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नागर खण्ड · अध्याय 114

नगर-संज्ञा की उत्पत्ति का वर्णन

अध्याय 113अध्याय-सूचीअध्याय 115

श्लोक 1 (skanda.6.114.1)

सूत उवाच। सोऽपि विप्रो द्विजश्रेष्ठाः विस्फोटकपरिप्लुतः। लज्जया परया युक्तो गत्वा किंचिद्वनांतरम्

sūta uvāca so'pi vipro dvijaśreṣṭhāḥ visphoṭakapariplutaḥ lajjayā parayā yukto gatvā kiṁcidvanāṁtaram

सूत जी ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठो! फफोलों से व्याप्त वह ब्राह्मण भी अत्यंत लज्जा से युक्त होकर किसी वन के भीतर चला गया।

श्लोक 2 (skanda.6.114.2)

ततो वैराग्यमापन्नो रौद्रे तपसि संस्थितः। त्यक्त्वा गृहादिकं सर्वं स्नेहं दारसुतोद्भवम्

tato vairāgyamāpanno raudre tapasi saṁsthitaḥ tyaktvā gṛhādikaṁ sarvaṁ snehaṁ dārasutodbhavam

फिर वैराग्य को प्राप्त होकर, घर आदि सब कुछ तथा पत्नी-पुत्र से उत्पन्न स्नेह को त्यागकर, वह भीषण तपस्या में लीन हो गया।

श्लोक 3 (skanda.6.114.3)

नियमैः संयमैश्चैव शोषयन्नात्मनस्तनुम्। किंचिज्जलाश्रयं गत्वा स्थापयित्वा महेश्वरम्

niyamaiḥ saṁyamaiścaiva śoṣayannātmanastanum kiṁcijjalāśrayaṁ gatvā sthāpayitvā maheśvaram

नियमों और संयमों से अपने शरीर को क्षीण करते हुए, वह किसी जलाशय के पास जाकर महेश्वर की स्थापना करने लगा।

श्लोक 4 (skanda.6.114.4)

ततः कालेन महता तुष्टस्तस्य महेश्वरः। प्रोवाच दर्शनं गत्वा प्रार्थयस्व यथेप्सितम्

tataḥ kālena mahatā tuṣṭastasya maheśvaraḥ provāca darśanaṁ gatvā prārthayasva yathepsitam

फिर बहुत काल बीतने पर उससे प्रसन्न हुए महेश्वर ने साक्षात् दर्शन देकर कहा — "जो चाहो, माँग लो।"

श्लोक 5 (skanda.6.114.5)

त्रिजात उवाच। मातृदोषादहं देव वैलक्ष्यं परमं गतः। मध्ये ब्राह्मणमुख्यानामानर्त्ताधिपतेस्तथा

trijāta uvāca mātṛdoṣādahaṁ deva vailakṣyaṁ paramaṁ gataḥ madhye brāhmaṇamukhyānāmānarttādhipatestathā

त्रिजात ने कहा — हे देव! माता के दोष के कारण मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणों के तथा अनर्ताधिपति के मध्य परम लज्जा को प्राप्त हुआ हूँ।

श्लोक 6 (skanda.6.114.6)

अहं शक्नोमि नो वक्तुं कस्यचिद्दर्शितुं विभो। त्रिजातोऽस्मीति विज्ञाय भूरिविद्यान्वितोऽपि च

ahaṁ śaknomi no vaktuṁ kasyaciddarśituṁ vibho trijāto'smīti vijñāya bhūrividyānvito'pi ca

"हे विभो! प्रचुर विद्या से युक्त होते हुए भी, मैं त्रिजातक हूँ यह जान लिए जाने पर, किसी से बोलने या अपना मुख दिखाने में समर्थ नहीं हूँ।"

श्लोक 7 (skanda.6.114.7)

तस्मात्सर्वोत्तमस्तेषामहं चैव द्विजन्मनाम्। यथा भवामि देवेश तथा नीतिर्विधीयताम्

tasmātsarvottamasteṣāmahaṁ caiva dvijanmanām yathā bhavāmi deveśa tathā nītirvidhīyatām

"अतः हे देवेश! ऐसी युक्ति कीजिए, जिससे मैं उन द्विजों में सर्वोत्तम बन सकूँ।"

श्लोक 8 (skanda.6.114.8)

श्रीभगवानुवाच। चमत्कारपुरे विप्रा ये वसंति द्विजोत्तम। तेषां सर्वोत्तमो नूनं मत्प्रसादाद्भविष्यसि

śrībhagavānuvāca camatkārapure viprā ye vasaṁti dvijottama teṣāṁ sarvottamo nūnaṁ matprasādādbhaviṣyasi

श्री भगवान ने कहा — हे द्विजोत्तम! चमत्कारपुर में जो ब्राह्मण निवास करते हैं, उनमें तुम मेरी कृपा से निश्चय ही सर्वोत्तम बनोगे।

श्लोक 9 (skanda.6.114.9)

तस्मात्कालं प्रतीक्षस्व कञ्चित्त्वं ब्राह्मणोत्तम। समये समनुप्राप्ते त्वां च नेष्यामि तत्र वै

tasmātkālaṁ pratīkṣasva kañcittvaṁ brāhmaṇottama samaye samanuprāpte tvāṁ ca neṣyāmi tatra vai

"अतः हे ब्राह्मणोत्तम! कुछ समय की प्रतीक्षा करो; उचित समय आने पर मैं स्वयं तुम्हें वहाँ ले जाऊँगा।"

श्लोक 10 (skanda.6.114.10)

एवमुक्त्वा स देवेशस्ततश्चादर्शनं गतः। ब्राह्मणोऽपि तपस्तेपे तथा संपूजयन्हरम्

evamuktvā sa deveśastataścādarśanaṁ gataḥ brāhmaṇo'pi tapastepe tathā saṁpūjayanharam

ऐसा कहकर वे देवेश अंतर्धान हो गए; और वह ब्राह्मण भी हर की पूजा करते हुए तपस्या में लीन रहा।

श्लोक 11 (skanda.6.114.11)

कस्यचित्त्वथ कालस्य चमत्कारपुरे द्विजाः। मौद्गल्यान्वयसंभूतो देवरातोऽभवद्द्विजः

kasyacittvatha kālasya camatkārapure dvijāḥ maudgalyānvayasaṁbhūto devarāto'bhavaddvijaḥ

हे द्विजो! कुछ समय पश्चात् चमत्कारपुर में मौद्गल्य वंश में उत्पन्न देवरात नामक एक ब्राह्मण रहता था।

श्लोक 12 (skanda.6.114.12)

तस्य पुत्रः क्रथोनाम यौवनोद्धतविग्रहः। सदा गर्वसमायुक्तः पौरुषे च व्यवस्थितः

tasya putraḥ krathonāma yauvanoddhatavigrahaḥ sadā garvasamāyuktaḥ pauruṣe ca vyavasthitaḥ

