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नागर खण्ड · अध्याय 79

वालखिल्याश्रममाहात्म्यकथनम्

अध्याय 78अध्याय-सूचीअध्याय 80

श्लोक 1 (skanda.6.79.1)

सूत उवाच॥ तस्यैव दक्षिणे भागे वालखिल्यैः प्रतिष्ठितम्॥ लिंगमस्ति सुविख्यातं सर्वपातकनाशनम्

sūta uvāca tasyaiva dakṣiṇe bhāge vālakhilyaiḥ pratiṣṭhitam liṁgamasti suvikhyātaṁ sarvapātakanāśanam

सूत जी बोले -- उसी के दक्षिण भाग में वालखिल्यों द्वारा प्रतिष्ठित एक अत्यंत प्रसिद्ध, समस्त पापों का नाश करने वाला लिंग है।

श्लोक 2 (skanda.6.79.2)

यमाराध्य च तैः पूर्वं शक्रामर्षसमन्वितैः॥ गरुडो जनितः पक्षी ख्यातो विष्णुरथोऽत्र यः

yamārādhya ca taiḥ pūrvaṁ śakrāmarṣasamanvitaiḥ garuḍo janitaḥ pakṣī khyāto viṣṇuratho'tra yaḥ

जिसकी आराधना कर, पहले इन्द्र के प्रति क्रोध से युक्त उन्हीं वालखिल्यों ने गरुड़ पक्षी को उत्पन्न किया था, जो यहाँ विष्णु के वाहन के रूप में विख्यात है।

श्लोक 3 (skanda.6.79.3)

ऋषय ऊचुः॥ कथं तेषां समुत्पन्नः शक्रस्योपरि सूतज॥ प्रकोपो वालखिल्यानां संजज्ञे गरुडः कथम्

ṛṣaya ūcuḥ kathaṁ teṣāṁ samutpannaḥ śakrasyopari sūtaja prakopo vālakhilyānāṁ saṁjajñe garuḍaḥ katham

ऋषियों ने कहा -- हे सूतपुत्र! उनका इन्द्र के प्रति क्रोध कैसे उत्पन्न हुआ, और वालखिल्यों से गरुड़ किस प्रकार उत्पन्न हुए?

श्लोक 4 (skanda.6.79.4)

सूत उवाच॥ पुरा प्रजापतिर्दक्षस्तस्मिन्क्षेत्रे सुशोभने॥ चकार विधिवद्यज्ञं संपूर्णवरदक्षिणम्

sūta uvāca purā prajāpatirdakṣastasminkṣetre suśobhane cakāra vidhivadyajñaṁ saṁpūrṇavaradakṣiṇam

सूत जी बोले -- प्राचीन काल में प्रजापति दक्ष ने उस सुशोभित क्षेत्र में विधिपूर्वक, समस्त वर और दक्षिणा से युक्त यज्ञ किया।

श्लोक 5 (skanda.6.79.5)

ततः शक्रादयो देवाः सहायार्थं निमंत्रिताः॥ दक्षेण मुनयश्चैव तथा राजर्षयोऽमलाः

tataḥ śakrādayo devāḥ sahāyārthaṁ nimaṁtritāḥ dakṣeṇa munayaścaiva tathā rājarṣayo'malāḥ

तब दक्ष ने सहायता के लिये इन्द्र आदि देवताओं, मुनियों तथा निर्मल राजर्षियों को आमंत्रित किया,

श्लोक 6 (skanda.6.79.6)

तथा वेदविदो विप्रा यज्ञकर्मविचक्षणाः॥ गृहस्थाश्रमिणो ये च ये चारण्यनिवासिनः

tathā vedavido viprā yajñakarmavicakṣaṇāḥ gṛhasthāśramiṇo ye ca ye cāraṇyanivāsinaḥ

तथा वेदज्ञ, यज्ञकर्म में निपुण ब्राह्मणों को, गृहस्थाश्रमियों को और वन में निवास करने वालों को भी।

श्लोक 7 (skanda.6.79.7)

