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नागर खण्ड · अध्याय 113

त्रिजातक-विशुद्धि हेतु अग्निकुण्ड-माहात्म्य-वर्णन

अध्याय 112अध्याय-सूचीअध्याय 114

श्लोक 1 (skanda.6.113.1)

सूत उवाच। ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे गतकोपा दधुर्मतिम्। यज्ञकर्मसु गार्हस्थ्ये पुत्रपौत्रसमुद्भवे

sūta uvāca tataste brāhmaṇāḥ sarve gatakopā dadhurmatim yajñakarmasu gārhasthye putrapautrasamudbhave

सूत जी ने कहा — तब वे सभी ब्राह्मण क्रोधरहित होकर यज्ञकर्मों, गृहस्थाश्रम और पुत्र-पौत्रों की उत्पत्ति में मन लगाने लगे।

श्लोक 2 (skanda.6.113.2)

एतस्मिन्नंतरे राजा स तान्प्राप्तान्द्विजोत्तमान्। श्रुत्वा भक्तिसमायुक्तः प्रणामार्थमुपागतः

etasminnaṁtare rājā sa tānprāptāndvijottamān śrutvā bhaktisamāyuktaḥ praṇāmārthamupāgataḥ

इसी बीच राजा उन आए हुए श्रेष्ठ द्विजों का समाचार सुनकर, भक्तियुक्त होकर उन्हें प्रणाम करने के लिए आया।

श्लोक 3 (skanda.6.113.3)

श्रुत्वा कोपगतां वार्तामुपशामकृतां तथा। गार्हस्थ्याप्रतिपन्नानां वाक्यैर्भार्यासमुद्भवैः

śrutvā kopagatāṁ vārtāmupaśāmakṛtāṁ tathā gārhasthyāpratipannānāṁ vākyairbhāryāsamudbhavaiḥ

उसने सुना था कि उनका क्रोध, उनकी पत्नियों के वचनों से किस प्रकार शांत हो गया था, और वे किस प्रकार गृहस्थाश्रम स्वीकार करने को उद्यत हुए थे।

श्लोक 4 (skanda.6.113.4)

ततः प्रणम्य तान्सर्वान्साष्टांगं स महीपतिः। ततः कृतांजलिपुटः प्रोवाच विनतः स्थितः

tataḥ praṇamya tānsarvānsāṣṭāṁgaṁ sa mahīpatiḥ tataḥ kṛtāṁjalipuṭaḥ provāca vinataḥ sthitaḥ

तब उन सबको साष्टांग प्रणाम करके, वह राजा हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक खड़ा होकर बोला।

श्लोक 5 (skanda.6.113.5)

युष्मदीयप्रसादेन संप्राप्तं जन्मनः फलम्। मया रोगविनाशेन तस्माद्ब्रूत करोमि किम्

yuṣmadīyaprasādena saṁprāptaṁ janmanaḥ phalam mayā rogavināśena tasmādbrūta karomi kim

"आपकी ही कृपा से, अपने रोग के नाश द्वारा, मुझे जन्म का फल प्राप्त हुआ है; अतः कहिए, मैं क्या करूँ?"

श्लोक 6 (skanda.6.113.6)

ब्राह्मणा ऊचुः। भार्यया तव राजेंद्र वयं सर्वत्र वासिनः। नीताः कृतार्थतां दत्त्वा रत्नानि विविधानि च

brāhmaṇā ūcuḥ bhāryayā tava rājeṁdra vayaṁ sarvatra vāsinaḥ nītāḥ kṛtārthatāṁ dattvā ratnāni vividhāni ca

ब्राह्मणों ने कहा — हे राजेंद्र! सर्वत्र निवास करने वाले हम लोगों को आपकी पत्नी ने विविध रत्न देकर कृतार्थ बना दिया है।

श्लोक 7 (skanda.6.113.7)

तस्मात्पुरवरं कृत्वा क्षेत्रेऽत्रैव सुशोभने। अस्माकं देहि गार्हस्थ्यं येन सम्यक्प्रजायते

tasmātpuravaraṁ kṛtvā kṣetre'traiva suśobhane asmākaṁ dehi gārhasthyaṁ yena samyakprajāyate

"अतः इसी सुशोभित क्षेत्र में एक श्रेष्ठ नगर बनवाकर हमें गृहस्थाश्रम प्रदान कीजिए, जिससे भलीभाँति संतानोत्पत्ति हो सके।"

श्लोक 8 (skanda.6.113.8)

यजामो विविधैर्यज्ञैः सदा संपूर्णदक्षिणैः। इमं लोकं परं चैव साधयामः सदास्थिताः

yajāmo vividhairyajñaiḥ sadā saṁpūrṇadakṣiṇaiḥ imaṁ lokaṁ paraṁ caiva sādhayāmaḥ sadāsthitāḥ

"हम सदा संपूर्ण दक्षिणा वाले विविध यज्ञों से यजन करेंगे, और सदा स्थिर रहकर इस लोक तथा परलोक दोनों को सिद्ध करेंगे।"

श्लोक 9 (skanda.6.113.9)

तच्छ्रुत्वा पार्थिवो हृष्टस्तथेत्युक्त्वा ततः परम्। अनुकूलदिने प्राप्ते शिल्पानाहूय भूरिशः

tacchrutvā pārthivo hṛṣṭastathetyuktvā tataḥ param anukūladine prāpte śilpānāhūya bhūriśaḥ

यह सुनकर प्रसन्न राजा ने "ऐसा ही होगा" कहकर, अनुकूल दिन आने पर बहुत-से शिल्पियों को बुलवाया।

श्लोक 10 (skanda.6.113.10)

पुरं प्रकल्पयामास बहुप्राकारसंकुलम्। प्राकारपरिखायुक्तं गोपुरैः समलंकृतम्

puraṁ prakalpayāmāsa bahuprākārasaṁkulam prākāraparikhāyuktaṁ gopuraiḥ samalaṁkṛtam

उसने अनेक प्राकारों से युक्त, परकोटे और खाई से संपन्न, तथा गोपुरों से सुसज्जित एक नगर का निर्माण करवाया।

श्लोक 11 (skanda.6.113.11)

अथाष्टषष्टिविप्राणां तत्र मध्ये नृपोत्तमः। अष्टषष्टिगृहाण्येव चकार सुबृहंति च

athāṣṭaṣaṣṭiviprāṇāṁ tatra madhye nṛpottamaḥ aṣṭaṣaṣṭigṛhāṇyeva cakāra subṛhaṁti ca

फिर उस श्रेष्ठ राजा ने अड़सठ ब्राह्मणों के लिए वहाँ बीचोंबीच अड़सठ अत्यंत विशाल भवन बनवाए।

श्लोक 12 (skanda.6.113.12)

मत्तवारणजुष्टानि दीर्घिकासहितानि च। गृहोद्यानैः समेतानि यथा राजगृहाणि च

mattavāraṇajuṣṭāni dīrghikāsahitāni ca gṛhodyānaiḥ sametāni yathā rājagṛhāṇi ca

वे भवन मदमत्त हाथियों से युक्त, बावड़ियों से युक्त, और उद्यानों से युक्त थे, मानो राजभवन ही हों।

श्लोक 13 (skanda.6.113.13)

तथा कृत्वाऽथ रत्नौघैः पूरयित्वा तथा परैः। ददौ तेभ्योऽष्टषष्टिं च ग्रामाणां तदनंतरम्

tathā kṛtvā'tha ratnaughaiḥ pūrayitvā tathā paraiḥ dadau tebhyo'ṣṭaṣaṣṭiṁ ca grāmāṇāṁ tadanaṁtaram

इस प्रकार बनवाकर और उन्हें रत्नराशियों तथा अन्य वस्तुओं से भरकर, उसने तत्पश्चात् उन्हें अड़सठ गाँव भी दिए।

श्लोक 14 (skanda.6.113.14)

