Skip to main content

नागर खण्ड · अध्याय 78

रुद्रशीर्ष (जागेश्वर) माहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 77अध्याय-सूचीअध्याय 79

श्लोक 1 (skanda.6.78.1)

ऋषय ऊचुः॥ ब्रह्मणा कतमे स्थाने तत्र सूत कृतं तपः॥ वालखिल्यैश्च तैः सर्वैर्मुनिभिः शंसितव्रतैः

ṛṣaya ūcuḥ brahmaṇā katame sthāne tatra sūta kṛtaṁ tapaḥ vālakhilyaiśca taiḥ sarvairmunibhiḥ śaṁsitavrataiḥ

ऋषियों ने कहा -- हे सूत! ब्रह्मा ने वहाँ किस स्थान पर तप किया था, तथा वे सभी दृढ़व्रती वालखिल्य मुनि भी?

श्लोक 2 (skanda.6.78.2)

सूत उवाच॥ तस्या वायव्यदिग्भागे हरवेद्या द्विजोत्तमाः॥ सम्यक्छ्रद्धाप्रयत्नेन ब्रह्मणा विहितं तपः

sūta uvāca tasyā vāyavyadigbhāge haravedyā dvijottamāḥ samyakchraddhāprayatnena brahmaṇā vihitaṁ tapaḥ

सूत जी बोले -- हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उस हरवेदी के वायव्य दिशा भाग में ब्रह्मा ने पूर्ण श्रद्धा और प्रयत्न से तप किया था,

श्लोक 3 (skanda.6.78.3)

पश्चिमे वालखिल्यैश्च जपस्नानपरायणैः॥ तत्राश्चर्यमभूद्यद्वै पूर्वं ब्राह्मणसत्तमाः॥ आश्रमे चतुरास्यस्य तद्वो वक्ष्यामि सांप्रतम्

paścime vālakhilyaiśca japasnānaparāyaṇaiḥ tatrāścaryamabhūdyadvai pūrvaṁ brāhmaṇasattamāḥ āśrame caturāsyasya tadvo vakṣyāmi sāṁpratam

और पश्चिम दिशा में जप-स्नान में तत्पर वालखिल्यों ने। वहाँ, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! चतुर्मुख ब्रह्मा के आश्रम में पूर्वकाल में जो आश्चर्यजनक घटना घटी, वह अब मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 4 (skanda.6.78.4)

तत्र दुश्चारिणी काचिद्रात्रौ ब्राह्मणवंशजा॥ देवदत्तं समासाद्य वल्लभं रमते सदा

tatra duścāriṇī kācidrātrau brāhmaṇavaṁśajā devadattaṁ samāsādya vallabhaṁ ramate sadā

वहाँ एक ब्राह्मण-कुल में उत्पन्न कोई दुराचारिणी स्त्री रात्रि में देवदत्त नामक अपने प्रियतम से मिलकर सदा उसके साथ रमण करती थी।

श्लोक 5 (skanda.6.78.5)

अज्ञाता पतिना मात्रा तथान्यैरपि बांधवैः॥ कृष्णपक्षं समासाद्य विजने हृष्टमानसा

ajñātā patinā mātrā tathānyairapi bāṁdhavaiḥ kṛṣṇapakṣaṁ samāsādya vijane hṛṣṭamānasā

पति, माता तथा अन्य बन्धुओं को अज्ञात रहते हुए, वह कृष्णपक्ष में एकांत में हर्षित मन से उसके पास जाती थी।

श्लोक 6 (skanda.6.78.6)

कस्यचित्त्वथ कालस्य दृष्टा सा केनचिद्द्विजाः॥ तत्रस्था जारसंयुक्ता स्वभर्तुश्च निवेदिता

kasyacittvatha kālasya dṛṣṭā sā kenaciddvijāḥ tatrasthā jārasaṁyuktā svabhartuśca niveditā

कुछ समय पश्चात्, हे ब्राह्मणो! वह किसी के द्वारा वहाँ अपने जार के साथ देखी गई और यह बात उसके पति को बता दी गई।

श्लोक 7 (skanda.6.78.7)

अथासौ कोपसंयुक्तस्तस्या भर्ता सुनिष्ठुरैः॥ वाक्यैस्तां गर्हयामास प्रहारैश्चाप्यताडयत्

athāsau kopasaṁyuktastasyā bhartā suniṣṭhuraiḥ vākyaistāṁ garhayāmāsa prahāraiścāpyatāḍayat

