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नागर खण्ड · अध्याय 87

सोमप्रासाद-माहात्म्य-वर्णन

अध्याय 86अध्याय-सूचीअध्याय 88

श्लोक 1 (skanda.6.87.1)

सूत उवाच। तथा तत्रास्ति विप्रेन्द्राः सोमस्यायतनं शुभम्॥ यस्यापि दर्शनादेव मुच्यते पातकैर्नरः

sūta uvāca tathā tatrāsti viprendrāḥ somasyāyatanaṁ śubham yasyāpi darśanādeva mucyate pātakairnaraḥ

सूत जी बोले -- हे विप्रेन्द्रो, वहाँ सोम (चन्द्रमा) का भी एक शुभ मन्दिर है, जिसके दर्शनमात्र से ही मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.6.87.2)

सोमवारे तु संप्राप्ते सोमस्य ग्रहणे नरः ॥ यस्तं पश्यति पापोऽपि नरकं न स पश्यति

somavāre tu saṁprāpte somasya grahaṇe naraḥ yastaṁ paśyati pāpo'pi narakaṁ na sa paśyati

सोमवार के दिन चन्द्रग्रहण के समय जो मनुष्य उसे देखता है, वह पापी होते हुए भी नरक नहीं देखता।

श्लोक 3 (skanda.6.87.3)

ऋषय ऊचुः। सर्वेषामेव देवानां दृश्यंतेऽत्र समाश्रयाः ॥ अत्र चंद्रस्य चैवैकः कथं जातः समाश्रयः

ṛṣaya ūcuḥ sarveṣāmeva devānāṁ dṛśyaṁte'tra samāśrayāḥ atra caṁdrasya caivaikaḥ kathaṁ jātaḥ samāśrayaḥ

ऋषिगण बोले -- यहाँ समस्त देवताओं के आश्रयस्थान दिखाई देते हैं; यहाँ केवल चन्द्रमा का ही आश्रय कैसे हुआ?

श्लोक 4 (skanda.6.87.4)

एतन्नः सूतपुत्रातिचित्रं मनसि वर्तते ॥ तस्माद्वद महाभाग सर्वं त्वं वेत्स्यशेषतः

etannaḥ sūtaputrāticitraṁ manasi vartate tasmādvada mahābhāga sarvaṁ tvaṁ vetsyaśeṣataḥ

हे सूतपुत्र, यह हमारे मन में बड़ा विचित्र प्रतीत होता है; अतः हे महाभाग, आप सब कुछ जानते हैं, यह हमें पूर्णतः बताइए।

श्लोक 5 (skanda.6.87.5)

सूत उवाच। एनज्जगद्द्विजश्रेष्ठाः सर्वं सोममयं स्मृतम् ॥ तस्मात्प्रतिष्ठिते तस्मिंस्त्रैलोक्यं स्यात्प्रतिष्ठितम्

sūta uvāca enajjagaddvijaśreṣṭhāḥ sarvaṁ somamayaṁ smṛtam tasmātpratiṣṭhite tasmiṁstrailokyaṁ syātpratiṣṭhitam

सूत जी बोले -- हे द्विजश्रेष्ठो, यह सारा जगत सोम-मय ही माना जाता है; अतः उसकी प्रतिष्ठा होने पर ही त्रैलोक्य प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 6 (skanda.6.87.6)

एताश्चौषधयः सर्वाः सस्याद्याश्चेह भूतले ॥ सर्वाः सोममयास्ताश्च याभिर्जीवंति जंतवः

etāścauṣadhayaḥ sarvāḥ sasyādyāśceha bhūtale sarvāḥ somamayāstāśca yābhirjīvaṁti jaṁtavaḥ

पृथ्वी पर जो ये समस्त औषधियाँ, अन्न आदि हैं, जिनके द्वारा प्राणी जीवित रहते हैं, वे सब सोम-मय ही हैं।

श्लोक 7 (skanda.6.87.7)