ततः सर्वान्समाहूय पुत्रपौत्रांस्तदग्रतः। प्रोवाच तारनादेन श्रूयतां जल्पतो मम

tataḥ sarvānsamāhūya putrapautrāṁstadagrataḥ provāca tāranādena śrūyatāṁ jalpato mama

तब अपने समस्त पुत्र-पौत्रों को उनके सामने बुलाकर, उसने ऊँचे स्वर में कहा — "मेरा कहना सुना जाए।"

श्लोक 15 (skanda.6.113.15)

एतत्पुरं मया दत्तमेभिर्ग्रामैः समन्वितम्। एतेभ्यो ब्राह्मणेंद्रेभ्यः श्रद्धापूतेन चेतसा

etatpuraṁ mayā dattamebhirgrāmaiḥ samanvitam etebhyo brāhmaṇeṁdrebhyaḥ śraddhāpūtena cetasā

"यह नगर, इन गाँवों सहित, मैंने श्रद्धा से पवित्र मन के साथ इन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दे दिया है।"

श्लोक 16 (skanda.6.113.16)

तस्माद्रक्षा प्रकर्तव्या यथा न स्यात्क्षतिः क्वचित्। कष्टं वा ब्राह्मणेंद्राणां तथा चैव पराभवम्

tasmādrakṣā prakartavyā yathā na syātkṣatiḥ kvacit kaṣṭaṁ vā brāhmaṇeṁdrāṇāṁ tathā caiva parābhavam

"अतः इस प्रकार रक्षा की जानी चाहिए कि इन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को कभी कोई हानि, कष्ट अथवा अपमान न हो।"

श्लोक 17 (skanda.6.113.17)

अस्मद्वंशसमुद्भूतो यस्त्वेतांस्तोषयिष्यति। अन्यो वा भूपतिर्वृद्धिमग्र्यां नूनं स यास्यति

asmadvaṁśasamudbhūto yastvetāṁstoṣayiṣyati anyo vā bhūpatirvṛddhimagryāṁ nūnaṁ sa yāsyati

"हमारे वंश में उत्पन्न अथवा अन्य कोई भी राजा, जो इन्हें संतुष्ट करेगा, वह निश्चय ही सर्वोच्च समृद्धि को प्राप्त होगा।"

श्लोक 18 (skanda.6.113.18)

यश्चापराधसंयुक्तानेतान्खेदं नयिष्यति। योजयिष्यति वा क्लेशैर्विविधैर्वा पराभवैः। स शत्रुभिः पराभूतो वेष्टितो विविधैर्गदैः

yaścāparādhasaṁyuktānetānkhedaṁ nayiṣyati yojayiṣyati vā kleśairvividhairvā parābhavaiḥ sa śatrubhiḥ parābhūto veṣṭito vividhairgadaiḥ

"किंतु जो अपराध करके इन्हें दुःख पहुँचाएगा, अथवा इन्हें विविध क्लेशों या अपमानों से युक्त करेगा, वह शत्रुओं से पराजित होकर विविध रोगों से घिर जाएगा।"

श्लोक 19 (skanda.6.113.19)

इह लोके वियोगादीन्प्राप्य क्लेशान्सुदारुणान्। रौरवादिषु रौद्रेषु नरकेषु प्रयास्यति

iha loke viyogādīnprāpya kleśānsudāruṇān rauravādiṣu raudreṣu narakeṣu prayāsyati

"इस लोक में वियोग आदि अत्यंत भयंकर क्लेशों को भोगकर, वह रौरव आदि भीषण नरकों में जाएगा।"

श्लोक 20 (skanda.6.113.20)

एवमुक्त्वा ततः सर्वं तेषां कृत्यं महीपतिः। स्वयमेवाकरोन्नित्यं दिवारात्रमतंद्रितः

evamuktvā tataḥ sarvaṁ teṣāṁ kṛtyaṁ mahīpatiḥ svayamevākaronnityaṁ divārātramataṁdritaḥ

ऐसा कहकर वह राजा स्वयं ही आलस्यरहित होकर, दिन-रात नित्य उनके सभी कार्यों को स्वयं करने लगा।

श्लोक 21 (skanda.6.113.21)

अथ ता ब्राह्मणेंद्राणां भार्याः सर्वा द्विजोत्तमाः। दमयंत्याः समासाद्य प्रासादं स्नेहवत्सलाः

atha tā brāhmaṇeṁdrāṇāṁ bhāryāḥ sarvā dvijottamāḥ damayaṁtyāḥ samāsādya prāsādaṁ snehavatsalāḥ

हे द्विजोत्तमो! फिर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों की स्नेहशील पत्नियाँ सब मिलकर दमयंती के प्रासाद में जाया करती थीं।

श्लोक 22 (skanda.6.113.22)

कुंकुमागरुकर्पूरैः पुष्पैर्गंधैः पृथग्विधैः। तदर्च्चा पूजयामासुः स च राजा दिनेदिने

kuṁkumāgarukarpūraiḥ puṣpairgaṁdhaiḥ pṛthagvidhaiḥ tadarccā pūjayāmāsuḥ sa ca rājā dinedine

कुंकुम, अगर, कर्पूर, पुष्पों और नाना प्रकार के सुगंधित द्रव्यों से वे तथा वह राजा प्रतिदिन उसकी प्रतिमा की पूजा करते थे।

श्लोक 23 (skanda.6.113.23)

अथ ताः प्रोचुरन्योन्यं तापस्यस्तत्पुरः स्थिताः। तस्य भूपस्य संतोषं जनयंत्यो द्विजोत्तमाः

atha tāḥ procuranyonyaṁ tāpasyastatpuraḥ sthitāḥ tasya bhūpasya saṁtoṣaṁ janayaṁtyo dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो! फिर उस नगर के सामने खड़ी हुई तपस्विनियाँ, राजा को संतोष प्रदान करती हुई आपस में बोलीं।

श्लोक 24 (skanda.6.113.24)

यदास्माकं गृहे वृद्धिः कदाचित्संभविष्यति। तदग्रतश्च पश्चाच्च दमयंत्याः प्रपूजनम्। करिष्यामो न संदेहः सर्वकृत्येषु सर्वदा

yadāsmākaṁ gṛhe vṛddhiḥ kadācitsaṁbhaviṣyati tadagrataśca paścācca damayaṁtyāḥ prapūjanam kariṣyāmo na saṁdehaḥ sarvakṛtyeṣu sarvadā

"जब कभी भी हमारे घर में वृद्धि (संतानोत्पत्ति आदि) होगी, तब उसके पहले और बाद में सदा सभी कार्यों में हम निःसंदेह दमयंती की पूजा करेंगी।"

श्लोक 25 (skanda.6.113.25)

एनां दृष्ट्वा कुमारी या वेदिमध्यं गमिष्यति। सा भविष्यत्यसंदेहः पत्युः प्राणसमा सदा

enāṁ dṛṣṭvā kumārī yā vedimadhyaṁ gamiṣyati sā bhaviṣyatyasaṁdehaḥ patyuḥ prāṇasamā sadā

"जो कन्या इसे देखकर विवाह-वेदी के मध्य जाएगी, वह निःसंदेह सदा अपने पति को प्राणों के समान प्रिय होगी।"

श्लोक 26 (skanda.6.113.26)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कन्यायज्ञ उपस्थिते। दमयंती प्रद्रष्टव्या पूजनीया प्रयत्नतः

tasmātsarvaprayatnena kanyāyajña upasthite damayaṁtī pradraṣṭavyā pūjanīyā prayatnataḥ

"अतः कन्या के विवाह-यज्ञ के उपस्थित होने पर, पूरे प्रयत्न से दमयंती का दर्शन और यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिए।"

श्लोक 27 (skanda.6.113.27)

सूत उवाच। एवं तत्र पुरे तेन भूभुजा सुमहात्मना। अष्टषष्टिं च संस्थाप्य गोत्राणां निर्वृतिः कृता

sūta uvāca evaṁ tatra pure tena bhūbhujā sumahātmanā aṣṭaṣaṣṭiṁ ca saṁsthāpya gotrāṇāṁ nirvṛtiḥ kṛtā

