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नागर खण्ड · अध्याय 116

अम्बारेवती-तीर्थ-माहात्म्य-वर्णन

अध्याय 115अध्याय-सूचीअध्याय 117

श्लोक 1 (skanda.6.116.1)

सूत उवाच। तथान्यापि च तत्रास्ति सुविख्याताम्बरेवती। देवी कामप्रदा पुंसां बालकानां सुखप्रदा

sūta uvāca tathānyāpi ca tatrāsti suvikhyātāmbarevatī devī kāmapradā puṁsāṁ bālakānāṁ sukhapradā

सूत जी ने कहा — वहाँ एक और सुविख्यात देवी भी हैं, अम्बरेवती नाम की, जो पुरुषों की कामनाएँ पूर्ण करने वाली और बालकों को सुख देने वाली हैं।

श्लोक 2 (skanda.6.116.2)

यां दृष्ट्वा पूजयित्वाऽथ चैत्राष्टम्यां विशेषतः। शुक्लायां नाप्नुयान्मर्त्यः कुटुम्बव्यसनं क्वचित्

yāṁ dṛṣṭvā pūjayitvā'tha caitrāṣṭamyāṁ viśeṣataḥ śuklāyāṁ nāpnuyānmartyaḥ kuṭumbavyasanaṁ kvacit

जो मनुष्य विशेष रूप से चैत्र शुक्ल अष्टमी को उनका दर्शन और पूजन करता है, उसे कभी भी परिवार पर कोई विपत्ति नहीं आती।

श्लोक 3 (skanda.6.116.3)

ऋषय ऊचुः। केन वा स्थापिता तत्र सा देवी चाम्बरेवती। किंप्रभावा किंस्वरूपा सूतपुत्र वदस्व नः

ṛṣaya ūcuḥ kena vā sthāpitā tatra sā devī cāmbarevatī kiṁprabhāvā kiṁsvarūpā sūtaputra vadasva naḥ

ऋषियों ने कहा — हे सूतपुत्र! वह अम्बरेवती देवी वहाँ किसके द्वारा स्थापित की गईं? उनका प्रभाव और स्वरूप कैसा है, यह हमें बताइए।

श्लोक 4 (skanda.6.116.4)

सूत उवाच। यदा शेषेण संदिष्टा नानानागा विषोल्बणाः। पुरस्यास्य विनाशाय क्रोधसंरक्तलोचनाः। तदा तस्य प्रिया सा च पुत्रशोकेन पीडिता

sūta uvāca yadā śeṣeṇa saṁdiṣṭā nānānāgā viṣolbaṇāḥ purasyāsya vināśāya krodhasaṁraktalocanāḥ tadā tasya priyā sā ca putraśokena pīḍitā

सूत जी ने कहा — जब शेषनाग द्वारा भेजे गए, क्रोध से लाल नेत्रों वाले अनेक विषैले नाग इस नगर के विनाश के लिए आए, तब पुत्रशोक से पीड़ित उनकी प्रिया भी...

श्लोक 5 (skanda.6.116.5)

स्वयमेवाग्रतो गत्वा भक्षयामास तं द्विजम्। कुटुम्बेन समायुक्तं येन पुत्रो निपातितः

svayamevāgrato gatvā bhakṣayāmāsa taṁ dvijam kuṭumbena samāyuktaṁ yena putro nipātitaḥ

...स्वयं ही सबसे आगे जाकर, जिसके द्वारा उनका पुत्र मारा गया था, उस ब्राह्मण को उसके कुटुंब सहित खा गई।

श्लोक 6 (skanda.6.116.6)

अथ तस्य द्विजेन्द्रस्य बालवैधव्यसंयुता। अनुजाऽऽसीत्तपोयुक्ता ब्रह्मचर्यकृतक्षणा

atha tasya dvijendrasya bālavaidhavyasaṁyutā anujā''sīttapoyuktā brahmacaryakṛtakṣaṇā

उस श्रेष्ठ ब्राह्मण की एक छोटी बहन थी, जो बचपन में ही विधवा हो गई थी, तपस्या में लीन और ब्रह्मचर्य में अपने समय बिताने वाली।

श्लोक 7 (skanda.6.116.7)

