नागर खण्ड · अध्याय 86
सप्तविंशतिका-माहात्म्य-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.86.1)
सूत उवाच। अथान्यापि च तत्रास्ति सप्तविंशतिका तथा ॥ नक्षत्रैः स्थापिता देवी वांछितस्य प्रदायिनी
sūta uvāca athānyāpi ca tatrāsti saptaviṁśatikā tathā nakṣatraiḥ sthāpitā devī vāṁchitasya pradāyinī
सूत जी बोले -- वहाँ एक अन्य देवी भी हैं, जो सप्तविंशतिका नाम से जानी जाती हैं, जो नक्षत्रों द्वारा स्थापित हैं और इच्छित वस्तु देने वाली हैं।
श्लोक 2 (skanda.6.86.2)
दक्षस्य तनया पूर्वं सप्तविंशतिसंख्यया ॥ उद्वाहिता हि सोमेन पूर्वं ब्राह्मणसत्तमाः
dakṣasya tanayā pūrvaṁ saptaviṁśatisaṁkhyayā udvāhitā hi somena pūrvaṁ brāhmaṇasattamāḥ
हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, पूर्वकाल में दक्ष की सत्ताईस कन्याओं का सोम (चन्द्रमा) के साथ विवाह हुआ था।
श्लोक 3 (skanda.6.86.3)
तासां मध्ये ऽभवच्चैका रोहिणी तस्य वल्लभा ॥ प्राणेभ्योऽपि सदासक्तस्तया सार्धं स तिष्ठति
tāsāṁ madhye 'bhavaccaikā rohiṇī tasya vallabhā prāṇebhyo'pi sadāsaktastayā sārdhaṁ sa tiṣṭhati
उनमें से एक रोहिणी उसकी प्रिय पत्नी थी; वह प्राणों से भी अधिक उसमें आसक्त रहकर सदा उसी के साथ रहता था।
श्लोक 4 (skanda.6.86.4)
ततो दौर्भाग्यसंतप्ताः सर्वा स्ता दक्षकन्यकाः ॥ वैराग्यं परमं गत्वा क्षेत्रेऽस्मिंस्तपसि स्थिताः
tato daurbhāgyasaṁtaptāḥ sarvā stā dakṣakanyakāḥ vairāgyaṁ paramaṁ gatvā kṣetre'smiṁstapasi sthitāḥ
तब दुर्भाग्य से संतप्त होकर दक्ष की वे सभी शेष कन्याएँ अत्यन्त वैराग्य को प्राप्त होकर इस क्षेत्र में तपस्या में लीन हो गईं।
श्लोक 5 (skanda.6.86.5)
संस्थाप्य देवतां दुर्गां श्रद्धया परया युताः ॥ बलिपूजोपहारैस्तां पूजयंत्यः सुरेश्वरीम्
saṁsthāpya devatāṁ durgāṁ śraddhayā parayā yutāḥ balipūjopahāraistāṁ pūjayaṁtyaḥ sureśvarīm
उन्होंने परम श्रद्धा से युक्त होकर देवी दुर्गा की स्थापना की, और बलि, पूजा और उपहारों से उस सुरेश्वरी की पूजा करने लगीं।
श्लोक 6 (skanda.6.86.6)
ततः कालेन महता तासां सा तुष्टिमभ्यगात् ॥ अब्रवीच्च प्रतुष्टोऽहं वरं दास्यामि पुत्रिकाः
tataḥ kālena mahatā tāsāṁ sā tuṣṭimabhyagāt abravīcca pratuṣṭo'haṁ varaṁ dāsyāmi putrikāḥ
तब बहुत काल बीतने पर वह देवी उन पर संतुष्ट हो गईं, और बोलीं -- हे पुत्रियो, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, वर दूँगी।
श्लोक 7 (skanda.6.86.7)
