नागर खण्ड · अध्याय 117
भट्टिका-तीर्थ-उत्पत्ति-माहात्म्य-कथन
श्लोक 1 (skanda.6.117.1)
ऋषय ऊचुः। भट्टिकाख्या पुरा प्रोक्ता या त्वया सूतनन्दन। कस्मात्तस्याः शरीरान्ताद्दंष्ट्रा नागसमुद्भवाः
ṛṣaya ūcuḥ bhaṭṭikākhyā purā proktā yā tvayā sūtanandana kasmāttasyāḥ śarīrāntāddaṁṣṭrā nāgasamudbhavāḥ
ऋषियों ने कहा — हे सूतनंदन! पहले आपने जिस भट्टिका नामक स्त्री का उल्लेख किया, उसके शरीर से टकराते ही नागों के दाँत किस कारण से...
श्लोक 2 (skanda.6.117.2)
विशीर्णाः किं प्रभावश्च तपसः सूतनन्दन। किं वा मंत्रप्रभावश्च एतन्नः कौतुकं परम्
viśīrṇāḥ kiṁ prabhāvaśca tapasaḥ sūtanandana kiṁ vā maṁtraprabhāvaśca etannaḥ kautukaṁ param
...टूट गए? हे सूतनंदन! क्या यह तपस्या का प्रभाव था, अथवा किसी मंत्र का प्रभाव? हमें इसमें बड़ा कौतूहल है।
श्लोक 3 (skanda.6.117.3)
यन्मानुषशरीरेऽपि विशीर्णास्ता विषोल्बणाः। नागानां तु विशेषेण तस्मात्सर्वं प्रकीर्तय
yanmānuṣaśarīre'pi viśīrṇāstā viṣolbaṇāḥ nāgānāṁ tu viśeṣeṇa tasmātsarvaṁ prakīrtaya
मनुष्य-शरीर होते हुए भी नागों के वे तीव्र विषैले दाँत विशेष रूप से टूट गए — अतः यह सब हमें बताइए।
श्लोक 4 (skanda.6.117.4)
सूत उवाच। सा पुरा ब्राह्मणी बाल्ये वर्तमाना पितुर्गृहे। वैधव्येन समायुक्ता जाता कर्मविपाकतः
sūta uvāca sā purā brāhmaṇī bālye vartamānā piturgṛhe vaidhavyena samāyuktā jātā karmavipākataḥ
सूत जी ने कहा — वह ब्राह्मणी पहले बचपन में ही, अपने पिता के घर में रहते हुए, अपने कर्मों के फलस्वरूप वैधव्य को प्राप्त हो गई थी।
श्लोक 5 (skanda.6.117.5)
ततो बाल्येऽपि शुश्राव शास्त्राणि विविधानि च। देवयात्रां प्रचक्रेऽथ तीर्थे स्नाति समाहिता
tato bālye'pi śuśrāva śāstrāṇi vividhāni ca devayātrāṁ pracakre'tha tīrthe snāti samāhitā
फिर बचपन में ही उसने विविध शास्त्रों को सुना, देव-दर्शन की यात्राएँ कीं, और एकाग्रचित्त होकर तीर्थों में स्नान किया।
श्लोक 6 (skanda.6.117.6)
तत्र केदारदेवं च गत्वा नित्यं समाहिता। प्रातरुत्थाय गीतं च भक्त्या चक्रे तदग्रतः
tatra kedāradevaṁ ca gatvā nityaṁ samāhitā prātarutthāya gītaṁ ca bhaktyā cakre tadagrataḥ
वहाँ केदार देव के पास नित्य एकाग्रचित्त होकर जाकर, प्रातःकाल उठकर वह भक्तिपूर्वक उनके सामने गायन किया करती थी।
श्लोक 7 (skanda.6.117.7)
ततस्तद्गीतलौल्येन पातालात्समुपेत्य च। तक्षको वासुकिश्चैव द्विजरूपधरावुभौ
tatastadgītalaulyena pātālātsamupetya ca takṣako vāsukiścaiva dvijarūpadharāvubhau
फिर उस गीत के आकर्षण से खिंचकर, तक्षक और वासुकि दोनों ब्राह्मण-रूप धारण करके पाताल से ऊपर आ गए।
श्लोक 8 (skanda.6.117.8)
साऽपि तत्र महद्गीतं तानैः सर्वैरलंकृतम्। मूर्च्छनाभिः समोपेतं सप्तस्वरविराजितम्
sā'pi tatra mahadgītaṁ tānaiḥ sarvairalaṁkṛtam mūrcchanābhiḥ samopetaṁ saptasvaravirājitam
वह भी वहाँ सभी तानों से अलंकृत, मूर्च्छनाओं से युक्त, सातों स्वरों से सुशोभित महान गीत गाती थी।
श्लोक 9 (skanda.6.117.9)
यतिभिश्च तथा ग्रामैर्वर्णग्रामैः पृथग्विधैः। ततं च विततं चैव घनं सुषिरमेव च
yatibhiśca tathā grāmairvarṇagrāmaiḥ pṛthagvidhaiḥ tataṁ ca vitataṁ caiva ghanaṁ suṣirameva ca
विरामों, विविध ग्राम-रागों और वर्ण-समूहों से, तथा तत, वितत, घन और सुषिर वाद्यों से युक्त होकर...