तब क्रोधित होकर उसके पति ने अत्यंत कठोर वचनों से उसकी निन्दा की और प्रहारों से भी उसे मारा।

श्लोक 8 (skanda.6.78.8)

अथ सा धार्ष्ट्यमासाद्य स्त्रीस्वभावं समाश्रिता॥ प्रोवाच बाष्पपूर्णाक्षी दीनांजलिपुटा स्थिता

atha sā dhārṣṭyamāsādya strīsvabhāvaṁ samāśritā provāca bāṣpapūrṇākṣī dīnāṁjalipuṭā sthitā

तब वह धृष्टता का सहारा लेकर, स्त्री-स्वभाव के अनुसार, आँसुओं से भरे नेत्रों तथा दीन अंजलि जोड़े हुए खड़ी होकर बोली --

श्लोक 9 (skanda.6.78.9)

किं मां दुर्जनवाक्येन त्वं ताडयसि निष्ठुरैः॥ प्रहारैर्दोषनिर्मुक्तां त्वत्पादप्रणतां विभो

kiṁ māṁ durjanavākyena tvaṁ tāḍayasi niṣṭhuraiḥ prahārairdoṣanirmuktāṁ tvatpādapraṇatāṁ vibho

"हे प्रभो! दुर्जनों के वचन से आप मुझ दोषरहित, आपके चरणों में प्रणत को इन कठोर प्रहारों से क्यों मारते हैं?"

श्लोक 10 (skanda.6.78.10)

अहं त्वां शपथं कृत्वा भक्षयित्वाऽथ वा विषम्॥ प्रविश्य हव्यवाहं वा करिष्ये प्रत्ययान्वितम्

ahaṁ tvāṁ śapathaṁ kṛtvā bhakṣayitvā'tha vā viṣam praviśya havyavāhaṁ vā kariṣye pratyayānvitam

"मैं शपथ लेकर, विष खाकर अथवा अग्नि में प्रवेश करके, विश्वासयुक्त प्रमाण दूँगी।"

श्लोक 11 (skanda.6.78.11)

अथ तां ब्राह्मणः प्राह यदि त्वं पापवर्जिता॥ पुरतो देवविप्राणां कुरु दिव्यग्रहं स्वयम्

atha tāṁ brāhmaṇaḥ prāha yadi tvaṁ pāpavarjitā purato devaviprāṇāṁ kuru divyagrahaṁ svayam

तब उस ब्राह्मण ने उससे कहा -- यदि तुम पापरहित हो, तो देवताओं और ब्राह्मणों के समक्ष स्वयं दिव्य-परीक्षा करो।

श्लोक 12 (skanda.6.78.12)

सा तथेति प्रतिज्ञाय साहसेन समन्विता॥ दिव्यग्रहं ततश्चक्रे यथोक्तविधिना सती

sā tatheti pratijñāya sāhasena samanvitā divyagrahaṁ tataścakre yathoktavidhinā satī

"ऐसा ही होगा" कहकर, साहसपूर्वक, उस सती ने यथोक्त विधि से दिव्य-परीक्षा की,

श्लोक 13 (skanda.6.78.13)

शुद्धिं च प्राप्ता सर्वेषां बन्धूनां च द्विजन्मनाम्॥ पुरतश्च गुरूणां च देवानामपि पापकृत्

śuddhiṁ ca prāptā sarveṣāṁ bandhūnāṁ ca dvijanmanām purataśca gurūṇāṁ ca devānāmapi pāpakṛt

और वह पापिनी होते हुए भी समस्त बन्धुओं, ब्राह्मणों, गुरुजनों तथा देवताओं के समक्ष शुद्धि को प्राप्त हो गई।

श्लोक 14 (skanda.6.78.14)

एतस्मिन्नन्तरे तस्याः साधुवादो महानभूत्॥ धिक्छब्दश्च तथा पत्युः सर्वैर्दत्तः सुगर्हितः

etasminnantare tasyāḥ sādhuvādo mahānabhūt dhikchabdaśca tathā patyuḥ sarvairdattaḥ sugarhitaḥ

इसी बीच उसकी बड़ी प्रशंसा हुई, और उसके पति को सब लोगों ने "धिक्कार" का अत्यंत निन्दनीय शब्द कहा।

श्लोक 15 (skanda.6.78.15)

अहो पापसमाचारो दुष्टोऽयं ब्राह्मणाधमः॥ अपापां धर्मपत्नीं यो मिथ्यादोषेणयोजयेत्

aho pāpasamācāro duṣṭo'yaṁ brāhmaṇādhamaḥ apāpāṁ dharmapatnīṁ yo mithyādoṣeṇayojayet

"अहो! यह दुष्ट, नीच ब्राह्मण कैसा पापपूर्ण आचरण करने वाला है, जिसने अपनी निर्दोष धर्मपत्नी को मिथ्या दोष से जोड़ दिया!"

