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नागर खण्ड · अध्याय 85

महालक्ष्मी-माहात्म्य-वर्णन

अध्याय 84अध्याय-सूचीअध्याय 86

श्लोक 1 (skanda.6.85.1)

ऋषय ऊचुः। माधव्याः पद्मया दत्तो यः शापस्तस्य यत्फलम् ॥ परिणामोद्भवं सर्वं श्रुतमस्माभिरद्य तत्

ṛṣaya ūcuḥ mādhavyāḥ padmayā datto yaḥ śāpastasya yatphalam pariṇāmodbhavaṁ sarvaṁ śrutamasmābhiradya tat

ऋषिगण बोले -- माधवी को पद्मा (लक्ष्मी) द्वारा दिए गए जिस शाप का जो फल परिणामस्वरूप हुआ, वह सब हमने आज सुन लिया।

श्लोक 2 (skanda.6.85.2)

तेन यत्कमला शप्ता ब्राह्मणेन महात्मना ॥ सा कथं गज वक्त्राऽथ पुनर्जाता शुभानना

tena yatkamalā śaptā brāhmaṇena mahātmanā sā kathaṁ gaja vaktrā'tha punarjātā śubhānanā

उस महात्मा ब्राह्मण द्वारा जो कमला (लक्ष्मी) शापित होकर गजमुखी हुई थी, वह फिर कैसे शुभमुखी हुई, यह बताइए।

श्लोक 3 (skanda.6.85.3)

सूत उवाच। शापेन तस्य विप्रस्य तत्क्षणादेव सा द्विजाः ॥ गजवक्त्रा समुत्पन्ना महाविस्मयकारिणी

sūta uvāca śāpena tasya viprasya tatkṣaṇādeva sā dvijāḥ gajavaktrā samutpannā mahāvismayakāriṇī

सूत जी बोले -- हे द्विजो, उस ब्राह्मण के शाप से वह उसी क्षण गजमुखी हो गई, जो बड़े आश्चर्य को उत्पन्न करने वाली घटना थी।

श्लोक 4 (skanda.6.85.4)

सा प्रोक्ता हरिणा तिष्ठ किञ्चित्कालांतरे शुभे ॥ अनेनैव तु रूपेण यावत्स्याद्द्वापरक्षयः

sā proktā hariṇā tiṣṭha kiñcitkālāṁtare śubhe anenaiva tu rūpeṇa yāvatsyāddvāparakṣayaḥ

हरि ने उससे कहा -- हे शुभे, तुम कुछ काल तक इसी रूप में रहो, जब तक द्वापर का क्षय न हो जाए।

श्लोक 5 (skanda.6.85.5)

ततोऽहं मेदिनीपृष्ठे ह्यवतीर्य समुद्रजे ॥ तपः शक्त्या करिष्यामि भूयस्त्वां तु शुभाननाम्

tato'haṁ medinīpṛṣṭhe hyavatīrya samudraje tapaḥ śaktyā kariṣyāmi bhūyastvāṁ tu śubhānanām

तब हे समुद्र-पुत्री, मैं पृथ्वी पर अवतार लेकर, तपस्या के बल से तुम्हें पुनः शुभमुखी बना दूँगा।

श्लोक 6 (skanda.6.85.6)

अवज्ञायाथ सा तस्य तद्वाक्यं शार्ङ्गधन्विनः ॥ शुभास्यत्वकृते तेपे तपस्तीव्रं सुहर्षिता

avajñāyātha sā tasya tadvākyaṁ śārṅgadhanvinaḥ śubhāsyatvakṛte tepe tapastīvraṁ suharṣitā

तब उस शार्ङ्गधनुर्धारी के उस वचन की अवहेलना करके, वह स्वयं ही शुभमुखी होने के लिए, अत्यन्त हर्षित होकर, तीव्र तपस्या करने लगी।

श्लोक 7 (skanda.6.85.7)

एतत्क्षेत्रं समासाद्य त्रिकालं स्नानमाचरत्॥ ब्रह्माणं तोषयामास दिवारात्रिमतंद्रिता

etatkṣetraṁ samāsādya trikālaṁ snānamācarat brahmāṇaṁ toṣayāmāsa divārātrimataṁdritā

इस क्षेत्र में पहुँचकर, वह तीनों संध्याओं में स्नान करती और दिन-रात अनथक रहकर ब्रह्मा को संतुष्ट करती रही।

श्लोक 8 (skanda.6.85.8)

तामुवाच ततो ब्रह्मा वर्षांते तुष्टिमागतः ॥ वरं प्रार्थय तुष्टोऽहं तव केशववल्लभे

tāmuvāca tato brahmā varṣāṁte tuṣṭimāgataḥ varaṁ prārthaya tuṣṭo'haṁ tava keśavavallabhe

