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नागर खण्ड · अध्याय 84

माधवी की तपश्चर्या और सुभद्रात्व-प्राप्ति

अध्याय 83अध्याय-सूचीअध्याय 85

श्लोक 1 (skanda.6.84.1)

ऋषय ऊचुः। यदेतद्भवता प्रोक्तं देवदेवेन विष्णुना ॥ माधवीं भगिनीं प्राप्य जन्मांतरमुपस्थिताम्

ṛṣaya ūcuḥ yadetadbhavatā proktaṁ devadevena viṣṇunā mādhavīṁ bhaginīṁ prāpya janmāṁtaramupasthitām

ऋषिगण बोले -- आपने जो यह बताया कि देवाधिदेव विष्णु ने अपनी बहन माधवी को अगले जन्म में पुनः पाकर,

श्लोक 2 (skanda.6.84.2)

अश्ववक्त्रां करिष्यामि तपसा सुशुभाननाम् ॥ सा कथं विहिता तेन तपस्तप्तं तथा कथम् ॥ सर्वं विस्तरतो ब्रूहि परं कौतूहलं हि नः

aśvavaktrāṁ kariṣyāmi tapasā suśubhānanām sā kathaṁ vihitā tena tapastaptaṁ tathā katham sarvaṁ vistarato brūhi paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ

'तपस्या द्वारा उस अश्वमुखी को सुन्दरमुखी बना दूँगा' -- ऐसी प्रतिज्ञा की थी; वह कैसे पूरी की गई और उन्होंने कैसा तप किया, यह सब विस्तार से बताइए, क्योंकि हमें बड़ी उत्सुकता है।

श्लोक 3 (skanda.6.84.3)

सूत उवाच। नारदस्य समाकर्ण्य तं सन्देशं सुरोद्भवम् ॥ गत्वा विष्णुः सुरैः सार्द्धं प्रचक्रे मंत्रनिश्चयम्

sūta uvāca nāradasya samākarṇya taṁ sandeśaṁ surodbhavam gatvā viṣṇuḥ suraiḥ sārddhaṁ pracakre maṁtraniścayam

सूत जी बोले -- नारद के उस देवोत्पन्न संदेश को सुनकर, विष्णु ने जाकर देवताओं के साथ मन्त्रणा का निश्चय किया।

श्लोक 4 (skanda.6.84.4)

भारावतरणार्थाय दानवानां वधाय च ॥ वसुदेवगृहे श्रीमान्द्वापरांते ततो हरिः

bhārāvataraṇārthāya dānavānāṁ vadhāya ca vasudevagṛhe śrīmāndvāparāṁte tato hariḥ

तब पृथ्वी का भार उतारने के लिए और दानवों के वध के लिए, द्वापर के अन्त में वे श्रीमान् हरि वसुदेव के घर में अवतरित हुए।

श्लोक 5 (skanda.6.84.5)

देवक्या जठरे देवः संजातो दैत्यदर्पहा ॥ तथान्या रोहिणीनाम भार्या तस्य च याऽभवत्

devakyā jaṭhare devaḥ saṁjāto daityadarpahā tathānyā rohiṇīnāma bhāryā tasya ca yā'bhavat

वह देव, दैत्यों के दर्प का नाश करने वाला, देवकी के गर्भ से उत्पन्न हुआ। तथा उसकी दूसरी भार्या रोहिणी नाम की थी।

श्लोक 6 (skanda.6.84.6)

तस्यां जज्ञे हलीनाम बलभद्रः प्रतापवान् ॥ तृतीया सुप्रभानाम वसुदेवप्रिया च या

tasyāṁ jajñe halīnāma balabhadraḥ pratāpavān tṛtīyā suprabhānāma vasudevapriyā ca yā

उससे हल धारण करने वाले प्रतापी बलभद्र उत्पन्न हुए। तथा वसुदेव की तीसरी प्रिय पत्नी सुप्रभा नाम की थी।