श्लोक 16 (skanda.6.78.16)

एवं स निन्द्यमानस्तु सर्वलोकैर्द्विजोत्तमाः॥ कोपं चक्रे ततो वह्निं समुद्दिश्य सदुःखितः

evaṁ sa nindyamānastu sarvalokairdvijottamāḥ kopaṁ cakre tato vahniṁ samuddiśya saduḥkhitaḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इस प्रकार समस्त लोगों द्वारा निन्दित होकर, वह अत्यंत दुःखी होकर अग्नि के प्रति क्रोधित हो गया।

श्लोक 17 (skanda.6.78.17)

शापं दातुं मतिं चक्रे ततो वह्नेः सुदुःखितः॥ अब्रवीत्परुषं वाक्यं निन्दमानः पुनःपुनः

śāpaṁ dātuṁ matiṁ cakre tato vahneḥ suduḥkhitaḥ abravītparuṣaṁ vākyaṁ nindamānaḥ punaḥpunaḥ

वह अत्यंत दुःखी होकर अग्नि को शाप देने का विचार करने लगा और बार-बार उसकी निन्दा करते हुए कठोर वचन बोला --

श्लोक 18 (skanda.6.78.18)

मया स्वयं प्रदृष्टेयं जारेण सह संगता॥ त्वया वह्ने सुपापेयं न कस्माद्भस्मसात्कृता

mayā svayaṁ pradṛṣṭeyaṁ jāreṇa saha saṁgatā tvayā vahne supāpeyaṁ na kasmādbhasmasātkṛtā

"मैंने स्वयं इसे जार के साथ देखा था; हे अग्नि! इस महापापिनी को तुमने क्यों नहीं भस्म कर दिया?"

श्लोक 19 (skanda.6.78.19)

तस्मात्त्वां पापकर्माणमसत्यपक्षपातिनम्॥ असंदिग्धं शपिष्यामि रौद्रशापेन सांप्रतम्

tasmāttvāṁ pāpakarmāṇamasatyapakṣapātinam asaṁdigdhaṁ śapiṣyāmi raudraśāpena sāṁpratam

"अतः, हे पापकर्मी, असत्य का पक्ष लेने वाले! मैं अब निश्चय ही तुम्हें भयंकर शाप दूँगा।"

श्लोक 20 (skanda.6.78.20)

सूत उवाच॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा संक्रुद्धस्य द्विजन्मनः॥ सप्तार्चिर्भयसंत्रस्तः कृतांजलिरुवाच तम्

sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā saṁkruddhasya dvijanmanaḥ saptārcirbhayasaṁtrastaḥ kṛtāṁjaliruvāca tam

सूत जी बोले -- उस अत्यंत क्रुद्ध ब्राह्मण के वचन सुनकर सप्तार्चि (अग्नि) भयभीत होकर हाथ जोड़कर उससे बोले --

श्लोक 21 (skanda.6.78.21)

अग्निरुवाच॥ नैष दोषो मम ब्रह्मन्यन्न दग्धा तव प्रिया॥ कृतागसाऽपि मे वाक्यं शृणुष्वात्र स्फुटेरितम्

agniruvāca naiṣa doṣo mama brahmanyanna dagdhā tava priyā kṛtāgasā'pi me vākyaṁ śṛṇuṣvātra sphuṭeritam

अग्नि ने कहा -- हे ब्रह्मन्! यह मेरा दोष नहीं है कि तुम्हारी प्रिया दग्ध नहीं हुई। यद्यपि मैंने अपराध किया है, फिर भी मेरा यह स्पष्ट वचन सुनो।

श्लोक 22 (skanda.6.78.22)

