नागर खण्ड · अध्याय 119
देवसेना-पराजय-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.119.1)
ऋषय ऊचुः। यत्त्वया सूतज प्रोक्तं देवी कात्यायनी च सा। महिषांतकरी जाता कथं सा मे प्रकीर्तय
ṛṣaya ūcuḥ yattvayā sūtaja proktaṁ devī kātyāyanī ca sā mahiṣāṁtakarī jātā kathaṁ sā me prakīrtaya
ऋषियों ने कहा — हे सूतज! आपने बताया कि देवी कात्यायनी महिष का अंत करने वाली बनीं; वह कैसे हुआ, यह मुझे बताइए।
श्लोक 2 (skanda.6.119.2)
कीदृग्दानववर्यः स माहिषं रूपमाश्रितः। कस्मात्स सूदितो देव्या तन्मे विस्तरतो वद
kīdṛgdānavavaryaḥ sa māhiṣaṁ rūpamāśritaḥ kasmātsa sūdito devyā tanme vistarato vada
वह महिष-रूप धारण करने वाला श्रेष्ठ दानव कैसा था, और देवी द्वारा किस कारण से मारा गया — यह मुझे विस्तार से बताइए।
श्लोक 3 (skanda.6.119.3)
सूत उवाच। अत्र वः कीर्तयिष्यामि देव्या माहात्म्यमुत्तमम्। श्रुतमात्रेऽपि मर्त्यानां येन शत्रुक्षयो भवेत्
sūta uvāca atra vaḥ kīrtayiṣyāmi devyā māhātmyamuttamam śrutamātre'pi martyānāṁ yena śatrukṣayo bhavet
सूत जी ने कहा — मैं अब आपको देवी का वह उत्तम माहात्म्य बताऊँगा, जिसे केवल सुनने मात्र से भी मनुष्यों के शत्रुओं का नाश हो जाता है।
श्लोक 4 (skanda.6.119.4)
हिरण्याक्षसुतः पूर्वं महिषोनाम दानवः। आसीन्महिषरूपेण येन भुक्तं जगत्त्रयम्
hiraṇyākṣasutaḥ pūrvaṁ mahiṣonāma dānavaḥ āsīnmahiṣarūpeṇa yena bhuktaṁ jagattrayam
पहले हिरण्याक्ष का पुत्र महिष नामक एक दानव था, जिसने भैंसे के रूप में तीनों लोकों को भोग लिया था।
श्लोक 5 (skanda.6.119.5)
ऋषय ऊचुः। माहिषेण स्वरूपेण किंजातः सूतनंदन। अथवा शापदोषेण सञ्जातः केनचिद्वद
ṛṣaya ūcuḥ māhiṣeṇa svarūpeṇa kiṁjātaḥ sūtanaṁdana athavā śāpadoṣeṇa sañjātaḥ kenacidvada
ऋषियों ने कहा — हे सूतनंदन! क्या वह स्वाभाविक रूप से ही भैंसे के रूप में उत्पन्न हुआ था, अथवा किसी के शाप के कारण ऐसा हुआ? यह बताइए।
श्लोक 6 (skanda.6.119.6)
सूत उवाच। संजातो हि सुरूपाढ्यः शतपत्रनिभाननः। दीर्घबाहुः पृथुग्रीवः सर्वलक्षणलक्षितः। नाम्ना चित्रसमः प्रोक्तस्तेजोवीर्यसमन्वितः
sūta uvāca saṁjāto hi surūpāḍhyaḥ śatapatranibhānanaḥ dīrghabāhuḥ pṛthugrīvaḥ sarvalakṣaṇalakṣitaḥ nāmnā citrasamaḥ proktastejovīryasamanvitaḥ
सूत जी ने कहा — वह अत्यंत सुंदर, कमल के समान मुखवाला, दीर्घ भुजाओं और चौड़ी ग्रीवा वाला, सभी शुभ लक्षणों से युक्त उत्पन्न हुआ था; तेज और वीर्य से युक्त उस दानव का नाम चित्रसम रखा गया।
श्लोक 7 (skanda.6.119.7)
सबाल्यात्प्रभृति प्रायो महिषाणां प्रबोधनम्। करोति संपरित्यज्य सर्वमश्वादिवाहनम्
sabālyātprabhṛti prāyo mahiṣāṇāṁ prabodhanam karoti saṁparityajya sarvamaśvādivāhanam
बचपन से ही वह घोड़े आदि अन्य सभी वाहनों को त्यागकर, प्रायः भैंसों के ही पालन-पोषण में लगा रहता था।
श्लोक 8 (skanda.6.119.8)
कदाचिन्महिषारूढः स प्रतस्थे दनोः सुतः। जाह्नवीतीरमासाद्य विनिघ्नञ्जलपक्षिणः
kadācinmahiṣārūḍhaḥ sa pratasthe danoḥ sutaḥ jāhnavītīramāsādya vinighnañjalapakṣiṇaḥ
