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नागर खण्ड · अध्याय 118

क्षेमंकरी-रैवतेश्वर-तीर्थ-उत्पत्ति-माहात्म्य-वर्णन

अध्याय 117अध्याय-सूचीअध्याय 119

श्लोक 1 (skanda.6.118.1)

ऋषय ऊचुः। यत्त्वया सूतज प्रोक्तं तक्षकः संभविष्यति। सौराष्ट्रविषये राजा रैवताख्यो महाबलः

ṛṣaya ūcuḥ yattvayā sūtaja proktaṁ takṣakaḥ saṁbhaviṣyati saurāṣṭraviṣaye rājā raivatākhyo mahābalaḥ

ऋषियों ने कहा — हे सूतज! आपने बताया कि तक्षक सौराष्ट्र देश में रैवत नामक महाबली राजा बनेगा।

श्लोक 2 (skanda.6.118.2)

तथा तस्य प्रिया भार्या नाम्ना क्षेमंकरीति या। आनर्ताधिपतेर्हर्म्ये संभविष्यति भामिनी

tathā tasya priyā bhāryā nāmnā kṣemaṁkarīti yā ānartādhipaterharmye saṁbhaviṣyati bhāminī

और उसकी प्रिय पत्नी क्षेमंकरी नाम की वह सुंदरी अनर्ताधिपति के भवन में जन्म लेगी।

श्लोक 3 (skanda.6.118.3)

ताभ्यां सर्वं समाचक्ष्व वृत्तांतं सूतनंदन। अत्र नः कौतुकं जातं विचित्रं जल्पतस्तव

tābhyāṁ sarvaṁ samācakṣva vṛttāṁtaṁ sūtanaṁdana atra naḥ kautukaṁ jātaṁ vicitraṁ jalpatastava

हे सूतनंदन! उन दोनों के विषय में सारा वृत्तांत हमें बताइए; आपकी विचित्र बातें सुनकर हमें बड़ा कौतूहल हो रहा है।

श्लोक 4 (skanda.6.118.4)

केदारश्च श्रुतोऽस्माभिः सूतपुत्र हिमाचले। स कथं तत्र संजातः सर्वं विस्तरतो वद

kedāraśca śruto'smābhiḥ sūtaputra himācale sa kathaṁ tatra saṁjātaḥ sarvaṁ vistarato vada

हे सूतपुत्र! केदार का नाम हमने हिमाचल में सुना था; वे यहाँ कैसे उत्पन्न हुए? यह सब विस्तार से बताइए।

श्लोक 5 (skanda.6.118.5)

सूत उवाच। अत्र वः कीर्तयिष्यामि सर्वं ब्राह्मणसत्तमाः। यथा मया श्रुतं पूर्वं निजतातमुखाद्द्विजाः

sūta uvāca atra vaḥ kīrtayiṣyāmi sarvaṁ brāhmaṇasattamāḥ yathā mayā śrutaṁ pūrvaṁ nijatātamukhāddvijāḥ

सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! हे द्विजो! जैसा मैंने पहले अपने पिता के मुख से सुना था, वह सब मैं यहाँ आपको बताऊँगा।

श्लोक 6 (skanda.6.118.6)

पूर्वं तच्छापदोषेण तक्षको धरणीतले। सौराष्ट्राधिपतेर्हर्म्ये रैवताख्यो बभूव ह

pūrvaṁ tacchāpadoṣeṇa takṣako dharaṇītale saurāṣṭrādhipaterharmye raivatākhyo babhūva ha

पहले उस शाप के प्रभाव से तक्षक इस पृथ्वी पर सौराष्ट्राधिपति के भवन में रैवत नाम से उत्पन्न हुआ।

श्लोक 7 (skanda.6.118.7)

आनर्त्ताधिपतेश्चापि संजाता तनया गृहे। तस्याश्चापि सुविख्यातं नाम जातं धरातले

ānarttādhipateścāpi saṁjātā tanayā gṛhe tasyāścāpi suvikhyātaṁ nāma jātaṁ dharātale