सूत जी ने कहा — इस प्रकार उस महात्मा राजा ने उस नगर में अड़सठ गोत्रों की स्थापना करके उनके लिए संतोष का प्रबंध किया।

श्लोक 28 (skanda.6.113.28)

तेषामपि च चत्वारि गोत्राण्युरगजाद्भयात्। गतानि तत्र यत्र स्युस्तानि पूर्वोद्भवानि च। चतुःषष्टिः स्थिता तत्र पुरे शेषा द्विजन्मनाम्

teṣāmapi ca catvāri gotrāṇyuragajādbhayāt gatāni tatra yatra syustāni pūrvodbhavāni ca catuḥṣaṣṭiḥ sthitā tatra pure śeṣā dvijanmanām

उनमें से भी सर्पभय के कारण चार गोत्र वहीं लौट गए जहाँ से वे पूर्व में उत्पन्न हुए थे; शेष चौंसठ द्विज उस नगर में ही बस गए।

श्लोक 29 (skanda.6.113.29)

ऋषय ऊचुः। कीदृङ्नागभयं तेषां येन ते विगता विभो। परित्यज्य निजं स्थानमेतन्नो विस्तराद्वद

ṛṣaya ūcuḥ kīdṛṅnāgabhayaṁ teṣāṁ yena te vigatā vibho parityajya nijaṁ sthānametanno vistarādvada

ऋषियों ने कहा — हे विभो! उनका वह कैसा सर्पभय था, जिसके कारण वे अपना निजी स्थान छोड़कर चले गए? यह हमें विस्तार से बताइए।

श्लोक 30 (skanda.6.113.30)

सूत उवाच। आनर्त्ताधिपतिः पूर्वमासीन्नाम्ना प्रभंजनः। धर्मज्ञः सुप्रतापी च परपक्षक्षयावहः

sūta uvāca ānarttādhipatiḥ pūrvamāsīnnāmnā prabhaṁjanaḥ dharmajñaḥ supratāpī ca parapakṣakṣayāvahaḥ

सूत जी ने कहा — पूर्वकाल में अनर्त का अधिपति प्रभंजन नाम से विख्यात था, जो धर्मज्ञ, महाप्रतापी और शत्रुपक्ष का नाश करने वाला था।

श्लोक 31 (skanda.6.113.31)

ततस्तस्य सुतो जज्ञे प्राप्ते वयसि पश्चिमे। अनिष्टस्थानसंस्थेषु ग्रहेषु द्विजसत्तमाः

tatastasya suto jajñe prāpte vayasi paścime aniṣṭasthānasaṁstheṣu graheṣu dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो! उसके अंतिम वय (वृद्धावस्था) में, जब ग्रह अशुभ स्थानों में स्थित थे, तब उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ।

श्लोक 32 (skanda.6.113.32)

ततस्तेन समाहूय दैवज्ञाञ्छास्त्रपंडितान्। तेषां निवेदितं सर्वं कालं तस्य समुद्भवम्

tatastena samāhūya daivajñāñchāstrapaṁḍitān teṣāṁ niveditaṁ sarvaṁ kālaṁ tasya samudbhavam

तब उसने शास्त्रपंडित दैवज्ञों को बुलाकर उन्हें अपने पुत्र की उत्पत्ति का संपूर्ण समय बता दिया।

श्लोक 33 (skanda.6.113.33)

दैवज्ञा ऊचुः। एष ते पृथिवीपाल जातः पुत्रः सुगर्हित। कालेऽनिष्टप्रदे रौद्रे गंडांतत्रितयोद्भवे

daivajñā ūcuḥ eṣa te pṛthivīpāla jātaḥ putraḥ sugarhita kāle'niṣṭaprade raudre gaṁḍāṁtatritayodbhave

दैवज्ञों ने कहा — हे पृथिवीपाल! अत्यंत निंदनीय, अशुभदायक, भीषण और त्रिविध गंडांत में उत्पन्न हुआ यह आपका पुत्र है।

श्लोक 34 (skanda.6.113.34)

कथंचिदपि यद्येष जीवयिष्यति पार्थिव। पितृमातृपुरार्थे च देशानुत्सादयिष्यति

kathaṁcidapi yadyeṣa jīvayiṣyati pārthiva pitṛmātṛpurārthe ca deśānutsādayiṣyati

"हे राजन्! यदि यह किसी प्रकार जीवित रहा, तो अपने पिता, माता, नगर और देश का विनाश करेगा।"

श्लोक 35 (skanda.6.113.35)

राजोवाच। अस्ति कश्चिदुपायोऽत्र दैवो वा मानुषोऽपि वा। येन संजायते क्षेमं पुत्रस्य विषयस्य च

rājovāca asti kaścidupāyo'tra daivo vā mānuṣo'pi vā yena saṁjāyate kṣemaṁ putrasya viṣayasya ca

राजा ने कहा — क्या यहाँ कोई दैवी अथवा मानवीय उपाय है, जिससे मेरे पुत्र और राज्य का कल्याण हो सके?

श्लोक 36 (skanda.6.113.36)

ब्राह्मणा ऊचुः। यथा समुत्थितं यंत्रं यंत्रेण प्रतिहन्यते। यथा बाणप्रहाराणां कवचं वारणं भवेत्। तथा ग्रहविकाराणां शांतिर्भवति वारणम्

brāhmaṇā ūcuḥ yathā samutthitaṁ yaṁtraṁ yaṁtreṇa pratihanyate yathā bāṇaprahārāṇāṁ kavacaṁ vāraṇaṁ bhavet tathā grahavikārāṇāṁ śāṁtirbhavati vāraṇam

ब्राह्मणों ने कहा — जैसे उठाए गए एक यंत्र को दूसरे यंत्र से रोका जाता है, और जैसे बाणों के प्रहार का निवारण कवच से होता है, वैसे ही ग्रहों के विकारों का निवारण शांति-कर्म से होता है।

श्लोक 37 (skanda.6.113.37)

तस्मान्नित्यमनुद्विग्नः शांतिकं कुरु भूपते। येन सर्वे ग्रहाः सौम्या जायंते च शुभावहाः

tasmānnityamanudvignaḥ śāṁtikaṁ kuru bhūpate yena sarve grahāḥ saumyā jāyaṁte ca śubhāvahāḥ

"अतः हे राजन्! सदा निश्चिंत रहकर शांति-कर्म कीजिए, जिससे समस्त ग्रह सौम्य और शुभ फल देने वाले हो जाएँ।"

श्लोक 38 (skanda.6.113.38)

अनिष्टस्थानसंस्थेषु ग्रहेषु विषमेषु च। ततः स सत्वं गत्वा चमत्कारपुरं नृपः

aniṣṭasthānasaṁstheṣu graheṣu viṣameṣu ca tataḥ sa satvaṁ gatvā camatkārapuraṁ nṛpaḥ

चूँकि ग्रह अशुभ और विषम स्थानों में स्थित थे, अतः वह राजा शीघ्रतापूर्वक चमत्कारपुर गया।

श्लोक 39 (skanda.6.113.39)

तत्र विप्रान्समावेश्य सर्वान्प्रोवाच सादरम्। वयं युष्मत्प्रसादेन राज्यं कुर्मः सदैव हि

tatra viprānsamāveśya sarvānprovāca sādaram vayaṁ yuṣmatprasādena rājyaṁ kurmaḥ sadaiva hi

वहाँ सब ब्राह्मणों को एकत्र करके उसने आदरपूर्वक कहा — "हम सदा आप ही की कृपा से राज्य करते हैं।"

श्लोक 40 (skanda.6.113.40)

येऽतीता ये भविष्यंति वंशेऽस्माकं नृपोत्तमाः। भवंतोऽत्र गतिस्तेषां सस्यानां नीरदो यथा

ye'tītā ye bhaviṣyaṁti vaṁśe'smākaṁ nṛpottamāḥ bhavaṁto'tra gatisteṣāṁ sasyānāṁ nīrado yathā

