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नागर खण्ड · अध्याय 82

सुपर्णेश्वर-माहात्म्य-वर्णन

अध्याय 81अध्याय-सूचीअध्याय 83

श्लोक 1 (skanda.6.82.1)

सूत उवाच। तद्दृष्ट्वा पुंडरीकाक्षो गरुडस्य विचेष्टितम् ॥ विस्मितश्चिंतयामास किमिदं सांप्रतं स्थितम्

sūta uvāca taddṛṣṭvā puṁḍarīkākṣo garuḍasya viceṣṭitam vismitaściṁtayāmāsa kimidaṁ sāṁprataṁ sthitam

सूत जी बोले -- गरुड़ की उस दशा को देखकर पुण्डरीकाक्ष विष्णु चकित होकर सोचने लगे कि अभी यह क्या हो गया है।

श्लोक 2 (skanda.6.82.2)

अपि वज्रप्रहारेण यस्य रोमापि न च्युतम् ॥ तौ पक्षौ सहसा चास्य कथं निपतितौ भुवि

api vajraprahāreṇa yasya romāpi na cyutam tau pakṣau sahasā cāsya kathaṁ nipatitau bhuvi

जिसका एक रोम भी वज्रप्रहार से भी नहीं हिलता, उसके वे दोनों पंख अचानक भूमि पर कैसे गिर पड़े?

श्लोक 3 (skanda.6.82.3)

नूनमेतेन या स्त्रीणां कृता निंदा महात्मना॥ दूषितं ब्रह्मचर्यं यच्छांडिलीं समवेक्ष्य च

nūnametena yā strīṇāṁ kṛtā niṁdā mahātmanā dūṣitaṁ brahmacaryaṁ yacchāṁḍilīṁ samavekṣya ca

निश्चय ही इस महात्मा ने जो स्त्रियों की निंदा की और शाण्डिली को देखकर उसके ब्रह्मचर्य को दूषित (संदिग्ध) ठहराया, उसी का यह फल है।

श्लोक 4 (skanda.6.82.4)

अनया पातितौ पक्षौ तपःशक्तिप्रभावतः॥ नान्यस्य विद्यते शक्तिरीदृशी भुवनत्रये

anayā pātitau pakṣau tapaḥśaktiprabhāvataḥ nānyasya vidyate śaktirīdṛśī bhuvanatraye

उसी की तपःशक्ति के प्रभाव से इसके पंख गिरे हैं। इन तीनों लोकों में किसी अन्य में ऐसी शक्ति नहीं है।

श्लोक 5 (skanda.6.82.5)

ततः प्रसादयामास शांडिलीं गरुडध्वजः ॥ तदर्थं विनयोपेतः स्मितं कृत्वा द्विजोत्तमाः

tataḥ prasādayāmāsa śāṁḍilīṁ garuḍadhvajaḥ tadarthaṁ vinayopetaḥ smitaṁ kṛtvā dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो, तब गरुड़ध्वज विष्णु ने विनयपूर्वक मुस्कुराते हुए उसी विषय में शाण्डिली को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया।

श्लोक 6 (skanda.6.82.6)

श्रीभगवानुवाच। सामान्यवचनं प्रोक्तं सर्वस्त्रीणामनेन हि ॥ तत्किमर्थं महाभागे त्वया चैवेदृशः कृतः

śrībhagavānuvāca sāmānyavacanaṁ proktaṁ sarvastrīṇāmanena hi tatkimarthaṁ mahābhāge tvayā caivedṛśaḥ kṛtaḥ

श्रीभगवान् बोले -- इसने तो सब स्त्रियों के विषय में सामान्य वचन ही कहा था, फिर हे महाभागे, तुमने उसका ऐसा हाल क्यों कर डाला?