श्लोक 10 (skanda.6.117.10)
तालकालक्रियामानवर्धमानादिकं च यत्। अविदग्धापि सा तेषां गीतांगानां द्विजांगना। केवलं कंठसंशुद्ध्या ताभ्यां तोषं समादधे
tālakālakriyāmānavardhamānādikaṁ ca yat avidagdhāpi sā teṣāṁ gītāṁgānāṁ dvijāṁganā kevalaṁ kaṁṭhasaṁśuddhyā tābhyāṁ toṣaṁ samādadhe
...ताल, काल, क्रिया, मान, वर्धमान आदि से युक्त उस गायन-कला में अनिपुण होते हुए भी, वह ब्राह्मण-कन्या केवल अपने शुद्ध कंठ-स्वर से ही उन दोनों को संतोष प्रदान करती थी।
श्लोक 11 (skanda.6.117.11)
ततस्तद्गीतलोभेन सर्वे तत्पुरवासिनः। प्रातरुत्थाय केदारं समागच्छंति कौतुकात्
tatastadgītalobhena sarve tatpuravāsinaḥ prātarutthāya kedāraṁ samāgacchaṁti kautukāt
फिर उस गायन के आकर्षण से उस नगर के सभी निवासी प्रातःकाल उठकर कौतूहलवश केदार में आने लगे।
श्लोक 12 (skanda.6.117.12)
कस्यचित्त्वथ कालस्य नागौ तौ स्वपुरं प्रति। निन्युर्बलात्समुद्यम्य सर्वलोकस्य पश्यतः
kasyacittvatha kālasya nāgau tau svapuraṁ prati ninyurbalātsamudyamya sarvalokasya paśyataḥ
फिर कुछ समय पश्चात्, समस्त लोगों के देखते-देखते, उन दोनों नागों ने उसे बलपूर्वक उठाकर अपने नगर की ओर ले लिया।
श्लोक 13 (skanda.6.117.13)
नागरूपं समाधाय रौद्रं जनविभीषणम्। भोगाग्र्येण च संवेष्ट्य पातालतलमभ्ययुः
nāgarūpaṁ samādhāya raudraṁ janavibhīṣaṇam bhogāgryeṇa ca saṁveṣṭya pātālatalamabhyayuḥ
जन-साधारण को भयभीत करने वाला भयंकर नाग-रूप धारण करके, अपने विशाल कुंडलों से उसे लपेटकर, वे पाताल-तल को चले गए।
श्लोक 14 (skanda.6.117.14)
अथ तां स्वगृहं नीत्वा प्रोचतुः कामपीडितौ। भवावाभ्यां विशालाक्षि भार्या धर्मपरायणा। एतदर्थं समानीता त्वं पाताले महीतलात्
atha tāṁ svagṛhaṁ nītvā procatuḥ kāmapīḍitau bhavāvābhyāṁ viśālākṣi bhāryā dharmaparāyaṇā etadarthaṁ samānītā tvaṁ pātāle mahītalāt
फिर उसे अपने घर ले जाकर, काम से पीड़ित उन दोनों ने कहा — "हे विशालाक्षि! तुम हम दोनों की धर्मपरायण पत्नी बनो; इसी उद्देश्य से तुम्हें पाताल में पृथ्वीतल से लाया गया है।"
श्लोक 15 (skanda.6.117.15)
भट्टिकोवाच। यत्त्वं तक्षक मां शांतामनपेक्षां रतोत्सवे। आनैषीरपहृत्याशु ब्राह्मणान्वयसंभवाम्
bhaṭṭikovāca yattvaṁ takṣaka māṁ śāṁtāmanapekṣāṁ ratotsave ānaiṣīrapahṛtyāśu brāhmaṇānvayasaṁbhavām
भट्टिका ने कहा — हे तक्षक! रति-सुख की इच्छारहित, शांत और ब्राह्मण-कुल में उत्पन्न मुझे तुमने अपहरण करके शीघ्रता से यहाँ ला दिया...
श्लोक 16 (skanda.6.117.16)
मानुषं रूपमास्थाय पुरा मां त्वं समाश्रितः। कामोपहृतचित्तात्मा तस्मान्मर्त्यो भविष्यसि
mānuṣaṁ rūpamāsthāya purā māṁ tvaṁ samāśritaḥ kāmopahṛtacittātmā tasmānmartyo bhaviṣyasi
"...मनुष्य-रूप धारण करके पहले भी काम से हरे गए चित्त से मेरे पास आए थे; अतः अब तुम मर्त्य (मनुष्य) बन जाओगे।"
श्लोक 17 (skanda.6.117.17)
यदि मां त्वं दुराचार धर्षयिष्यसि वीर्यतः। शतधा तव मूर्धाऽयं सद्य एव भविष्यति
yadi māṁ tvaṁ durācāra dharṣayiṣyasi vīryataḥ śatadhā tava mūrdhā'yaṁ sadya eva bhaviṣyati
"हे दुराचारी! यदि तुमने बलपूर्वक मेरे साथ बलात्कार करने का प्रयास किया, तो तुम्हारा यह सिर इसी क्षण सौ टुकड़ों में विभक्त हो जाएगा।"
श्लोक 18 (skanda.6.117.18)
तं श्रुत्वा सुमहाशापं तस्याः स भयविह्वलः। ततः प्रसादयामास कृतांजलिपुटः स्थितः
taṁ śrutvā sumahāśāpaṁ tasyāḥ sa bhayavihvalaḥ tataḥ prasādayāmāsa kṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ
उसका वह अत्यंत भीषण शाप सुनकर, भय से विह्वल हुआ वह हाथ जोड़कर खड़ा होकर उसे मनाने लगा।
श्लोक 19 (skanda.6.117.19)
मया त्वं कामसक्तेन समानीता सुमोहतः। तस्मात्कुरु प्रसादं मे शापस्यांतो यथा भवेत्
mayā tvaṁ kāmasaktena samānītā sumohataḥ tasmātkuru prasādaṁ me śāpasyāṁto yathā bhavet
"कामासक्त होकर मैंने अत्यंत मोहवश तुम्हें यहाँ ला दिया; अतः मुझ पर कृपा करो, जिससे इस शाप का अंत हो सके।"
श्लोक 20 (skanda.6.117.20)
सूत उवाच। एवं प्रसादिता तेन तक्षकेण द्विजात्मजा। ततः प्रोवाच तं नागं बाष्पव्याकुललोचना
sūta uvāca evaṁ prasāditā tena takṣakeṇa dvijātmajā tataḥ provāca taṁ nāgaṁ bāṣpavyākulalocanā
सूत जी ने कहा — इस प्रकार तक्षक द्वारा मनाई गई वह ब्राह्मण-कन्या, आँसुओं से व्याकुल नेत्रों के साथ उस नाग से बोली।
श्लोक 21 (skanda.6.117.21)
यदि मां मर्त्यलोके त्वं भूयो न यसि तक्षक। तत्र शापस्य पर्यंतं करिष्यामि न संशयः
yadi māṁ martyaloke tvaṁ bhūyo na yasi takṣaka tatra śāpasya paryaṁtaṁ kariṣyāmi na saṁśayaḥ
"हे तक्षक! यदि तुम मुझे पुनः मर्त्यलोक में नहीं ले जाओगे, तो निःसंदेह मैं इस शाप का अंत कर दूँगी।"
श्लोक 22 (skanda.6.117.22)
एतस्मिन्नंतरे ज्ञात्वा मानुषीं स्वगृहागताम्। तक्षकेण समानीतां कामोपहतचेतसा
etasminnaṁtare jñātvā mānuṣīṁ svagṛhāgatām takṣakeṇa samānītāṁ kāmopahatacetasā
इसी बीच यह जानकर कि काम से पीड़ित चित्त वाले तक्षक द्वारा एक मानवी उनके घर लाई गई है...
