.12)
देवता ऊचुः। अत्र स्थाने महादेवि कोऽस्माकं प्रकरिष्यति ॥ पूजां को वात्र चाहारस्तस्माद्ब्रूहि सुरेश्वरि
devatā ūcuḥ atra sthāne mahādevi ko'smākaṁ prakariṣyati pūjāṁ ko vātra cāhārastasmādbrūhi sureśvari
देवियाँ बोलीं -- हे महादेवि, इस स्थान में हमारी पूजा कौन करेगा, और हमारा आहार क्या होगा? अतः हे सुरेश्वरि, यह बताइए।
श्लोक 13 (skanda.6.89.13)
अम्बोवाच। अत्रागत्य विनिर्मुक्ता योगिनो ध्यानचिन्तकाः ॥ पूजां सम्यक्करिष्यंति सर्वासां भक्तिसंयुताः
ambovāca atrāgatya vinirmuktā yogino dhyānacintakāḥ pūjāṁ samyakkariṣyaṁti sarvāsāṁ bhaktisaṁyutāḥ
अम्बा बोलीं -- यहाँ आकर मुक्त, ध्यानपरायण योगीजन, भक्तियुक्त होकर तुम सबकी भलीभाँति पूजा करेंगे।
श्लोक 14 (skanda.6.89.14)
पादुके मे प्रपूज्यादौ मांस मद्यादिभिः क्रमात् ॥ अवाप्स्यंति च संसिद्धिं दुर्लभाममरैरपि
pāduke me prapūjyādau māṁsa madyādibhiḥ kramāt avāpsyaṁti ca saṁsiddhiṁ durlabhāmamarairapi
वे पहले मेरी पादुकाओं की मांस, मद्य आदि से क्रमशः पूजा करेंगे, और देवताओं के लिए भी दुर्लभ ऐसी सिद्धि प्राप्त करेंगे।
श्लोक 15 (skanda.6.89.15)
ततस्तथेति ताः प्रोच्य गुहामध्ये व्यवस्थिताः ॥ परिवार्य शुभे तस्याः पादुके मोक्षदायिके
tatastatheti tāḥ procya guhāmadhye vyavasthitāḥ parivārya śubhe tasyāḥ pāduke mokṣadāyike
तब 'ऐसा ही हो' कहकर, वे सभी उस गुफा में उसकी उन शुभ, मोक्षदायिनी पादुकाओं को घेरकर स्थित हो गईं।
श्लोक 16 (skanda.6.89.16)
ततस्तत्र समागत्य पुरुषा अपि दूरतः ॥ प्रपूज्य पादुके सम्यङ्मातॄस्ताश्च ततः परम्॥ प्रयांति च परां सिद्धिं जन्म मृत्युविवर्जिताम्
tatastatra samāgatya puruṣā api dūrataḥ prapūjya pāduke samyaṅmātṝstāśca tataḥ param prayāṁti ca parāṁ siddhiṁ janma mṛtyuvivarjitām
तब वहाँ दूर-दूर से भी आकर पुरुष, उन पादुकाओं और उन मातृगणों की भलीभाँति पूजा करके, जन्म-मृत्यु से रहित परम सिद्धि को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 17 (skanda.6.89.17)
एतस्मिन्नंतरे नष्टा अग्निष्टोमादिकाः क्रियाः ॥ तीर्थयात्राव्रतान्येव संयमा नियमाश्च ये
etasminnaṁtare naṣṭā agniṣṭomādikāḥ kriyāḥ tīrthayātrāvratānyeva saṁyamā niyamāśca ye
इसी बीच अग्निष्टोम आदि यज्ञ-कर्म नष्ट हो गए, तथा तीर्थयात्रा, व्रत, संयम और नियम भी नष्ट हो गए।
श्लोक 18 (skanda.6.89.18)
ये चापि ब्राह्मणाः शांताः सदा मद्यस्य दूषणम् ॥ प्रकुर्वंति स्वहस्तेन तेऽपि मद्यैः पृथग्विधैः
ye cāpi brāhmaṇāḥ śāṁtāḥ sadā madyasya dūṣaṇam prakurvaṁti svahastena te'pi madyaiḥ pṛthagvidhaiḥ
जो शान्त ब्राह्मण भी सदा अपने ही हाथों से मद्य की निन्दा करते थे, वे भी विविध प्रकार के मद्यों से --
श्लोक 19 (skanda.6.89.19)
तर्पयंति तथा मांसैस्त्यक्ताशेषमखक्रियाः ॥ पादुके मातृभिर्जुष्टे तथा धूपानुलेपनैः
tarpayaṁti tathā māṁsaistyaktāśeṣamakhakriyāḥ pāduke mātṛbhirjuṣṭe tathā dhūpānulepanaiḥ
-- तथा मांस से, तर्पण करने लगे, यज्ञ-कर्मों को पूर्णतः त्यागकर, मातृगणों द्वारा सेवित उन पादुकाओं को धूप और अनुलेपन से भी पूजने लगे।