उसका पुत्र क्रथ नामक था, जिसका शरीर युवावस्था के उन्माद से भरा था, जो सदा गर्व से युक्त और अपने पौरुष में स्थित रहता था।

श्लोक 13 (skanda.6.114.13)

स कदाचिद्ययौ विप्रो नागतीर्थं प्रति द्विजाः। श्रावणस्यासिते पक्षे पंचम्यां पर्यटन्वने

sa kadācidyayau vipro nāgatīrthaṁ prati dvijāḥ śrāvaṇasyāsite pakṣe paṁcamyāṁ paryaṭanvane

हे द्विजो! एक बार वह ब्राह्मण-पुत्र श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी को वन में विचरण करता हुआ नागतीर्थ की ओर गया।

श्लोक 14 (skanda.6.114.14)

अथापश्यत्स नागेन्द्रतनयं भूरिवर्च्चसम्। रुद्रमालमिति ख्यातं जनन्या सह संगतम्

athāpaśyatsa nāgendratanayaṁ bhūrivarccasam rudramālamiti khyātaṁ jananyā saha saṁgatam

वहाँ उसने नागराज के अत्यंत तेजस्वी पुत्र को देखा, जो रुद्रमाल नाम से विख्यात था और अपनी माता के साथ था।

श्लोक 15 (skanda.6.114.15)

अथासौ तं समालोक्य सुलघुं सर्पपुत्रकम्। जलसर्पमिति ज्ञात्वा लगुडेन व्यपोथयत्

athāsau taṁ samālokya sulaghuṁ sarpaputrakam jalasarpamiti jñātvā laguḍena vyapothayat

फिर उस छोटे से सर्प-शिशु को देखकर, उसे साधारण जलसर्प समझकर, उसने उसे लाठी से मार डाला।

श्लोक 16 (skanda.6.114.16)

हन्यमानेन तेनाथ प्रमुक्तः सुमहान्स्वनः। हा मातस्तात तातेति विपन्नोऽस्मि निरागसः

hanyamānena tenātha pramuktaḥ sumahānsvanaḥ hā mātastāta tāteti vipanno'smi nirāgasaḥ

मारे जाते हुए उससे एक बहुत बड़ी चीत्कार निकली — "हाय माँ, हाय पिता! मैं निर्दोष होते हुए भी नष्ट हो रहा हूँ।"

श्लोक 17 (skanda.6.114.17)

सोऽपि श्रुत्वाऽथ तं शब्दं ब्राह्मणो मानुषोद्भवम्। सर्पस्य भयसंत्रस्तः सत्वरं स्वगृहं ययौ

so'pi śrutvā'tha taṁ śabdaṁ brāhmaṇo mānuṣodbhavam sarpasya bhayasaṁtrastaḥ satvaraṁ svagṛhaṁ yayau

वह ब्राह्मण-पुत्र भी सर्प के मुख से निकली मानवी वाणी सुनकर भयभीत हो गया और शीघ्रता से अपने घर चला गया।

श्लोक 18 (skanda.6.114.18)

अथ सा जननी तस्य निष्क्रांता सलिलाश्रयात्। यावत्पश्यति तीरस्थं तावत्पुत्रं निपातितम्

atha sā jananī tasya niṣkrāṁtā salilāśrayāt yāvatpaśyati tīrasthaṁ tāvatputraṁ nipātitam

इसी बीच उसकी माता जलाशय से बाहर निकली; और जैसे ही उसने तट पर देखा, वैसे ही अपने पुत्र को गिरा हुआ पाया।

श्लोक 19 (skanda.6.114.19)

ततो मूर्च्छामनुप्राप्ता दृष्ट्वा पुत्रं तथाविधम्। यष्टिप्रहारनिर्भिन्नं सर्वांगरुधिरोक्षितम्

tato mūrcchāmanuprāptā dṛṣṭvā putraṁ tathāvidham yaṣṭiprahāranirbhinnaṁ sarvāṁgarudhirokṣitam

लाठी के प्रहार से घायल और सर्वांग रक्त से लथपथ अपने पुत्र को उस अवस्था में देखकर वह मूर्च्छित हो गई।

श्लोक 20 (skanda.6.114.20)

अथ लब्ध्वा पुनः संज्ञां प्रलापानकरोद्बहून्। करुणं शोकसंतप्ता वाष्पपर्याकुलेक्षणा

atha labdhvā punaḥ saṁjñāṁ pralāpānakarodbahūn karuṇaṁ śokasaṁtaptā vāṣpaparyākulekṣaṇā

फिर चेतना पाकर, शोक से संतप्त और आँसुओं से व्याकुल नेत्रों वाली वह करुणापूर्वक बहुत विलाप करने लगी।

श्लोक 21 (skanda.6.114.21)

हाहा पुत्र परित्यक्त्वा मां च क्वासि विनिर्गतः। अनावृत्तिकरं स्थानं किं स्नेहो नास्ति ते मयि

hāhā putra parityaktvā māṁ ca kvāsi vinirgataḥ anāvṛttikaraṁ sthānaṁ kiṁ sneho nāsti te mayi

"हाय पुत्र! मुझे छोड़कर तू किस अनावृत्ति के स्थान को चला गया? क्या मुझमें तेरा स्नेह नहीं था?"

श्लोक 22 (skanda.6.114.22)

केन त्वं निहतः पुत्र पापेन च दुरात्मना। निष्पापोऽपि च पुत्र त्वं कस्य क्रुद्धोऽद्यवै यमः

kena tvaṁ nihataḥ putra pāpena ca durātmanā niṣpāpo'pi ca putra tvaṁ kasya kruddho'dyavai yamaḥ

"हे पुत्र! किस पापी दुरात्मा ने तुझे मार डाला? हे निष्पाप पुत्र! आज किस पर यम क्रुद्ध हुआ है?"

श्लोक 23 (skanda.6.114.23)

सपुरस्य सराष्ट्रस्य सकुटुंबस्य दुर्मतेः। येन त्वं निहतोऽद्यापि पंचम्यां पूजितो न च

sapurasya sarāṣṭrasya sakuṭuṁbasya durmateḥ yena tvaṁ nihato'dyāpi paṁcamyāṁ pūjito na ca

"जिस दुर्बुद्धि ने तुझे मार डाला, वह अपने नगर, राष्ट्र और कुटुंब सहित नष्ट हो — उसने आज पंचमी की पूजा भी नहीं की।"

श्लोक 24 (skanda.6.114.24)

रजसा क्रीडयित्वाऽद्य समागत्य चिरादथ। कामेनोत्संगमागत्य ग्लानिं नैष्यति चांबरम्

rajasā krīḍayitvā'dya samāgatya cirādatha kāmenotsaṁgamāgatya glāniṁ naiṣyati cāṁbaram

"धूल में खेलकर, बहुत समय बाद लौटकर, प्रेमवश मेरी गोद में चढ़कर, अब तू फिर कभी मेरे वस्त्र पर धूल का दाग नहीं लगाएगा।"

श्लोक 25 (skanda.6.114.25)

गद्गदानि मनोज्ञानि जनहास्यकराणि च। त्वया विनाऽद्य वाक्यानि को वदिष्यति मे पुरः

gadgadāni manojñāni janahāsyakarāṇi ca tvayā vinā'dya vākyāni ko vadiṣyati me puraḥ

"तेरे बिना अब वे तोतले, मनोहर, सबको हँसाने वाले शब्द मेरे सामने कौन बोलेगा?"

