नागर खण्ड · अध्याय 83
सुपर्णाख्य-माहात्म्य-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.83.1)
सूत उवाच। तत्राश्चर्यमभूत्पूर्वं यत्तद्ब्राह्मणसत्तमाः ॥ अहं वः कीर्तयिष्यामि पुराणे यदुदाहृतम्
sūta uvāca tatrāścaryamabhūtpūrvaṁ yattadbrāhmaṇasattamāḥ ahaṁ vaḥ kīrtayiṣyāmi purāṇe yadudāhṛtam
सूत जी बोले -- हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, वहाँ पूर्वकाल में जो आश्चर्यजनक घटना हुई थी और जो पुराण में वर्णित है, उसे मैं तुम्हें सुनाऊँगा।
श्लोक 2 (skanda.6.83.2)
वेणुर्नाम महीपालः पुरासीत्सूर्यवंशजः ॥ सदैव पापसंयुक्तो दुर्मेधाः कामपीडितः
veṇurnāma mahīpālaḥ purāsītsūryavaṁśajaḥ sadaiva pāpasaṁyukto durmedhāḥ kāmapīḍitaḥ
पूर्वकाल में सूर्यवंश में उत्पन्न वेणु नामक एक राजा था, जो सदैव पाप में लिप्त, दुर्बुद्धि और कामवासना से पीड़ित रहता था।
श्लोक 3 (skanda.6.83.3)
शासनानि प्रदत्तानि ब्राह्मणानां महात्मनाम् ॥ अन्यैः पार्थिवशार्दूलैस्तेन तानि हृतान्यलम्
śāsanāni pradattāni brāhmaṇānāṁ mahātmanām anyaiḥ pārthivaśārdūlaistena tāni hṛtānyalam
जो शासन-पत्र (भूमि-अनुदान) अन्य श्रेष्ठ राजाओं द्वारा महात्मा ब्राह्मणों को दिए गए थे, उसने उन सबको बलपूर्वक छीन लिया।
श्लोक 4 (skanda.6.83.4)
विध्वंसिताः स्त्रियो नैका विधवाश्च विशेषतः कुमार्यो रूपवत्यश्च तथा निज कुलोद्भवाः
vidhvaṁsitāḥ striyo naikā vidhavāśca viśeṣataḥ kumāryo rūpavatyaśca tathā nija kulodbhavāḥ
उसने अनेक स्त्रियों को भ्रष्ट किया, विशेषकर विधवाओं को, तथा सुन्दर कुमारी कन्याओं को भी, चाहे वे अपने ही कुल में उत्पन्न क्यों न हों।
श्लोक 5 (skanda.6.83.5)
देवताराधनं पूजां कर्तुं नैव ददाति सः ॥ न च यज्ञं न होमं च स्वाध्यायं न च पापकृत्
devatārādhanaṁ pūjāṁ kartuṁ naiva dadāti saḥ na ca yajñaṁ na homaṁ ca svādhyāyaṁ na ca pāpakṛt
वह पापी देवताओं की आराधना और पूजा भी नहीं करने देता था, न यज्ञ, न होम और न स्वाध्याय ही करने देता था।
श्लोक 6 (skanda.6.83.6)
प्रोवाचाथ जनान्सर्वान्मां पूजयत सर्वदा ॥ न मामभ्यधिकोऽन्योऽस्ति देवो वा ब्राह्मणोऽपि वा
provācātha janānsarvānmāṁ pūjayata sarvadā na māmabhyadhiko'nyo'sti devo vā brāhmaṇo'pi vā
वह सब लोगों से कहता था -- 'सदा मेरी ही पूजा करो; मुझसे बढ़कर न कोई देवता है और न कोई ब्राह्मण है।
श्लोक 7 (skanda.6.83.7)
मया तुष्टेन सर्वेषां संपत्स्यति हृदि स्थितम् ॥ इह लोकेष्वसंदिग्धं शुभं वा यदि वाऽशुभम्
mayā tuṣṭena sarveṣāṁ saṁpatsyati hṛdi sthitam iha lokeṣvasaṁdigdhaṁ śubhaṁ vā yadi vā'śubham
मेरे प्रसन्न होने पर ही सबके हृदय में स्थित शुभ अथवा अशुभ इच्छा इस लोक में निःसंदेह पूर्ण होगी।'
श्लोक 8 (skanda.6.83.8)
तेन शस्त्रविहीनानां विश्वस्तानां वधः कृतः ॥ संत्यक्ताः शरणं प्राप्ताः पुरुषा भयविह्वलाः
tena śastravihīnānāṁ viśvastānāṁ vadhaḥ kṛtaḥ saṁtyaktāḥ śaraṇaṁ prāptāḥ puruṣā bhayavihvalāḥ