अथ ते वालखिल्याख्या मुनयः संशितव्रताः॥ एकां समिधमादाय साहाय्यार्थं प्रजापतेः॥ प्रस्थिता यज्ञवाटं तं भारार्ताः क्लेशसंयुताः

atha te vālakhilyākhyā munayaḥ saṁśitavratāḥ ekāṁ samidhamādāya sāhāyyārthaṁ prajāpateḥ prasthitā yajñavāṭaṁ taṁ bhārārtāḥ kleśasaṁyutāḥ

तब दृढ़व्रती वालखिल्य नामक मुनि, प्रजापति की सहायता के लिये एक-एक समिधा लेकर, बोझ से पीड़ित तथा क्लेशयुक्त होकर उस यज्ञशाला की ओर चल पड़े।

श्लोक 8 (skanda.6.79.8)

अथ तेषां समस्तानां मार्गे गोष्पदमागतम्॥ जलपूर्णं समायातमकालजलदागमे

atha teṣāṁ samastānāṁ mārge goṣpadamāgatam jalapūrṇaṁ samāyātamakālajaladāgame

तब उन सबके मार्ग में अकालवर्षा से भरा हुआ एक जलपूर्ण गोखुर (गाय के खुर जितना गड्ढा) आ गया।

श्लोक 9 (skanda.6.79.9)

ततस्तरीतुकामास्ते क्लिश्यमाना इतस्ततः॥ समिद्भारश्रमोपेता देवराजेन वीक्षिताः

tatastarītukāmāste kliśyamānā itastataḥ samidbhāraśramopetā devarājena vīkṣitāḥ

तब उसे पार करने की इच्छा से इधर-उधर क्लेश उठाते, समिधाओं के भार से थके हुए वे मुनि देवराज इन्द्र द्वारा देखे गये,

श्लोक 10 (skanda.6.79.10)

गच्छता तेन मार्गेण मखे दक्षप्रजापतेः॥ ततश्चिरं समालोक्य स्मितं कृत्वा स कौतुकात्॥ जगामाथ समुल्लंघ्य ऐश्वर्यमदगर्वितः

gacchatā tena mārgeṇa makhe dakṣaprajāpateḥ tataściraṁ samālokya smitaṁ kṛtvā sa kautukāt jagāmātha samullaṁghya aiśvaryamadagarvitaḥ

जो उसी मार्ग से दक्ष प्रजापति के यज्ञ की ओर जा रहे थे। तब देर तक उन्हें देखकर, कौतूहलवश मुस्कुराते हुए, वे ऐश्वर्य के मद से गर्वित होकर उन्हें लाँघकर चले गये।

श्लोक 11 (skanda.6.79.11)

ततस्ते कोपसंयुक्ताः शक्राद्दृष्ट्वा पराभवम्॥ निवृत्य स्वाश्रमं गत्वा चक्रुर्मंत्रं सनिश्चयम्

tataste kopasaṁyuktāḥ śakrāddṛṣṭvā parābhavam nivṛtya svāśramaṁ gatvā cakrurmaṁtraṁ saniścayam

तब इन्द्र से यह पराभव पाकर क्रोधित हुए वे अपने आश्रम को लौटकर, दृढ़ निश्चय के साथ विचार करने लगे --

श्लोक 12 (skanda.6.79.12)

शाक्रं पदं समासाद्य यस्मादेतेन पाप्मना॥ अतिक्रांता वयं सर्वे तस्मात्पात्यः स सत्पदात्

śākraṁ padaṁ samāsādya yasmādetena pāpmanā atikrāṁtā vayaṁ sarve tasmātpātyaḥ sa satpadāt

"इन्द्रपद को प्राप्त कर, इस पापी ने हम सब का अतिक्रमण किया है, अतः इसे उसके श्रेष्ठ पद से गिरा देना चाहिये।"

श्लोक 13 (skanda.6.79.13)

अन्यः शक्रः प्रकर्तव्यो मंत्रवीर्यसमुद्भवः॥ आथर्वणैर्महासूक्तैराभिचारिकसंभवैः

anyaḥ śakraḥ prakartavyo maṁtravīryasamudbhavaḥ ātharvaṇairmahāsūktairābhicārikasaṁbhavaiḥ

"अभिचार-विधि से उत्पन्न महान् अथर्ववेदीय सूक्तों द्वारा मंत्र-शक्ति से उत्पन्न एक अन्य इन्द्र बनाया जाए,"