श्लोक 7 (skanda.6.82.7)

शांडिल्युवाच। मम वक्त्रं समालोक्य स्मितं चक्रे जनार्दन ॥ स्त्रीनिंदा विहितानेन स्वमत्यापि जगद्गुरो

śāṁḍilyuvāca mama vaktraṁ samālokya smitaṁ cakre janārdana strīniṁdā vihitānena svamatyāpi jagadguro

शाण्डिली बोली -- हे जनार्दन, इसने मेरे मुख को देखकर स्वयं ही मुस्कुराते हुए स्त्रियों की निंदा की थी। हे जगद्गुरो, यह उसकी अपनी बुद्धि से ही किया गया था।

श्लोक 8 (skanda.6.82.8)

एतस्मात्कारणादस्य निग्रहोऽयं मया कृतः ॥ मनसा न च वाक्येन न च केशव कर्मणा

etasmātkāraṇādasya nigraho'yaṁ mayā kṛtaḥ manasā na ca vākyena na ca keśava karmaṇā

इसी कारण मैंने इसका यह निग्रह किया है; हे केशव, यह न तो द्वेषवश मन से, न वचन से और न ही कर्म से किया गया है।

श्लोक 9 (skanda.6.82.9)

श्रीभगवानुवाच। तथापि कुरु चास्य त्वं प्रसादं गतकल्मषे॥ मम वाक्यानुरोधेन यदिमां मन्यसे शुभे

śrībhagavānuvāca tathāpi kuru cāsya tvaṁ prasādaṁ gatakalmaṣe mama vākyānurodhena yadimāṁ manyase śubhe

श्रीभगवान् बोले -- हे पापरहिते, फिर भी यदि तुम मेरी बात का आदर करती हो, तो हे शुभे, तुम इस पर कृपा करो।

श्लोक 10 (skanda.6.82.10)

शांडिल्युवाच। मनसापि मया ध्यातं शुभं वा यदिवाऽशुभम् ॥ नान्यथा जायते देव विशेषात्कोपयुक्तया

śāṁḍilyuvāca manasāpi mayā dhyātaṁ śubhaṁ vā yadivā'śubham nānyathā jāyate deva viśeṣātkopayuktayā

शाण्डिली बोली -- हे देव, मैंने मन से भी जो शुभ अथवा अशुभ सोच लिया है, वह विशेष रूप से क्रोधयुक्त होने पर अन्यथा नहीं होता, अर्थात अवश्य ही फलित होता है।

श्लोक 11 (skanda.6.82.11)

तस्मादेष ममादेशादाराध यतु शंकरम् ॥ पक्षलाभाय नान्यस्य शक्तिर्दातुं व्यवस्थिता

tasmādeṣa mamādeśādārādha yatu śaṁkaram pakṣalābhāya nānyasya śaktirdātuṁ vyavasthitā

अतः यह मेरे आदेश से जाकर शंकर की आराधना करे; पंख पुनः प्राप्त कराने की शक्ति और किसी में स्थित नहीं है।

श्लोक 12 (skanda.6.82.12)

अथवा पुंडरीकाक्ष रूपमीदृग्व्यवस्थितः ॥ एष संस्थास्यते लोके सत्यमेतद्ब्रवीम्यहम्

athavā puṁḍarīkākṣa rūpamīdṛgvyavasthitaḥ eṣa saṁsthāsyate loke satyametadbravīmyaham

अन्यथा, हे पुण्डरीकाक्ष, यह इसी रूप में स्थित होकर लोक में इसी दशा में रहेगा -- मैं यह सत्य कह रही हूँ।

श्लोक 13 (skanda.6.82.13)

सूत उवाच। तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा तं प्रोवाच जनार्दनः ॥ गरुडं दैन्यसंयुक्तं भासपिंडोपमं स्थितम्

sūta uvāca tasyāstadvacanaṁ śrutvā taṁ provāca janārdanaḥ garuḍaṁ dainyasaṁyuktaṁ bhāsapiṁḍopamaṁ sthitam

सूत जी बोले -- उसका वह वचन सुनकर, जनार्दन ने दीनतायुक्त और मांसपिंड-सदृश पड़े हुए गरुड़ से कहा।

श्लोक 14 (skanda.6.82.14)

एष एव वरश्चास्या द्विपदेश्या द्विजोत्तम ॥ पक्षलाभाय यत्प्रोक्तं तव शंभुप्रसादनम्

eṣa eva varaścāsyā dvipadeśyā dvijottama pakṣalābhāya yatproktaṁ tava śaṁbhuprasādanam

हे द्विजोत्तम, इस द्विपदा (शाण्डिली) की यही वाणी अब वरदान है, कि तुम्हारे पंख प्राप्त करने के लिए तुम्हें शंभु को प्रसन्न करना होगा, ऐसा उसने बताया है।

