नागर खण्ड · अध्याय 81
सुपर्णपक्षपात-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.81.1)
श्रीगरुड उवाच। ममास्ति दयितं मित्रं ब्राह्मणो भृगुवंशजः ॥ तस्यास्ति माधवीनाम कन्या कमललोचना
śrīgaruḍa uvāca mamāsti dayitaṁ mitraṁ brāhmaṇo bhṛguvaṁśajaḥ tasyāsti mādhavīnāma kanyā kamalalocanā
श्री गरुड़ जी बोले -- मेरा एक प्रिय मित्र है, जो भृगुवंश में उत्पन्न एक ब्राह्मण है। उसकी माधवी नाम की एक कमल-नेत्री कन्या है।
श्लोक 2 (skanda.6.81.2)
न तस्याः सदृशः कांतः प्राप्तस्तेन महात्मना ॥ यतस्ततोऽहमादिष्टः कांतमस्यास्त्वमानय ॥ अनुरूपं द्विजश्रेष्ठ यद्यहं संमतस्तव
na tasyāḥ sadṛśaḥ kāṁtaḥ prāptastena mahātmanā yatastato'hamādiṣṭaḥ kāṁtamasyāstvamānaya anurūpaṁ dvijaśreṣṭha yadyahaṁ saṁmatastava
उस महात्मा को उसके योग्य कोई वर नहीं मिल सका, इसलिए उसने मुझे यह आदेश दिया कि 'यदि तुम मुझे सम्मत हो, तो हे द्विजश्रेष्ठ, इसके अनुरूप वर तुम स्वयं लाओ।'
श्लोक 3 (skanda.6.81.3)
ततो मयाऽखिला भूमिस्तद्वरार्थं विलोकिता ॥ न तदर्थं वरो लब्धः सर्वैः समुचितो गुणैः
tato mayā'khilā bhūmistadvarārthaṁ vilokitā na tadarthaṁ varo labdhaḥ sarvaiḥ samucito guṇaiḥ
तब मैंने उसके लिए वर की खोज में समस्त पृथ्वी को देख डाला, परन्तु सब गुणों से समुचित कोई वर उसके लिए नहीं मिला।
श्लोक 4 (skanda.6.81.4)
ततस्त्वं पुण्डरीकाक्ष मम चित्ते व्यवस्थितः ॥ अनुरूपः पतिस्तस्याः सर्वैरेव गुणैर्युतः
tatastvaṁ puṇḍarīkākṣa mama citte vyavasthitaḥ anurūpaḥ patistasyāḥ sarvaireva guṇairyutaḥ
तब हे पुण्डरीकाक्ष, आप मेरे मन में यह निश्चय होकर बैठ गये कि आप ही समस्त गुणों से युक्त होने के कारण उसके योग्य पति हैं।
श्लोक 5 (skanda.6.81.5)
तस्मात्पाणिग्रहं तस्याः स्वीकुरुष्व सुरेश्वर ॥ अत्यन्तरूपयुक्ताया मम वाक्यप्रणोदितः
tasmātpāṇigrahaṁ tasyāḥ svīkuruṣva sureśvara atyantarūpayuktāyā mama vākyapraṇoditaḥ
अतः हे सुरेश्वर, मेरे वचन से प्रेरित होकर अत्यन्त रूपवती उस कन्या का पाणिग्रहण आप स्वीकार करें।
श्लोक 6 (skanda.6.81.6)
भगवानुवाच ॥ अत्रानय द्विजश्रेष्ठ तां कन्यां कमलेक्षणाम्॥ येन दृष्ट्वा स्वयं पश्चात्प्रकरोमि यथोदितम्
bhagavānuvāca atrānaya dvijaśreṣṭha tāṁ kanyāṁ kamalekṣaṇām yena dṛṣṭvā svayaṁ paścātprakaromi yathoditam
भगवान् बोले -- हे द्विजश्रेष्ठ, उस कमल-नयनी कन्या को यहाँ ले आओ, जिसे देखकर मैं स्वयं फिर वैसा ही करूँगा जैसा उचित होगा।
श्लोक 7 (skanda.6.81.7)
गरुड उवाच ॥ तव तेजोभयादेव सा कन्या जनकान्विता ॥ मया दूरे विनिर्मुक्ता तत्कथं तामिहानये
garuḍa uvāca tava tejobhayādeva sā kanyā janakānvitā mayā dūre vinirmuktā tatkathaṁ tāmihānaye
गरुड़ बोले -- आपके तेज के भय से ही मैंने उस कन्या को उसके पिता सहित दूर ही छोड़ दिया है; अब उसे यहाँ कैसे लाऊँ?