श्लोक 7 (skanda.6.84.7)

तस्यां सा माधवी जज्ञे अश्ववक्त्रस्वरूपधृक् ॥ तां दृष्ट्वा विकृताकारां सुतां जातां च सुप्रभा ॥ वासुदेवसमायुक्ता विषादं परमं गता

tasyāṁ sā mādhavī jajñe aśvavaktrasvarūpadhṛk tāṁ dṛṣṭvā vikṛtākārāṁ sutāṁ jātāṁ ca suprabhā vāsudevasamāyuktā viṣādaṁ paramaṁ gatā

उससे वही माधवी, अश्वमुख रूप धारण किए हुए, उत्पन्न हुई। अपनी उस विकृताकार पुत्री को जन्म लेते देखकर, वसुदेव के साथ सुप्रभा भी अत्यन्त विषाद को प्राप्त हुई।

श्लोक 8 (skanda.6.84.8)

अथ ते यादवाः सर्वे कृतशान्तिकपौष्टिकाः ॥ स्वस्तिस्वस्तीति संत्रस्ताः प्रोचुर्भूयात्कुलेऽत्र नः

atha te yādavāḥ sarve kṛtaśāntikapauṣṭikāḥ svastisvastīti saṁtrastāḥ procurbhūyātkule'tra naḥ

तब उन सभी यादवों ने शान्तिक और पौष्टिक कर्म कराए, और भयभीत होकर 'स्वस्ति, स्वस्ति' कहते हुए कहा -- हमारे इस कुल में मंगल हो।

श्लोक 9 (skanda.6.84.9)

एवं सा यौवनोपेता तथा दुःखसमन्विता ॥ न कश्चिद्वरयामास वाजिवक्त्रां विलोक्य ताम्

evaṁ sā yauvanopetā tathā duḥkhasamanvitā na kaścidvarayāmāsa vājivaktrāṁ vilokya tām

इस प्रकार यौवन को प्राप्त होकर भी वह दुःख से युक्त रही; उस अश्वमुखी को देखकर कोई भी उसे वरण नहीं करता था।

श्लोक 10 (skanda.6.84.10)

ततश्च भगवान्विष्णुर्ज्ञात्वा तां भगिनीं तथा ॥ मातरं पितरं चैव तथा दुःखसमन्वितौ

tataśca bhagavānviṣṇurjñātvā tāṁ bhaginīṁ tathā mātaraṁ pitaraṁ caiva tathā duḥkhasamanvitau

तब भगवान् विष्णु ने अपनी उस बहन को, तथा उसके माता-पिता को भी, दुःख से युक्त जानकर,

श्लोक 11 (skanda.6.84.11)

तामादाय गतस्तूर्णं बलदेवसमन्वितः ॥ हाटकेश्वरजे क्षेत्रे तपस्तप्तुं ततः परम्

tāmādāya gatastūrṇaṁ baladevasamanvitaḥ hāṭakeśvaraje kṣetre tapastaptuṁ tataḥ param

उसे साथ लेकर बलदेव के साथ शीघ्र ही हाटकेश्वर क्षेत्र में तप करने के लिए चले गए।

श्लोक 12 (skanda.6.84.12)

ब्रह्माणं तोषयामास सम्यग्यज्ञपरायणः ॥ व्रतैश्च विविधैर्दानैर्ब्राह्मणानां च तर्पणैः

brahmāṇaṁ toṣayāmāsa samyagyajñaparāyaṇaḥ vrataiśca vividhairdānairbrāhmaṇānāṁ ca tarpaṇaiḥ

यज्ञपरायण होकर उन्होंने विविध व्रतों, दानों और ब्राह्मणों के तर्पण द्वारा भलीभाँति ब्रह्मा को संतुष्ट किया।

श्लोक 13 (skanda.6.84.13)