तस्माद्ब्रह्मादयो देवाः सोमं प्राप्य क्रमाद्द्विजाः ॥ तृप्तिं यांति परां हृष्टा यतस्तस्माद्वरोऽत्र सः

tasmādbrahmādayo devāḥ somaṁ prāpya kramāddvijāḥ tṛptiṁ yāṁti parāṁ hṛṣṭā yatastasmādvaro'tra saḥ

हे द्विजो, इसीलिए ब्रह्मा आदि देवगण भी क्रमशः सोम को प्राप्त करके प्रसन्न होते हुए परम तृप्ति को प्राप्त होते हैं, इसीलिए यहाँ वह श्रेष्ठ माना जाता है।

श्लोक 8 (skanda.6.87.8)

अग्निष्टोमादयो यज्ञास्तथा सोमे प्रतिष्ठिताः ॥ तस्य पानाद्यतस्तृप्तिं तत्र यांति द्विजोत्तमाः

agniṣṭomādayo yajñāstathā some pratiṣṭhitāḥ tasya pānādyatastṛptiṁ tatra yāṁti dvijottamāḥ

अग्निष्टोम आदि यज्ञ भी सोम में ही प्रतिष्ठित हैं; हे द्विजोत्तमो, उसके पान से ही उनमें तृप्ति उत्पन्न होती है।

श्लोक 9 (skanda.6.87.9)

एतस्मात्कारणात्सोमः सर्वेषामधिकः स्मृतः ॥ देवानां दानवानां च स हि पूज्यतमः स्मृतः

etasmātkāraṇātsomaḥ sarveṣāmadhikaḥ smṛtaḥ devānāṁ dānavānāṁ ca sa hi pūjyatamaḥ smṛtaḥ

इसी कारण सोम सबसे बढ़कर माना गया है; वह देवताओं और दानवों दोनों के लिए ही सबसे अधिक पूज्य माना गया है।

श्लोक 10 (skanda.6.87.10)

यथान्येषां सुरेन्द्राणां हर्म्याणि धरणीतले ॥ क्रियन्ते रात्रिनाथस्य तद्वत्कुर्वंति मानवाः

yathānyeṣāṁ surendrāṇāṁ harmyāṇi dharaṇītale kriyante rātrināthasya tadvatkurvaṁti mānavāḥ

जिस प्रकार पृथ्वी पर अन्य देवेन्द्रों के मन्दिर बनाए जाते हैं, उसी प्रकार मनुष्य रात्रि के स्वामी चन्द्रमा के भी मन्दिर बनाते हैं।

श्लोक 11 (skanda.6.87.11)

यैर्येर्नरैर्निशेशस्य प्रासादो विहितः क्षितौ ॥ तेते मुक्तिपदं प्राप्ताः कृत्वाऽथ शुभसंचयम्

yairyernarairniśeśasya prāsādo vihitaḥ kṣitau tete muktipadaṁ prāptāḥ kṛtvā'tha śubhasaṁcayam

जिन-जिन मनुष्यों ने पृथ्वी पर रात्रीश चन्द्रमा का मन्दिर बनवाया है, उन-उन सभी ने शुभ पुण्य-संचय करके मुक्तिपद प्राप्त किया है।

श्लोक 12 (skanda.6.87.12)

यन्महेश्वरहर्म्याणां सहस्रेण भवेच्छुभम् ॥ तदेके नैव चंद्रस्य प्राप्नुवंति शुभं नराः

yanmaheśvaraharmyāṇāṁ sahasreṇa bhavecchubham tadeke naiva caṁdrasya prāpnuvaṁti śubhaṁ narāḥ

महेश्वर के सहस्र मन्दिरों से जो शुभ फल प्राप्त होता है, वह शुभ फल मनुष्य चन्द्रमा के एक ही मन्दिर से नहीं प्राप्त कर पाते।

श्लोक 13 (skanda.6.87.13)