अनर्ताधिपति के घर में भी एक पुत्री उत्पन्न हुई, और उसका भी इस पृथ्वी पर एक सुविख्यात नाम हुआ।

श्लोक 8 (skanda.6.118.8)

क्षेमंकरीति विप्रेन्द्राः कर्मणा प्रकटीकृतम्। आनर्ताधिपतिः पूर्वमासीद्राजा प्रभंजनः

kṣemaṁkarīti viprendrāḥ karmaṇā prakaṭīkṛtam ānartādhipatiḥ pūrvamāsīdrājā prabhaṁjanaḥ

हे विप्रेंद्रो! 'क्षेमंकरी' — यह नाम उसके कर्मों से ही प्रकट हुआ। पहले अनर्त का अधिपति प्रभंजन नामक राजा था।

श्लोक 9 (skanda.6.118.9)

तस्य वैरं समुत्पन्नं बहुभिः सह भूमिपैः। ततो निर्वास्यते देशो नीयते पशवो बलात्। शत्रुभिर्जायते युद्धं दिवा नक्तं द्विजोत्तमाः

tasya vairaṁ samutpannaṁ bahubhiḥ saha bhūmipaiḥ tato nirvāsyate deśo nīyate paśavo balāt śatrubhirjāyate yuddhaṁ divā naktaṁ dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो! अनेक राजाओं के साथ उसका वैर उत्पन्न हो गया, जिससे देश उजड़ने लगा, पशु बलपूर्वक ले जाए जाने लगे, और शत्रुओं के साथ दिन-रात युद्ध होने लगा।

श्लोक 10 (skanda.6.118.10)

ततः कतिपयाहस्य तस्य भार्या प्रियंवदा। ऋतुस्नाता दधाराथ गर्भं पुण्यं निजोदरे

tataḥ katipayāhasya tasya bhāryā priyaṁvadā ṛtusnātā dadhārātha garbhaṁ puṇyaṁ nijodare

फिर कुछ दिनों बाद उसकी मधुरभाषिणी पत्नी ने ऋतुस्नान करके अपने उदर में एक पुण्यमय गर्भ धारण किया।

श्लोक 11 (skanda.6.118.11)

यतः प्रभृति तस्याः स गर्भोऽभूदुदराश्रयः। ततः प्रभृति राष्ट्रस्य क्षेमं जातं तथा पुरे

yataḥ prabhṛti tasyāḥ sa garbho'bhūdudarāśrayaḥ tataḥ prabhṛti rāṣṭrasya kṣemaṁ jātaṁ tathā pure

जब से वह गर्भ उसके उदर में स्थित हुआ, तभी से राष्ट्र और नगर दोनों में कल्याण होने लगा।

श्लोक 12 (skanda.6.118.12)

एके संख्ये जिताः स्तेन शत्रवोऽपि सुदुर्जयाः। निहताश्च तथैवान्ये मित्रभावं समाश्रिताः

eke saṁkhye jitāḥ stena śatravo'pi sudurjayāḥ nihatāśca tathaivānye mitrabhāvaṁ samāśritāḥ

कुछ अत्यंत दुर्जय शत्रु भी उसके द्वारा युद्ध में जीत लिए गए, कुछ मार डाले गए, और कुछ अन्य मित्रता को प्राप्त हो गए।

श्लोक 13 (skanda.6.118.13)

ततो जज्ञे शुभा कन्या तस्याः पद्मायतेक्षणा। अंधकारेऽपि यद्रात्र्यां द्योतितं सूतिकागृहम्

tato jajñe śubhā kanyā tasyāḥ padmāyatekṣaṇā aṁdhakāre'pi yadrātryāṁ dyotitaṁ sūtikāgṛham

फिर उसके एक शुभ, कमल के समान विशाल नेत्रों वाली कन्या उत्पन्न हुई, जिसकी दीप्ति से अंधकारमय रात्रि में भी सूतिका-गृह प्रकाशित हो उठा।

श्लोक 14 (skanda.6.118.14)

