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नागर खण्ड · अध्याय 120

कात्यायनी-उत्पत्ति-वर्णन

अध्याय 119अध्याय-सूचीअध्याय 121

श्लोक 1 (skanda.6.120.1)

सूत उवाच। एवं शक्रादयो देवा जितास्ते तु रणाजिरे। महिषेण ततो राज्यं त्रैलोक्येऽपि चकार सः

sūta uvāca evaṁ śakrādayo devā jitāste tu raṇājire mahiṣeṇa tato rājyaṁ trailokye'pi cakāra saḥ

सूत जी ने कहा — इस प्रकार इंद्र आदि देवगण युद्धभूमि में पराजित हो गए; फिर उस महिष ने त्रैलोक्य का राज्य भी अपने अधिकार में कर लिया।

श्लोक 2 (skanda.6.120.2)

यत्किञ्चित्त्रिषु लोकेषु सारभूतं प्रपश्यति। गजवाजिरथाश्वादि सर्वं गृह्णाति सोऽसुरः

yatkiñcittriṣu lokeṣu sārabhūtaṁ prapaśyati gajavājirathāśvādi sarvaṁ gṛhṇāti so'suraḥ

तीनों लोकों में जो कुछ भी उसे श्रेष्ठ वस्तु दिखाई देती — हाथी, घोड़े, रथ आदि — वह असुर सब कुछ छीन लेता था।

श्लोक 3 (skanda.6.120.3)

एवं प्रवर्तमानस्य तस्य देवाः सवासवाः। वधार्थं मिलिताश्चक्रुः कथा दुःखसमन्विताः

evaṁ pravartamānasya tasya devāḥ savāsavāḥ vadhārthaṁ militāścakruḥ kathā duḥkhasamanvitāḥ

उसके इस प्रकार आचरण करते रहने पर, इंद्र सहित देवगण उसके वध के लिए एकत्र होकर दुःखयुक्त होकर विचार-विमर्श करने लगे।

श्लोक 4 (skanda.6.120.4)

एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो नारदो मुनिसत्तमः। दृष्ट्वा तं माहिषं सर्वं व्यवहारं महोत्कटम्

etasminnaṁtare prāpto nārado munisattamaḥ dṛṣṭvā taṁ māhiṣaṁ sarvaṁ vyavahāraṁ mahotkaṭam

इसी बीच श्रेष्ठ मुनि नारद वहाँ आ पहुँचे, जिन्होंने उस महिष के संपूर्ण अत्यंत उग्र आचरण को देखा था।

श्लोक 5 (skanda.6.120.5)

ततश्च कथयामास सर्वं तेषां सविस्तरम्। तस्य संचेष्टितं भूरि लोकत्रयप्रपीडनम्

tataśca kathayāmāsa sarvaṁ teṣāṁ savistaram tasya saṁceṣṭitaṁ bhūri lokatrayaprapīḍanam

फिर उन्होंने उन देवताओं को उसके तीनों लोकों को पीड़ित करने वाले प्रचुर कृत्यों का सारा वृत्तांत विस्तारपूर्वक बताया।

श्लोक 6 (skanda.6.120.6)

अथ तेषां महाकोपो भूय एवाभ्यवर्धत। नारदस्य वचः श्रुत्वा तादृग्लोककथोद्भवम्

atha teṣāṁ mahākopo bhūya evābhyavardhata nāradasya vacaḥ śrutvā tādṛglokakathodbhavam

फिर लोकों की उस प्रकार की दुर्दशा की कथा नारद के मुख से सुनकर, उन देवताओं का महाक्रोध और भी बढ़ गया।

श्लोक 7 (skanda.6.120.7)

तेषां कोपोद्भवो घर्मो वक्त्रद्वारेण निर्ययौ। येन दिङ्मंडलं सर्वं तत्क्षणात्कलुषीकृतम्

teṣāṁ kopodbhavo gharmo vaktradvāreṇa niryayau yena diṅmaṁḍalaṁ sarvaṁ tatkṣaṇātkaluṣīkṛtam

उनके क्रोध से उत्पन्न तेज उनके मुखों से बाहर निकला, जिससे समस्त दिशामंडल उसी क्षण धूमिल हो गया।

श्लोक 8 (skanda.6.120.8)

एतस्मिन्नंतरे तत्र कार्तिकेयः समभ्ययात्। पप्रच्छ च किमेतद्धि देवानां कोपकारणम्। येन कालुष्यतां प्राप्तं दिक्चक्रं सकलं मुने

etasminnaṁtare tatra kārtikeyaḥ samabhyayāt papraccha ca kimetaddhi devānāṁ kopakāraṇam yena kāluṣyatāṁ prāptaṁ dikcakraṁ sakalaṁ mune

इसी बीच वहाँ कार्तिकेय आए और पूछा — "हे मुने! देवताओं के क्रोध का यह क्या कारण है, जिससे संपूर्ण दिक्चक्र धूमिल हो गया है?"