उसने निःशस्त्र और विश्वस्त लोगों का भी वध कर डाला, और भय से विह्वल होकर शरण में आए हुए पुरुषों को भी त्याग दिया।
श्लोक 9 (skanda.6.83.9)
नष्टो महाहवं दृष्ट्वा शत्रुसंघानुपस्थितान् ॥ क्षात्रं धर्मं परित्यज्य प्राणरक्षार्थमेव हि
naṣṭo mahāhavaṁ dṛṣṭvā śatrusaṁghānupasthitān kṣātraṁ dharmaṁ parityajya prāṇarakṣārthameva hi
वह महासंग्राम को देखकर और शत्रुसमूहों को समक्ष उपस्थित पाकर, क्षात्रधर्म को त्यागकर, केवल अपने प्राणों की रक्षा के लिए ही भाग खड़ा होता था।
श्लोक 10 (skanda.6.83.10)
अचौराः प्रगृहीताश्च चौराः संरक्षिताः सदा ॥ साधवः क्लेशिता नित्यं तेषां संहरता धनम्
acaurāḥ pragṛhītāśca caurāḥ saṁrakṣitāḥ sadā sādhavaḥ kleśitā nityaṁ teṣāṁ saṁharatā dhanam
निर्दोष लोगों को पकड़ लिया जाता था, जबकि चोर सदा उसकी शरण में सुरक्षित रहते थे। उनका धन हरण करके साधु पुरुषों को सदा कष्ट दिया जाता था।
श्लोक 11 (skanda.6.83.11)
न कृतं च व्रतं तेन श्रद्धापूतेन चेतसा ॥ न दत्तं ब्राह्मणेभ्यश्च न च यष्टं कदाचन
na kṛtaṁ ca vrataṁ tena śraddhāpūtena cetasā na dattaṁ brāhmaṇebhyaśca na ca yaṣṭaṁ kadācana
उसने कभी भी श्रद्धापूत चित्त से न कोई व्रत किया, न ब्राह्मणों को कुछ दान दिया, और न कभी कोई यज्ञ ही किया।
श्लोक 12 (skanda.6.83.12)
एवं तस्य नरेन्द्रस्य पापासक्तस्य नित्यशः ॥ कुष्ठव्याधिरभूदुग्रो वंशोच्छेदश्च सद्द्विजाः
evaṁ tasya narendrasya pāpāsaktasya nityaśaḥ kuṣṭhavyādhirabhūdugro vaṁśocchedaśca saddvijāḥ
हे सद्द्विजो, इस प्रकार सदा पाप में आसक्त रहने वाले उस राजा को एक भयंकर कुष्ठरोग हो गया, तथा उसके वंश का भी उच्छेद हो गया।
श्लोक 13 (skanda.6.83.13)
ततस्तं व्याधिना ग्रस्तं पुत्रपौत्रविवर्जितम् ॥ दायादाः सहसोपेता राज्यं जह्रुस्ततः परम्
tatastaṁ vyādhinā grastaṁ putrapautravivarjitam dāyādāḥ sahasopetā rājyaṁ jahrustataḥ param
तब रोगग्रस्त और पुत्र-पौत्रों से रहित हुए उसे देखकर, उसके सम्बन्धी सहसा एकत्र होकर उसका राज्य छीन ले गए।
श्लोक 14 (skanda.6.83.14)
तं च निर्वासयामासुस्तस्माद्देशात्पदातिकम् ॥ एकाकिनं परित्यक्तं सर्वैरपि सुहृद्गणैः
taṁ ca nirvāsayāmāsustasmāddeśātpadātikam ekākinaṁ parityaktaṁ sarvairapi suhṛdgaṇaiḥ
उन्होंने उसे पैदल ही उस देश से निर्वासित कर दिया; वह उसके सभी मित्रों द्वारा भी त्याग दिया गया और अकेला रह गया।
श्लोक 15 (skanda.6.83.15)
सोऽपि सर्वैः परित्यक्तस्तेन पापेन कर्मणा ॥ कलत्रैरपि चात्मीयैः स्मृत्वा पूर्वविचेष्टितम्
so'pi sarvaiḥ parityaktastena pāpena karmaṇā kalatrairapi cātmīyaiḥ smṛtvā pūrvaviceṣṭitam
वह भी अपने उस पाप-कर्म के कारण सबके द्वारा त्याग दिया गया, यहाँ तक कि अपनी पत्नियों द्वारा भी, उसके पूर्व आचरण का स्मरण करके।
श्लोक 16 (skanda.6.83.16)
एकाकी भ्रममाणोऽथ सोऽपि कष्टवशं गतः ॥ क्षुत्तृष्णासुपरिश्रांतः क्षेत्रेऽत्रैव समागतः
