नागर खण्ड · अध्याय 76
मुंडीरकालप्रियमूलस्थानप्रतिष्ठावर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.6.76.1)
सूत उवाच॥ तथान्यदपि तत्रास्ति भास्करत्रितयं शुभम्॥ यैस्तुष्टैस्त्रिषु लोकेषु मानवो मुक्तिमाप्नुयात्
sūta uvāca tathānyadapi tatrāsti bhāskaratritayaṁ śubham yaistuṣṭaistriṣu lokeṣu mānavo muktimāpnuyāt
सूत जी बोले -- वहाँ एक अन्य शुभ वस्तु भी है -- तीन सूर्यों की त्रयी, जिनसे प्रसन्न होकर मनुष्य तीनों लोकों में मुक्ति प्राप्त करता है।
श्लोक 2 (skanda.6.76.2)
मुण्डीरं प्रथमं तत्र कालप्रियं तथापरम्॥ मूलस्थानं तृतीयं च सर्वव्याधिविनाशनम्
muṇḍīraṁ prathamaṁ tatra kālapriyaṁ tathāparam mūlasthānaṁ tṛtīyaṁ ca sarvavyādhivināśanam
वहाँ पहला मुण्डीर है, दूसरा कालप्रिय है, और तीसरा मूलस्थान है, जो समस्त व्याधियों का नाश करने वाला है।
श्लोक 3 (skanda.6.76.3)
तत्र संक्रमते सूर्यो मुंडीरे रजनीक्षये॥ कालप्रिये च मध्याह्ने मूलस्थाने क्षपागमे
tatra saṁkramate sūryo muṁḍīre rajanīkṣaye kālapriye ca madhyāhne mūlasthāne kṣapāgame
वहाँ सूर्य रात्रि के अंत (प्रातःकाल) में मुण्डीर में, मध्याह्न में कालप्रिय में, और रात्रि के आगमन (सायंकाल) में मूलस्थान में संक्रमण करता है।
श्लोक 4 (skanda.6.76.4)
तस्मिन्काले नरो भक्त्या पश्येदप्येकमेवच॥ कृतक्षणो नरो मोक्षं सत्यं याति न संशयः
tasminkāle naro bhaktyā paśyedapyekamevaca kṛtakṣaṇo naro mokṣaṁ satyaṁ yāti na saṁśayaḥ
उस समय जो मनुष्य भक्तिपूर्वक उनमें से एक को भी देख लेता है, वह उस क्षण को सार्थक कर सत्य ही मोक्ष को प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 5 (skanda.6.76.5)
ऋषय ऊचुः॥ मुंडीरः पूर्वदिग्भागे धरित्र्याः श्रूयते किल॥ मध्ये कालप्रियो देवो मूलस्थानं तदन्तरे
ṛṣaya ūcuḥ muṁḍīraḥ pūrvadigbhāge dharitryāḥ śrūyate kila madhye kālapriyo devo mūlasthānaṁ tadantare
ऋषियों ने कहा -- ऐसा सुना जाता है कि मुण्डीर पृथ्वी के पूर्व दिशा में है, बीच में कालप्रिय देव हैं, और मूलस्थान उनके बीच में है --
श्लोक 6 (skanda.6.76.6)
तत्कथं ते त्रयस्तत्र संजाताः सूत भास्कराः॥ हाटकेश्वरजे क्षेत्रे सर्वं नो ब्रूहि विस्तरात्
tatkathaṁ te trayastatra saṁjātāḥ sūta bhāskarāḥ hāṭakeśvaraje kṣetre sarvaṁ no brūhi vistarāt
"तो हे सूत! वे तीनों भास्कर हाटकेश्वर क्षेत्र में वहाँ कैसे उत्पन्न हुए? यह सब हमें विस्तार से बताइये।"
श्लोक 7 (skanda.6.76.7)
सूत उवाच॥ अस्ति सागरपर्यंते विटंकपुरमुत्तमम्॥ समुद्रवीचिसंसक्तप्रोच्चप्राकारमण्डनम्
sūta uvāca asti sāgaraparyaṁte viṭaṁkapuramuttamam samudravīcisaṁsaktaproccaprākāramaṇḍanam
सूत जी बोले -- सागर के तट पर विटंकपुर नामक एक उत्तम नगर है, जो समुद्र की लहरों से संलग्न ऊँची प्राचीरों से सुशोभित है।
श्लोक 8 (skanda.6.76.8)
तत्राभूद्ब्राह्मणः कश्चित्कुष्ठव्याधिसमन्वितः॥ पूर्वकर्मविपाकेन यौवने समुपस्थिते
tatrābhūdbrāhmaṇaḥ kaścitkuṣṭhavyādhisamanvitaḥ pūrvakarmavipākena yauvane samupasthite
वहाँ एक ब्राह्मण था, जो पूर्वजन्म के कर्मों के फलस्वरूप यौवनावस्था में कोढ़ रोग से ग्रस्त हो गया था।
श्लोक 9 (skanda.6.76.9)
