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नागर खण्ड · अध्याय 88

अम्बावृद्धा-माहात्म्य-वर्णन

अध्याय 87अध्याय-सूचीअध्याय 89

श्लोक 1 (skanda.6.88.1)

ऋषय ऊचुः। यास्त्वया देवताः प्रोक्ताश्चतस्रः सूतनंदन ॥ चमत्कारी महित्था च महालक्ष्मीस्तथाऽपरा

ṛṣaya ūcuḥ yāstvayā devatāḥ proktāścatasraḥ sūtanaṁdana camatkārī mahitthā ca mahālakṣmīstathā'parā

ऋषिगण बोले -- हे सूतनन्दन, आपने जो चार देवियाँ बताई थीं -- चमत्कारी, महित्था, और तीसरी महालक्ष्मी --

श्लोक 2 (skanda.6.88.2)

अंबावृद्धा चतुर्थी च तासां तिस्रः प्रकीर्तिताः॥ विस्तरेण चतुर्थी च अंबावृद्धा न कीर्तिता

aṁbāvṛddhā caturthī ca tāsāṁ tisraḥ prakīrtitāḥ vistareṇa caturthī ca aṁbāvṛddhā na kīrtitā

-- तथा चौथी अम्बावृद्धा -- उनमें से तीन का विस्तार से वर्णन आपने किया है, किन्तु चौथी अम्बावृद्धा का विस्तार से वर्णन नहीं किया।

श्लोक 3 (skanda.6.88.3)

एतस्याः सर्वमाचक्ष्व प्रभावं सूतसंभव ॥ केनैषा निर्मिता यात्रा सर्वं विस्तरतो वद

etasyāḥ sarvamācakṣva prabhāvaṁ sūtasaṁbhava kenaiṣā nirmitā yātrā sarvaṁ vistarato vada

हे सूतसंभव, इसका सारा प्रभाव बताइए; यह यात्रा किसके द्वारा निर्मित हुई, यह सब विस्तार से कहिए।

श्लोक 4 (skanda.6.88.4)

सूत उवाच। एषा तपोमयी शक्तिरम्बावृद्धा सुरेश्वरी ॥ यथात्र संस्थिता पूर्वं तत्सर्वं श्रूयतां मम

sūta uvāca eṣā tapomayī śaktirambāvṛddhā sureśvarī yathātra saṁsthitā pūrvaṁ tatsarvaṁ śrūyatāṁ mama

सूत जी बोले -- यह अम्बावृद्धा तपोमयी शक्ति और सुरेश्वरी है; वह पूर्वकाल में यहाँ जिस प्रकार स्थापित हुई, वह सब मुझसे सुनो।

श्लोक 5 (skanda.6.88.5)

चमत्कारमहीपेन पुरमेतद्यदा कृतम्॥ तदा तद्रक्षणार्थाय निर्मिता भावितात्मना ॥ चतस्रो देवता ह्येताः संमतेन द्विजन्मनाम्

camatkāramahīpena purametadyadā kṛtam tadā tadrakṣaṇārthāya nirmitā bhāvitātmanā catasro devatā hyetāḥ saṁmatena dvijanmanām

जब राजा चमत्कार ने इस पुर को बसाया, तब उसकी रक्षा के लिए भावितात्मा उस राजा ने ब्राह्मणों की सम्मति से ये चारों देवियाँ स्थापित कीं।

श्लोक 6 (skanda.6.88.6)

अथ तस्य महीपस्य अंबानामाभवत्सुता ॥ तथान्या वृद्धसंज्ञा च रूपौदार्यगुणान्विते

atha tasya mahīpasya aṁbānāmābhavatsutā tathānyā vṛddhasaṁjñā ca rūpaudāryaguṇānvite

फिर उस राजा की एक पुत्री थी जिसका नाम अम्बा था, तथा दूसरी वृद्धा नाम की थी; दोनों ही रूप और औदार्य के गुणों से युक्त थीं।

श्लोक 7 (skanda.6.88.7)

उभे ते काशिराजेन परिणीते द्विजोत्तमाः ॥ गृह्योक्तेन विधानेन देवविप्राग्निसंनिधौ

ubhe te kāśirājena pariṇīte dvijottamāḥ gṛhyoktena vidhānena devaviprāgnisaṁnidhau

हे द्विजोत्तमो, उन दोनों का काशिराज के साथ, देवता, ब्राह्मण और अग्नि की उपस्थिति में, गृह्यसूत्रोक्त विधि से विवाह हुआ।

श्लोक 8 (skanda.6.88.8)

कस्यचित्त्वथ कालस्य काशिराजस्य भूपतेः ॥ तैः कालयवनैः सार्धमभवत्संगरो महान्

kasyacittvatha kālasya kāśirājasya bhūpateḥ taiḥ kālayavanaiḥ sārdhamabhavatsaṁgaro mahān

फिर कुछ समय बीतने पर काशिराज का उन कालयवनों के साथ एक महासंग्राम हुआ।

श्लोक 9 (skanda.6.88.9)