श्लोक 26 (skanda.6.114.26)

पितुरुत्संगमाश्रित्य कूर्चाकर्षणपूर्वकम्। कः करिष्यति पुत्राऽद्य सतोषं भवता विना

piturutsaṁgamāśritya kūrcākarṣaṇapūrvakam kaḥ kariṣyati putrā'dya satoṣaṁ bhavatā vinā

"हे पुत्र! तेरे बिना अब पिता की गोद में बैठकर उनकी दाढ़ी खींचकर कौन उन्हें संतोष देगा?"

श्लोक 27 (skanda.6.114.27)

निषिद्धोऽसि मया वत्स त्वमायातोऽनुपृष्ठतः। मर्त्यलोकमिमं तात बहुदोषसमाकुलम्

niṣiddho'si mayā vatsa tvamāyāto'nupṛṣṭhataḥ martyalokamimaṁ tāta bahudoṣasamākulam

"हे वत्स! मैंने तुझे मना किया था, फिर भी तू मेरे पीछे-पीछे इस अनेक दोषों से भरे मर्त्यलोक में आ गया।"

श्लोक 28 (skanda.6.114.28)

एवं विलप्य नागी सा संक्रुद्धा शोककर्षिता। तं मृतं सुतमादाय जगामानंतसंनिधौ

evaṁ vilapya nāgī sā saṁkruddhā śokakarṣitā taṁ mṛtaṁ sutamādāya jagāmānaṁtasaṁnidhau

इस प्रकार विलाप करके, क्रोध और शोक से व्याकुल वह नागिन अपने मृत पुत्र को लेकर अनंत (शेष) के समीप गई।

श्लोक 29 (skanda.6.114.29)

ततस्तदग्रतः क्षिप्त्वा तं मृतं निजबालकम्। प्रलापानकरोद्दीना वियुक्ता कुररी यथा

tatastadagrataḥ kṣiptvā taṁ mṛtaṁ nijabālakam pralāpānakaroddīnā viyuktā kurarī yathā

फिर अपने मृत शिशु को उसके सामने रखकर, वह दीन नागिन विरही कुररी पक्षिणी की भाँति विलाप करने लगी।

श्लोक 30 (skanda.6.114.30)

नागराजोऽपि तं दृष्ट्वा स्वपुत्रं विनिपातितम्। जगाम सोऽपि मूर्च्छां च पुत्रशोकेन पीडितः

nāgarājo'pi taṁ dṛṣṭvā svaputraṁ vinipātitam jagāma so'pi mūrcchāṁ ca putraśokena pīḍitaḥ

अपने गिरे हुए पुत्र को देखकर नागराज भी पुत्रशोक से पीड़ित होकर मूर्च्छित हो गए।

श्लोक 31 (skanda.6.114.31)

ततः सिक्तो जलैः शीतैः संज्ञां लब्ध्वा स कृच्छ्रतः। प्रलापान्कृपणांश्चक्रे प्राकृतः पुरुषो यथा

tataḥ sikto jalaiḥ śītaiḥ saṁjñāṁ labdhvā sa kṛcchrataḥ pralāpānkṛpaṇāṁścakre prākṛtaḥ puruṣo yathā

फिर शीतल जल से सींचे जाने पर, बड़ी कठिनाई से चेतना पाकर, वे साधारण मनुष्य की भाँति करुण विलाप करने लगे।

श्लोक 32 (skanda.6.114.32)

एतस्मिन्नंतरे नागाः सर्वे तत्र समागताः। रुरुदुर्दुःखिताः संतो बाष्पपर्याकुलेक्षणाः

etasminnaṁtare nāgāḥ sarve tatra samāgatāḥ rurudurduḥkhitāḥ saṁto bāṣpaparyākulekṣaṇāḥ

इसी बीच सभी नाग वहाँ एकत्र हुए, और दुःखी होकर आँसुओं से व्याकुल नेत्रों के साथ रोने लगे।

श्लोक 33 (skanda.6.114.33)

वासुकिः पद्मजः शंखस्तक्षकश्च महाविषः। शंखचूडः सचूडश्च पुंडरीकश्च दारुणः

vāsukiḥ padmajaḥ śaṁkhastakṣakaśca mahāviṣaḥ śaṁkhacūḍaḥ sacūḍaśca puṁḍarīkaśca dāruṇaḥ

वासुकि, पद्मज, शंख, महाविषधारी तक्षक; शंखचूड, सचूड और भयंकर पुंडरीक भी वहाँ आए।

श्लोक 34 (skanda.6.114.34)

अञ्जनो वामनश्चैव कुमुदश्च तथा परः। कम्बलाश्वतरौ नागौ नागः कर्कोटकस्तथा

añjano vāmanaścaiva kumudaśca tathā paraḥ kambalāśvatarau nāgau nāgaḥ karkoṭakastathā

अंजन, वामन, कुमुद तथा दूसरा नाग भी; कम्बल और अश्वतर नाग, तथा कर्कोटक नाग भी।

श्लोक 35 (skanda.6.114.35)

पुष्पदंतः सुदंतश्च मूषको मूषकादनः। एलापत्रः सुपत्रश्च दीर्घास्यः पुष्पवाहनः

puṣpadaṁtaḥ sudaṁtaśca mūṣako mūṣakādanaḥ elāpatraḥ supatraśca dīrghāsyaḥ puṣpavāhanaḥ

पुष्पदंत और सुदंत, मूषक और मूषकादन, एलापत्र और सुपत्र, दीर्घास्य और पुष्पवाहन।

श्लोक 36 (skanda.6.114.36)

एते चान्ये तथा नागास्तत्राऽऽयाताः सहस्रशः। पुत्रशोकाभिसतप्तं ज्ञात्वा तं पन्नगाधिपम्

ete cānye tathā nāgāstatrā''yātāḥ sahasraśaḥ putraśokābhisataptaṁ jñātvā taṁ pannagādhipam

ये तथा अन्य हजारों नाग भी, नागराज को पुत्रशोक से संतप्त जानकर वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 37 (skanda.6.114.37)