"हमारे वंश में जो श्रेष्ठ राजा हो चुके हैं और जो आगे होंगे, उन सबके लिए आप ही आश्रय हैं, जैसे फसलों के लिए मेघ होता है।"

श्लोक 41 (skanda.6.113.41)

यदत्र मत्सुतो जातो दुष्टस्थानस्थितैर्ग्रहैः। दैवज्ञैः शांतिकं प्रोक्तं तस्यानिष्टस्य शांतिदम्

yadatra matsuto jāto duṣṭasthānasthitairgrahaiḥ daivajñaiḥ śāṁtikaṁ proktaṁ tasyāniṣṭasya śāṁtidam

"चूँकि यहाँ दुष्ट स्थानों में स्थित ग्रहों के प्रभाव से मेरा पुत्र उत्पन्न हुआ है, अतः दैवज्ञों ने उस अशुभ के शमन के लिए शांति-कर्म बताया है।"

श्लोक 42 (skanda.6.113.42)

तस्मात्कुरुत विप्रेंद्रा यथोक्तं शांतिकं मम। न पुत्रश्च राष्ट्रं च विभवश्च विवर्धते

tasmātkuruta vipreṁdrā yathoktaṁ śāṁtikaṁ mama na putraśca rāṣṭraṁ ca vibhavaśca vivardhate

"अतः हे विप्रेंद्रो! मेरे लिए यथोक्त शांति-कर्म कीजिए, जिससे पुत्र, राष्ट्र और वैभव सभी की वृद्धि हो।"

श्लोक 43 (skanda.6.113.43)

ततस्ते ब्राह्मणाः प्रोचुः संमंत्र्याऽथ परस्परम्। क्षेमाय तव भूनाथ करिष्यामोऽत्र शांतिकम्

tataste brāhmaṇāḥ procuḥ saṁmaṁtryā'tha parasparam kṣemāya tava bhūnātha kariṣyāmo'tra śāṁtikam

तब उन ब्राह्मणों ने आपस में परामर्श करके कहा — "हे भूनाथ! आपके कल्याण के लिए हम यहाँ शांति-कर्म करेंगे।"

श्लोक 44 (skanda.6.113.44)

सदैव नियताः संतः शांताः षोडश ते द्विजाः। उपहाराः सदा प्रेष्यास्त्वया भक्त्या महीपते। मासांते चाभिषेकश्च ग्राह्यो रुद्रघटोद्भवः

sadaiva niyatāḥ saṁtaḥ śāṁtāḥ ṣoḍaśa te dvijāḥ upahārāḥ sadā preṣyāstvayā bhaktyā mahīpate māsāṁte cābhiṣekaśca grāhyo rudraghaṭodbhavaḥ

"संयमशील और शांत सोलह द्विज सदा इसमें नियुक्त रहेंगे; हे राजन्! आपको भक्तिपूर्वक सदा भेंट भेजनी होगी, और मास के अंत में रुद्र-घट से उत्पन्न अभिषेक-जल ग्रहण करना होगा।"

श्लोक 45 (skanda.6.113.45)

एवं प्रकुर्वतस्तुभ्यं पुत्रो वृद्धिं प्रयास्यति। तथा राष्ट्रं च कोशश्च यच्चान्यदपि किंचन

evaṁ prakurvatastubhyaṁ putro vṛddhiṁ prayāsyati tathā rāṣṭraṁ ca kośaśca yaccānyadapi kiṁcana

"इस प्रकार करते रहने पर आपका पुत्र वृद्धि को प्राप्त होगा, और वैसे ही आपका राष्ट्र, कोश तथा जो कुछ और भी हो, वह सब भी।"

श्लोक 46 (skanda.6.113.46)

ततः प्रणम्य तान्हृष्टो गत्वा निजनिवेशनम्। उत्सवं पुत्रजन्मोत्थं चक्रे तैः प्रेरितः सदा

tataḥ praṇamya tānhṛṣṭo gatvā nijaniveśanam utsavaṁ putrajanmotthaṁ cakre taiḥ preritaḥ sadā

तब उन्हें प्रणाम करके, प्रसन्न होकर वह अपने निवास को गया, और उनके द्वारा सदा प्रेरित होकर उसने पुत्र-जन्म का उत्सव मनाया।

श्लोक 47 (skanda.6.113.47)

संभारान्प्रेषयामास चमत्कारपुरे ततः। मासांते चाभिषेकश्च ग्राह्यो वै विधिपूर्वकम्

saṁbhārānpreṣayāmāsa camatkārapure tataḥ māsāṁte cābhiṣekaśca grāhyo vai vidhipūrvakam

तत्पश्चात् उसने चमत्कारपुर में सामग्री भिजवाई, ताकि मास के अंत में विधिपूर्वक अभिषेक-जल ग्रहण किया जा सके।

श्लोक 48 (skanda.6.113.48)

तेऽपि ब्राह्मणशार्दूलाश्चातुश्चरणसंभवाः। क्रमेण शांतिकं चक्रुर्ब्रह्मचर्यपरायणाः

te'pi brāhmaṇaśārdūlāścātuścaraṇasaṁbhavāḥ krameṇa śāṁtikaṁ cakrurbrahmacaryaparāyaṇāḥ

चारों वेदों में निष्णात, ब्रह्मचर्यपरायण वे श्रेष्ठ ब्राह्मण भी क्रमशः शांति-कर्म करने लगे।

श्लोक 49 (skanda.6.113.49)

मासं मासं प्रति सदा शांता दांता जितेंद्रियाः। ततो मासावसानेऽन्ये चक्रुस्तच्छांतिकं द्विजाः

māsaṁ māsaṁ prati sadā śāṁtā dāṁtā jiteṁdriyāḥ tato māsāvasāne'nye cakrustacchāṁtikaṁ dvijāḥ

प्रत्येक मास शांत, संयमी और जितेंद्रिय द्विज बदल-बदल कर उस शांति-कर्म को करते थे, और मास के अंत में दूसरे उसे करने लगते थे।

श्लोक 50 (skanda.6.113.50)

सोऽपि राजाऽथ मासांते समागत्य सुभक्तितः। अभिषेकं समादाय पूजयित्वा द्विजोत्तमान्

so'pi rājā'tha māsāṁte samāgatya subhaktitaḥ abhiṣekaṁ samādāya pūjayitvā dvijottamān

वह राजा भी मास के अंत में अत्यंत भक्तिपूर्वक आकर, अभिषेक-जल ग्रहण करके, श्रेष्ठ ब्राह्मणों की पूजा करता था।

श्लोक 51 (skanda.6.113.51)

वासोभिर्मुकुटैश्चैव गोभूदानेन केवलम्। संतर्प्यान्यांस्तथा विप्रान्स्वस्थानं याति भूमिपः

vāsobhirmukuṭaiścaiva gobhūdānena kevalam saṁtarpyānyāṁstathā viprānsvasthānaṁ yāti bhūmipaḥ

वस्त्रों, मुकुटों तथा केवल गो-भूमि के दान से अन्य ब्राह्मणों को भी संतुष्ट करके राजा अपने स्थान को लौट जाता था।

श्लोक 52 (skanda.6.113.52)

एवं प्रवर्तमाने च शांतिके तत्र भूपतेः। जगाम सुमहान्कालः क्षेमारोग्यधनागमैः

evaṁ pravartamāne ca śāṁtike tatra bhūpateḥ jagāma sumahānkālaḥ kṣemārogyadhanāgamaiḥ

इस प्रकार राजा का वह शांति-कर्म चलते रहने पर, क्षेम, आरोग्य और धन की प्राप्ति के साथ बहुत लंबा समय बीत गया।

श्लोक 53 (skanda.6.113.53)

कस्यचित्त्वथ कालस्य मासादावपि भूपतेः। प्रारब्धे शांतिके तस्मिन्महाव्याधिरजायत

kasyacittvatha kālasya māsādāvapi bhūpateḥ prārabdhe śāṁtike tasminmahāvyādhirajāyata