श्लोक 8 (skanda.6.81.8)
श्रीभगवानुवाच ॥ अत्र तां मम तत्तेजो जनकेन समन्विताम्॥ न हि धक्ष्यति तस्मात्त्वं शीघ्रं द्विजवराऽनय
śrībhagavānuvāca atra tāṁ mama tattejo janakena samanvitām na hi dhakṣyati tasmāttvaṁ śīghraṁ dvijavarā'naya
श्रीभगवान् बोले -- यहाँ मेरा वह तेज उसे उसके पिता सहित नहीं जलाएगा; अतः हे द्विजश्रेष्ठ, तुम शीघ्र उसे ले आओ।
श्लोक 9 (skanda.6.81.9)
एवमुक्तस्ततस्तेन विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ तां कन्या मानयामास तं च विप्रभृगूद्वहम्
evamuktastatastena viṣṇunā prabhaviṣṇunā tāṁ kanyā mānayāmāsa taṁ ca viprabhṛgūdvaham
सर्वशक्तिमान् विष्णु द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, उसने आदरपूर्वक उस कन्या और भृगुवंशोद्भव उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को वहाँ ला दिया।
श्लोक 10 (skanda.6.81.10)
अथासौ प्रणिपत्योच्चैर्ब्राह्मणो मधुसूदनम् ॥ लक्ष्मीवन्न्यविशत्पार्श्वे गरुडस्य समीपतः
athāsau praṇipatyoccairbrāhmaṇo madhusūdanam lakṣmīvannyaviśatpārśve garuḍasya samīpataḥ
तब उस ब्राह्मण ने मधुसूदन को ऊँचे स्वर में प्रणाम करके, गरुड़ के समीप ही, अपनी कन्या को लक्ष्मी के स्थान पर, उनके पार्श्व में बिठा दिया।
श्लोक 11 (skanda.6.81.11)
सापि कन्या वरारोहा बाल्यभावादनिन्दिता ॥ शय्यैकांते समाविष्टा दक्षिणे मुरविद्विषः
sāpi kanyā varārohā bālyabhāvādaninditā śayyaikāṁte samāviṣṭā dakṣiṇe muravidviṣaḥ
वह सुन्दरांगी कन्या भी अपने बाल्यभाव के कारण निर्दोष मानकर, मुर के शत्रु विष्णु की शय्या के एक छोर पर, दाहिनी ओर बैठ गई।
श्लोक 12 (skanda.6.81.12)
अथ कोपपरीतांगी महिष्याधर्ममाश्रिता ॥ लक्ष्मीः शशाप तां कन्यां सपत्नीति विचिन्त्य च
atha kopaparītāṁgī mahiṣyādharmamāśritā lakṣmīḥ śaśāpa tāṁ kanyāṁ sapatnīti vicintya ca
तब क्रोध से व्याप्तांगी होकर, अपने पटरानी-धर्म का आश्रय लेकर, लक्ष्मी ने उसे सौत समझकर उस कन्या को शाप दे दिया।
श्लोक 13 (skanda.6.81.13)
यस्मान्मे पुरतः पापे कांतस्य मम हर्षिता॥ शय्यायां त्वं समाविष्टा लज्जां त्यक्त्वा सुदूरतः ॥ तस्मादश्वमुखी नूनं विकृता त्वं भविष्यसि
yasmānme purataḥ pāpe kāṁtasya mama harṣitā śayyāyāṁ tvaṁ samāviṣṭā lajjāṁ tyaktvā sudūrataḥ tasmādaśvamukhī nūnaṁ vikṛtā tvaṁ bhaviṣyasi
हे पापिनी! चूँकि तूने लज्जा को दूर त्यागकर, मेरे सामने ही प्रसन्न होकर, मेरे प्रियतम की शय्या में प्रवेश किया है, अतः तू निश्चय ही विकृत, अश्वमुखी हो जाएगी।
श्लोक 14 (skanda.6.81.14)
एवं शापे श्रिया दत्ते हाहाकारो महानभूत् ॥ सर्वेषां तत्र संस्थानां कोपश्चापि द्विजन्मनः
evaṁ śāpe śriyā datte hāhākāro mahānabhūt sarveṣāṁ tatra saṁsthānāṁ kopaścāpi dvijanmanaḥ