तस्मात्तत्प्रार्थ्यतां चित्ते यद्युष्माकं व्यवस्थितम् ॥ सर्वं दास्याम्यसंदिग्धं यद्युष्माकं हृदि स्थितम्
tasmāttatprārthyatāṁ citte yadyuṣmākaṁ vyavasthitam sarvaṁ dāsyāmyasaṁdigdhaṁ yadyuṣmākaṁ hṛdi sthitam
अतः तुम्हारे मन में जो हो, वह माँग लो; तुम्हारे हृदय में जो कुछ भी है, वह मैं निःसंदेह सब दूँगी।
श्लोक 8 (skanda.6.86.8)
ततः प्रोचुश्च ताः सर्वाः प्रसादात्तव वांछितम् ॥ अस्माकं विद्यते देवि यावत्त्रैलोक्यसंस्थितम्
tataḥ procuśca tāḥ sarvāḥ prasādāttava vāṁchitam asmākaṁ vidyate devi yāvattrailokyasaṁsthitam
तब वे सभी बोलीं -- हे देवि, जब तक यह त्रैलोक्य स्थित है, तब तक हमें आपकी कृपा से जो इच्छित है वह प्राप्त हो --
श्लोक 9 (skanda.6.86.9)
एकं पत्युः सुखं मुक्त्वा यत्सौभाग्यसमुद्भवम् ॥ तस्मात्तद्देहि चास्माकं यदि तुष्टासि चंडिके
ekaṁ patyuḥ sukhaṁ muktvā yatsaubhāgyasamudbhavam tasmāttaddehi cāsmākaṁ yadi tuṣṭāsi caṁḍike
-- वह है, पति के सुख को छोड़कर, जो सौभाग्य से उत्पन्न होता है, वही एक सुख; हे चण्डिके, यदि आप हमसे प्रसन्न हैं, तो वही हमें प्रदान करें।
श्लोक 10 (skanda.6.86.10)
वयं दौर्भाग्यदोषेण सर्वाः क्लेशं परं गताः ॥ न शक्नुमः प्रियान्प्राणान्देहे धर्तुं कथंचन
vayaṁ daurbhāgyadoṣeṇa sarvāḥ kleśaṁ paraṁ gatāḥ na śaknumaḥ priyānprāṇāndehe dhartuṁ kathaṁcana
हम सब इस दुर्भाग्य के दोष से अत्यन्त क्लेश को प्राप्त हैं; हम अपने प्रिय प्राणों को शरीर में किसी प्रकार भी धारण नहीं कर पातीं।
श्लोक 11 (skanda.6.86.11)
श्रीदेव्युवाच। अद्यप्रभृति युष्माकं सौभाग्यं पतिसंभवम्॥ मत्प्रसादादसंदिग्धं भविष्यति सुखोदयम्
śrīdevyuvāca adyaprabhṛti yuṣmākaṁ saubhāgyaṁ patisaṁbhavam matprasādādasaṁdigdhaṁ bhaviṣyati sukhodayam
श्रीदेवी बोलीं -- आज से मेरी कृपा से तुम्हारा पति से उत्पन्न सौभाग्य निःसंदेह सुखोदय होगा।
श्लोक 12 (skanda.6.86.12)
अन्यापि या पतित्यक्ता स्त्री मामत्र स्थितां सदा ॥ पूजयिष्यति सद्भक्तया चतुर्दश्यामुपोषिता
anyāpi yā patityaktā strī māmatra sthitāṁ sadā pūjayiṣyati sadbhaktayā caturdaśyāmupoṣitā
कोई अन्य स्त्री भी जो अपने पति द्वारा त्यागी गई हो, यदि वह उपवास करके चतुर्दशी के दिन सद्भक्ति से यहाँ सदा स्थित मुझे पूजे,
श्लोक 13 (skanda.6.86.13)
सा भविष्यति सौभाग्ययु्क्ता पुत्रवती सती ॥ यावत्संवत्सरं तावदेकभक्तपरायणा
sā bhaviṣyati saubhāgyayuktā putravatī satī yāvatsaṁvatsaraṁ tāvadekabhaktaparāyaṇā