किंतु कुछ समय बाद, मास के आरंभ में ही, वह शांति-कर्म प्रारंभ होते ही राजा को एक महाव्याधि उत्पन्न हो गई।

श्लोक 54 (skanda.6.113.54)

तत्पुत्रस्य विशेषेण तथैवांतःपुरस्य च। राष्ट्रस्य च समग्रस्य वाहनानां तथा क्षयः

tatputrasya viśeṣeṇa tathaivāṁtaḥpurasya ca rāṣṭrasya ca samagrasya vāhanānāṁ tathā kṣayaḥ

उसके पुत्र का, तथा अंतःपुर का, संपूर्ण राष्ट्र का और वाहनों का भी विशेष रूप से क्षय होने लगा।

श्लोक 55 (skanda.6.113.55)

स ततः प्रेषयामास शांत्यर्थं तत्र सत्पुरे। सुसंभारान्विशेषेण दक्षिणाश्च विशेषतः

sa tataḥ preṣayāmāsa śāṁtyarthaṁ tatra satpure susaṁbhārānviśeṣeṇa dakṣiṇāśca viśeṣataḥ

तब उसने शांति-कर्म के लिए उस उत्तम नगर में विशेष रूप से पर्याप्त सामग्री और विशेष रूप से दक्षिणाएँ भेजीं।

श्लोक 56 (skanda.6.113.56)

यथायथा द्विजास्तत्र होमं कुर्वंति पावके। तथा सर्वे विशेषेण रोगा वर्धंति सर्वशः

yathāyathā dvijāstatra homaṁ kurvaṁti pāvake tathā sarve viśeṣeṇa rogā vardhaṁti sarvaśaḥ

किंतु जैसे-जैसे वहाँ द्विज अग्नि में होम करते गए, वैसे-वैसे सभी रोग विशेष रूप से हर ओर बढ़ते ही गए।

श्लोक 57 (skanda.6.113.57)

म्रियन्ते वाजिनस्तस्य बृहन्तो वारणास्तथा। शत्रवः सर्वकाष्ठासु विग्रहार्थमुपस्थिताः

mriyante vājinastasya bṛhanto vāraṇāstathā śatravaḥ sarvakāṣṭhāsu vigrahārthamupasthitāḥ

उसके घोड़े मरने लगे, और वैसे ही उसके विशाल हाथी भी; और शत्रु सभी दिशाओं से युद्ध के लिए उपस्थित हो गए।

श्लोक 58 (skanda.6.113.58)

ततः स व्याकुलीभूतो रोगग्रस्तो महीपतिः। चमत्कारपुरं प्राप्य सर्वान्विप्रानुवाच ह

tataḥ sa vyākulībhūto rogagrasto mahīpatiḥ camatkārapuraṁ prāpya sarvānviprānuvāca ha

तब व्याकुल और रोगग्रस्त वह राजा चमत्कारपुर जाकर सभी ब्राह्मणों से बोला।

श्लोक 59 (skanda.6.113.59)

युष्माभिः स्वामिभिः संस्थैरापदोऽभिभवंति माम्। तत्किमेतन्महाभागाः क्षीयन्ते मम संपदः। रोगाश्चैव विवर्धंते शत्रुसंघैः समन्विताः

yuṣmābhiḥ svāmibhiḥ saṁsthairāpado'bhibhavaṁti mām tatkimetanmahābhāgāḥ kṣīyante mama saṁpadaḥ rogāścaiva vivardhaṁte śatrusaṁghaiḥ samanvitāḥ

"हे महाभागो! आप जैसे स्वामियों के होते हुए भी विपत्तियाँ मुझे घेर रही हैं; यह क्या है? मेरी संपत्तियाँ क्षीण हो रही हैं, रोग बढ़ रहे हैं, और शत्रुओं के समूह भी मुझ पर आ पड़े हैं।"

श्लोक 60 (skanda.6.113.60)

तस्माद्विशेषतो होमः कार्यो रोगप्रशांतये। दानानि च विशिष्टानि प्रदास्यामि द्विजन्मनाम्

tasmādviśeṣato homaḥ kāryo rogapraśāṁtaye dānāni ca viśiṣṭāni pradāsyāmi dvijanmanām

"अतः रोग-शांति के लिए विशेष रूप से होम किया जाए; मैं द्विजों को विशेष दान भी दूँगा।"

श्लोक 61 (skanda.6.113.61)

ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे प्रत्यक्षं तस्य भूपतेः। चक्रुः समाहिता भूत्वा शांतिकं तद्धिताय च

tataste brāhmaṇāḥ sarve pratyakṣaṁ tasya bhūpateḥ cakruḥ samāhitā bhūtvā śāṁtikaṁ taddhitāya ca

तब वे सब ब्राह्मण उस राजा के समक्ष ही, एकाग्रचित्त होकर उसके हित के लिए शांति-कर्म करने लगे।

श्लोक 62 (skanda.6.113.62)

यथायथा प्रयुञ्जीरन्होमांते सुसमाहिताः। तथातथास्य भूपस्य वृद्धिं रोगः प्रगच्छति

yathāyathā prayuñjīranhomāṁte susamāhitāḥ tathātathāsya bhūpasya vṛddhiṁ rogaḥ pragacchati

किंतु जैसे-जैसे वे सुसमाहित होकर अंत तक होम करते गए, वैसे-वैसे राजा का रोग और बढ़ता गया।

श्लोक 63 (skanda.6.113.63)

एतस्मिन्नंतरे क्रुद्धास्ते सर्वे द्विजसत्तमाः। ग्रहानुद्दिश्य सूर्यादीञ्छापाय कृतनिश्चयाः

etasminnaṁtare kruddhāste sarve dvijasattamāḥ grahānuddiśya sūryādīñchāpāya kṛtaniścayāḥ

इसी बीच वे सब श्रेष्ठ द्विज क्रुद्ध होकर, सूर्य आदि ग्रहों को लक्ष्य करके उन्हें शाप देने का निश्चय करने लगे।

श्लोक 64 (skanda.6.113.64)

ब्राह्मणा ऊचुः। पूजिता अपि सद्भक्त्या विधानेन तथा ग्रहाः। पीडयंति पुरं राज्ञः सपुत्रपशुबांधवम्

brāhmaṇā ūcuḥ pūjitā api sadbhaktyā vidhānena tathā grahāḥ pīḍayaṁti puraṁ rājñaḥ saputrapaśubāṁdhavam

ब्राह्मणों ने कहा — "सद्भक्तिपूर्वक और विधिपूर्वक पूजित होने पर भी ये ग्रह राजा के नगर को, पुत्र, पशु और बंधुजनों सहित पीड़ित कर रहे हैं।"

श्लोक 65 (skanda.6.113.65)

एवं ते निश्चयं कृत्वा शुचीभूय समाहिताः। यावद्यच्छंति तच्छापं ग्रहेभ्यः क्रोधमूर्छिताः

evaṁ te niścayaṁ kṛtvā śucībhūya samāhitāḥ yāvadyacchaṁti tacchāpaṁ grahebhyaḥ krodhamūrchitāḥ

इस प्रकार निश्चय करके, पवित्र और एकाग्र होकर, क्रोध से विह्वल हुए वे जैसे ही ग्रहों को वह शाप देने लगे...