अथ तैर्निहतः संख्ये सभृत्यबलवाहनः ॥ हरलब्धवरै रौद्रैः काशिराजः प्रतापवान्

atha tairnihataḥ saṁkhye sabhṛtyabalavāhanaḥ haralabdhavarai raudraiḥ kāśirājaḥ pratāpavān

तब उन भयंकर, हर से वरदान प्राप्त यवनों द्वारा, अपने सेवकों, सेना और वाहनों सहित प्रतापी काशिराज युद्ध में मारा गया।

श्लोक 10 (skanda.6.88.10)

अथांबा चैव वृद्धा च वैधव्यं प्राप्य दुःखदम् ॥ हाटकेश्वरजं क्षेत्रं गत्वा ते वांछितप्रदम्

athāṁbā caiva vṛddhā ca vaidhavyaṁ prāpya duḥkhadam hāṭakeśvarajaṁ kṣetraṁ gatvā te vāṁchitapradam

तब अम्बा और वृद्धा दोनों दुःखदायी वैधव्य को प्राप्त होकर, इच्छित वस्तु देने वाले हाटकेश्वर क्षेत्र में गईं।

श्लोक 11 (skanda.6.88.11)

देव्या आराधने यत्नं कृतवत्यौ ततः परम् ॥ नाशार्थं पतिशत्रूणां धृतवत्यौ शुभव्रतम्

devyā ārādhane yatnaṁ kṛtavatyau tataḥ param nāśārthaṁ patiśatrūṇāṁ dhṛtavatyau śubhavratam

फिर उन्होंने देवी की आराधना में प्रयत्न किया, और अपने पति के शत्रुओं के नाश के लिए एक शुभ व्रत धारण किया।

श्लोक 12 (skanda.6.88.12)

यावद्वर्षशतं साग्रं न च तुष्टा सुरेश्वरी ॥ ततो वैराग्यमासाद्य वांछंत्यौ स्वतनुक्षयम्

yāvadvarṣaśataṁ sāgraṁ na ca tuṣṭā sureśvarī tato vairāgyamāsādya vāṁchaṁtyau svatanukṣayam

पूरे सौ वर्ष बीत जाने पर भी वह सुरेश्वरी संतुष्ट नहीं हुई; तब वैराग्य को प्राप्त होकर वे दोनों अपने शरीर के नाश की इच्छा करने लगीं।

श्लोक 13 (skanda.6.88.13)

मंत्रैराथर्वणैर्विप्राः क्षुरिकासूक्तसंभवैः ॥ छित्त्वाच्छित्त्वा स्वमांसानि मंत्रपूतानि भक्तितः

maṁtrairātharvaṇairviprāḥ kṣurikāsūktasaṁbhavaiḥ chittvācchittvā svamāṁsāni maṁtrapūtāni bhaktitaḥ

हे विप्रो, अथर्ववेद के क्षुरिका-सूक्त से उत्पन्न मन्त्रों से पवित्र करके, वे भक्तिपूर्वक बार-बार अपने ही मांस को काट-काट कर,

श्लोक 14 (skanda.6.88.14)

कृतवत्यौ ततो होमं सुसमिद्धे हुताशने ॥ अग्निकुण्डात्ततस्तस्माश्चतुर्हस्ता शुभानना

kṛtavatyau tato homaṁ susamiddhe hutāśane agnikuṇḍāttatastasmāścaturhastā śubhānanā

उन्होंने उस भलीभाँति प्रज्वलित अग्नि में होम किया। तब उसी अग्निकुण्ड से एक चार भुजाओं वाली, शुभमुखी --

श्लोक 15 (skanda.6.88.15)

श्वेतवस्त्रा विनिष्क्रांता नारी बालार्कसव्रिभा ॥ तथान्या च सुनेत्रास्या तप्तहाटकसन्निभा

śvetavastrā viniṣkrāṁtā nārī bālārkasavribhā tathānyā ca sunetrāsyā taptahāṭakasannibhā

-- श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, उदीयमान सूर्य के समान कान्तिवाली, प्रकट हुई। तथा उसके साथ ही एक दूसरी, सुन्दर नेत्र और मुख वाली, तपाए हुए सुवर्ण के समान कान्तिवाली --

श्लोक 16 (skanda.6.88.16)

तस्मात्कुण्डाद्विनिष्क्रांता धृतखड्गा भयावहा ॥ साऽपरापि तथारूपा शक्तिः परमदारुणा

tasmātkuṇḍādviniṣkrāṁtā dhṛtakhaḍgā bhayāvahā sā'parāpi tathārūpā śaktiḥ paramadāruṇā

-- उसी कुण्ड से खड्ग धारण किए हुए, भयावह रूप में प्रकट हुई। वह दूसरी शक्ति भी उसी रूप वाली, अत्यन्त भयंकर थी।

श्लोक 17 (skanda.6.88.17)