अनया परकांतेन कृतः सह समागमः॥ चिरं कालं द्विजश्रेष्ठ त्वया ज्ञाताद्य वासरे

anayā parakāṁtena kṛtaḥ saha samāgamaḥ ciraṁ kālaṁ dvijaśreṣṭha tvayā jñātādya vāsare

हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! इसने परपुरुष के साथ यह सम्बन्ध दीर्घकाल से बनाए रखा था, जिसे तुमने आज ही जाना।

श्लोक 23 (skanda.6.78.23)

परं यस्माद्विशुद्धैषा मया दग्धा न सा द्विज॥ कारणं तच्च ते वच्मि शृणुष्वैकमनाः स्थितः

paraṁ yasmādviśuddhaiṣā mayā dagdhā na sā dvija kāraṇaṁ tacca te vacmi śṛṇuṣvaikamanāḥ sthitaḥ

परन्तु चूँकि यह अब पूर्ण रूप से शुद्ध हो चुकी है, इसलिये मैंने इसे दग्ध नहीं किया, हे द्विज! उसका कारण बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 24 (skanda.6.78.24)

यत्रानया कृतः संगः परकांतेन वै द्विज॥ तस्मिन्नायतने ब्रह्मा रुद्रशीर्षो व्यवस्थितः

yatrānayā kṛtaḥ saṁgaḥ parakāṁtena vai dvija tasminnāyatane brahmā rudraśīrṣo vyavasthitaḥ

जिस स्थान पर इसने परपुरुष के साथ यह संग किया था, हे द्विज! उस आयतन में ब्रह्मा रुद्रशीर्ष के रूप में स्थित हैं।

श्लोक 25 (skanda.6.78.25)

तत्र कृत्वा रतं चित्रं परकांतसमं तदा॥ पश्यति स्म ततो रुद्रं ब्रह्ममस्तकसंस्थितम्

tatra kṛtvā rataṁ citraṁ parakāṁtasamaṁ tadā paśyati sma tato rudraṁ brahmamastakasaṁsthitam

वहाँ परपुरुष के साथ विविध रति-क्रिया करते हुए इसने ब्रह्मा के मस्तक पर स्थित रुद्र को देखा।

श्लोक 26 (skanda.6.78.26)

ततः प्रक्षालयत्यंगं कुण्डे तत्राग्रतः स्थिते॥ कृतपापापि तेनैषा शुद्धिं याति शुचिस्मिता

tataḥ prakṣālayatyaṁgaṁ kuṇḍe tatrāgrataḥ sthite kṛtapāpāpi tenaiṣā śuddhiṁ yāti śucismitā

तत्पश्चात् उसके समक्ष स्थित कुण्ड में इसने अपने शरीर को धो लिया, और उसी से यह पापिनी होते हुए भी शुद्धि को प्राप्त हो गई, यह शुद्ध मुस्कान वाली।

श्लोक 27 (skanda.6.78.27)

अत्र पूर्वं विपाप्माऽभूद्ब्रह्मा लोकपितामहः॥ सतीवक्त्रं समालोक्य कामार्तोऽपि स पापकृत्

atra pūrvaṁ vipāpmā'bhūdbrahmā lokapitāmahaḥ satīvaktraṁ samālokya kāmārto'pi sa pāpakṛt

यहीं पूर्वकाल में लोकपितामह ब्रह्मा भी पापी हुए थे, सती के मुख को देखकर कामातुर होकर पापकर्म किया था।

श्लोक 28 (skanda.6.78.28)

तस्मान्नास्त्यत्र मे दोषः स्वल्पोऽपि द्विजसत्तम॥ रुद्रशीर्षप्रभावोऽयं तस्य कुण्डोदकस्य च

tasmānnāstyatra me doṣaḥ svalpo'pi dvijasattama rudraśīrṣaprabhāvo'yaṁ tasya kuṇḍodakasya ca

अतः, हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! यहाँ मेरा तनिक भी दोष नहीं है; यह रुद्रशीर्ष का तथा उस कुण्ड के जल का प्रभाव है।

श्लोक 29 (skanda.6.78.29)

तस्मादेनां समादाय संशुद्धां पापवर्जिताम्॥ गृहं गच्छ द्विजश्रेष्ठ सत्यमेतन्मयोदितम्

tasmādenāṁ samādāya saṁśuddhāṁ pāpavarjitām gṛhaṁ gaccha dvijaśreṣṭha satyametanmayoditam