श्लोक 14 (skanda.6.79.14)

येन व्यापाद्यते तेन शक्रोऽयं मदगर्वितः॥ मखमाहात्म्यसंपन्नः स्वल्पबुद्धिपराक्रमः

yena vyāpādyate tena śakro'yaṁ madagarvitaḥ makhamāhātmyasaṁpannaḥ svalpabuddhiparākramaḥ

"जिससे यह मद से गर्वित, यज्ञ की महिमा से युक्त परन्तु अल्पबुद्धि और अल्पपराक्रमी इन्द्र नष्ट हो जाए।"

श्लोक 15 (skanda.6.79.15)

ततस्ते शुचयो भूत्वा स्कंदसूक्तेन पावकम्॥ जुहुवुश्च दिवारात्रौ क्षुरिकोक्तेन सोद्यमाः

tataste śucayo bhūtvā skaṁdasūktena pāvakam juhuvuśca divārātrau kṣurikoktena sodyamāḥ

तत्पश्चात् शुद्ध होकर वे स्कन्दसूक्त से, तथा क्षुरिकोक्त विधि से यत्नपूर्वक दिन-रात अग्नि में हवन करने लगे,

श्लोक 16 (skanda.6.79.16)

गर्भोपनिषदेनैव नीलरुद्रैर्द्विजोत्तमाः॥ रुद्रशीर्षेण काम्येन विष्णुसूक्तयुतेन च

garbhopaniṣadenaiva nīlarudrairdvijottamāḥ rudraśīrṣeṇa kāmyena viṣṇusūktayutena ca

तथा गर्भोपनिषद् से, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! नीलरुद्र सूक्तों से, इच्छापूरक रुद्रशीर्ष से तथा विष्णुसूक्त से युक्त होकर,

श्लोक 17 (skanda.6.79.17)

निधाय कलशं मध्ये मंडलस्योदकावृतम्॥ होमांते तत्र संस्पर्शं चक्रुस्तस्य जलैः शुभैः

nidhāya kalaśaṁ madhye maṁḍalasyodakāvṛtam homāṁte tatra saṁsparśaṁ cakrustasya jalaiḥ śubhaiḥ

मण्डल के मध्य में जल से भरा कलश रखकर, होम की समाप्ति पर उन्होंने उसे उसके शुभ जल से स्पर्श किया।

श्लोक 18 (skanda.6.79.18)

एतस्मिन्नंतरे शक्रः प्रपश्यति सुदारुणान्॥ उत्पातानात्मनाशाय जायमानान्समंततः

etasminnaṁtare śakraḥ prapaśyati sudāruṇān utpātānātmanāśāya jāyamānānsamaṁtataḥ

इसी बीच इन्द्र को चारों ओर अपने विनाश के लिये अत्यंत भयंकर उत्पात उत्पन्न होते दिखाई देने लगे।

श्लोक 19 (skanda.6.79.19)

वामो बाहुश्च नेत्रं च मुहुः स्फुरति चास्य वै॥ न च पश्यति नासाग्रं जिह्वाग्रं च तथा हनुम्

vāmo bāhuśca netraṁ ca muhuḥ sphurati cāsya vai na ca paśyati nāsāgraṁ jihvāgraṁ ca tathā hanum

उसकी बाईं भुजा और बायाँ नेत्र बार-बार फड़कने लगे, और वह अपनी नासाग्र, जिह्वाग्र और ठोड़ी को भी नहीं देख पाता था।

श्लोक 20 (skanda.6.79.20)

शिरोहीनां तथा छायां गगने भास्करद्वयम्॥ अरुंधतीं ध्रुवं चैव न च विष्णुपदानि सः

śirohīnāṁ tathā chāyāṁ gagane bhāskaradvayam aruṁdhatīṁ dhruvaṁ caiva na ca viṣṇupadāni saḥ

उसे अपनी परछाईं सिरविहीन दिखाई देने लगी, आकाश में दो सूर्य दिखने लगे, अरुंधती और ध्रुव तारा भी दिखाई नहीं देते थे, न ही विष्णु के चरण-चिह्न।

श्लोक 21 (skanda.6.79.21)

