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नागर खण्ड · अध्याय 80

सुपर्णाख्यमाहात्म्ये विष्णुदर्शनमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 79अध्याय-सूचीअध्याय 81

श्लोक 1 (skanda.6.80.1)

ऋषय ऊचुः॥ यदेतद्भवता प्रोक्तं तेजोवीर्यसमन्वितः॥ गरुडस्तेन संजज्ञे मुनीनां होमकर्मणा

ṛṣaya ūcuḥ yadetadbhavatā proktaṁ tejovīryasamanvitaḥ garuḍastena saṁjajñe munīnāṁ homakarmaṇā

ऋषियों ने कहा -- आपने जो बताया कि तेज और बल से युक्त गरुड़ मुनियों के उस होम-कर्म से उत्पन्न हुए,

श्लोक 2 (skanda.6.80.2)

स कथं तत्र संभूत एतन्नो विस्तराद्वद॥ विनतायाः समुद्भूत इत्येषा श्रूयते श्रुतिः

sa kathaṁ tatra saṁbhūta etanno vistarādvada vinatāyāḥ samudbhūta ityeṣā śrūyate śrutiḥ

"वे वहाँ कैसे उत्पन्न हुए, यह हमें विस्तार से बताइये। हमने तो यह भी सुना है कि वे विनता से उत्पन्न हुए थे।"

श्लोक 3 (skanda.6.80.3)

सूत उवाच॥ योऽसावाथर्वणैर्मंत्रैः कलशश्चाभिमन्त्रितः॥ तैर्मंत्रैर्वालखिल्यैश्च महाऽमर्षसमन्वितैः

sūta uvāca yo'sāvātharvaṇairmaṁtraiḥ kalaśaścābhimantritaḥ tairmaṁtrairvālakhilyaiśca mahā'marṣasamanvitaiḥ

सूत जी बोले -- अथर्ववेदीय मंत्रों से अभिमंत्रित किया गया वह कलश, महाक्रोध से युक्त उन वालखिल्यों के उन्हीं मंत्रों से,

श्लोक 4 (skanda.6.80.4)

निवारितैश्च दक्षेण सूचिते विहगाधिपे॥ कश्यपस्तं समादाय कलशं प्रययौ गृहम्

nivāritaiśca dakṣeṇa sūcite vihagādhipe kaśyapastaṁ samādāya kalaśaṁ prayayau gṛham

दक्ष द्वारा रोके जाने पर, पक्षियों के भावी राजा के रूप में निर्दिष्ट होने पर, कश्यप उस कलश को लेकर अपने घर गये।

श्लोक 5 (skanda.6.80.5)

ततः प्रोवाच संहृष्टो विनतां दयितां निजाम्॥ एतत्पिब जलं भद्रे मन्त्रपूतं महत्तरम्

tataḥ provāca saṁhṛṣṭo vinatāṁ dayitāṁ nijām etatpiba jalaṁ bhadre mantrapūtaṁ mahattaram

तब प्रसन्न होकर उन्होंने अपनी प्रिय पत्नी विनता से कहा -- "हे भद्रे! इस मंत्र से पवित्र किये गये अत्यंत शक्तिशाली जल को पी लो,"

श्लोक 6 (skanda.6.80.6)

येन ते जायते पुत्रः सहस्राक्षाधिको बली॥ तेजस्वी च यशस्वी च अजेयः सर्वदानवैः

yena te jāyate putraḥ sahasrākṣādhiko balī tejasvī ca yaśasvī ca ajeyaḥ sarvadānavaiḥ

"जिससे तुम्हें सहस्राक्ष (इन्द्र) से भी अधिक बलशाली, तेजस्वी, यशस्वी और समस्त दानवों के लिये अजेय पुत्र उत्पन्न होगा।"

श्लोक 7 (skanda.6.80.7)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तत्क्षणादेव संपपौ॥ तत्तोयं सा वरारोहा सद्यो गर्भं ततो दधे

tasya tadvacanaṁ śrutvā tatkṣaṇādeva saṁpapau tattoyaṁ sā varārohā sadyo garbhaṁ tato dadhe

उनका यह वचन सुनकर उस सुन्दरी ने उसी क्षण वह जल पी लिया, और तत्काल ही गर्भ धारण कर लिया।

श्लोक 8 (skanda.6.80.8)