तस्य भार्याऽभवत्साध्वी कुलीना शीलमंडना॥ तथाभूतमपि प्रायः सा पश्यति यथा स्मरम्
tasya bhāryā'bhavatsādhvī kulīnā śīlamaṁḍanā tathābhūtamapi prāyaḥ sā paśyati yathā smaram
उसकी पत्नी एक साध्वी, कुलीन, शीलवती स्त्री थी; ऐसी अवस्था में भी वह प्रायः उसे कामदेव के समान देखती थी।
श्लोक 10 (skanda.6.76.10)
औषधानि विचित्राणि महार्घ्याण्यपि चाददे॥ तदर्थमुपलेपांश्च पथ्यानि विविधानि च
auṣadhāni vicitrāṇi mahārghyāṇyapi cādade tadarthamupalepāṁśca pathyāni vividhāni ca
उसने उसके लिये विविध, अत्यंत मूल्यवान् औषधियाँ, लेप तथा नाना प्रकार के पथ्य-आहार जुटाये,
श्लोक 11 (skanda.6.76.11)
तथा भिषग्वरान्नित्यमानिनाय च सादरम्॥ तदर्थे न गुणस्तस्य तथापि स्याच्छरीरजः
tathā bhiṣagvarānnityamānināya ca sādaram tadarthe na guṇastasya tathāpi syāccharīrajaḥ
तथा नित्य आदरपूर्वक श्रेष्ठ वैद्यों को बुलाया; फिर भी उसके शरीर को कोई लाभ नहीं हुआ।
श्लोक 12 (skanda.6.76.12)
यथायथा स गृह्णाति भेषजानि द्विजोत्तमाः॥ कुष्ठेन सर्वगात्रेषु व्याप्यते च तथातथा
yathāyathā sa gṛhṇāti bheṣajāni dvijottamāḥ kuṣṭhena sarvagātreṣu vyāpyate ca tathātathā
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वह जैसे-जैसे औषधियाँ लेता गया, वैसे-वैसे कोढ़ उसके सम्पूर्ण शरीर में फैलता गया।
श्लोक 13 (skanda.6.76.13)
अथैवं वर्तमानस्य तस्य विप्रवरस्य च॥ गृहेऽतिथिः समायातः कश्चित्पांथः श्रमान्वितः
athaivaṁ vartamānasya tasya vipravarasya ca gṛhe'tithiḥ samāyātaḥ kaścitpāṁthaḥ śramānvitaḥ
इस प्रकार की अवस्था में रहते हुए उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के घर में एक थका हुआ पथिक अतिथि रूप में आया।
श्लोक 14 (skanda.6.76.14)
अथ विप्रं गृहं प्राप्तं दृष्ट्वा तस्य सती प्रिया॥ अज्ञातमपि सद्भक्त्या सूपचारैरतोषयत्
atha vipraṁ gṛhaṁ prāptaṁ dṛṣṭvā tasya satī priyā ajñātamapi sadbhaktyā sūpacārairatoṣayat
उस ब्राह्मण को घर आया देखकर उसकी सती पत्नी ने, अपरिचित होने पर भी, सच्ची भक्ति से उचित सत्कार द्वारा उसे संतुष्ट किया।
श्लोक 15 (skanda.6.76.15)
अथ तं स्नातमाचांतं कृताहारं द्विजोत्तमम्॥ विश्रान्तं शयने विप्रः प्रोवाच स गृहाधिपः
atha taṁ snātamācāṁtaṁ kṛtāhāraṁ dvijottamam viśrāntaṁ śayane vipraḥ provāca sa gṛhādhipaḥ
तब स्नान, आचमन और भोजन कर चुके तथा शय्या पर विश्राम कर रहे उस श्रेष्ठ ब्राह्मण अतिथि से घर के स्वामी उस ब्राह्मण ने कहा --
श्लोक 16 (skanda.6.76.16)
तेजोऽन्वितं यथा भानुं रूपौदार्यगुणान्वितम्॥ यौवने वर्तमानं च मूर्तं काममिवापरम्
tejo'nvitaṁ yathā bhānuṁ rūpaudāryaguṇānvitam yauvane vartamānaṁ ca mūrtaṁ kāmamivāparam
वह अतिथि सूर्य के समान तेजस्वी, रूप-औदार्य आदि गुणों से युक्त, यौवन में स्थित तथा मानो साक्षात् दूसरा कामदेव था।
श्लोक 17 (skanda.6.76.17)
कुष्ठ्युवाच॥ कुत आगम्यते विप्र क्व यास्यसि वदाऽधुना॥ एवं लावण्ययुक्तोऽपि किमेकाकी यथार्तिभाक्
kuṣṭhyuvāca kuta āgamyate vipra kva yāsyasi vadā'dhunā evaṁ lāvaṇyayukto'pi kimekākī yathārtibhāk
कुष्ठी ने कहा -- हे विप्र! आप कहाँ से आये हैं और अभी कहाँ जायेंगे, बताइये। इतने सुन्दर होने पर भी आप अकेले, मानो दुःखी होकर क्यों घूम रहे हैं?