ततः संबोध्य ते सर्वे तमीशं पवनाशनम्। पूर्ववृत्तैः कथोद्भेदैर्दृष्टांतैर्विविधैरपि

tataḥ saṁbodhya te sarve tamīśaṁ pavanāśanam pūrvavṛttaiḥ kathodbhedairdṛṣṭāṁtairvividhairapi

तब उन सबने उस वायुभक्षी नागेश्वर को पूर्वकालिक कथाओं और नाना दृष्टांतों से समझाने का प्रयास किया।

श्लोक 38 (skanda.6.114.38)

एवं संबोधितस्तैस्तु चिरात्पन्नगसत्तमः। अग्निदाह्यं ततश्चक्रे तस्य पुत्रस्य दुःखितः

evaṁ saṁbodhitastaistu cirātpannagasattamaḥ agnidāhyaṁ tataścakre tasya putrasya duḥkhitaḥ

इस प्रकार उनके द्वारा समझाए जाने पर, बहुत देर बाद उस श्रेष्ठ नाग ने दुःखी होकर अपने पुत्र का अग्निदाह-संस्कार किया।

श्लोक 39 (skanda.6.114.39)

जलदानस्य काले च सर्पान्सर्वानुवाच सः। सर्वान्नागान्प्रदानार्थं तोयस्य समुपस्थितान्

jaladānasya kāle ca sarpānsarvānuvāca saḥ sarvānnāgānpradānārthaṁ toyasya samupasthitān

फिर जलांजलि के समय, जल देने के लिए उपस्थित हुए उन सभी नागों से उसने कहा।

श्लोक 40 (skanda.6.114.40)

नाहं तोयं प्रदास्यामि स्वपुत्रस्य कथंचन। भवद्भिः प्रेरितोऽप्येवं तथान्यैरपि बांधवैः

nāhaṁ toyaṁ pradāsyāmi svaputrasya kathaṁcana bhavadbhiḥ prerito'pyevaṁ tathānyairapi bāṁdhavaiḥ

"आप लोगों के तथा अन्य बंधुओं के आग्रह करने पर भी, मैं अपने पुत्र के लिए किसी भी प्रकार जलांजलि नहीं दूँगा।"

श्लोक 41 (skanda.6.114.41)

यावत्तस्य न दुष्टस्य मम पुत्रांतकारिणः। सदारपुत्रभृत्यस्य विहितो न परिक्षयः

yāvattasya na duṣṭasya mama putrāṁtakāriṇaḥ sadāraputrabhṛtyasya vihito na parikṣayaḥ

"...जब तक मेरे पुत्र का अंत करने वाले उस दुष्ट का, उसकी पत्नी, पुत्रों और सेवकों सहित, पूर्ण विनाश नहीं कर दिया जाता।"

श्लोक 42 (skanda.6.114.42)

एवमुक्त्वा ततः शेषः शोधयामास तं द्विजम्। येन संसूदितः पुत्रो दंडकाष्ठेन पाप्मना

evamuktvā tataḥ śeṣaḥ śodhayāmāsa taṁ dvijam yena saṁsūditaḥ putro daṁḍakāṣṭhena pāpmanā

ऐसा कहकर शेषनाग ने उस ब्राह्मण का पता लगवाया, जिस पापी ने लाठी के प्रहार से उनके पुत्र को मार डाला था।

श्लोक 43 (skanda.6.114.43)

ततः प्रोवाच तान्नागान्पार्श्वस्थान्पन्नगाधिपः। हाटकेश्वरजे क्षेत्रे यांतु मे सुहृदुत्तमाः

tataḥ provāca tānnāgānpārśvasthānpannagādhipaḥ hāṭakeśvaraje kṣetre yāṁtu me suhṛduttamāḥ

तब नागराज ने अपने पास खड़े उन नागों से कहा — "मेरे श्रेष्ठ मित्रो! हाटकेश्वर-क्षेत्र में जाओ।"

श्लोक 44 (skanda.6.114.44)

पुत्रघ्नं तं निहत्याऽऽशु सकुटुम्बपरिग्रहम्। चमत्कारपुरं सर्वं भक्षणीयं ततः परम्

putraghnaṁ taṁ nihatyā''śu sakuṭumbaparigraham camatkārapuraṁ sarvaṁ bhakṣaṇīyaṁ tataḥ param

"मेरे पुत्र के हत्यारे को उसके परिवार सहित शीघ्र मारकर, उसके बाद संपूर्ण चमत्कारपुर को भक्षण कर लो।"

श्लोक 45 (skanda.6.114.45)

तत्रैव वसतिः कार्या समस्तैः पन्नगोत्तमैः। यथा भूयो वसेन्नैव तथा कार्यं च तत्पुरम्

tatraiva vasatiḥ kāryā samastaiḥ pannagottamaiḥ yathā bhūyo vasennaiva tathā kāryaṁ ca tatpuram

"वहीं समस्त श्रेष्ठ नागों को निवास बनाना चाहिए, और उस नगर को ऐसा कर देना चाहिए कि वहाँ फिर कोई न बस सके।"

श्लोक 46 (skanda.6.114.46)

एवमुक्तास्ततस्तेन नागाः प्राधान्यतः श्रुताः। गत्वाथ सत्वरं तत्र प्रथमं तं द्विजोत्तमम्

evamuktāstatastena nāgāḥ prādhānyataḥ śrutāḥ gatvātha satvaraṁ tatra prathamaṁ taṁ dvijottamam

इस प्रकार आदेश पाकर, प्रधानतापूर्वक आज्ञा मानने वाले वे नाग वहाँ शीघ्रतापूर्वक गए और पहले उस ब्राह्मण-पुत्र को...

श्लोक 47 (skanda.6.114.47)

देवरातसुतं सुप्तं भक्षयित्वा ततः परम्। तत्कुटुंबं समग्रं च क्रोधेन महतान्विताः

devarātasutaṁ suptaṁ bhakṣayitvā tataḥ param tatkuṭuṁbaṁ samagraṁ ca krodhena mahatānvitāḥ

...सोए हुए देवरात-पुत्र को खा जाने के बाद, महाक्रोध से युक्त होकर उन्होंने उसका संपूर्ण कुटुंब भी खा लिया।

श्लोक 48 (skanda.6.114.48)

ततोऽन्यानपि संक्रुद्धा बालान्वृद्धान्कुमारकान्। भक्षयामासुः सर्वे ते तिर्यग्योनिगता अपि

tato'nyānapi saṁkruddhā bālānvṛddhānkumārakān bhakṣayāmāsuḥ sarve te tiryagyonigatā api

फिर वे अत्यंत क्रुद्ध होकर बालकों, वृद्धों और कुमारों को भी खा गए, तथा तिर्यक्-योनि में उत्पन्न प्राणियों को भी।