एवं तज्जलपानेन तेजोवीर्यसमन्वितः॥ कश्यपाद्गरुडो जज्ञे सर्वसर्पभयावहः

evaṁ tajjalapānena tejovīryasamanvitaḥ kaśyapādgaruḍo jajñe sarvasarpabhayāvahaḥ

इस प्रकार उस जल-पान से कश्यप से तेज और बल से युक्त गरुड़ उत्पन्न हुए, जो समस्त सर्पों के लिये भयंकर थे,

श्लोक 9 (skanda.6.80.9)

येनामृतं हृतं वीर्यात्परिभूय पुरंदरम्॥ मातृभक्तिपरीतेन सर्पाणां संनिवेदितम्

yenāmṛtaṁ hṛtaṁ vīryātparibhūya puraṁdaram mātṛbhaktiparītena sarpāṇāṁ saṁniveditam

जिन्होंने अपने पराक्रम से इन्द्र को पराजित कर अमृत का हरण किया और माता के प्रति भक्ति से युक्त होकर उसे सर्पों को अर्पित किया,

श्लोक 10 (skanda.6.80.10)

यो जज्ञे दयितो विष्णोर्वाहनत्वमुपागतः॥ ध्वजाग्रे तु रथस्यापि यः सदैव व्यवस्थितः

yo jajñe dayito viṣṇorvāhanatvamupāgataḥ dhvajāgre tu rathasyāpi yaḥ sadaiva vyavasthitaḥ

जो विष्णु के प्रिय होकर उनके वाहन के पद को प्राप्त हुए, और जो सदा उनके रथ की ध्वजा के अग्रभाग में भी स्थित रहते हैं,

श्लोक 11 (skanda.6.80.11)

येन पूर्वं तपस्तप्त्वा क्षेत्रेऽत्रैव महात्मना॥ त्रिनेत्रस्तुष्टिमानीतो गतपक्षेण धीमता

yena pūrvaṁ tapastaptvā kṣetre'traiva mahātmanā trinetrastuṣṭimānīto gatapakṣeṇa dhīmatā

जिन बुद्धिमान महात्मा ने पहले यहीं इसी क्षेत्र में तप करके, पंखविहीन होते हुए भी, त्रिनेत्र (शिव) को संतुष्ट किया था,

श्लोक 12 (skanda.6.80.12)

पक्षाप्तिर्येन संजाता यस्य भूयोऽपि तादृशी॥ देवदेवप्रसादेन विशिष्टा चाऽथ निर्मिता

pakṣāptiryena saṁjātā yasya bhūyo'pi tādṛśī devadevaprasādena viśiṣṭā cā'tha nirmitā

और जिससे उन्हें पंख पुनः प्राप्त हुए, और वे पंख देवाधिदेव की कृपा से पहले से भी विशिष्ट रूप में पुनः बनाये गये।

श्लोक 13 (skanda.6.80.13)

मुनय ऊचुः॥ कथं तस्य गतौ पक्षौ गरुडस्य महात्मनः॥ पुनर्लब्धौ कथं तेन कथं तुष्टो महेश्वरः॥ एतन्नो विस्तराद्ब्रूहि सूतपुत्र यथातथम्

munaya ūcuḥ kathaṁ tasya gatau pakṣau garuḍasya mahātmanaḥ punarlabdhau kathaṁ tena kathaṁ tuṣṭo maheśvaraḥ etanno vistarādbrūhi sūtaputra yathātatham

मुनियों ने कहा -- महात्मा गरुड़ के पंख कैसे गये, वे उन्हें पुनः कैसे प्राप्त हुए, और महेश्वर कैसे संतुष्ट हुए? हे सूतपुत्र! यह सब हमें यथार्थ रूप से विस्तार से बताइये।

श्लोक 14 (skanda.6.80.14)

सूत उवाच॥ पुरासीद्ब्राह्मणो मित्रं भृगुवंशकुलोद्वहः॥ गरुडस्य द्विजश्रेष्ठा बालभावादपि प्रभो

sūta uvāca purāsīdbrāhmaṇo mitraṁ bhṛguvaṁśakulodvahaḥ garuḍasya dvijaśreṣṭhā bālabhāvādapi prabho

सूत जी बोले -- हे प्रभो! पूर्वकाल में भृगुवंश में उत्पन्न एक ब्राह्मण था, जो बचपन से ही गरुड़ का मित्र था, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो!