श्लोक 20 (skanda.6.89.20)
एतस्मिन्नंतरे भीताः सर्वे देवाः सवासवाः ॥ दृष्ट्वा यज्ञक्रियोच्छेदं क्षुत्पिपासा समाकुलाः
etasminnaṁtare bhītāḥ sarve devāḥ savāsavāḥ dṛṣṭvā yajñakriyocchedaṁ kṣutpipāsā samākulāḥ
इसी बीच यज्ञ-कर्मों का उच्छेद देखकर, इन्द्र सहित सभी देवगण भयभीत होकर, भूख-प्यास से व्याकुल हो गए।
श्लोक 21 (skanda.6.89.21)
प्रोचुर्महेश्वरं गत्वा विनयावनताः स्थिताः ॥ स्तुत्वा पृथग्विधैः सूक्तैर्वेदोक्तैः शतरुद्रियैः
procurmaheśvaraṁ gatvā vinayāvanatāḥ sthitāḥ stutvā pṛthagvidhaiḥ sūktairvedoktaiḥ śatarudriyaiḥ
वे महेश्वर के पास जाकर, विनयपूर्वक झुककर खड़े हुए, तथा वेदोक्त शतरुद्रीय आदि विविध सूक्तों से स्तुति करके उनसे बोले।
श्लोक 22 (skanda.6.89.22)
देवा ऊचुः। हाटकेश्वरजे क्षेत्रे पादुके तत्र संस्थिते ॥ अंबाया मातृभिः सार्धं गुहामध्ये सुगुप्तके
devā ūcuḥ hāṭakeśvaraje kṣetre pāduke tatra saṁsthite aṁbāyā mātṛbhiḥ sārdhaṁ guhāmadhye suguptake
देवगण बोले -- हाटकेश्वर क्षेत्र में, गुफा के भीतर, सुरक्षित रूप से, अम्बा की वे पादुकाएँ मातृगणों के साथ स्थित हैं।
श्लोक 23 (skanda.6.89.23)
ब्राह्मणा अपिदेवेश मद्यमांसेन भक्तितः ॥ ताभ्यां पूजां प्रकुर्वंति प्रयांति परमां गतिम्
brāhmaṇā apideveśa madyamāṁsena bhaktitaḥ tābhyāṁ pūjāṁ prakurvaṁti prayāṁti paramāṁ gatim
हे देवेश, ब्राह्मण भी अब भक्तिपूर्वक मद्य-मांस से उनकी पूजा करते हैं, और परम गति को प्राप्त हो रहे हैं।
श्लोक 24 (skanda.6.89.24)
नष्टा धर्मक्रिया सर्वा मर्त्यलोकेत्र सांप्रतम् ॥ अस्माकं संक्षयो जातो यज्ञभागं विना प्रभो
naṣṭā dharmakriyā sarvā martyaloketra sāṁpratam asmākaṁ saṁkṣayo jāto yajñabhāgaṁ vinā prabho
इस मृत्युलोक में अब समस्त धर्मकर्म नष्ट हो गए हैं; हे प्रभो, यज्ञभाग के बिना हमारा क्षय हो गया है।
श्लोक 25 (skanda.6.89.25)
तस्मात्त्वं कुरु देवेश यथा स्यात्पादुकाक्षयः॥ प्रभवंति मखा भूमावस्माकं स्युः परा मुदः
tasmāttvaṁ kuru deveśa yathā syātpādukākṣayaḥ prabhavaṁti makhā bhūmāvasmākaṁ syuḥ parā mudaḥ
अतः हे देवेश, ऐसा कीजिए कि उन पादुकाओं का क्षय हो जाए, जिससे पृथ्वी पर यज्ञ पुनः प्रवृत्त हों और हमें परम प्रसन्नता प्राप्त हो।
श्लोक 26 (skanda.6.89.26)
श्रीभगवानुवाच। या सा अंबेति विख्याता शक्तिः सा परमेश्वरी॥ जगन्माताऽक्षया साक्षान्ममा पि जननी च सा
śrībhagavānuvāca yā sā aṁbeti vikhyātā śaktiḥ sā parameśvarī jaganmātā'kṣayā sākṣānmamā pi jananī ca sā
श्रीभगवान् बोले -- जो वह अम्बा नाम से विख्यात शक्ति है, वह साक्षात परमेश्वरी है; वह जगत् की अक्षय माता है, और वह मेरी भी माता है।
श्लोक 27 (skanda.6.89.27)
तत्कथं संक्षयस्तस्याः कर्तुं केनापि शक्यते ॥ मनसापि महाभागाः पादुकानां विशेषतः
tatkathaṁ saṁkṣayastasyāḥ kartuṁ kenāpi śakyate manasāpi mahābhāgāḥ pādukānāṁ viśeṣataḥ
हे महाभागो, फिर उसका, विशेष रूप से उसकी पादुकाओं का, नाश करना किसी के द्वारा मन से भी कैसे संभव है?