श्लोक 23 (skanda.6.117.23)
ततस्तस्य कलत्राणि महेर्ष्यासंश्रितानि च। तस्या नाशार्थमाजग्मुः कोपरक्तेक्षणानि च
tatastasya kalatrāṇi maherṣyāsaṁśritāni ca tasyā nāśārthamājagmuḥ koparaktekṣaṇāni ca
...उसकी अन्य पत्नियाँ, अत्यंत ईर्ष्या से भरकर, क्रोध से लाल नेत्रों के साथ उसे नष्ट करने के लिए आ पहुँचीं।
श्लोक 24 (skanda.6.117.24)
अथ तासां परिज्ञाय तक्षकः स विचेष्टितम्। वाञ्छञ्छापस्य पर्यंतं तत्पार्श्वाद्भयसंयुतः
atha tāsāṁ parijñāya takṣakaḥ sa viceṣṭitam vāñchañchāpasya paryaṁtaṁ tatpārśvādbhayasaṁyutaḥ
फिर उनके इस मंतव्य को समझकर, शाप के अंत की कामना करते हुए तक्षक भय से युक्त होकर उसके पास से हट गया।
श्लोक 25 (skanda.6.117.25)
वज्रां नामास्मरद्विद्यां तस्या गात्रं ततस्तया। योजयामास रक्षार्थं प्राप्ता चाथ भुजंगमी
vajrāṁ nāmāsmaradvidyāṁ tasyā gātraṁ tatastayā yojayāmāsa rakṣārthaṁ prāptā cātha bhujaṁgamī
उसने वज्रा नामक विद्या का स्मरण किया, और उससे उसके शरीर की रक्षा की; तब तक एक नागिन वहाँ आ पहुँची।
श्लोक 26 (skanda.6.117.26)
अदशत्तां ततः क्रुद्धा ब्राह्मणस्य सुतां सतीम्। सपत्नीं मन्यमानोच्चैः शीर्णदंष्ट्रा व्यजायत
adaśattāṁ tataḥ kruddhā brāhmaṇasya sutāṁ satīm sapatnīṁ manyamānoccaiḥ śīrṇadaṁṣṭrā vyajāyata
उसे अपनी सौत मानकर, अत्यंत क्रुद्ध होकर उस नागिन ने उस सती ब्राह्मण-कन्या को डस लिया, और इस प्रकार उसके दाँत ही टूट गए।
श्लोक 27 (skanda.6.117.27)
अथ तामपि सा क्रुद्धा शशाप द्विजसंभवा। दृष्ट्वा सापत्न्यजैर्भावैर्वर्तमानां सहेर्ष्यया
atha tāmapi sā kruddhā śaśāpa dvijasaṁbhavā dṛṣṭvā sāpatnyajairbhāvairvartamānāṁ saherṣyayā
तब उस ब्राह्मण-कन्या ने भी, उसे सौत की ईर्ष्यायुक्त भावना से व्यवहार करते देखकर, क्रुद्ध होकर उसे भी शाप दे दिया।
श्लोक 28 (skanda.6.117.28)
यस्मात्त्वं दोषहीनां मां सदोषामिव मन्यसे। तस्माद्भव द्रुतं पापे मानुषी दुःखभागिनी
yasmāttvaṁ doṣahīnāṁ māṁ sadoṣāmiva manyase tasmādbhava drutaṁ pāpe mānuṣī duḥkhabhāginī
"चूँकि तू दोषरहित मुझे दोषयुक्त मानती है, अतः हे पापिनी! तू शीघ्र ही दुःख भोगने वाली मानवी बन जा।"
श्लोक 29 (skanda.6.117.29)
अथ तां संगृहीत्वा स तक्षको नागसत्तमः। केदारायतने तस्मिन्नर्धरात्रे मुमोच ह
atha tāṁ saṁgṛhītvā sa takṣako nāgasattamaḥ kedārāyatane tasminnardharātre mumoca ha
फिर उस श्रेष्ठ नाग तक्षक ने उसे लेकर, आधी रात को उस केदार-मंदिर में छोड़ दिया।
श्लोक 30 (skanda.6.117.30)
ततः प्रोवाच तां देवीं कृतांजलिपुटः स्थितः। शापांतं कुरु मे साध्वि स्वगृहं येन याम्यहम्
tataḥ provāca tāṁ devīṁ kṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ śāpāṁtaṁ kuru me sādhvi svagṛhaṁ yena yāmyaham
फिर हाथ जोड़कर खड़ा होकर वह उस साध्वी देवी से बोला — "हे साध्वी! मेरे शाप का अंत करो, जिससे मैं अपने घर जा सकूँ।"
श्लोक 31 (skanda.6.117.31)
भट्टिकोवाच। सौराष्ट्रविषये राजा त्वं भविष्यसि पन्नग। भूमौ रैवतको नाम भोगानां भाजनं सदा
bhaṭṭikovāca saurāṣṭraviṣaye rājā tvaṁ bhaviṣyasi pannaga bhūmau raivatako nāma bhogānāṁ bhājanaṁ sadā
भट्टिका ने कहा — हे नाग! तुम सौराष्ट्र देश में रैवतक नाम से राजा बनोगे, इस पृथ्वी पर सदा भोगों के भागी रहोगे।