श्लोक 15 (skanda.6.80.15)

तस्य कन्या पुरा जाता माधवी नाम संमता॥ रूपौदार्यसमोपेता सर्वलक्षणलक्षिता

tasya kanyā purā jātā mādhavī nāma saṁmatā rūpaudāryasamopetā sarvalakṣaṇalakṣitā

उसकी माधवी नामक एक सम्मानित कन्या पूर्वकाल में उत्पन्न हुई थी, जो रूप और औदार्य से सम्पन्न, समस्त शुभ लक्षणों से चिह्नित थी।

श्लोक 16 (skanda.6.80.16)

न देवी न च गन्धर्वी नासुरी न च पन्नगी॥ तादृग्रूपा महाभागा यादृशी सा सुमध्यमा

na devī na ca gandharvī nāsurī na ca pannagī tādṛgrūpā mahābhāgā yādṛśī sā sumadhyamā

न कोई देवी, न गन्धर्वी, न असुर-कन्या, न नाग-कन्या ऐसे रूप वाली थी जैसी वह सुमध्यमा महाभागा थी।

श्लोक 17 (skanda.6.80.17)

अथ तस्या वरार्थाय गरुडं विहगाधिपम्॥ स प्रोवाच परं मित्रं विनयावनतः स्थितः

atha tasyā varārthāya garuḍaṁ vihagādhipam sa provāca paraṁ mitraṁ vinayāvanataḥ sthitaḥ

तब उसके लिये वर की खोज हेतु उसने विनयपूर्वक झुककर अपने परम मित्र पक्षिराज गरुड़ से कहा --

श्लोक 18 (skanda.6.80.18)

एतस्या मम कन्याया वरं त्वं विहगाधिप॥ सदृशं वीक्षयस्वाद्य येन तस्मै ददाम्यहम्

etasyā mama kanyāyā varaṁ tvaṁ vihagādhipa sadṛśaṁ vīkṣayasvādya yena tasmai dadāmyaham

"हे विहगाधिप! आज मेरी इस कन्या के लिये एक योग्य वर देखो, जिसे मैं उसे प्रदान कर सकूँ।"

श्लोक 19 (skanda.6.80.19)

गरुड उवाच॥ मम पृष्ठं समारुह्य समस्तं क्षितिमंडलम्॥ त्वं भ्रमस्व द्विजश्रेष्ठ गृहीत्वेमां च कन्यकाम्

garuḍa uvāca mama pṛṣṭhaṁ samāruhya samastaṁ kṣitimaṁḍalam tvaṁ bhramasva dvijaśreṣṭha gṛhītvemāṁ ca kanyakām

गरुड़ ने कहा -- हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! मेरी पीठ पर सवार होकर इस कन्या को साथ लेकर सम्पूर्ण पृथ्वीमंडल में घूमो।

श्लोक 20 (skanda.6.80.20)

ततस्तस्याः कुमार्या वै अनुरूपं गुणान्वितम्॥ स्वयं चाहर भर्तारमेषा मैत्री ममोद्भवा

tatastasyāḥ kumāryā vai anurūpaṁ guṇānvitam svayaṁ cāhara bhartārameṣā maitrī mamodbhavā

"फिर इस कुमारी के लिये स्वयं अनुरूप, गुणवान वर खोज लो; यही मेरी उत्पन्न हुई मित्रता है।"

श्लोक 21 (skanda.6.80.21)

सूत उवाच॥ एवमुक्तोऽथ विप्रः स तत्क्षणात्कन्यया सह॥ आरूढो गारुडं पृष्ठं वरार्थाय द्विजोत्तमाः

sūta uvāca evamukto'tha vipraḥ sa tatkṣaṇātkanyayā saha ārūḍho gāruḍaṁ pṛṣṭhaṁ varārthāya dvijottamāḥ

सूत जी बोले -- इस प्रकार कहे जाने पर वह ब्राह्मण तत्क्षण ही कन्या सहित गरुड़ की पीठ पर सवार होकर वर की खोज के लिये चला गया, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो!