प्रोचतुस्ते वरं हृत्स्थं प्रार्थ्यतामिति दुर्लभम्

procatuste varaṁ hṛtsthaṁ prārthyatāmiti durlabham

उन दोनों देवियों ने अम्बा और वृद्धा से कहा -- अपने हृदय में स्थित दुर्लभ वर माँगो।

श्लोक 18 (skanda.6.88.18)

ते ऊचतुः। अस्माकं दयितो भर्त्ता काशिराजः प्रतापवान् ॥ निहतः संगरे क्रुद्धैर्यवनैः कालपूर्वकैः

te ūcatuḥ asmākaṁ dayito bharttā kāśirājaḥ pratāpavān nihataḥ saṁgare kruddhairyavanaiḥ kālapūrvakaiḥ

वे दोनों बोलीं -- हमारे प्रिय पति, प्रतापी काशिराज, क्रुद्ध कालयवन-प्रधान यवनों द्वारा युद्ध में मारे गए हैं।

श्लोक 19 (skanda.6.88.19)

युष्मदीय प्रसादेन यथा तेषां परिक्षयः ॥ सञ्जायते महादेव्यौ तथा कार्यमसंशयम्

yuṣmadīya prasādena yathā teṣāṁ parikṣayaḥ sañjāyate mahādevyau tathā kāryamasaṁśayam

हे महादेवियो, आपकी कृपा से जिस प्रकार उनका सम्पूर्ण नाश हो, वह कार्य निःसंदेह हमारे लिए कीजिए।

श्लोक 20 (skanda.6.88.20)

स्थातव्यं च तथात्रैव उभाभ्यामपि सादरम् ॥ स्वपुरस्य प्ररक्षार्थमेतत्कृत्यं मतं हि नौ

sthātavyaṁ ca tathātraiva ubhābhyāmapi sādaram svapurasya prarakṣārthametatkṛtyaṁ mataṁ hi nau

और आप दोनों भी आदरपूर्वक यहीं निवास करें; हम दोनों की यही अभिलाषा है कि यह हमारे नगर की रक्षा के लिए किया जाए।

श्लोक 21 (skanda.6.88.21)

तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा उभे ते देवते ततः॥ संप्रोच्य बाढमित्येवं तस्मिन्कुण्डे व्यवस्थिते

tayostadvacanaṁ śrutvā ubhe te devate tataḥ saṁprocya bāḍhamityevaṁ tasminkuṇḍe vyavasthite

उन दोनों का वह वचन सुनकर, वे दोनों देवियाँ 'ऐसा ही हो' कहकर, उसी कुण्ड में स्थित हो गईं।

श्लोक 22 (skanda.6.88.22)

एतस्मिन्नंतरे तस्मात्कुण्डाच्छतसहस्रशः ॥ निष्क्रांताः संख्यया हीना मातरो नैकरूपिकाः

etasminnaṁtare tasmātkuṇḍācchatasahasraśaḥ niṣkrāṁtāḥ saṁkhyayā hīnā mātaro naikarūpikāḥ

इसी बीच उसी कुण्ड से लाखों-लाखों, अगणित मातृगण, विविध रूपों वाली, प्रकट हुईं।

श्लोक 23 (skanda.6.88.23)

एका गजमुखी तत्र तथान्या तुरगानना ॥ सारमेय मुखाश्चान्याः पक्षिच्छागमुखाः पराः

ekā gajamukhī tatra tathānyā turagānanā sārameya mukhāścānyāḥ pakṣicchāgamukhāḥ parāḥ

उनमें से एक गजमुखी थी, दूसरी अश्वमुखी; कुछ अन्य श्वानमुखी थीं, कुछ पक्षीमुखी और कुछ बकरे के मुख वाली।

श्लोक 24 (skanda.6.88.24)

तिर्यञ्च वपुषश्चान्या वक्त्रैर्मानुषसंभवैः ॥ त्रिशीर्षाः पञ्चशीर्षाश्च दशशीर्षास्तथा पराः

tiryañca vapuṣaścānyā vaktrairmānuṣasaṁbhavaiḥ triśīrṣāḥ pañcaśīrṣāśca daśaśīrṣāstathā parāḥ

कुछ का शरीर पशु-सदृश था किन्तु मुख मनुष्य के समान थे; कुछ तीन सिर वाली, कुछ पाँच सिर वाली, और कुछ दस सिर वाली भी थीं।

श्लोक 25 (skanda.6.88.25)

गुह्य स्थानस्थितैर्वक्त्रैरेकाश्चान्या हृदिस्थितैः ॥ पार्श्वसंस्थैः स्थिताश्चान्या अन्याः पृष्ठिगतैर्मुखैः

guhya sthānasthitairvaktrairekāścānyā hṛdisthitaiḥ pārśvasaṁsthaiḥ sthitāścānyā anyāḥ pṛṣṭhigatairmukhaiḥ

कुछ के मुख गुह्य स्थान में स्थित थे, कुछ के हृदय में, कुछ के पार्श्व में, और कुछ के पीठ में स्थित मुखों वाली थीं।

श्लोक 26 (skanda.6.88.26)