अथ चन्द्रोत्थहर्म्यस्य माहात्म्यं तद्द्विजोत्तमाः ॥ ज्ञात्वा ब्रह्मादयो देवा भयसंत्रस्तमानसाः ॥ तद्विघ्नार्थमिदं प्रोचुर्मेरुमूर्धानमाश्रिताः

atha candrotthaharmyasya māhātmyaṁ taddvijottamāḥ jñātvā brahmādayo devā bhayasaṁtrastamānasāḥ tadvighnārthamidaṁ procurmerumūrdhānamāśritāḥ

हे द्विजोत्तमो, तब चन्द्र-मन्दिर के उस माहात्म्य को जानकर, ब्रह्मा आदि देवगण भयभीत मन वाले होकर, मेरु के शिखर पर स्थित होकर, उसमें विघ्न डालने के लिए यह कहने लगे।

श्लोक 14 (skanda.6.87.14)

सौम्यर्क्षे सोमवारेण सौम्ये मासि च संस्थिते ॥ तिथौ च सोमदेवत्ये प्राप्ते सोमग्रहे तथा ॥ सकारैः पंचभिर्युक्ते काले सोमस्य मंदिरम्

saumyarkṣe somavāreṇa saumye māsi ca saṁsthite tithau ca somadevatye prāpte somagrahe tathā sakāraiḥ paṁcabhiryukte kāle somasya maṁdiram

सौम्य नक्षत्र, सोमवार, सौम्य मास के होने पर, सोम-देवता वाली तिथि तथा सोमग्रह के योग में, और 'स' अक्षर से युक्त पाँचों तत्त्वों के काल में -- सोम का मन्दिर --

श्लोक 15 (skanda.6.87.15)

य एकाहेन संपाद्य प्रासादं स्थापयिष्यति ॥ चंद्रं स सर्वदेवोत्थहर्म्यस्याप्नोति सत्फलम्

ya ekāhena saṁpādya prāsādaṁ sthāpayiṣyati caṁdraṁ sa sarvadevotthaharmyasyāpnoti satphalam

-- जो कोई एक ही दिन में पूर्ण करके प्रतिष्ठित कर देगा, वह उस चन्द्र-मन्दिर से समस्त देव-मन्दिरों के निर्माण का सत्फल प्राप्त कर लेगा --

श्लोक 16 (skanda.6.87.16)

सहस्रगुणितं सम्यक्छ्रद्धापूतेन चेतसा ॥ अन्यथा यस्तु चंद्रस्य प्रासादं प्रकरिष्यति

sahasraguṇitaṁ samyakchraddhāpūtena cetasā anyathā yastu caṁdrasya prāsādaṁ prakariṣyati

-- वह भी सहस्रगुणित, यदि श्रद्धापूत चित्त से भलीभाँति किया जाए। इसके विपरीत, जो कोई चन्द्रमा का मन्दिर अन्यथा (इस विधि के बिना) बनाएगा,

श्लोक 17 (skanda.6.87.17)

वंशोच्छेदं समासाद्य नरकं स प्रयास्यति ॥ एतस्मात्कारणाद्भीता न कुर्वंति नरा भुवि

vaṁśocchedaṁ samāsādya narakaṁ sa prayāsyati etasmātkāraṇādbhītā na kurvaṁti narā bhuvi

-- वह अपने वंश के उच्छेद को प्राप्त कर नरक को जाएगा। इसी कारण से भयभीत होकर मनुष्य पृथ्वी पर --

श्लोक 18 (skanda.6.87.18)

प्रासादं रात्रिनाथस्य सुपुण्यमपि सद्द्विजाः ॥ य एष रात्रिनाथस्य क्षेत्रेऽत्रैव व्यवस्थितः

prāsādaṁ rātrināthasya supuṇyamapi saddvijāḥ ya eṣa rātrināthasya kṣetre'traiva vyavasthitaḥ

-- हे सद्द्विजो, अत्यन्त पुण्यदायी होने पर भी रात्रीश का मन्दिर नहीं बनवाते। अब जो यह रात्रीश का मन्दिर इसी क्षेत्र में स्थित है --