श्लोक 22 (skanda.6.80.22)

यंयं पश्यति विप्रः स कुमारं तरुणाकृतिम्॥ स स नो तस्य चित्तांते वर्ततेस्म कथंचन

yaṁyaṁ paśyati vipraḥ sa kumāraṁ taruṇākṛtim sa sa no tasya cittāṁte vartatesma kathaṁcana

वह ब्राह्मण जिस-जिस सुन्दराकृति कुमार को देखता, वह किसी भी प्रकार उसके मन को संतुष्ट नहीं कर पाता था।

श्लोक 23 (skanda.6.80.23)

कस्यचिद्रूपमत्युग्रं न कुलं च सुनिर्मलम्॥ कुलं रूपं च यस्य स्यात्तस्य नो गुणसंचयः

kasyacidrūpamatyugraṁ na kulaṁ ca sunirmalam kulaṁ rūpaṁ ca yasya syāttasya no guṇasaṁcayaḥ

किसी का रूप अत्यंत उग्र होता तो कुल शुद्ध न होता; जिसका कुल और रूप दोनों अच्छे होते, उसमें गुणों का संग्रह न होता;

श्लोक 24 (skanda.6.80.24)

यस्य वा गुणसन्दोहस्तस्य नो रूपमुत्तमम्॥ पक्षपातं च वित्तं च तथान्यद्वरलक्षणम्

yasya vā guṇasandohastasya no rūpamuttamam pakṣapātaṁ ca vittaṁ ca tathānyadvaralakṣaṇam

और जिसमें गुणों की प्रचुरता होती, उसका रूप उत्तम न होता -- इस प्रकार उसे निष्पक्षता, धन तथा अन्य वर-लक्षणों की भी आवश्यकता प्रतीत होती।

श्लोक 25 (skanda.6.80.25)

एवं वर्षसहस्रांते भ्रमतस्तस्यभूतलम्॥ विप्रस्य पक्षिनाथस्य वरार्थाय द्रिजोत्तमाः

evaṁ varṣasahasrāṁte bhramatastasyabhūtalam viprasya pakṣināthasya varārthāya drijottamāḥ

इस प्रकार, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वर की खोज में उस ब्राह्मण और पक्षिनाथ के पूरी पृथ्वी पर घूमते-घूमते एक सहस्र वर्ष बीत गये।

श्लोक 26 (skanda.6.80.26)

कदाचिदथ तौ श्रान्तौ भ्रममाणावितस्ततः॥ क्षेत्रेऽत्रैव समायातौ वासुदेवदिदृक्षया

kadācidatha tau śrāntau bhramamāṇāvitastataḥ kṣetre'traiva samāyātau vāsudevadidṛkṣayā

तब एक बार, इधर-उधर घूमते-घूमते थके हुए, वे दोनों वासुदेव के दर्शन की इच्छा से इसी क्षेत्र में आ पहुँचे।

श्लोक 27 (skanda.6.80.27)

श्वेतद्वीपं समालोक्य तथान्यां बदरीं शुभाम्॥ क्षीरोदं च सवैकुण्ठं तथान्यं तस्य संश्रयम्

śvetadvīpaṁ samālokya tathānyāṁ badarīṁ śubhām kṣīrodaṁ ca savaikuṇṭhaṁ tathānyaṁ tasya saṁśrayam

श्वेतद्वीप, तथा अन्य शुभ बदरी, क्षीरसागर सहित वैकुण्ठ तथा विष्णु के अन्य आश्रय-स्थानों को देखकर,

श्लोक 28 (skanda.6.80.28)

अथ ताभ्यां मुनिर्दृष्टो नारदो ब्रह्मसंभवः॥ सांत्वपूर्वं तदा पृष्टो विष्णुं ब्रह्म सनातनम्

atha tābhyāṁ munirdṛṣṭo nārado brahmasaṁbhavaḥ sāṁtvapūrvaṁ tadā pṛṣṭo viṣṇuṁ brahma sanātanam

तब उन दोनों ने ब्रह्मपुत्र नारद मुनि को देखा, और स्नेहपूर्वक अभिवादन कर उनसे सनातन ब्रह्मस्वरूप विष्णु के विषय में पूछा --

श्लोक 29 (skanda.6.80.29)

क्व देवः पुंडरीकाक्षः सांप्रतं वर्तते मुने॥ विष्णुस्थानानि सर्वाणि वीक्षितानि समंततः॥ आवाभ्यां संप्रहृष्टाभ्यां न संदृष्टः स केशवः

kva devaḥ puṁḍarīkākṣaḥ sāṁprataṁ vartate mune viṣṇusthānāni sarvāṇi vīkṣitāni samaṁtataḥ āvābhyāṁ saṁprahṛṣṭābhyāṁ na saṁdṛṣṭaḥ sa keśavaḥ

