नागर खण्ड · अध्याय 75
यज्ञभूमिमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.6.75.1)
सूत उवाच॥ पुरा कल्पे भगवता एतत्क्षेत्रमनुत्तमम्॥ रुद्रेण ब्रह्मणे दत्तं तुष्टेन द्विजसत्तमाः
sūta uvāca purā kalpe bhagavatā etatkṣetramanuttamam rudreṇa brahmaṇe dattaṁ tuṣṭena dvijasattamāḥ
सूत जी बोले -- हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! प्राचीन कल्प में इस अनुपम क्षेत्र को प्रसन्न होकर भगवान् रुद्र ने ब्रह्मा को प्रदान किया था।
श्लोक 2 (skanda.6.75.2)
यदा तु स्थापितं लिंगं हाटकेश्वरसंज्ञितम्॥ देवैः प्रीतेन रुद्रेण प्रदत्तं ब्रह्मणे पुनः
yadā tu sthāpitaṁ liṁgaṁ hāṭakeśvarasaṁjñitam devaiḥ prītena rudreṇa pradattaṁ brahmaṇe punaḥ
जब हाटकेश्वर नामक लिंग की स्थापना हुई, तब देवताओं द्वारा प्रसन्न हुए रुद्र ने पुनः इसे ब्रह्मा को प्रदान किया।
श्लोक 3 (skanda.6.75.3)
एतत्क्षेत्रं तदा दत्तं शंभुना षण्मुखस्य ह॥ रक्षणार्थं हि विप्राणां कलिकालादिदोषतः
etatkṣetraṁ tadā dattaṁ śaṁbhunā ṣaṇmukhasya ha rakṣaṇārthaṁ hi viprāṇāṁ kalikālādidoṣataḥ
तब यह क्षेत्र शम्भु द्वारा षण्मुख (स्कन्द) को दिया गया, कलिकाल आदि के दोषों से ब्राह्मणों की रक्षा के लिये।
श्लोक 4 (skanda.6.75.4)
ब्रह्मणा प्रार्थितेनेदं स्वयमादिममुत्तमम्॥ पित्रादिष्टस्तु गांगेयस्तत्र वासमथाकरोत्
brahmaṇā prārthitenedaṁ svayamādimamuttamam pitrādiṣṭastu gāṁgeyastatra vāsamathākarot
ब्रह्मा द्वारा प्रार्थित यह स्वयं आदि और उत्तम क्षेत्र; और पिता की आज्ञा से गांगेय (स्कन्द) ने वहीं निवास किया।
श्लोक 5 (skanda.6.75.5)
कार्तिक्यां कृत्तिकायोगे यः कुर्यात्स्वामिदर्शनम्॥ सप्तजन्म भवेद्विप्रो धनाढ्यो वेदपारगः
kārtikyāṁ kṛttikāyoge yaḥ kuryātsvāmidarśanam saptajanma bhavedvipro dhanāḍhyo vedapāragaḥ
जो कोई कार्तिक पूर्णिमा को कृत्तिका-योग में स्वामी (स्कन्द) का दर्शन करता है, वह सात जन्मों तक धनाढ्य, वेदपारंगत ब्राह्मण होता है।
श्लोक 6 (skanda.6.75.6)
महासेनस्य देवस्य प्रासादं सुमनोहरम्॥ उच्चैः स्थितं सर्वलोके पातुकाममिवांबरम्
mahāsenasya devasya prāsādaṁ sumanoharam uccaiḥ sthitaṁ sarvaloke pātukāmamivāṁbaram
महासेन देव का वह अत्यंत मनोहर प्रासाद है, जो सम्पूर्ण लोक में इतना ऊँचा खड़ा है मानो आकाश को पी लेना चाहता हो।
श्लोक 7 (skanda.6.75.7)
तच्छ्रुत्वा विबुधाः सर्वे कौतुकादेत्य सत्वरम्॥ वीक्षांचक्रुस्ततो गत्वा दृष्ट्वा मेध्यतमं पुरम्
tacchrutvā vibudhāḥ sarve kautukādetya satvaram vīkṣāṁcakrustato gatvā dṛṣṭvā medhyatamaṁ puram
यह सुनकर समस्त देवता कौतूहलवश शीघ्र वहाँ आये और जाकर उस परम पवित्र नगर को देखा।
श्लोक 8 (skanda.6.75.8)
प्रासादस्योत्तरे देशे प्राच्ये देशे तथा द्विजाः॥ यज्ञक्रियासमारंभांश्चकुर्विप्रैर्यथोदितान्
prāsādasyottare deśe prācye deśe tathā dvijāḥ yajñakriyāsamāraṁbhāṁścakurviprairyathoditān
प्रासाद के उत्तर दिशा में तथा पूर्व दिशा में भी, हे ब्राह्मणो! उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा यथोक्त यज्ञ-क्रियाओं का आरम्भ किया।
श्लोक 9 (skanda.6.75.9)
इष्ट्वा च विबुधाः सर्वे दत्त्वा तेभ्यश्च दक्षिणाम्॥ जग्मुस्त्रिविष्टपं हृष्टा लब्ध्वा तत्स्थानजं फलम्
iṣṭvā ca vibudhāḥ sarve dattvā tebhyaśca dakṣiṇām jagmustriviṣṭapaṁ hṛṣṭā labdhvā tatsthānajaṁ phalam
और यज्ञ सम्पन्न कर तथा उन ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर, वे समस्त देवता उस स्थान से प्राप्त फल को पाकर हर्षपूर्वक स्वर्गलोक चले गये।
श्लोक 10 (skanda.6.75.10)
ततस्तु देवयजनंनाम तस्य बभूव ह॥ यदन्यत्र शतं कृत्वा क्रतूनां फलमाप्नुयात्॥ तदत्रैकेन लभते क्रतुना दक्षिणावता
tatastu devayajanaṁnāma tasya babhūva ha yadanyatra śataṁ kṛtvā kratūnāṁ phalamāpnuyāt tadatraikena labhate kratunā dakṣiṇāvatā
तब से उस स्थान का नाम "देवयजन" पड़ गया -- जो फल अन्यत्र सौ यज्ञ करने से प्राप्त होता है, वही फल यहाँ दक्षिणा सहित एक ही यज्ञ से प्राप्त हो जाता है।