अतः इसे शुद्ध और पापरहित मानकर ले जाओ; हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! घर जाओ; यह मैंने सत्य कहा है।

श्लोक 30 (skanda.6.78.30)

ब्राह्मण उवाच॥ या मया सहसा दृष्टा स्वयमेव हुताशन॥ परकांतेन तां नाद्य शुद्धामपि गृहं नये

brāhmaṇa uvāca yā mayā sahasā dṛṣṭā svayameva hutāśana parakāṁtena tāṁ nādya śuddhāmapi gṛhaṁ naye

ब्राह्मण ने कहा -- जिसे मैंने स्वयं तत्काल परपुरुष के साथ देखा, हे अग्ने! उसे अब शुद्ध होने पर भी मैं घर नहीं ले जाऊँगा।

श्लोक 31 (skanda.6.78.31)

इत्युक्त्वा च द्विजश्रेष्ठस्तां त्यक्त्वापि शुचिव्रतः॥ जगाम स्वगृहं पश्चात्तथा जग्मुर्जना गृहान्

ityuktvā ca dvijaśreṣṭhastāṁ tyaktvāpi śucivrataḥ jagāma svagṛhaṁ paścāttathā jagmurjanā gṛhān

ऐसा कहकर वह पवित्रव्रती श्रेष्ठ ब्राह्मण उसे त्यागकर अपने घर चला गया, और अन्य लोग भी अपने-अपने घर चले गये।

श्लोक 32 (skanda.6.78.32)

सापि तेन परित्यक्ता पतिना हृष्टमानसा॥ ज्ञात्वा तत्तीर्थमाहात्म्यं वैश्वानरमुखेरितम्

sāpi tena parityaktā patinā hṛṣṭamānasā jñātvā tattīrthamāhātmyaṁ vaiśvānaramukheritam

उसके पति द्वारा त्याग दी गई वह भी, हर्षित मन से, अग्नि के मुख से कहे गये उस तीर्थ की महिमा को जानकर,

श्लोक 33 (skanda.6.78.33)

तेनैव परकांतेन विशेषेण रतिक्रियाम्॥ तस्मिन्नायतने चक्रे कुण्डे तोयावगाहनम्

tenaiva parakāṁtena viśeṣeṇa ratikriyām tasminnāyatane cakre kuṇḍe toyāvagāhanam

उसी परपुरुष के साथ विशेष रूप से उसी आयतन में रति-क्रिया करती और कुण्ड में स्नान करती रही।

श्लोक 34 (skanda.6.78.34)

अथान्ये परलोकस्य भीत्याऽतीव व्यवस्थिताः॥ विमुखाः परदारेषु नार्यश्चापि पतिव्रताः

athānye paralokasya bhītyā'tīva vyavasthitāḥ vimukhāḥ paradāreṣu nāryaścāpi pativratāḥ

तत्पश्चात् परलोक के भय से अत्यंत सावधान रहने वाले, परस्त्रीगमन से विमुख अन्य पुरुष तथा पतिव्रता स्त्रियाँ भी,

श्लोक 35 (skanda.6.78.35)

दूरतोऽपि समभ्येत्य ते सर्वे तत्र मंदिरे॥ रुद्रशीर्षाभिधानं च प्रचक्रुः सुरतोत्सवम्

dūrato'pi samabhyetya te sarve tatra maṁdire rudraśīrṣābhidhānaṁ ca pracakruḥ suratotsavam

दूर-दूर से आकर, उस रुद्रशीर्ष नामक मन्दिर में रति-उत्सव करने लगे।

श्लोक 36 (skanda.6.78.36)

निमज्जंति ततः कुण्डे तस्मिन्पातकनाशने॥ भवंति पापनिर्मुक्ता रुद्रशीर्षावलोकनात्

nimajjaṁti tataḥ kuṇḍe tasminpātakanāśane bhavaṁti pāpanirmuktā rudraśīrṣāvalokanāt

तत्पश्चात् वे उस पातकनाशक कुण्ड में स्नान करते और रुद्रशीर्ष के दर्शन मात्र से पापमुक्त हो जाते।

श्लोक 37 (skanda.6.78.37)

एतस्मिन्नंतरे नष्टो धर्मः पत्नीसमुद्भवः॥ पुरुषाणां ततः स्त्रीणां निजकांतासमुद्भवः

etasminnaṁtare naṣṭo dharmaḥ patnīsamudbhavaḥ puruṣāṇāṁ tataḥ strīṇāṁ nijakāṁtāsamudbhavaḥ

