नागर खण्ड · अध्याय 77
हराश्रयवेदिकामाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.6.77.1)
ऋषय ऊचुः॥ यदेतद्भवता प्रोक्तं तत्र तौ परमेश्वरौ॥ उमामहेश्वरौ सूत हरिश्चन्द्रेण भूभुजा
ṛṣaya ūcuḥ yadetadbhavatā proktaṁ tatra tau parameśvarau umāmaheśvarau sūta hariścandreṇa bhūbhujā
ऋषियों ने कहा -- आपने जो कहा कि वहाँ राजा हरिश्चन्द्र द्वारा वे दोनों परमेश्वर -- उमा-महेश्वर --
श्लोक 2 (skanda.6.77.2)
कृतौ कथयसीत्येवं वेदिमध्यं समाश्रितौ॥ उतान्यौ स्थापितौ तत्र चमत्कारपुरांतिकम्
kṛtau kathayasītyevaṁ vedimadhyaṁ samāśritau utānyau sthāpitau tatra camatkārapurāṁtikam
"वेदी के मध्य में स्थापित कर बनाए गए, ऐसा आप कहते हैं; अथवा क्या वे दोनों चमत्कारपुर के समीप वहाँ स्थापित किए गए थे?"
श्लोक 3 (skanda.6.77.3)
वेदिमध्यगतौ नित्यं पार्वतीपरमेश्वरौ॥ एतत्संश्रूयते सूत विवाहः प्रागभूत्तयोः॥ ओषधिप्रस्थमासाद्य पुरं हिमवतः प्रियम्
vedimadhyagatau nityaṁ pārvatīparameśvarau etatsaṁśrūyate sūta vivāhaḥ prāgabhūttayoḥ oṣadhiprasthamāsādya puraṁ himavataḥ priyam
"पार्वती-परमेश्वर सदा वेदी के मध्य में स्थित रहते हैं, ऐसा सुना जाता है, हे सूत! परन्तु उनका विवाह पहले औषधिप्रस्थ में, हिमवान् की प्रिय नगरी में हुआ था, यह भी सुना जाता है।"
श्लोक 4 (skanda.6.77.4)
अत्र नः संशयो जातः श्रद्धेयमपि ते वचः॥ श्रुत्वा किं वा भ्रमस्तेऽयं किं वाऽस्माकं प्रकीर्तय
atra naḥ saṁśayo jātaḥ śraddheyamapi te vacaḥ śrutvā kiṁ vā bhramaste'yaṁ kiṁ vā'smākaṁ prakīrtaya
"इस विषय में हमें संशय हो गया है; यद्यपि आपका वचन श्रद्धेय है, फिर भी सुनकर -- क्या यह हमारा भ्रम है, या आपका -- यह बताइये।"
श्लोक 5 (skanda.6.77.5)
सूत उवाच॥ नास्माकं विभ्रमो जातो युष्माकं तु द्विजोत्तमाः॥ परं यत्कारणं कृत्स्नं तद्ब्रवीमि निबोध्यताम्
sūta uvāca nāsmākaṁ vibhramo jāto yuṣmākaṁ tu dvijottamāḥ paraṁ yatkāraṇaṁ kṛtsnaṁ tadbravīmi nibodhyatām
सूत जी बोले -- हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मुझे कोई भ्रम नहीं हुआ है, अपितु तुम्हें हुआ है; परन्तु मैं इसका सम्पूर्ण कारण बताता हूँ, समझो।
श्लोक 6 (skanda.6.77.6)
य एष ओषधिप्रस्थे विवाहः प्रागभूत्तयोः॥ उमात्रिनेत्रयो रम्यः सर्वदेवप्रमोदकृत्
ya eṣa oṣadhiprasthe vivāhaḥ prāgabhūttayoḥ umātrinetrayo ramyaḥ sarvadevapramodakṛt
औषधिप्रस्थ में उमा और त्रिनेत्र का यह विवाह, जो अत्यंत रम्य और समस्त देवताओं को आनन्दित करने वाला था,
श्लोक 7 (skanda.6.77.7)
वैवस्वतेऽन्तरे पूर्वं संजातो द्विजसत्तमाः॥ सप्तमस्य तु विख्यातो युष्माकं विदितोऽत्र यः
vaivasvate'ntare pūrvaṁ saṁjāto dvijasattamāḥ saptamasya tu vikhyāto yuṣmākaṁ vidito'tra yaḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वह पहले वैवस्वत मन्वन्तर में हुआ था -- सातवें मन्वन्तर में, जो तुम्हें यहाँ विदित है।
श्लोक 8 (skanda.6.77.8)
हाटकेश्वरजे क्षेत्रे यश्चोद्वाहस्तयोरभूत्॥ स्वायंभुवमनोराद्ये स संजातः सुविस्तरः
hāṭakeśvaraje kṣetre yaścodvāhastayorabhūt svāyaṁbhuvamanorādye sa saṁjātaḥ suvistaraḥ
और हाटकेश्वर क्षेत्र में जो उनका विवाह हुआ, वह स्वायंभुव मन्वन्तर के आरम्भ में हुआ था, और वह अत्यंत विस्तृत था।
श्लोक 9 (skanda.6.77.9)
ऋषय ऊचुः॥ विवाह ओषधिप्रस्थे यः पुरा समभूत्तयोः॥ पार्वतीहरयोः सूत सोऽस्माभिर्विस्तराच्छ्रुतः
ṛṣaya ūcuḥ vivāha oṣadhiprasthe yaḥ purā samabhūttayoḥ pārvatīharayoḥ sūta so'smābhirvistarācchrutaḥ