-- वह सती स्त्री सौभाग्य से युक्त और पुत्रवती होगी, यदि वह एक वर्ष तक एकभुक्त व्रत में तत्पर रहे।
श्लोक 14 (skanda.6.86.14)
अक्षारलवणाशा या नारी मां पूजयिष्यति ॥ न तस्याः पतिजं दुःखं दौर्भाग्यं वा भविष्यति
akṣāralavaṇāśā yā nārī māṁ pūjayiṣyati na tasyāḥ patijaṁ duḥkhaṁ daurbhāgyaṁ vā bhaviṣyati
जो स्त्री क्षार और लवण से रहित भोजन करती हुई मेरी पूजा करेगी, उसे पति से उत्पन्न दुःख अथवा दुर्भाग्य नहीं होगा।
श्लोक 15 (skanda.6.86.15)
आश्विनस्य सिते पक्षे संप्राप्ते नवमीदिने ॥ उपवासपरा या मां निशीथे पूजयिष्यति ॥ तस्याः सौभाग्यमत्युग्रं सर्वदा वै भविष्यति
āśvinasya site pakṣe saṁprāpte navamīdine upavāsaparā yā māṁ niśīthe pūjayiṣyati tasyāḥ saubhāgyamatyugraṁ sarvadā vai bhaviṣyati
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में नवमी तिथि आने पर, जो स्त्री उपवासपरायण होकर मध्यरात्रि में मेरी पूजा करेगी, उसका सौभाग्य सदैव अत्यन्त प्रबल रहेगा।
श्लोक 16 (skanda.6.86.16)
एवमुक्त्वा तु सा देवी विरराम द्विजोत्तमाः ॥ ताश्च सर्वाः सुसंहृष्टा जग्मुर्दक्षस्य मंदिरम्
evamuktvā tu sā devī virarāma dvijottamāḥ tāśca sarvāḥ susaṁhṛṣṭā jagmurdakṣasya maṁdiram
हे द्विजोत्तमो, ऐसा कहकर वह देवी चुप हो गईं, और वे सभी कन्याएँ अत्यन्त प्रसन्न होकर दक्ष के भवन को चली गईं।
श्लोक 17 (skanda.6.86.17)
एतस्मिन्नंतरे दक्ष आहूतः शूलपाणिना ॥ प्रोक्तः कस्मात्त्वया चन्द्रो यक्ष्मणा संनियोजितः ॥ तदयुक्तं कृतं दक्ष जामाताऽयं यतस्तव
etasminnaṁtare dakṣa āhūtaḥ śūlapāṇinā proktaḥ kasmāttvayā candro yakṣmaṇā saṁniyojitaḥ tadayuktaṁ kṛtaṁ dakṣa jāmātā'yaṁ yatastava
इसी बीच त्रिशूलधारी शिव ने दक्ष को बुलाया और कहा -- तुमने चन्द्रमा को यक्ष्मा (क्षयरोग) से क्यों युक्त कर दिया? हे दक्ष, यह अनुचित किया गया है, क्योंकि यह तुम्हारा जामाता है।
श्लोक 18 (skanda.6.86.18)
दक्ष उवाच। अनेन तनया मह्यमष्टाविंशतिसंख्यया ॥ ऊढा अखण्डचारित्रास्तास्त्यक्ता दोषवर्जिताः ॥ मुक्त्वैकां रोहिणीं देव निषिद्धेन मयाऽसकृत्
dakṣa uvāca anena tanayā mahyamaṣṭāviṁśatisaṁkhyayā ūḍhā akhaṇḍacāritrāstāstyaktā doṣavarjitāḥ muktvaikāṁ rohiṇīṁ deva niṣiddhena mayā'sakṛt
दक्ष बोले -- इसने मेरी अट्ठाईस कन्याओं का विवाह किया, जो सभी अखण्ड चरित्र वाली और दोषरहित थीं, फिर भी इसने रोहिणी को छोड़कर शेष सभी को त्याग दिया, जबकि हे देव, मैंने इसे बार-बार मना किया था।
श्लोक 19 (skanda.6.86.19)