श्लोक 49 (skanda.6.114.49)

एतस्मिन्नंतरे जातः पुरे तत्र सुदारुणः। आक्रंदो ब्राह्मणेंद्राणां सर्पभक्षणसंभवः

etasminnaṁtare jātaḥ pure tatra sudāruṇaḥ ākraṁdo brāhmaṇeṁdrāṇāṁ sarpabhakṣaṇasaṁbhavaḥ

इसी बीच उस नगर में सर्पों के भक्षण से उत्पन्न, श्रेष्ठ ब्राह्मणों का अत्यंत भयंकर हाहाकार मच गया।

श्लोक 50 (skanda.6.114.50)

तत्र भूमौ तथाऽन्यच्च यत्किंचिदपि दृश्यते। तत्सर्वं पन्नगैर्व्याप्तं रौद्रैः कृष्णवपुर्धरैः

tatra bhūmau tathā'nyacca yatkiṁcidapi dṛśyate tatsarvaṁ pannagairvyāptaṁ raudraiḥ kṛṣṇavapurdharaiḥ

वहाँ भूमि पर और अन्यत्र जो कुछ भी दिखाई देता था, वह सब भयंकर, काले शरीर वाले सर्पों से व्याप्त हो गया।

श्लोक 51 (skanda.6.114.51)

एतस्मिन्नंतरे प्राप्ताः केचिन्मृत्युवशं गताः। विषसंघूर्णिताः केचित्पतिता धरणीतले

etasminnaṁtare prāptāḥ kecinmṛtyuvaśaṁ gatāḥ viṣasaṁghūrṇitāḥ kecitpatitā dharaṇītale

इसी बीच वहाँ आए हुए कुछ लोग मृत्यु के वशीभूत हो गए, कुछ विष से घूर्णित होकर धरती पर गिर पड़े।

श्लोक 52 (skanda.6.114.52)

अन्ये गृहादिकं सर्वं परित्यज्य सुतादि च। वित्रस्ताः परिधावंति वनमुद्दिश्य दूरतः

anye gṛhādikaṁ sarvaṁ parityajya sutādi ca vitrastāḥ paridhāvaṁti vanamuddiśya dūrataḥ

अन्य लोग घर-बार और पुत्रादि सब कुछ त्यागकर, भयभीत होकर दूर वन की ओर भागने लगे।

श्लोक 53 (skanda.6.114.53)

अन्ये मंत्रविदो विप्राः प्रयतंते समंततः। मंदं धावंति संत्रस्ता गृहीत्वौषधयः परे

anye maṁtravido viprāḥ prayataṁte samaṁtataḥ maṁdaṁ dhāvaṁti saṁtrastā gṛhītvauṣadhayaḥ pare

मंत्र जानने वाले कुछ ब्राह्मण चारों ओर उपाय करने लगे; अन्य भयभीत लोग औषधियाँ लेकर धीरे-धीरे भागने लगे।

श्लोक 54 (skanda.6.114.54)

एवं तत्पुरमुद्दिश्य सर्वे ते पन्नगोत्तमाः। प्रचरंति यथा कश्चिन्न तत्र ब्राह्मणो वसेत्

evaṁ tatpuramuddiśya sarve te pannagottamāḥ pracaraṁti yathā kaścinna tatra brāhmaṇo vaset

इस प्रकार वे श्रेष्ठ नाग उस नगर में इस प्रकार फैल गए कि वहाँ कोई भी ब्राह्मण न रह सके।

श्लोक 55 (skanda.6.114.55)

अथ शून्यं पुरं कृत्वा सर्वे ते पन्नगोत्तमाः। व्यचरन्स्वेच्छया तत्र तीर्थेष्वायतनेषु च

atha śūnyaṁ puraṁ kṛtvā sarve te pannagottamāḥ vyacaransvecchayā tatra tīrtheṣvāyataneṣu ca

फिर उस नगर को शून्य बनाकर वे सभी श्रेष्ठ नाग वहाँ तीर्थों और मंदिरों में स्वेच्छापूर्वक विचरण करने लगे।

श्लोक 56 (skanda.6.114.56)

न कश्चित्पन्नगः क्षेत्रात्त्यक्त्वा निर्याति बाह्यतः। प्रविशेन्न परः कश्चित्तत्र क्षेत्रे च मानवः

na kaścitpannagaḥ kṣetrāttyaktvā niryāti bāhyataḥ praviśenna paraḥ kaścittatra kṣetre ca mānavaḥ

अब कोई भी नाग उस क्षेत्र को छोड़कर बाहर नहीं निकलता था, और न ही कोई दूसरा मनुष्य उस क्षेत्र में प्रवेश करता था।

श्लोक 57 (skanda.6.114.57)

व्यवस्थैवं समुद्भूता सर्पाणां मानुषैः सह। वधभक्षणजान्योन्यं बाह्याभ्यंतरसंभवा

vyavasthaivaṁ samudbhūtā sarpāṇāṁ mānuṣaiḥ saha vadhabhakṣaṇajānyonyaṁ bāhyābhyaṁtarasaṁbhavā

इस प्रकार सर्पों और मनुष्यों के बीच परस्पर वध और भक्षण से उत्पन्न, बाह्य और आभ्यंतर क्षेत्रों को विभाजित करने वाली यह व्यवस्था बन गई।

श्लोक 58 (skanda.6.114.58)

एतस्मिन्नंतरे शेषो मुक्त्वा दुःखं सुतोद्भवम्। प्रहृष्टः प्रददौ तोयं तस्य जातिभिरन्वितः

etasminnaṁtare śeṣo muktvā duḥkhaṁ sutodbhavam prahṛṣṭaḥ pradadau toyaṁ tasya jātibhiranvitaḥ

इसी बीच शेषनाग ने पुत्र-जनित दुःख को त्यागकर, प्रसन्न होकर अपने बांधवों सहित उसके लिए जलांजलि दी।

श्लोक 59 (skanda.6.114.59)

अथ ते ब्राह्मणाः केचित्सर्पेभ्यो भयविह्वलाः। सशोका दिङ्मुखान्याशु ते सर्वे संगता मिथः

atha te brāhmaṇāḥ kecitsarpebhyo bhayavihvalāḥ saśokā diṅmukhānyāśu te sarve saṁgatā mithaḥ

फिर सर्पों से भयभीत हुए वे ब्राह्मण, शोक से युक्त होकर, चारों दिशाओं से शीघ्र आकर परस्पर एकत्र हो गए।

श्लोक 60 (skanda.6.114.60)

ततो वनं समाजग्मुस्त्रिजातो यत्र संस्थितः। हरलब्धवरो हृष्टः सुमहत्तपसि स्थितः

tato vanaṁ samājagmustrijāto yatra saṁsthitaḥ haralabdhavaro hṛṣṭaḥ sumahattapasi sthitaḥ

फिर वे उस वन में गए, जहाँ हर से वर पाकर प्रसन्न त्रिजात महान तपस्या में स्थित था।

श्लोक 61 (skanda.6.114.61)

स दृष्ट्वा ताञ्जनान्सर्वांस्तथा दुःखपरिप्लुतान्। पुत्रदारादिकं स्मृत्वा रुदतः करुणं बहु

sa dṛṣṭvā tāñjanānsarvāṁstathā duḥkhapariplutān putradārādikaṁ smṛtvā rudataḥ karuṇaṁ bahu

अपने पुत्र-पत्नी आदि को स्मरण करते हुए अत्यंत करुणापूर्वक रोते हुए, दुःख में डूबे उन सब लोगों को देखकर...