एकहस्ता द्विहस्ताश्च पञ्चहस्तास्तथापराः ॥ अन्या विंशतिहस्ताश्च विहस्ताश्च तथापराः

ekahastā dvihastāśca pañcahastāstathāparāḥ anyā viṁśatihastāśca vihastāśca tathāparāḥ

कुछ एक भुजा वाली थीं, कुछ दो भुजा वाली, कुछ पाँच भुजा वाली; कुछ बीस भुजा वाली और कुछ भुजारहित भी थीं।

श्लोक 27 (skanda.6.88.27)

बहुपादा विपादाश्च एकपादास्तथापराः ॥ तथान्याश्चार्धपादाश्च अधोवक्त्रा विभीषणाः

bahupādā vipādāśca ekapādāstathāparāḥ tathānyāścārdhapādāśca adhovaktrā vibhīṣaṇāḥ

कुछ के अनेक पैर थे, कुछ पैररहित थीं, कुछ एक पैर वाली; तथा कुछ आधे पैर वाली और नीचे मुख वाली, अत्यन्त भयंकर थीं।

श्लोक 28 (skanda.6.88.28)

एकनेत्रा द्विनेत्राश्च त्रिनेत्राश्च तथापराः ॥ काश्चिद्गजसमारूढा हयारूढास्तथापराः

ekanetrā dvinetrāśca trinetrāśca tathāparāḥ kāścidgajasamārūḍhā hayārūḍhāstathāparāḥ

कुछ एक नेत्र वाली थीं, कुछ दो नेत्र वाली, कुछ तीन नेत्र वाली; कुछ हाथी पर आरूढ़ थीं, कुछ घोड़े पर।

श्लोक 29 (skanda.6.88.29)

वृषवानरसिंहाजव्याघ्रसर्पास्थिताः पराः ॥ गोधाश्वरासभारूढास्तथा च विहगाश्रिताः

vṛṣavānarasiṁhājavyāghrasarpāsthitāḥ parāḥ godhāśvarāsabhārūḍhāstathā ca vihagāśritāḥ

कुछ बैल, वानर, सिंह, बकरे, बाघ और सर्प पर स्थित थीं; कुछ गोह, घोड़े, गधे पर आरूढ़ थीं, और कुछ पक्षियों पर आश्रित थीं।

श्लोक 30 (skanda.6.88.30)

कूर्मकुक्कुटसर्पादिसमारूढाः सहस्रशः ॥ प्रकुर्वंत्यो रुदन्त्यश्च गायन्त्यश्च तथा पराः ॥ नृत्यंत्यश्च हसंत्यश्च क्रीडासक्ताः परस्परम्

kūrmakukkuṭasarpādisamārūḍhāḥ sahasraśaḥ prakurvaṁtyo rudantyaśca gāyantyaśca tathā parāḥ nṛtyaṁtyaśca hasaṁtyaśca krīḍāsaktāḥ parasparam

हजारों की संख्या में कछुए, मुर्गे, सर्प आदि पर आरूढ़ होकर, कुछ रोती हुई, कुछ गाती हुई, कुछ नाचती और हँसती हुईं, वे परस्पर क्रीड़ा में तल्लीन थीं।

श्लोक 31 (skanda.6.88.31)

ऊर्ध्वकेशा विकेशाश्च गात्रकेशाश्च भूरिशः ॥ लंबकेशा विकेशाश्च वाजिकेशास्तथैव च

ūrdhvakeśā vikeśāśca gātrakeśāśca bhūriśaḥ laṁbakeśā vikeśāśca vājikeśāstathaiva ca

कुछ के केश ऊपर की ओर खड़े थे, कुछ केशरहित थीं, कुछ के शरीर पर अत्यधिक रोम थे; कुछ के केश लटकते हुए थे, कुछ केशहीन, और कुछ के अश्व-जैसे केश थे।

श्लोक 32 (skanda.6.88.32)

ह्रस्वदन्त्यो विदंत्यश्च दीर्घदन्त्यो विभीषणाः ॥ गजदंत्यस्तथैवान्या लोहदंत्योभयावहाः

hrasvadantyo vidaṁtyaśca dīrghadantyo vibhīṣaṇāḥ gajadaṁtyastathaivānyā lohadaṁtyobhayāvahāḥ

कुछ छोटे दाँतों वाली, कुछ दाँतरहित, कुछ लम्बे और भयंकर दाँतों वाली थीं; कुछ हाथी-जैसे दाँतों वाली, और कुछ लोहे-जैसे भयकारी दाँतों वाली थीं।

श्लोक 33 (skanda.6.88.33)

लंबकर्ण्यो विकर्ण्यश्च शूर्पकर्ण्यस्तथा पराः ॥ शंकुकर्ण्यः कुकर्ण्यश्च बहुकर्ण्यः सुकर्णिकाः

laṁbakarṇyo vikarṇyaśca śūrpakarṇyastathā parāḥ śaṁkukarṇyaḥ kukarṇyaśca bahukarṇyaḥ sukarṇikāḥ