श्लोक 32 (skanda.6.117.32)
ततश्चैव तनुं त्यक्त्वा क्षेत्रेष्वाश्रममध्यतः। संप्राप्स्यसि निजं स्थानं तत्क्षेत्रस्य प्रभावतः
tataścaiva tanuṁ tyaktvā kṣetreṣvāśramamadhyataḥ saṁprāpsyasi nijaṁ sthānaṁ tatkṣetrasya prabhāvataḥ
"फिर उस तीर्थ-क्षेत्र में किसी आश्रम के मध्य अपने शरीर को त्यागकर, उस क्षेत्र के ही प्रभाव से तुम अपने वास्तविक स्थान को प्राप्त हो जाओगे।"
श्लोक 33 (skanda.6.117.33)
तक्षक उवाच। एषा मम प्रिया कांता त्वया शापेन योजिता। या सा भवतु मे भार्या मानुषत्वेऽपि वर्तिते
takṣaka uvāca eṣā mama priyā kāṁtā tvayā śāpena yojitā yā sā bhavatu me bhāryā mānuṣatve'pi vartite
तक्षक ने कहा — तुम्हारे शाप से जिससे युक्त हुई यह मेरी प्रिया, मनुष्य-रूप में रहते हुए भी मेरी ही पत्नी बनी रहे।
श्लोक 34 (skanda.6.117.34)
एतत्कुरु प्रसादं मे दीनस्य परियाचतः। माऽस्या भवतु चान्येन पुरुषेण समागमः
etatkuru prasādaṁ me dīnasya pariyācataḥ mā'syā bhavatu cānyena puruṣeṇa samāgamaḥ
"दीन होकर बार-बार याचना करने वाले मुझ पर यह कृपा करो — इसका किसी अन्य पुरुष से समागम कभी न हो।"
श्लोक 35 (skanda.6.117.35)
भट्टिकोवाच। आनर्ताधिपतेरेषा भवित्री दुहिता शुभा। ततः पाणिग्रहं प्राप्य भार्या तव भविष्यति
bhaṭṭikovāca ānartādhipatereṣā bhavitrī duhitā śubhā tataḥ pāṇigrahaṁ prāpya bhāryā tava bhaviṣyati
भट्टिका ने कहा — यह शुभा अनर्ताधिपति की पुत्री बनेगी, और फिर विवाह करके तुम्हारी पत्नी बन जाएगी।
श्लोक 36 (skanda.6.117.36)
क्षेमंकरीति विख्याता रूपयौवनशालिनी। त्वया सार्धं बहून्भोगान्भुक्त्वाऽथ पृथिवीतले। परलोके पुनस्त्वां वै चानुयास्यति शोभना
kṣemaṁkarīti vikhyātā rūpayauvanaśālinī tvayā sārdhaṁ bahūnbhogānbhuktvā'tha pṛthivītale paraloke punastvāṁ vai cānuyāsyati śobhanā
क्षेमंकरी नाम से विख्यात, रूप-यौवन से संपन्न वह सुंदरी, पृथ्वी पर तुम्हारे साथ अनेक भोगों को भोगकर, परलोक में भी पुनः तुम्हारा अनुसरण करेगी।
श्लोक 37 (skanda.6.117.37)
सूत उवाच। एवं च स तया प्रोक्तः क्षम्यतामिति सादरम्। प्रणिपत्य जगामाऽथ निजं स्थानं प्रहर्षितः
sūta uvāca evaṁ ca sa tayā proktaḥ kṣamyatāmiti sādaram praṇipatya jagāmā'tha nijaṁ sthānaṁ praharṣitaḥ
सूत जी ने कहा — इस प्रकार उससे कहे जाने पर, वह "क्षमा किया जाए" कहकर आदरपूर्वक प्रणाम करके, अत्यंत हर्षित होकर अपने स्थान को चला गया।
श्लोक 38 (skanda.6.117.38)
साऽपि प्राप्ते निशाशेषे केदारस्य पुरः स्थिता। पुनश्चक्रे च तद्गीतं श्रुतिसौख्यकरं परम्
sā'pi prāpte niśāśeṣe kedārasya puraḥ sthitā punaścakre ca tadgītaṁ śrutisaukhyakaraṁ param
वह भी रात्रि के शेष भाग के आने पर केदार के सामने खड़ी होकर, कानों को अत्यंत सुख देने वाला वही गीत पुनः गाने लगी।
श्लोक 39 (skanda.6.117.39)
अथ तस्य समायाताः केदारस्य दिदृक्षवः। पुनः केदारभक्त्याढ्या ब्राह्मणाः शतशः परम्
atha tasya samāyātāḥ kedārasya didṛkṣavaḥ punaḥ kedārabhaktyāḍhyā brāhmaṇāḥ śataśaḥ param
तब केदार का दर्शन करने की इच्छा से, केदार-भक्ति से परिपूर्ण सैकड़ों ब्राह्मण पुनः वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 40 (skanda.6.117.40)