सा दृष्ट्वा भक्षितं सर्वं भट्टिकाख्या कुटुम्बकम्। नागपत्न्या ततः प्राह जलमादाय पाणिना

sā dṛṣṭvā bhakṣitaṁ sarvaṁ bhaṭṭikākhyā kuṭumbakam nāgapatnyā tataḥ prāha jalamādāya pāṇinā

भट्टिका नामक उस बहन ने अपने पूरे परिवार को खाया हुआ देखकर, हाथ में जल लेकर नागपत्नी से कहा।

श्लोक 8 (skanda.6.116.8)

यस्मात्त्वया कुटुम्बं मे नाशं नीतं द्विजिह्वके। दर्शितं च महद्दुःखं मम बन्धुजनोद्भवम्

yasmāttvayā kuṭumbaṁ me nāśaṁ nītaṁ dvijihvake darśitaṁ ca mahadduḥkhaṁ mama bandhujanodbhavam

"हे द्विजिह्वे (दो जीभ वाली)! चूँकि तूने मेरे परिवार का नाश कर दिया, और मुझे अपने बंधुजनों की मृत्यु से उत्पन्न यह महान दुःख दिखाया है..."

श्लोक 9 (skanda.6.116.9)

तथा त्वमपि संप्राप्य मानुषत्वं सुगर्हितम्। मानुषं पतिमासाद्य पुत्रपौत्रानवाप्य च

tathā tvamapi saṁprāpya mānuṣatvaṁ sugarhitam mānuṣaṁ patimāsādya putrapautrānavāpya ca

"...उसी प्रकार तू भी अत्यंत निंदनीय मनुष्य-योनि को प्राप्त करके, मनुष्य पति पाकर, तथा पुत्र-पौत्र प्राप्त करके..."

श्लोक 10 (skanda.6.116.10)

तेषां विनाशजं दुःखं मानुषे त्वमवाप्स्यसि। नागत्वे वर्तमानायाः शापं तेऽमुं ददाम्यहम्

teṣāṁ vināśajaṁ duḥkhaṁ mānuṣe tvamavāpsyasi nāgatve vartamānāyāḥ śāpaṁ te'muṁ dadāmyaham

"...मनुष्य-रूप में उनके विनाश से उत्पन्न दुःख भोगेगी। अभी नाग-रूप में रहते हुए ही मैं तुझे यह शाप देती हूँ।"

श्लोक 11 (skanda.6.116.11)

साऽपि श्रुत्वाऽथ तं शापं रेवती भट्टिकोद्भवम्। क्रोधेन महताविष्टा ह्यदशत्तां द्रुतं ततः

sā'pi śrutvā'tha taṁ śāpaṁ revatī bhaṭṭikodbhavam krodhena mahatāviṣṭā hyadaśattāṁ drutaṁ tataḥ

भट्टिका से मिला वह शाप सुनकर, महाक्रोध से युक्त हुई रेवती ने तुरंत उसे डस लिया।

श्लोक 12 (skanda.6.116.12)

अथ तस्यास्तनुं प्राप्य नागीदंष्ट्रा विषोल्बणा। जगाम शतधा नाशं बिभिदे न त्वचं क्वचित्

atha tasyāstanuṁ prāpya nāgīdaṁṣṭrā viṣolbaṇā jagāma śatadhā nāśaṁ bibhide na tvacaṁ kvacit

किंतु उसके शरीर से टकराते ही नागिन का वह विषभरा दंत सैकड़ों टुकड़ों में टूट गया, और उसकी त्वचा को भेद ही नहीं सका।

श्लोक 13 (skanda.6.116.13)

ततः सा लज्जयाविष्टा स्वरक्तप्लावितानना। विषण्णा निषसादाथ संनिविष्टा धरातले

tataḥ sā lajjayāviṣṭā svaraktaplāvitānanā viṣaṇṇā niṣasādātha saṁniviṣṭā dharātale

तब लज्जा से युक्त होकर, अपने ही रक्त से लथपथ मुख वाली वह उदास होकर भूमि पर बैठ गई।

श्लोक 14 (skanda.6.116.14)

एतस्मिन्नंतरे नागास्तथान्ये ये समागताः। रेवतीं ते समालोक्य तथारूपां भयान्विताम्। प्रोचुश्च किमिदं देवि तव वक्त्रे रुजास्पदम्

etasminnaṁtare nāgāstathānye ye samāgatāḥ revatīṁ te samālokya tathārūpāṁ bhayānvitām procuśca kimidaṁ devi tava vaktre rujāspadam

इसी बीच वहाँ आए हुए अन्य नागों ने रेवती को उस भयभीत अवस्था में देखकर पूछा — "हे देवी! यह आपके मुख पर पीड़ा का चिह्न क्या है?"