एक बार वह दनु-पुत्र भैंसे पर सवार होकर चला, और गंगा-तट पर पहुँचकर जलपक्षियों को मारने लगा।
श्लोक 9 (skanda.6.119.9)
अथासीत्सुसमाधिस्थो दुर्वासा मुनिसत्तमः। गंगातीरे विधायोच्चैः पद्मासनमनुत्तमम्
athāsītsusamādhistho durvāsā munisattamaḥ gaṁgātīre vidhāyoccaiḥ padmāsanamanuttamam
उस समय श्रेष्ठ मुनि दुर्वासा गंगा-तट पर उत्कृष्ट पद्मासन लगाकर गहरी समाधि में स्थित थे।
श्लोक 10 (skanda.6.119.10)
विहंगासक्तचित्तेन शून्येन स मुनीश्वरः। दृष्टो न महिषक्षुण्णः खुरैर्वेगवशाद्द्विजः
vihaṁgāsaktacittena śūnyena sa munīśvaraḥ dṛṣṭo na mahiṣakṣuṇṇaḥ khurairvegavaśāddvijaḥ
हे द्विजो! उस दानव का चित्त पक्षियों में ही लीन था, इसलिए वह भैंसे के वेगपूर्वक खुरों से रौंदे जा रहे उस मुनीश्वर को देख नहीं सका।
श्लोक 11 (skanda.6.119.11)
ततः क्षतजदिग्धांगः स दृष्ट्वा दानवं पुरः। अथ दृष्ट्वा प्रणामेन रहितं कोपमाविशत्
tataḥ kṣatajadigdhāṁgaḥ sa dṛṣṭvā dānavaṁ puraḥ atha dṛṣṭvā praṇāmena rahitaṁ kopamāviśat
तब रक्त से लथपथ अंगों वाले उस मुनि ने सामने उस दानव को देखा, और उसे प्रणामरहित पाकर क्रोध से भर गए।
श्लोक 12 (skanda.6.119.12)
ततः प्रोवाच तं क्रुद्धस्तोयमादाय पाणिना। यस्मात्पाप मम क्षुण्णं गात्रं महिषजैः खुरैः
tataḥ provāca taṁ kruddhastoyamādāya pāṇinā yasmātpāpa mama kṣuṇṇaṁ gātraṁ mahiṣajaiḥ khuraiḥ
तब क्रोधित होकर, हाथ में जल लेकर, उन्होंने उससे कहा — "हे पापी! चूँकि भैंसे के खुरों से मेरा शरीर रौंदा गया है..."
श्लोक 13 (skanda.6.119.13)
समाधेश्च कृतो भंगस्तस्मात्त्वं महिषो भव। यावज्जीवसि दुर्बुद्धे सम्यग्ज्ञानसमन्वितः
samādheśca kṛto bhaṁgastasmāttvaṁ mahiṣo bhava yāvajjīvasi durbuddhe samyagjñānasamanvitaḥ
"...और मेरी समाधि भंग हुई है, इसलिए तू स्वयं ही भैंसा बन जा। हे दुर्बुद्धे! जब तक तू जीवित रहेगा, सम्यक् ज्ञान से युक्त होते हुए भी..."
श्लोक 14 (skanda.6.119.14)
अथाऽसौ महिषो जातः कृष्णगात्रधरो महान्। अतिदीर्घविषाणश्च अंजनाद्रिरिवापरः
athā'sau mahiṣo jātaḥ kṛṣṇagātradharo mahān atidīrghaviṣāṇaśca aṁjanādririvāparaḥ
तब वह एक विशाल, कृष्ण-वर्ण शरीर वाला, अत्यंत लंबे सींगों वाला भैंसा बन गया, मानो दूसरा अंजन-पर्वत हो।
श्लोक 15 (skanda.6.119.15)
ततः प्रसादयामास तं मुनिं विनयान्वितः। शापांतं कुरु मे विप्र बाल्यभावादजानतः
tataḥ prasādayāmāsa taṁ muniṁ vinayānvitaḥ śāpāṁtaṁ kuru me vipra bālyabhāvādajānataḥ
तब विनयपूर्वक उसने उस मुनि को मनाने का प्रयत्न किया — "हे विप्र! मैंने बालस्वभाव के कारण अनजाने में यह किया; अतः इस शाप का अंत कीजिए।"
श्लोक 16 (skanda.6.119.16)
अथ तं स मुनिः प्राह न मे स्याद्वचनं वृथा। तस्माद्यावत्स्थिताः प्राणास्तावदित्थं भविष्यति
atha taṁ sa muniḥ prāha na me syādvacanaṁ vṛthā tasmādyāvatsthitāḥ prāṇāstāvaditthaṁ bhaviṣyati
तब उस मुनि ने उससे कहा — "मेरा वचन कभी व्यर्थ नहीं जा सकता; अतः जब तक तेरे प्राण रहेंगे, तब तक तू इसी प्रकार रहेगा..."
