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नागर खण्ड · अध्याय 112

ऊषर भूमि की उत्पत्ति का माहात्म्य-कथन

अध्याय 111अध्याय-सूचीअध्याय 113

श्लोक 1 (skanda.6.112.1)

सूत उवाच। ततः कतिपयाहस्य गते तस्मिन्महीपतौ। स्वगृहं प्रति दुःखार्ते परिवारसमन्विते

sūta uvāca tataḥ katipayāhasya gate tasminmahīpatau svagṛhaṁ prati duḥkhārte parivārasamanvite

सूत जी ने कहा — तत्पश्चात् कुछ दिन बीत जाने पर, जब वह दुःखार्त राजा अपने परिवार सहित अपने घर की ओर चला गया...

श्लोक 2 (skanda.6.112.2)

पद्भ्यामेव समायाता ह्यष्टषष्टिर्द्विजोत्तमाः। परिश्रांताः कृशांगाश्च धूलिधूसरिताननाः

padbhyāmeva samāyātā hyaṣṭaṣaṣṭirdvijottamāḥ pariśrāṁtāḥ kṛśāṁgāśca dhūlidhūsaritānanāḥ

...तब अड़सठ श्रेष्ठ द्विज पैदल ही, थके हुए, कृशांग हुए और धूल से धूसरित मुखवाले होकर वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 3 (skanda.6.112.3)

यावत्पश्यंति दाराः स्वा दिव्याभरणभूषिताः। दिव्यवस्त्रैः सुसंवीता राजपत्न्य इवापराः

yāvatpaśyaṁti dārāḥ svā divyābharaṇabhūṣitāḥ divyavastraiḥ susaṁvītā rājapatnya ivāparāḥ

जैसे ही उन्होंने अपनी पत्नियों को दिव्य आभूषणों से भूषित, दिव्य वस्त्रों से सुसज्जित, मानो अन्य राजरानियों के समान देखा...

श्लोक 4 (skanda.6.112.4)

ततश्च विस्मयाविष्टाः पप्रच्छुस्ते क्षुधान्विताः। किमिदं किमिदं पापाः विरुद्धं विहितं वपुः

tataśca vismayāviṣṭāḥ papracchuste kṣudhānvitāḥ kimidaṁ kimidaṁ pāpāḥ viruddhaṁ vihitaṁ vapuḥ

...तब आश्चर्यचकित और भूख से पीड़ित होकर उन्होंने पूछा — "यह क्या है, यह क्या है, हे पापिनियो! तुम्हारे शरीर पर यह विपरीत रूप किसने कर दिया है?"

श्लोक 5 (skanda.6.112.5)

कथं प्राप्तानि वस्त्राणि भूषणानि वराणि च। नूनमस्मद्गतेर्भ्रंशः खे जातो नाऽन्यथा भवेत्

kathaṁ prāptāni vastrāṇi bhūṣaṇāni varāṇi ca nūnamasmadgaterbhraṁśaḥ khe jāto nā'nyathā bhavet

"ये वस्त्र और उत्तम आभूषण तुम्हें कैसे मिले? निश्चय ही इसी कारण आकाश में हमारी गति भ्रष्ट हुई है, अन्यथा नहीं हो सकता।"

श्लोक 6 (skanda.6.112.6)

विकारमेनं संत्यक्त्वा युष्मदीयं सुगर्हिताः। अथ ताः सर्ववृत्तांतमूचुस्तापसयोषितः

vikāramenaṁ saṁtyaktvā yuṣmadīyaṁ sugarhitāḥ atha tāḥ sarvavṛttāṁtamūcustāpasayoṣitaḥ

"हे निंदनीय स्त्रियो! अपने इस विकार को त्याग दो।" तब उन तपस्विनी स्त्रियों ने संपूर्ण वृत्तांत कह सुनाया।

श्लोक 7 (skanda.6.112.7)

यथा राज्ञी समायाता दमयन्ती नृपप्रिया। भूषणानि च दत्तानि तया चैव यथा द्विजाः

yathā rājñī samāyātā damayantī nṛpapriyā bhūṣaṇāni ca dattāni tayā caiva yathā dvijāḥ