कुछ के कान लटकते हुए थे, कुछ बिना कान की, कुछ सूप के समान बड़े कान वाली थीं; कुछ के कान कील के समान, कुछ के विकृत, कुछ के अनेक कान, और कुछ के सुन्दर कान थे।

श्लोक 34 (skanda.6.88.34)

एकवस्त्रा विवस्त्राश्च बहुवस्त्रास्तथा पराः ॥ चर्मप्रावरणाश्चैव कथाप्रावरणान्विताः

ekavastrā vivastrāśca bahuvastrāstathā parāḥ carmaprāvaraṇāścaiva kathāprāvaraṇānvitāḥ

कुछ एक वस्त्र वाली थीं, कुछ वस्त्ररहित, कुछ अनेक वस्त्रों वाली; कुछ चर्म का ओढ़ना ओढ़े हुए, और कुछ अन्य प्रकार के आवरण से युक्त थीं।

श्लोक 35 (skanda.6.88.35)

खङ्गहस्ताः शराहस्ताः कुंतहस्ताश्च भीषणाः ॥ पाशहस्तास्तथैवान्याः प्रासचापकराः पराः ॥ शूलमुद्गरहस्ताश्च भुशुंडिकरभूषिताः

khaṅgahastāḥ śarāhastāḥ kuṁtahastāśca bhīṣaṇāḥ pāśahastāstathaivānyāḥ prāsacāpakarāḥ parāḥ śūlamudgarahastāśca bhuśuṁḍikarabhūṣitāḥ

कुछ हाथों में खड्ग लिए थीं, कुछ बाण लिए, कुछ भाले लिए हुए भयंकर थीं; कुछ हाथों में पाश लिए हुए थीं, कुछ भाला और धनुष धारण किए हुए; कुछ त्रिशूल और मुद्गर हाथ में लिए, तथा भुशुण्डि नामक अस्त्र से सुशोभित थीं।

श्लोक 36 (skanda.6.88.36)

अथ ताभ्यां तथाऽकर्ण्य ताः सर्वा हर्षसंयुताः ॥ प्रस्थितास्तत्र ता यत्र ते कालयवनाः स्थिताः

atha tābhyāṁ tathā'karṇya tāḥ sarvā harṣasaṁyutāḥ prasthitāstatra tā yatra te kālayavanāḥ sthitāḥ

फिर उन दोनों (अम्बा और वृद्धा) की बात सुनकर, वे सभी हर्षित होकर वहाँ चल पड़ीं, जहाँ वे कालयवन स्थित थे।

श्लोक 37 (skanda.6.88.37)

ततस्ते तत्समालोक्य बलं देवीसमुद्रवम् ॥ रौद्र रूपधरं तीव्रं विकृतं विकृतैर्मुखैः

tataste tatsamālokya balaṁ devīsamudravam raudra rūpadharaṁ tīvraṁ vikṛtaṁ vikṛtairmukhaiḥ

तब उन यवनों ने उस देवी-सेना को देखा, जो रौद्र रूप धारण किए हुए, तीव्र, विकृत मुखों से विकृत थी।

श्लोक 38 (skanda.6.88.38)

विषण्णवदनाः सर्वे भयभीता समंततः ॥ धावतो भक्षितास्ताभिर्देवताभिः सुनिर्दयम्

viṣaṇṇavadanāḥ sarve bhayabhītā samaṁtataḥ dhāvato bhakṣitāstābhirdevatābhiḥ sunirdayam

वे सब चारों ओर से भयभीत होकर, म्लान मुख हो गए; भागते हुए भी वे उन देवियों द्वारा निर्दयतापूर्वक खा लिए गए।

श्लोक 39 (skanda.6.88.39)

बालवृद्धसमोपेतं तेषां राष्ट्रं दुरात्मनाम् ॥ स्त्रीभिश्च सहितं ताभिर्देवताभिः प्रभक्षितम्

bālavṛddhasamopetaṁ teṣāṁ rāṣṭraṁ durātmanām strībhiśca sahitaṁ tābhirdevatābhiḥ prabhakṣitam

उन दुरात्माओं का सम्पूर्ण राष्ट्र, बालक-वृद्धों सहित, तथा स्त्रियों सहित, उन देवियों द्वारा भक्षण कर लिया गया।

श्लोक 40 (skanda.6.88.40)

एवं निर्वास्य तद्राष्ट्रं सर्वास्ता हर्षसंयुताः ॥ भूय एव निजं स्थानं संप्राप्ता द्विजसत्तमाः

evaṁ nirvāsya tadrāṣṭraṁ sarvāstā harṣasaṁyutāḥ bhūya eva nijaṁ sthānaṁ saṁprāptā dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो, इस प्रकार उस राष्ट्र को नष्ट करके, वे सभी देवियाँ प्रसन्न होकर पुनः अपने स्थान को लौट आईं।

श्लोक 41 (skanda.6.88.41)