ऋषियों ने कहा -- हे सूत! जो विवाह पहले औषधिप्रस्थ में पार्वती-हर का हुआ, वह हमने आपसे विस्तार से सुन लिया है।
श्लोक 10 (skanda.6.77.10)
हाटकेश्वरजे क्षेत्रे दक्षयज्ञे मनोहरे॥ विवाहो वृषयानस्य मनौ स्वायंभुवे पुरा
hāṭakeśvaraje kṣetre dakṣayajñe manohare vivāho vṛṣayānasya manau svāyaṁbhuve purā
अब बताइये -- हाटकेश्वर क्षेत्र में, दक्ष के मनोहर यज्ञ में, स्वायंभुव मन्वन्तर में पहले हुए वृषवाहन (शिव) का जो विवाह था,
श्लोक 11 (skanda.6.77.11)
सोऽस्माकं कीर्तनीयश्च त्वया सूतकुलोद्वह॥ विस्तरेण यथा वृत्तः एतन्न कौतुकं परम्
so'smākaṁ kīrtanīyaśca tvayā sūtakulodvaha vistareṇa yathā vṛttaḥ etanna kautukaṁ param
हे सूतकुलोद्वह! वह हमें विस्तार से कहा जाए, जैसा वह घटित हुआ था -- यह हमारे लिये साधारण कौतूहल नहीं है।
श्लोक 12 (skanda.6.77.12)
सूत उवाच॥ अत्र वः कीर्तयिष्यामि सर्वपातकनाशनम्॥ विवाहसमयं सम्यग्देवदेवस्य शूलिनः
sūta uvāca atra vaḥ kīrtayiṣyāmi sarvapātakanāśanam vivāhasamayaṁ samyagdevadevasya śūlinaḥ
सूत जी बोले -- अब मैं तुम्हें देवाधिदेव शूलपाणि के, समस्त पातकों का नाश करने वाले, विवाह-समय की भलीभाँति कथा सुनाऊँगा।
श्लोक 13 (skanda.6.77.13)
ब्रह्मणो दक्षिणांगुष्ठाद्दक्षः प्राचेतसोऽभवत्॥ शतानि पञ्च कन्यानां तस्य जातानि च द्विजाः
brahmaṇo dakṣiṇāṁguṣṭhāddakṣaḥ prācetaso'bhavat śatāni pañca kanyānāṁ tasya jātāni ca dvijāḥ
ब्रह्मा के दाहिने अंगूठे से प्राचेतस दक्ष उत्पन्न हुए, और हे ब्राह्मणो! उनकी पाँच सौ कन्याएँ उत्पन्न हुईं।
श्लोक 14 (skanda.6.77.14)
तासां ज्येष्ठतमा साध्वी सतीनाम शुचिस्मिता॥ बभूव कन्यका सर्वैर्गुणैर्युक्ताऽऽयतेक्षणा
tāsāṁ jyeṣṭhatamā sādhvī satīnāma śucismitā babhūva kanyakā sarvairguṇairyuktā''yatekṣaṇā
उनमें सबसे बड़ी, सती नामक साध्वी, शुद्ध मुस्कान वाली कन्या, समस्त गुणों से युक्त, विशाल नेत्रों वाली थी।
श्लोक 15 (skanda.6.77.15)
न देवी न च गंधर्वी नासुरी न च नागजा॥ तादृग्रूपाऽभवच्चान्या यादृशी सा सुमध्यमा
na devī na ca gaṁdharvī nāsurī na ca nāgajā tādṛgrūpā'bhavaccānyā yādṛśī sā sumadhyamā
न कोई देवी, न गंधर्वी, न असुर-कन्या, न नाग-कन्या ऐसे रूप वाली थी जैसी वह सुमध्यमा थी।
श्लोक 16 (skanda.6.77.16)
अथ तां प्रददौ दक्षः पत्न्यर्थं शूलपाणये॥ प्रार्थितां बहुशो यत्नात्सस्पृहाय स्पृहान्विताम्
atha tāṁ pradadau dakṣaḥ patnyarthaṁ śūlapāṇaye prārthitāṁ bahuśo yatnātsaspṛhāya spṛhānvitām
तब दक्ष ने बार-बार यत्नपूर्वक प्रार्थना करने पर, स्वयं इच्छुक होते हुए, इच्छा रखने वाले शूलपाणि को पत्नी रूप में उसे प्रदान किया।
श्लोक 17 (skanda.6.77.17)
ततः पुण्यतमं क्षेत्रं कन्यादानस्य स क्षमम्॥ संध्याय ससुतामात्यः सभृत्यः समुपस्थितः
tataḥ puṇyatamaṁ kṣetraṁ kanyādānasya sa kṣamam saṁdhyāya sasutāmātyaḥ sabhṛtyaḥ samupasthitaḥ
तब उस अत्यंत पुण्यमय, कन्यादान के योग्य क्षेत्र का चयन कर, वे अपनी कन्या, मंत्रियों और सेवकों सहित वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 18 (skanda.6.77.18)
ततश्चोद्वाहयोग्यानि वसुनि विविधान्यपि॥ आनयामास भूरीणि मांगल्यानि विशेषतः
tataścodvāhayogyāni vasuni vividhānyapi ānayāmāsa bhūrīṇi māṁgalyāni viśeṣataḥ
तत्पश्चात् उन्होंने विवाह के योग्य विविध सम्पत्ति तथा विशेष रूप से अनेक मांगलिक वस्तुएँ मंगवाईं।
श्लोक 19 (skanda.6.77.19)
अथ चैत्रस्य शुक्लस्य नक्षत्रे भगदैवते॥ त्रयोदश्यां दिने भानोः समायातो महेश्वरः