श्लोक 18 (skanda.6.76.18)
पथिक उवाच॥ अस्ति कान्तीपुरीनाम पुरंदरपुरी यथा॥ सुस्थितैः सेविता नित्यं जनैर्धर्मव्रतान्वितैः
pathika uvāca asti kāntīpurīnāma puraṁdarapurī yathā susthitaiḥ sevitā nityaṁ janairdharmavratānvitaiḥ
पथिक ने कहा -- इन्द्र की पुरी के समान कान्तीपुरी नामक एक नगरी है, जो सदा सुस्थित, धर्मव्रत में लगे लोगों द्वारा सेवित रहती है।
श्लोक 19 (skanda.6.76.19)
तस्यामहं कृतावासो गृहस्थाश्रममावहन्॥ ग्रस्तः कुष्ठेन रौद्रेण यथा त्वं द्विजसत्तम
tasyāmahaṁ kṛtāvāso gṛhasthāśramamāvahan grastaḥ kuṣṭhena raudreṇa yathā tvaṁ dvijasattama
"मैंने वहीं गृहस्थाश्रम में रहते हुए निवास किया था, और हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! आपके ही समान भयंकर कोढ़ से ग्रस्त हो गया था।"
श्लोक 20 (skanda.6.76.20)
ततः श्रुतं मया तावत्पुराणे स्कान्दसंज्ञिते॥ भास्करत्रितयं भूमौ सर्वव्याधिविनाशनम्
tataḥ śrutaṁ mayā tāvatpurāṇe skāndasaṁjñite bhāskaratritayaṁ bhūmau sarvavyādhivināśanam
"तब मैंने स्कान्द नामक पुराण में सुना कि पृथ्वी पर एक तीन सूर्यों की त्रयी है, जो समस्त व्याधियों का नाश करती है।"
श्लोक 21 (skanda.6.76.21)
ततो निर्वेदमापन्नो भेषजैः क्लेशितश्चिरम्॥ क्षारैश्चाम्लैः कषायैश्च कटुकैरथ तिक्तकैः
tato nirvedamāpanno bheṣajaiḥ kleśitaściram kṣāraiścāmlaiḥ kaṣāyaiśca kaṭukairatha tiktakaiḥ
"तत्पश्चात् दीर्घकाल तक क्षार, अम्ल, कषाय, कटु और तिक्त औषधियों से क्लेश उठाकर मैं निराश हो गया।"
श्लोक 22 (skanda.6.76.22)
ततो विनिश्चयं चित्ते कृत्वा गृह्य धनं महत्॥ मुण्डीरस्वामिनं गत्वा स्थितस्तस्यैव सन्निधौ
tato viniścayaṁ citte kṛtvā gṛhya dhanaṁ mahat muṇḍīrasvāminaṁ gatvā sthitastasyaiva sannidhau
"मैंने मन में दृढ़ निश्चय कर, बहुत सा धन लेकर, मुण्डीरस्वामी के पास जाकर उन्हीं के सान्निध्य में रहना आरम्भ किया।"
श्लोक 23 (skanda.6.76.23)
ततः प्रातः समुत्थाय नित्यं पश्यामि तं विभुम्॥ पूजयामि स्वशक्त्या च प्रणमामि ततः परम्
tataḥ prātaḥ samutthāya nityaṁ paśyāmi taṁ vibhum pūjayāmi svaśaktyā ca praṇamāmi tataḥ param
"तब प्रातः उठकर मैं नित्य उस प्रभु के दर्शन करता, अपनी शक्ति के अनुसार पूजा करता, और फिर प्रणाम करता।"
श्लोक 24 (skanda.6.76.24)
सूर्यवारे विशेषेण निराहारो यतेन्द्रियः॥ करोमि जागरं रात्रौ गीतवादित्रनिःस्वनैः
sūryavāre viśeṣeṇa nirāhāro yatendriyaḥ karomi jāgaraṁ rātrau gītavāditraniḥsvanaiḥ
"विशेषतः रविवार को निराहार और जितेन्द्रिय होकर मैं रात्रि में गीत-वाद्यों की ध्वनि के साथ जागरण करता।"
श्लोक 25 (skanda.6.76.25)
ततः संवत्सरस्यांते तं प्रणम्य दिनाधिपम्॥ कालप्रियं ततः पश्चाच्छ्रद्धया परया युतः
tataḥ saṁvatsarasyāṁte taṁ praṇamya dinādhipam kālapriyaṁ tataḥ paścācchraddhayā parayā yutaḥ
"तत्पश्चात् वर्ष के अन्त में उस दिनाधीश (सूर्य) को प्रणाम कर मैं परम श्रद्धा से युक्त होकर कालप्रिय की ओर गया,"
श्लोक 26 (skanda.6.76.26)
तेनैव विधिना विप्र तस्यापि दिवसेशितुः॥ पूजां करोमि मध्याह्ने श्रद्धापूतेन चेतसा
tenaiva vidhinā vipra tasyāpi divaseśituḥ pūjāṁ karomi madhyāhne śraddhāpūtena cetasā
"और हे विप्र! उसी विधि से उस दिवसेश्वर की भी मध्याह्न में श्रद्धापूत हृदय से पूजा करता।"
श्लोक 27 (skanda.6.76.27)
ततोऽपि वत्सरस्यांते तं प्रणम्याथ शक्तितः॥ मूलस्थानं गतो देवमपरस्यां दिशि स्थितम्
tato'pi vatsarasyāṁte taṁ praṇamyātha śaktitaḥ mūlasthānaṁ gato devamaparasyāṁ diśi sthitam
"फिर वर्ष के अंत में उन्हें भी अपनी शक्ति के अनुसार प्रणाम कर मैं दूसरी दिशा में स्थित मूलस्थान देव के पास गया।"
श्लोक 28 (skanda.6.76.28)
तेनैव विधिना पूजा तस्यापि विहिता मया॥ संध्याकाले द्विजश्रेष्ठ यावत्संवत्सरं स्थितः
tenaiva vidhinā pūjā tasyāpi vihitā mayā saṁdhyākāle dvijaśreṣṭha yāvatsaṁvatsaraṁ sthitaḥ
"उसी विधि से मैंने उनकी भी सन्ध्याकाल में पूजा की, हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! और एक वर्ष तक वहाँ रहा।"
श्लोक 29 (skanda.6.76.29)