इस प्रकार श्री (लक्ष्मी) द्वारा शाप दिए जाने पर वहाँ उपस्थित सभी लोगों में हाहाकार मच गया, और उस ब्राह्मण को भी बड़ा क्रोध आया।
श्लोक 15 (skanda.6.81.15)
ब्राह्मण उवाच ॥ सहस्रं याच्यते कन्या करोत्येकः करग्रहम् ॥ वाङ्मात्रेण न तस्याः स्यात्पत्नीभावः कथंचन
brāhmaṇa uvāca sahasraṁ yācyate kanyā karotyekaḥ karagraham vāṅmātreṇa na tasyāḥ syātpatnībhāvaḥ kathaṁcana
ब्राह्मण बोला -- कन्या के लिए सहस्रों याचना करते हैं, किन्तु उसका पाणिग्रहण तो एक ही करता है। केवल वचन मात्र से किसी भी प्रकार उसका पत्नीभाव सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 16 (skanda.6.81.16)
यावन्नाग्निद्विजातीनां प्रत्यक्षं गुरुसंनिधौ ॥ ससंकल्पं स्वयं दत्ता गृह्योक्तविधिना जनैः
yāvannāgnidvijātīnāṁ pratyakṣaṁ gurusaṁnidhau sasaṁkalpaṁ svayaṁ dattā gṛhyoktavidhinā janaiḥ
जब तक अग्नि और ब्राह्मणों के समक्ष, गुरुजनों की उपस्थिति में, संकल्पपूर्वक स्वजनों द्वारा गृह्यसूत्रोक्त विधि से वह न दी जाए, तब तक (विवाह सिद्ध नहीं होता)।
श्लोक 17 (skanda.6.81.17)
तस्मात्तद्दोषनिर्मुक्ता सपत्न्येषा समा त्वया ॥ कृता वाजिमुखी पापे त्वं गजास्या भविष्यसि
tasmāttaddoṣanirmuktā sapatnyeṣā samā tvayā kṛtā vājimukhī pāpe tvaṁ gajāsyā bhaviṣyasi
अतः यह उस दोष से मुक्त है और तुम्हारे समान ही सौत है। हे पापिनी! तूने इसे जो अश्वमुखी बनाया है, उसके बदले तू स्वयं गजमुखी हो जाएगी।
श्लोक 18 (skanda.6.81.18)
एवमुक्त्वा स विप्रेंद्रस्ततः प्रोवाच केशवम्॥ आतिथ्यं विहितं ह्येतत्तव पत्न्या यथोचितम् ॥ तस्मात्तत्र प्रयास्यामि यत्र स्यात्तादृशी सुता
evamuktvā sa vipreṁdrastataḥ provāca keśavam ātithyaṁ vihitaṁ hyetattava patnyā yathocitam tasmāttatra prayāsyāmi yatra syāttādṛśī sutā
ऐसा कहकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने फिर केशव से कहा -- आपकी पत्नी ने यह जो आतिथ्य किया, वह यथोचित ही हुआ। अतः अब मैं वहीं जाऊँगा जहाँ इस जैसी पुत्री के लिए (उचित वर मिल सके)।
श्लोक 19 (skanda.6.81.19)
श्रीभगवानुवाच ॥ न सन्तापस्त्वया कार्यः कृत्येस्मिन्द्विजसत्तम ॥ ममांतिके प्रयातानां नाशुभं जायते क्वचित्
śrībhagavānuvāca na santāpastvayā kāryaḥ kṛtyesmindvijasattama mamāṁtike prayātānāṁ nāśubhaṁ jāyate kvacit
श्रीभगवान् बोले -- हे द्विजसत्तम, इस विषय में तुम्हें संताप नहीं करना चाहिए; मेरे समीप आए हुओं का कभी अशुभ नहीं होता।
श्लोक 20 (skanda.6.81.20)
तस्मान्नाश्वमुखी ह्येषा जन्मन्यस्मिन्भविष्यति ॥ गृहीत्वेमां गृहं गच्छ प्रयच्छ स्वेप्सिताय च
tasmānnāśvamukhī hyeṣā janmanyasminbhaviṣyati gṛhītvemāṁ gṛhaṁ gaccha prayaccha svepsitāya ca