"हे मुने! भगवान् पुण्डरीकाक्ष अभी कहाँ हैं? हमने विष्णु के सभी स्थानों को चारों ओर देख लिया है, फिर भी हम दोनों हर्षित होते हुए भी उन केशव के दर्शन नहीं कर सके।"

श्लोक 30 (skanda.6.80.30)

नारद उवाच॥ जलशायिस्वरूपेण यावन्मासचतुष्टयम्॥ हाटकेश्वरजे क्षेत्रे स संतिष्ठति सर्वदा

nārada uvāca jalaśāyisvarūpeṇa yāvanmāsacatuṣṭayam hāṭakeśvaraje kṣetre sa saṁtiṣṭhati sarvadā

नारद ने कहा -- चार मासों तक वे जलशायी के रूप में सदा हाटकेश्वर क्षेत्र में स्थित रहते हैं।

श्लोक 31 (skanda.6.80.31)

तस्मात्तद्दर्शनार्थाय गम्यतां तत्र मा चिरम्॥ येन सन्दर्शनं याति द्वाभ्यामपि स चक्रधृक्

tasmāttaddarśanārthāya gamyatāṁ tatra mā ciram yena sandarśanaṁ yāti dvābhyāmapi sa cakradhṛk

"अतः उनके दर्शन के लिये बिना विलम्ब वहाँ चलो, जिससे तुम दोनों उन चक्रधारी के दर्शन कर सको।"

श्लोक 32 (skanda.6.80.32)

अहमप्येव तत्रैव प्रस्थितस्तस्य दर्शनात्॥ प्रस्थितश्च त्वया युको देवकार्येण केनचित्

ahamapyeva tatraiva prasthitastasya darśanāt prasthitaśca tvayā yuko devakāryeṇa kenacit

"मैं भी उनके दर्शन के लिये वहीं जा रहा हूँ, तथा किसी देवकार्य के लिये भी प्रस्थित हुआ हूँ; तुम मेरे साथ चलो।"

श्लोक 33 (skanda.6.80.33)

अथ तौ पक्षिविप्रेन्द्रौ स च ब्रह्मसुतो मुनिः॥ प्राप्ताः सर्वे स्थितो यत्र जलशायी जनार्दनः

atha tau pakṣiviprendrau sa ca brahmasuto muniḥ prāptāḥ sarve sthito yatra jalaśāyī janārdanaḥ

तब वे दोनों -- पक्षिराज और श्रेष्ठ ब्राह्मण -- तथा वे ब्रह्मपुत्र मुनि, सब मिलकर वहाँ पहुँचे, जहाँ जलशायी जनार्दन शयन कर रहे थे।

श्लोक 34 (skanda.6.80.34)

अथ दृष्ट्वा महत्तेजो वैष्णवं दूरतोऽपि तम्॥ ब्राह्मणं गरुडः प्राह नारदश्च मुनीश्वरः

atha dṛṣṭvā mahattejo vaiṣṇavaṁ dūrato'pi tam brāhmaṇaṁ garuḍaḥ prāha nāradaśca munīśvaraḥ

तब दूर से ही उस महातेजस्वी वैष्णव तेज को देखकर गरुड़ और मुनीश्वर नारद ने उस ब्राह्मण से कहा --

श्लोक 35 (skanda.6.80.35)

अत्रैव त्वं द्विजश्रेष्ठ तिष्ठ दूरेऽपि तेजसः॥ वैष्णवस्य सुतायुक्तः कल्पांताग्निसमम्

atraiva tvaṁ dvijaśreṣṭha tiṣṭha dūre'pi tejasaḥ vaiṣṇavasya sutāyuktaḥ kalpāṁtāgnisamam

"हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! तुम अपनी कन्या सहित यहीं, इस कल्पांत-अग्नि के समान वैष्णव तेज से दूर ही रुक जाओ।"

श्लोक 36 (skanda.6.80.36)

नो चेत्संपत्स्यसे भस्म पतंग इव पावकम्॥ समासाद्य निशायोगे मूढं भावं समाश्रितः

no cetsaṁpatsyase bhasma pataṁga iva pāvakam samāsādya niśāyoge mūḍhaṁ bhāvaṁ samāśritaḥ