ततः संवत्सरस्यांते स्वप्ने मां भास्करोऽब्रवीत्॥ समेत्य प्रहसन्विप्रः संप्रहृष्टेन चेतसा
tataḥ saṁvatsarasyāṁte svapne māṁ bhāskaro'bravīt sametya prahasanvipraḥ saṁprahṛṣṭena cetasā
"तत्पश्चात् वर्ष के अन्त में स्वप्न में मुस्कुराते हुए, अत्यंत प्रसन्न हृदय से आकर सूर्यदेव ने मुझसे कहा --"
श्लोक 30 (skanda.6.76.30)
परितुष्टोऽस्मि ते विप्र कर्मणाऽनेन भक्तितः॥ ममाराधनजेनैव तस्मात्कुष्ठं प्रयातु ते
parituṣṭo'smi te vipra karmaṇā'nena bhaktitaḥ mamārādhanajenaiva tasmātkuṣṭhaṁ prayātu te
"'मैं तुम्हारी इस भक्तिपूर्ण, मेरी ही आराधना से उत्पन्न क्रिया से संतुष्ट हूँ, हे विप्र; अतः तुम्हारा कोढ़ दूर हो जाए।'"
श्लोक 31 (skanda.6.76.31)
गच्छ शीघ्रं द्विजश्रेष्ठ श्रांतोऽसि निजमंदिरम्॥ पश्य बंधुजनं सर्वं सोत्कण्ठं तत्कृते स्थितम्
gaccha śīghraṁ dvijaśreṣṭha śrāṁto'si nijamaṁdiram paśya baṁdhujanaṁ sarvaṁ sotkaṇṭhaṁ tatkṛte sthitam
"'हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! तुम थके हुए हो, शीघ्र अपने घर जाओ; अपने सभी बन्धुजनों को देखो, जो उत्कण्ठा से तुम्हारी प्रतीक्षा में स्थित हैं।'"
श्लोक 32 (skanda.6.76.32)
त्वया हृतं पुरा रुक्मं ब्राह्मणस्य महात्मनः॥ तेन कर्मविपाकेन कुष्ठव्याधिरुपस्थितः
tvayā hṛtaṁ purā rukmaṁ brāhmaṇasya mahātmanaḥ tena karmavipākena kuṣṭhavyādhirupasthitaḥ
"'तुमने पहले एक महात्मा ब्राह्मण का सुवर्ण चुराया था; उसी कर्म के फलस्वरूप यह कोढ़ रोग उत्पन्न हुआ था।'"
श्लोक 33 (skanda.6.76.33)
स मया नाशितस्तुभ्यं प्रहृष्टेनाधुना द्विज॥ एतज्ज्ञात्वा न कर्तव्यं सुवर्णहरणं पुनः
sa mayā nāśitastubhyaṁ prahṛṣṭenādhunā dvija etajjñātvā na kartavyaṁ suvarṇaharaṇaṁ punaḥ
"'वह अब मैंने तुम्हारे लिये प्रसन्न होकर नष्ट कर दिया है, हे विप्र! यह जानकर पुनः सुवर्ण-हरण मत करना।'"
श्लोक 34 (skanda.6.76.34)
दृश्यन्ते ये नरा लोके कुष्ठव्याधिसमाकुलाः॥ सुवर्णहरणं सर्वैस्तैः कृतं पापकर्मभिः
dṛśyante ye narā loke kuṣṭhavyādhisamākulāḥ suvarṇaharaṇaṁ sarvaistaiḥ kṛtaṁ pāpakarmabhiḥ
"'संसार में जो भी मनुष्य कोढ़ रोग से पीड़ित दिखाई देते हैं, उन सब पापकर्मियों ने सुवर्ण का हरण किया है।'"
श्लोक 35 (skanda.6.76.35)
तस्माद्देयं यथाशक्त्या न स्तेयं कनकं बुधैः॥ इच्छद्भिः परमं सौख्यं स्वशरीरस्य शाश्वतम्
tasmāddeyaṁ yathāśaktyā na steyaṁ kanakaṁ budhaiḥ icchadbhiḥ paramaṁ saukhyaṁ svaśarīrasya śāśvatam
"'अतः बुद्धिमानों को अपनी शक्ति के अनुसार सुवर्ण दान देना चाहिये, चुराना नहीं चाहिये, यदि वे अपने शरीर के लिये परम और शाश्वत सुख चाहते हैं।'"
श्लोक 36 (skanda.6.76.36)
एवमुक्त्वा सहस्रांशुस्ततश्चादर्शनं गतः॥ अहं च विस्मयाविष्टः प्रोत्थितः शयनाद्द्रुतम्
evamuktvā sahasrāṁśustataścādarśanaṁ gataḥ ahaṁ ca vismayāviṣṭaḥ protthitaḥ śayanāddrutam
ऐसा कहकर सहस्रांशु (सूर्य) अन्तर्धान हो गये, और मैं विस्मय से भरकर तुरन्त शय्या से उठ बैठा।
श्लोक 37 (skanda.6.76.37)
यावत्पश्यामि देहं स्वं कुष्ठव्याधिपरिच्युतम्॥ द्वादशार्कप्रभं दिव्यं यथा त्वं पश्यसे द्विज
yāvatpaśyāmi dehaṁ svaṁ kuṣṭhavyādhiparicyutam dvādaśārkaprabhaṁ divyaṁ yathā tvaṁ paśyase dvija
और मैंने देखा कि मेरा शरीर कोढ़ रोग से मुक्त हो गया है, बारह सूर्यों के समान दिव्य कान्तिमय -- जैसा तुम अभी देख रहे हो, हे विप्र!
श्लोक 38 (skanda.6.76.38)
तस्मात्त्वमपि विप्रेंद्र भक्त्या तद्भास्करत्रयम्॥ अनेन विधिना पश्य येन कुष्ठं प्रशाम्यति
tasmāttvamapi vipreṁdra bhaktyā tadbhāskaratrayam anena vidhinā paśya yena kuṣṭhaṁ praśāmyati
अतः हे विप्रेन्द्र! तुम भी भक्तिपूर्वक इसी विधि से उस तीन सूर्यों की त्रयी का दर्शन करो, जिससे कोढ़ शान्त हो जाए।
श्लोक 39 (skanda.6.76.39)
किमौषधैः किमाहारैः कटुकैरपि योजितैः॥ सर्वव्याधिप्रणाशेशे स्थितेऽस्मिन्भास्करत्रये
kimauṣadhaiḥ kimāhāraiḥ kaṭukairapi yojitaiḥ sarvavyādhipraṇāśeśe sthite'sminbhāskaratraye
जब यह व्याधिनाशक सूर्य-त्रयी उपस्थित है, तो कटु औषधियों और कटु आहारों से भला क्या लाभ?