ततः प्रोचुः प्रणम्योच्चैस्ताभ्यां विनयपूर्वकम् ॥ हतास्ते यवनाः कृष्णाः सपुत्रपशुबांधवाः

tataḥ procuḥ praṇamyoccaistābhyāṁ vinayapūrvakam hatāste yavanāḥ kṛṣṇāḥ saputrapaśubāṁdhavāḥ

तब उन्होंने अम्बा और वृद्धा को ऊँचे स्वर में प्रणाम करके विनयपूर्वक कहा -- वे कृष्णवर्ण यवन, अपने पुत्रों, पशुओं और बन्धुओं सहित मारे गए।

श्लोक 42 (skanda.6.88.42)

उद्वासितस्तथा सर्वो देशस्तेषां स वै महान् ॥ सांप्रतं दीयतां कश्चिदाहारस्तृप्तिहेतवे ॥ निवासाय ततः स्थानं किंचिच्चावेद्यतां हि नः

udvāsitastathā sarvo deśasteṣāṁ sa vai mahān sāṁprataṁ dīyatāṁ kaścidāhārastṛptihetave nivāsāya tataḥ sthānaṁ kiṁciccāvedyatāṁ hi naḥ

उनका वह विशाल देश भी पूर्णतः उजाड़ दिया गया है। अब हमें तृप्ति के लिए कोई आहार दिया जाए, और निवास के लिए भी कोई स्थान हमें बता दिया जाए।

श्लोक 43 (skanda.6.88.43)

देव्यावूचतुः। मर्त्यलोकेऽत्र या नार्यो गर्भवत्यः स्वपंति च ॥ संध्याकालप्रकाशे च तासां गर्भोऽस्तु वो द्रुतम्

devyāvūcatuḥ martyaloke'tra yā nāryo garbhavatyaḥ svapaṁti ca saṁdhyākālaprakāśe ca tāsāṁ garbho'stu vo drutam

दोनों देवियाँ बोलीं -- इस मृत्युलोक में जो गर्भवती स्त्रियाँ संध्याकाल के प्रकाश में सोती हैं, उनका गर्भ तुम्हें शीघ्र प्राप्त हो।

श्लोक 44 (skanda.6.88.44)

रुदंत्यो या विनिर्यांति चत्वरेषु त्रिकेषु च ॥ तासां गर्भस्तु युष्माकं संप्रदत्तः प्रभुज्यताम्

rudaṁtyo yā viniryāṁti catvareṣu trikeṣu ca tāsāṁ garbhastu yuṣmākaṁ saṁpradattaḥ prabhujyatām

जो स्त्रियाँ रोती हुई चौराहों और तिराहों पर निकलती हैं, उनका गर्भ भी तुम्हें दिया गया है, उसे भोगो।

श्लोक 45 (skanda.6.88.45)

उच्छिष्टा याः प्रसर्पंति रमन्ते च स्वपंति च ॥ तासां गर्भः समस्तानां युष्माकं भोज नाय वै

ucchiṣṭā yāḥ prasarpaṁti ramante ca svapaṁti ca tāsāṁ garbhaḥ samastānāṁ yuṣmākaṁ bhoja nāya vai

जो स्त्रियाँ जूठे मुख से ही चलती-फिरती हैं, रमण करती हैं, और सोती हैं, उन सबका गर्भ तुम्हारे भोजन के लिए है।

श्लोक 46 (skanda.6.88.46)

सूतिकाभवने यस्मिन्नुच्छिष्टं चोपजायते ॥ स बालकस्तु युष्माकं भोजनाय प्रकल्पितः

sūtikābhavane yasminnucchiṣṭaṁ copajāyate sa bālakastu yuṣmākaṁ bhojanāya prakalpitaḥ

जिस सूतिकागृह (प्रसूतिगृह) में जूठन उत्पन्न हो जाए, वहाँ का बालक तुम्हारे भोजन के लिए नियत है।

श्लोक 47 (skanda.6.88.47)

न षष्ठीजागरो यस्य बालकस्य भविष्यति ॥ स भविष्यति भोज्याय युष्माकं नात्र संशयः

na ṣaṣṭhījāgaro yasya bālakasya bhaviṣyati sa bhaviṣyati bhojyāya yuṣmākaṁ nātra saṁśayaḥ

जिस बालक के लिए षष्ठी की रात्रि-जागरण न किया जाए, वह निःसंदेह तुम्हारे भोजन के योग्य होगा।

श्लोक 48 (skanda.6.88.48)

नाशं यास्यति वा यत्र पावकः सूतिकागृहे ॥ स भविष्यति भोज्याय युष्माकं बालरूपधृक्

nāśaṁ yāsyati vā yatra pāvakaḥ sūtikāgṛhe sa bhaviṣyati bhojyāya yuṣmākaṁ bālarūpadhṛk

जिस सूतिकागृह में अग्नि बुझ जाए, वहाँ का बालक भी तुम्हारे भोजन के योग्य होगा।

श्लोक 49 (skanda.6.88.49)