अतः यह इस जन्म में अश्वमुखी नहीं होगी। इसे लेकर तुम अपने घर जाओ, और जिसे चाहो उसे इसे प्रदान करो।
श्लोक 21 (skanda.6.81.21)
शयने वामदिग्भागः कलत्राणामुदाहृतः ॥ दक्षिणे बन्धुलोकानां तत्कालोचितशायिनाम्
śayane vāmadigbhāgaḥ kalatrāṇāmudāhṛtaḥ dakṣiṇe baṁdhulokānāṁ tatkālocitaśāyinām
शय्या में बायाँ भाग पत्नियों का बताया गया है, और दाहिना भाग उस समय उचित रीति से विश्राम करने वाले बन्धुजनों का है।
श्लोक 22 (skanda.6.81.22)
सेयं तव सुता विप्र बंधुस्थानं समाश्रिता ॥ भविष्यति ततो जामिः कनिष्ठा मेऽन्यजन्मनि
seyaṁ tava sutā vipra baṁdhusthānaṁ samāśritā bhaviṣyati tato jāmiḥ kaniṣṭhā me'nyajanmani
हे विप्र, यह तुम्हारी पुत्री कुटुम्बी के स्थान पर बैठी थी, अतः यह अगले जन्म में मेरी कनिष्ठा भगिनी होगी।
श्लोक 23 (skanda.6.81.23)
अवतीर्णस्य भूपृष्ठे देवकार्येण केनचित् ॥ वाजिवक्त्रधरा प्रोक्ता यद्येषा मम कांतया
avatīrṇasya bhūpṛṣṭhe devakāryeṇa kenacit vājivaktradharā proktā yadyeṣā mama kāṁtayā
जब मैं किसी देवकार्य के लिए पृथ्वी पर अवतार लूँगा, तब तक यह मेरी प्रिया के शाप से अश्वमुखधारिणी ही कही गई है।
श्लोक 24 (skanda.6.81.24)
ततोऽहं सुमहत्कृत्वा तपश्चैवानया सह ॥ करिष्यामि शुभास्यां च तथा लक्ष्मीमपि द्विज
tato'haṁ sumahatkṛtvā tapaścaivānayā saha kariṣyāmi śubhāsyāṁ ca tathā lakṣmīmapi dvija
तब मैं इसके साथ महान तपस्या करके, हे द्विज, इसे शुभमुखी बना दूँगा, और साथ ही लक्ष्मी को भी।
श्लोक 25 (skanda.6.81.25)
एवं स भगवान्विप्रं तं सन्तोष्य तदा गिरा ॥ गरुडेन समं चक्रे कथाश्चित्रा मनोरमाः
evaṁ sa bhagavānvipraṁ taṁ santoṣya tadā girā garuḍena samaṁ cakre kathāścitrā manoramāḥ
इस प्रकार उस भगवान् ने अपनी वाणी से उस ब्राह्मण को संतुष्ट करके, फिर गरुड़ के साथ अनेक विचित्र और मनोरम कथाएँ कीं।
श्लोक 26 (skanda.6.81.26)
अथ तस्मिन्कथांते स गरुडः पुरुषोत्तमम् ॥ प्रोवाच तां स्त्रियं दृष्ट्वा वृद्धां तेजःसमन्विताम्
atha tasminkathāṁte sa garuḍaḥ puruṣottamam provāca tāṁ striyaṁ dṛṣṭvā vṛddhāṁ tejaḥsamanvitām
फिर उस कथा के अंत में गरुड़ ने, वहाँ एक तेजयुक्त वृद्धा स्त्री को देखकर, पुरुषोत्तम से कहा।
श्लोक 27 (skanda.6.81.27)
अपूर्वेयं सुरश्रेष्ठ स्त्री वृद्धा तव पार्श्वगा ॥ किमर्थं केयमाख्याहि कुतः प्राप्ता जनार्दन
apūrveyaṁ suraśreṣṭha strī vṛddhā tava pārśvagā kimarthaṁ keyamākhyāhi kutaḥ prāptā janārdana
हे सुरश्रेष्ठ, आपके पार्श्व में स्थित यह वृद्धा स्त्री अद्भुत है। हे जनार्दन, यह कौन है, किसलिए और कहाँ से आई है, यह बताइए।
श्लोक 28 (skanda.6.81.28)