"अन्यथा, रात्रि में अज्ञानतावश उस अग्नि के निकट पहुँचकर, पतंगे की भाँति तुम भस्म हो जाओगे।"

श्लोक 37 (skanda.6.80.37)

आवाभ्यां तत्प्रसादेन सोढमेतत्सुदुःसहम्॥ न करोति शरीरार्ति तथान्यदपि कुत्सितम्

āvābhyāṁ tatprasādena soḍhametatsuduḥsaham na karoti śarīrārti tathānyadapi kutsitam

"हम दोनों उनकी कृपा से इस अत्यंत दुःसह तेज को सहन कर सकते हैं, परन्तु तुम्हारे शरीर को यह पीड़ा तथा अन्य अनिष्ट भी पहुँचा सकता है।"

श्लोक 38 (skanda.6.80.38)

एवं तं ब्राह्मणं तत्र मुक्त्वा दूरे सुतान्वितम्॥ गतौ तौ तत्र संसुप्तस्तोये यत्र जनार्दनः

evaṁ taṁ brāhmaṇaṁ tatra muktvā dūre sutānvitam gatau tau tatra saṁsuptastoye yatra janārdanaḥ

इस प्रकार उस ब्राह्मण को कन्या सहित दूर छोड़कर, वे दोनों वहाँ गये, जहाँ जनार्दन जल में शयन कर रहे थे,

श्लोक 39 (skanda.6.80.39)

दिव्यस्तुतिपरौ मूर्ध्नि धृतहस्तांजलीपुटौ॥ पुलकांकितसर्वांगावानन्दाश्रुप्लुताननौ

divyastutiparau mūrdhni dhṛtahastāṁjalīpuṭau pulakāṁkitasarvāṁgāvānandāśruplutānanau

दिव्य स्तुति में तत्पर, सिर पर हाथ जोड़े हुए, पुलकित सर्वांग तथा आनन्दाश्रुओं से भीगे मुख वाले,

श्लोक 40 (skanda.6.80.40)

त्रिःपरिकम्य तं देवमष्टांगं प्रणतौ हरिम्॥ दृष्टवन्तौ च पादांते संनिविष्टां समुद्रजाम्

triḥparikamya taṁ devamaṣṭāṁgaṁ praṇatau harim dṛṣṭavantau ca pādāṁte saṁniviṣṭāṁ samudrajām

उन देव हरि की तीन बार प्रदक्षिणा कर, अष्टांग प्रणाम कर, उन्होंने उनके चरणों के समीप बैठी समुद्र-कन्या (लक्ष्मी) को देखा,

श्लोक 41 (skanda.6.80.41)

पादसंवाहनासक्तां विष्णुवक्त्राहितेक्षणाम्॥ अथापरां वयोवृद्धां श्वेतवस्त्रावगुंठिताम्

pādasaṁvāhanāsaktāṁ viṣṇuvaktrāhitekṣaṇām athāparāṁ vayovṛddhāṁ śvetavastrāvaguṁṭhitām

जो चरण-सेवा में तत्पर, विष्णु के मुख पर दृष्टि टिकाये हुए थीं; और फिर एक अन्य वृद्धावस्था वाली, श्वेत वस्त्रों से आवृत स्त्री को,

श्लोक 42 (skanda.6.80.42)

सन्निविष्टां तदभ्याशे सम्यग्ध्यानपरायणाम्॥ द्वादशार्कप्रभायुक्तां कृशांगीं पुलकान्विताम्

sanniviṣṭāṁ tadabhyāśe samyagdhyānaparāyaṇām dvādaśārkaprabhāyuktāṁ kṛśāṁgīṁ pulakānvitām

जो उनके समीप बैठी, भलीभाँति ध्यान में तत्पर, बारह सूर्यों के समान कान्तिमान, कृशांगी और पुलकित थीं।

श्लोक 43 (skanda.6.80.43)

अथ तौ विष्णुना हर्षादुभावपि प्रहर्षितौ॥ संभाषितौ च संपृष्टौ यदर्थं च समागतौ

atha tau viṣṇunā harṣādubhāvapi praharṣitau saṁbhāṣitau ca saṁpṛṣṭau yadarthaṁ ca samāgatau

तब विष्णु ने हर्षपूर्वक उन दोनों को अत्यंत प्रसन्न करते हुए उनसे बातचीत की और पूछा कि वे किस उद्देश्य से आये हैं।

श्लोक 44 (skanda.6.80.44)