न च मंदं न चाकाशे संस्थितां स्वर्धुनीं हरिः॥ स्वपन्पश्यति कृष्णांगीं नित्यं नारीं धृतायुधाम्

na ca maṁdaṁ na cākāśe saṁsthitāṁ svardhunīṁ hariḥ svapanpaśyati kṛṣṇāṁgīṁ nityaṁ nārīṁ dhṛtāyudhām

न शनि दिखाई देता, न आकाश में स्थित स्वर्गंगा; और सोते समय इन्द्र सदा एक श्यामांगी, शस्त्रधारिणी स्त्री को देखता था,

श्लोक 22 (skanda.6.79.22)

मुक्तकेशीं विवस्त्रां च कृष्णदंतां भयानकाम्॥ तान्दृष्ट्वा स महोत्पातान्देवराजो बृहस्पतिम्

muktakeśīṁ vivastrāṁ ca kṛṣṇadaṁtāṁ bhayānakām tāndṛṣṭvā sa mahotpātāndevarājo bṛhaspatim

जो खुले बालों वाली, वस्त्रहीन, काले दाँतों वाली और भयानक थी। इन महान उत्पातों को देखकर देवराज ने बृहस्पति से,

श्लोक 23 (skanda.6.79.23)

पप्रच्छ भयसंत्रस्तः किमेतदिति मे गुरो॥ जायंते सुमहोत्पाता दुर्निमित्तानि वै पृथक्

papraccha bhayasaṁtrastaḥ kimetaditi me guro jāyaṁte sumahotpātā durnimittāni vai pṛthak

भयभीत होकर पूछा -- "हे गुरो! यह क्या है? मुझे इतने बड़े-बड़े उत्पात और तरह-तरह के अपशकुन उत्पन्न हो रहे हैं।"

श्लोक 24 (skanda.6.79.24)

किं मे भविष्यति प्राज्ञ विनाशः सांप्रतं वद॥ किं वा त्रैलोक्यराज्यस्य किं वा वित्तादिकस्य च

kiṁ me bhaviṣyati prājña vināśaḥ sāṁprataṁ vada kiṁ vā trailokyarājyasya kiṁ vā vittādikasya ca

"हे प्राज्ञ! अभी मुझे बताइये -- क्या मेरा विनाश होगा, अथवा त्रैलोक्य-राज्य का, अथवा धन आदि का?"

श्लोक 25 (skanda.6.79.25)

बृहस्पतिरुवाच॥ ये त्वया मदमत्तेन वालखिल्या महर्षयः॥ उल्लंघिताः स्थिता मार्गे गोष्पदं तर्त्तुमिच्छवः

bṛhaspatiruvāca ye tvayā madamattena vālakhilyā maharṣayaḥ ullaṁghitāḥ sthitā mārge goṣpadaṁ tarttumicchavaḥ

बृहस्पति ने कहा -- हे शचीपते! मद में उन्मत्त होकर तुमने जिन वालखिल्य महर्षियों को मार्ग में लाँघ दिया था, जो गोखुर पार करना चाहते थे,

श्लोक 26 (skanda.6.79.26)

तैरेवाथर्वणैर्मंत्रैस्त्वकृतेऽस्ति शचीपते॥ कृतो होमः सुसंपूर्णः कलशश्चाभिमंत्रितः

tairevātharvaṇairmaṁtraistvakṛte'sti śacīpate kṛto homaḥ susaṁpūrṇaḥ kalaśaścābhimaṁtritaḥ

उन्हीं के द्वारा, तुम्हारी अनजाने में, अथर्ववेदीय मंत्रों से पूर्ण होम सम्पन्न किया गया है, और एक कलश अभिमंत्रित किया गया है,

श्लोक 27 (skanda.6.79.27)

युष्माकं सुविनाशाय सर्वदेवाधिनायकः॥ भविष्यति न संदेहो मंत्रैराथर्वणैर्हरिः

yuṣmākaṁ suvināśāya sarvadevādhināyakaḥ bhaviṣyati na saṁdeho maṁtrairātharvaṇairhariḥ