ekākī bhramamāṇo'tha so'pi kaṣṭavaśaṁ gataḥ kṣuttṛṣṇāsupariśrāṁtaḥ kṣetre'traiva samāgataḥ
तब वह अकेला भटकता हुआ भारी कष्ट को प्राप्त हो गया, और भूख-प्यास से अत्यन्त थका हुआ इसी क्षेत्र में आ पहुँचा।
श्लोक 17 (skanda.6.83.17)
ततः प्रासादमासाद्य सुपर्णाख्यसमुद्भवम् ॥ यावत्प्राप्तः परित्यक्तस्ताव त्प्राणैरुपोषितः
tataḥ prāsādamāsādya suparṇākhyasamudbhavam yāvatprāptaḥ parityaktastāva tprāṇairupoṣitaḥ
तब सुपर्ण नामक देव के उस मन्दिर तक पहुँचकर, जहाँ तक ही वह पहुँच सका, वहीं वह उपवास करते-करते प्राणरहित हो गया।
श्लोक 18 (skanda.6.83.18)
ततो दिव्यवपुर्भूत्वाविमानवरमाश्रितः ॥ जगाम शिवलोकं स दुर्लभं धार्मिकैरपि
tato divyavapurbhūtvāvimānavaramāśritaḥ jagāma śivalokaṁ sa durlabhaṁ dhārmikairapi
तब वह दिव्य शरीरधारी होकर, श्रेष्ठ विमान का आश्रय लेकर, शिवलोक को चला गया, जो धर्मात्माओं के लिए भी दुर्लभ है।
श्लोक 19 (skanda.6.83.19)
सेव्यमानोप्सरोभिश्च स्तूयमानश्च किन्नरैः ॥ गीयमानश्च गन्धर्वैः शिवपार्श्वे व्यवस्थितः
sevyamānopsarobhiśca stūyamānaśca kinnaraiḥ gīyamānaśca gandharvaiḥ śivapārśve vyavasthitaḥ
वह अप्सराओं द्वारा सेवित, किन्नरों द्वारा स्तुति किया जाता हुआ, और गन्धर्वों द्वारा गाया जाता हुआ, शिव के पार्श्व में स्थित हो गया।
श्लोक 20 (skanda.6.83.20)
अथ तं संनिधौ दृष्ट्वा गौरी पप्रच्छ सादरम्॥ कोऽयं देव समायातः सुकृती तव मन्दिरे ॥ अनेन किं कृतं कर्म यत्प्राप्तोऽत्र विभूतिधृक्
atha taṁ saṁnidhau dṛṣṭvā gaurī papraccha sādaram ko'yaṁ deva samāyātaḥ sukṛtī tava mandire anena kiṁ kṛtaṁ karma yatprāpto'tra vibhūtidhṛk
तब उसे अपने समीप देखकर गौरी ने आदरपूर्वक पूछा -- हे देव, आपके इस मन्दिर में यह कौन पुण्यात्मा आया है? इसने ऐसा कौन-सा कर्म किया है, जिससे यह यहाँ ऐश्वर्यशाली होकर आया है?
श्लोक 21 (skanda.6.83.21)
श्रीभगवानुवाच। एष पापसमाचारः सदाऽसीत्पृथिवीपतिः ॥ वेणुसंज्ञो धरापृष्ठे कुष्ठव्याधिसमाकुलः
śrībhagavānuvāca eṣa pāpasamācāraḥ sadā'sītpṛthivīpatiḥ veṇusaṁjño dharāpṛṣṭhe kuṣṭhavyādhisamākulaḥ
श्रीभगवान् बोले -- यह वेणु नामक राजा पृथ्वी पर सदा पापाचारी रहा, और कुष्ठरोग से पीड़ित हो गया था।
श्लोक 22 (skanda.6.83.22)
स संत्यक्तो निजैर्दारैः शत्रुवर्गेण धर्षितः ॥ भ्रममाणः समायातः सुपर्णाख्यस्य मन्दिरे
sa saṁtyakto nijairdāraiḥ śatruvargeṇa dharṣitaḥ bhramamāṇaḥ samāyātaḥ suparṇākhyasya mandire
वह अपनी पत्नियों द्वारा त्याग दिया गया, शत्रुसमूह द्वारा पीड़ित होकर, भटकता हुआ सुपर्ण नामक देव के मन्दिर में आ पहुँचा।
श्लोक 23 (skanda.6.83.23)
उपवासपरिश्रांतः सांनिध्यं मम यत्र च ॥ सर्वप्राणैः परित्यक्तस्तस्मिन्नायतने शुभे
upavāsapariśrāṁtaḥ sāṁnidhyaṁ mama yatra ca sarvaprāṇaiḥ parityaktastasminnāyatane śubhe