श्लोक 17 (skanda.6.119.17)
महिषस्य स्वरूपेण निन्दितस्य सुदुर्मते। एवं स तं परित्यज्य गंगातीरं मुनीश्वरः। जगामाऽन्यत्र सोऽप्याशु गत्वा शुक्रमुवाच ह
mahiṣasya svarūpeṇa ninditasya sudurmate evaṁ sa taṁ parityajya gaṁgātīraṁ munīśvaraḥ jagāmā'nyatra so'pyāśu gatvā śukramuvāca ha
"...हे अत्यंत दुर्बुद्धे! भैंसे के निंदित रूप में।" इस प्रकार उसे छोड़कर वे मुनीश्वर गंगा-तट से अन्यत्र चले गए; और वह भी शीघ्रतापूर्वक शुक्राचार्य के पास जाकर बोला।
श्लोक 18 (skanda.6.119.18)
अहं दुर्वाससा शप्तः कस्मिंश्चित्कारणांतरे। महिषत्वं समानीतस्तस्मात्त्वं मे गतिर्भव
ahaṁ durvāsasā śaptaḥ kasmiṁścitkāraṇāṁtare mahiṣatvaṁ samānītastasmāttvaṁ me gatirbhava
"मुझे किसी कारणवश दुर्वासा ने शाप देकर भैंसे की योनि में डाल दिया है; अतः आप ही मेरे शरणदाता बनें।"
श्लोक 19 (skanda.6.119.19)
यथा स्यात्पूर्वजं देहं तिर्यक्त्वं नश्यते यथा। प्रसादात्तव विप्रेंद्र तथा नीतिर्विधीयताम्
yathā syātpūrvajaṁ dehaṁ tiryaktvaṁ naśyate yathā prasādāttava vipreṁdra tathā nītirvidhīyatām
"हे विप्रेंद्र! आपकी कृपा से ऐसी युक्ति बताइए, जिससे मेरा पूर्व शरीर पुनः प्राप्त हो सके, और यह पशु-योनि नष्ट हो जाए।"
श्लोक 20 (skanda.6.119.20)
शुक्र उवाच। तस्य शापोऽन्यथा कर्तुं नैव शक्यः कथंचन। केनापि संपरित्यज्य देवमेकं महेश्वरम्
śukra uvāca tasya śāpo'nyathā kartuṁ naiva śakyaḥ kathaṁcana kenāpi saṁparityajya devamekaṁ maheśvaram
शुक्राचार्य ने कहा — उनका वह शाप किसी भी प्रकार से, एक महेश्वर देव को छोड़कर, अन्य किसी के द्वारा भी बदला नहीं जा सकता।
श्लोक 21 (skanda.6.119.21)
तस्मादाराधयाऽऽशु त्वं गत्वा लिंगमनुत्तमम्। हाटकेश्वरजे क्षेत्रे सर्वसिद्धिप्रदायके
tasmādārādhayā''śu tvaṁ gatvā liṁgamanuttamam hāṭakeśvaraje kṣetre sarvasiddhipradāyake
"अतः तुम शीघ्र जाकर सर्वसिद्धि प्रदान करने वाले हाटकेश्वर-क्षेत्र में उस अनुपम लिंग की आराधना करो।"
श्लोक 22 (skanda.6.119.22)
तत्र सञ्जायते सिद्धिः शीघ्रं दानवसत्तम। अपि पापयुगे प्राप्ते किं पुनः प्रथमे युगे
tatra sañjāyate siddhiḥ śīghraṁ dānavasattama api pāpayuge prāpte kiṁ punaḥ prathame yuge
"हे श्रेष्ठ दानव! वहाँ शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है — कलियुग जैसे पापमय युग में भी, फिर सत्ययुग में तो कहना ही क्या।"
श्लोक 23 (skanda.6.119.23)
एवमुक्तः स शुक्रेण दानवः सत्वरं ययौ। हाटकेश्वरजं क्षेत्रं तपस्तेपे ततः परम्
evamuktaḥ sa śukreṇa dānavaḥ satvaraṁ yayau hāṭakeśvarajaṁ kṣetraṁ tapastepe tataḥ param
शुक्राचार्य के ऐसा कहने पर वह दानव शीघ्रतापूर्वक हाटकेश्वर-क्षेत्र गया, और वहाँ तपस्या करने लगा।
श्लोक 24 (skanda.6.119.24)
स्थापयित्वा महल्लिंगं भक्त्या देवस्य शूलिनः। प्रासादं च ततश्चक्रे कैलासशिखरोपमम्
sthāpayitvā mahalliṁgaṁ bhaktyā devasya śūlinaḥ prāsādaṁ ca tataścakre kailāsaśikharopamam
भक्तिपूर्वक त्रिशूलधारी देव का एक विशाल लिंग स्थापित करके, उसने फिर कैलास-शिखर के समान एक मंदिर बनवाया।
श्लोक 25 (skanda.6.119.25)
तस्यैवं वर्तमानस्य तपःस्थस्य महात्मनः। जगाम सुमहान्कालः कृच्छ्रे तपसि वर्ततः
tasyaivaṁ vartamānasya tapaḥsthasya mahātmanaḥ jagāma sumahānkālaḥ kṛcchre tapasi vartataḥ
इस प्रकार तपस्या में स्थित उस महात्मा का बहुत लंबा समय कठोर तपस्या में लीन रहते हुए बीत गया।
श्लोक 26 (skanda.6.119.26)
ततस्तुष्टो महादेवो गत्वा तद्दृष्टिगोचरम्। प्रोवाच परितुष्टोऽस्मि वरं वरय दानव
tatastuṣṭo mahādevo gatvā taddṛṣṭigocaram provāca parituṣṭo'smi varaṁ varaya dānava
तब प्रसन्न होकर महादेव उसके सामने प्रकट हुए और बोले — "हे दानव! मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ, वर माँगो।"
श्लोक 27 (skanda.6.119.27)
महिष उवाच। अहं दुर्वाससा शप्तो महिषत्वे नियोजितः। तिर्यक्त्वं नाशमायातु तस्मान्मे त्वत्प्रसादतः
mahiṣa uvāca ahaṁ durvāsasā śapto mahiṣatve niyojitaḥ tiryaktvaṁ nāśamāyātu tasmānme tvatprasādataḥ