ते तां दृष्ट्वा समायातां भट्टिंकां तां द्विजोद्भवाम्। विस्मयेन समायुक्ताः पप्रच्छुस्तदनंतरम्
te tāṁ dṛṣṭvā samāyātāṁ bhaṭṭiṁkāṁ tāṁ dvijodbhavām vismayena samāyuktāḥ papracchustadanaṁtaram
उन्होंने उस ब्राह्मण-कन्या भट्टिका को वहाँ उपस्थित देखकर, आश्चर्यचकित होकर उससे पूछा।
श्लोक 41 (skanda.6.117.41)
कोऽसौ ब्राह्मणरूपेण नागः प्राप्तः सुशोभने। तेन त्वं कुत्र नीतासि किमर्थं च वदस्व नः
ko'sau brāhmaṇarūpeṇa nāgaḥ prāptaḥ suśobhane tena tvaṁ kutra nītāsi kimarthaṁ ca vadasva naḥ
"हे सुशोभने! ब्राह्मण-रूप धारण करके आया वह नाग कौन था? वह तुम्हें कहाँ ले गया और किसलिए, यह हमें बताओ।"
श्लोक 42 (skanda.6.117.42)
कस्मात्पुनः प्रमुक्ताऽसि सर्वं वद यथातथम्। अत्र नः कौतुकं जातं सुमहत्तव कारणात्
kasmātpunaḥ pramuktā'si sarvaṁ vada yathātatham atra naḥ kautukaṁ jātaṁ sumahattava kāraṇāt
"फिर किस कारण से तुम मुक्त हुई? सब कुछ यथार्थ रूप से बताओ — तुम्हारे कारण हमें इस विषय में अत्यंत कौतूहल हुआ है।"
श्लोक 43 (skanda.6.117.43)
सूत उवाच। ततः सा कथयामास सर्वं तक्षकसंभवम्। वृत्तांतं नागसंभूतं शापानुग्रहजं तथा
sūta uvāca tataḥ sā kathayāmāsa sarvaṁ takṣakasaṁbhavam vṛttāṁtaṁ nāgasaṁbhūtaṁ śāpānugrahajaṁ tathā
सूत जी ने कहा — तब उसने तक्षक से संबंधित संपूर्ण वृत्तांत, नाग से उत्पन्न घटना, तथा शाप और वरदान से उत्पन्न सारी बातें कह सुनाईं।
श्लोक 44 (skanda.6.117.44)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्तं सर्वं तस्याः कुटुम्बकम्। रोरूयमाणं दुःखार्तं श्रुत्वा तां तत्र चागताम्
etasminnaṁtare prāptaṁ sarvaṁ tasyāḥ kuṭumbakam rorūyamāṇaṁ duḥkhārtaṁ śrutvā tāṁ tatra cāgatām
इसी बीच उसका संपूर्ण परिवार भी, उसके वहाँ आने का समाचार सुनकर, रोता-बिलखता, दुःखार्त होकर वहाँ आ पहुँचा।
श्लोक 45 (skanda.6.117.45)
अथ सा जननी तस्या वाष्पपर्याकुलेक्षणा। सस्वजे तां तथा चान्याः सख्यः स्निग्धेन चेतसा
atha sā jananī tasyā vāṣpaparyākulekṣaṇā sasvaje tāṁ tathā cānyāḥ sakhyaḥ snigdhena cetasā
तब आँसुओं से व्याकुल नेत्रों वाली उसकी माता ने उसे गले लगाया, और वैसे ही स्नेहयुक्त हृदय से उसकी अन्य सखियों ने भी।
श्लोक 46 (skanda.6.117.46)
ततो निन्युर्गृहं स्वं च शृण्वंतश्च मुहुर्मुहुः। नागलोकोद्भवां वार्तां विस्मयाविष्टचेतसः
tato ninyurgṛhaṁ svaṁ ca śṛṇvaṁtaśca muhurmuhuḥ nāgalokodbhavāṁ vārtāṁ vismayāviṣṭacetasaḥ
फिर नागलोक से संबंधित उस कथा को बार-बार सुनते हुए, आश्चर्य से भरे मन के साथ वे उसे अपने घर ले गए।
श्लोक 47 (skanda.6.117.47)
अथ तत्र पुरे पौराः सर्वे प्रोचुः परस्परम्। अयुक्तं कृतमेतेन ब्राह्मणेन दुरात्मना
atha tatra pure paurāḥ sarve procuḥ parasparam ayuktaṁ kṛtametena brāhmaṇena durātmanā
तब उस नगर के सभी नागरिकों ने आपस में कहना शुरू किया — "इस दुरात्मा ब्राह्मण ने अनुचित कार्य किया है।"
श्लोक 48 (skanda.6.117.48)
यदानीता सुतरुणी परहर्म्योषिता तया। अन्येषामपि विप्राणां संति नार्यो ह्यनेकशः
yadānītā sutaruṇī paraharmyoṣitā tayā anyeṣāmapi viprāṇāṁ saṁti nāryo hyanekaśaḥ
"क्योंकि उसने इस युवती को घर में रख लिया है, जो पराए घर में रह चुकी थी; अन्य ब्राह्मणों की भी ऐसी अनेक स्त्रियाँ हैं..."