तुम्हारे सर्वनाश के लिये; अथर्ववेदीय मंत्रों से अवश्य ही एक नया सर्वदेवाधिनायक उत्पन्न होगा, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 28 (skanda.6.79.28)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सहस्राक्षो भयान्वितः॥ दक्षं गत्वा च दीनास्यः प्रोवाच तदनंतरम्

tasya tadvacanaṁ śrutvā sahasrākṣo bhayānvitaḥ dakṣaṁ gatvā ca dīnāsyaḥ provāca tadanaṁtaram

उसका यह वचन सुनकर भयभीत हुए सहस्राक्ष (इन्द्र) दक्ष के पास जाकर, दीन मुख से यह कहने लगे --

श्लोक 29 (skanda.6.79.29)

अस्मन्नाशाय मुनिभिर्वालखिल्यैः प्रजापते॥ प्रोद्यमो विहितः सम्यक्छक्रस्यान्यस्य वै कृते

asmannāśāya munibhirvālakhilyaiḥ prajāpate prodyamo vihitaḥ samyakchakrasyānyasya vai kṛte

"हे प्रजापते! वालखिल्य मुनियों ने हमारे विनाश के लिये पूरी तरह से एक अन्य इन्द्र बनाने का उद्यम किया है।"

श्लोक 30 (skanda.6.79.30)

तान्वारय स्वयं गत्वा यावन्नो जायते परः॥ शक्रोऽस्मद्ध्वंसनार्थाय नास्ति तेषामसाध्यता

tānvāraya svayaṁ gatvā yāvanno jāyate paraḥ śakro'smaddhvaṁsanārthāya nāsti teṣāmasādhyatā

"आप स्वयं जाकर उन्हें रोकिये, इससे पहले कि हमारे विनाश के लिये कोई अन्य इन्द्र उत्पन्न हो जाए; उनके लिये कुछ भी असाध्य नहीं है।"

श्लोक 31 (skanda.6.79.31)

अथ दक्षो द्रुतं गत्वा शक्राद्यैरमरैर्वृतः॥ प्रहसंस्तानुवाचेदं विनयेन समन्वितः

atha dakṣo drutaṁ gatvā śakrādyairamarairvṛtaḥ prahasaṁstānuvācedaṁ vinayena samanvitaḥ

तब दक्ष शीघ्र ही इन्द्र आदि देवताओं से घिरे हुए वहाँ गये, और अत्यंत विनयपूर्वक मुस्कुराते हुए उनसे यह बोले --

श्लोक 32 (skanda.6.79.32)

किमेतत्क्रियते विप्राः कर्म रौद्रतमं महत्॥ त्रैलोक्यं व्याकुलं येन सर्वमेतद्व्यवस्थितम्

kimetatkriyate viprāḥ karma raudratamaṁ mahat trailokyaṁ vyākulaṁ yena sarvametadvyavasthitam

"हे विप्रो! यह कैसा अत्यंत भयंकर कर्म किया जा रहा है, जिससे यह सारा त्रैलोक्य व्याकुल हो गया है?"

श्लोक 33 (skanda.6.79.33)

अथ ते दक्षमालोक्य समायातं स्वमाश्रयम्॥ संमुखाश्चाभ्ययुस्तूर्णं प्रगृहीतार्घ्यपाणयः

atha te dakṣamālokya samāyātaṁ svamāśrayam saṁmukhāścābhyayustūrṇaṁ pragṛhītārghyapāṇayaḥ

तब वे वालखिल्य, अपने आश्रम में आये हुए दक्ष को देखकर, अर्घ्य लिये हाथों में शीघ्र ही उनके सम्मुख गये,

श्लोक 34 (skanda.6.79.34)

अर्घ्यं दत्त्वा यथान्यायं पूजां कृत्वाथ भक्तितः॥ प्रोचुश्च प्रणता भूत्वा स्वागतं ते प्रजापते

arghyaṁ dattvā yathānyāyaṁ pūjāṁ kṛtvātha bhaktitaḥ procuśca praṇatā bhūtvā svāgataṁ te prajāpate

और यथोचित अर्घ्य देकर, भक्तिपूर्वक पूजा कर, प्रणत होकर बोले -- "हे प्रजापते! आपका स्वागत है।"

श्लोक 35 (skanda.6.79.35)