हे द्विजो! उन्होंने बताया कि किस प्रकार राजरानी दमयंती, राजा की प्रिया, वहाँ आई थी, और किस प्रकार उसी ने ये आभूषण दिए थे।

श्लोक 8 (skanda.6.112.8)

यथा शापश्च सञ्जातो ब्राह्मणानां महात्मनाम्। अथ ते मुनयः क्रुद्धास्तच्छ्रुत्वा गर्हितं वचः। राजप्रतिग्रहो निंद्यस्तापसानां विशेषतः

yathā śāpaśca sañjāto brāhmaṇānāṁ mahātmanām atha te munayaḥ kruddhāstacchrutvā garhitaṁ vacaḥ rājapratigraho niṁdyastāpasānāṁ viśeṣataḥ

और किस प्रकार महात्मा ब्राह्मणों का शाप उत्पन्न हुआ। यह निंदनीय वृत्तांत सुनकर वे मुनि क्रुद्ध हो गए, क्योंकि तपस्वियों के लिए राजा से प्रतिग्रह लेना विशेष रूप से निंदनीय है।

श्लोक 9 (skanda.6.112.9)

ततो भूपस्य राष्ट्रस्य नाशार्थं जगृहुर्जलम्। क्रोधेन महताविष्टा वेपमाना निरर्गलम्

tato bhūpasya rāṣṭrasya nāśārthaṁ jagṛhurjalam krodhena mahatāviṣṭā vepamānā nirargalam

तब अत्यधिक क्रोध से भरकर और अनियंत्रित रूप से काँपते हुए, उन्होंने राजा के राज्य के विनाश के लिए हाथ में जल ले लिया।

श्लोक 10 (skanda.6.112.10)

अनेन पाप्मनाऽस्माकं कुभूपेन प्रणाशिता। खे गतिर्लोभयित्वा तु पत्न्योऽस्माकमकृत्रिमाः। सरलास्तद्गणाः सर्वे येनेदृग्व्यसनं स्थितम्

anena pāpmanā'smākaṁ kubhūpena praṇāśitā khe gatirlobhayitvā tu patnyo'smākamakṛtrimāḥ saralāstadgaṇāḥ sarve yenedṛgvyasanaṁ sthitam

"इस पापी दुष्ट राजा ने, हमारी सीधी-सादी, निष्कपट पत्नियों और उनके सारे समूह को लोभ देकर, हमारी आकाशगमन-शक्ति का नाश कर दिया है, जिससे हम पर ऐसा संकट आ पड़ा है।"

श्लोक 11 (skanda.6.112.11)

सूत उवाच। एवं ते मुनयो यावच्छापं तस्य महीपतेः। प्रयच्छंति च तास्तावदूचुर्भार्या रुषान्विताः

sūta uvāca evaṁ te munayo yāvacchāpaṁ tasya mahīpateḥ prayacchaṁti ca tāstāvadūcurbhāryā ruṣānvitāḥ

सूत जी ने कहा — इस प्रकार, जैसे ही वे मुनि उस राजा को शाप देने ही वाले थे, वैसे ही उनकी पत्नियों ने क्रोधयुक्त होकर उनसे कहा।

श्लोक 12 (skanda.6.112.12)

न देयो भूपतेस्तस्य शापो ब्राह्मणसत्तमाः। अस्मदीयं वचस्तावच्छ्रोतव्यमविशंकितैः

na deyo bhūpatestasya śāpo brāhmaṇasattamāḥ asmadīyaṁ vacastāvacchrotavyamaviśaṁkitaiḥ

"हे ब्राह्मणसत्तमो! उस राजा को शाप मत दीजिए; पहले निःशंक होकर हमारा वचन सुन लीजिए।"

श्लोक 13 (skanda.6.112.13)

वयं सर्वा नरेन्द्रस्य भार्यया समलंकृताः। सुवस्त्रैर्भूषणैर्दिव्यैः श्रद्धापूतेन चेतसा

vayaṁ sarvā narendrasya bhāryayā samalaṁkṛtāḥ suvastrairbhūṣaṇairdivyaiḥ śraddhāpūtena cetasā