श्लोक 40 (skanda.6.76.40)
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सांप्रतं तां पुरीं प्रति॥ गृहेऽद्य तव विश्रांतो यथा विप्र निजे गृहे
svasti te'stu gamiṣyāmi sāṁprataṁ tāṁ purīṁ prati gṛhe'dya tava viśrāṁto yathā vipra nije gṛhe
तुम्हारा कल्याण हो; मैं अब उस नगरी की ओर जाऊँगा; आज तुम्हारे घर में ऐसे विश्राम किया मानो अपने ही घर में।
श्लोक 41 (skanda.6.76.41)
एवमुक्तः स पांथेन तेन विप्रः स कुष्ठभाक्॥ वीक्षांचक्रे ततो वक्त्रं स्वपत्न्या दुःखसंयुतः
evamuktaḥ sa pāṁthena tena vipraḥ sa kuṣṭhabhāk vīkṣāṁcakre tato vaktraṁ svapatnyā duḥkhasaṁyutaḥ
उस पथिक द्वारा ऐसा कहे जाने पर वह कुष्ठरोगी ब्राह्मण दुःख से भरकर अपनी पत्नी के मुख की ओर देखने लगा।
श्लोक 42 (skanda.6.76.42)
साऽब्रवीद्युक्तमुक्तं ते पांथेनानेन वल्लभ॥ तस्मात्तत्र द्रुतं गच्छ यत्र तद्भास्करत्रयम्
sā'bravīdyuktamuktaṁ te pāṁthenānena vallabha tasmāttatra drutaṁ gaccha yatra tadbhāskaratrayam
उसने कहा -- हे प्रियतम! इस पथिक ने ठीक ही कहा है; अतः तुम शीघ्र वहाँ जाओ, जहाँ वह सूर्य-त्रयी है।
श्लोक 43 (skanda.6.76.43)
अहं त्वया समं तत्र शुश्रूषानिरता सती॥ गमिष्यामि न संदेहस्तस्माद्गच्छ द्रुतं विभो
ahaṁ tvayā samaṁ tatra śuśrūṣāniratā satī gamiṣyāmi na saṁdehastasmādgaccha drutaṁ vibho
"मैं भी सतीत्व में स्थित हो, तुम्हारी सेवा में लगी हुई, वहाँ तुम्हारे साथ चलूँगी, इसमें संशय नहीं; अतः हे प्रभो! शीघ्र चलो।"
श्लोक 44 (skanda.6.76.44)
एवमुक्तस्तया सोऽथ वित्तमादाय भूरिशः॥ प्रस्थितः कांतया सार्धं मुण्डीरस्वामिनं प्रति
evamuktastayā so'tha vittamādāya bhūriśaḥ prasthitaḥ kāṁtayā sārdhaṁ muṇḍīrasvāminaṁ prati
उसके ऐसा कहने पर वह ब्राह्मण बहुत सा धन लेकर अपनी पत्नी के साथ मुण्डीरस्वामी की ओर प्रस्थान कर गया,
श्लोक 45 (skanda.6.76.45)
प्रतिज्ञया गमिष्यामि द्रष्टुं तद्देवतात्रयम्॥ मुंडीरं कालनाथं च मूलस्थानं च भास्करम्
pratijñayā gamiṣyāmi draṣṭuṁ taddevatātrayam muṁḍīraṁ kālanāthaṁ ca mūlasthānaṁ ca bhāskaram
यह प्रतिज्ञा करते हुए कि मैं उन तीनों देवताओं -- मुण्डीर, कालनाथ (कालप्रिय) और मूलस्थान के सूर्य -- के दर्शन के लिये जाऊँगा।
श्लोक 46 (skanda.6.76.46)
ततः कृच्छ्रेण महता कुष्ठव्याधिसमाकुलः॥ हाटकेश्वरजे क्षेत्रे संप्राप्तः स द्विजोत्तमाः
tataḥ kṛcchreṇa mahatā kuṣṭhavyādhisamākulaḥ hāṭakeśvaraje kṣetre saṁprāptaḥ sa dvijottamāḥ
तत्पश्चात् महान कष्ट सहते हुए, कोढ़ रोग से पीड़ित, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वह हाटकेश्वर क्षेत्र में पहुँचा।
श्लोक 47 (skanda.6.76.47)
तद्दृष्ट्वा सुमहत्क्षेत्रं तापसौघनिषेवितम्॥ निर्विण्णः कुष्ठरोगेण पथि श्रांतोऽब्रवीत्प्रियाम्
taddṛṣṭvā sumahatkṣetraṁ tāpasaughaniṣevitam nirviṇṇaḥ kuṣṭharogeṇa pathi śrāṁto'bravītpriyām
उस विशाल, तपस्वियों के समूहों से सेवित क्षेत्र को देखकर, कोढ़ रोग से खिन्न, मार्ग में थका हुआ, उसने अपनी प्रिया से कहा --
श्लोक 48 (skanda.6.76.48)
अहं निर्वेदमापन्नो रोगेणाथ बुभुक्षया॥ मुण्डीरस्वामिनं यावन्न शक्रोमि प्रसर्पितुम्
ahaṁ nirvedamāpanno rogeṇātha bubhukṣayā muṇḍīrasvāminaṁ yāvanna śakromi prasarpitum
"मैं रोग और भूख से अत्यंत निराश हो गया हूँ; अब मुण्डीरस्वामी तक चलने में असमर्थ हूँ।"