आदेशो दीयतां शीघ्रं यदर्थमिह चागतः॥ अपि प्राणप्रदानेन करिष्यामः प्रियं तव

ādeśo dīyatāṁ śīghraṁ yadarthamiha cāgataḥ api prāṇapradānena kariṣyāmaḥ priyaṁ tava

"जिस उद्देश्य से आप यहाँ आये हैं, वह आज्ञा शीघ्र दीजिये; हम प्राणदान देकर भी आपकी प्रिय बात पूरी करेंगे।"

श्लोक 36 (skanda.6.79.36)

दक्ष उवाच॥ एतद्रौद्रतमं कर्म सर्वदेवभयावहम्॥ त्याज्यं युष्माभिरव्यग्रैरेतदर्थमिहागतः

dakṣa uvāca etadraudratamaṁ karma sarvadevabhayāvaham tyājyaṁ yuṣmābhiravyagrairetadarthamihāgataḥ

दक्ष बोले -- यह अत्यंत भयंकर, समस्त देवताओं के लिये भयावह कर्म तुम्हें त्यागना चाहिये, इसी उद्देश्य से मैं यहाँ आया हूँ।

श्लोक 37 (skanda.6.79.37)

मुनय ऊचुः॥ वयं शक्रेण ते यज्ञे समायाताः सुभक्तितः॥ उल्लंघिता मदोद्रेकात्कृत्वा हास्यं मुहुर्मुहुः

munaya ūcuḥ vayaṁ śakreṇa te yajñe samāyātāḥ subhaktitaḥ ullaṁghitā madodrekātkṛtvā hāsyaṁ muhurmuhuḥ

मुनियों ने कहा -- हम पूर्ण भक्तिपूर्वक आपके यज्ञ में गये थे, परन्तु मद के आवेश में इन्द्र ने हमें बार-बार हँसते हुए लाँघ दिया,

श्लोक 38 (skanda.6.79.38)

शक्रोच्छेदाय चास्माभिः शकोऽन्यो वीर्यमंत्रतः॥ प्रारब्धः कर्तुमत्युग्रैर्होमांतश्च व्यवस्थितः

śakrocchedāya cāsmābhiḥ śako'nyo vīryamaṁtrataḥ prārabdhaḥ kartumatyugrairhomāṁtaśca vyavasthitaḥ

अतः हम अत्यंत उग्र होकर इन्द्र के उच्छेद के लिये मंत्र-शक्ति से एक अन्य इन्द्र बनाने का कार्य आरम्भ कर चुके हैं, और होम भी सम्पन्न हो चुका है।

श्लोक 39 (skanda.6.79.39)

तत्कथं मंत्रवीर्यं तत्क्रियते मोघमित्यहो॥ वेदोक्तं च विशेषेण तस्मादत्र वद प्रभो

tatkathaṁ maṁtravīryaṁ tatkriyate moghamityaho vedoktaṁ ca viśeṣeṇa tasmādatra vada prabho

अब उस वेदोक्त मंत्रशक्ति को व्यर्थ कैसे किया जाए? हे प्रभो! अतः इस विषय में हमें बताइये।

श्लोक 40 (skanda.6.79.40)

त्वमेव यदि शक्तः स्यादन्यथा कर्तुमेव हि॥ कुरुष्व वा स्वयं नाथ नास्माकं शक्तिरीदृशी

tvameva yadi śaktaḥ syādanyathā kartumeva hi kuruṣva vā svayaṁ nātha nāsmākaṁ śaktirīdṛśī

यदि आप ही अन्यथा करने में समर्थ हों, तो हे नाथ! आप स्वयं ऐसा करें; हममें ऐसी शक्ति नहीं है।

श्लोक 41 (skanda.6.79.41)

दक्ष उवाच॥ सत्यमेतन्महाभागा यद्युष्माभिः प्रकीर्तितम्॥ नान्यथा शक्यते कर्तुं वेदमन्त्रोद्भवं बलम्

dakṣa uvāca satyametanmahābhāgā yadyuṣmābhiḥ prakīrtitam nānyathā śakyate kartuṁ vedamantrodbhavaṁ balam

दक्ष बोले -- हे महाभागो! तुमने जो कहा है वह सत्य है; वेदमंत्र से उत्पन्न बल को अन्यथा नहीं किया जा सकता।