atha caitrasya śuklasya nakṣatre bhagadaivate trayodaśyāṁ dine bhānoḥ samāyāto maheśvaraḥ
फिर चैत्र मास की शुक्ल त्रयोदशी को, भग देवता वाले नक्षत्र में, रविवार के दिन, महेश्वर आये,
श्लोक 20 (skanda.6.77.20)
सर्वैः सुरगणैः सार्धं देवविष्णुपुरःसरैः॥ आदित्यैर्वसुभी रुद्रैरश्विभ्यां च तथाऽपरैः
sarvaiḥ suragaṇaiḥ sārdhaṁ devaviṣṇupuraḥsaraiḥ ādityairvasubhī rudrairaśvibhyāṁ ca tathā'paraiḥ
विष्णु आदि देवताओं के आगे-आगे, समस्त देवगणों, आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, दोनों अश्विनीकुमारों तथा अन्य देवताओं सहित,
श्लोक 21 (skanda.6.77.21)
सिद्धैः साध्यगणैर्भूतैः प्रेतैर्वैनायकैस्तथा॥ गन्धर्वैश्चारणौघैश्च गुह्यकैर्यक्षराक्षसैः
siddhaiḥ sādhyagaṇairbhūtaiḥ pretairvaināyakaistathā gandharvaiścāraṇaughaiśca guhyakairyakṣarākṣasaiḥ
सिद्धों, साध्यगणों, भूतों, प्रेतों, विनायकों, गन्धर्वों, चारण-समूहों, गुह्यकों, यक्षों और राक्षसों सहित।
श्लोक 22 (skanda.6.77.22)
एतस्मिन्नंतरे दक्षः संप्रहृष्टतनूरुहः॥ प्रययौ संमुखस्तस्य युक्तः सर्वैः सुहृद्गणैः
etasminnaṁtare dakṣaḥ saṁprahṛṣṭatanūruhaḥ prayayau saṁmukhastasya yuktaḥ sarvaiḥ suhṛdgaṇaiḥ
इसी बीच रोमांचित शरीर वाले दक्ष अपने सभी सुहृदों सहित उनके स्वागत हेतु आगे गये,
श्लोक 23 (skanda.6.77.23)
वाद्यमानैर्महावाद्यैः सूतमागधबन्दिभिः॥ पठद्भिः सर्वतोऽनेकैर्गायद्भिर्गायनैस्तथा
vādyamānairmahāvādyaiḥ sūtamāgadhabandibhiḥ paṭhadbhiḥ sarvato'nekairgāyadbhirgāyanaistathā
महान वाद्यों की ध्वनि, सूत-मागध-बन्दीजनों, चारों ओर पाठ करते अनेक जनों तथा गायकों के गायन के साथ।
श्लोक 24 (skanda.6.77.24)
ततः सर्वे सुरास्तत्र स्वयं दक्षेण पूजिताः॥ यथाश्रेष्ठं यथाज्येष्ठमुपविष्टा यथाक्रमम्॥ परिवार्याखिलां वेदिं मंडपांतरवर्तिनीम्
tataḥ sarve surāstatra svayaṁ dakṣeṇa pūjitāḥ yathāśreṣṭhaṁ yathājyeṣṭhamupaviṣṭā yathākramam parivāryākhilāṁ vediṁ maṁḍapāṁtaravartinīm
तब वहाँ दक्ष द्वारा स्वयं पूजित समस्त देवता, ज्येष्ठता-श्रेष्ठता के क्रम से, मण्डप के भीतर स्थित सम्पूर्ण वेदी को घेरकर बैठ गये।
श्लोक 25 (skanda.6.77.25)
ततः पितामहं प्राह दक्षः प्रीतिपुरःसरम्॥ प्रणिपत्य त्वया कर्म कार्यं वैवाहिकं विभोः
tataḥ pitāmahaṁ prāha dakṣaḥ prītipuraḥsaram praṇipatya tvayā karma kāryaṁ vaivāhikaṁ vibhoḥ
तब दक्ष ने प्रेमपूर्वक प्रणाम कर पितामह से कहा -- "आपको ही प्रभु का विवाह-कर्म सम्पन्न करना है,"
श्लोक 26 (skanda.6.77.26)
स्वयमेव सुताऽस्माकं येन स्यात्सुभगा सती॥ पुत्रपौत्रवती नित्यं सुशीला पतिवल्लभा
svayameva sutā'smākaṁ yena syātsubhagā satī putrapautravatī nityaṁ suśīlā pativallabhā
"जिससे हमारी पुत्री स्वयं सौभाग्यवती, सदा पुत्र-पौत्रवती, सुशीला और पतिप्रिया हो सके।"
श्लोक 27 (skanda.6.77.27)
बाढमित्येव सोऽप्युक्त्वा प्रहृष्टेनांतरात्मना॥ समुत्थाय ततश्चक्रे कृत्यमर्हणपूर्वकम्
bāḍhamityeva so'pyuktvā prahṛṣṭenāṁtarātmanā samutthāya tataścakre kṛtyamarhaṇapūrvakam
"ऐसा ही हो" कहकर वे भी प्रसन्न अन्तःकरण से उठ खड़े हुए और अर्घ्य आदि पूर्वक कार्य सम्पन्न किया।
श्लोक 28 (skanda.6.77.28)
संप्रदानक्रियां कृत्वा तत्रैव विधिपूर्वकम्॥ ततो हस्तग्रहं ताभ्यां मिथश्चक्रे यथाक्रमम्॥ मातॄणां पुरतो वेधाः सतीशाभ्यां यथोचितम्
saṁpradānakriyāṁ kṛtvā tatraiva vidhipūrvakam tato hastagrahaṁ tābhyāṁ mithaścakre yathākramam mātṝṇāṁ purato vedhāḥ satīśābhyāṁ yathocitam