"हम सब राजा की भार्या के द्वारा श्रद्धा से पवित्र चित्त से उत्तम वस्त्रों और दिव्य आभूषणों से अलंकृत की गई हैं।"

श्लोक 14 (skanda.6.112.14)

वयं दरिद्रदोषेण सदा युष्मद्गृहे स्थिताः। कर्शिता न च संप्राप्तं सुखं मर्त्यसमुद्भवम्

vayaṁ daridradoṣeṇa sadā yuṣmadgṛhe sthitāḥ karśitā na ca saṁprāptaṁ sukhaṁ martyasamudbhavam

"हम दरिद्रता के दोष से सदा आपके घर में क्षीण होकर रही हैं, और हमें मनुष्य-जन्म से मिलने वाला सुख कभी प्राप्त नहीं हुआ।"

श्लोक 15 (skanda.6.112.15)

एतेषां परलोकोऽत्र विद्यते ये तपोरताः। न च मर्त्यफलं किंचिदपि स्वल्पतरं भवेत्

eteṣāṁ paraloko'tra vidyate ye taporatāḥ na ca martyaphalaṁ kiṁcidapi svalpataraṁ bhavet

"जो तपस्या में लीन हैं, उनके लिए यहाँ केवल परलोक ही है; उन्हें मनुष्य-जीवन का फल तनिक भी नहीं मिलता।"

श्लोक 16 (skanda.6.112.16)

अन्येषां विषयस्थानामिह लोकः प्रकीर्तितः। भोगप्रसक्तचित्तानां नीचानां सुदुरात्मनाम्

anyeṣāṁ viṣayasthānāmiha lokaḥ prakīrtitaḥ bhogaprasaktacittānāṁ nīcānāṁ sudurātmanām

"विषयों में लिप्त, भोग में आसक्तचित्त, नीच और अत्यंत दुरात्मा अन्य लोगों के लिए तो केवल यही लोक कहा गया है।"

श्लोक 17 (skanda.6.112.17)

गृहस्थाश्रमिणां चैव स्वधर्मरतचेतसाम्। इह लोकः परश्चैव जायते नाऽत्र संशयः

gṛhasthāśramiṇāṁ caiva svadharmaratacetasām iha lokaḥ paraścaiva jāyate nā'tra saṁśayaḥ

"किंतु जो गृहस्थाश्रमी अपने धर्म में रतचित्त हैं, उनके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही सिद्ध होते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।"

श्लोक 18 (skanda.6.112.18)

ता वयं नात्र सन्देहो गृहस्थाश्रममुत्तमम्। संसेव्य साधयिष्यामो लोकद्वयमनुत्तमम्

tā vayaṁ nātra sandeho gṛhasthāśramamuttamam saṁsevya sādhayiṣyāmo lokadvayamanuttamam

"अतः हम भी, इसमें कोई संदेह नहीं, उत्तम गृहस्थाश्रम का सेवन करके दोनों उत्कृष्ट लोकों को सिद्ध करेंगी।"

श्लोक 19 (skanda.6.112.19)

तस्माद्गृहाणि रम्याणि प्रवदंति समाहिताः। भूपालाद्भूमिमादाय वृत्तिं चैवाभिवांछिताम्

tasmādgṛhāṇi ramyāṇi pravadaṁti samāhitāḥ bhūpālādbhūmimādāya vṛttiṁ caivābhivāṁchitām

"इसलिए एकाग्रचित्त होकर वे (विद्वज्जन) सुंदर घर बनाने की सलाह देते हैं — राजा से भूमि और अभीष्ट जीविका लेकर।"

श्लोक 20 (skanda.6.112.20)

ततश्चैवाथ वीक्षध्वं पुत्रपौत्रसमुद्भवम्। सौख्यं चापि कुमारीणां बांधवानां विशेषतः

tataścaivātha vīkṣadhvaṁ putrapautrasamudbhavam saukhyaṁ cāpi kumārīṇāṁ bāṁdhavānāṁ viśeṣataḥ

"और फिर पुत्र-पौत्रों के जन्म को, तथा कन्याओं और विशेष रूप से बंधुजनों के सुख को भी देखिए।"