श्रीनारद उवाच॥ अहं हि सुरकार्येण संप्राप्योऽत्र तवांतिकम्॥ गरुडो वै ब्राह्मणाय यन्मां पृच्छसि केशव

śrīnārada uvāca ahaṁ hi surakāryeṇa saṁprāpyo'tra tavāṁtikam garuḍo vai brāhmaṇāya yanmāṁ pṛcchasi keśava

श्रीनारद ने कहा -- हे केशव! मैं तो देवकार्य से आपके समीप यहाँ आया हूँ; परन्तु गरुड़ एक ब्राह्मण के लिये आये हैं, यह जो आप मुझसे पूछते हैं।

श्लोक 45 (skanda.6.80.45)

श्रीभगवानुवाच॥ कच्चित्क्षेमं मुनिश्रेष्ठ सर्वेषां त्रिदिवौकसाम्॥ कच्चिन्नेंद्रस्य संजातं भयं दानवसंभवम्

śrībhagavānuvāca kaccitkṣemaṁ muniśreṣṭha sarveṣāṁ tridivaukasām kaccinneṁdrasya saṁjātaṁ bhayaṁ dānavasaṁbhavam

श्रीभगवान् ने कहा -- हे मुनिश्रेष्ठ! क्या स्वर्गवासियों का कुशल है? क्या इन्द्र को दानवों से उत्पन्न कोई भय तो नहीं हुआ है?

श्लोक 46 (skanda.6.80.46)

यज्ञभागं लभंते स्म कच्चिद्देवाः सवासवाः॥ कच्चिन्न दानवः कश्चिदुत्कटोऽभूद्धरातले

yajñabhāgaṁ labhaṁte sma kacciddevāḥ savāsavāḥ kaccinna dānavaḥ kaścidutkaṭo'bhūddharātale

क्या देवगण इन्द्र सहित यज्ञ-भाग प्राप्त कर रहे हैं? क्या पृथ्वी पर कोई दानव अत्यंत प्रबल तो नहीं हो गया है?

श्लोक 47 (skanda.6.80.47)

श्रीनारद उवाच॥ सांप्रतं धरणी प्राप्ता चतुर्वक्त्रस्य संनिधौ॥ रोरूयमाणा भारार्ता दानवैः पीडिता भृशम्॥ प्रोवाच पद्मजं तत्र दुःखेन महताऽन्विता

śrīnārada uvāca sāṁprataṁ dharaṇī prāptā caturvaktrasya saṁnidhau rorūyamāṇā bhārārtā dānavaiḥ pīḍitā bhṛśam provāca padmajaṁ tatra duḥkhena mahatā'nvitā

श्रीनारद ने कहा -- अभी हाल ही में भार से पीड़ित, दानवों से अत्यंत सताई गई पृथ्वी रोती हुई चतुर्मुख ब्रह्मा के समीप आई और अत्यंत दुःख से युक्त होकर पद्मज से बोली --

श्लोक 48 (skanda.6.80.48)

धरण्युवाच॥ कालनेमिर्हतो योऽसौ विष्णुनाप्रभविष्णुना॥ उग्रसेनसुतः कंसः संभूतः स महासुरः

dharaṇyuvāca kālanemirhato yo'sau viṣṇunāprabhaviṣṇunā ugrasenasutaḥ kaṁsaḥ saṁbhūtaḥ sa mahāsuraḥ

पृथ्वी ने कहा -- जो कालनेमि प्रभावशाली विष्णु द्वारा मारा गया था, वही महादैत्य उग्रसेन के पुत्र कंस के रूप में उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 49 (skanda.6.80.49)

अरिष्टो धेनुकः केशी प्रलम्बोनाम चापरः॥ तथान्या तु महारौद्रा पूतना नाम राक्षसी

ariṣṭo dhenukaḥ keśī pralambonāma cāparaḥ tathānyā tu mahāraudrā pūtanā nāma rākṣasī

अरिष्ट, धेनुक, केशी तथा प्रलम्ब नामक एक और, तथा एक अन्य अत्यंत भयंकर पूतना नामक राक्षसी --

श्लोक 50 (skanda.6.80.50)

इतश्चेतश्च धावद्भिर्दानवैरेभिरेव च॥ वृथा मे जायते पीडा तथान्यैरपि दारुणैः

itaścetaśca dhāvadbhirdānavairebhireva ca vṛthā me jāyate pīḍā tathānyairapi dāruṇaiḥ