तब एक वर्ष के अन्त में संतुष्ट होकर ब्रह्मा ने उससे कहा -- हे केशव की प्रिये, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, वर माँगो।

श्लोक 9 (skanda.6.85.9)

लक्ष्मीरुवाच। गजास्याहं कृता देव शापं दत्त्वा सुदारुणम् ॥ ब्राह्मणेन सुक्रुद्धेन कस्मिश्चित्कारणांतरे

lakṣmīruvāca gajāsyāhaṁ kṛtā deva śāpaṁ dattvā sudāruṇam brāhmaṇena sukruddhena kasmiścitkāraṇāṁtare

लक्ष्मी बोलीं -- हे देव, किसी अन्य कारण से अत्यन्त क्रुद्ध हुए एक ब्राह्मण ने मुझे भयंकर शाप देकर गजमुखी बना दिया।

श्लोक 10 (skanda.6.85.10)

तस्मात्तद्रूपिणीं भूयो मां कुरुष्व पितामह ॥ यदि मे तुष्टिमापन्नो नान्यत्किंचिद्वृणोम्यहम्

tasmāttadrūpiṇīṁ bhūyo māṁ kuruṣva pitāmaha yadi me tuṣṭimāpanno nānyatkiṁcidvṛṇomyaham

अतः हे पितामह, यदि आप मुझसे संतुष्ट हैं, तो मुझे पुनः उसी पूर्व रूप वाली बना दीजिए; मैं और कुछ नहीं माँगती।

श्लोक 11 (skanda.6.85.11)

ब्रह्मोवाच। भविष्यति शुभं वक्त्रं मत्प्रसादादसंशयम् ॥ तव भद्रे विशेषेण तस्मात्त्वं स्वगृहं व्रज

brahmovāca bhaviṣyati śubhaṁ vaktraṁ matprasādādasaṁśayam tava bhadre viśeṣeṇa tasmāttvaṁ svagṛhaṁ vraja

ब्रह्मा बोले -- हे भद्रे, मेरी कृपा से निःसंदेह तुम्हारा मुख विशेष रूप से शुभ हो जाएगा; अतः तुम अपने घर जाओ।

श्लोक 12 (skanda.6.85.12)

महत्त्वं ते मया दत्तमद्यप्रभृति शोभने ॥ महालक्ष्मीति ते नाम तस्मादत्र भविष्यति

mahattvaṁ te mayā dattamadyaprabhṛti śobhane mahālakṣmīti te nāma tasmādatra bhaviṣyati

हे शोभने, आज से मैंने तुम्हें महत्त्व प्रदान किया है; इसी कारण तुम्हारा नाम यहाँ महालक्ष्मी होगा।

श्लोक 13 (skanda.6.85.13)

गजवक्त्रां नरो यस्त्वां पूजयिष्यति भक्तितः ॥ स गजाधिपतिर्भूपो भविष्यति च भूतले

gajavaktrāṁ naro yastvāṁ pūjayiṣyati bhaktitaḥ sa gajādhipatirbhūpo bhaviṣyati ca bhūtale

जो पुरुष तुम्हें गजमुखी रूप में भक्तिपूर्वक पूजेगा, वह पृथ्वी पर गजाधिपति राजा होगा।

श्लोक 14 (skanda.6.85.14)

द्वितीयादिवसे यस्त्वां महालक्ष्मीरिति ब्रुवन् ॥ श्रीसूक्तेन सुभक्त्याऽथ देवि संपूजयिष्यति

dvitīyādivase yastvāṁ mahālakṣmīriti bruvan śrīsūktena subhaktyā'tha devi saṁpūjayiṣyati

हे देवि, जो द्वितीया के दिन तुम्हें 'महालक्ष्मी' कहकर, श्रीसूक्त से भलीभाँति भक्तिपूर्वक पूजेगा,

श्लोक 15 (skanda.6.85.15)

सप्तजन्मांतराण्येव न भविष्यति सोऽधनः॥ एवमुक्त्वा चतुर्वक्त्रो विरराम ततः परम्

saptajanmāṁtarāṇyeva na bhaviṣyati so'dhanaḥ evamuktvā caturvaktro virarāma tataḥ param

-- वह सात जन्मों तक कभी निर्धन नहीं होगा। ऐसा कहकर चतुर्मुख ब्रह्मा चुप हो गए।

श्लोक 16 (skanda.6.85.16)

साऽपि हृष्टा गता देवी यत्र तिष्ठति केशवः

sā'pi hṛṣṭā gatā devī yatra tiṣṭhati keśavaḥ

वह देवी भी प्रसन्न होकर वहीं चली गईं, जहाँ केशव विराजमान थे।

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