श्लोक 28 (skanda.6.89.28)
परं तत्र करिष्यामि सुखोपायं सुरेश्वराः ॥ युष्मभ्यं पादुकायां च महत्त्वं येन जायते
paraṁ tatra kariṣyāmi sukhopāyaṁ sureśvarāḥ yuṣmabhyaṁ pādukāyāṁ ca mahattvaṁ yena jāyate
हे सुरेश्वरो, फिर भी मैं वहाँ एक ऐसा सुखद उपाय करूँगा, जिससे तुम्हारा भी हित हो और उन पादुकाओं की महत्ता भी बनी रहे।
श्लोक 29 (skanda.6.89.29)
एवमुक्त्वा ततो ध्यानं चक्रे देवो महेश्वरः ॥ व्यावृत्यकमलं हृत्स्थमष्टपत्रं सकर्णिकम्
evamuktvā tato dhyānaṁ cakre devo maheśvaraḥ vyāvṛtyakamalaṁ hṛtsthamaṣṭapatraṁ sakarṇikam
ऐसा कहकर तब देव महेश्वर ने ध्यान किया, अपने हृदयस्थ आठ पंखुड़ियों और कर्णिका वाले कमल की ओर मुड़कर।
श्लोक 30 (skanda.6.89.30)
तस्यांतर्गतमासीनमंगुष्ठाग्रमितं शुभम् ॥ द्वादशार्कप्रभं सूक्ष्मं स्वमात्मानं व्यलोकयत्
tasyāṁtargatamāsīnamaṁguṣṭhāgramitaṁ śubham dvādaśārkaprabhaṁ sūkṣmaṁ svamātmānaṁ vyalokayat
उसके भीतर विराजमान, अंगूठे के अग्रभाग के बराबर, शुभ, बारह सूर्यों के समान तेजयुक्त, सूक्ष्म अपने आत्मा को उन्होंने देखा।
श्लोक 31 (skanda.6.89.31)
तस्यैवं ध्यायमानस्य तृतीयनयनात्ततः ॥ श्वेतांबरधरा शुभ्रा निर्गता कन्यका शुभा
tasyaivaṁ dhyāyamānasya tṛtīyanayanāttataḥ śvetāṁbaradharā śubhrā nirgatā kanyakā śubhā
इस प्रकार ध्यान करते हुए उनके तीसरे नेत्र से, श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, शुभ्र, एक शुभ कन्या प्रकट हुई।
श्लोक 32 (skanda.6.89.32)
अथ सा प्राह तं देवं प्रणिपत्य महेश्वरम् ॥ किमर्थं देव सृष्टास्मि ममादेशः प्रदीयताम्
atha sā prāha taṁ devaṁ praṇipatya maheśvaram kimarthaṁ deva sṛṣṭāsmi mamādeśaḥ pradīyatām
तब उसने महेश्वर देव को प्रणाम करके कहा -- हे देव, किस प्रयोजन से मैं उत्पन्न हुई हूँ? मुझे आदेश दीजिए।
श्लोक 33 (skanda.6.89.33)
श्रीभगवानुवाच। हाटकेश्वरजे क्षेत्रे पादुके संस्थिते शुभे ॥ श्रीमातुर्जगतां मुख्ये ताभ्यां पूजां त्वमाचर
śrībhagavānuvāca hāṭakeśvaraje kṣetre pāduke saṁsthite śubhe śrīmāturjagatāṁ mukhye tābhyāṁ pūjāṁ tvamācara
श्रीभगवान् बोले -- हाटकेश्वर क्षेत्र में जगत् की परम माता श्रीमाता की वे दोनों शुभ पादुकाएँ स्थित हैं, तुम उनकी पूजा करो।
श्लोक 34 (skanda.6.89.34)
कन्यकां संपरित्यज्य तवान्वयविवर्द्धिताम्॥ यः करिष्यति तत्पूजामाहारः स्यात्स मातृषु
kanyakāṁ saṁparityajya tavānvayavivarddhitām yaḥ kariṣyati tatpūjāmāhāraḥ syātsa mātṛṣu
तुम्हारे वंश में उत्पन्न किसी कन्या को छोड़कर, यदि कोई अन्य उनकी पूजा करेगा, तो वह उन मातृगणों के लिए आहार होगा।
श्लोक 35 (skanda.6.89.35)
कौमारब्रह्मचर्य्येण त्वयापि च सुभक्तितः ॥ ताभ्यां पूजा प्रकर्तव्या नो चेन्नाशमवाप्स्यसि