ततो मयाऽतिकोपेन नियुक्तो राजयक्ष्मणा ॥ असत्यजल्पको मन्दः कामदेववशं गतः
tato mayā'tikopena niyukto rājayakṣmaṇā asatyajalpako mandaḥ kāmadevavaśaṁ gataḥ
अतः अत्यन्त क्रोधित होकर मैंने इसे राजयक्ष्मा (क्षयरोग) से युक्त कर दिया; यह मूर्ख, असत्यभाषी, कामवश हो गया है।
श्लोक 20 (skanda.6.86.20)
श्रीभगवानुवाच। अद्यप्रभृति सर्वासां समं स प्रचरिष्यति ॥ मद्वाक्यान्नात्र संदेहः सत्यमेतन्मयोदितम्॥
śrībhagavānuvāca adyaprabhṛti sarvāsāṁ samaṁ sa pracariṣyati madvākyānnātra saṁdehaḥ satyametanmayoditam
श्रीभगवान् बोले -- आज से यह सभी के साथ समान रूप से रहेगा; मेरे इस वचन में कोई संदेह नहीं है, मैंने यह सत्य कहा है।
श्लोक 21 (skanda.6.86.21)
त्वयापि यद्वचः प्रोक्तमसत्यं स्यान्न तत्क्वचित् ॥ तस्मादेष क्षयं पक्षं वृद्धिं पक्षं प्रयास्यति
tvayāpi yadvacaḥ proktamasatyaṁ syānna tatkvacit tasmādeṣa kṣayaṁ pakṣaṁ vṛddhiṁ pakṣaṁ prayāsyati
और तुमने भी जो वचन कहा है, वह भी कभी असत्य नहीं होगा; अतः यह एक पक्ष में क्षीण होगा और दूसरे पक्ष में वृद्धि को प्राप्त होगा।
श्लोक 22 (skanda.6.86.22)
दक्षोऽपि बाढमित्येव तत्प्रोक्त्वा च ययौ गृहम् ॥ चंद्रस्तु दक्षकन्यास्ताः समं पश्यति सर्वदा
dakṣo'pi bāḍhamityeva tatproktvā ca yayau gṛham caṁdrastu dakṣakanyāstāḥ samaṁ paśyati sarvadā
दक्ष ने भी 'ऐसा ही हो' कहकर वह बात मान ली और अपने घर चले गए। तब से चन्द्रमा दक्ष की उन कन्याओं को सदा समान दृष्टि से देखता है,
श्लोक 23 (skanda.6.86.23)
गच्छमानः क्षयं पक्षं वृद्धिं पक्षं च सद्द्विजाः ॥ सापि देवी ततः प्रोक्ता सप्तविंशतिका क्षितौ ॥ सर्वसौभाग्यदा स्त्रीणां तस्मिन्क्षेत्रे व्यवस्थिता
gacchamānaḥ kṣayaṁ pakṣaṁ vṛddhiṁ pakṣaṁ ca saddvijāḥ sāpi devī tataḥ proktā saptaviṁśatikā kṣitau sarvasaubhāgyadā strīṇāṁ tasminkṣetre vyavasthitā
हे सद्द्विजो, एक पक्ष में क्षीण होते और दूसरे पक्ष में वृद्धि को प्राप्त होते हुए। और वह देवी भी तब से पृथ्वी पर सप्तविंशतिका के नाम से कही गईं, जो उस क्षेत्र में स्त्रियों को सर्वसौभाग्य देने वाली होकर स्थित हैं।
श्लोक 24 (skanda.6.86.24)
यश्चैतत्पुरतस्तस्याः संप्राप्ते चाष्टमीदिने ॥ शुचिर्भूत्वा पठेद्भक्त्या स सौभाग्यमवाप्नुयात्
yaścaitatpuratastasyāḥ saṁprāpte cāṣṭamīdine śucirbhūtvā paṭhedbhaktyā sa saubhāgyamavāpnuyāt
जो कोई भी अष्टमी तिथि आने पर, पवित्र होकर, भक्तिपूर्वक उसके सामने इसका पाठ करे, वह सौभाग्य को प्राप्त करता है।