श्लोक 49 (skanda.6.117.49)
तरुण्यो रूपवत्यश्च वैधव्येन समन्विताः। तासामपि च सर्वासामेष न्यायो भविष्यति। योनिसंकरजो नूनं तस्मान्निर्वास्यतामिति
taruṇyo rūpavatyaśca vaidhavyena samanvitāḥ tāsāmapi ca sarvāsāmeṣa nyāyo bhaviṣyati yonisaṁkarajo nūnaṁ tasmānnirvāsyatāmiti
"...युवा, रूपवती और विधवा — उन सबके लिए भी यही नियम बन जाएगा; यह निश्चय ही मिश्रित-योनि से उत्पन्न है, अतः इसे निर्वासित कर दिया जाए।"
श्लोक 50 (skanda.6.117.50)
एकीभूय ततः सर्वे ब्राह्मणं तं द्विजोत्तमाः। सामपूर्वमिदं वाक्यं प्रोचुः शास्त्रसमुद्भवम्
ekībhūya tataḥ sarve brāhmaṇaṁ taṁ dvijottamāḥ sāmapūrvamidaṁ vākyaṁ procuḥ śāstrasamudbhavam
तब वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण एकत्र होकर, उस ब्राह्मण से सांत्वनापूर्वक शास्त्र-संगत यह वचन बोले।
श्लोक 51 (skanda.6.117.51)
एषा तव सुता विप्र तरुणी रूपसंयुता। सानुरागेण नागेण पाताले च समाहृता
eṣā tava sutā vipra taruṇī rūpasaṁyutā sānurāgeṇa nāgeṇa pātāle ca samāhṛtā
"हे विप्र! तुम्हारी यह युवा, रूपवती पुत्री एक अनुरागी नाग द्वारा पाताल में ले जाई गई थी।"
श्लोक 52 (skanda.6.117.52)
तद्वक्ष्यति प्रमुक्ताहं निर्दोषा तेन रागिणा। न श्रद्धां याति लोकोऽयं शुद्धैषा समुदाहृता
tadvakṣyati pramuktāhaṁ nirdoṣā tena rāgiṇā na śraddhāṁ yāti loko'yaṁ śuddhaiṣā samudāhṛtā
"वह कहेगी कि 'मैं उस अनुरागी के द्वारा निर्दोष होकर ही छोड़ी गई हूँ', किंतु यह लोक इतने मात्र से विश्वास नहीं करेगा — इसे प्रमाणपूर्वक शुद्ध घोषित करना होगा।"
श्लोक 53 (skanda.6.117.53)
तस्माच्छुद्धिं द्विजेंद्राणां प्रयच्छतु द्विजोत्तम। येनान्येषामपि प्राज्ञ विनश्यंति न योषितः
tasmācchuddhiṁ dvijeṁdrāṇāṁ prayacchatu dvijottama yenānyeṣāmapi prājña vinaśyaṁti na yoṣitaḥ
"अतः हे द्विजोत्तम! वह श्रेष्ठ ब्राह्मणों के सामने अपनी शुद्धि सिद्ध करे, जिससे हे प्राज्ञ! अन्य लोगों की स्त्रियाँ भी (इस बहाने से) पथभ्रष्ट न हों।"
श्लोक 54 (skanda.6.117.54)
बाढमित्येव स प्रोक्त्वा ततस्तां विजने सुताम्। पप्रच्छ यदि ते दोषः कश्चिदस्ति प्रकीर्तय
bāḍhamityeva sa proktvā tatastāṁ vijane sutām papraccha yadi te doṣaḥ kaścidasti prakīrtaya
"ऐसा ही होगा" कहकर, उसने फिर एकांत में अपनी पुत्री से पूछा — "यदि तुझमें कोई दोष हो, तो बता दे।"
श्लोक 55 (skanda.6.117.55)
नो चेत्प्रयच्छ संशुद्धिं ब्राह्मणानां प्रतुष्टये
no cetprayaccha saṁśuddhiṁ brāhmaṇānāṁ pratuṣṭaye
"अन्यथा, ब्राह्मणों की संतुष्टि के लिए अपनी शुद्धि प्रमाणित कर दे।"
श्लोक 56 (skanda.6.117.56)
भट्टिकोवाच। युक्तमुक्तं त्वया तात तथान्यैरपि च द्विजैः। युक्ता स्याद्योषितः शुद्धिर्द्वारातिक्रमणादपि
bhaṭṭikovāca yuktamuktaṁ tvayā tāta tathānyairapi ca dvijaiḥ yuktā syādyoṣitaḥ śuddhirdvārātikramaṇādapi
भट्टिका ने कहा — हे तात! आपने और अन्य द्विजों ने भी उचित ही कहा है; स्त्री की शुद्धि तो केवल द्वार लाँघने मात्र से भी आवश्यक हो जाती है।
श्लोक 57 (skanda.6.117.57)
किं पुनः परदेशं च गताया रागिणा सह। तस्मादहं न संदेहः प्रातः स्नाता हुताशनम्
kiṁ punaḥ paradeśaṁ ca gatāyā rāgiṇā saha tasmādahaṁ na saṁdehaḥ prātaḥ snātā hutāśanam
"फिर जो किसी अनुरागी के साथ परदेश गई हो, उसके लिए तो कहना ही क्या! अतः मैं प्रातःकाल स्नान करके, निःसंदेह अग्नि में..."
श्लोक 58 (skanda.6.117.58)
प्रविश्य सर्वविप्राणां शुद्धिं दास्याम्यसंशयम्। अहमत्र च पानं च यच्चान्यदपि किंचन। प्राशयिष्यामि संप्राप्य शुद्धिं चैव हुताशनात्
praviśya sarvaviprāṇāṁ śuddhiṁ dāsyāmyasaṁśayam ahamatra ca pānaṁ ca yaccānyadapi kiṁcana prāśayiṣyāmi saṁprāpya śuddhiṁ caiva hutāśanāt
"...प्रवेश करके सभी ब्राह्मणों को अपनी शुद्धि का प्रमाण दूँगी; और अग्नि से शुद्धि प्राप्त करके मैं यहाँ पान तथा जो कुछ भी अन्य हो, ग्रहण करूँगी।"
श्लोक 59 (skanda.6.117.59)
एवमुक्तस्तया सोऽथ हर्षेण महतान्वितः। प्रातरुत्थाय दारूणि पुरबाह्ये न्ययोजयत्
evamuktastayā so'tha harṣeṇa mahatānvitaḥ prātarutthāya dārūṇi purabāhye nyayojayat
उसके इस प्रकार कहने पर, वह अत्यंत हर्षित होकर, प्रातःकाल उठकर नगर के बाहर काष्ठ (चिता की लकड़ियाँ) व्यवस्थित करवाने लगा।
श्लोक 60 (skanda.6.117.60)
भट्टिकाऽपि ततः स्नात्वा शुक्लांबरधरा शुचिः। सर्वैः परिजनैः सार्धं तथा निजकुटुंबकैः
bhaṭṭikā'pi tataḥ snātvā śuklāṁbaradharā śuciḥ sarvaiḥ parijanaiḥ sārdhaṁ tathā nijakuṭuṁbakaiḥ
भट्टिका भी स्नान करके, शुभ्र वस्त्र धारण करके, पवित्र होकर, अपने सभी परिजनों और कुटुंबियों के साथ...