श्लोक 15 (skanda.6.116.15)

अथवा किं प्रभावोऽयं कस्यचिद्रक्तसंपदः

athavā kiṁ prabhāvo'yaṁ kasyacidraktasaṁpadaḥ

"अथवा यह किसी की शक्ति का प्रभाव है, यह रक्त की यह अधिकता?"

श्लोक 16 (skanda.6.116.16)

रेवत्युवाच। येयं दुष्टतमा काचिद्दृश्यते दुष्टतापसी। अस्या जातो विकारोऽयं ममास्ये नागसत्तमाः

revatyuvāca yeyaṁ duṣṭatamā kāciddṛśyate duṣṭatāpasī asyā jāto vikāro'yaṁ mamāsye nāgasattamāḥ

रेवती ने कहा — हे नागसत्तमो! यहाँ दिखाई देने वाली यह अत्यंत दुष्ट तपस्विनी है, इसी के कारण मेरे मुख में यह विकार उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 17 (skanda.6.116.17)

तस्मादेनां महादुष्टां भगिनीं तस्य दुर्मतेः। येन मे निहतः पुत्रो द्विजपुत्रेण सांप्रतम्

tasmādenāṁ mahāduṣṭāṁ bhaginīṁ tasya durmateḥ yena me nihataḥ putro dvijaputreṇa sāṁpratam

"अतः उस दुर्बुद्धि ब्राह्मण-पुत्र की, जिसके द्वारा अभी मेरा पुत्र मारा गया, इस महादुष्ट बहन को..."

श्लोक 18 (skanda.6.116.18)

भक्ष्यतां भक्ष्यतां शीघ्रं मम नाशाय संस्थिताम्। सांप्रतं मन्मुखे तेन रुधिरं पन्नगोत्तमाः

bhakṣyatāṁ bhakṣyatāṁ śīghraṁ mama nāśāya saṁsthitām sāṁprataṁ manmukhe tena rudhiraṁ pannagottamāḥ

"हे श्रेष्ठ नागो! मेरे विनाश के लिए यहाँ खड़ी इसे शीघ्र खा डालो — इसी के कारण अभी मेरे मुख में रक्त बह रहा है।"

श्लोक 19 (skanda.6.116.19)

अथ ते पन्नगाः क्रुद्धा ददंशुस्तां तपस्विनीम्। समं सर्वेषु गात्रेषु यथान्या प्राकृता स्त्रियम्

atha te pannagāḥ kruddhā dadaṁśustāṁ tapasvinīm samaṁ sarveṣu gātreṣu yathānyā prākṛtā striyam

तब क्रुद्ध हुए उन नागों ने, जैसे किसी साधारण स्त्री को डसते हैं, वैसे ही उस तपस्विनी को उसके सभी अंगों पर एक साथ डस लिया।

श्लोक 20 (skanda.6.116.20)

ततस्तेषामपि तथा मुखाद्दंष्ट्रा विनिर्गताः। रुधिरं च ततो जज्ञे शेषपत्न्या यथा तथा

tatasteṣāmapi tathā mukhāddaṁṣṭrā vinirgatāḥ rudhiraṁ ca tato jajñe śeṣapatnyā yathā tathā

तब उनके मुख से भी उसी प्रकार दंत टूट गए, और शेषनाग की पत्नी की भाँति ही उनके मुख से भी रक्त निकलने लगा।

श्लोक 21 (skanda.6.116.21)

अथ तस्याः प्रभावं तं दृष्ट्वा ते नागसत्तमाः। शेषा भयपरित्रस्ताः प्रजग्मुश्च दिशो दश

atha tasyāḥ prabhāvaṁ taṁ dṛṣṭvā te nāgasattamāḥ śeṣā bhayaparitrastāḥ prajagmuśca diśo daśa

फिर उसका वह प्रभाव देखकर, भय से त्रस्त हुए शेष के अनुयायी वे श्रेष्ठ नाग दसों दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 22 (skanda.6.116.22)