अथाऽसौ पार्थिवश्चक्रे सुतवत्सुमहोत्सवम्। तस्यास्तोषसमायुक्तो गीतवाद्यादिनिस्वनैः

athā'sau pārthivaścakre sutavatsumahotsavam tasyāstoṣasamāyukto gītavādyādinisvanaiḥ

तब उस राजा ने प्रसन्न होकर, गीत-वाद्य आदि की ध्वनियों से युक्त, उसके लिए पुत्र के समान महान उत्सव मनाया।

श्लोक 15 (skanda.6.118.15)

दिने त्रयोदशे प्राप्ते नाम तस्या यथोचितम्। विहितं भूभुजा तेन विप्राणां पुरतो द्विजाः

dine trayodaśe prāpte nāma tasyā yathocitam vihitaṁ bhūbhujā tena viprāṇāṁ purato dvijāḥ

हे द्विजो! तेरहवाँ दिन आने पर उस राजा ने ब्राह्मणों के सामने उसका यथोचित नामकरण किया।

श्लोक 16 (skanda.6.118.16)

यस्मात्क्षेमं समुत्पन्नं गर्भवासेऽपि संस्थया। अनया क्षेमंकरीनाम तस्मादेषाभवेद्द्विजाः

yasmātkṣemaṁ samutpannaṁ garbhavāse'pi saṁsthayā anayā kṣemaṁkarīnāma tasmādeṣābhaveddvijāḥ

हे द्विजो! चूँकि गर्भवास में स्थित रहते हुए भी इसकी उपस्थिति से कल्याण उत्पन्न हुआ था, अतः इसका नाम क्षेमंकरी हुआ।

श्लोक 17 (skanda.6.118.17)

एवं सुविहिता ख्याता वृद्धिं याति दिनेदिने। शुक्लपक्षे कला चेन्दोर्यथैव गगनांगणे

evaṁ suvihitā khyātā vṛddhiṁ yāti dinedine śuklapakṣe kalā cendoryathaiva gaganāṁgaṇe

इस प्रकार उचित नामकरण से प्रसिद्ध होकर, वह प्रतिदिन उसी प्रकार वृद्धि को प्राप्त होने लगी, जैसे शुक्ल पक्ष में चंद्रमा की कला आकाश-आँगन में बढ़ती है।

श्लोक 18 (skanda.6.118.18)

ततस्तां यौवनोपेतां रैवताय महीपतिः। ददौ सौराष्ट्रनाथाय काले वैवाहिके शुभे

tatastāṁ yauvanopetāṁ raivatāya mahīpatiḥ dadau saurāṣṭranāthāya kāle vaivāhike śubhe

फिर यौवनावस्था को प्राप्त होने पर, राजा ने विवाह के शुभ समय पर उसे सौराष्ट्रनाथ रैवत को दे दिया।

श्लोक 19 (skanda.6.118.19)

अथ ताभ्यां सुता जाता रेवतीनाम विश्रुता। भट्टिकाशापदोषेण शेषपत्नी यशस्विनी

atha tābhyāṁ sutā jātā revatīnāma viśrutā bhaṭṭikāśāpadoṣeṇa śeṣapatnī yaśasvinī

तब उन दोनों को रेवती नाम से विख्यात एक पुत्री हुई — वही यशस्विनी, जो भट्टिका के शाप के प्रभाव से शेषनाग की पत्नी रही थी।

श्लोक 20 (skanda.6.118.20)

या तूढा रामरूपेण नागराजेन धीमता। पुत्रपौत्रवती जाता सौभाग्यमदगर्विता

yā tūḍhā rāmarūpeṇa nāgarājena dhīmatā putrapautravatī jātā saubhāgyamadagarvitā

उस बुद्धिमान नागराज ने राम-रूप में उससे विवाह किया, और वह पुत्र-पौत्रों से युक्त होकर सौभाग्य के गर्व से गर्वित हुई।

श्लोक 21 (skanda.6.118.21)