श्लोक 62 (skanda.6.114.62)

सोऽपि दुःखसमायुक्तो दृष्ट्वा तान्स्वपुरोद्भवान्। ब्राह्मणेंद्रांस्ततः प्राह बाष्पव्याकुललोचनः

so'pi duḥkhasamāyukto dṛṣṭvā tānsvapurodbhavān brāhmaṇeṁdrāṁstataḥ prāha bāṣpavyākulalocanaḥ

...वह त्रिजात भी अपने ही नगर से आए उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को देखकर दुःखी हो गया, और आँसुओं से व्याकुल नेत्रों के साथ उनसे बोला।

श्लोक 63 (skanda.6.114.63)

शृण्वंतु ब्राह्मणाः सर्वे वचनं मम सांप्रतम्। मया विनिर्गतेनैव तत्पुरात्तोषितो हरः

śṛṇvaṁtu brāhmaṇāḥ sarve vacanaṁ mama sāṁpratam mayā vinirgatenaiva tatpurāttoṣito haraḥ

"सभी ब्राह्मण अब मेरा वचन सुनें — उस नगर से निकाले गए मुझ अकेले के द्वारा ही हर को प्रसन्न किया गया है।"

श्लोक 64 (skanda.6.114.64)

तेन मह्यं वरो दत्तो वांछितो द्विजसत्तमाः। गृहीतो न मयाद्यापि प्रार्थयिष्यामि सांप्रतम्

tena mahyaṁ varo datto vāṁchito dvijasattamāḥ gṛhīto na mayādyāpi prārthayiṣyāmi sāṁpratam

"हे द्विजसत्तमो! उन्होंने मुझे इच्छित वर दिया, जिसे मैंने अब तक ग्रहण नहीं किया; अब मैं उसकी याचना करूँगा।"

श्लोक 65 (skanda.6.114.65)

यथा स्यात्संक्षयस्तेषां नागानां सुदुरात्मनाम्। यैः कृतं नः पुरं कृत्स्नमुद्रसं पापकर्मभिः

yathā syātsaṁkṣayasteṣāṁ nāgānāṁ sudurātmanām yaiḥ kṛtaṁ naḥ puraṁ kṛtsnamudrasaṁ pāpakarmabhiḥ

"...जिससे उन अत्यंत दुरात्मा नागों का पूर्ण नाश हो जाए, जिन्होंने पाप-कर्म करके हमारे संपूर्ण नगर को उजाड़ दिया है।"

श्लोक 66 (skanda.6.114.66)

एवमुक्त्वाऽथ विप्रः स त्रिजातः परमेश्वरम्। प्रार्थयामास मे देव तं वरं यच्छ सांप्रतम्

evamuktvā'tha vipraḥ sa trijātaḥ parameśvaram prārthayāmāsa me deva taṁ varaṁ yaccha sāṁpratam

ऐसा कहकर उस ब्राह्मण त्रिजात ने परमेश्वर से प्रार्थना की — "हे देव! अब मुझे वह वर दीजिए।"

श्लोक 67 (skanda.6.114.67)

ततः प्रोवाच देवेशः प्रार्थयस्व द्रुतं द्विज। येनाभीष्टं प्रयच्छामि यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्

tataḥ provāca deveśaḥ prārthayasva drutaṁ dvija yenābhīṣṭaṁ prayacchāmi yadyapi syātsudurlabham

तब देवेश ने कहा — "हे द्विज! शीघ्र माँगो, चाहे वह कितना भी दुर्लभ क्यों न हो, मैं तुम्हें अभीष्ट दूँगा।"

श्लोक 68 (skanda.6.114.68)

त्रिजात उवाच। नागैरस्मत्पुरं कृत्स्नं कृतं जनविवर्जितम्। तत्तस्मात्ते क्षयं यांतु सर्वे वृषभवाहन

trijāta uvāca nāgairasmatpuraṁ kṛtsnaṁ kṛtaṁ janavivarjitam tattasmātte kṣayaṁ yāṁtu sarve vṛṣabhavāhana

त्रिजात ने कहा — नागों ने हमारे संपूर्ण नगर को जनरहित कर दिया है; अतः हे वृषभवाहन! वे सब नष्ट हो जाएँ।

श्लोक 69 (skanda.6.114.69)

येन तत्पूर्यते विप्रैर्भूयोऽपि सुरसत्तम। ममापि जायते कीर्तिः स्वस्थानोद्धरणोद्भवा

yena tatpūryate viprairbhūyo'pi surasattama mamāpi jāyate kīrtiḥ svasthānoddharaṇodbhavā

"हे सुरसत्तम! जिससे वह पुनः ब्राह्मणों से भर जाए, और अपने स्वस्थान के उद्धार से मुझे भी कीर्ति प्राप्त हो।"

श्लोक 70 (skanda.6.114.70)

श्रीभगवानुवाच। नायुक्तं विहितं विप्र पन्नगैस्तैर्महात्मभिः। निर्दोषश्चापि पुत्रोऽत्र येषां विप्रेण सूदितः

śrībhagavānuvāca nāyuktaṁ vihitaṁ vipra pannagaistairmahātmabhiḥ nirdoṣaścāpi putro'tra yeṣāṁ vipreṇa sūditaḥ

श्री भगवान ने कहा — हे विप्र! उन महात्मा नागों ने जो किया, वह अनुचित नहीं था, क्योंकि उनका निर्दोष पुत्र भी एक ब्राह्मण के द्वारा मार डाला गया था।

श्लोक 71 (skanda.6.114.71)

विशेषेण द्विजश्रेष्ठ संप्राप्ते पंचमीदिने। तत्राऽपि श्रावणे मासि पूज्यंते यत्र पन्नगाः

viśeṣeṇa dvijaśreṣṭha saṁprāpte paṁcamīdine tatrā'pi śrāvaṇe māsi pūjyaṁte yatra pannagāḥ

"हे द्विजश्रेष्ठ! विशेष रूप से यह पंचमी के दिन हुआ, वह भी श्रावण मास में, जिसमें सर्पों की पूजा की जाती है।"

श्लोक 72 (skanda.6.114.72)