श्लोक 66 (skanda.6.113.66)

तावद्वह्निरुवाचेदं मूर्तो भूत्वा द्विजोत्तमान्। मा प्रयच्छत विप्रेंद्राः शापं कोपात्कथंचन

tāvadvahniruvācedaṁ mūrto bhūtvā dvijottamān mā prayacchata vipreṁdrāḥ śāpaṁ kopātkathaṁcana

...तभी अग्निदेव साक्षात् रूप धारण करके उन श्रेष्ठ द्विजों से बोले — "हे विप्रेंद्रो! क्रोधवश किसी भी प्रकार शाप मत दीजिए।"

श्लोक 67 (skanda.6.113.67)

ग्रहेभ्यो दोषमुक्तेभ्यः श्रूयतां वचनं मम। मासिमासि प्रकुर्वंति होमं ते षोडश द्विजाः

grahebhyo doṣamuktebhyaḥ śrūyatāṁ vacanaṁ mama māsimāsi prakurvaṁti homaṁ te ṣoḍaśa dvijāḥ

"मेरा वचन सुनिए — दोष निर्दोष ग्रहों का नहीं है। वे सोलह द्विज प्रतिमास होम करते हैं।"

श्लोक 68 (skanda.6.113.68)

तेषां मध्यस्थितश्चैकस्त्रिजातो ब्राह्मणाधमः। तेन तद्दूषितं द्रव्यं समग्रं होमसंभवम्

teṣāṁ madhyasthitaścaikastrijāto brāhmaṇādhamaḥ tena taddūṣitaṁ dravyaṁ samagraṁ homasaṁbhavam

"उनमें एक निकृष्ट, त्रिजातक (मिश्रित-कुल) ब्राह्मण भी सम्मिलित है; उसी के कारण होम की समस्त सामग्री दूषित हो गई है।"

श्लोक 69 (skanda.6.113.69)

मया दत्तं न गृह्णंति ते ग्रहा भास्करादयः। तेन कुर्वंति भूपस्य पीडामप्यधिकामिमाम्

mayā dattaṁ na gṛhṇaṁti te grahā bhāskarādayaḥ tena kurvaṁti bhūpasya pīḍāmapyadhikāmimām

"मेरे द्वारा दिए जाने पर भी सूर्य आदि वे ग्रह उसे ग्रहण नहीं करते, और इसीलिए राजा को यह अधिक पीड़ा दे रहे हैं।"

श्लोक 70 (skanda.6.113.70)

तस्मादेनं परित्यज्य होमं कुरुत मा चिरम्। येन प्रीतिं परां यांति ग्रहाः सर्वेऽर्कपूर्वकाः

tasmādenaṁ parityajya homaṁ kuruta mā ciram yena prītiṁ parāṁ yāṁti grahāḥ sarve'rkapūrvakāḥ

"अतः इसे त्यागकर बिना देरी किए होम कीजिए, जिससे सूर्य आदि सभी ग्रह परम प्रसन्नता को प्राप्त हों।"

श्लोक 71 (skanda.6.113.71)

आरोग्यश्च भवेद्राजा गतशत्रुः सुतान्वितः। सततं सुखमभ्येति मच्छांतिकप्रभावतः

ārogyaśca bhavedrājā gataśatruḥ sutānvitaḥ satataṁ sukhamabhyeti macchāṁtikaprabhāvataḥ

"तब राजा आरोग्य को प्राप्त होगा, शत्रुरहित होगा, पुत्र सहित होगा, और मेरे शांति-कर्म के प्रभाव से निरंतर सुख पाएगा।"

श्लोक 72 (skanda.6.113.72)

एवमुक्त्वा स भगवान्वह्निश्चादर्शनं गतः। तेऽपि विप्रा विषण्णास्या लज्जया परया वृताः

evamuktvā sa bhagavānvahniścādarśanaṁ gataḥ te'pi viprā viṣaṇṇāsyā lajjayā parayā vṛtāḥ

ऐसा कहकर वे भगवान अग्निदेव अदृश्य हो गए; और वे ब्राह्मण भी अत्यंत लज्जा से युक्त होकर उदास हो गए।

श्लोक 73 (skanda.6.113.73)

ततस्तं पावकं भूयः स्तुवंतस्तत्र च स्थिताः। प्रोचुर्वैश्वानरं ब्रूहि त्रिजातो योऽत्र च द्विजः

tatastaṁ pāvakaṁ bhūyaḥ stuvaṁtastatra ca sthitāḥ procurvaiśvānaraṁ brūhi trijāto yo'tra ca dvijaḥ

तब वहीं खड़े होकर उन्होंने पुनः उस अग्नि की स्तुति की और वैश्वानर से कहा — "बताइए, यहाँ त्रिजातक द्विज कौन है?"

श्लोक 74 (skanda.6.113.74)

येन तं संपरित्यज्य कुर्मः कर्म प्रशांतये। निःशेषमेव दोषाणां भूपस्यास्य महात्मनः

yena taṁ saṁparityajya kurmaḥ karma praśāṁtaye niḥśeṣameva doṣāṇāṁ bhūpasyāsya mahātmanaḥ

"जिससे उसे त्यागकर हम इस महात्मा राजा के समस्त दोषों की शांति के लिए यह कर्म कर सकें।"

श्लोक 75 (skanda.6.113.75)

वह्निरुवाच। नाहं दोषं द्विजेंद्राणां जानन्नपि कथंचन। ब्रवीमि ब्राह्मणा वन्द्या मम सर्वे धरातले

vahniruvāca nāhaṁ doṣaṁ dvijeṁdrāṇāṁ jānannapi kathaṁcana bravīmi brāhmaṇā vandyā mama sarve dharātale

अग्निदेव ने कहा — मैं इन श्रेष्ठ द्विजों का दोष जानते हुए भी किसी प्रकार नहीं कहूँगा; इस पृथ्वी पर सभी ब्राह्मण मेरे लिए वंदनीय हैं।

श्लोक 76 (skanda.6.113.76)

ब्राह्मणा ऊचुः। यदि तं ब्राह्मणं वह्ने नास्माकं कीर्तयिष्यसि। तत्ते शापं प्रदास्यामस्तस्माच्छीघ्रं वदस्व नः

brāhmaṇā ūcuḥ yadi taṁ brāhmaṇaṁ vahne nāsmākaṁ kīrtayiṣyasi tatte śāpaṁ pradāsyāmastasmācchīghraṁ vadasva naḥ

ब्राह्मणों ने कहा — हे अग्ने! यदि तुम हमें उस ब्राह्मण का नाम नहीं बताओगे, तो हम तुम्हें शाप दे देंगे; अतः शीघ्र हमें बताओ।

श्लोक 77 (skanda.6.113.77)

सूत उवाच। तेषां तद्वचनं श्रुत्वा वह्निर्भयसमन्वितः। चिरं विचिंतयामास कुर्वेऽतः किं शुभावहम्

sūta uvāca teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā vahnirbhayasamanvitaḥ ciraṁ viciṁtayāmāsa kurve'taḥ kiṁ śubhāvaham

सूत जी ने कहा — उनका यह वचन सुनकर भयभीत अग्निदेव बहुत देर तक सोचते रहे कि अब क्या करना कल्याणकारी होगा।

श्लोक 78 (skanda.6.113.78)

ब्राह्मणं दूषयिष्यामि यदि तावच्च पातकम्। भविष्यति न संदेहः शापश्चापि तदुद्भवः

brāhmaṇaṁ dūṣayiṣyāmi yadi tāvacca pātakam bhaviṣyati na saṁdehaḥ śāpaścāpi tadudbhavaḥ

"यदि मैं ब्राह्मण को दूषित (निंदित) कहूँगा, तो निश्चय ही उससे पाप और शाप दोनों उत्पन्न होंगे।"

श्लोक 79 (skanda.6.113.79)

कीर्तयिष्यामि वा नैव विद्यमानं द्विजोत्तमम्। शपिष्यति न संदेहः क्रुद्धा आशीविषोपमाः

kīrtayiṣyāmi vā naiva vidyamānaṁ dvijottamam śapiṣyati na saṁdehaḥ kruddhā āśīviṣopamāḥ

"और यदि मैं विद्यमान उस द्विज का नाम न बताऊँ, तो सर्प के समान क्रुद्ध ये ब्राह्मण निःसंदेह मुझे शाप देंगे।"

श्लोक 80 (skanda.6.113.80)

एवं चिंतयतस्तस्य गात्रे स्वेदोऽभवन्महान्। येन तत्पूरितं कुण्डं होमार्थं यत्प्रकल्पितम्

evaṁ ciṁtayatastasya gātre svedo'bhavanmahān yena tatpūritaṁ kuṇḍaṁ homārthaṁ yatprakalpitam

