नागर खण्ड · अध्याय 74
कौरवपाण्डवयादवकृतलिंगप्रतिष्ठावृत्तांतवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.6.74.1)
सूत उवाच॥ धृतराष्ट्रेण भूपेन शतपुत्रान्वितेन च॥ लिंगानां स्थापितं तत्र शतमेकोत्तरं द्विजाः
sūta uvāca dhṛtarāṣṭreṇa bhūpena śataputrānvitena ca liṁgānāṁ sthāpitaṁ tatra śatamekottaraṁ dvijāḥ
सूत जी बोले -- राजा धृतराष्ट्र ने अपने सौ पुत्रों सहित वहाँ एक सौ एक लिंगों की स्थापना की, हे ब्राह्मणो!
श्लोक 2 (skanda.6.74.2)
तथा च पांडवैः सर्वैः स्थापितं लिंगपंचकम्॥ द्रौपद्या चाऽथ कुन्त्याऽथ गांधार्याऽथ यदृच्छया
tathā ca pāṁḍavaiḥ sarvaiḥ sthāpitaṁ liṁgapaṁcakam draupadyā cā'tha kuntyā'tha gāṁdhāryā'tha yadṛcchayā
और समस्त पाण्डवों ने मिलकर पाँच लिंगों की स्थापना की; तथा द्रौपदी ने, कुन्ती ने और गांधारी ने भी अपनी-अपनी इच्छा से,
श्लोक 3 (skanda.6.74.3)
भानुमत्या च गौरीणां स्थापितं च चतुष्टयम्॥ विदुरेणाथ शल्येन कलिंगेन युयुत्सुना
bhānumatyā ca gaurīṇāṁ sthāpitaṁ ca catuṣṭayam vidureṇātha śalyena kaliṁgena yuyutsunā
और भानुमती ने -- इस प्रकार गौरी देवियों के चार लिंगों की स्थापना हुई। तथा विदुर ने, शल्य ने, कलिंगराज ने और युयुत्सु ने,
श्लोक 4 (skanda.6.74.4)
बाह्लीकेन सपुत्रेण कर्णेनाथ ससूनुना॥ तथा शकुनिना तत्र द्रोणेन च कृपेण च
bāhlīkena saputreṇa karṇenātha sasūnunā tathā śakuninā tatra droṇena ca kṛpeṇa ca
पुत्र सहित बाह्लीक ने, पुत्र सहित कर्ण ने, तथा वहाँ शकुनि ने, द्रोण ने और कृप ने,
श्लोक 5 (skanda.6.74.5)
अश्वत्थाम्ना पृथक्त्वेन लिङ्गमेकैकमुत्तमम्॥ स्थापितं परया भक्त्या वरप्रासादमाश्रितम्
aśvatthāmnā pṛthaktvena liṅgamekaikamuttamam sthāpitaṁ parayā bhaktyā varaprāsādamāśritam
और अश्वत्थामा ने -- प्रत्येक ने पृथक्-पृथक् परम भक्तिपूर्वक एक-एक उत्तम लिंग की स्थापना की, जो एक सुन्दर प्रासाद में स्थित था।
श्लोक 6 (skanda.6.74.6)
तथा संस्थापितं तत्र विष्णुना प्रभविष्णुना॥ लिंगं प्रासादमाधाय प्रोत्तुंगशिखरान्वितम्
tathā saṁsthāpitaṁ tatra viṣṇunā prabhaviṣṇunā liṁgaṁ prāsādamādhāya prottuṁgaśikharānvitam
तथा वहाँ प्रभावशाली विष्णु ने भी अत्यंत ऊँचे शिखर वाले प्रासाद का निर्माण कर एक लिंग की स्थापना की।
श्लोक 7 (skanda.6.74.7)
सात्वतेनापि सांबेन बलभद्रेण धीमता॥ प्रद्युमेनानिरुद्धेन तथान्यैर्मुख्ययादवैः
sātvatenāpi sāṁbena balabhadreṇa dhīmatā pradyumenāniruddhena tathānyairmukhyayādavaiḥ
सात्यकि ने, साम्ब ने, बुद्धिमान बलभद्र ने, प्रद्युम्न ने, अनिरुद्ध ने तथा अन्य प्रमुख यादवों ने भी,
श्लोक 8 (skanda.6.74.8)
चारुदेष्णादिभिः पुत्रैरुक्मिण्या दशभिः सुतैः॥ लिंगानां दशकं मुख्यं स्थापितं श्रद्धयान्वितैः
cārudeṣṇādibhiḥ putrairukmiṇyā daśabhiḥ sutaiḥ liṁgānāṁ daśakaṁ mukhyaṁ sthāpitaṁ śraddhayānvitaiḥ
और चारुदेष्ण आदि रुक्मिणी के दस पुत्रों ने, श्रद्धायुक्त होकर, दस लिंगों के एक प्रमुख समूह की स्थापना की।