भट्टिकापि जगामाशु स्वाश्रमं प्रति दुःखिता। भयत्रस्तैः समंताच्च वीक्ष्यमाणा महोरगैः

bhaṭṭikāpi jagāmāśu svāśramaṁ prati duḥkhitā bhayatrastaiḥ samaṁtācca vīkṣyamāṇā mahoragaiḥ

भट्टिका भी दुःखी होकर, चारों ओर से भयभीत महासर्पों द्वारा देखी जाती हुई शीघ्रतापूर्वक अपने आश्रम की ओर चली गई।

श्लोक 23 (skanda.6.116.23)

ततः सर्वं समालोक्य ताप्यमानं महोरगैः। तत्स्थानं स्वजनैर्मुक्तं दुःखेन महतान्वितैः

tataḥ sarvaṁ samālokya tāpyamānaṁ mahoragaiḥ tatsthānaṁ svajanairmuktaṁ duḥkhena mahatānvitaiḥ

फिर महासर्पों से संतप्त उस समस्त स्थान को, अपने ही स्वजनों से रहित हुआ देखकर, अत्यंत दुःख से युक्त होकर...

श्लोक 24 (skanda.6.116.24)

जगामान्यत्र सा साध्वी सम्यग्व्रतपरायणा। तीर्थयात्रां प्रकुर्वाणा परिबभ्राम मेदिनीम्

jagāmānyatra sā sādhvī samyagvrataparāyaṇā tīrthayātrāṁ prakurvāṇā paribabhrāma medinīm

...अपने व्रतों में सम्यक् रूप से लीन वह साध्वी अन्यत्र चली गई, और तीर्थयात्रा करते हुए पृथ्वी पर भ्रमण करने लगी।

श्लोक 25 (skanda.6.116.25)

एवमुद्वासिते स्थाने तस्मिन्सा रेवती तदा। स्मृत्वा तं भट्टिकाशापं दुःखेन महताऽन्विता

evamudvāsite sthāne tasminsā revatī tadā smṛtvā taṁ bhaṭṭikāśāpaṁ duḥkhena mahatā'nvitā

इस प्रकार वह स्थान उजड़ जाने पर, रेवती भी भट्टिका के उस शाप को स्मरण करके अत्यंत दुःख से युक्त हो गई।

श्लोक 26 (skanda.6.116.26)

कथं मे मानुषीगर्भे शापाद्वासो भविष्यति। मानुष्येण च कांतेन प्रभविष्यति संगमः

kathaṁ me mānuṣīgarbhe śāpādvāso bhaviṣyati mānuṣyeṇa ca kāṁtena prabhaviṣyati saṁgamaḥ

"शाप के कारण मुझे मनुष्य के गर्भ में कैसे निवास करना होगा, और मनुष्य पति के साथ मेरा संगम कैसे होगा?"

श्लोक 27 (skanda.6.116.27)

नैतत्पुत्रोद्भवं दुःखं तथा मां बाधते हृदि। यथेदं मानुषे गर्भे संवासो मानुषं प्रति

naitatputrodbhavaṁ duḥkhaṁ tathā māṁ bādhate hṛdi yathedaṁ mānuṣe garbhe saṁvāso mānuṣaṁ prati

"पुत्र की मृत्यु से उत्पन्न यह दुःख मेरे हृदय को उतना नहीं सताता, जितना यह मनुष्य के गर्भ में निवास और मनुष्य से संबंध का विचार।"

श्लोक 28 (skanda.6.116.28)

तथा दशनसंत्यक्ता कथं भर्तुः स्वमाननम्। दर्शयिष्यामि भूयोऽपि क्षते क्षारोऽत्र मे स्थितः

tathā daśanasaṁtyaktā kathaṁ bhartuḥ svamānanam darśayiṣyāmi bhūyo'pi kṣate kṣāro'tra me sthitaḥ

"और अपने दाँतों को खोकर मैं फिर कभी अपने पति को अपना मुख कैसे दिखाऊँगी? यहाँ तो मेरे घाव पर नमक ही रखा गया है।"

श्लोक 29 (skanda.6.116.29)

तस्मात्परिचरिष्यामि क्षेत्रेऽत्रैव व्यवस्थिता। किं करिष्यामि संप्राप्य गृहं पुत्रं विनाकृता

tasmātparicariṣyāmi kṣetre'traiva vyavasthitā kiṁ kariṣyāmi saṁprāpya gṛhaṁ putraṁ vinākṛtā

"अतः मैं इसी क्षेत्र में स्थिर होकर सेवा में लगूँगी; पुत्र के बिना घर जाकर मैं क्या करूँगी?"