इसी बीच पत्नी से उत्पन्न पुरुषों का धर्म और अपने पति से उत्पन्न स्त्रियों का धर्म नष्ट हो गया।

श्लोक 38 (skanda.6.78.38)

यो यां पश्यति रूपाढ्यां नारीमपि कुलोद्भवाम्॥ स तत्रानीय संहृष्टो भजते द्विजसत्तमाः

yo yāṁ paśyati rūpāḍhyāṁ nārīmapi kulodbhavām sa tatrānīya saṁhṛṣṭo bhajate dvijasattamāḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो पुरुष किसी रूपवती, कुलीन स्त्री को भी देखता, वह उसे वहाँ लाकर प्रसन्नतापूर्वक भोग करता।

श्लोक 39 (skanda.6.78.39)

तथा नारी सुरूपाढ्यं यं पश्यति नरं क्वचित्॥ सापि तत्र समानीय कुरुते सुरतोत्सवम्

tathā nārī surūpāḍhyaṁ yaṁ paśyati naraṁ kvacit sāpi tatra samānīya kurute suratotsavam

और जो स्त्री किसी सुरूप पुरुष को देखती, वह भी उसे वहाँ लाकर रति-उत्सव करती।

श्लोक 40 (skanda.6.78.40)

लिप्यते न च पापेन कथंचित्तकृतेन च॥ नरो वा यदि वा नारी तत्तीर्थस्य प्रभावतः

lipyate na ca pāpena kathaṁcittakṛtena ca naro vā yadi vā nārī tattīrthasya prabhāvataḥ

उस तीर्थ के प्रभाव से, ऐसा करने पर भी, न कोई पुरुष और न कोई स्त्री उस पाप से लिप्त होते।

श्लोक 41 (skanda.6.78.41)

कस्यचित्त्वथ कालस्य तत्र राजा विदूरथः॥ आनर्त्तविषये जज्ञे वार्धक्यं च क्रमाद्ययौ

kasyacittvatha kālasya tatra rājā vidūrathaḥ ānarttaviṣaye jajñe vārdhakyaṁ ca kramādyayau

कुछ काल पश्चात् आनर्त देश में विदूरथ नामक राजा उत्पन्न हुआ, और वह क्रमशः वृद्धावस्था को प्राप्त हुआ।

श्लोक 42 (skanda.6.78.42)

तस्य भार्याऽभवत्तन्वी तरुणी वररूपधृक्॥ पश्चिमे वयसि प्राप्ते प्राणेभ्योऽपि गरीयसी

tasya bhāryā'bhavattanvī taruṇī vararūpadhṛk paścime vayasi prāpte prāṇebhyo'pi garīyasī

उसकी पत्नी एक सुन्दर रूपवाली, कृशांगी युवती थी, जो उसके वृद्धावस्था में पहुँचने पर भी उसे प्राणों से अधिक प्रिय थी।

श्लोक 43 (skanda.6.78.43)

न तस्याः स जराग्रस्तश्चित्ते वसति पार्थिवः॥ तस्मिंस्तीर्थे समागत्य वांछितं रमते नरः

na tasyāḥ sa jarāgrastaścitte vasati pārthivaḥ tasmiṁstīrthe samāgatya vāṁchitaṁ ramate naraḥ

उस वृद्ध राजा का उसके हृदय में कोई स्थान नहीं था; वह उस तीर्थ में जाकर अपनी इच्छानुसार पुरुषों के साथ रमण करती थी।

श्लोक 44 (skanda.6.78.44)

पार्थिवोऽपि परिज्ञाय तस्यास्तच्च विचेष्टितम्॥ कोपाविष्टस्ततो गत्वा तस्मिन्क्षेत्रे सुशोभने

pārthivo'pi parijñāya tasyāstacca viceṣṭitam kopāviṣṭastato gatvā tasminkṣetre suśobhane

उसके इस आचरण को जानकर राजा भी क्रोधित होकर उस सुशोभित क्षेत्र में गया,

श्लोक 45 (skanda.6.78.45)

तत्कुण्डं पूरयामास ततः पांशूत्करैर्द्रुतम्॥ बभंज तं च प्रासादं ततः प्रोवाच दारुणम्

tatkuṇḍaṁ pūrayāmāsa tataḥ pāṁśūtkarairdrutam babhaṁja taṁ ca prāsādaṁ tataḥ provāca dāruṇam