न च ताभ्यां सुतो जातः कथंचिदपि वंशजः। वयसोंऽतेऽपि विप्रेंद्रास्ततो दुःखं व्यजायत

na ca tābhyāṁ suto jātaḥ kathaṁcidapi vaṁśajaḥ vayasoṁ'te'pi vipreṁdrāstato duḥkhaṁ vyajāyata

हे विप्रेंद्रो! किंतु उन दोनों (रैवत और क्षेमंकरी) को वंश बढ़ाने वाला कोई पुत्र नहीं हुआ, इसलिए वृद्धावस्था में भी उन्हें दुःख होने लगा।

श्लोक 22 (skanda.6.118.22)

अथ तौ मंत्रिवर्गस्य राज्यं सर्वमशेषतः। अर्पयित्वा तु पुत्रार्थं तपोऽर्थमिह चागतौ

atha tau maṁtrivargasya rājyaṁ sarvamaśeṣataḥ arpayitvā tu putrārthaṁ tapo'rthamiha cāgatau

तब उन दोनों ने संपूर्ण राज्य मंत्रि-वर्ग को सौंपकर, पुत्र-प्राप्ति के लिए तपस्या करने हेतु यहाँ आगमन किया।

श्लोक 23 (skanda.6.118.23)

ततः स्वमाश्रमं गत्वा स्थितौ तत्र समाहितौ। देवीं कात्यायनीं स्थाप्य तदाराधनतत्परौ

tataḥ svamāśramaṁ gatvā sthitau tatra samāhitau devīṁ kātyāyanīṁ sthāpya tadārādhanatatparau

फिर अपने आश्रम में जाकर, वहाँ एकाग्रचित्त होकर वे दोनों देवी कात्यायनी की स्थापना करके उनकी आराधना में तत्पर हो गए।

श्लोक 24 (skanda.6.118.24)

यया विनिहतो रौद्रो महिषाख्यो महासुरः। कौमारव्रतधारिण्या तस्मिन्विन्ध्ये महाचले

yayā vinihato raudro mahiṣākhyo mahāsuraḥ kaumāravratadhāriṇyā tasminvindhye mahācale

जिसने, आजीवन कौमार्य-व्रत धारण करते हुए, उस महान विंध्य पर्वत पर भयंकर महिषासुर नामक महादैत्य का वध किया था।

श्लोक 25 (skanda.6.118.25)

ततस्ताभ्यां ददौ तुष्टा सा पुत्रं वंशवर्धनम्। नाम्ना क्षेमजितं ख्यातं परपक्षक्षयावहम्

tatastābhyāṁ dadau tuṣṭā sā putraṁ vaṁśavardhanam nāmnā kṣemajitaṁ khyātaṁ parapakṣakṣayāvaham

तब उनसे प्रसन्न होकर उस देवी ने उन्हें वंश बढ़ाने वाला, शत्रुपक्ष का नाश करने वाला, क्षेमजित नाम से विख्यात पुत्र प्रदान किया।

श्लोक 26 (skanda.6.118.26)

ततः स्वं राज्यमासाद्य भूयोऽपि स महीपतिः। स्वपुत्रं वर्धयामास हर्षेण महतान्वितः

tataḥ svaṁ rājyamāsādya bhūyo'pi sa mahīpatiḥ svaputraṁ vardhayāmāsa harṣeṇa mahatānvitaḥ

फिर पुनः अपने राज्य को प्राप्त करके, वह राजा अत्यंत हर्ष से युक्त होकर अपने पुत्र का पालन-पोषण करने लगा।

श्लोक 27 (skanda.6.118.27)

यदा स यौवनोपेतः सञ्जातः क्षेमजित्सुतः। तं च राज्ये नियोज्याऽथ स्वस्थानं स पुनर्ययौ

yadā sa yauvanopetaḥ sañjātaḥ kṣemajitsutaḥ taṁ ca rājye niyojyā'tha svasthānaṁ sa punaryayau

जब पुत्र क्षेमजित यौवनावस्था को प्राप्त हो गया, तब उसे राज्य में नियुक्त करके वह राजा पुनः अपने (तपस्या के) स्थान को चला गया।

