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नागर खण्ड · अध्याय 110

अष्टषष्टि तीर्थों के सार एवं हाटकेश्वर की सर्वोच्चता का वर्णन

अध्याय 109अध्याय-सूचीअध्याय 111

श्लोक 1 (skanda.6.110.1)

श्रीदेव्युवाच । नैतेष्वपि सुरश्रेष्ठ सर्वेषु भुवि मानवाः । अपि दीर्घायुषो भूत्वा स्नातुं शक्ताः कथंचन

śrīdevyuvāca naiteṣvapi suraśreṣṭha sarveṣu bhuvi mānavāḥ api dīrghāyuṣo bhūtvā snātuṁ śaktāḥ kathaṁcana

श्री देवी ने कहा — "हे सुरश्रेष्ठ! इन सभी में भी मनुष्य, चाहे वे दीर्घायु ही क्यों न हों, किसी प्रकार भी स्नान करने में समर्थ नहीं हैं।

श्लोक 2 (skanda.6.110.2)

एतेषामपि साराणि मम तीर्थानि कीर्तय । येषु स्नातो नरः सम्यक्सर्वेषां लभते फलम्

eteṣāmapi sārāṇi mama tīrthāni kīrtaya yeṣu snāto naraḥ samyaksarveṣāṁ labhate phalam

इनमें से भी मेरे तीर्थों का सार बताइए, जिनमें भलीभाँति स्नान करके मनुष्य समस्त तीर्थों का फल प्राप्त कर ले।

श्लोक 3 (skanda.6.110.3)

ईश्वर उवाच । एतेषां मध्यतो देवि तीर्थाष्टकमनुत्तमम् । अस्ति स्नातैर्नरैस्तत्र सर्वेषां लभ्यते फलम्

īśvara uvāca eteṣāṁ madhyato devi tīrthāṣṭakamanuttamam asti snātairnaraistatra sarveṣāṁ labhyate phalam

ईश्वर ने कहा — "हे देवि! इनमें से आठ तीर्थों का एक अनुपम समूह है; वहाँ स्नान करने वाले मनुष्यों को समस्त तीर्थों का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 4 (skanda.6.110.4)

नैमिषं चैव केदारं पुष्करं कृमिजांगलम् । वाराणसी कुरुक्षेत्रं प्रभासं हाटकेश्वरम्

naimiṣaṁ caiva kedāraṁ puṣkaraṁ kṛmijāṁgalam vārāṇasī kurukṣetraṁ prabhāsaṁ hāṭakeśvaram

नैमिष, केदार, पुष्कर, कृमिजांगल; वाराणसी, कुरुक्षेत्र, प्रभास, हाटकेश्वर।

श्लोक 5 (skanda.6.110.5)

अष्टास्वेतेषु यः स्नातः सम्यक्श्रद्धासमन्वितः । स स्नातः सर्वतीर्थेषु सत्यमेतन्मयोदितम्

aṣṭāsveteṣu yaḥ snātaḥ samyakśraddhāsamanvitaḥ sa snātaḥ sarvatīrtheṣu satyametanmayoditam

जो कोई इन आठों में भलीभाँति श्रद्धायुक्त होकर स्नान करता है, वह समस्त तीर्थों में स्नान कर चुका माना जाता है — यह मैंने सत्य कहा है।

श्लोक 6 (skanda.6.110.6)

श्रीदेव्युवाच । कलिकाले महादेव भविष्यति कथंचन । स्नानं तस्मान्मम ब्रूहि यत्सारं तीर्थमेव हि

śrīdevyuvāca kalikāle mahādeva bhaviṣyati kathaṁcana snānaṁ tasmānmama brūhi yatsāraṁ tīrthameva hi

श्री देवी ने कहा — "हे महादेव! कलिकाल में ऐसा स्नान किसी प्रकार असंभव हो जाएगा; अतः मुझे वह स्नान बताइए जो तीर्थ का सार ही है।

श्लोक 7 (skanda.6.110.7)