श्रीभगवानुवाच ॥ एषा ख्याता खगश्रेष्ठ लोकेऽस्मिन्वृद्धकन्यका ॥ शांडिलीनाम सर्वज्ञा ब्रह्मचर्यपरायणा
śrībhagavānuvāca eṣā khyātā khagaśreṣṭha loke'sminvṛddhakanyakā śāṁḍilīnāma sarvajñā brahmacaryaparāyaṇā
श्रीभगवान् बोले -- हे खगश्रेष्ठ, यह इस लोक में वृद्धकन्या (आजीवन कुमारी) के नाम से विख्यात, सर्वज्ञा, ब्रह्मचर्यपरायणा शाण्डिली है।
श्लोक 29 (skanda.6.81.29)
तपोवीर्यसमोपेता सर्वदेवाभिवंदिता ॥ नास्ति वै चेदृशी नारी खगेन्द्रात्र जगत्त्रये
tapovīryasamopetā sarvadevābhivaṁditā nāsti vai cedṛśī nārī khagendrātra jagattraye
वह तपोबल से युक्त है और समस्त देवों द्वारा वंदित है। हे खगेन्द्र, इस त्रिलोक में उसके समान दूसरी स्त्री नहीं है।
श्लोक 30 (skanda.6.81.30)
सूत उवाच ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा विहस्य विहगाधिपः ॥ प्रोवाच वासुदेवं च तां विलोक्य चिरं द्विजाः
sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā vihasya vihagādhipaḥ provāca vāsudevaṁ ca tāṁ vilokya ciraṁ dvijāḥ
सूत जी बोले -- उनका वह वचन सुनकर पक्षिराज गरुड़ ने हँसकर, हे द्विजो, उस वृद्धा को देर तक देखकर वासुदेव से कहा।
श्लोक 31 (skanda.6.81.31)
गरुड उवाच ॥ नैतच्चित्रं तपो यच्च क्रियते सुमहत्तरम् ॥ यथा च दीयते दानं यच्च तत्रास्ति चाद्भुतम्॥ तथा च क्रियते युद्धं संग्रामे युद्धशालिभिः
garuḍa uvāca naitaccitraṁ tapo yacca kriyate sumahattaram yathā ca dīyate dānaṁ yacca tatrāsti cādbhutam tathā ca kriyate yuddhaṁ saṁgrāme yuddhaśālibhiḥ
गरुड़ बोले -- जो महान तप किया जाता है, वह कोई विचित्र बात नहीं; जिस प्रकार दान दिया जाता है, उसमें भी कोई अद्भुत बात नहीं; और जिस प्रकार युद्धप्रिय पुरुष संग्राम में युद्ध करते हैं, वह भी आश्चर्य की बात नहीं है।
श्लोक 32 (skanda.6.81.32)
नाश्चर्यं चित्रमेतच्च ब्रह्मचर्यं तदद्भुतम् ॥ विशेषाद्यौवनावस्थां संप्राप्य पुरुषोत्तम
nāścaryaṁ citrametacca brahmacaryaṁ tadadbhutam viśeṣādyauvanāvasthāṁ saṁprāpya puruṣottama
हे पुरुषोत्तम, आश्चर्य और विचित्रता की बात तो यह है कि विशेष रूप से यौवनावस्था को प्राप्त होकर भी कोई ब्रह्मचर्य का पालन करे।
श्लोक 33 (skanda.6.81.33)
विशेषेण च नारीभिरत्र न श्रद्दधाम्यहम् ॥ अवश्यं यौवनस्थेन तिर्यग्योनिगतेन च
viśeṣeṇa ca nārībhiratra na śraddadhāmyaham avaśyaṁ yauvanasthena tiryagyonigatena ca
और विशेष रूप से स्त्रियों के विषय में तो मुझे इस पर विश्वास ही नहीं होता; क्योंकि यौवनावस्था को प्राप्त प्राणी को, चाहे वह पशु-पक्षी योनि में ही क्यों न हो, अवश्य ही विकार होता है --
श्लोक 34 (skanda.6.81.34)
विकारः खलु कर्तव्यो नाधि काराय यौवनम् ॥ यदि न प्राप्नुवंत्येताः पुरुषं योषितः क्वचित्