तस्मात्तेऽहं प्रवक्ष्यामि सिद्धमंत्रमनुत्तमम्। यस्योच्चारणमात्रेण सर्प्पाणां नश्यते विषम्

tasmātte'haṁ pravakṣyāmi siddhamaṁtramanuttamam yasyoccāraṇamātreṇa sarppāṇāṁ naśyate viṣam

"फिर भी मैं तुम्हें एक अनुपम सिद्ध मंत्र बताऊँगा, जिसके उच्चारण मात्र से सर्पों का विष नष्ट हो जाता है।"

श्लोक 73 (skanda.6.114.73)

तं मंत्रं तत्र गत्वा त्वं तद्विप्रैरखिलैर्वृतः। श्रावयस्व महाभाग तारशब्देन सर्वशः

taṁ maṁtraṁ tatra gatvā tvaṁ tadviprairakhilairvṛtaḥ śrāvayasva mahābhāga tāraśabdena sarvaśaḥ

"हे महाभाग! वहाँ जाकर, समस्त उन ब्राह्मणों से घिरे हुए, तुम उस मंत्र को ऊँचे स्वर से सर्वत्र सुनाओ।"

श्लोक 74 (skanda.6.114.74)

तं श्रुत्वा ये न यास्यंति पातालं पन्नगाधमाः। युष्मद्वाक्याद्भविष्यंति निर्विषास्ते न संशयः

taṁ śrutvā ye na yāsyaṁti pātālaṁ pannagādhamāḥ yuṣmadvākyādbhaviṣyaṁti nirviṣāste na saṁśayaḥ

"उसे सुनकर जो निकृष्ट नाग पाताल को नहीं जाएँगे, वे तुम्हारे वचन से निःसंदेह निर्विष हो जाएँगे।"

श्लोक 75 (skanda.6.114.75)

त्रिजात उवाच। ब्रूहि तं मे महामंत्रं सर्वतीक्ष्णविनाशनम्। येन गत्वा निजं स्थानं सर्पानुत्सादयाम्यहम्

trijāta uvāca brūhi taṁ me mahāmaṁtraṁ sarvatīkṣṇavināśanam yena gatvā nijaṁ sthānaṁ sarpānutsādayāmyaham

त्रिजात ने कहा — मुझे वह महामंत्र बताइए, जो हर प्रकार के तीक्ष्ण विष का विनाश करने वाला हो, जिससे अपने स्थान को जाकर मैं सर्पों को भगा सकूँ।

श्लोक 76 (skanda.6.114.76)

श्रीभगवानुवाच। गरं विषमिति प्रोक्तं न तत्रास्ति च सांप्रतम्। मत्प्रसादात्त्वया ह्येतदुच्चार्यं ब्राह्मणोत्तम

śrībhagavānuvāca garaṁ viṣamiti proktaṁ na tatrāsti ca sāṁpratam matprasādāttvayā hyetaduccāryaṁ brāhmaṇottama

श्री भगवान ने कहा — 'गर' विष को कहा जाता है; अब मेरी कृपा से वहाँ वह नहीं रहेगा। हे ब्राह्मणोत्तम! तुम्हें बस यही उच्चारण करना है।

श्लोक 77 (skanda.6.114.77)

न गरं न गरं चैतच्छ्रुत्वा ये पन्नगाधमाः। तत्र स्थास्यंति ते वध्या भविष्यंति यथासुखम्

na garaṁ na garaṁ caitacchrutvā ye pannagādhamāḥ tatra sthāsyaṁti te vadhyā bhaviṣyaṁti yathāsukham

"'न गरं न गरं' (अब विष नहीं है) — यह सुनकर भी जो निकृष्ट नाग वहीं रह जाएँगे, वे इच्छानुसार वध्य हो जाएँगे।"

श्लोक 78 (skanda.6.114.78)

अद्यप्रभृति तत्स्थानं नगराख्यं धरातले। भविष्यति सुविख्यातं तव कीर्तिविवर्धनम्

adyaprabhṛti tatsthānaṁ nagarākhyaṁ dharātale bhaviṣyati suvikhyātaṁ tava kīrtivivardhanam

"आज से वह स्थान इस पृथ्वी पर 'नगर' नाम से सुविख्यात होगा, जो तुम्हारी कीर्ति को बढ़ाने वाला होगा।"

श्लोक 79 (skanda.6.114.79)

तथान्योऽपि च यो विप्रो नागरः शुद्धवंशजः। नगराख्येन मंत्रेण अभिमंत्र्य त्रिधा जलम्

tathānyo'pi ca yo vipro nāgaraḥ śuddhavaṁśajaḥ nagarākhyena maṁtreṇa abhimaṁtrya tridhā jalam

"और वैसे ही, शुद्ध वंश में उत्पन्न कोई भी अन्य नागर ब्राह्मण, नगर नामक इस मंत्र से जल को तीन बार अभिमंत्रित करके..."

श्लोक 80 (skanda.6.114.80)

प्राणिनं कालसंदष्टमपि मृत्युवशंगतम्। प्रकरिष्यति जीवाढ्यं प्रक्षिप्य वदने स्वयम्

prāṇinaṁ kālasaṁdaṣṭamapi mṛtyuvaśaṁgatam prakariṣyati jīvāḍhyaṁ prakṣipya vadane svayam

"...उस जल को स्वयं मुख में डालकर, काल-दंश से मृत्यु के वशीभूत हुए प्राणी को भी पुनः जीवित कर देगा।"

श्लोक 81 (skanda.6.114.81)

अन्यत्रापि स्थितो मर्त्यो मंत्रमेतं त्रिरक्षरम्। यः स्मरिष्यति संसुप्तो न हिंस्यः स्यादहेर्हि सः

anyatrāpi sthito martyo maṁtrametaṁ trirakṣaram yaḥ smariṣyati saṁsupto na hiṁsyaḥ syādaherhi saḥ

"अन्यत्र स्थित मनुष्य भी, सोया हुआ रहते हुए भी, यदि इस त्रि-अक्षर मंत्र का स्मरण करे, तो वह सर्प से हिंसित नहीं होगा।"

श्लोक 82 (skanda.6.114.82)

स्थावरं जंगमं वापि कृत्रिमं वा गरं हि तत्। तदनेन च मंत्रेण संस्पृष्टं त्वमृतायितम्

sthāvaraṁ jaṁgamaṁ vāpi kṛtrimaṁ vā garaṁ hi tat tadanena ca maṁtreṇa saṁspṛṣṭaṁ tvamṛtāyitam

"स्थावर, जंगम अथवा कृत्रिम — जो भी विष हो, इस मंत्र से स्पर्श किए जाने पर वह अमृत के समान हो जाता है।"

श्लोक 83 (skanda.6.114.83)