और उस कुण्ड को शीघ्र ही धूल के ढेरों से भर दिया, तथा उस प्रासाद को तोड़ डाला, और फिर यह भयंकर वचन कहा --

श्लोक 46 (skanda.6.78.46)

यश्चैतत्पूरितं कुण्डं पांशुना निखनिष्यति॥ प्रासादं च पुनश्चैनं करिष्यति पुनर्नवम्

yaścaitatpūritaṁ kuṇḍaṁ pāṁśunā nikhaniṣyati prāsādaṁ ca punaścainaṁ kariṣyati punarnavam

"जो कोई इस धूल से भरे कुण्ड को पुनः खोदेगा और इस प्रासाद को फिर से नया बनाएगा,"

श्लोक 47 (skanda.6.78.47)

परदारकृतं पापं तस्य संपत्स्यतेऽखिलम्॥ यदत्र प्रकरिष्यंति मानवाः काममोहिताः

paradārakṛtaṁ pāpaṁ tasya saṁpatsyate'khilam yadatra prakariṣyaṁti mānavāḥ kāmamohitāḥ

"यहाँ काममोहित मनुष्यों द्वारा किया गया समस्त परस्त्रीगमन का पाप उसे प्राप्त होगा।"

श्लोक 48 (skanda.6.78.48)

सूत उवाच॥ एवं स पार्थिवः प्रोच्य तामादाय ततः प्रियाम्॥ जगाम स्वगृहं पश्चात्प्रहृष्टेनांतरात्मना

sūta uvāca evaṁ sa pārthivaḥ procya tāmādāya tataḥ priyām jagāma svagṛhaṁ paścātprahṛṣṭenāṁtarātmanā

सूत जी बोले -- इस प्रकार कहकर वह राजा अपनी प्रिया को लेकर हर्षित अन्तःकरण से अपने घर चला गया।

श्लोक 49 (skanda.6.78.49)

अथ तां विरतां ज्ञात्वा सोऽन्यचित्तां प्रियां नृपः॥ यत्नेन रक्षयामास विश्वासं नैव गच्छति

atha tāṁ viratāṁ jñātvā so'nyacittāṁ priyāṁ nṛpaḥ yatnena rakṣayāmāsa viśvāsaṁ naiva gacchati

तत्पश्चात् उसकी प्रिया को विरक्त तथा अन्यत्र चित्तवाली जानकर राजा ने उसकी बड़े यत्न से रक्षा की और उस पर विश्वास नहीं किया।

श्लोक 50 (skanda.6.78.50)

अन्यस्मिन्दिवसे शस्त्रं सूक्ष्मं वेण्यां निधाय सा॥ जगाम शयनं तस्य वधार्थं वरवर्णिनी

anyasmindivase śastraṁ sūkṣmaṁ veṇyāṁ nidhāya sā jagāma śayanaṁ tasya vadhārthaṁ varavarṇinī

एक दिन उस सुन्दरी ने अपनी वेणी में एक सूक्ष्म शस्त्र छिपाकर, राजा का वध करने के लिये उसकी शय्या पर गई।

श्लोक 51 (skanda.6.78.51)

ततस्तेन समं हास्यं कृत्वा क्षत्रियभावजम्॥ सुरतं रुचिरैर्भावैर्हावैर्भूरिभिरेव च

tatastena samaṁ hāsyaṁ kṛtvā kṣatriyabhāvajam surataṁ rucirairbhāvairhāvairbhūribhireva ca

तब उसके साथ क्षत्रिय-भाव से युक्त हास्य कर, मनोहर भावों तथा अनेक हाव-भावों से रति की,

श्लोक 52 (skanda.6.78.52)

ततो निद्रावशं प्राप्तं तं नृपं सा नृपप्रिया॥ स्ववेण्याः शस्त्रमादाय निजघान सुनिर्दया

tato nidrāvaśaṁ prāptaṁ taṁ nṛpaṁ sā nṛpapriyā svaveṇyāḥ śastramādāya nijaghāna sunirdayā

और जब वह राजा निद्रा के वशीभूत हो गया, तब उस राजप्रिया ने अपनी वेणी से शस्त्र निकालकर निर्दयतापूर्वक उसका वध कर दिया।

श्लोक 53 (skanda.6.78.53)