ततस्तुष्टिं गतो ब्रह्मा वर्षांते तस्य शार्ङ्गिणः ॥ उवाच वरदोऽस्मीति प्रार्थयस्वाभिवांछितम्

tatastuṣṭiṁ gato brahmā varṣāṁte tasya śārṅgiṇaḥ uvāca varado'smīti prārthayasvābhivāṁchitam

तब एक वर्ष के अन्त में उस शार्ङ्गधारी विष्णु पर संतुष्ट होकर ब्रह्मा बोले -- मैं वरदाता हूँ, अपनी अभिलषित वस्तु माँगो।

श्लोक 14 (skanda.6.84.14)

विष्णुरुवाच। एषा मे भगिनी देव जाताऽश्ववदना किल ॥ तव प्रसादात्सद्वक्त्रा भूयादेतन्ममेप्सितम्

viṣṇuruvāca eṣā me bhaginī deva jātā'śvavadanā kila tava prasādātsadvaktrā bhūyādetanmamepsitam

विष्णु बोले -- हे देव, यह मेरी बहन है, जो अश्वमुखी होकर जन्मी है। मेरी यही अभिलाषा है कि आपकी कृपा से इसका मुख सुन्दर हो जाए।

श्लोक 15 (skanda.6.84.15)

श्रीब्रह्मोवाच। एषा शुभानना साध्वी मत्प्रसादाद्भविष्यति ॥ सुभद्रा नाम विख्याता वीरसूः पतिवल्लभा

śrībrahmovāca eṣā śubhānana sādhvī matprasādādbhaviṣyati subhadrā nāma vikhyātā vīrasūḥ pativallabhā

श्रीब्रह्मा बोले -- यह साध्वी मेरी कृपा से शुभमुखी हो जाएगी, और सुभद्रा नाम से विख्यात, वीर-प्रसविनी और पतिवल्लभा होगी।

श्लोक 16 (skanda.6.84.16)

एतद्रूपां पुमान्योऽत्र पूजयिष्यति भक्तितः ॥ एतां विष्णो त्वया सार्धं तथानेन च सीरिणा

etadrūpāṁ pumānyo'tra pūjayiṣyati bhaktitaḥ etāṁ viṣṇo tvayā sārdhaṁ tathānena ca sīriṇā

हे विष्णु, जो भी पुरुष इस रूप वाली को भक्तिपूर्वक तुम्हारे और इस हलधर बलराम के साथ पूजेगा,

श्लोक 17 (skanda.6.84.17)

द्वादश्यां माघमासस्य गंधपुष्पानुलेपनैः ॥ सोऽप्यवाप्स्यति यच्चित्ते वर्तते नात्र संशयः

dvādaśyāṁ māghamāsasya gaṁdhapuṣpānulepanaiḥ so'pyavāpsyati yaccitte vartate nātra saṁśayaḥ

-- माघ मास की द्वादशी को गन्ध, पुष्प और अनुलेपन से -- वह भी जो उसके मन में हो, उसे अवश्य प्राप्त करेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।

श्लोक 18 (skanda.6.84.18)

या नारी पतिना त्यक्ता वंध्या वा भक्तिसंयुता ॥ तृतीयादिवसे चैतां पूजयिष्यति केशव

yā nārī patinā tyaktā vaṁdhyā vā bhaktisaṁyutā tṛtīyādivase caitāṁ pūjayiṣyati keśava

हे केशव, जो स्त्री अपने पति द्वारा त्यागी गई हो अथवा बांझ हो, वह भी भक्तियुक्त होकर तृतीया के दिन इसकी पूजा करे, तो --

श्लोक 19 (skanda.6.84.19)

भविष्यति सुपुत्राढ्या सुभगा सा सुखान्विता ॥ ऐश्वर्यसहिता नित्यं सर्वैः समुदिता गुणैः

bhaviṣyati suputrāḍhyā subhagā sā sukhānvitā aiśvaryasahitā nityaṁ sarvaiḥ samuditā guṇaiḥ