श्लोक 30 (skanda.6.116.30)

ततश्चाराधयामास सम्यक्छ्रद्धासमन्विता। अंबिकां सा तदा देवीं स्थापयित्वा सुरेश्वरीम्

tataścārādhayāmāsa samyakchraddhāsamanvitā aṁbikāṁ sā tadā devīṁ sthāpayitvā sureśvarīm

तब उचित श्रद्धा से युक्त होकर उसने देवेश्वरी अम्बिका देवी की स्थापना करके उनकी आराधना की।

श्लोक 31 (skanda.6.116.31)

गन्धपुष्पोपहारेण नैवेद्यैर्विविधैरपि। गीतनृत्यैस्तथा वाद्यैर्मनोहारिभिरेव च

gandhapuṣpopahāreṇa naivedyairvividhairapi gītanṛtyaistathā vādyairmanohāribhireva ca

सुगंध-पुष्पों के उपहार से, विविध नैवेद्यों से, और मनोहर गीत-नृत्य तथा वाद्यों से (उनकी सेवा की)।

श्लोक 32 (skanda.6.116.32)

ततः कतिपयाहस्य तस्यास्तुष्टा सुरेश्वरी। प्रोवाच वरदाऽस्मीति प्रार्थयस्व हृदि स्थितम्

tataḥ katipayāhasya tasyāstuṣṭā sureśvarī provāca varadā'smīti prārthayasva hṛdi sthitam

फिर कुछ दिन बाद उससे प्रसन्न हुई देवेश्वरी ने कहा — "मैं वरदायिनी हूँ, अपने हृदय में स्थित इच्छा को माँगो।"

श्लोक 33 (skanda.6.116.33)

रेवत्युवाच। अहं शप्ता पुरा देवि ब्राह्मण्या कारणांतरे। यत्त्वं मानुषमासाद्य स्वयं भूत्वा च मानुषी

revatyuvāca ahaṁ śaptā purā devi brāhmaṇyā kāraṇāṁtare yattvaṁ mānuṣamāsādya svayaṁ bhūtvā ca mānuṣī

रेवती ने कहा — हे देवी! पहले एक ब्राह्मणी ने मुझे इस कारण से शाप दिया कि तुम स्वयं मनुष्य-योनि को प्राप्त होकर मानवी बनोगी।

श्लोक 34 (skanda.6.116.34)

ततः संप्राप्स्यसि फलं तेषां नाशसमुद्भवम्। महद्दुःखं स्वपुत्रोत्थं मम शापेन पीडिता

tataḥ saṁprāpsyasi phalaṁ teṣāṁ nāśasamudbhavam mahadduḥkhaṁ svaputrotthaṁ mama śāpena pīḍitā

"...और तब तुम अपने पुत्र की मृत्यु से उत्पन्न उनके विनाश का महान दुःख भोगोगी।" इस शाप से मैं अभी पीड़ित हूँ।

श्लोक 35 (skanda.6.116.35)

तथा मम मुखाद्दंष्ट्रा संनीताश्च सुरेश्वरि। तेषां च संभवस्तावत्कथं स्यात्त्वत्प्रभावतः

tathā mama mukhāddaṁṣṭrā saṁnītāśca sureśvari teṣāṁ ca saṁbhavastāvatkathaṁ syāttvatprabhāvataḥ

"हे सुरेश्वरी! मेरे मुख से मेरे दाँत भी छीन लिए गए हैं; आपकी शक्ति से उनकी पुनःप्राप्ति कैसे हो सकती है?"

श्लोक 36 (skanda.6.116.36)

भवंतु तनया नश्च तथा वंशविवर्धनाः। एतन्मे वांछितं देवि नान्यत्संप्रार्थयाम्यहम्

bhavaṁtu tanayā naśca tathā vaṁśavivardhanāḥ etanme vāṁchitaṁ devi nānyatsaṁprārthayāmyaham

"हमारे भी वंश बढ़ाने वाले पुत्र हों — हे देवी! यही मेरी कामना है, इसके अतिरिक्त मुझे और कुछ नहीं चाहिए।"

श्लोक 37 (skanda.6.116.37)