kaumārabrahmacaryyeṇa tvayāpi ca subhaktitaḥ tābhyāṁ pūjā prakartavyā no cennāśamavāpsyasi
तुम्हें भी कौमार ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, सुभक्तिपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिए; अन्यथा तुम्हारा भी नाश हो जाएगा।
श्लोक 36 (skanda.6.89.36)
तव पूजा करिष्यन्ति ये नरा भक्तितत्पराः ॥ मातॄणां संमतास्ते स्युः सर्वदैव सुखान्विताः
tava pūjā kariṣyanti ye narā bhaktitatparāḥ mātṝṇāṁ saṁmatāste syuḥ sarvadaiva sukhānvitāḥ
जो पुरुष भक्तिपरायण होकर तुम्हारी पूजा करेंगे, वे मातृगणों को भी स्वीकार्य होकर, सदा ही सुखयुक्त रहेंगे।
श्लोक 37 (skanda.6.89.37)
एवमुक्त्वा ततस्तस्या मंत्रमार्गं यथोचितम् ॥ पूजामार्गं विशेषेण कथयामास विस्तरात्
evamuktvā tatastasyā maṁtramārgaṁ yathocitam pūjāmārgaṁ viśeṣeṇa kathayāmāsa vistarāt
ऐसा कहकर, फिर उन्होंने उसे यथोचित मन्त्रमार्ग और पूजा-विधि विशेष रूप से विस्तार से बता दी।
श्लोक 38 (skanda.6.89.38)
ततो विसर्जयामास दत्त्वा छत्रादिभूषणम् ॥ प्रतिपत्तिं महादेवस्तांश्च सर्वान्सुरेश्वरान्
tato visarjayāmāsa dattvā chatrādibhūṣaṇam pratipattiṁ mahādevastāṁśca sarvānsureśvarān
तब महादेव ने उसे छत्र आदि आभूषण प्रदान करके विसर्जित किया, और उन सभी देवताओं को भी विदा किया।
श्लोक 39 (skanda.6.89.39)
कुमार्युवाच। त्वयेतत्कथितं देव त्वदन्वयसमुद्भवाः ॥ कन्यकाः पूजयिष्यंति पादुके ते सुशोभने
kumāryuvāca tvayetatkathitaṁ deva tvadanvayasamudbhavāḥ kanyakāḥ pūjayiṣyaṁti pāduke te suśobhane
कुमारी बोली -- हे देव, आपने यह बताया कि आपके वंश में उत्पन्न कन्याएँ ही आपकी उन शुभ पादुकाओं की पूजा करेंगी।
श्लोक 40 (skanda.6.89.40)
कौमारब्रह्मचर्य्येण भविष्यत्यन्वयः कथम् ॥ एतन्मे विस्तरात्सर्वं यथावद्वक्तुमर्हसि
kaumārabrahmacaryyeṇa bhaviṣyatyanvayaḥ katham etanme vistarātsarvaṁ yathāvadvaktumarhasi
किन्तु कौमार ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए मेरा वंश कैसे उत्पन्न होगा? यह सब मुझे विस्तार से यथावत बताइए।
श्लोक 41 (skanda.6.89.41)
श्रीभगवानुवाच। यस्यायस्याः प्रसन्ना त्वं कन्यकाया वदिष्यसि ॥ मंत्रग्राममिमं सम्यक्त्वद्भावा सा भविष्यति
śrībhagavānuvāca yasyāyasyāḥ prasannā tvaṁ kanyakāyā vadiṣyasi maṁtragrāmamimaṁ samyaktvadbhāvā sā bhaviṣyati
श्रीभगवान् बोले -- जिस-जिस कन्या से तुम प्रसन्न होकर इस मन्त्रसमूह को भलीभाँति कह दोगी, वह तुम्हारे ही भाव को प्राप्त हो जाएगी।
श्लोक 42 (skanda.6.89.42)
एवं चान्या महाभागे पारंपर्येण कन्यकाः ॥ तव वंशोद्भवाः सर्वाः प्रभविष्यंति मंत्रतः ॥ ततः सा तां समासाद्य पादुकासंभवां गुहाम् ॥ पूजां चक्रे यथान्यायं यथोक्तं त्रिपुरारिणा