श्लोक 15 (skanda.6.82.15)

तस्मादाराधय क्षिप्रं त्वं देवं शशिशेखरम् ॥ अव्यग्रं चित्तमास्थाय दिवारात्रमतंद्रितः

tasmādārādhaya kṣipraṁ tvaṁ devaṁ śaśiśekharam avyagraṁ cittamāsthāya divārātramataṁdritaḥ

अतः तुम शीघ्र ही चन्द्रशेखर देव की आराधना करो; अव्यग्र चित्त होकर, दिन-रात अनथक रहकर।

श्लोक 16 (skanda.6.82.16)

येन ते तत्प्रभावेन भूयः स्यात्तादृशं वपुः ॥ तस्य देवस्य माहात्म्यादचिरादपि काश्यप

yena te tatprabhāvena bhūyaḥ syāttādṛśaṁ vapuḥ tasya devasya māhātmyādacirādapi kāśyapa

हे काश्यप, उस देव के माहात्म्य से उसी के प्रभाव से तुम्हें शीघ्र ही पुनः वैसा ही शरीर प्राप्त हो जाएगा।

श्लोक 17 (skanda.6.82.17)

तच्छ्रुत्वा गरुडस्तूर्णं धृतपाशुपतव्रतः ॥ संस्थाप्य देवमीशानं ततस्तं तोषमानयत्

tacchrutvā garuḍastūrṇaṁ dhṛtapāśupatavrataḥ saṁsthāpya devamīśānaṁ tatastaṁ toṣamānayat

यह सुनकर गरुड़ ने शीघ्र ही पाशुपत व्रत धारण करके, देव ईशान की स्थापना कर, फिर उन्हें संतुष्ट किया।

श्लोक 18 (skanda.6.82.18)

चांद्रायणानि कृच्छ्राणि तथा सांतपनानि च ॥ प्राजापत्यानि चक्रेऽथ पाराकाणि तदग्रतः

cāṁdrāyaṇāni kṛcchrāṇi tathā sāṁtapanāni ca prājāpatyāni cakre'tha pārākāṇi tadagrataḥ

उसने चान्द्रायण, कृच्छ्र, सांतपन, प्राजापत्य और पाराक व्रत उनके सम्मुख किए।

श्लोक 19 (skanda.6.82.19)

स्नात्वा त्रिषवणं पश्चाद्भस्मस्नान परायणः ॥ जपन्रुद्रशिरो रुद्रान्नीलरुद्रांस्तथापरान्

snātvā triṣavaṇaṁ paścādbhasmasnāna parāyaṇaḥ japanrudraśiro rudrānnīlarudrāṁstathāparān

वह तीनों संध्याओं में स्नान करके, भस्मस्नान में तत्पर रहकर, रुद्रशिर, रुद्र और नीलरुद्र आदि मन्त्रों का जप करता रहा।

श्लोक 20 (skanda.6.82.20)

चक्रे पूजां स्वयं तस्य स्नापयित्वा यथाविधि ॥ बलिपूजोपहारांश्च विधानेन प्रयच्छति

cakre pūjāṁ svayaṁ tasya snāpayitvā yathāvidhi balipūjopahārāṁśca vidhānena prayacchati

उसने स्वयं विधिपूर्वक उन्हें स्नान कराकर पूजा की, और विधानपूर्वक बलि, पूजा और उपहार अर्पित किए।

श्लोक 21 (skanda.6.82.21)

एवं तस्य व्रतस्थस्य जपपूजापरस्य च ॥ ततो वर्षसहस्रांते गतस्तुष्टिं महेश्वरः ॥ अब्रवीद्वरदोऽस्मीति वृणुष्वेष्टं द्विजोत्तम

evaṁ tasya vratasthasya japapūjāparasya ca tato varṣasahasrāṁte gatastuṣṭiṁ maheśvaraḥ abravīdvarado'smīti vṛṇuṣveṣṭaṁ dvijottama

इस प्रकार व्रतस्थ होकर जप-पूजा में तत्पर उसके सहस्र वर्ष पूर्ण होने पर महेश्वर संतुष्ट हो गए और बोले -- हे द्विजोत्तम, मैं वर देने को तैयार हूँ, अपनी इच्छित वस्तु माँगो।