श्लोक 9 (skanda.6.74.9)
एवं संस्थाप्य लिङ्गानि ते सर्वे कुरुपांडवाः॥ यादवाश्च सुसंहृष्टा कृतकृत्यास्तदाऽभवन्
evaṁ saṁsthāpya liṅgāni te sarve kurupāṁḍavāḥ yādavāśca susaṁhṛṣṭā kṛtakṛtyāstadā'bhavan
इस प्रकार लिंगों की स्थापना कर वे समस्त कुरु, पाण्डव और यादव अत्यंत हर्षित होकर कृतकृत्य हो गये।
श्लोक 10 (skanda.6.74.10)
तत्र स्थित्वा चिरं कालं दत्त्वा दानान्यनेकशः॥ धनाढ्यान्ब्राह्मणान्कृत्वा चमत्कारपुरोद्भवान्
tatra sthitvā ciraṁ kālaṁ dattvā dānānyanekaśaḥ dhanāḍhyānbrāhmaṇānkṛtvā camatkārapurodbhavān
वहाँ दीर्घकाल तक रहकर, अनेक प्रकार के दान देकर, उन्होंने चमत्कारपुर के ब्राह्मणों को धनाढ्य बना दिया,
श्लोक 11 (skanda.6.74.11)
दत्त्वा तेभ्यो वरान्नागान्हयाञ्जात्याननेकशः॥ सद्ग्रामाणि विचित्राणि क्षेत्राणि च सुधेनवः
dattvā tebhyo varānnāgānhayāñjātyānanekaśaḥ sadgrāmāṇi vicitrāṇi kṣetrāṇi ca sudhenavaḥ
उन्हें उत्तम गज, अनेक जातियों के अश्व, सुन्दर ग्राम, विचित्र क्षेत्र और उत्तम गौएँ देकर,
श्लोक 12 (skanda.6.74.12)
महोक्षांश्च सुवस्त्राणि भूस्थानान्याश्रयांस्तथा॥ दासीदासांस्तथा भृत्यान्दानानि विविधानि च
mahokṣāṁśca suvastrāṇi bhūsthānānyāśrayāṁstathā dāsīdāsāṁstathā bhṛtyāndānāni vividhāni ca
तथा महान वृषभ, सुन्दर वस्त्र, भूमि-स्थान, आश्रय-स्थान, दास-दासियाँ, भृत्य तथा विविध प्रकार के अन्य दान देकर।
श्लोक 13 (skanda.6.74.13)
तत आमन्त्र्य तान्सर्वान्प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः॥ स्वस्थानं प्रति संहृष्टाः प्रजग्मुः सर्व एव ते
tata āmantrya tānsarvānpraṇipatya muhurmuhuḥ svasthānaṁ prati saṁhṛṣṭāḥ prajagmuḥ sarva eva te
तत्पश्चात् उन सबसे विदा लेकर, बार-बार प्रणाम कर, वे सभी अत्यंत हर्षित होकर अपने-अपने स्थान की ओर चले गये।
श्लोक 14 (skanda.6.74.14)
सूत उवाच॥ एतद्वः सर्वमाख्यातं स्थापितं तेन भूभुजा॥ तथा तद्धृतराष्ट्रेण लिंगं पातकनाशनम्
sūta uvāca etadvaḥ sarvamākhyātaṁ sthāpitaṁ tena bhūbhujā tathā taddhṛtarāṣṭreṇa liṁgaṁ pātakanāśanam
सूत जी बोले -- यह सब तुम्हें बता दिया गया -- उस राजा धृतराष्ट्र द्वारा स्थापित वह पापनाशक लिंग,
श्लोक 15 (skanda.6.74.15)
तथान्यैरपि भूपालैः प्राधान्येन व्यवस्थितैः॥ पाण्डवैर्यादवैश्चैव पृथक्त्वेन व्यवस्थितैः
tathānyairapi bhūpālaiḥ prādhānyena vyavasthitaiḥ pāṇḍavairyādavaiścaiva pṛthaktvena vyavasthitaiḥ
और वैसे ही अन्य राजाओं द्वारा, अपनी-अपनी प्रधानता के अनुसार, तथा पाण्डवों और यादवों द्वारा पृथक्-पृथक् व्यवस्थित रूप से स्थापित लिंग।
श्लोक 16 (skanda.6.74.16)
यस्तानि पुरुषः सम्यक्पूजयेद्भक्तिभावितः॥ स लभेच्चाखिलान्कामान्वांछितान्स्वेन चेतसा
yastāni puruṣaḥ samyakpūjayedbhaktibhāvitaḥ sa labheccākhilānkāmānvāṁchitānsvena cetasā
जो पुरुष भक्तिभाव से युक्त होकर उनकी भलीभाँति पूजा करता है, वह अपने मन से चाही गई समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है।