इधर-उधर दौड़ते इन्हीं दानवों तथा अन्य भयंकर दानवों से मुझे व्यर्थ ही पीड़ा हो रही है।

श्लोक 51 (skanda.6.80.51)

ऊर्ध्वबाहुस्तथा जातो मर्त्यलोके जनोऽधुना॥ बहुत्वान्न प्रमाति स्म कथंचिद्धि ममोपरि

ūrdhvabāhustathā jāto martyaloke jano'dhunā bahutvānna pramāti sma kathaṁciddhi mamopari

और अब मृत्युलोक में ऊर्ध्वबाहु नामक एक जन भी उत्पन्न हुआ है; इनकी अधिकता के कारण मैं अब किसी भी प्रकार उन्हें अपने ऊपर सहन नहीं कर पा रही हूँ।

श्लोक 52 (skanda.6.80.52)

भारावतरणं देव न करिष्यसि चाशु चेत्॥ रसातलं प्रयास्यामि तदाऽहं नात्र संशयः

bhārāvataraṇaṁ deva na kariṣyasi cāśu cet rasātalaṁ prayāsyāmi tadā'haṁ nātra saṁśayaḥ

हे देव! यदि आप शीघ्र ही भार-अवतरण नहीं करेंगे, तो मैं निश्चय ही रसातल में चली जाऊँगी, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 53 (skanda.6.80.53)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणा लोककर्तृणा॥ संमंत्र्य विबुधैः सार्धं प्रेषितोऽहं तवांतिकम्

tasyāstadvacanaṁ śrutvā brahmaṇā lokakartṛṇā saṁmaṁtrya vibudhaiḥ sārdhaṁ preṣito'haṁ tavāṁtikam

उसका यह वचन सुनकर लोक-कर्ता ब्रह्मा ने देवताओं के साथ परामर्श कर मुझे आपके पास भेजा है।

श्लोक 54 (skanda.6.80.54)

प्रोक्तव्यो भगवान्वाक्यं त्वया देवो जनार्दनः॥ यथाऽवतीर्य भूपृष्ठे भारमस्याः प्रणाशयेत्

proktavyo bhagavānvākyaṁ tvayā devo janārdanaḥ yathā'vatīrya bhūpṛṣṭhe bhāramasyāḥ praṇāśayet

आपसे यह कहना है कि भगवान् जनार्दन पृथ्वी पर अवतीर्ण होकर उसके भार का नाश करें।

श्लोक 55 (skanda.6.80.55)

तस्माद्भूभितले देव कृत्वा जन्म स्वयं विभो॥ भारं नाशय मेदिन्या एतदर्थमिहागतः

tasmādbhūbhitale deva kṛtvā janma svayaṁ vibho bhāraṁ nāśaya medinyā etadarthamihāgataḥ

अतः, हे विभो! स्वयं पृथ्वी पर जन्म लेकर पृथ्वी का भार नष्ट कीजिये -- इसी उद्देश्य से मैं यहाँ आया हूँ।

श्लोक 56 (skanda.6.80.56)

श्रीभगवानुवाच॥ एवं मुने करिष्यामि संमंत्र्य ब्रह्मणा सह॥ भारावतरणं भूमेः साकं देवैः सवासवैः

śrībhagavānuvāca evaṁ mune kariṣyāmi saṁmaṁtrya brahmaṇā saha bhārāvataraṇaṁ bhūmeḥ sākaṁ devaiḥ savāsavaiḥ

श्रीभगवान् ने कहा -- हे मुने! ऐसा ही करूँगा; ब्रह्मा से परामर्श कर, इन्द्र सहित देवताओं के साथ मिलकर मैं पृथ्वी के भार का अवतरण करूँगा।

श्लोक 57 (skanda.6.80.57)

एवमुक्त्वाऽथ तं विष्णुर्नारदं मुनिपुंगवम्॥ ततश्च गरुडं प्राह त्वं किमर्थमिहागतः

evamuktvā'tha taṁ viṣṇurnāradaṁ munipuṁgavam tataśca garuḍaṁ prāha tvaṁ kimarthamihāgataḥ

ऐसा उस मुनिश्रेष्ठ नारद से कहकर विष्णु ने फिर गरुड़ से कहा -- "तुम किस उद्देश्य से यहाँ आये हो?"

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