महिष ने कहा — मुझे दुर्वासा ने शाप देकर भैंसे की योनि में डाल दिया है; अतः आपकी कृपा से मेरी यह पशु-अवस्था नष्ट हो जाए।
श्लोक 28 (skanda.6.119.28)
श्रीभगवानुवाच। नान्यथा शक्यते कर्तुं तस्य वाक्यं कथंचन। तस्मात्तव करिष्यामि सुखोपायं शृणुष्व तम्
śrībhagavānuvāca nānyathā śakyate kartuṁ tasya vākyaṁ kathaṁcana tasmāttava kariṣyāmi sukhopāyaṁ śṛṇuṣva tam
श्री भगवान ने कहा — उनका वह वचन किसी भी प्रकार बदला नहीं जा सकता; अतः मैं तुम्हारे लिए सुख का एक उपाय बताता हूँ, उसे सुनो।
श्लोक 29 (skanda.6.119.29)
ये केचिन्मानवा भोगा दैविका ये तथाऽऽसुराः। ते सर्वे तव गात्रेऽत्र सम्प्रयास्यंति संश्रयम्
ye kecinmānavā bhogā daivikā ye tathā''surāḥ te sarve tava gātre'tra samprayāsyaṁti saṁśrayam
"जो भी मानवीय, दैवी अथवा आसुरी भोग हैं, वे सब यहाँ तुम्हारे ही शरीर में शरण प्राप्त करेंगे।"
श्लोक 30 (skanda.6.119.30)
भोगार्थमिष्यते कायं यतो मर्त्यं सुरासुरैः। समवाप्स्यसि तान्सर्वांस्तस्मात्तव कलेवरम्
bhogārthamiṣyate kāyaṁ yato martyaṁ surāsuraiḥ samavāpsyasi tānsarvāṁstasmāttava kalevaram
"चूँकि सुर और असुर दोनों ही भोग के लिए मर्त्य शरीर की इच्छा रखते हैं, अतः तुम्हारा वह शरीर ही उन सबको प्राप्त होने वाला बनेगा।"
श्लोक 31 (skanda.6.119.31)
महिष उवाच। यद्येवं देवदेवेश भोगप्राप्तिर्भवेन्मम। तस्मादवध्यमेवास्तु गात्रमेतन्मम प्रभो
mahiṣa uvāca yadyevaṁ devadeveśa bhogaprāptirbhavenmama tasmādavadhyamevāstu gātrametanmama prabho
महिष ने कहा — हे देवदेवेश! यदि इस प्रकार मुझे भोग की प्राप्ति होगी, तो हे प्रभो! मेरा यह शरीर अवध्य ही हो जाए...
श्लोक 32 (skanda.6.119.32)
दशानां देवयोनीनां मनुष्याणां विशेषतः। तिर्यञ्चानां च नागानां पक्षिणां सुरसत्तम
daśānāṁ devayonīnāṁ manuṣyāṇāṁ viśeṣataḥ tiryañcānāṁ ca nāgānāṁ pakṣiṇāṁ surasattama
"...हे सुरश्रेष्ठ! दसों देवयोनियों के द्वारा, विशेष रूप से मनुष्यों, पशुओं, नागों और पक्षियों के द्वारा।"
श्लोक 33 (skanda.6.119.33)
श्रीभगवानुवाच। नावध्योऽस्ति धरापृष्ठे कश्चिद्देही च दानव। तस्मादेकं परित्यक्त्वा शेषान्प्रार्थय दैत्यप
śrībhagavānuvāca nāvadhyo'sti dharāpṛṣṭhe kaściddehī ca dānava tasmādekaṁ parityaktvā śeṣānprārthaya daityapa
श्री भगवान ने कहा — हे दानव! इस पृथ्वी पर कोई भी प्राणी पूर्णतः अवध्य नहीं होता; अतः हे दैत्यराज! किसी एक को छोड़कर शेष सबसे अवध्यत्व माँग लो।
श्लोक 34 (skanda.6.119.34)
ततः स सुचिरं ध्यात्वा प्रोवाच वृषभध्वजम्। स्त्रियमेकां परित्यक्त्वा नान्येभ्यस्तु वधो मम
tataḥ sa suciraṁ dhyātvā provāca vṛṣabhadhvajam striyamekāṁ parityaktvā nānyebhyastu vadho mama
तब बहुत देर तक विचार करके उसने वृषभध्वज से कहा — "एक स्त्री को छोड़कर, अन्य किसी से भी मेरा वध न हो।"
श्लोक 35 (skanda.6.119.35)
तथात्र मामके तीर्थे यः कश्चिच्छ्रद्धया नरः। करोति स्नानमव्यग्रस्त्वां पश्यति ततः परम्
tathātra māmake tīrthe yaḥ kaścicchraddhayā naraḥ karoti snānamavyagrastvāṁ paśyati tataḥ param
"और इसी प्रकार, इस मेरे नाम वाले तीर्थ में जो भी मनुष्य श्रद्धापूर्वक, अविचलित होकर स्नान करता है, और तत्पश्चात् आपका दर्शन करता है..."
श्लोक 36 (skanda.6.119.36)
तस्य स्यात्त्वत्प्रसादेन संसिद्धिः सार्वकामिकी। सर्वोपद्रवनाशश्च तेजोवृद्धिश्च शंकर
tasya syāttvatprasādena saṁsiddhiḥ sārvakāmikī sarvopadravanāśaśca tejovṛddhiśca śaṁkara
"...हे शंकर! आपकी कृपा से उसे सभी कामनाओं की सिद्धि, समस्त उपद्रवों का नाश, और तेज की वृद्धि प्राप्त हो।"
श्लोक 37 (skanda.6.119.37)
श्रीभगवानुवाच। मार्गशुक्लचतुर्दश्यां तीर्थे स्नात्वाऽत्र तावके। विलोकयिष्यति प्रीत्या मम लिंगं ततः परम्
śrībhagavānuvāca mārgaśuklacaturdaśyāṁ tīrthe snātvā'tra tāvake vilokayiṣyati prītyā mama liṁgaṁ tataḥ param
श्री भगवान ने कहा — जो मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी को तुम्हारे इस तीर्थ में स्नान करके, प्रेमपूर्वक मेरे लिंग का दर्शन करेगा...