एवं तस्य फलं जातं सद्यस्तीर्थस्य भंगजम्॥ आनर्ताधिपते रौद्रं सर्वलोकविगर्हितम्

evaṁ tasya phalaṁ jātaṁ sadyastīrthasya bhaṁgajam ānartādhipate raudraṁ sarvalokavigarhitam

इस प्रकार तीर्थ के भंग का यह फल आनर्त के उस राजा को शीघ्र ही प्राप्त हुआ -- एक भयंकर, समस्त लोक द्वारा निन्दित घटना।

श्लोक 54 (skanda.6.78.54)

अद्यापि तत्र देवेशो रुद्रशीर्षः स तिष्ठति॥ लिंगभेदभयात्तेन न स भग्नो द्विजोत्तमाः

adyāpi tatra deveśo rudraśīrṣaḥ sa tiṣṭhati liṁgabhedabhayāttena na sa bhagno dvijottamāḥ

आज भी वहाँ देवेश रुद्रशीर्ष स्थित हैं; हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! लिंग-भेद के भय से उसने उसे तोड़ा नहीं था।

श्लोक 55 (skanda.6.78.55)

यस्तस्य पुरतः स्थित्वा जपेद्रुद्रशिरः शुचिः॥ माघशुक्लचतुर्दश्यां पूजयित्वा स्रगादिभिः

yastasya purataḥ sthitvā japedrudraśiraḥ śuciḥ māghaśuklacaturdaśyāṁ pūjayitvā sragādibhiḥ

जो कोई माघ शुक्ल चतुर्दशी को शुद्ध होकर, माला आदि से पूजा कर, उसके समक्ष खड़े होकर "रुद्रशिरः" का जप करता है,

श्लोक 56 (skanda.6.78.56)

वांछितं लभते चाशु तस्येशस्य प्रभावतः॥ अष्टोत्तरशतं यावद्यो जपेत्पुरतः स्थितः

vāṁchitaṁ labhate cāśu tasyeśasya prabhāvataḥ aṣṭottaraśataṁ yāvadyo japetpurataḥ sthitaḥ

वह उस ईश्वर के प्रभाव से शीघ्र ही इच्छित वस्तु को प्राप्त कर लेता है। और जो कोई उसके समक्ष खड़े होकर एक सौ आठ बार जप करता है,

श्लोक 57 (skanda.6.78.57)

रुद्रशीर्षं न संदेहः स याति परमां गतिम्॥ एकवारं नरो यो वा तत्पुरः पठति द्विजः

rudraśīrṣaṁ na saṁdehaḥ sa yāti paramāṁ gatim ekavāraṁ naro yo vā tatpuraḥ paṭhati dvijaḥ

वह निःसंदेह रुद्रशीर्ष के प्रभाव से परम गति को प्राप्त होता है। और जो कोई मनुष्य या ब्राह्मण उसके समक्ष एक बार भी उसका पाठ करता है,

श्लोक 58 (skanda.6.78.58)

नित्यं दिनकृतात्पापान्मुच्यते द्विजसत्तमाः॥ एतद्वः सर्वमाख्यातं रुद्रशीर्षसमुद्भवम्

nityaṁ dinakṛtātpāpānmucyate dvijasattamāḥ etadvaḥ sarvamākhyātaṁ rudraśīrṣasamudbhavam

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वह नित्य उस दिन किये गये पापों से मुक्त हो जाता है। यह सब तुम्हें रुद्रशीर्ष से सम्बन्धित बताया गया,

श्लोक 59 (skanda.6.78.59)

माहात्म्यं सर्वपापानां सद्यो नाशनकारकम्॥ मंगलं परमं ह्येतदायुष्यं कीर्तिवर्धनम्॥ रुद्रशीर्षस्य माहात्म्यं तस्माच्छ्रोतव्यमादरात्

māhātmyaṁ sarvapāpānāṁ sadyo nāśanakārakam maṁgalaṁ paramaṁ hyetadāyuṣyaṁ kīrtivardhanam rudraśīrṣasya māhātmyaṁ tasmācchrotavyamādarāt

यह समस्त पापों का तत्काल नाश करने वाली महिमा है; यह परम मंगलकारी, आयुवर्धक और कीर्तिवर्धक है; अतः रुद्रशीर्ष की इस महिमा को आदरपूर्वक सुनना चाहिये।

अध्याय 77अध्याय-सूचीअध्याय 79