देव्युवाच। नात्र वासस्त्वया कार्यः कथंचिदपि शोभने। मनुष्यगर्भसंवासो भर्ता च भविता नरः

devyuvāca nātra vāsastvayā kāryaḥ kathaṁcidapi śobhane manuṣyagarbhasaṁvāso bhartā ca bhavitā naraḥ

देवी ने कहा — हे शोभने! तुम्हें यहाँ किसी भी प्रकार निवास नहीं करना है; मनुष्य के गर्भ में निवास और मनुष्य पति की प्राप्ति अवश्य होगी।

श्लोक 38 (skanda.6.116.38)

तस्माच्छृणुष्व मे वाक्यं यत्त्वां वक्ष्यामि सांप्रतम्। दुःखनाशकरं तुभ्यं सत्यं च वरवर्णिनि

tasmācchṛṇuṣva me vākyaṁ yattvāṁ vakṣyāmi sāṁpratam duḥkhanāśakaraṁ tubhyaṁ satyaṁ ca varavarṇini

"हे वरवर्णिनी! अतः अब मैं जो कहती हूँ, वह सुनो — यह तुम्हारे दुःख को नष्ट करने वाला और सत्य वचन है।"

श्लोक 39 (skanda.6.116.39)

उत्पत्स्यति न संदेहो देवकार्यप्रसिद्धये। तव भर्ता त्रिलोकेऽस्मिन्कृत्वा मानुषविग्रहम्

utpatsyati na saṁdeho devakāryaprasiddhaye tava bhartā triloke'sminkṛtvā mānuṣavigraham

"देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए, निःसंदेह तुम्हारे पति इस त्रिलोक में मनुष्य-रूप धारण करके जन्म लेंगे।"

श्लोक 40 (skanda.6.116.40)

तक्षकाख्यस्तथा नागो द्विजशापवशाच्छुभे। सौराष्ट्रविषये राजा रैवताख्यो भविष्यति

takṣakākhyastathā nāgo dvijaśāpavaśācchubhe saurāṣṭraviṣaye rājā raivatākhyo bhaviṣyati

"हे शुभे! तक्षक नामक वह नाग एक ब्राह्मण के शाप के प्रभाव से सौराष्ट्र देश में रैवत नामक राजा होगा।"

श्लोक 41 (skanda.6.116.41)

तस्य क्षेमकरी भार्या नामवंशसमुद्भवा। भविष्यति न संदेहो विशिष्टा विप्रशापतः

tasya kṣemakarī bhāryā nāmavaṁśasamudbhavā bhaviṣyati na saṁdeho viśiṣṭā vipraśāpataḥ

"उसकी पत्नी क्षेमकरी नाम से, उसी वंश में उत्पन्न, ब्राह्मण के शाप के कारण ही विशिष्ट होकर निःसंदेह जन्म लेगी।"

श्लोक 42 (skanda.6.116.42)

तस्या गर्भं समासाद्य त्वं जन्म समवाप्स्यसि। रामरूपस्य शेषस्य पुनर्भार्या भविष्यसि

tasyā garbhaṁ samāsādya tvaṁ janma samavāpsyasi rāmarūpasya śeṣasya punarbhāryā bhaviṣyasi

"उसी के गर्भ में जाकर तुम जन्म प्राप्त करोगी, और राम-रूप में अवतरित शेष की पुनः पत्नी बनोगी।"

श्लोक 43 (skanda.6.116.43)

तस्मात्त्वं देवि मा शोकं कार्येऽस्मिन्कुरु शोभने। तेन मानुषजे गर्भे संभूतिः संभविष्यति

tasmāttvaṁ devi mā śokaṁ kārye'sminkuru śobhane tena mānuṣaje garbhe saṁbhūtiḥ saṁbhaviṣyati

"अतः हे शोभना देवी! इस विषय में शोक मत करो; इसी प्रकार तुम्हारा जन्म मनुष्य के गर्भ में होगा।"

श्लोक 44 (skanda.6.116.44)

तत्र पश्यसि यन्नाशं स्वकुटुम्बसमुद्भवम्। हिताय तदवस्थायास्तद्भविष्यत्यसंशयम्

tatra paśyasi yannāśaṁ svakuṭumbasamudbhavam hitāya tadavasthāyāstadbhaviṣyatyasaṁśayam

"वहाँ तुमने अपने कुटुंब का जो नाश देखा, वह भविष्य की उस अवस्था के हित के लिए ही निःसंदेह हुआ है।"