वहीं विधिपूर्वक कन्यादान की क्रिया कर, ब्रह्मा ने माताओं के सम्मुख यथोचित रूप से उन दोनों सती और ईश का हस्तमिलन क्रमशः सम्पन्न कराया।
श्लोक 29 (skanda.6.77.29)
अथ वेदिं समासाद्य गृह्योक्तविधिनाऽखिलम्॥ अग्निकार्यं यथोद्दिष्टं चकाराथ सुविस्तरम्
atha vediṁ samāsādya gṛhyoktavidhinā'khilam agnikāryaṁ yathoddiṣṭaṁ cakārātha suvistaram
तब वेदी पर पहुँचकर उन्होंने गृह्यसूत्रोक्त विधि से सम्पूर्ण अग्निकार्य विस्तारपूर्वक यथाविधि सम्पन्न किया।
श्लोक 30 (skanda.6.77.30)
यथायथा स रम्याणि वीक्षतेंऽगानि कौतुकात्॥ सत्याः पितामहो हृष्टः कामार्तोऽभूत्तथातथा
yathāyathā sa ramyāṇi vīkṣateṁ'gāni kautukāt satyāḥ pitāmaho hṛṣṭaḥ kāmārto'bhūttathātathā
कौतूहलवश जैसे-जैसे वे सती के रम्य अंगों को देखते गये, वैसे-वैसे हर्षित पितामह कामार्त होते गये।
श्लोक 31 (skanda.6.77.31)
तेनैकं वदनं मुक्त्वा तस्या वस्त्रावगुंठितम्॥ वीक्षिताऽतिस्मरार्तेन यथा कश्चिन्न बुद्ध्यते
tenaikaṁ vadanaṁ muktvā tasyā vastrāvaguṁṭhitam vīkṣitā'tismarārtena yathā kaścinna buddhyate
कामातुर होकर उन्होंने उसके वस्त्र से आच्छादित मुख में से केवल एक मुख उघाड़कर देखा, इस प्रकार कि कोई समझ न सके।
श्लोक 32 (skanda.6.77.32)
न शंभोर्लज्जया वक्त्रं प्रत्यक्षं स व्यलोकयत्॥ न च सा लज्जयाविष्टा करोति प्रकटं मुखम्
na śaṁbhorlajjayā vaktraṁ pratyakṣaṁ sa vyalokayat na ca sā lajjayāviṣṭā karoti prakaṭaṁ mukham
शम्भु की लज्जा से उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से उसका मुख नहीं देखा, और वह भी लज्जा से युक्त होकर अपना मुख प्रकट नहीं करती थी।
श्लोक 33 (skanda.6.77.33)
ततस्तद्दर्शनार्थाय स उपायं व्यलोकयत्॥ धूमद्वारेण कामार्तश्चकार च ततः परम्
tatastaddarśanārthāya sa upāyaṁ vyalokayat dhūmadvāreṇa kāmārtaścakāra ca tataḥ param
तब उसे देखने के लिये उन्होंने एक उपाय सोचा, और कामातुर होकर धूम के द्वारा यह किया --
श्लोक 34 (skanda.6.77.34)
आर्द्रेंधनानि भूरीणि क्षिप्त्वाक्षित्वा विभावसौ॥ स्वल्पाज्याहुतिविन्यासादार्द्रद्रव्योद्भवस्तथा
ārdreṁdhanāni bhūrīṇi kṣiptvākṣitvā vibhāvasau svalpājyāhutivinyāsādārdradravyodbhavastathā
अग्नि में बहुत सा गीला ईंधन डालकर तथा अत्यल्प घी की आहुति देकर, उन्होंने गीली वस्तुओं से उत्पन्न धुआँ पैदा किया।
श्लोक 35 (skanda.6.77.35)
एतस्मिन्नंतरे धूमः प्रादुर्भूतः समंततः॥ तादृग्येन तमोभूतं वेदिमूलं विनिर्मितम्
etasminnaṁtare dhūmaḥ prādurbhūtaḥ samaṁtataḥ tādṛgyena tamobhūtaṁ vedimūlaṁ vinirmitam
इसी बीच चारों ओर इतना धुआँ फैल गया कि उससे वेदी का आधार अन्धकारमय हो गया।
श्लोक 36 (skanda.6.77.36)
ततो धूमाकुलेनेत्रे भगवांस्त्रिपुरान्तकः॥ हस्ताभ्यां छादयामास येऽन्ये तत्र व्यवस्थिताः
tato dhūmākulenetre bhagavāṁstripurāntakaḥ hastābhyāṁ chādayāmāsa ye'nye tatra vyavasthitāḥ
तब धुएँ से व्याकुल नेत्रों वाले त्रिपुरान्तक भगवान् ने अपने दोनों हाथों से आँखें ढक लीं, और वहाँ उपस्थित अन्य लोगों ने भी ऐसा ही किया।
श्लोक 37 (skanda.6.77.37)
ततो वस्त्रं समुत्क्षिप्य सतीवक्त्रं पितामहः॥ वीक्षयामास कामार्तः प्रहृष्टेनांतरात्मना
tato vastraṁ samutkṣipya satīvaktraṁ pitāmahaḥ vīkṣayāmāsa kāmārtaḥ prahṛṣṭenāṁtarātmanā
तब कामातुर पितामह ने वस्त्र उठाकर, प्रसन्न अन्तःकरण से सती का मुख देखा।
श्लोक 38 (skanda.6.77.38)
तस्य रेतः प्रचस्कन्द ततस्तद्वीक्षणाद्द्रुतम्॥ पतितं च धरापृष्ठे तुषारचयसंनिभम्
tasya retaḥ pracaskanda tatastadvīkṣaṇāddrutam patitaṁ ca dharāpṛṣṭhe tuṣāracayasaṁnibham