श्लोक 22 (skanda.6.82.22)

गरुड उवाच। पश्यावस्थां ममेशान शांडिल्या या विनिर्मिता ॥ पक्षपातः कृतोऽस्माकं तमहं प्रार्थयामि वै

garuḍa uvāca paśyāvasthāṁ mameśāna śāṁḍilyā yā vinirmitā pakṣapātaḥ kṛto'smākaṁ tamahaṁ prārthayāmi vai

गरुड़ बोले -- हे ईशान, मेरी वह दशा देखिए जो शाण्डिली द्वारा बनाई गई है; हमारे पंखों का जो यह पतन हुआ है, मैं उसी के विषय में प्रार्थना करता हूँ।

श्लोक 23 (skanda.6.82.23)

त्वयात्रैव सदा लिंगे स्थेयं हर ममाधुना ॥ मम वाक्यादसंदिग्धं यदि चेष्टं प्रयच्छसि

tvayātraiva sadā liṁge stheyaṁ hara mamādhunā mama vākyādasaṁdigdhaṁ yadi ceṣṭaṁ prayacchasi

हे हर, यदि आप अभी मुझे मेरी इच्छित वस्तु देना चाहते हैं, तो निःसंदेह मेरे इसी वचन से आप सदा यहाँ इस लिंग में विराजें।

श्लोक 24 (skanda.6.82.24)

भगवानुवाच। अद्यप्रभृति मे चात्र लिंगे वासो भविष्यति ॥ त्वं च तद्रूपसंपन्नो विशेषाद्बलवेगभाक्

bhagavānuvāca adyaprabhṛti me cātra liṁge vāso bhaviṣyati tvaṁ ca tadrūpasaṁpanno viśeṣādbalavegabhāk

भगवान् बोले -- आज से यहाँ इस लिंग में मेरा निवास होगा, और तुम भी उसी रूप से संपन्न होकर, विशेष रूप से बल और वेग से युक्त हो जाओगे।

श्लोक 25 (skanda.6.82.25)

भविष्यसि न संदेहो मत्प्रसादाद्विहंगम ॥ एवमुक्त्वाथ तं देवः स्वयं पस्पर्श पाणिना

bhaviṣyasi na saṁdeho matprasādādvihaṁgama evamuktvātha taṁ devaḥ svayaṁ pasparśa pāṇinā

हे पक्षिराज, मेरी कृपा से इसमें कोई संदेह नहीं है। ऐसा कहकर उस देव ने स्वयं अपने हाथ से उसे स्पर्श किया।

श्लोक 26 (skanda.6.82.26)

ततोऽस्य पक्षौ संजातौ तत्क्षणादेव सुन्दरौ ॥ तथा रोमाणि दिव्यानि जातरूपोपमानि च

tato'sya pakṣau saṁjātau tatkṣaṇādeva sundarau tathā romāṇi divyāni jātarūpopamāni ca

तब उसी क्षण उसके दोनों सुन्दर पंख पुनः उत्पन्न हो गए, तथा सुवर्ण के समान दिव्य रोम भी।

श्लोक 27 (skanda.6.82.27)

ततः प्रणम्य तं देवं प्रहष्टः स विहंगमः ॥ गतः स्वभवनं पश्चादनुज्ञाप्य महेश्वरम्

tataḥ praṇamya taṁ devaṁ prahaṣṭaḥ sa vihaṁgamaḥ gataḥ svabhavanaṁ paścādanujñāpya maheśvaram

तब उस पक्षिराज ने प्रसन्न होकर उस देव को प्रणाम किया, और फिर महेश्वर से आज्ञा लेकर अपने भवन को चला गया।

श्लोक 28 (skanda.6.82.28)

देवोपि वचनात्तस्य तस्मिँल्लिंगे सदा हरः ॥ निवासमकरोत्सम्यक्प्राप्ते संध्यात्रये सदा

devopi vacanāttasya tasmi~lliṁge sadā haraḥ nivāsamakarotsamyakprāpte saṁdhyātraye sadā