श्लोक 19 (skanda.6.87.19)

प्रासादस्त्वंबरीषेण भूभुजा स विनिर्मितः ॥ कथंचित्समयं प्राप्य यथोक्तं शास्त्रचिंतकैः

prāsādastvaṁbarīṣeṇa bhūbhujā sa vinirmitaḥ kathaṁcitsamayaṁ prāpya yathoktaṁ śāstraciṁtakaiḥ

-- वह मन्दिर राजा अंबरीष द्वारा बनवाया गया था, जिसने किसी प्रकार शास्त्रवेत्ताओं द्वारा बताया गया वह उचित समय प्राप्त कर लिया था।

श्लोक 20 (skanda.6.87.20)

तस्यैवोत्तरदिग्भागे द्वितीयोऽन्यः प्रतिष्ठितः ॥ चन्द्रमा धंधुमारेण तद्वत्सोऽपि प्रतिष्ठितः

tasyaivottaradigbhāge dvitīyo'nyaḥ pratiṣṭhitaḥ candramā dhaṁdhumāreṇa tadvatso'pi pratiṣṭhitaḥ

उसी के उत्तर दिशा भाग में एक दूसरा मन्दिर प्रतिष्ठित है; धुन्धुमार राजा द्वारा वह भी उसी प्रकार चन्द्रमा का प्रतिष्ठित कराया गया था।

श्लोक 21 (skanda.6.87.21)

ततश्च तौ महीपालौ तत्प्रभावादुभौ द्विजाः ॥ गतौ च परमां सिद्धिं जन्ममृत्युविवर्जिताम्

tataśca tau mahīpālau tatprabhāvādubhau dvijāḥ gatau ca paramāṁ siddhiṁ janmamṛtyuvivarjitām

हे द्विजो, तब उन दोनों राजाओं ने, उसी के प्रभाव से, जन्म-मृत्यु से रहित परम सिद्धि को प्राप्त किया।

श्लोक 22 (skanda.6.87.22)

प्रासादोऽन्यस्तृतीयस्तु क्षेत्रे प्राभासिके तथा ॥ इक्ष्वाकुणा नरेंद्रेण श्रद्धायुक्तेन निर्मितः

prāsādo'nyastṛtīyastu kṣetre prābhāsike tathā ikṣvākuṇā nareṁdreṇa śraddhāyuktena nirmitaḥ

तीसरा एक अन्य मन्दिर प्रभास क्षेत्र में है, जो श्रद्धायुक्त इक्ष्वाकु राजा द्वारा बनवाया गया था।

श्लोक 23 (skanda.6.87.23)

प्रासादत्रयमेतद्धि मुक्त्वात्र धरणीतले ॥ अपरो नास्ति चन्द्रस्य सत्यमेतन्मयोदितम् ॥ एकोऽस्ति नर्मदातीरे पुण्ये रेवोरिसंगमे

prāsādatrayametaddhi muktvātra dharaṇītale aparo nāsti candrasya satyametanmayoditam eko'sti narmadātīre puṇye revorisaṁgame

इन तीन मन्दिरों को छोड़कर, पृथ्वी पर चन्द्रमा का कोई अन्य मन्दिर नहीं है -- यह मैंने सत्य कहा है; एक और है नर्मदा के तट पर, रेवा-उरी के पवित्र संगम पर।

श्लोक 24 (skanda.6.87.24)

एतद्वः सर्वमाख्यातं चन्द्रमाहात्म्यमुत्तमम् ॥ पठतां शृण्वतां चापि सर्वपातकनाशनम्

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ candramāhātmyamuttamam paṭhatāṁ śṛṇvatāṁ cāpi sarvapātakanāśanam

यह समस्त उत्तम चन्द्र-माहात्म्य, जो पढ़ने और सुनने वालों के सभी पापों का नाश करने वाला है, मैंने तुम्हें पूर्णतः सुना दिया।

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