श्लोक 21 (skanda.6.112.21)

न करिष्यथ चेद्वाक्यमेतदस्मदुदीरितम्। सर्वाः प्राणपरित्यागं करिष्यामो न संशयः

na kariṣyatha cedvākyametadasmadudīritam sarvāḥ prāṇaparityāgaṁ kariṣyāmo na saṁśayaḥ

"यदि आप हमारे इस कहे हुए वचन का पालन नहीं करेंगे, तो हम सब निःसंदेह प्राणत्याग कर देंगी।"

श्लोक 22 (skanda.6.112.22)

यूयं स्त्रीवधपापेन युक्ताः सन्तस्ततः परम्। नरकं रौरवं दुर्गं गमिष्यथ सुनिश्चितम्

yūyaṁ strīvadhapāpena yuktāḥ santastataḥ param narakaṁ rauravaṁ durgaṁ gamiṣyatha suniścitam

"और तब स्त्री-हत्या के पाप से युक्त होकर आप निश्चित रूप से भयंकर रौरव नरक को प्राप्त होंगे।"

श्लोक 23 (skanda.6.112.23)

एवं ते मुनयः श्रुत्वा तासां वाक्यानि तानि वै। भूपृष्ठे तत्यजुस्तोयं शापार्थं यत्करैर्धृतम्

evaṁ te munayaḥ śrutvā tāsāṁ vākyāni tāni vai bhūpṛṣṭhe tatyajustoyaṁ śāpārthaṁ yatkarairdhṛtam

इस प्रकार उनकी वे बातें सुनकर, उन मुनियों ने शाप के लिए हाथों में धारण किया हुआ जल पृथ्वी की सतह पर छोड़ दिया।

श्लोक 24 (skanda.6.112.24)

ततस्तत्तोयनिर्दग्धं तद्विभागं क्षितेस्तदा। ऊषरत्वमनुप्राप्तमद्यापि द्विजसत्तमाः

tatastattoyanirdagdhaṁ tadvibhāgaṁ kṣitestadā ūṣaratvamanuprāptamadyāpi dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो! तब उस जल से जला हुआ पृथ्वी का वह भाग ऊषरता (बंजरपन) को प्राप्त हो गया, और आज भी वैसा ही बना हुआ है।

श्लोक 25 (skanda.6.112.25)

आस्तामन्नादिकं तत्र यदुत्पन्नं न प्ररोहति। न जन्म चाप्नुयाद्भूयः पक्षी वा कीट एव वा

āstāmannādikaṁ tatra yadutpannaṁ na prarohati na janma cāpnuyādbhūyaḥ pakṣī vā kīṭa eva vā

वहाँ अन्न आदि की बात तो दूर, जो कुछ उगता भी है वह बढ़ता नहीं; न वहाँ पक्षी और न ही कीट का पुनः जन्म होता है।

श्लोक 26 (skanda.6.112.26)

तृणं वाथ मृगस्तत्र किं पुनर्भक्तिमान्नरः। यस्तत्र कुरुते श्राद्धं श्रद्धया फाल्गुने नरः

tṛṇaṁ vātha mṛgastatra kiṁ punarbhaktimānnaraḥ yastatra kurute śrāddhaṁ śraddhayā phālgune naraḥ

वहाँ न घास टिकती है, न कोई पशु — फिर भक्तिमान मनुष्य की तो बात ही क्या! किंतु जो मनुष्य वहाँ फाल्गुन मास में श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है...

श्लोक 27 (skanda.6.112.27)

पौर्णमास्यां रवैर्वारे स पितॄनुद्धरेन्निजान्। अपि स्वकर्मणा प्राप्तान्नरके दारुणाकृतौ

paurṇamāsyāṁ ravairvāre sa pitṝnuddharennijān api svakarmaṇā prāptānnarake dāruṇākṛtau

...और वह भी पूर्णिमा के दिन यदि रविवार पड़े, तो वह अपने पितरों का उद्धार कर देता है — भले ही वे अपने कर्मों से भयंकर रूप वाले नरक में पड़े हों।

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