उसके वचन के अनुसार हर देव भी उस लिंग में सदा निवास करने लगे, और विशेषतः तीनों संध्याओं में सदा वहाँ भलीभाँति उपस्थित होते हैं।

श्लोक 29 (skanda.6.82.29)

तस्य चायतने पुण्ये योगात्प्राणान्परित्यजेत् ॥ प्रायोपवेशनं कृत्वा न स भूयोऽपि जायते

tasya cāyatane puṇye yogātprāṇānparityajet prāyopaveśanaṁ kṛtvā na sa bhūyo'pi jāyate

उसके उस पवित्र मन्दिर में जो कोई योगपूर्वक प्रायोपवेशन करके प्राणत्याग करता है, वह पुनः जन्म नहीं लेता।

श्लोक 30 (skanda.6.82.30)

अपि पाप समाचारः कौलो वा निर्घृणोऽपि वा ॥ ब्रह्मघ्नो वा सुरापो वा चौरो वा भ्रूणहाऽपि वा

api pāpa samācāraḥ kaulo vā nirghṛṇo'pi vā brahmaghno vā surāpo vā cauro vā bhrūṇahā'pi vā

चाहे वह पापाचारी हो, कौल हो, निर्दय हो, ब्रह्महत्यारा हो, मद्यपायी हो, चोर हो, अथवा भ्रूणहत्यारा ही क्यों न हो --

श्लोक 31 (skanda.6.82.31)

त्रिकालं पूजयन्यस्तु श्रद्धापूतेन चेतसा ॥। संवत्सरं वसेत्सोऽपि शिवलोके महीयते

trikālaṁ pūjayanyastu śraddhāpūtena cetasā saṁvatsaraṁ vasetso'pi śivaloke mahīyate

-- यदि वह श्रद्धापूत चित्त से तीनों काल पूजा करता हुआ एक वर्ष तक वहाँ निवास करे, तो वह भी शिवलोक में पूजित होता है।

श्लोक 32 (skanda.6.82.32)

अथवा सोमवारेण यस्तं पश्यति मानवः ॥ कृत्वा क्षणं सुभक्त्या यो यावत्संवत्सरं द्विजाः

athavā somavāreṇa yastaṁ paśyati mānavaḥ kṛtvā kṣaṇaṁ subhaktyā yo yāvatsaṁvatsaraṁ dvijāḥ

अथवा हे द्विजो, जो मनुष्य सोमवार के दिन उन्हें देखता है और भक्तिपूर्वक क्षणभर भी वहाँ रहता है, यदि वह यह क्रम एक वर्ष तक करता रहे,

श्लोक 33 (skanda.6.82.33)

सोऽपि याति न संदेहः पुरुषः शिवमन्दिरे ॥ विमानवरमारूढः सेव्यमानोऽप्सरोगणैः

so'pi yāti na saṁdehaḥ puruṣaḥ śivamandire vimānavaramārūḍhaḥ sevyamāno'psarogaṇaiḥ

वह पुरुष भी, निःसंदेह, दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर, अप्सराओं द्वारा सेवित होते हुए, शिवमन्दिर को जाता है।

श्लोक 34 (skanda.6.82.34)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कलिकाले विशेषतः॥ द्रष्टव्यो वै सुपर्णाख्यो देवः श्रद्धासमन्वितैः

tasmātsarvaprayatnena kalikāle viśeṣataḥ draṣṭavyo vai suparṇākhyo devaḥ śraddhāsamanvitaiḥ

अतः विशेष रूप से कलिकाल में, श्रद्धायुक्त होकर, सुपर्ण नामक उस देव का दर्शन पूरे प्रयत्न से करना चाहिए।

श्लोक 35 (skanda.6.82.35)

संत्याज्याश्च तथा प्राणास्तदग्रेप्रायसंश्रितैः ॥ वांछद्भिः शिवसांनिध्यं सत्यमेतन्मयोदितम्

saṁtyājyāśca tathā prāṇāstadagreprāyasaṁśritaiḥ vāṁchadbhiḥ śivasāṁnidhyaṁ satyametanmayoditam

तथा जो शिव की सन्निधि चाहते हैं, उन्हें उसके सम्मुख प्रायोपवेशन का आश्रय लेकर अपने प्राणों का त्याग कर देना चाहिए -- यह मैंने सत्य कहा है।

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