उस दर्शन से तत्काल उनका वीर्य स्खलित हो गया और तुषार-राशि के समान पृथ्वी पर गिर पड़ा।
श्लोक 39 (skanda.6.77.39)
ततश्च सिकतौघेना तत्क्षणात्पद्मसंभवः॥ छादयामास तद्रेतो यथा कश्चिन्न बुद्ध्यते
tataśca sikataughenā tatkṣaṇātpadmasaṁbhavaḥ chādayāmāsa tadreto yathā kaścinna buddhyate
तत्क्षण ही पद्मज (ब्रह्मा) ने उसे बालू के ढेर से ढक दिया, ताकि कोई समझ न सके।
श्लोक 40 (skanda.6.77.40)
अथ तद्भगवाञ्च्छंभुर्ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा॥ रेतोऽवस्कन्दनात्तस्य कोपादेतदुवाच ह
atha tadbhagavāñcchaṁbhurjñātvā divyena cakṣuṣā reto'vaskandanāttasya kopādetaduvāca ha
परन्तु भगवान् शम्भु ने अपनी दिव्य दृष्टि से उनके वीर्य-स्खलन को जानकर क्रोधपूर्वक यह कहा --
श्लोक 41 (skanda.6.77.41)
किमेतद्विहितं पाप त्वया कर्म विगर्हितम्॥ नैवार्हा मम कान्ताया वक्त्रवीक्षाऽनुरागतः
kimetadvihitaṁ pāpa tvayā karma vigarhitam naivārhā mama kāntāyā vaktravīkṣā'nurāgataḥ
"हे पापी! यह कैसा निन्दनीय कर्म तुमने किया है? मेरी प्रिया के मुख को अनुरागपूर्वक देखने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है।"
श्लोक 42 (skanda.6.77.42)
त्वं वेत्सि शंकरेणैतत्कर्मजालं न विंदितम्॥ त्रैलोक्येऽपि मयाऽप्यस्ति गूढं तत्स्यात्कथं विधे॥ यत्किञ्चित्त्रिषु लोकेषु जंगमं स्थावरं तथा॥ तस्याहं मध्यगो मूढ तैलं यद्वत्तिलांतगम्
tvaṁ vetsi śaṁkareṇaitatkarmajālaṁ na viṁditam trailokye'pi mayā'pyasti gūḍhaṁ tatsyātkathaṁ vidhe yatkiñcittriṣu lokeṣu jaṁgamaṁ sthāvaraṁ tathā tasyāhaṁ madhyago mūḍha tailaṁ yadvattilāṁtagam
"क्या तुम समझते हो कि यह कर्मजाल शंकर से अज्ञात है? हे विधाता! मुझसे तीनों लोकों में भी क्या कुछ गुप्त रह सकता है? तीनों लोकों में जो कुछ भी चर-अचर है, उसके मध्य मैं ही व्याप्त हूँ, हे मूढ़! जैसे तिल में तेल व्याप्त रहता है।"
श्लोक 43 (skanda.6.77.43)
तस्मात्स्पृश निजं शीर्षं ब्रह्मन्नेतदसंशयम्॥ यावदेवं गते ब्रह्मा शिरः स्पृशति पाणिना॥ तावत्तत्र स्थितः साक्षात्तद्रूपो वृषवाहनः
tasmātspṛśa nijaṁ śīrṣaṁ brahmannetadasaṁśayam yāvadevaṁ gate brahmā śiraḥ spṛśati pāṇinā tāvattatra sthitaḥ sākṣāttadrūpo vṛṣavāhanaḥ
"अतः, हे ब्रह्मन्! अपने ही सिर का स्पर्श करो, इसमें कोई संशय नहीं।" ऐसा कहे जाने पर, ब्रह्मा जैसे ही हाथ से अपना सिर स्पर्श करने लगे, वहीं साक्षात् उसी रूप में वृषवाहन (शिव) स्थित हो गये।
श्लोक 44 (skanda.6.77.44)
ततो लज्जापरीतांगः स्थितश्चाधोमुखो द्विजाः॥ इन्द्राद्यैरमरैः सर्वैः सहितः सर्वतः स्थितैः
tato lajjāparītāṁgaḥ sthitaścādhomukho dvijāḥ indrādyairamaraiḥ sarvaiḥ sahitaḥ sarvataḥ sthitaiḥ
तब हे ब्राह्मणो! इन्द्र आदि समस्त देवताओं से चारों ओर घिरे हुए, वे लज्जा से व्याप्त अंगों वाले, अधोमुख होकर खड़े रहे।
श्लोक 45 (skanda.6.77.45)
अथाऽसौ लज्जयाविष्टः प्रणिपत्य महेश्वरम्॥ प्रोवाच च स्तुतिं कृत्वा क्षम्यतां क्षम्यतामिति
athā'sau lajjayāviṣṭaḥ praṇipatya maheśvaram provāca ca stutiṁ kṛtvā kṣamyatāṁ kṣamyatāmiti
तब लज्जा से व्याप्त होकर उन्होंने महेश्वर को प्रणाम किया और स्तुति करते हुए कहा -- "क्षमा करो, क्षमा करो।"
श्लोक 46 (skanda.6.77.46)
अस्य पापस्य शुद्ध्यर्थं प्रायश्चित्तं वद प्रभो॥ निग्रहं च यथान्यायं येन पापं प्रयाति मे
asya pāpasya śuddhyarthaṁ prāyaścittaṁ vada prabho nigrahaṁ ca yathānyāyaṁ yena pāpaṁ prayāti me
"हे प्रभो! इस पाप की शुद्धि के लिये प्रायश्चित्त बताइये, तथा न्यायसंगत दण्ड भी, जिससे मेरा यह पाप दूर हो जाए।"