evaṁ cānyā mahābhāge pāraṁparyeṇa kanyakāḥ tava vaṁśodbhavāḥ sarvāḥ prabhaviṣyaṁti maṁtrataḥ tataḥ sā tāṁ samāsādya pādukāsaṁbhavāṁ guhām pūjāṁ cakre yathānyāyaṁ yathoktaṁ tripurāriṇā
हे महाभागे, इसी प्रकार परम्परा से अन्य कन्याएँ भी, इस मन्त्र के द्वारा तुम्हारे ही वंश से उत्पन्न मानी जाकर, यह सामर्थ्य प्राप्त करेंगी। तब वह उस पादुकाओं वाली गुफा में जाकर, त्रिपुरारि द्वारा बताई गई विधि के अनुसार यथान्याय पूजा करने लगी।
श्लोक 43 (skanda.6.89.43)
सूत उवाच। तदन्वयसमुत्थायाः कन्यकायाः करेण यः ॥ पादुकाभ्यां नरः पूजां प्रकरोति समाहितः ॥ इह लोके सुखं प्राप्य स स्यात्प्रेत्य सुखान्वितः
sūta uvāca tadanvayasamutthāyāḥ kanyakāyāḥ kareṇa yaḥ pādukābhyāṁ naraḥ pūjāṁ prakaroti samāhitaḥ iha loke sukhaṁ prāpya sa syātpretya sukhānvitaḥ
सूत जी बोले -- जो पुरुष उस वंश-परम्परा में उत्पन्न कन्या के हाथ से, समाहित होकर, उन पादुकाओं की पूजा करता है, वह इस लोक में सुख पाकर, मृत्यु के बाद भी सुखी होता है।
श्लोक 44 (skanda.6.89.44)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कन्याहस्तेन पादुके ॥ पूजनीये विशेषेण पूज्या सा चापि कन्यका
tasmātsarvaprayatnena kanyāhastena pāduke pūjanīye viśeṣeṇa pūjyā sā cāpi kanyakā
अतः पूरे प्रयत्न से कन्या के हाथ से ही उन पादुकाओं की विशेष रूप से पूजा करनी चाहिए, और उस कन्या की भी पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 45 (skanda.6.89.45)
वांछद्भिः शाश्वतं सौख्यमिह लोके परत्र च ॥ मानवैर्भक्तिसंयुक्तैरित्युवाच महेश्वरः
vāṁchadbhiḥ śāśvataṁ saukhyamiha loke paratra ca mānavairbhaktisaṁyuktairityuvāca maheśvaraḥ
जो मनुष्य इस लोक और परलोक में शाश्वत सुख चाहते हैं, उन्हें भक्तियुक्त होकर ऐसा ही करना चाहिए -- ऐसा महेश्वर ने कहा।
श्लोक 46 (skanda.6.89.46)
एतद्वः सर्वमाख्यातं माहात्म्यं पादुकोद्भवम् ॥ श्रीमातुरनुषंगेण अंबादेव्या द्विजोत्तमाः
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ māhātmyaṁ pādukodbhavam śrīmāturanuṣaṁgeṇa aṁbādevyā dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो, यह श्रीमाता अम्बादेवी के प्रसंग में पादुकाओं से सम्बन्धित सम्पूर्ण माहात्म्य मैंने तुम्हें सुना दिया।
श्लोक 47 (skanda.6.89.47)
यश्चैतच्छृणुयाद्भक्त्या चतुर्दश्यां समाहितः ॥ तथाष्टम्यां विशेषेण स प्राप्नोति परं पदम्
yaścaitacchṛṇuyādbhaktyā caturdaśyāṁ samāhitaḥ tathāṣṭamyāṁ viśeṣeṇa sa prāpnoti paraṁ padam
जो कोई भी चतुर्दशी को, और विशेष रूप से अष्टमी को, समाहित होकर भक्तिपूर्वक इसे सुनता है, वह परम पद को प्राप्त करता है।