अष्टानामपि चैतेषां देवदेव त्रिलोचन । यद्यहं वल्लभा भक्ता तथा चित्तानुवर्तिनी

aṣṭānāmapi caiteṣāṁ devadeva trilocana yadyahaṁ vallabhā bhaktā tathā cittānuvartinī

हे देवदेव त्रिलोचन! इन आठों में से भी, यदि मैं आपकी प्रिया, भक्त, तथा आपके चित्त का अनुसरण करने वाली हूँ, तो बताइए।

श्लोक 8 (skanda.6.110.8)

ईश्वर उवाच । अष्टानामपि देवेशि क्षेत्राणामस्ति चोत्तमम् । एतेषामपि तत्क्षेत्रं हाटकेश्वरसंज्ञितम्

īśvara uvāca aṣṭānāmapi deveśi kṣetrāṇāmasti cottamam eteṣāmapi tatkṣetraṁ hāṭakeśvarasaṁjñitam

ईश्वर ने कहा — "हे देवेशि! इन आठ क्षेत्रों में भी एक सर्वोत्तम है; इनमें से भी वह हाटकेश्वर नामक क्षेत्र —

श्लोक 9 (skanda.6.110.9)

यत्र सर्वाणि क्षेत्राणि संस्थितानि ममाज्ञया । तथान्यानि च तीर्थानि कलिकालेऽपि संस्थिते

yatra sarvāṇi kṣetrāṇi saṁsthitāni mamājñayā tathānyāni ca tīrthāni kalikāle'pi saṁsthite

जहाँ मेरी आज्ञा से समस्त क्षेत्र स्थित हैं, तथा वैसे ही अन्य तीर्थ भी, कलिकाल के आने पर भी।

श्लोक 10 (skanda.6.110.10)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तत्क्षेत्रं सेव्यमेव हि । मानुषैर्मोक्षमिच्छद्भिः सत्यमेतन्मयोदितम्

tasmātsarvaprayatnena tatkṣetraṁ sevyameva hi mānuṣairmokṣamicchadbhiḥ satyametanmayoditam

अतः मोक्ष की इच्छा रखने वाले मनुष्यों द्वारा उस क्षेत्र का पूर्ण प्रयत्न से सेवन किया जाना चाहिए; यह मैंने सत्य कहा है।

श्लोक 11 (skanda.6.110.11)

सूत उवाच । एतद्वः सर्वमाख्यातमष्टषष्टिसमुद्भवम् । समुच्चयं द्विजश्रेष्ठा नामदेवसमन्वितम्

sūta uvāca etadvaḥ sarvamākhyātamaṣṭaṣaṣṭisamudbhavam samuccayaṁ dvijaśreṣṭhā nāmadevasamanvitam

सूत जी ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठो! यह सब तुम्हें बता दिया गया — अड़सठ से उत्पन्न यह समुच्चय, नामों और देवताओं सहित,

श्लोक 12 (skanda.6.110.12)

यथा देवेन चाख्यातं पार्वत्या गुह्यमुत्तमम् । प्रसन्नेन मया कृत्स्नं युष्माकं समुदाहृतम्

yathā devena cākhyātaṁ pārvatyā guhyamuttamam prasannena mayā kṛtsnaṁ yuṣmākaṁ samudāhṛtam

जैसे देव द्वारा पार्वती को वह उत्तम रहस्य बताया गया था, वैसे ही प्रसन्न होकर मैंने उसे तुम्हें पूर्णतः बताया है।

श्लोक 13 (skanda.6.110.13)

यश्चैतत्पठते भक्त्या ह्यष्टषष्टिसमुद्भवम् । स्नानजं लभते पुण्यं शृण्वानः श्रद्धयान्वितः

yaścaitatpaṭhate bhaktyā hyaṣṭaṣaṣṭisamudbhavam snānajaṁ labhate puṇyaṁ śṛṇvānaḥ śraddhayānvitaḥ

तथा जो कोई इस अड़सठ के वृत्तांत को भक्तिपूर्वक पढ़ता है, अथवा श्रद्धायुक्त होकर सुनता है, वह स्नान से उत्पन्न पुण्य प्राप्त करता है।

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