श्लोक 49 (skanda.6.76.49)
तस्मादत्रैव देहं स्वं विहास्यामि न संशयः॥ त्वं गच्छ स्वगृहं कांते सार्थमासाद्य शोभनम्
tasmādatraiva dehaṁ svaṁ vihāsyāmi na saṁśayaḥ tvaṁ gaccha svagṛhaṁ kāṁte sārthamāsādya śobhanam
"अतः मैं यहीं अपना शरीर त्याग दूँगा, इसमें संशय नहीं; तुम किसी अच्छे यात्री-दल के साथ अपने घर लौट जाओ, प्रिये।"
श्लोक 50 (skanda.6.76.50)
पत्न्युवाच॥ अभुक्ते त्वयि नो भुक्तं कदाचित्कांत वै मया॥ एकांतेऽपि महाभाग न सुप्तं जाग्रति त्वयि
patnyuvāca abhukte tvayi no bhuktaṁ kadācitkāṁta vai mayā ekāṁte'pi mahābhāga na suptaṁ jāgrati tvayi
पत्नी ने कहा -- हे प्रियतम! ऐसा कभी नहीं हुआ कि तुम्हारे भोजन किये बिना मैंने भोजन किया हो; हे महाभाग! एकान्त में भी, तुम्हारे जागते हुए मैं कभी सोई नहीं।
श्लोक 51 (skanda.6.76.51)
तस्मादेतन्महाक्षेत्रं संप्राप्य त्वां व्यवस्थितम्॥ परलोकाय संत्यज्य कथं गच्छाम्यहं गृहम्
tasmādetanmahākṣetraṁ saṁprāpya tvāṁ vyavasthitam paralokāya saṁtyajya kathaṁ gacchāmyahaṁ gṛham
"अतः इस महाक्षेत्र में तुम्हें परलोक-गमन के लिये स्थित पाकर, तुम्हें त्यागकर मैं घर कैसे जाऊँ?"
श्लोक 52 (skanda.6.76.52)
दर्शयिष्ये मुखं तेषां त्वया हीना अहं कथम्॥ बांधवानां गुरूणां च अन्येषां सुदृदामपि
darśayiṣye mukhaṁ teṣāṁ tvayā hīnā ahaṁ katham bāṁdhavānāṁ gurūṇāṁ ca anyeṣāṁ sudṛdāmapi
"तुमसे रहित होकर मैं बन्धुओं, गुरुजनों तथा अन्य सुहृदों को अपना मुख कैसे दिखाऊँगी?"
श्लोक 53 (skanda.6.76.53)
तस्मात्त्वया समं नाथ प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्॥ स्नेहपाशविनिर्बद्धा सत्येनात्मानमालभे
tasmāttvayā samaṁ nātha pravekṣyāmi hutāśanam snehapāśavinirbaddhā satyenātmānamālabhe
"अतः हे नाथ! मैं तुम्हारे साथ ही अग्नि में प्रवेश करूँगी; स्नेह-पाश से बँधी हुई मैं सत्य से अपने आपको समर्पित करती हूँ।"
श्लोक 54 (skanda.6.76.54)
यावतस्तव संजाता उपवासा महामते॥ तावंतश्च तथास्माकं कथं गच्छामि तद्गृहम्
yāvatastava saṁjātā upavāsā mahāmate tāvaṁtaśca tathāsmākaṁ kathaṁ gacchāmi tadgṛham
"हे महामते! जितने उपवास तुमने किये हैं, उतने ही मैंने भी किये हैं; फिर मैं उस घर में कैसे जाऊँ?"
श्लोक 55 (skanda.6.76.55)
एवं तस्या विदित्वा स निश्चयं ब्राह्मणस्तदा॥ चितिं कृत्वा तु दाहार्थं तया सार्धे ततोऽविशत्
evaṁ tasyā viditvā sa niścayaṁ brāhmaṇastadā citiṁ kṛtvā tu dāhārthaṁ tayā sārdhe tato'viśat
उसका ऐसा निश्चय जानकर उस ब्राह्मण ने चिता बनाकर, उसके साथ ही उसमें प्रवेश किया।
श्लोक 56 (skanda.6.76.56)
भास्करं मनसि ध्यात्वा यावदग्निं समाददे॥ तावत्पश्यति चाग्रस्थं सुदीप्तं पुरुषत्रयम्
bhāskaraṁ manasi dhyātvā yāvadagniṁ samādade tāvatpaśyati cāgrasthaṁ sudīptaṁ puruṣatrayam
मन में सूर्य का ध्यान करते हुए, जैसे ही उसने अग्नि जलाई, तभी उसने अपने सामने अत्यंत दीप्तिमान तीन पुरुषों को देखा।
श्लोक 57 (skanda.6.76.57)
तद्दृष्ट्वा विस्मयाविष्टः क एते पुरुषास्त्रयः॥ न कदाचिन्मया दृष्टा ईदृक्तेजःसमन्विताः
taddṛṣṭvā vismayāviṣṭaḥ ka ete puruṣāstrayaḥ na kadācinmayā dṛṣṭā īdṛktejaḥsamanvitāḥ
उन्हें देखकर विस्मय से भरकर वह सोचने लगा -- "ये तीन पुरुष कौन हैं? मैंने ऐसे तेज से युक्त किसी को कभी नहीं देखा।"