श्लोक 28 (skanda.6.118.28)

हाटकेश्वरजं क्षेत्रं तदेतद्द्विजसत्तमाः। भार्यया सहितस्त्यक्त्वा शेषमन्यं परिच्छदम्

hāṭakeśvarajaṁ kṣetraṁ tadetaddvijasattamāḥ bhāryayā sahitastyaktvā śeṣamanyaṁ paricchadam

हे द्विजसत्तमो! अपनी शेष सारी परिचर्या-सामग्री त्यागकर, वह अपनी पत्नी सहित इसी हाटकेश्वर-क्षेत्र में आ गया।

श्लोक 29 (skanda.6.118.29)

तत्र संस्थापयामास लिंगं देवस्य शूलिनः। प्रासादं च मनोहारि ततश्चक्रे समाहितः

tatra saṁsthāpayāmāsa liṁgaṁ devasya śūlinaḥ prāsādaṁ ca manohāri tataścakre samāhitaḥ

वहाँ उसने त्रिशूलधारी देव का एक लिंग स्थापित किया, और फिर एकाग्रचित्त होकर एक मनोहर मंदिर बनवाया।

श्लोक 30 (skanda.6.118.30)

रैवतेश्वरमित्युक्तं सर्वपातकनाशनम्। दर्शनादेव सर्वेषां देहिनां द्विजसत्तमाः

raivateśvaramityuktaṁ sarvapātakanāśanam darśanādeva sarveṣāṁ dehināṁ dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो! वह रैवतेश्वर नाम से कहा जाता है, और दर्शन मात्र से ही समस्त प्राणियों के सभी पापों का नाशक है।

श्लोक 31 (skanda.6.118.31)

या पूर्वं स्थापिता दुर्गा तस्मिन्क्षेत्रे महीभुजा। तस्याः क्षेमंकरी चक्रे प्रासादं श्रद्धयान्विता

yā pūrvaṁ sthāpitā durgā tasminkṣetre mahībhujā tasyāḥ kṣemaṁkarī cakre prāsādaṁ śraddhayānvitā

उस क्षेत्र में पूर्वकाल में उस राजा द्वारा स्थापित की गई दुर्गा देवी के लिए, क्षेमंकरी ने श्रद्धायुक्त होकर एक मंदिर बनवाया।

श्लोक 32 (skanda.6.118.32)

सापि क्षेमंकरीनाम ततः प्रभृति कीर्त्यते। कात्यायन्यपि या प्रोक्ता महिषासुरमर्दिनी

sāpi kṣemaṁkarīnāma tataḥ prabhṛti kīrtyate kātyāyanyapi yā proktā mahiṣāsuramardinī

वे देवी भी, जो कात्यायनी और महिषासुरमर्दिनी कही जाती हैं, तभी से क्षेमंकरी नाम से कीर्तित होती हैं।

श्लोक 33 (skanda.6.118.33)

यस्तां चैत्रसिते पक्षे संपश्येदष्टमीदिने। तस्याभीष्टा भवेत्सिद्धिः सर्वदैव द्विजोत्तमाः

yastāṁ caitrasite pakṣe saṁpaśyedaṣṭamīdine tasyābhīṣṭā bhavetsiddhiḥ sarvadaiva dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो! जो कोई चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को उनका दर्शन करता है, उसकी अभीष्ट सिद्धि सदा प्राप्त होती है।

श्लोक 34 (skanda.6.118.34)

एतद्वः सर्वमाख्यातं रैवतेश्वरवर्णनम्। क्षेमंकर्याः प्रभावं च सर्वपातकनाशनम्

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ raivateśvaravarṇanam kṣemaṁkaryāḥ prabhāvaṁ ca sarvapātakanāśanam

यह सब आपको बता दिया गया — रैवतेश्वर का वर्णन, तथा क्षेमंकरी का वह प्रभाव, जो समस्त पापों का नाश करने वाला है।

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