श्लोक 61 (skanda.6.117.61)
प्रसन्नवदना हृष्टा विष्णुध्यानपरायणा। जगाम तत्र यत्रास्ते सुमहान्दारुपर्वतः
prasannavadanā hṛṣṭā viṣṇudhyānaparāyaṇā jagāma tatra yatrāste sumahāndāruparvataḥ
...प्रसन्न मुख वाली, हर्षित, विष्णु के ध्यान में परायण होकर उस स्थान पर गई, जहाँ काष्ठ का वह विशाल पर्वत रखा था।
श्लोक 62 (skanda.6.117.62)
ततो वह्निं समाधाय स्वयं तत्र द्विजोत्तमाः। प्रदक्षिणात्रयं कृत्वा प्राह चैव कृतांजलिः
tato vahniṁ samādhāya svayaṁ tatra dvijottamāḥ pradakṣiṇātrayaṁ kṛtvā prāha caiva kṛtāṁjaliḥ
हे द्विजोत्तमो! फिर स्वयं वहाँ अग्नि प्रज्वलित करके, उसकी तीन बार प्रदक्षिणा करके, हाथ जोड़कर उसने कहा।
श्लोक 63 (skanda.6.117.63)
यदि मेऽस्ति क्वचिद्दोषः कामजोऽल्पोऽपि गात्रके। कृतो वाऽपि बलात्तेन तक्षकेण दुरात्मना
yadi me'sti kvaciddoṣaḥ kāmajo'lpo'pi gātrake kṛto vā'pi balāttena takṣakeṇa durātmanā
"यदि मेरे शरीर में काम से उत्पन्न कोई भी दोष हो, चाहे कितना भी अल्प हो, अथवा उस दुरात्मा तक्षक ने बलपूर्वक कोई कृत्य किया हो..."
श्लोक 64 (skanda.6.117.64)
अन्येनापि च केनापि भविष्यत्यथवा परः। तस्मात्प्रदहतु क्षिप्रं समिद्धोऽयं हुताशनः
anyenāpi ca kenāpi bhaviṣyatyathavā paraḥ tasmātpradahatu kṣipraṁ samiddho'yaṁ hutāśanaḥ
"...अथवा किसी और के द्वारा भी हुआ हो — तो यह प्रज्वलित अग्नि मुझे शीघ्र ही भस्म कर दे।"
श्लोक 65 (skanda.6.117.65)
एवमुक्त्वाऽथ सा साध्वी प्रविष्टा निजहर्म्यवत्। सुसमिद्धो हुतो वह्निर्जातो जलमयः क्षणात्
evamuktvā'tha sā sādhvī praviṣṭā nijaharmyavat susamiddho huto vahnirjāto jalamayaḥ kṣaṇāt
ऐसा कहकर वह साध्वी उसमें इस प्रकार प्रविष्ट हुई मानो अपने ही घर में हो; और वह भलीभाँति प्रज्वलित अग्नि क्षणभर में जल-रूप हो गई।
श्लोक 66 (skanda.6.117.66)
सा च पश्यति चात्मानं जलमध्यगतां शुभा। पपाताऽथ महावृष्टिः कुसुमानां नभस्तलात्
sā ca paśyati cātmānaṁ jalamadhyagatāṁ śubhā papātā'tha mahāvṛṣṭiḥ kusumānāṁ nabhastalāt
उस शुभा ने स्वयं को जल के मध्य में खड़ा हुआ देखा; और तब आकाश से पुष्पों की महावृष्टि होने लगी।
श्लोक 67 (skanda.6.117.67)
देवदूतो विमानस्थ इदं वाक्यमुवाच ह। शुद्धासि त्वं महाभागे चारित्रैर्निजगात्रजैः
devadūto vimānastha idaṁ vākyamuvāca ha śuddhāsi tvaṁ mahābhāge cāritrairnijagātrajaiḥ
विमान में स्थित एक देवदूत ने यह वचन कहा — "हे महाभागे! तुम अपने ही शरीर से संबंधित आचरणों में शुद्ध हो।"
श्लोक 68 (skanda.6.117.68)
न त्वया सदृशी चान्या काचिन्नारी भविष्यति। तिस्रः कोट्योर्धकोटी च यानि लोमानि मानुषे। प्रभवंति महाभागे सर्वगात्रेषु सर्वदा
na tvayā sadṛśī cānyā kācinnārī bhaviṣyati tisraḥ koṭyordhakoṭī ca yāni lomāni mānuṣe prabhavaṁti mahābhāge sarvagātreṣu sarvadā
"तुम्हारे समान कोई अन्य स्त्री नहीं होगी। हे महाभागे! मनुष्य के संपूर्ण शरीर पर सदा उत्पन्न होने वाले साढ़े तीन करोड़ रोमों में से..."
श्लोक 69 (skanda.6.117.69)
तेषां मध्ये न ते साध्वि पापमेकमपि क्वचित्। तस्माच्छीघ्रं ग्रहं गच्छ निजं बांधवसंयुता
teṣāṁ madhye na te sādhvi pāpamekamapi kvacit tasmācchīghraṁ grahaṁ gaccha nijaṁ bāṁdhavasaṁyutā
"...हे साध्वी! उनमें से किसी एक में भी तुझमें पाप नहीं है। अतः अब शीघ्र अपने बंधुजनों सहित अपने घर जाओ।"
श्लोक 70 (skanda.6.117.70)
कुरु कृत्यानि पुण्यानि समाराधय केशवम्। एतच्चैव चितेः स्थानं त्वदीयं जलपूरितम्
kuru kṛtyāni puṇyāni samārādhaya keśavam etaccaiva citeḥ sthānaṁ tvadīyaṁ jalapūritam
"पुण्यकर्म करो, केशव की भलीभाँति आराधना करो; और यह जल से भरा हुआ चिता का स्थान अब तुम्हारा ही हो जाए।"
श्लोक 71 (skanda.6.117.71)
तव नाम्ना सुविख्यातं तीर्थं लोके भविष्यति। येऽत्र स्नानं करिष्यंति शयने बोधने हरेः
tava nāmnā suvikhyātaṁ tīrthaṁ loke bhaviṣyati ye'tra snānaṁ kariṣyaṁti śayane bodhane hareḥ
"यह तुम्हारे ही नाम से लोक में सुविख्यात तीर्थ बनेगा। जो कोई हरि के शयन अथवा प्रबोधन के समय यहाँ स्नान करेगा..."