श्लोक 42 (skanda.6.79.42)

तद्य एष कृतो होमो युष्माभिर्वेदमंत्रतः॥ देवराजार्थमव्यग्रैः कलशश्चाभिमंत्रितः

tadya eṣa kṛto homo yuṣmābhirvedamaṁtrataḥ devarājārthamavyagraiḥ kalaśaścābhimaṁtritaḥ

अतः तुमने अव्यग्र होकर वेदमंत्र से देवराज के लिये जो यह होम किया है, तथा जो यह कलश अभिमंत्रित किया है,

श्लोक 43 (skanda.6.79.43)

सोऽयं मद्वचनाद्राजा भविष्यति पतत्रिणाम्॥ तेजोवीर्यसमोपेतः शक्रादपि सुवीर्यवान्

so'yaṁ madvacanādrājā bhaviṣyati patatriṇām tejovīryasamopetaḥ śakrādapi suvīryavān

वह अब मेरे वचन से पक्षियों का राजा बने, तेज और वीर्य से युक्त, इन्द्र से भी अधिक पराक्रमी।

श्लोक 44 (skanda.6.79.44)

एतस्य देवराजस्य क्षंतव्यं मम वाक्यतः॥ तत्कृतं मूढभावेन यदनेन विचेष्टितम्

etasya devarājasya kṣaṁtavyaṁ mama vākyataḥ tatkṛtaṁ mūḍhabhāvena yadanena viceṣṭitam

और मेरे वचन से इस देवराज को क्षमा किया जाए, जो कुछ मूढ़तावश इसने किया है।

श्लोक 45 (skanda.6.79.45)

एवमुक्त्वाथ तेषां तं सहस्राक्षं भयातुरम्॥ दर्शयामास दक्षस्तु विनयावनतं स्थितम्

evamuktvātha teṣāṁ taṁ sahasrākṣaṁ bhayāturam darśayāmāsa dakṣastu vinayāvanataṁ sthitam

ऐसा कहकर दक्ष ने उन्हें भयातुर, विनयपूर्वक झुककर खड़े सहस्राक्ष (इन्द्र) को दिखाया।

श्लोक 46 (skanda.6.79.46)

तेऽपि दृष्ट्वा सहस्राक्षं वेपमानं कृतांजलिम्॥ प्रोचुर्माऽतिक्रमं शक्र ब्राह्मणानां करिष्यसि

te'pi dṛṣṭvā sahasrākṣaṁ vepamānaṁ kṛtāṁjalim procurmā'tikramaṁ śakra brāhmaṇānāṁ kariṣyasi

उन्होंने भी काँपते हुए, हाथ जोड़े सहस्राक्ष को देखकर कहा -- "हे शक्र! भविष्य में ब्राह्मणों का अतिक्रमण मत करना।"

श्लोक 47 (skanda.6.79.47)

भूयो यदि दिवेशानामाधिपत्यं प्रवांछसि॥ अपि मन्दोऽपि मूर्खोऽपि क्रियाहीनोऽपि वा द्विजः॥ नावज्ञेयो बुधैः क्वापि लोकद्वयमभीप्सुभिः

bhūyo yadi diveśānāmādhipatyaṁ pravāṁchasi api mando'pi mūrkho'pi kriyāhīno'pi vā dvijaḥ nāvajñeyo budhaiḥ kvāpi lokadvayamabhīpsubhiḥ

"यदि तुम पुनः देवताओं का आधिपत्य चाहते हो, तो जान लो कि मन्द, मूर्ख या क्रियाहीन ब्राह्मण भी, दोनों लोकों की कामना करने वाले बुद्धिमानों द्वारा कहीं भी अपमानित नहीं करना चाहिये।"

श्लोक 48 (skanda.6.79.48)

इन्द्र उवाच॥ अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाद्यन्मया कुकृतं कृतम्॥ तत्क्षंतव्यं द्विजैः सर्वैर्विशेषाद्दक्ष वाक्यतः

indra uvāca ajñānādyadi vā jñānādyanmayā kukṛtaṁ kṛtam tatkṣaṁtavyaṁ dvijaiḥ sarvairviśeṣāddakṣa vākyataḥ