इस प्रकार सोचते हुए उसके शरीर पर इतना अधिक पसीना आया कि उससे होम के लिए बनाया गया वह कुंड भर गया।

श्लोक 81 (skanda.6.113.81)

ततः प्रोवाच तान्विप्रान्कृतांजलिपुटः स्थितः। वेपमानो भयत्रस्तः कुण्डान्निष्क्रम्य पावकः

tataḥ provāca tānviprānkṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ vepamāno bhayatrastaḥ kuṇḍānniṣkramya pāvakaḥ

तब भयभीत और काँपता हुआ अग्निदेव उस कुंड से बाहर निकलकर, हाथ जोड़कर खड़े होकर उन ब्राह्मणों से बोले।

श्लोक 82 (skanda.6.113.82)

नाहं स्वजिह्वया दोषं ब्राह्मणस्य समुद्भवम्। कथञ्चित्कीर्तयिष्यामि तस्माच्छृण्वन्तु भो द्विजाः

nāhaṁ svajihvayā doṣaṁ brāhmaṇasya samudbhavam kathañcitkīrtayiṣyāmi tasmācchṛṇvantu bho dvijāḥ

"मैं अपनी जिह्वा से किसी भी प्रकार उस ब्राह्मण के दोष का उच्चारण नहीं करूँगा; अतः हे द्विजो! सुनिए।"

श्लोक 83 (skanda.6.113.83)

अत्र स्वेदजले विप्रा ये स्थिताः षोडश द्विजाः। ते स्नानमद्य कुर्वंतु प्रविशुद्ध्यर्थमात्मनः

atra svedajale viprā ye sthitāḥ ṣoḍaśa dvijāḥ te snānamadya kurvaṁtu praviśuddhyarthamātmanaḥ

"इस पसीने के जल में जो सोलह द्विज उपस्थित हैं, वे अपनी शुद्धि के लिए आज इसमें स्नान करें।"

श्लोक 84 (skanda.6.113.84)

एतेषां मध्यगो यश्च त्रिजातः स भविष्यति। तस्य विस्फोटकैर्युक्तं स्नातस्यांगं भविष्यति

eteṣāṁ madhyago yaśca trijātaḥ sa bhaviṣyati tasya visphoṭakairyuktaṁ snātasyāṁgaṁ bhaviṣyati

"इनमें से जो त्रिजातक होगा, उसका स्नान करने के बाद शरीर फफोलों से युक्त हो जाएगा।"

श्लोक 85 (skanda.6.113.85)

ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे क्रमात्तत्र निमज्जनम्। चक्रुः शुद्धिं गताश्चापि मुक्त्वैकं ब्राह्मणं तदा

tataste brāhmaṇāḥ sarve kramāttatra nimajjanam cakruḥ śuddhiṁ gatāścāpi muktvaikaṁ brāhmaṇaṁ tadā

तब वे सभी ब्राह्मण क्रमशः उसमें डुबकी लगाकर स्नान करने लगे, और एक ब्राह्मण को छोड़कर सभी शुद्धि को प्राप्त हुए।

श्लोक 86 (skanda.6.113.86)

हाहाकारस्ततो जज्ञे महांस्तत्र जनोद्भवः। दृष्ट्वा विस्फोटकैर्युक्तमकस्मात्तं द्विजोत्तमम्

hāhākārastato jajñe mahāṁstatra janodbhavaḥ dṛṣṭvā visphoṭakairyuktamakasmāttaṁ dvijottamam

उस द्विज को अचानक फफोलों से युक्त देखकर वहाँ उपस्थित लोगों में बड़ा हाहाकार मच गया।

श्लोक 87 (skanda.6.113.87)

सोऽपि लज्जान्वितो विप्रः कृत्वाऽधो वदनं ततः। निष्क्रांतोऽथ सभामध्यात्स्थानाद्विप्रसमुद्भवात्

so'pi lajjānvito vipraḥ kṛtvā'dho vadanaṁ tataḥ niṣkrāṁto'tha sabhāmadhyātsthānādviprasamudbhavāt

वह ब्राह्मण भी लज्जा से युक्त होकर, मुख नीचा करके, उस ब्राह्मण-सभा के स्थान से बाहर निकल गया।

श्लोक 88 (skanda.6.113.88)

वह्निरुवाच। एतद्वः साधितं कृत्यं मया पूर्वं द्विजोत्तमाः। तस्माद्यास्ये निजं स्थानं भवद्भिः पारमापितः

vahniruvāca etadvaḥ sādhitaṁ kṛtyaṁ mayā pūrvaṁ dvijottamāḥ tasmādyāsye nijaṁ sthānaṁ bhavadbhiḥ pāramāpitaḥ

अग्निदेव ने कहा — हे द्विजोत्तमो! मैंने पहले जैसा वचन दिया था, वह कार्य सिद्ध हो गया; अतः अब आप लोगों के द्वारा पूर्णता को प्राप्त कराकर मैं अपने स्थान को जाऊँगा।

श्लोक 89 (skanda.6.113.89)

न वृथा दर्शनं मे स्यादपि स्वप्रे द्विजोत्तमाः। तस्मात्सम्प्रार्थ्यतां किंचिदभीष्टं हृदि संस्थितम्

na vṛthā darśanaṁ me syādapi svapre dvijottamāḥ tasmātsamprārthyatāṁ kiṁcidabhīṣṭaṁ hṛdi saṁsthitam

"हे द्विजोत्तमो! मेरा दर्शन स्वप्न में भी व्यर्थ नहीं जाता; अतः हृदय में स्थित जो भी अभीष्ट हो, वह माँग लीजिए।"

श्लोक 90 (skanda.6.113.90)

ब्राह्मणा ऊचुः। एतत्तव जलं वह्ने स्वेदजं सर्वदैव तु। स्थिरं भवतु चात्रैव विशुद्ध्यर्थं द्विजन्मनाम्

brāhmaṇā ūcuḥ etattava jalaṁ vahne svedajaṁ sarvadaiva tu sthiraṁ bhavatu cātraiva viśuddhyarthaṁ dvijanmanām

ब्राह्मणों ने कहा — हे अग्ने! तुम्हारा यह पसीने से उत्पन्न जल सदा के लिए यहीं स्थिर हो जाए, द्विजों की शुद्धि के लिए।

श्लोक 91 (skanda.6.113.91)

अन्यजातो नरो योऽत्र प्रकरोति निमज्जनम्। तस्य चिह्नं त्वया कार्यं विस्फोटकसमुद्भवम्

anyajāto naro yo'tra prakaroti nimajjanam tasya cihnaṁ tvayā kāryaṁ visphoṭakasamudbhavam

"जो भी अन्य कुल में उत्पन्न पुरुष यहाँ स्नान करे, तुम उसके शरीर पर फफोलों के रूप में चिह्न बना देना।"

श्लोक 92 (skanda.6.113.92)

बाढमित्येव स प्रोच्य गतोऽन्तर्धानमेव हि। पावकस्ते द्विजाः सर्वे मंत्रं चक्रुः परस्परम्

bāḍhamityeva sa procya gato'ntardhānameva hi pāvakaste dvijāḥ sarve maṁtraṁ cakruḥ parasparam

"ऐसा ही होगा" — इतना कहकर अग्निदेव अंतर्धान हो गए; और वे सभी द्विज आपस में परामर्श करने लगे।

श्लोक 93 (skanda.6.113.93)

अद्यप्रभृति सर्वेषां ब्राह्मणानां समुद्भवम्। शुद्धिरत्र प्रकर्तव्या पितृमातृसमुद्भवा

adyaprabhṛti sarveṣāṁ brāhmaṇānāṁ samudbhavam śuddhiratra prakartavyā pitṛmātṛsamudbhavā

"आज से यहाँ सभी ब्राह्मणों की उत्पत्ति की, अर्थात् उनके पितृ-मातृ-कुल की, शुद्धि इसी प्रकार सिद्ध की जाए।"

श्लोक 94 (skanda.6.113.94)