श्लोक 47 (skanda.6.77.47)
श्रीभगवानुवाच॥ अनेनैव तु रूपेण मस्तकस्थेन वै ततः॥ तपः कुरु समाधिस्थो ममाराधनतत्परः
śrībhagavānuvāca anenaiva tu rūpeṇa mastakasthena vai tataḥ tapaḥ kuru samādhistho mamārādhanatatparaḥ
भगवान् बोले -- अब इसी रूप में, सिर पर स्थित होकर, समाधिस्थ होकर तथा मेरी आराधना में तत्पर होकर तप करो।
श्लोक 48 (skanda.6.77.48)
ख्यातिं यास्यति सर्वत्र नाम्ना रुद्रशिरः क्षितौ॥ साधकः सर्वकृत्यानां तेजोभाजां द्विजन्मनाम्
khyātiṁ yāsyati sarvatra nāmnā rudraśiraḥ kṣitau sādhakaḥ sarvakṛtyānāṁ tejobhājāṁ dvijanmanām
यह स्थान पृथ्वी पर "रुद्रशीर्ष" नाम से सर्वत्र प्रसिद्धि पाएगा, तेजस्वी ब्राह्मणों के समस्त कर्मों को सिद्ध करने वाला।
श्लोक 49 (skanda.6.77.49)
मानुषाणामिदं कृत्यं यस्माच्चीर्णं त्वयाऽऽधुना॥ तस्मात्त्वं मानुषो भूत्वा विचरिष्यसि भूतले
mānuṣāṇāmidaṁ kṛtyaṁ yasmāccīrṇaṁ tvayā''dhunā tasmāttvaṁ mānuṣo bhūtvā vicariṣyasi bhūtale
चूँकि तुमने अभी मनुष्यों जैसा यह कर्म किया है, इसलिये तुम मनुष्य बनकर पृथ्वी पर विचरण करोगे।
श्लोक 50 (skanda.6.77.50)
यस्त्वां चानेन रूपेण दृष्ट्वा पृच्छां करिष्यति॥ किमेतद्ब्रह्मणो मूर्ध्नि भगवांस्त्रिपुरांतकः
yastvāṁ cānena rūpeṇa dṛṣṭvā pṛcchāṁ kariṣyati kimetadbrahmaṇo mūrdhni bhagavāṁstripurāṁtakaḥ
जो कोई इस रूप में तुम्हें देखकर यह प्रश्न पूछेगा कि "ब्रह्मा के मस्तक पर यह त्रिपुरान्तक भगवान् क्या है?"
श्लोक 51 (skanda.6.77.51)
ततस्ते चेष्टितं सर्वं कौतुकाच्च शृणोति यः॥ परदारकृतात्पापात्ततो मुक्तिं प्रयास्यति
tataste ceṣṭitaṁ sarvaṁ kautukācca śṛṇoti yaḥ paradārakṛtātpāpāttato muktiṁ prayāsyati
और फिर जो कोई कौतूहलवश तुम्हारी यह सारी कथा सुनेगा, वह परस्त्रीगमन के पाप से मुक्ति पाएगा।
श्लोक 52 (skanda.6.77.52)
यथायथा जनस्त्वेतत्कृत्यं ते कीर्तयिष्यति॥ तथातथा विशुद्धिस्ते पापस्यास्य भविष्यति
yathāyathā janastvetatkṛtyaṁ te kīrtayiṣyati tathātathā viśuddhiste pāpasyāsya bhaviṣyati
जैसे-जैसे कोई व्यक्ति तुम्हारे इस कृत्य का वर्णन करेगा, वैसे-वैसे इस पाप से तुम्हारी शुद्धि होती जाएगी।
श्लोक 53 (skanda.6.77.53)
एतदेव हि ते ब्रह्मन्प्रायश्चित्तं प्रकीर्तितम्॥ जनहास्यकरं लोके तव गर्हाकरं परम्
etadeva hi te brahmanprāyaścittaṁ prakīrtitam janahāsyakaraṁ loke tava garhākaraṁ param
हे ब्रह्मन्! यही तुम्हारा प्रायश्चित्त कहा गया है -- जगत् में लोगों के लिये हास्यजनक और तुम्हारे लिये अत्यंत निन्दाजनक।
श्लोक 54 (skanda.6.77.54)
एतच्च तव वीर्यं तु पतितं वेदिमध्यगम्॥ कामार्तस्य मया दृष्टं नैतद्व्यर्थं भविष्यति
etacca tava vīryaṁ tu patitaṁ vedimadhyagam kāmārtasya mayā dṛṣṭaṁ naitadvyarthaṁ bhaviṣyati
और यह तुम्हारा वीर्य जो वेदी के मध्य में गिरा है, जिसे मैंने कामातुर अवस्था में देखा है, वह व्यर्थ नहीं जाएगा।
श्लोक 55 (skanda.6.77.55)
यावन्मात्रैः परिस्पृष्टमेतत्सैकतरेणुभिः॥ तावन्मात्रा भविष्यंति मुनयः संशितव्रताः
yāvanmātraiḥ parispṛṣṭametatsaikatareṇubhiḥ tāvanmātrā bhaviṣyaṁti munayaḥ saṁśitavratāḥ
जितने बालू के कणों ने इसे स्पर्श किया है, उतने ही दृढ़व्रती मुनि उत्पन्न होंगे,
श्लोक 56 (skanda.6.77.56)
वालखिल्या इति ख्याताः सर्वेंऽगुष्ठप्रमाणकाः॥ तपोवीर्यसमोपेताः शापानुग्रहकारकाः
vālakhilyā iti khyātāḥ sarveṁ'guṣṭhapramāṇakāḥ tapovīryasamopetāḥ śāpānugrahakārakāḥ