इन्द्र ने कहा -- अज्ञानवश या जानबूझकर मैंने जो भी बुरा किया है, वह समस्त ब्राह्मणों द्वारा, विशेषतः दक्ष के वचन से, क्षमा किया जाए।

श्लोक 49 (skanda.6.79.49)

प्रगृह्यतां वरोऽस्माकं यः सदा वर्तते हृदि॥ प्रदास्यामि न संदेहो नादेयं विद्यते मम

pragṛhyatāṁ varo'smākaṁ yaḥ sadā vartate hṛdi pradāsyāmi na saṁdeho nādeyaṁ vidyate mama

तुम्हारे हृदय में जो भी वर सदा रहता है, उसे स्वीकार करो; मैं उसे निःसंदेह प्रदान करूँगा -- मेरे लिये कुछ भी अदेय नहीं है।

श्लोक 50 (skanda.6.79.50)

मुनय ऊचुः॥ अस्मिन्कुण्डे नरो होमं यः कुर्याच्छ्रद्धयाऽन्वितः॥ एतल्लिंगं समभ्यर्च्य तस्याऽस्तु हृदि वांछितम्

munaya ūcuḥ asminkuṇḍe naro homaṁ yaḥ kuryācchraddhayā'nvitaḥ etalliṁgaṁ samabhyarcya tasyā'stu hṛdi vāṁchitam

मुनियों ने कहा -- इस कुण्ड में जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक होम करेगा, इस लिंग की भलीभाँति पूजा कर, उसके हृदय की इच्छा पूर्ण हो।

श्लोक 51 (skanda.6.79.51)

इन्द्र उवाच॥ एतल्लिंगं समभ्यर्च्य योऽत्र होमं करिष्यति॥ कुंडेऽत्र वांछितं सद्यः सफलं स हि लप्स्यते

indra uvāca etalliṁgaṁ samabhyarcya yo'tra homaṁ kariṣyati kuṁḍe'tra vāṁchitaṁ sadyaḥ saphalaṁ sa hi lapsyate

इन्द्र ने कहा -- इस लिंग की भलीभाँति पूजा कर जो कोई यहाँ इस कुण्ड में होम करेगा, वह तत्काल अपनी इच्छा को सफल पाएगा।

श्लोक 52 (skanda.6.79.52)

निष्कामो वाऽथ संपूज्य लिंगमेतच्छुभावहम्॥ प्रयास्यति परां सिद्धिं त्रिदशैरपि दुर्लभाम्

niṣkāmo vā'tha saṁpūjya liṁgametacchubhāvaham prayāsyati parāṁ siddhiṁ tridaśairapi durlabhām

अथवा निष्काम होकर इस शुभदायक लिंग की पूजा करके, वह देवताओं के लिये भी दुर्लभ परम सिद्धि को प्राप्त करेगा।

श्लोक 53 (skanda.6.79.53)

सूत उवाच॥ एवमुक्त्वा सहस्राक्षो वालखिल्यान्मुनीश्वरान्॥ ऐरावतं समारुह्य दक्षयज्ञे ततो गतः

sūta uvāca evamuktvā sahasrākṣo vālakhilyānmunīśvarān airāvataṁ samāruhya dakṣayajñe tato gataḥ

सूत जी बोले -- ऐसा कहकर सहस्राक्ष ने उन मुनीश्वर वालखिल्यों को सम्बोधित कर, ऐरावत पर आरूढ़ होकर दक्ष के यज्ञ में प्रस्थान किया।

श्लोक 54 (skanda.6.79.54)

दक्षोऽपि विधिवद्यज्ञं चकार द्विजसत्तमाः॥ संहृष्टैर्वालखिल्यैस्तैरुपविष्टैः समीपतः

dakṣo'pi vidhivadyajñaṁ cakāra dvijasattamāḥ saṁhṛṣṭairvālakhilyaistairupaviṣṭaiḥ samīpataḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! दक्ष ने भी उन प्रसन्न वालखिल्यों के समीप बैठे रहते हुए विधिपूर्वक यज्ञ सम्पन्न किया।

अध्याय 78अध्याय-सूचीअध्याय 80