श्लोक 72 (skanda.6.117.72)
ते यास्यंति परां सिद्धिं दुष्प्राप्या याऽमरैरपि। उक्त्वैवं विरता वाणी देवदूतसमुद्भवा
te yāsyaṁti parāṁ siddhiṁ duṣprāpyā yā'marairapi uktvaivaṁ viratā vāṇī devadūtasamudbhavā
"...वह उस परम सिद्धि को प्राप्त करेगा, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।" ऐसा कहकर वह देवदूत से उत्पन्न वाणी मौन हो गई।
श्लोक 73 (skanda.6.117.73)
भट्टिका तु ततो हृष्टा प्रणम्य जनकं निजम्। नाहं गृहं गमिष्यामि किं करिष्याम्यहं गृहे
bhaṭṭikā tu tato hṛṣṭā praṇamya janakaṁ nijam nāhaṁ gṛhaṁ gamiṣyāmi kiṁ kariṣyāmyahaṁ gṛhe
तब भट्टिका ने प्रसन्न होकर, अपने पिता को प्रणाम करके कहा — "मैं घर नहीं जाऊँगी; मैं घर जाकर क्या करूँगी?"
श्लोक 74 (skanda.6.117.74)
अत्रैवाराधयिष्यामि निजतीर्थे सदाऽच्युतम्। तथा तपः करिष्यामि भिक्षान्नकृतभोजना
atraivārādhayiṣyāmi nijatīrthe sadā'cyutam tathā tapaḥ kariṣyāmi bhikṣānnakṛtabhojanā
"यहीं, अपने इस तीर्थ में, मैं सदा अच्युत की आराधना करूँगी, और भिक्षा के अन्न से भोजन करते हुए तपस्या करूँगी।"
श्लोक 75 (skanda.6.117.75)
तस्मात्तात गृहं गच्छ स्थिताऽहं चाग्रसंश्रये
tasmāttāta gṛhaṁ gaccha sthitā'haṁ cāgrasaṁśraye
"अतः हे तात! आप घर जाइए; मैं इसी प्रमुख आश्रय-स्थल में रहूँगी।"
श्लोक 76 (skanda.6.117.76)
ततः स जनकस्तस्यास्ते वाऽपि पुरवासिनः। संप्रहृष्टा गृहं जग्मुः शंसतस्तां पृथक्पृथक्
tataḥ sa janakastasyāste vā'pi puravāsinaḥ saṁprahṛṣṭā gṛhaṁ jagmuḥ śaṁsatastāṁ pṛthakpṛthak
तब उसका पिता तथा नगरवासी भी अत्यंत हर्षित होकर, अलग-अलग उसकी प्रशंसा करते हुए अपने-अपने घर लौट गए।
श्लोक 77 (skanda.6.117.77)
तया त्रैविक्रमी तत्र प्रतिमा प्राग्विनिर्मिता। पश्चान्माहेश्वरं लिंगं कृत्वा प्रासादमुत्तमम्
tayā traivikramī tatra pratimā prāgvinirmitā paścānmāheśvaraṁ liṁgaṁ kṛtvā prāsādamuttamam
उसके द्वारा वहाँ पहले त्रैविक्रम (विष्णु) की प्रतिमा स्थापित की गई, और बाद में माहेश्वर लिंग की स्थापना करके एक उत्तम मंदिर बनवाया गया।
श्लोक 78 (skanda.6.117.78)
ततः परं तपश्चक्रे भिक्षान्नकृतभोजना। शस्यमाना जनैः सर्वैश्चमत्कारपुरोद्भवैः
tataḥ paraṁ tapaścakre bhikṣānnakṛtabhojanā śasyamānā janaiḥ sarvaiścamatkārapurodbhavaiḥ
उसके पश्चात् वह भिक्षा के अन्न से भोजन करते हुए तपस्या करती रही, चमत्कारपुर के समस्त जनों द्वारा प्रशंसित होती हुई।
श्लोक 79 (skanda.6.117.79)
सूत उवाच। एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि द्विजोत्तमाः। यथा तस्या दृढं कायमभेद्यं संस्थितं सदा
sūta uvāca etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi dvijottamāḥ yathā tasyā dṛḍhaṁ kāyamabhedyaṁ saṁsthitaṁ sadā
सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो! जो आपने पूछा था, वह सब मैंने बता दिया — किस प्रकार उसका शरीर सदा दृढ़ और अभेद्य बना रहा।
श्लोक 80 (skanda.6.117.80)
सर्पाणां च तथाऽन्येषां शस्त्रादीनामपि द्विजाः। यश्चैतत्पठते नित्यं भट्टिकाख्यानमुत्तमम्। नापवादो भवेत्तस्य कुकृतो द्विजसत्तमाः
sarpāṇāṁ ca tathā'nyeṣāṁ śastrādīnāmapi dvijāḥ yaścaitatpaṭhate nityaṁ bhaṭṭikākhyānamuttamam nāpavādo bhavettasya kukṛto dvijasattamāḥ
हे द्विजो! सर्पों के तथा अन्य शस्त्रों के प्रति भी अभेद्य। हे द्विजसत्तमो! जो कोई इस उत्तम भट्टिका-आख्यान का नित्य पाठ करता है, उस पर कभी दुष्कृत्य का मिथ्या दोषारोपण नहीं होता।