श्लोक 45 (skanda.6.116.45)

ततः परं युगं पापं यतो भीरु भविष्यति। तदूर्ध्वं मर्त्यधर्माणो म्लेच्छाः स्थास्यंति सर्वतः

tataḥ paraṁ yugaṁ pāpaṁ yato bhīru bhaviṣyati tadūrdhvaṁ martyadharmāṇo mlecchāḥ sthāsyaṁti sarvataḥ

"हे भीरु! उसके बाद एक पापमय युग आएगा; उसके पश्चात् मर्त्य-धर्म वाले म्लेच्छ सर्वत्र स्थापित हो जाएँगे।"

श्लोक 46 (skanda.6.116.46)

ततः स्वर्गनिवासार्थं भगवान्देवकीसुतः। संहर्ता स्वकुलं सर्वं स्वयमेव न संशयः

tataḥ svarganivāsārthaṁ bhagavāndevakīsutaḥ saṁhartā svakulaṁ sarvaṁ svayameva na saṁśayaḥ

"तब स्वर्ग-निवास के लिए भगवान देवकी-पुत्र स्वयं ही निःसंदेह अपने संपूर्ण कुल का संहार करेंगे।"

श्लोक 47 (skanda.6.116.47)

भविष्यंति पुनर्दंष्ट्रास्तव वक्त्रे मनोरमाः। तस्मात्त्वं गच्छ पातालं स्वभर्ता यत्र तिष्ठति

bhaviṣyaṁti punardaṁṣṭrāstava vaktre manoramāḥ tasmāttvaṁ gaccha pātālaṁ svabhartā yatra tiṣṭhati

"तुम्हारे मुख में मनोहर दाँत फिर से प्राप्त होंगे; अतः अब तुम पाताल को जाओ, जहाँ तुम्हारे पति निवास करते हैं।"

श्लोक 48 (skanda.6.116.48)

अन्यच्चापि यदिष्टं ते किंचिच्चित्ते व्यवस्थितम्। तत्कीर्तयस्व कल्याणि महांस्तोषो मम स्थितः

anyaccāpi yadiṣṭaṁ te kiṁciccitte vyavasthitam tatkīrtayasva kalyāṇi mahāṁstoṣo mama sthitaḥ

"हे कल्याणी! और भी जो कुछ तुम्हारे मन में अभीष्ट हो, वह भी कह दो; तुम्हारे प्रति मेरा बड़ा संतोष है।"

श्लोक 49 (skanda.6.116.49)

रेवत्युवाच। स्थाने स्थेयं सदाऽत्रैव मम नाम्ना सुरेश्वरि। येन मे जायते कीर्तिस्त्रैलोक्ये सचराचरे

revatyuvāca sthāne stheyaṁ sadā'traiva mama nāmnā sureśvari yena me jāyate kīrtistrailokye sacarācare

रेवती ने कहा — हे सुरेश्वरी! आप सदा मेरे ही नाम से इस स्थान पर स्थित रहें, जिससे चराचर सहित तीनों लोकों में मेरी कीर्ति हो।

श्लोक 50 (skanda.6.116.50)

तथाऽहं नागलोकाच्च चतुर्दश्यष्टमीषु च। सदा त्वां पूजयिष्यामि विशेषान्नवमीदिने

tathā'haṁ nāgalokācca caturdaśyaṣṭamīṣu ca sadā tvāṁ pūjayiṣyāmi viśeṣānnavamīdine

"और मैं नागलोक से ही सदा चतुर्दशी और अष्टमी को, तथा विशेष रूप से नवमी के दिन आपकी पूजा करूँगी।"

श्लोक 51 (skanda.6.116.51)

आश्विनस्य सिते पक्षे सर्वैर्नागैः समन्विता। प्रपूजां ते विधास्यामि श्रद्धया परया युता

āśvinasya site pakṣe sarvairnāgaiḥ samanvitā prapūjāṁ te vidhāsyāmi śraddhayā parayā yutā

"आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में समस्त नागों सहित, परम श्रद्धा से युक्त होकर मैं आपकी विशेष पूजा करूँगी।"

श्लोक 52 (skanda.6.116.52)

तस्मिन्नहनि येऽन्येऽपि पूजां दास्यंति ते नराः। मा पश्यंतु प्रसादात्ते नरास्ते वल्लभक्षयम्

tasminnahani ye'nye'pi pūjāṁ dāsyaṁti te narāḥ mā paśyaṁtu prasādātte narāste vallabhakṣayam