जो "वालखिल्य" नाम से प्रसिद्ध होंगे, सभी अंगूठे के बराबर परिमाण वाले, तप और वीर्य से युक्त, शाप और अनुग्रह करने में समर्थ।
श्लोक 57 (skanda.6.77.57)
एतस्मिन्नंतरे तस्माद्वेदिमध्याच्च तत्क्षणात्॥ अष्टाशीतिसहस्राणि मुनीनां भावितात्मनाम्॥ अंगुष्ठकप्रमाणानि निष्क्रान्तानि द्विजोत्तमाः
etasminnaṁtare tasmādvedimadhyācca tatkṣaṇāt aṣṭāśītisahasrāṇi munīnāṁ bhāvitātmanām aṁguṣṭhakapramāṇāni niṣkrāntāni dvijottamāḥ
इसी बीच उस वेदी के मध्य से तत्क्षण अठासी हजार भावितात्मा मुनि, अंगूठे के बराबर आकार वाले, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! निकल आये।
श्लोक 58 (skanda.6.77.58)
ततस्ते प्रणिपत्योच्चैः प्रोचुर्देवं पितामहम्॥ स्थानं दर्शय नस्तात तपोऽर्थं कलिवर्जितम्
tataste praṇipatyoccaiḥ procurdevaṁ pitāmaham sthānaṁ darśaya nastāta tapo'rthaṁ kalivarjitam
तब उन्होंने ऊँचे स्वर से प्रणाम करते हुए देवता पितामह से कहा -- "हे तात! हमें कलि-दोष से रहित तप हेतु स्थान दिखाइये।"
श्लोक 59 (skanda.6.77.59)
पितामह उवाच॥ अस्मिन्क्षेत्रे मया सार्धं कुरुध्वं पुत्रकास्तपः॥ गमिष्यथ परां सिद्धिं येन लोके सुदुर्लभाम्
pitāmaha uvāca asminkṣetre mayā sārdhaṁ kurudhvaṁ putrakāstapaḥ gamiṣyatha parāṁ siddhiṁ yena loke sudurlabhām
पितामह ने कहा -- हे पुत्रो! इसी क्षेत्र में मेरे साथ तप करो, जिससे तुम लोक में अत्यंत दुर्लभ परम सिद्धि को प्राप्त करोगे।
श्लोक 60 (skanda.6.77.60)
ते तथेति प्रतिज्ञाय कृत्वा तत्राश्रमं शुभम्॥ वालखिल्यास्तपश्चक्रुः संसिद्धिं च परां गताः
te tatheti pratijñāya kṛtvā tatrāśramaṁ śubham vālakhilyāstapaścakruḥ saṁsiddhiṁ ca parāṁ gatāḥ
"ऐसा ही हो" कहकर वालखिल्यों ने वहाँ एक शुभ आश्रम बनाकर तप किया और परम सिद्धि को प्राप्त हुए।
श्लोक 61 (skanda.6.77.61)
अथ ब्रह्मापि तत्कर्म सर्वं वैवाहिकं क्रमात्॥ समाप्तिमनयत्प्रोक्तं यच्छ्रुतौ तेन च स्वयम्
atha brahmāpi tatkarma sarvaṁ vaivāhikaṁ kramāt samāptimanayatproktaṁ yacchrutau tena ca svayam
तत्पश्चात् ब्रह्मा ने भी शास्त्रोक्त उस सम्पूर्ण विवाह-कर्म को क्रमशः स्वयं समाप्त कराया।
श्लोक 62 (skanda.6.77.62)
पतत्सु पुष्पवर्षेषु समन्ताद्गगनांगणात्॥ वाद्यमानेषु वाद्येषु गीयमानैश्च गीतकैः
patatsu puṣpavarṣeṣu samantādgaganāṁgaṇāt vādyamāneṣu vādyeṣu gīyamānaiśca gītakaiḥ
आकाश के आँगन से चारों ओर पुष्पों की वर्षा होते हुए, वाद्य बजते हुए और गीत गाये जाते हुए,
श्लोक 63 (skanda.6.77.63)
पठत्सु विप्रमुख्येषु नृत्यमानासु रागतः॥ रंभादिषु पुरन्ध्रीषु देवानां दृङ्मनोहरम्
paṭhatsu vipramukhyeṣu nṛtyamānāsu rāgataḥ raṁbhādiṣu purandhrīṣu devānāṁ dṛṅmanoharam
प्रमुख विप्रों के पाठ करते हुए तथा रंभा आदि अप्सराओं के राग के अनुसार नृत्य करते हुए, जो देवताओं के नेत्रों को मनोहर लगता था,
श्लोक 64 (skanda.6.77.64)
एवं महोत्सवो जज्ञे ततस्तुंबुरुपूर्वकैः॥ गीयमानेषु गीतेषु यथापूर्वं त्रिविष्टपे
evaṁ mahotsavo jajñe tatastuṁburupūrvakaiḥ gīyamāneṣu gīteṣu yathāpūrvaṁ triviṣṭape
इस प्रकार वहाँ तुम्बुरु आदि द्वारा गाये जाते गीतों के साथ, पहले की भाँति स्वर्गलोक में महान् उत्सव उत्पन्न हुआ।
श्लोक 65 (skanda.6.77.65)
अथ कर्मावसाने स भगवांस्त्रिपुरांतकः॥ प्रोवाच पद्मजं भक्त्या दक्षिणां ते ददामि किम्
atha karmāvasāne sa bhagavāṁstripurāṁtakaḥ provāca padmajaṁ bhaktyā dakṣiṇāṁ te dadāmi kim
तब कर्म की समाप्ति पर उन त्रिपुरान्तक भगवान् ने भक्तिपूर्वक पद्मज (ब्रह्मा) से कहा -- "मैं तुम्हें कौन-सी दक्षिणा दूँ?"