-- वह उत्तम पुत्रों से समृद्ध, सौभाग्यशाली और सुखयुक्त होगी, तथा सदा ऐश्वर्य सहित समस्त गुणों से युक्त होगी।

श्लोक 20 (skanda.6.84.20)

एवमुक्त्वा चतुर्वक्त्रो विरराम ततः परम् ॥ वासुदेवोऽपि हृष्टात्मा ययौ द्वारवतीं पुरीम्

evamuktvā caturvaktro virarāma tataḥ param vāsudevo'pi hṛṣṭātmā yayau dvāravatīṁ purīm

ऐसा कहकर चतुर्मुख ब्रह्मा चुप हो गए। तब प्रसन्नचित्त वासुदेव भी द्वारवती नगरी को चले गए।

श्लोक 21 (skanda.6.84.21)

तामादाय विशालाक्षीं चंद्रबिंबसमाननाम् ॥ बलदेवसमायुक्तो ह्यनुज्ञाप्य पिताम हम्

tāmādāya viśālākṣīṁ caṁdrabiṁbasamānanām baladevasamāyukto hyanujñāpya pitāma ham

उस विशाल-नेत्रा, चन्द्रबिम्बसदृश मुख वाली बहन को साथ लेकर, बलदेव के साथ, पितामह ब्रह्मा से आज्ञा लेकर वे चल पड़े।

श्लोक 22 (skanda.6.84.22)

सूत उवाच। एवं सा माधवी विप्राः सुभगारूपमास्थिता ॥ अवतीर्णा धरापृष्ठे लक्ष्मीशापप्रपीडिता

sūta uvāca evaṁ sā mādhavī viprāḥ subhagārūpamāsthitā avatīrṇā dharāpṛṣṭhe lakṣmīśāpaprapīḍitā

सूत जी बोले -- हे विप्रो, इस प्रकार सुन्दर रूप को प्राप्त हुई वह माधवी, जो लक्ष्मी के शाप से पीड़ित थी, पृथ्वी पर अवतरित हुई थी।

श्लोक 23 (skanda.6.84.23)

उपयेमे सुतः पांडोर्यां पार्थश्चारुहासिनीम् ॥ जज्ञे तस्याः सुतो वीरोऽभिमन्युरिति विश्रुतः

upayeme sutaḥ pāṁḍoryāṁ pārthaścāruhāsinīm jajñe tasyāḥ suto vīro'bhimanyuriti viśrutaḥ

पाण्डु के पुत्र पार्थ (अर्जुन) ने उस मनोहर-हास्य वाली को ब्याहा। उससे उस वीर पुत्र का जन्म हुआ, जो अभिमन्यु के नाम से विख्यात है।

श्लोक 24 (skanda.6.84.24)

एतद्वः सर्वमाख्यातं माधबीजन्मसम्भवम् ॥ सुपर्णाख्यस्य देवस्य कथासंगाद्द्विजोत्तमाः

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ mādhabījanmasambhavam suparṇākhyasya devasya kathāsaṁgāddvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो, यह सब मैंने तुम्हें सुपर्ण नामक देव की कथा के प्रसंग में माधवी के जन्म-वृत्तान्त के रूप में सुनाया।

श्लोक 25 (skanda.6.84.25)

यश्चैतत्पठते मर्त्यो भक्त्या युक्तः शृणोति वा ॥ मुच्यते स नरः पापात्तद्दिनैकसमुद्भवात्

yaścaitatpaṭhate martyo bhaktyā yuktaḥ śṛṇoti vā mucyate sa naraḥ pāpāttaddinaikasamudbhavāt

जो भी मनुष्य भक्तियुक्त होकर इसे पढ़ता है अथवा सुनता है, वह उस दिन में उत्पन्न होने वाले पाप से मुक्त हो जाता है।

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