मांगल्यैः संपरित्यक्तं यद्भवेत्सूतिकागृहम् ॥ तस्मिन्यस्तिष्ठते बालः स युष्माकं प्रकल्पितः

māṁgalyaiḥ saṁparityaktaṁ yadbhavetsūtikāgṛham tasminyastiṣṭhate bālaḥ sa yuṣmākaṁ prakalpitaḥ

जो सूतिकागृह मंगल-वस्तुओं से रहित हो, उसमें रहने वाला बालक तुम्हारे लिए नियत है।

श्लोक 50 (skanda.6.88.50)

संध्यायां बालका ये वा स्वपंत्याकाशदेशगाः॥ ते सर्वे भोजनार्थाय युष्माकं संनिवेदिताः

saṁdhyāyāṁ bālakā ye vā svapaṁtyākāśadeśagāḥ te sarve bhojanārthāya yuṣmākaṁ saṁniveditāḥ

जो बालक संध्याकाल में खुले आकाश के नीचे सोते हैं, वे सभी तुम्हारे भोजन के लिए सौंपे गए हैं।

श्लोक 51 (skanda.6.88.51)

यस्य जन्मदिने प्राप्ते वर्षांते क्रियते न च ॥ मांगल्यं तस्य यद्गात्रं तद्युष्माकं प्रकल्पितम्

yasya janmadine prāpte varṣāṁte kriyate na ca māṁgalyaṁ tasya yadgātraṁ tadyuṣmākaṁ prakalpitam

जिसके जन्मदिन पर वर्ष के अन्त में मांगलिक कृत्य नहीं किया जाता, उसका शरीर तुम्हारे लिए नियत है।

श्लोक 52 (skanda.6.88.52)

तैलाभ्यंगं नरः कृत्वा यश्च स्नानं करोति न ॥ स दत्तो भोजनार्थाय युष्माकं नात्र संशयः

tailābhyaṁgaṁ naraḥ kṛtvā yaśca snānaṁ karoti na sa datto bhojanārthāya yuṣmākaṁ nātra saṁśayaḥ

जो मनुष्य तेल-मालिश करके स्नान नहीं करता, वह निःसंदेह तुम्हारे भोजन के लिए दिया गया है।

श्लोक 53 (skanda.6.88.53)

उच्छिष्टो यः पुमांस्तिष्ठेद्यो वा चत्वरमध्यगः॥ भक्षणीयः स सर्वाभिर्निर्विकल्पेन चेतसा

ucchiṣṭo yaḥ pumāṁstiṣṭhedyo vā catvaramadhyagaḥ bhakṣaṇīyaḥ sa sarvābhirnirvikalpena cetasā

जो पुरुष जूठे मुख से ही खड़ा रहता है, अथवा जो चौराहे के बीच में स्थित होता है, वह सबके द्वारा निःसंकोच भाव से भक्षणीय है।

श्लोक 54 (skanda.6.88.54)

रजस्वलां व्रजेद्यो वा पुरुषः काममोहितः॥ नग्नः शेते तथा स्नाति भक्षणीयः स सत्वरम्

rajasvalāṁ vrajedyo vā puruṣaḥ kāmamohitaḥ nagnaḥ śete tathā snāti bhakṣaṇīyaḥ sa satvaram

जो पुरुष कामवश होकर रजस्वला स्त्री के पास जाता है, अथवा नग्न होकर सोता या स्नान करता है, वह शीघ्र भक्षणीय है।

श्लोक 55 (skanda.6.88.55)

दक्षिणाभिमुखो रात्रौ यश्च स्नाति विमूढधीः ॥ शेते च शयने सोऽपि भक्षणीयश्च सत्वरम्

dakṣiṇābhimukho rātrau yaśca snāti vimūḍhadhīḥ śete ca śayane so'pi bhakṣaṇīyaśca satvaram

जो मूढ़बुद्धि पुरुष रात्रि में दक्षिणमुख होकर स्नान करता है और शय्या पर उसी दिशा में सोता है, वह भी शीघ्र भक्षणीय है।

श्लोक 56 (skanda.6.88.56)

उदङ्मुखश्च यो रात्रौ दिवा वा दक्षिणामुखः ॥ मूत्रोत्सर्गं पुरीष वा प्रकुर्याद्भक्ष्य एव सः

udaṅmukhaśca yo rātrau divā vā dakṣiṇāmukhaḥ mūtrotsargaṁ purīṣa vā prakuryādbhakṣya eva saḥ

जो रात्रि में उत्तरमुख होकर, अथवा दिन में दक्षिणमुख होकर मल-मूत्र त्याग करता है, वह भी भक्ष्य ही है।

श्लोक 57 (skanda.6.88.57)

यः कुर्याद्रजनीवक्त्रे दधिसक्तुप्रभक्षणम् ॥ अंत्यजाभिगमं चाथ भक्षणीयो द्रुतं हि सः

yaḥ kuryādrajanīvaktre dadhisaktuprabhakṣaṇam aṁtyajābhigamaṁ cātha bhakṣaṇīyo drutaṁ hi saḥ