श्लोक 66 (skanda.6.77.66)
वैवाहिकी सुरश्रेष्ठ यद्यपि स्यात्सुदुर्लभा॥ ब्रूहि शीघ्रं महाभाग नादेयं विद्यते मम
vaivāhikī suraśreṣṭha yadyapi syātsudurlabhā brūhi śīghraṁ mahābhāga nādeyaṁ vidyate mama
"हे देवश्रेष्ठ! वैवाहिक दक्षिणा भले ही अत्यंत दुर्लभ हो, हे महाभाग! शीघ्र बताओ -- मेरे लिये कुछ भी अदेय नहीं है।"
श्लोक 67 (skanda.6.77.67)
पितामह उवाच॥ अनेनैव तु रूपेण वेद्यामस्यां सुरेश्वर॥ त्वया स्थेयं सदैवात्र नृणां पापविशुद्धये
pitāmaha uvāca anenaiva tu rūpeṇa vedyāmasyāṁ sureśvara tvayā stheyaṁ sadaivātra nṛṇāṁ pāpaviśuddhaye
पितामह ने कहा -- हे सुरेश्वर! इसी रूप में, इस वेदी पर, मनुष्यों के पापों की शुद्धि के लिये तुम्हें सदा यहीं रहना होगा,
श्लोक 68 (skanda.6.77.68)
येन ते सन्निधौ कृत्वा स्वाश्रमं शशिशेखर॥ तपः करोमि नाशाय पापस्यास्य महत्तमम्
yena te sannidhau kṛtvā svāśramaṁ śaśiśekhara tapaḥ karomi nāśāya pāpasyāsya mahattamam
"जिससे, हे शशिशेखर! तुम्हारे सान्निध्य में अपना आश्रम बनाकर, मैं इस महान् पाप के नाश हेतु तप कर सकूँ।"
श्लोक 69 (skanda.6.77.69)
चैत्रशुक्लत्रयोदश्यां नक्षत्रे भगदैवते॥ सूर्यवारेण यो भक्त्या वीक्षयिष्यति मानवः॥ तदैव तस्य पापानि प्रयास्यन्ति च संक्षयम्
caitraśuklatrayodaśyāṁ nakṣatre bhagadaivate sūryavāreṇa yo bhaktyā vīkṣayiṣyati mānavaḥ tadaiva tasya pāpāni prayāsyanti ca saṁkṣayam
"चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को, भग देवता वाले नक्षत्र में, रविवार के दिन, जो मनुष्य भक्तिपूर्वक तुम्हारा दर्शन करेगा, उसके पाप उसी क्षण नष्ट हो जाएँगे।"
श्लोक 70 (skanda.6.77.70)
या नारी दुर्भगा वन्ध्या काणा रूपविवर्जिता॥ साऽपि त्वद्दर्शनादेव भविष्यति सुरूपधृक्॥ प्रजावती सुभोगाढ्या सुभगा नात्र संशयः
yā nārī durbhagā vandhyā kāṇā rūpavivarjitā sā'pi tvaddarśanādeva bhaviṣyati surūpadhṛk prajāvatī subhogāḍhyā subhagā nātra saṁśayaḥ
"जो स्त्री दुर्भागी, बाँझ, काणी अथवा रूपहीन हो, वह भी तुम्हारे दर्शनमात्र से सुरूप, सन्तानवती, सुखी-सम्पन्न और सौभाग्यवती हो जाएगी, इसमें कोई संशय नहीं।"
श्लोक 71 (skanda.6.77.71)
महेश्वर उवाच॥ हिताय सर्वलोकानां वेद्यामस्यां व्यवस्थितः॥ स्थास्यामि सहितः पत्न्या सत्यात्वद्वचनाद्विधे
maheśvara uvāca hitāya sarvalokānāṁ vedyāmasyāṁ vyavasthitaḥ sthāsyāmi sahitaḥ patnyā satyātvadvacanādvidhe
महेश्वर बोले -- हे विधे! समस्त लोकों के हित के लिये, तुम्हारे सत्य वचन के अनुसार, मैं इस वेदी पर अपनी पत्नी सहित स्थित रहूँगा।
श्लोक 72 (skanda.6.77.72)
सूत उवाच॥ एवं स भगवांस्तत्र सभार्यो वृषभध्वजः॥ विद्यते वेदिमध्यस्थो लोकानां पापनाशनः
sūta uvāca evaṁ sa bhagavāṁstatra sabhāryo vṛṣabhadhvajaḥ vidyate vedimadhyastho lokānāṁ pāpanāśanaḥ
सूत जी बोले -- इस प्रकार वे भगवान् वृषभध्वज अपनी पत्नी सहित वहाँ वेदी के मध्य में स्थित होकर लोगों के पापों का नाश करते रहते हैं।
श्लोक 73 (skanda.6.77.73)
एतद्वः सर्वमाख्यातं यथा तस्य पुराऽभवत्॥ विवाहो वृषनाथस्य मनौ स्वायंभुवे द्विजाः
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yathā tasya purā'bhavat vivāho vṛṣanāthasya manau svāyaṁbhuve dvijāḥ
हे ब्राह्मणो! यह सब तुम्हें बताया गया, जैसा पूर्वकाल में स्वायंभुव मन्वन्तर में वृषनाथ (शिव) का यह विवाह हुआ था।
श्लोक 74 (skanda.6.77.74)
विवाहसमये प्राप्ते प्रारम्भे वा शृणोति यः॥ एतदाख्यानमव्यग्रं संपूज्य वृषभध्वजम्॥ तस्याऽविघ्नं भवेत्सर्वं कर्म वैवाहिकं च यत्
vivāhasamaye prāpte prārambhe vā śṛṇoti yaḥ etadākhyānamavyagraṁ saṁpūjya vṛṣabhadhvajam tasyā'vighnaṁ bhavetsarvaṁ karma vaivāhikaṁ ca yat
विवाह का समय आने पर या उसके आरम्भ में जो कोई एकाग्रचित्त होकर वृषभध्वज की पूजा करते हुए यह आख्यान सुनता है, उसका सम्पूर्ण विवाह-कर्म निर्विघ्न सम्पन्न होता है,
श्लोक 75 (skanda.6.77.75)
कन्या च सुखसौभाग्य शीलाचारगुणान्विता॥ तथा स्यात्पुत्रिणी साध्वी पतिव्रतपरायणा
kanyā ca sukhasaubhāgya śīlācāraguṇānvitā tathā syātputriṇī sādhvī pativrataparāyaṇā
और कन्या सुख-सौभाग्य, शील-आचार तथा गुणों से युक्त, पुत्रवती, साध्वी और पतिव्रता होती है।