अजीर्णप्रभवा रोगा ये चान्ये जठरोद्भवाः। मंत्रस्यास्य प्रभावेन सर्वे यांति द्रुतं क्षयम्

ajīrṇaprabhavā rogā ye cānye jaṭharodbhavāḥ maṁtrasyāsya prabhāvena sarve yāṁti drutaṁ kṣayam

"अजीर्ण से उत्पन्न रोग तथा उदर से उत्पन्न अन्य रोग भी, इस मंत्र के प्रभाव से शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।"

श्लोक 84 (skanda.6.114.84)

एवमुक्त्वाऽथ तं विप्रं भगवान्वृषभध्वजः। जगामादर्शनं पश्चाद्यथा दीपो वितैलकः

evamuktvā'tha taṁ vipraṁ bhagavānvṛṣabhadhvajaḥ jagāmādarśanaṁ paścādyathā dīpo vitailakaḥ

उस ब्राह्मण से ऐसा कहकर, भगवान वृषभध्वज तत्पश्चात् इस प्रकार अंतर्धान हो गए, जैसे तेल समाप्त होने पर दीपक बुझ जाता है।

श्लोक 85 (skanda.6.114.85)

त्रिजातोऽपि समं विप्रैर्हतशेषैस्तु तैर्द्रुतम्। जगाम संप्रहृष्टात्मा चमत्कारपुरं प्रति

trijāto'pi samaṁ viprairhataśeṣaistu tairdrutam jagāma saṁprahṛṣṭātmā camatkārapuraṁ prati

त्रिजात भी अत्यंत हर्षित होकर, बचे हुए उन ब्राह्मणों के साथ शीघ्रतापूर्वक चमत्कारपुर की ओर चल पड़ा।

श्लोक 86 (skanda.6.114.86)

एवं ते ब्राह्मणाः सर्वे त्रिजातेन समन्विताः। न गरं न गरं प्रोच्चैरुच्चरंतः समाययुः

evaṁ te brāhmaṇāḥ sarve trijātena samanvitāḥ na garaṁ na garaṁ proccairuccaraṁtaḥ samāyayuḥ

इस प्रकार त्रिजात के साथ वे सभी ब्राह्मण "न गरं न गरं" ऊँचे स्वर से उच्चारण करते हुए वहाँ पहुँचे।

श्लोक 87 (skanda.6.114.87)

हाटकेश्वरजं क्षेत्रं यत्तद्व्याप्तं समंततः। रौद्रैराशीविषैः क्रूरैः शेषस्यादेशमाश्रितैः

hāṭakeśvarajaṁ kṣetraṁ yattadvyāptaṁ samaṁtataḥ raudrairāśīviṣaiḥ krūraiḥ śeṣasyādeśamāśritaiḥ

उस समय हाटकेश्वर-क्षेत्र चारों ओर से शेषनाग की आज्ञा का पालन करने वाले भयंकर, क्रूर, विषधर सर्पों से व्याप्त हो चुका था।

श्लोक 88 (skanda.6.114.88)

अथ ते पन्नगाः श्रुत्वा सिद्धमंत्रं शिवोद्भवम्। निर्विषास्तेजसा हीनाः समन्तात्ते प्रदुद्रवुः

atha te pannagāḥ śrutvā siddhamaṁtraṁ śivodbhavam nirviṣāstejasā hīnāḥ samantātte pradudravuḥ

फिर उन नागों ने शिव से प्राप्त उस सिद्ध मंत्र को सुनकर, निर्विष और तेजरहित होकर चारों दिशाओं में भागना शुरू कर दिया।

श्लोक 89 (skanda.6.114.89)

वल्मीकान्केचिदासाद्य चित्ररंध्रांतरोद्भवान्। अन्ये चापि प्रजग्मुश्च पातालं दंदशूककाः

valmīkānkecidāsādya citraraṁdhrāṁtarodbhavān anye cāpi prajagmuśca pātālaṁ daṁdaśūkakāḥ

कुछ सर्प विचित्र छिद्रों वाले बाँबियों में जा घुसे, और अन्य डसने वाले सर्प पाताल को चले गए।

श्लोक 90 (skanda.6.114.90)

ये केचिद्भयसंत्रस्ता वार्द्धक्येन निपीडिताः। वालत्वेन तथा चान्ये शक्नुवंति न सर्पितुम्

ye kecidbhayasaṁtrastā vārddhakyena nipīḍitāḥ vālatvena tathā cānye śaknuvaṁti na sarpitum

जो भी सर्प भय से त्रस्त होकर, वृद्धावस्था से पीड़ित होने के कारण, अथवा बाल्यावस्था के कारण सरक कर भाग नहीं सकते थे...

श्लोक 91 (skanda.6.114.91)

ते सर्वे ब्राह्मणेन्द्रैस्तैः कृतस्य प्रतिकारकैः। निहताः पन्नगास्तत्र दंडकाष्ठैः सहस्रशः

te sarve brāhmaṇendraistaiḥ kṛtasya pratikārakaiḥ nihatāḥ pannagāstatra daṁḍakāṣṭhaiḥ sahasraśaḥ

...उन सभी नागों को, किए गए अत्याचार का प्रतिकार करने वाले उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने वहाँ लाठियों से हजारों की संख्या में मार डाला।

श्लोक 92 (skanda.6.114.92)

एवमुत्साद्य तान्सर्वान्ब्राह्मणास्ते गतव्यथाः। तं त्रिजातं पुरस्कृत्य स्थानकृत्यानि चक्रिरे

evamutsādya tānsarvānbrāhmaṇāste gatavyathāḥ taṁ trijātaṁ puraskṛtya sthānakṛtyāni cakrire

इस प्रकार उन सबको भगाकर, व्यथारहित हुए वे ब्राह्मण त्रिजात को आगे करके अपने स्थान के कार्यों में लग गए।

श्लोक 93 (skanda.6.114.93)

एवं तन्नगरं जातमस्मात्कालादनंतरम्। देवदेवस्य भर्गस्य प्रसादेन द्विजोत्तमाः

evaṁ tannagaraṁ jātamasmātkālādanaṁtaram devadevasya bhargasya prasādena dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो! इस प्रकार उसी काल के बाद से देवदेव भर्ग (शिव) की कृपा से वह स्थान 'नगर' नाम से प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 94 (skanda.6.114.94)

एतद्यः पठते नित्यमाख्यानं नगरोद्भवम्। न तस्य सर्पजं क्वापि कथंचिज्जायते भयम्

etadyaḥ paṭhate nityamākhyānaṁ nagarodbhavam na tasya sarpajaṁ kvāpi kathaṁcijjāyate bhayam

जो कोई नित्य नगर की उत्पत्ति के इस आख्यान का पाठ करता है, उसे कभी भी, कहीं भी, किसी भी प्रकार सर्प से उत्पन्न भय नहीं होता।

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