श्लोक 38 (skanda.6.119.38)
भूतप्रेतपिशाचादि संभवास्तस्य तत्क्षणात्। दोषा नाशं प्रयास्यंति तथा रोगा ज्वरादयः
bhūtapretapiśācādi saṁbhavāstasya tatkṣaṇāt doṣā nāśaṁ prayāsyaṁti tathā rogā jvarādayaḥ
"...उसके भूत, प्रेत, पिशाच आदि से उत्पन्न दोष उसी क्षण नष्ट हो जाएँगे, तथा ज्वर आदि रोग भी।"
श्लोक 39 (skanda.6.119.39)
एवमुक्त्वाऽथ देवेशस्ततश्चादर्शनं गतः। महिषोऽपि निजं स्थानं प्रजगाम ततः परम्
evamuktvā'tha deveśastataścādarśanaṁ gataḥ mahiṣo'pi nijaṁ sthānaṁ prajagāma tataḥ param
ऐसा कहकर वे देवेश अंतर्धान हो गए; और महिष भी तत्पश्चात् अपने ही स्थान को चला गया।
श्लोक 40 (skanda.6.119.40)
स गत्वा दानवान्सर्वान्समाहूय ततः परम्। प्रोवाचामर्षसंयुक्तः सभामध्ये व्यवस्थितः
sa gatvā dānavānsarvānsamāhūya tataḥ param provācāmarṣasaṁyuktaḥ sabhāmadhye vyavasthitaḥ
वहाँ जाकर उसने सभी दानवों को बुलाकर, क्रोध से युक्त होकर, सभा के मध्य खड़े होकर कहा।
श्लोक 41 (skanda.6.119.41)
पिता मम पितृव्यश्च ये चान्ये मम पूर्वजाः। दानवा निहता देवैर्वासुदेवपुरोगमैः
pitā mama pitṛvyaśca ye cānye mama pūrvajāḥ dānavā nihatā devairvāsudevapurogamaiḥ
"मेरे पिता, मेरे चाचा, तथा मेरे अन्य पूर्वज दानव — वासुदेव के नेतृत्व में देवताओं द्वारा मारे गए थे।"
श्लोक 42 (skanda.6.119.42)
तस्मात्तान्नाशयिष्यामि देवानपि महाहवे। अहं त्रैलोक्यराज्यं हि ग्रहीष्यामि ततः परम्
tasmāttānnāśayiṣyāmi devānapi mahāhave ahaṁ trailokyarājyaṁ hi grahīṣyāmi tataḥ param
"अतः महासंग्राम में मैं उन देवताओं को भी नष्ट कर दूँगा, और तत्पश्चात् मैं ही त्रैलोक्य के राज्य को ग्रहण करूँगा।"
श्लोक 43 (skanda.6.119.43)
अथ ते दानवाः प्रोचुर्युक्तमेतदनुत्तमम्। अस्मदीयमिदं राज्यं यच्छक्रः कुरुते दिवि
atha te dānavāḥ procuryuktametadanuttamam asmadīyamidaṁ rājyaṁ yacchakraḥ kurute divi
तब उन दानवों ने कहा — यह सर्वथा उचित है; स्वर्ग में इंद्र जो राज्य करता है, वह वास्तव में हमारा ही है।
श्लोक 44 (skanda.6.119.44)
तस्मादद्यैव गत्वाऽऽशु हत्वेन्द्रं रणमूर्धनि। दिव्यान्भोगान्प्रभुञ्जानाः स्थास्यामः सुखिनो दिवि
tasmādadyaiva gatvā''śu hatvendraṁ raṇamūrdhani divyānbhogānprabhuñjānāḥ sthāsyāmaḥ sukhino divi
"अतः आज ही जाकर, युद्ध के अग्रभाग में इंद्र को मारकर, हम दिव्य भोगों को भोगते हुए स्वर्ग में सुखपूर्वक रहेंगे।"
श्लोक 45 (skanda.6.119.45)
एवं ते दानवाः सर्वे कृत्वा मंत्रविनिश्चयम्। मेरुशृंगं ततो जग्मुः सभृत्यबलवाहनः
evaṁ te dānavāḥ sarve kṛtvā maṁtraviniścayam meruśṛṁgaṁ tato jagmuḥ sabhṛtyabalavāhanaḥ
इस प्रकार निर्णय करके, वे सभी दानव अपने सेवकों, सेना और वाहनों सहित मेरु के शिखर पर गए।
श्लोक 46 (skanda.6.119.46)
अथ शक्रादयो देवा दृष्ट्वा तद्दानवोद्भवम्। अकस्मादेव संप्राप्तं बलं शस्त्रास्त्रसंयुतम्। युद्धार्थं स्वपुरद्वारि निर्ययुस्तदनंतरम्
atha śakrādayo devā dṛṣṭvā taddānavodbhavam akasmādeva saṁprāptaṁ balaṁ śastrāstrasaṁyutam yuddhārthaṁ svapuradvāri niryayustadanaṁtaram
तब इंद्र आदि देवगण, शस्त्रास्त्रों से युक्त उस दानव-सेना को अकस्मात् आया हुआ देखकर, युद्ध के लिए अपने नगर के द्वार पर निकल आए।
श्लोक 47 (skanda.6.119.47)
आदित्या वसवो रुद्रा नासत्यौ च भिषग्वरौ। विश्वेदेवास्तथा साध्याः सिद्धा विद्याधराश्च ये
ādityā vasavo rudrā nāsatyau ca bhiṣagvarau viśvedevāstathā sādhyāḥ siddhā vidyādharāśca ye