श्लोक 58 (skanda.6.76.58)
पुरुषा ऊचुः॥ मा त्वं मृत्युपथं गच्छ कृत्वा वैराग्यमाकुलः॥ व्यावृत्य स्वगृहं गच्छ स्वभार्यासहितो द्विज
puruṣā ūcuḥ mā tvaṁ mṛtyupathaṁ gaccha kṛtvā vairāgyamākulaḥ vyāvṛtya svagṛhaṁ gaccha svabhāryāsahito dvija
उन पुरुषों ने कहा -- वैराग्य से व्याकुल होकर तुम मृत्यु के मार्ग पर मत जाओ; हे विप्र! लौटकर अपनी पत्नी सहित अपने घर जाओ।
श्लोक 59 (skanda.6.76.59)
ब्राह्मण उवाच॥ प्रतिज्ञाय मया पूर्व गृहं मुक्तं निजं यतः॥ मुण्डीरस्वामिनं दृष्ट्वा तथाऽन्यं कालवल्लभम्
brāhmaṇa uvāca pratijñāya mayā pūrva gṛhaṁ muktaṁ nijaṁ yataḥ muṇḍīrasvāminaṁ dṛṣṭvā tathā'nyaṁ kālavallabham
ब्राह्मण ने कहा -- क्योंकि मैंने पहले प्रतिज्ञा करके अपना घर छोड़ा था, मुण्डीरस्वामी और काल के प्रिय अन्य देव को देखने के लिये,
श्लोक 60 (skanda.6.76.60)
मूलस्थानं च कर्तव्यं ततः सस्यप्रभक्षणम्॥ सोऽहं तानविलोक्याथ कथं गच्छामि मन्दिरम्॥ भक्षयामि तथा सस्यं तेन त्यक्ष्यामि जीवितम्
mūlasthānaṁ ca kartavyaṁ tataḥ sasyaprabhakṣaṇam so'haṁ tānavilokyātha kathaṁ gacchāmi mandiram bhakṣayāmi tathā sasyaṁ tena tyakṣyāmi jīvitam
"तथा मूलस्थान को भी देखना था, फिर अन्न-भक्षण करना था। मैं उन्हें देखे बिना घर कैसे जाऊँ? या तो अन्न खाऊँगा, या उसी कारण अपना जीवन त्याग दूँगा।"
श्लोक 61 (skanda.6.76.61)
पुरुषा ऊचुः॥ वयं ते भास्करा ब्रह्मंस्त्रयोऽत्रैव समागताः॥ त्वद्भक्त्याकृष्टमनसो ब्रूहि किं करवामहे
puruṣā ūcuḥ vayaṁ te bhāskarā brahmaṁstrayo'traiva samāgatāḥ tvadbhaktyākṛṣṭamanaso brūhi kiṁ karavāmahe
पुरुषों ने कहा -- हे ब्राह्मण! हम तुम्हारे वे ही तीन सूर्य हैं, यहीं एकत्र आये हुए, तुम्हारी भक्ति से आकृष्ट-मन होकर; बताओ, हम क्या करें?
श्लोक 62 (skanda.6.76.62)
ब्राह्मण उवाच॥ यदि यूयं समायाताः स्वयमेव ममांतिकम्॥ त्रयोऽपि भास्करा नाशमेष कुष्ठः प्रगच्छतु
brāhmaṇa uvāca yadi yūyaṁ samāyātāḥ svayameva mamāṁtikam trayo'pi bhāskarā nāśameṣa kuṣṭhaḥ pragacchatu
ब्राह्मण ने कहा -- यदि आप तीनों सूर्य स्वयं ही मेरे समीप आ गये हैं, तो यह मेरा कोढ़ नष्ट हो जाए।
श्लोक 63 (skanda.6.76.63)
तथाऽत्रैव सदा स्थेयं क्षेत्रे युष्माभिरेव हि॥ सांनिध्यं त्रिषु लोकेषु गन्तव्यं च यथा पुरा
tathā'traiva sadā stheyaṁ kṣetre yuṣmābhireva hi sāṁnidhyaṁ triṣu lokeṣu gantavyaṁ ca yathā purā
"और आप सब सदा यहीं इस क्षेत्र में रहें; भले ही आपका सान्निध्य पहले की तरह तीनों लोकों में भी बना रहे।"
श्लोक 64 (skanda.6.76.64)
भास्करा ऊचुः॥ एवं विप्र करिष्यामः स्थास्यामोऽत्र सदा वयम्॥ त्वं चापि रोगनिर्मुक्तः सुखं प्राप्स्यस्यनुत्तमम्
bhāskarā ūcuḥ evaṁ vipra kariṣyāmaḥ sthāsyāmo'tra sadā vayam tvaṁ cāpi roganirmuktaḥ sukhaṁ prāpsyasyanuttamam
सूर्यों ने कहा -- हे विप्र! ऐसा ही होगा; हम सदा यहीं रहेंगे, और तुम भी रोग से मुक्त होकर अनुपम सुख प्राप्त करोगे।
श्लोक 65 (skanda.6.76.65)
प्रासादत्रितयं तस्मादस्मदर्थं निरूपय॥ येन त्रिकालमासाद्य गच्छामः संनिधिं द्विज
prāsādatritayaṁ tasmādasmadarthaṁ nirūpaya yena trikālamāsādya gacchāmaḥ saṁnidhiṁ dvija
"अतः हमारे लिये तीन प्रासादों का निर्माण करो, जिससे हम तीनों काल में आकर तुम्हारे सान्निध्य में पहुँच सकें, हे विप्र!"