उपवास से थककर, जहाँ मेरी सन्निधि है, उसी शुभ मन्दिर में उसके सारे प्राण छूट गए।
श्लोक 24 (skanda.6.83.24)
तत्प्रभावादिह प्राप्तः सत्यमेतन्मयोदितम् ॥ अन्योऽप्यनशनं कृत्वा प्राणान्यस्तत्र संत्यजेत्
tatprabhāvādiha prāptaḥ satyametanmayoditam anyo'pyanaśanaṁ kṛtvā prāṇānyastatra saṁtyajet
उसी के प्रभाव से वह यहाँ आ पहुँचा है -- यह मैंने सत्य कहा है। कोई अन्य भी यदि अनशन करके वहाँ अपने प्राणों का त्याग करे,
श्लोक 25 (skanda.6.83.25)
स सर्वाभ्यधिकां भूतिं प्राप्नुयाद्वरवर्णिनि ॥ यानेतान्वीक्षसे देवि गणान्मे पार्श्वसंस्थितान्
sa sarvābhyadhikāṁ bhūtiṁ prāpnuyādvaravarṇini yānetānvīkṣase devi gaṇānme pārśvasaṁsthitān
हे वरवर्णिनि, वह भी सबसे बढ़कर ऐश्वर्य को प्राप्त होता है। हे देवि, तुम मेरे पार्श्व में स्थित इन गणों को जो देखती हो,
श्लोक 26 (skanda.6.83.26)
एतैस्तत्र कृतं सर्वैर्देवि प्रायोपवेशनम् ॥ अपि कीटपतंगा ये पशवः पक्षिणो मृगाः ॥ प्रासादे तत्र निर्मुक्ताः प्राणैर्यांति ममांतिकम्
etaistatra kṛtaṁ sarvairdevi prāyopaveśanam api kīṭapataṁgā ye paśavaḥ pakṣiṇo mṛgāḥ prāsāde tatra nirmuktāḥ prāṇairyāṁti mamāṁtikam
हे देवि, इन सभी ने वहाँ प्रायोपवेशन किया था। यहाँ तक कि जो कीड़े-पतंगे, पशु, पक्षी और मृग भी उस मन्दिर में अपने प्राण त्याग देते हैं, वे भी मेरे समीप ही आते हैं।
श्लोक 27 (skanda.6.83.27)
सूत उवाच। तच्छ्रुत्वा पार्वती वाक्यं प्रोक्तं देवेन शम्भुना ॥ विस्मयाविष्टहृदया साधु साध्विति साऽब्रवीत्
sūta uvāca tacchrutvā pārvatī vākyaṁ proktaṁ devena śambhunā vismayāviṣṭahṛdayā sādhu sādhviti sā'bravīt
सूत जी बोले -- देव शंभु द्वारा कहा गया यह वचन सुनकर, पार्वती का हृदय आश्चर्य से भर गया, और वे 'साधु, साधु' कहने लगीं।
श्लोक 28 (skanda.6.83.28)
ततःप्रभृति लोकेऽत्र पुरुषा मुक्तिमिच्छवः ॥ दूरतोऽपि समभ्येत्य स्वान्प्राणांस्तत्र तत्यजुः
tataḥprabhṛti loke'tra puruṣā muktimicchavaḥ dūrato'pi samabhyetya svānprāṇāṁstatra tatyajuḥ
तब से इस लोक में मुक्ति चाहने वाले पुरुष दूर-दूर से भी वहाँ आकर अपने प्राणों का त्याग करने लगे।
श्लोक 29 (skanda.6.83.29)
प्रायोपवेशनं कृत्वा श्रद्धया परया युताः ॥ गच्छन्ति च परां सिद्धिमपि पापपरायणाः
prāyopaveśanaṁ kṛtvā śraddhayā parayā yutāḥ gacchanti ca parāṁ siddhimapi pāpaparāyaṇāḥ
परम श्रद्धा से युक्त होकर प्रायोपवेशन करके, यहाँ तक कि पापपरायण व्यक्ति भी परम सिद्धि को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 30 (skanda.6.83.30)
एतद्वः सर्वमाख्यातं सर्वपातकनाशनम् ॥ सुपर्णाख्यस्य माहात्म्यं यन्मया स्वपितुः श्रुतम्
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ sarvapātakanāśanam suparṇākhyasya māhātmyaṁ yanmayā svapituḥ śrutam
यह समस्त पापों का नाश करने वाला सुपर्ण नामक देव का माहात्म्य, जो मैंने स्वयं अपने पिता से सुना था, मैंने तुम सबको पूर्णतः सुना दिया।