श्लोक 9 (skanda.6.120.9)

नारद उवाच। एतेषां सांप्रतं स्कन्द मया वार्ता निवेदिता। त्रैलोक्यं दानवैः सर्वैर्यथा नीतं मदोत्कटैः

nārada uvāca eteṣāṁ sāṁprataṁ skanda mayā vārtā niveditā trailokyaṁ dānavaiḥ sarvairyathā nītaṁ madotkaṭaiḥ

नारद ने कहा — हे स्कंद! अभी मैंने इन्हें यह समाचार सुनाया है कि किस प्रकार मदोन्मत्त दानवों ने संपूर्ण त्रैलोक्य को अपने अधीन कर लिया है।

श्लोक 10 (skanda.6.120.10)

स्त्रीरत्नमश्वरत्नं वा न किंचित्कस्यचिद्गृहे। ते दृष्ट्वा मोक्षयंति स्म दुर्निवार्या मदोत्कटाः

strīratnamaśvaratnaṁ vā na kiṁcitkasyacidgṛhe te dṛṣṭvā mokṣayaṁti sma durnivāryā madotkaṭāḥ

उन दुर्निवार्य, मदोन्मत्त दानवों ने किसी के भी घर में स्त्री-रत्न या अश्व-रत्न कुछ भी शेष नहीं छोड़ा — जो कुछ भी उन्हें दिखा, उसे वे छीन ले जाते हैं।

श्लोक 11 (skanda.6.120.11)

तच्छ्रुत्वा कार्तिकेयस्य विशेषात्संप्रजायत। वक्त्रद्वारेण देवानां यथा कोपः समागतः

tacchrutvā kārtikeyasya viśeṣātsaṁprajāyata vaktradvāreṇa devānāṁ yathā kopaḥ samāgataḥ

यह सुनकर कार्तिकेय में भी विशेष रूप से वैसा ही क्रोध उत्पन्न हुआ, जैसा अन्य देवताओं के मुखों से प्रकट हुआ था।

श्लोक 12 (skanda.6.120.12)

एतस्मिन्नंतरे जाता तत्कोपांते कुमारिका। सर्वलक्षणसंपन्ना दिव्यतेजोऽन्विता शुभा

etasminnaṁtare jātā tatkopāṁte kumārikā sarvalakṣaṇasaṁpannā divyatejo'nvitā śubhā

इसी बीच उस क्रोध के अंत में एक कुमारी कन्या उत्पन्न हुई, जो सभी शुभ लक्षणों से संपन्न, दिव्य तेज से युक्त और परम सुंदर थी।

श्लोक 13 (skanda.6.120.13)

कार्तिकेयस्य कोपेन कोपे मिश्रे दिवौकसाम्। यस्माज्जातात्र सा कन्या तस्मात्कात्यायनी स्मृता

kārtikeyasya kopena kope miśre divaukasām yasmājjātātra sā kanyā tasmātkātyāyanī smṛtā

चूँकि यह कन्या कार्तिकेय के क्रोध के, देवताओं के क्रोध में मिश्रित होने से उत्पन्न हुई, अतः वह कात्यायनी नाम से स्मरण की गई।

श्लोक 14 (skanda.6.120.14)

ततस्तस्या ददौ वज्रमायुधं त्रिदशाधिपः। शक्तिं स्कन्दः सुतीक्ष्णाग्रां चापं देवो जनार्दनः

tatastasyā dadau vajramāyudhaṁ tridaśādhipaḥ śaktiṁ skandaḥ sutīkṣṇāgrāṁ cāpaṁ devo janārdanaḥ

तब त्रिदशाधिपति इंद्र ने उसे वज्र आयुध दिया, स्कंद ने अत्यंत तीक्ष्ण अग्रभाग वाली शक्ति दी, और भगवान जनार्दन ने धनुष दिया।

श्लोक 15 (skanda.6.120.15)

त्रिशूलं च महादेवः पाशं च वरुणः स्वयम्। आदित्यश्च सितान्बाणांश्चंद्रमाश्चर्म चोत्तमम्

triśūlaṁ ca mahādevaḥ pāśaṁ ca varuṇaḥ svayam ādityaśca sitānbāṇāṁścaṁdramāścarma cottamam

महादेव ने त्रिशूल दिया, स्वयं वरुण ने पाश दिया, सूर्य ने श्वेत बाण दिए, और चंद्रमा ने उत्तम ढाल दी।

श्लोक 16 (skanda.6.120.16)

निस्त्रिंशं निर्ऋतिस्तुष्ट उल्मुकं च हुताशनः। वायुश्च छुरिकां तीक्ष्णां धनदः परिघं तथा

nistriṁśaṁ nirṛtistuṣṭa ulmukaṁ ca hutāśanaḥ vāyuśca churikāṁ tīkṣṇāṁ dhanadaḥ parighaṁ tathā

प्रसन्न निर्ऋति ने खड्ग दिया, अग्नि ने अलात (जलती हुई लकड़ी) दिया, वायु ने तीक्ष्ण छुरी दी, और कुबेर ने वैसे ही परिघ (गदा) दी।

श्लोक 17 (skanda.6.120.17)

दण्डं प्रेताधिपो रौद्रं वधाय सुरविद्विषाम्। द्वादशैवं समालोक्य साऽऽयुधानि द्विजोत्तमाः

daṇḍaṁ pretādhipo raudraṁ vadhāya suravidviṣām dvādaśaivaṁ samālokya sā''yudhāni dvijottamāḥ

प्रेतों के अधिपति यम ने देवताओं के शत्रुओं के वध के लिए भयंकर दंड दिया। हे द्विजोत्तमो! इस प्रकार उन बारह आयुधों को देखकर...