आदित्य, वसु, रुद्र, तथा वैद्यशिरोमणि दोनों अश्विनीकुमार; विश्वेदेव, तथा साध्य, सिद्ध और विद्याधर भी।
श्लोक 48 (skanda.6.119.48)
ततः समभवद्युद्धं देवानां सह दानवैः। मिथः प्रभर्त्स्यमानानां मृत्युं कृत्वा निवर्तनम्
tataḥ samabhavadyuddhaṁ devānāṁ saha dānavaiḥ mithaḥ prabhartsyamānānāṁ mṛtyuṁ kṛtvā nivartanam
तब देवताओं और दानवों के बीच घोर युद्ध हुआ, जिसमें वे परस्पर ललकारते हुए मृत्यु के आने पर ही लौटते थे।
श्लोक 49 (skanda.6.119.49)
एवं समभवद्युद्धं यावद्वर्षत्रयं दिवि। रक्तनद्योतिविपुलास्तत्रातीव प्रसुस्रुवुः
evaṁ samabhavadyuddhaṁ yāvadvarṣatrayaṁ divi raktanadyotivipulāstatrātīva prasusruvuḥ
इस प्रकार स्वर्ग में तीन वर्षों तक निरंतर युद्ध होता रहा, और वहाँ रक्त की अत्यंत विशाल नदियाँ बहुतायत से बहने लगीं।
श्लोक 50 (skanda.6.119.50)
अन्यस्मिन्दिवसे शक्रं दृष्टैवारावणसंस्थितम्। तं शुक्लेनातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि। देवैः परिवृतं दिव्यशस्त्रपाणिभिरेव च
anyasmindivase śakraṁ dṛṣṭaivārāvaṇasaṁsthitam taṁ śuklenātapatreṇa dhriyamāṇena mūrdhani devaiḥ parivṛtaṁ divyaśastrapāṇibhireva ca
एक दिन ऐरावत हाथी पर बैठे हुए इंद्र को, जिनके सिर पर श्वेत छत्र धारण किया जा रहा था, तथा जो दिव्य शस्त्रधारी देवताओं से घिरे हुए थे, देखकर...
श्लोक 51 (skanda.6.119.51)
ततः कोपपरीतात्मा महिषो दानवाधिपः। महावेगं समासाद्य तस्यैवाभिमुखो ययौ
tataḥ kopaparītātmā mahiṣo dānavādhipaḥ mahāvegaṁ samāsādya tasyaivābhimukho yayau
...तब क्रोध से भरा हुआ दानवराज महिष अत्यंत वेग धारण करके सीधे उन्हीं की ओर दौड़ा।
श्लोक 52 (skanda.6.119.52)
शृंगाभ्यां च सुतीक्ष्णाभ्यां ततश्चैरावणं गजम्। विव्याध हृदये सोऽथ चक्रे रावं सुदारुणम्
śṛṁgābhyāṁ ca sutīkṣṇābhyāṁ tataścairāvaṇaṁ gajam vivyādha hṛdaye so'tha cakre rāvaṁ sudāruṇam
फिर उसने अपने दोनों अत्यंत तीक्ष्ण सींगों से ऐरावत हाथी को हृदय में बींध दिया, जिससे वह अत्यंत भयंकर चीत्कार करने लगा।
श्लोक 53 (skanda.6.119.53)
ततः पराङ्मुखो भूत्वा पलायनपरायणः। अभिदुद्राव वेगेन पुरी यत्रामरावती
tataḥ parāṅmukho bhūtvā palāyanaparāyaṇaḥ abhidudrāva vegena purī yatrāmarāvatī
फिर पीठ फेरकर, केवल भागने में तत्पर होकर, वह वेगपूर्वक उस नगर की ओर दौड़ा जहाँ अमरावती पुरी थी।
श्लोक 54 (skanda.6.119.54)
अंकुशोत्थप्रहारैश्च क्षतकुंभोऽपि भूरिशः। महामात्रनिरुद्धोऽपि न स तस्थौ कथंचन
aṁkuśotthaprahāraiśca kṣatakuṁbho'pi bhūriśaḥ mahāmātraniruddho'pi na sa tasthau kathaṁcana
अंकुश के प्रहारों से उसके गंडस्थल बार-बार घायल हो गए, और महावत द्वारा रोके जाने पर भी वह किसी भी प्रकार रुका नहीं।
श्लोक 55 (skanda.6.119.55)
अथाब्रवीत्सहस्राक्षो महिषं वीक्ष्य गर्वितम्। गर्जमानांस्तथा दैत्यान्क्ष्वेडनास्फोटनादिभिः
athābravītsahasrākṣo mahiṣaṁ vīkṣya garvitam garjamānāṁstathā daityānkṣveḍanāsphoṭanādibhiḥ
तब सहस्राक्ष इंद्र ने गर्वित महिष को, तथा हुंकार और भुजास्फोट आदि से गर्जना करते दैत्यों को देखकर कहा।
श्लोक 56 (skanda.6.119.56)
मा दैत्य प्रविजानीहि यन्नष्टस्त्रिदशाधिपः। एष नागो रणं हित्वा विवशो याति मे बलात्
mā daitya pravijānīhi yannaṣṭastridaśādhipaḥ eṣa nāgo raṇaṁ hitvā vivaśo yāti me balāt
"हे दैत्य! यह मत समझ लेना कि त्रिदशाधिपति भाग गया — यह हाथी अपने आप युद्ध छोड़कर मेरे वश के बाहर होकर जा रहा है।"