श्लोक 66 (skanda.6.76.66)
एवमुक्त्वा तु ते सर्वे गताश्चाद्दर्शनं ततः॥ सोऽपि पश्यति कायं स्वं यावद्रोगविवर्जितम्
evamuktvā tu te sarve gatāścāddarśanaṁ tataḥ so'pi paśyati kāyaṁ svaṁ yāvadrogavivarjitam
ऐसा कहकर वे सब अन्तर्धान हो गये; और उसने भी अपने शरीर को रोगमुक्त पाया,
श्लोक 67 (skanda.6.76.67)
द्वादशार्कप्रतीकाशं सर्वलक्षणलक्षितम्॥ ततः प्रोवाच तां भार्यां विनयावनतां स्थिताम्
dvādaśārkapratīkāśaṁ sarvalakṣaṇalakṣitam tataḥ provāca tāṁ bhāryāṁ vinayāvanatāṁ sthitām
बारह सूर्यों के समान तेजस्वी, समस्त शुभ लक्षणों से युक्त। तब उसने विनयपूर्वक झुककर खड़ी अपनी पत्नी से कहा --
श्लोक 68 (skanda.6.76.68)
पश्य त्वं सुभ्रूर्मे गात्रं यादृग्रूपं पुनः स्थितम्॥ प्रसादाद्देवदेवस्य भास्करस्यांशुमालिनः
paśya tvaṁ subhrūrme gātraṁ yādṛgrūpaṁ punaḥ sthitam prasādāddevadevasya bhāskarasyāṁśumālinaḥ
"हे सुभ्रु! देखो मेरा शरीर, जैसा रूप देवाधिदेव अंशुमाली भास्कर की कृपा से पुनः प्राप्त हुआ है।"
श्लोक 69 (skanda.6.76.69)
सोऽहमत्र स्थितो नित्यं पूजयिष्यामि भास्करम्॥ न यास्यामि पुनः सद्म सत्यमेतन्मयोदितम्
so'hamatra sthito nityaṁ pūjayiṣyāmi bhāskaram na yāsyāmi punaḥ sadma satyametanmayoditam
"अब मैं यहीं रहकर नित्य सूर्य की पूजा करूँगा, फिर घर नहीं जाऊँगा; यह मैंने सत्य कहा है।"
श्लोक 70 (skanda.6.76.70)
एवमुक्त्वा स विप्रेन्द्रस्तस्मिन्क्षेत्रे सुशोभने॥ प्रासादत्रितयं रम्यं निर्ममे भक्तिसंयुतः
evamuktvā sa viprendrastasminkṣetre suśobhane prāsādatritayaṁ ramyaṁ nirmame bhaktisaṁyutaḥ
ऐसा कहकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने उस सुशोभित क्षेत्र में भक्तिपूर्वक तीन सुन्दर प्रासादों का निर्माण किया --
श्लोक 71 (skanda.6.76.71)
मुण्डीरस्वामिनश्चैकमन्यत्कालप्रियस्य च॥ मूलस्थानस्य चान्यत्तु सत्पताकाविभूषितम्
muṇḍīrasvāminaścaikamanyatkālapriyasya ca mūlasthānasya cānyattu satpatākāvibhūṣitam
एक मुण्डीरस्वामी का, दूसरा कालप्रिय का, और तीसरा मूलस्थान का, जो शुभ ध्वजाओं से सुशोभित था।
श्लोक 72 (skanda.6.76.72)
त्रयाणामपि तेषां तु साध्वर्चाः शास्त्रसूचिताः॥ स्थापयामास सूर्याणां हस्तार्के सूर्यवासरे
trayāṇāmapi teṣāṁ tu sādhvarcāḥ śāstrasūcitāḥ sthāpayāmāsa sūryāṇāṁ hastārke sūryavāsare
उन तीनों सूर्यों की शास्त्रोक्त सुन्दर प्रतिमाओं की उसने रविवार को, हस्त नक्षत्र में सूर्य के होने पर, स्थापना की।
श्लोक 73 (skanda.6.76.73)
ततस्ताः पुष्पधूपाद्यैः समभ्यर्च्य चिरं द्विजः॥ त्रिसंध्यं क्रमशः प्राप्तो देहांते भास्करालयम्
tatastāḥ puṣpadhūpādyaiḥ samabhyarcya ciraṁ dvijaḥ trisaṁdhyaṁ kramaśaḥ prāpto dehāṁte bhāskarālayam
तत्पश्चात् उस ब्राह्मण ने पुष्प-धूप आदि से दीर्घकाल तक उनकी पूजा कर, त्रिसन्ध्या क्रमशः करते हुए, देहान्त होने पर सूर्यलोक को प्राप्त किया।
श्लोक 74 (skanda.6.76.74)
सूत उवाच॥ एवं ते तत्र संजातास्त्रयोऽपि द्विजसत्तमाः॥ भास्करा भक्तलोकस्य सर्वव्याधिविनाशकाः
sūta uvāca evaṁ te tatra saṁjātāstrayo'pi dvijasattamāḥ bhāskarā bhaktalokasya sarvavyādhivināśakāḥ
सूत जी बोले -- इस प्रकार वे तीनों श्रेष्ठ सूर्यदेव वहाँ उत्पन्न हुए, जो भक्तजनों की समस्त व्याधियों का नाश करने वाले हैं।
श्लोक 75 (skanda.6.76.75)
यस्तान्पश्यति काले स्वे यथोक्ते सूर्यवासरे॥ स वांछिताँल्लभेत्कामान्दुर्लभानपि मानवैः
yastānpaśyati kāle sve yathokte sūryavāsare sa vāṁchitā~llabhetkāmāndurlabhānapi mānavaiḥ
जो कोई उन्हें यथोक्त रविवार को अपने-अपने निर्धारित समय पर देखता है, वह उन इच्छित कामनाओं को भी प्राप्त कर लेता है, जो मनुष्यों के लिये दुर्लभ हैं।