"उस दिन जो अन्य मनुष्य भी आपकी पूजा करेंगे, आपकी कृपा से वे मनुष्य अपने प्रियजनों की हानि कभी न देखें।"

श्लोक 53 (skanda.6.116.53)

देव्युवाच। एवं भद्रे करिष्यामि वासो मेऽत्र भविष्यति। त्वन्नाम्ना पूजकानां च श्रेयो दास्यामि ते सदा। महानवमिजे चाह्नि विशेषेण शुचिस्मिते

devyuvāca evaṁ bhadre kariṣyāmi vāso me'tra bhaviṣyati tvannāmnā pūjakānāṁ ca śreyo dāsyāmi te sadā mahānavamije cāhni viśeṣeṇa śucismite

देवी ने कहा — हे भद्रे! ऐसा ही होगा; मेरा निवास यहीं होगा। हे शुचिस्मिते! तुम्हारे नाम से पूजा करने वालों को मैं सदा कल्याण दूँगी, विशेष रूप से महानवमी के दिन।

श्लोक 54 (skanda.6.116.54)

सूत उवाच। एवमुक्ता तया साऽथ रेवती शेषवल्लभा। जगाम स्वगृहं पश्चाद्धर्षेण महतान्विता

sūta uvāca evamuktā tayā sā'tha revatī śeṣavallabhā jagāma svagṛhaṁ paścāddharṣeṇa mahatānvitā

सूत जी ने कहा — इस प्रकार उनके द्वारा कहे जाने पर, शेषनाग की प्रिया रेवती अत्यंत हर्ष से युक्त होकर अपने घर को चली गई।

श्लोक 55 (skanda.6.116.55)

ततःप्रभृति सा देवी तस्मिन्क्षेत्रे व्यवस्थिता। तन्नाम्ना कामदा नृणां सर्वव्यसननाशिनी

tataḥprabhṛti sā devī tasminkṣetre vyavasthitā tannāmnā kāmadā nṛṇāṁ sarvavyasananāśinī

तब से वह देवी उस क्षेत्र में स्थित रहीं, उसी नाम से मनुष्यों की कामनाएँ पूर्ण करने वाली और समस्त संकटों का नाश करने वाली।

श्लोक 56 (skanda.6.116.56)

अंबा सा कीर्त्यते दुर्गा रेवती सोरगप्रिया। ततः संकीर्त्यते लोके भूतले चांबरेवती

aṁbā sā kīrtyate durgā revatī soragapriyā tataḥ saṁkīrtyate loke bhūtale cāṁbarevatī

वे माता दुर्गा के रूप में तथा नागों की प्रिय रेवती के रूप में कही जाती हैं; इसीलिए इस पृथ्वी पर वे लोक में अम्बरेवती नाम से प्रसिद्ध हैं।

श्लोक 57 (skanda.6.116.57)

यस्तां श्रद्धासमोपेतः शुचिर्भूत्वा प्रपूजयेत्। नवम्यामाश्विने मासि शुक्लपक्षे समाहितः। न स संवत्सरं यावद्व्यसनं स्वकुलोद्भवम्

yastāṁ śraddhāsamopetaḥ śucirbhūtvā prapūjayet navamyāmāśvine māsi śuklapakṣe samāhitaḥ na sa saṁvatsaraṁ yāvadvyasanaṁ svakulodbhavam

जो कोई श्रद्धायुक्त होकर, पवित्र और एकाग्रचित्त होकर आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को उनकी पूजा करता है, उसे एक वर्ष तक अपने कुल में कोई विपत्ति नहीं आती।

श्लोक 58 (skanda.6.116.58)

दृष्ट्वाग्रे छिद्रकं व्यालयुक्तं दोषैर्विमुच्यते। ग्रहभूतपिशाचोत्थैस्तथान्यैरपि चापदैः

dṛṣṭvāgre chidrakaṁ vyālayuktaṁ doṣairvimucyate grahabhūtapiśācotthaistathānyairapi cāpadaiḥ

पहले से किसी सर्पजनित अपशकुन को देख लेने पर भी, वह ग्रह, भूत, पिशाच से उत्पन्न तथा अन्य विपत्तियों से भी मुक्त हो जाता है।

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