श्लोक 57 (skanda.6.119.57)
तस्मात्तिष्ठ मुहूर्तं त्वं यावदास्थाय सद्रथम्। नाशयामि च ते दर्पं निहत्य निशितैः शरैः
tasmāttiṣṭha muhūrtaṁ tvaṁ yāvadāsthāya sadratham nāśayāmi ca te darpaṁ nihatya niśitaiḥ śaraiḥ
"अतः तू क्षणभर रुक, जब तक मैं अपने रथ पर चढ़ता हूँ; और मैं तीक्ष्ण बाणों से मारकर तेरे दर्प का नाश करूँगा।"
श्लोक 58 (skanda.6.119.58)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो मातलिः शक्रसारथिः। सहस्रैदर्शभिर्युक्तं वाजिनां वातरंहसाम्
etasminnaṁtare prāpto mātaliḥ śakrasārathiḥ sahasraidarśabhiryuktaṁ vājināṁ vātaraṁhasām
इसी बीच इंद्र का सारथी मातलि, वायु के समान वेग वाले हजारों घोड़ों से युक्त रथ लेकर वहाँ आ पहुँचा।
श्लोक 59 (skanda.6.119.59)
तेऽथ मातलिना अश्वाः प्रतोदेन समाहताः। उत्पतंत इवाकाशे सत्वं संप्रदुद्रुवुः
te'tha mātalinā aśvāḥ pratodena samāhatāḥ utpataṁta ivākāśe satvaṁ saṁpradudruvuḥ
फिर मातलि द्वारा चाबुक से थपथपाए गए वे घोड़े, मानो आकाश में उड़ते हुए, शीघ्रतापूर्वक दौड़ पड़े।
श्लोक 60 (skanda.6.119.60)
अथ चापं समारोप्य सत्वरं पाकशासनः। शरैराशीविषाकारैश्छादयामास दानवम्
atha cāpaṁ samāropya satvaraṁ pākaśāsanaḥ śarairāśīviṣākāraiśchādayāmāsa dānavam
फिर धनुष चढ़ाकर, इंद्र ने शीघ्रतापूर्वक विषधर सर्पों के समान बाणों से उस दानव को ढँक दिया।
श्लोक 61 (skanda.6.119.61)
ततः स वेगमास्थाय भूयोऽपि क्रोधमूर्छितः। अभिदुद्राव वेगेन स यत्र त्रिदशाधिपः
tataḥ sa vegamāsthāya bhūyo'pi krodhamūrchitaḥ abhidudrāva vegena sa yatra tridaśādhipaḥ
तब वह फिर से क्रोध से मूर्च्छित होकर, वेग धारण करके, जहाँ त्रिदशाधिपति खड़े थे, वहाँ वेगपूर्वक दौड़ा।
श्लोक 62 (skanda.6.119.62)
ततस्तान्सुहयांस्तस्य शृंगाभ्यां वेगमाश्रितः। दारयामास संक्रुद्ध आविध्याविध्य चासकृत्
tatastānsuhayāṁstasya śṛṁgābhyāṁ vegamāśritaḥ dārayāmāsa saṁkruddha āvidhyāvidhya cāsakṛt
फिर वेगपूर्वक बढ़कर, उस क्रुद्ध दानव ने उन उत्तम घोड़ों को अपने सींगों से बार-बार उछालते हुए चीर डाला।
श्लोक 63 (skanda.6.119.63)
ततस्ते वाजिनस्त्रस्ताः संजग्मुः क्षतवक्षसः। रक्तप्लावितसर्वांगा मार्गमैरावणस्य च
tataste vājinastrastāḥ saṁjagmuḥ kṣatavakṣasaḥ raktaplāvitasarvāṁgā mārgamairāvaṇasya ca
तब वे घोड़े भयभीत होकर, वक्षस्थल घायल होकर, संपूर्ण शरीर रक्त से नहाए हुए, ऐरावत के ही मार्ग की ओर भाग गए।
श्लोक 64 (skanda.6.119.64)
ततः शक्ररथं दृष्ट्वा विमुखं सुरसत्तमाः। सर्वे प्रदुद्रुवुर्भीतास्तस्य मार्गमुपाश्रिताः
tataḥ śakrarathaṁ dṛṣṭvā vimukhaṁ surasattamāḥ sarve pradudruvurbhītāstasya mārgamupāśritāḥ
तब इंद्र के रथ को पीछे मुड़ते देखकर, समस्त श्रेष्ठ देवगण भयभीत होकर उसी मार्ग का अनुसरण करते हुए भाग गए।
श्लोक 65 (skanda.6.119.65)
ततस्तु दानवाः सर्वे भग्नान्दृष्ट्वा रणे सुरान्। शस्त्रवृष्टिं प्रमुंचंतो गर्जमाना यथा घनाः
tatastu dānavāḥ sarve bhagnāndṛṣṭvā raṇe surān śastravṛṣṭiṁ pramuṁcaṁto garjamānā yathā ghanāḥ
तब सभी दानव, युद्ध में देवताओं को पराजित देखकर, मेघों के समान गरजते हुए शस्त्रों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 66 (skanda.6.119.66)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्ता रजनी तमसावृता। न किंचित्तत्र संयाति कस्यचिद्दृष्टिगोचरे