जो व्यक्ति रात्रि के प्रारम्भ में दही और सत्तू का भक्षण करता है, अथवा अन्त्यज (निम्न वर्ण) स्त्री के पास जाता है, वह शीघ्र भक्षणीय है।

श्लोक 58 (skanda.6.88.58)

सूत उवाच। एवं ताभ्यां तदा प्रोक्ता देवतास्ताः समंततः ॥ परिवार्य तदा तस्थुः संप्रहृष्टेन चेतसा

sūta uvāca evaṁ tābhyāṁ tadā proktā devatāstāḥ samaṁtataḥ parivārya tadā tasthuḥ saṁprahṛṣṭena cetasā

सूत जी बोले -- इस प्रकार उन दोनों (अम्बा-वृद्धा) द्वारा तब यह सब कहे जाने पर, वे देवियाँ चारों ओर से घेर कर, प्रसन्न चित्त से वहीं ठहर गईं।

श्लोक 59 (skanda.6.88.59)

एतस्मिन्नंतरे राजा चमत्कारः प्रतापवान् ॥ प्रासादं निर्ममे ताभ्यां कैलासशिखरोपमम्

etasminnaṁtare rājā camatkāraḥ pratāpavān prāsādaṁ nirmame tābhyāṁ kailāsaśikharopamam

इसी बीच प्रतापी राजा चमत्कार ने उन दोनों अम्बा-वृद्धा के लिए कैलास शिखर के समान एक मन्दिर बनवाया।

श्लोक 60 (skanda.6.88.60)

ततः प्रभृति ते ख्याते क्षेत्रे तत्र महोदये ॥ अंबावृद्धाभिधाने च पुररक्षापरे सदा

tataḥ prabhṛti te khyāte kṣetre tatra mahodaye aṁbāvṛddhābhidhāne ca purarakṣāpare sadā

तब से वे दोनों उस प्रसिद्ध, महान उन्नति वाले क्षेत्र में, अम्बावृद्धा नाम से जानी जाकर, सदा नगर की रक्षा में तत्पर रहती हैं।

श्लोक 61 (skanda.6.88.61)

यः पुमान्प्रातरुत्थाय ताभ्यां पश्यति चाननम् ॥ तस्य संवत्सरंयावन्न च च्छिद्रं प्रजायते

yaḥ pumānprātarutthāya tābhyāṁ paśyati cānanam tasya saṁvatsaraṁyāvanna ca cchidraṁ prajāyate

जो पुरुष प्रातःकाल उठकर उन दोनों का मुख दर्शन करता है, उसे एक वर्ष तक कोई विघ्न उत्पन्न नहीं होता।

श्लोक 62 (skanda.6.88.62)

वृद्ध्यादौ वाथ चांते वा ताभ्यां पूजां करोति यः ॥ न तस्य जायते च्छिद्रं कथंचिदपि भूतले

vṛddhyādau vātha cāṁte vā tābhyāṁ pūjāṁ karoti yaḥ na tasya jāyate cchidraṁ kathaṁcidapi bhūtale

जो कोई किसी कार्य के आरम्भ में अथवा अन्त में उन दोनों की पूजा करता है, उसे इस पृथ्वी पर किसी भी प्रकार का विघ्न उत्पन्न नहीं होता।

श्लोक 63 (skanda.6.88.63)

यात्राकाले पुमान्यश्च ताभ्यां पूजां समाचरेत् ॥ स वांछितफलं प्राप्य शीघ्रं स्वगृहमाप्नुयात्

yātrākāle pumānyaśca tābhyāṁ pūjāṁ samācaret sa vāṁchitaphalaṁ prāpya śīghraṁ svagṛhamāpnuyāt

जो पुरुष यात्रा के समय उन दोनों की पूजा करता है, वह अपना इच्छित फल प्राप्त कर शीघ्र ही अपने घर लौट आता है।

श्लोक 64 (skanda.6.88.64)

सदाष्टम्यां चतुर्दश्यां यस्ताभ्यां बलिमाहरेत् ॥ स कामानाप्नुयादिष्टानिह प्रेत्य च सद्गतिम्

sadāṣṭamyāṁ caturdaśyāṁ yastābhyāṁ balimāharet sa kāmānāpnuyādiṣṭāniha pretya ca sadgatim

जो सदा अष्टमी और चतुर्दशी को उन दोनों को बलि अर्पित करता है, वह अपनी इच्छित कामनाएँ पाता है, और मृत्यु के बाद सद्गति भी।

श्लोक 65 (skanda.6.88.65)

यो महानवमीसंज्ञे दिवसे श्रद्धयान्वितः ॥ ताभ्यां समाचरेत्पूजां स सदा स्यादकण्टकी

yo mahānavamīsaṁjñe divase śraddhayānvitaḥ tābhyāṁ samācaretpūjāṁ sa sadā syādakaṇṭakī

जो श्रद्धायुक्त होकर महानवमी नामक दिन पर उन दोनों की पूजा करता है, वह सदा कण्टकरहित निर्विघ्न रहता है।

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