श्लोक 18 (skanda.6.120.18)

कात्यायनी ततश्चक्रे भुजद्वादशकं तदा। जग्राह च द्रुतं तानि सुरास्त्राणि दिवौकसाम्

kātyāyanī tataścakre bhujadvādaśakaṁ tadā jagrāha ca drutaṁ tāni surāstrāṇi divaukasām

...कात्यायनी ने तब बारह भुजाएँ धारण कीं, और देवताओं के उन दिव्य अस्त्रों को शीघ्रतापूर्वक ग्रहण कर लिया।

श्लोक 19 (skanda.6.120.19)

ततः प्रोवाच तान्सर्वान्संप्रहृष्टतनूरुहा। यदर्थं विबुधश्रेष्ठाः सृष्टा तद्ब्रूत मा चिरम्

tataḥ provāca tānsarvānsaṁprahṛṣṭatanūruhā yadarthaṁ vibudhaśreṣṭhāḥ sṛṣṭā tadbrūta mā ciram

फिर रोमांचित होकर उसने उन सबसे कहा — "हे श्रेष्ठ देवो! जिस प्रयोजन के लिए मैं उत्पन्न की गई हूँ, वह बिना विलंब किए बताइए।"

श्लोक 20 (skanda.6.120.20)

सर्वं कार्यं करिष्यामि युष्माकं नात्र संशयः। देवा ऊचुः। महिषो दानवो रौद्रः समुत्पन्नोऽत्र सांप्रतम्। अवध्यः सर्वभूतानां मानुषाणां विशेषतः

sarvaṁ kāryaṁ kariṣyāmi yuṣmākaṁ nātra saṁśayaḥ devā ūcuḥ mahiṣo dānavo raudraḥ samutpanno'tra sāṁpratam avadhyaḥ sarvabhūtānāṁ mānuṣāṇāṁ viśeṣataḥ

"मैं आप सबका सारा कार्य करूँगी, इसमें कोई संदेह नहीं।" देवताओं ने कहा — अभी यहाँ महिष नामक एक भयंकर दानव उत्पन्न हुआ है, जो समस्त प्राणियों द्वारा, विशेष रूप से मनुष्यों द्वारा, अवध्य है।

श्लोक 21 (skanda.6.120.21)

मुक्त्वैकां योषितं तेन त्वमस्माभिर्विनिर्मिता

muktvaikāṁ yoṣitaṁ tena tvamasmābhirvinirmitā

"केवल एक स्त्री को छोड़कर वह किसी से भी अवध्य है; इसी प्रयोजन के लिए तुम्हें हमने उत्पन्न किया है।"

श्लोक 22 (skanda.6.120.22)

तस्मात्त्वं सांप्रतं गच्छ विंध्याख्यं पर्वतोत्तमम्। तपस्तत्र कुरुष्वोग्र तेजो येनाभिवर्धते

tasmāttvaṁ sāṁprataṁ gaccha viṁdhyākhyaṁ parvatottamam tapastatra kuruṣvogra tejo yenābhivardhate

"अतः अब तुम विंध्य नामक उत्तम पर्वत पर जाओ, और वहाँ उग्र तपस्या करो, जिससे तुम्हारा तेज बढ़ता जाए।"

श्लोक 23 (skanda.6.120.23)

ततस्तु तेजःसंयुक्तां त्वां ज्ञात्वा वयमेव हि। अग्रे धृत्वा करिष्यामो युद्धं तेन दुरात्मना

tatastu tejaḥsaṁyuktāṁ tvāṁ jñātvā vayameva hi agre dhṛtvā kariṣyāmo yuddhaṁ tena durātmanā

"फिर तेज से युक्त हुई तुम्हें जानकर, हम स्वयं ही तुम्हें आगे रखकर उस दुरात्मा के साथ युद्ध करेंगे।"

श्लोक 24 (skanda.6.120.24)

ततस्त्वच्छस्त्रनिर्दग्धः पंचत्वं स प्रयास्यति। वयं च त्रिदशैश्वर्यं लभिष्यामो हतद्विषः

tatastvacchastranirdagdhaḥ paṁcatvaṁ sa prayāsyati vayaṁ ca tridaśaiśvaryaṁ labhiṣyāmo hatadviṣaḥ

"फिर तुम्हारे अस्त्रों से भस्म होकर वह मृत्यु को प्राप्त होगा, और शत्रु का नाश होने पर हम पुनः त्रिदश-ऐश्वर्य को प्राप्त करेंगे।"

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