etasminnaṁtare prāptā rajanī tamasāvṛtā na kiṁcittatra saṁyāti kasyaciddṛṣṭigocare
इसी बीच अंधकार से आवृत रात्रि आ गई, जिसमें किसी को भी कुछ भी दिखाई नहीं देता था।
श्लोक 67 (skanda.6.119.67)
ततस्तु दानवाः सर्वे युद्धान्निर्वृत्य सर्वतः। मेरुशृंगं समाश्रित्य रम्यं वासं प्रचक्रमुः
tatastu dānavāḥ sarve yuddhānnirvṛtya sarvataḥ meruśṛṁgaṁ samāśritya ramyaṁ vāsaṁ pracakramuḥ
तब सभी दानव चारों ओर से युद्ध रोककर, मेरु के शिखर पर शरण लेकर वहाँ सुंदर निवास बनाने लगे।
श्लोक 68 (skanda.6.119.68)
विजयेन समायुक्तास्तुष्टिं च परमां गताः। कथाश्चक्रुश्च युद्धोत्था युद्धं तस्य यथा भवत्
vijayena samāyuktāstuṣṭiṁ ca paramāṁ gatāḥ kathāścakruśca yuddhotthā yuddhaṁ tasya yathā bhavat
विजय से युक्त होकर, परम संतोष को प्राप्त होकर, वे युद्ध किस प्रकार हुआ था, इस विषय में युद्ध-संबंधी कथाएँ करने लगे।
श्लोक 69 (skanda.6.119.69)
देवाश्चापि हतोत्साहाः प्रहारैः क्षतविक्षताः। मंत्रं चक्रुर्मिथो भूत्वा बृहस्पतिपुरःसराः
devāścāpi hatotsāhāḥ prahāraiḥ kṣatavikṣatāḥ maṁtraṁ cakrurmitho bhūtvā bṛhaspatipuraḥsarāḥ
देवगण भी उत्साहहीन होकर, प्रहारों से घायल और क्षत-विक्षत होकर, बृहस्पति के नेतृत्व में एकत्र होकर परस्पर परामर्श करने लगे।
श्लोक 70 (skanda.6.119.70)
सांप्रतं दानवैः सैन्यमस्माकं विमुखं कृतम्। विध्वस्तं सुनिरुत्साहमक्षमं युद्धकर्मणि
sāṁprataṁ dānavaiḥ sainyamasmākaṁ vimukhaṁ kṛtam vidhvastaṁ sunirutsāhamakṣamaṁ yuddhakarmaṇi
"अभी दानवों ने हमारी सेना को पीछे हटा दिया है, उसे विध्वस्त, उत्साहहीन और युद्ध के अयोग्य बना दिया है।"
श्लोक 71 (skanda.6.119.71)
तस्मात्त्यक्त्वा प्रवेक्ष्यामः पुरीं चैवामरावतीम्। ब्रह्मणः सदनं यत्र न स्याद्दानवजं भयम्
tasmāttyaktvā pravekṣyāmaḥ purīṁ caivāmarāvatīm brahmaṇaḥ sadanaṁ yatra na syāddānavajaṁ bhayam
"अतः अमरावती नगरी को त्यागकर हम ब्रह्मा के उस भवन में प्रवेश करेंगे, जहाँ दानवों से उत्पन्न कोई भय नहीं होगा।"
श्लोक 72 (skanda.6.119.72)
एवं ते निश्चयं कृत्वा ब्रह्मलोकं ततो गताः। शून्यां शक्रपुरीं कृत्वा सर्वे देवाः सवासवाः
evaṁ te niścayaṁ kṛtvā brahmalokaṁ tato gatāḥ śūnyāṁ śakrapurīṁ kṛtvā sarve devāḥ savāsavāḥ
इस प्रकार निश्चय करके, इंद्र सहित समस्त देवगण, इंद्रपुरी को शून्य छोड़कर ब्रह्मलोक को चले गए।
श्लोक 73 (skanda.6.119.73)
ततः प्रातः समुत्थाय दानवास्ते प्रहर्षिताः। शून्यां शक्रपुरीं दृष्ट्वा विविशुस्तदनंतरम्
tataḥ prātaḥ samutthāya dānavāste praharṣitāḥ śūnyāṁ śakrapurīṁ dṛṣṭvā viviśustadanaṁtaram
फिर प्रातःकाल उठकर, वे दानव अत्यंत हर्षित होकर, इंद्रपुरी को शून्य देखकर उसमें प्रविष्ट हो गए।
श्लोक 74 (skanda.6.119.74)
अथ शाक्रे पदे दैत्यं महिषं संनिधाय च। प्रणेमुस्तुष्टिसंयुक्ताश्चक्रुश्चैव महोत्सवम्
atha śākre pade daityaṁ mahiṣaṁ saṁnidhāya ca praṇemustuṣṭisaṁyuktāścakruścaiva mahotsavam
फिर दैत्य महिष को इंद्र के ही पद पर बैठाकर, उन्होंने संतुष्ट होकर उसे प्रणाम किया और एक महान उत्सव मनाया।
श्लोक 75 (skanda.6.119.75)
जगृहुर्यज्ञभागांश्च सर्वेषां त्रिदिवौकसाम्। देवस्थानेषु सर्वेषु देवताऽभिमताश्च ये
jagṛhuryajñabhāgāṁśca sarveṣāṁ tridivaukasām devasthāneṣu sarveṣu devatā'bhimatāśca ye
समस्त देवस्थानों में जहाँ-जहाँ देवता पूजित होते थे, वहाँ सभी स्वर्गवासी देवताओं के यज्ञ-भागों को उन्होंने (दानवों ने) ग्रहण कर लिया।