vikāraḥ khalu kartavyo nādhi kārāya yauvanam yadi na prāpnuvaṁtyetāḥ puruṣaṁ yoṣitaḥ kvacit
यौवन तो निश्चय ही विकार उत्पन्न करने के लिए ही है, न कि प्रभुत्व के लिए। यदि इन स्त्रियों को कहीं पुरुष न मिले,
श्लोक 35 (skanda.6.81.35)
अन्योन्यं मैथुनं चक्रुः कामबाणप्रपीडिताः ॥ कुष्ठिनं व्याधितं वापि स्थविरं व्यंगमेव च ॥ अप्येताः पुरुषाभावे मन्यंते पंचसायकम्
anyonyaṁ maithunaṁ cakruḥ kāmabāṇaprapīḍitāḥ kuṣṭhinaṁ vyādhitaṁ vāpi sthaviraṁ vyaṁgameva ca apyetāḥ puruṣābhāve manyaṁte paṁcasāyakam
तो कामबाण से पीड़ित होकर वे परस्पर ही संयोग कर लेती हैं; अथवा पुरुष के अभाव में वे कोढ़ी, रोगी, वृद्ध या अंगहीन पुरुष को भी कामदेव के समान मान लेती हैं।
श्लोक 36 (skanda.6.81.36)
नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः ॥ नांतकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना
nāgnistṛpyati kāṣṭhānāṁ nāpagānāṁ mahodadhiḥ nāṁtakaḥ sarvabhūtānāṁ na puṁsāṁ vāmalocanā
जैसे अग्नि लकड़ी से तृप्त नहीं होती, महासागर नदियों से तृप्त नहीं होता, मृत्यु समस्त प्राणियों से तृप्त नहीं होती, वैसे ही सुनयनी स्त्रियाँ पुरुषों से तृप्त नहीं होतीं।
श्लोक 37 (skanda.6.81.37)
न परत्र भयादेता मर्यादां विदधुः स्त्रियः ॥ मुक्त्वा भूपभयं चैकमथवा गुरुजं भयम्
na paratra bhayādetā maryādāṁ vidadhuḥ striyaḥ muktvā bhūpabhayaṁ caikamathavā gurujaṁ bhayam
ये स्त्रियाँ परलोक के भय से मर्यादा का पालन नहीं करतीं; केवल राजा के भय अथवा गुरुजनों के भय से ही वे मर्यादा में रहती हैं।
श्लोक 38 (skanda.6.81.38)
सूत उवाच ॥ एवं तस्य वचः श्रुत्वा शांडिली ब्रह्मचारिणी ॥ मौनव्रतधराऽप्येवं हृदि कोपं दधार सा
sūta uvāca evaṁ tasya vacaḥ śrutvā śāṁḍilī brahmacāriṇī maunavratadharā'pyevaṁ hṛdi kopaṁ dadhāra sā
सूत जी बोले -- गरुड़ के इस वचन को सुनकर, ब्रह्मचारिणी शाण्डिली मौनव्रतधारिणी होते हुए भी अपने हृदय में क्रोध धारण कर बैठी।
श्लोक 39 (skanda.6.81.39)
एतस्मिन्नंतरे तस्य पक्षिनाथस्य तत्क्षणात् ॥ उभौ पक्षौ गतौ नाशं रुण्डाकारोऽत्र सोऽभवत्
etasminnaṁtare tasya pakṣināthasya tatkṣaṇāt ubhau pakṣau gatau nāśaṁ ruṇḍākāro'tra so'bhavat
इसी बीच उस पक्षिराज के दोनों पंख उसी क्षण नष्ट हो गए, और वह यहाँ मुण्डाकार (धड़ मात्र) हो गया।
श्लोक 40 (skanda.6.81.40)
मांसपिंडमयो रौद्रः सर्वरोगविवर्जितः ॥ अशक्तश्च तथा गन्तुं पदमात्रमपि क्वचित्
māṁsapiṁḍamayo raudraḥ sarvarogavivarjitaḥ aśaktaśca tathā gantuṁ padamātramapi kvacit
वह एक भयानक मांसपिंड मात्र रह गया; यद्यपि वह किसी रोग से रहित था, फिर भी वह एक पग भर भी चलने में असमर्थ हो गया।