चमत्कारपुरोत्थो यः कश्चिद्विप्रः प्रकीर्तितः। सोऽत्र स्नातो विशुद्धश्च विज्ञेयः कुलपुत्रकः

camatkārapurottho yaḥ kaścidvipraḥ prakīrtitaḥ so'tra snāto viśuddhaśca vijñeyaḥ kulaputrakaḥ

"चमत्कारपुर से उत्पन्न कहलाने वाला जो भी ब्राह्मण यहाँ स्नान करके शुद्ध सिद्ध हो, वह सच्चे कुल का पुत्र समझा जाए।"

श्लोक 95 (skanda.6.113.95)

तस्मै कन्या प्रदातव्या स श्राद्धार्हो भविष्यति। धर्मकृत्येषु सर्वेषु योजनीयः स एव हि

tasmai kanyā pradātavyā sa śrāddhārho bhaviṣyati dharmakṛtyeṣu sarveṣu yojanīyaḥ sa eva hi

"उसी को कन्या दी जानी चाहिए, वही श्राद्ध के योग्य होगा, और सभी धार्मिक कार्यों में वही नियुक्त किया जाना चाहिए।"

श्लोक 96 (skanda.6.113.96)

अष्टषष्टिषु गोत्रेषु मिलितेषु यथाक्रमम्। तत्प्रत्यक्षं विशुद्धो यः स शुद्धः पंक्तिपावनः

aṣṭaṣaṣṭiṣu gotreṣu militeṣu yathākramam tatpratyakṣaṁ viśuddho yaḥ sa śuddhaḥ paṁktipāvanaḥ

"अड़सठ गोत्रों के यथाक्रम एकत्र होने पर, उनके समक्ष जो शुद्ध सिद्ध हो, वही सच्चा शुद्ध और पंक्तिपावन है।"

श्लोक 97 (skanda.6.113.97)

अपवादाश्च ये केचिद्ब्रह्महत्यादिकाः स्थिताः। अन्येऽपि दुर्जनैः प्रोक्ता धर्मसन्देहकारकाः

apavādāśca ye kecidbrahmahatyādikāḥ sthitāḥ anye'pi durjanaiḥ proktā dharmasandehakārakāḥ

"ब्रह्महत्या आदि जो भी लांछन किसी पर लगे हों, और दुर्जनों द्वारा कहे गए अन्य भी जो धर्म पर संदेह उत्पन्न करने वाले हों..."

श्लोक 98 (skanda.6.113.98)

ते सर्वेऽत्र विशुद्धाः स्युर्विज्ञेयाः कुलपुत्रकाः। अपवादास्तथा चान्ये नाशं यास्यंति चाखिलाः

te sarve'tra viśuddhāḥ syurvijñeyāḥ kulaputrakāḥ apavādāstathā cānye nāśaṁ yāsyaṁti cākhilāḥ

"...वे सब यहाँ शुद्ध होकर कुल के सच्चे पुत्र समझे जाएँ, और वे सभी लांछन तथा अन्य आरोप पूर्णतः नष्ट हो जाएँ।"

श्लोक 99 (skanda.6.113.99)

यावन्नात्र कृतं स्नानं प्रत्यक्षं च द्विजन्मनाम्। सर्वेषां तावदेवाऽत्र न स विप्रो भवेत्स्फुटम्

yāvannātra kṛtaṁ snānaṁ pratyakṣaṁ ca dvijanmanām sarveṣāṁ tāvadevā'tra na sa vipro bhavetsphuṭam

"जब तक यहाँ सभी द्विजों के समक्ष प्रत्यक्ष रूप से स्नान न किया जाए, तब तक वह स्पष्ट रूप से सच्चा ब्राह्मण नहीं माना जा सकता।"

श्लोक 100 (skanda.6.113.100)

सूत उवाच। एवं ते समयं कृत्वा चमत्कारपुरोद्भवाः। ब्राह्मणाः शांतिकं चक्रुर्हितार्थं तस्य भूपतेः

sūta uvāca evaṁ te samayaṁ kṛtvā camatkārapurodbhavāḥ brāhmaṇāḥ śāṁtikaṁ cakrurhitārthaṁ tasya bhūpateḥ

सूत जी ने कहा — इस प्रकार यह प्रतिज्ञा करके चमत्कारपुर में उत्पन्न उन ब्राह्मणों ने राजा के हित के लिए शांति-कर्म किया।

श्लोक 101 (skanda.6.113.101)

तस्मिन्कुण्डे ततः स्नानं कृतं सर्वैर्महात्मभिः। भयत्रस्तैर्विशुद्ध्यर्थं शेषैरपि महात्मभिः

tasminkuṇḍe tataḥ snānaṁ kṛtaṁ sarvairmahātmabhiḥ bhayatrastairviśuddhyarthaṁ śeṣairapi mahātmabhiḥ

उस कुंड में तब सभी भयभीत महात्माओं ने, तथा शेष महात्माओं ने भी, अपनी शुद्धि के लिए स्नान किया।

श्लोक 102 (skanda.6.113.102)

ततो नीरोगतां प्राप्तः स भूपस्तत्क्षणाद्विजाः। यस्तत्र कुरुते स्नानमद्यापि द्विजसत्तमाः

tato nīrogatāṁ prāptaḥ sa bhūpastatkṣaṇādvijāḥ yastatra kurute snānamadyāpi dvijasattamāḥ

हे द्विजो! तब वह राजा उसी क्षण नीरोग हो गया। हे द्विजसत्तमो! आज भी जो वहाँ स्नान करता है...

श्लोक 103 (skanda.6.113.103)

कार्तिक्यां परदारोत्थैः स विमुच्येत पातकैः। एषां युगत्रये शुद्धिरासीत्तत्र द्विजन्मनाम्

kārtikyāṁ paradārotthaiḥ sa vimucyeta pātakaiḥ eṣāṁ yugatraye śuddhirāsīttatra dvijanmanām

...कार्तिक-पूर्णिमा पर, वह परस्त्रीगमन से उत्पन्न पापों से भी मुक्त हो जाता है। तीन युगों तक वहाँ द्विजों की यही शुद्धि-प्रक्रिया रही।

श्लोक 104 (skanda.6.113.104)

कुलशीलविहीनानामन्येषामपि पाप्मनाम्। मत्वा कलियुगं घोरं परदारसुरंजितम्। तत्र शुद्धिस्ततः सर्वैः कृता विप्रैश्च वाचिका

kulaśīlavihīnānāmanyeṣāmapi pāpmanām matvā kaliyugaṁ ghoraṁ paradārasuraṁjitam tatra śuddhistataḥ sarvaiḥ kṛtā vipraiśca vācikā

किंतु कलियुग को घोर और परस्त्रीरत जानकर, कुल-शीलहीन तथा अन्य पापियों की शुद्धि भी अब वहाँ सभी ब्राह्मणों द्वारा केवल वाचिक रूप से (मौखिक घोषणा से) की जाती है।

श्लोक 105 (skanda.6.113.105)

पुरतो देवदेवस्य ब्रह्मणो द्विजसत्तमाः। पितृमातृजवंशस्य विशुद्ध्यर्थमतंद्रितैः

purato devadevasya brahmaṇo dvijasattamāḥ pitṛmātṛjavaṁśasya viśuddhyarthamataṁdritaiḥ

हे द्विजसत्तमो! देवों के देव ब्रह्मा के समक्ष, आलस्यरहित होकर, पितृ-मातृ-कुल की शुद्धि के लिए यह किया जाता है।

श्लोक 106 (skanda.6.113.106)

अद्यापि कुरुते तत्र यः स्नानं द्विजसत्तमाः। त्रिजातो दह्यते तत्र वह्निना स न संशयः

adyāpi kurute tatra yaḥ snānaṁ dvijasattamāḥ trijāto dahyate tatra vahninā sa na saṁśayaḥ

हे द्विजसत्तमो! आज भी जो वहाँ स्नान करता है, यदि वह त्रिजातक हो, तो वह वहाँ अग्नि द्वारा निःसंदेह दग्ध हो जाता है।

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