नागर खण्ड · अध्याय 121
महिषासुर-पराजय एवं कात्यायनी-माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.121.1)
सूत उवाच । देवानां तद्वचः श्रुत्वा ततः सा परमेश्वरी । प्रोवाच वाहनं किंचिद्देवा यच्छतु मे द्रुतम्
sūta uvāca devānāṁ tadvacaḥ śrutvā tataḥ sā parameśvarī provāca vāhanaṁ kiṁciddevā yacchatu me drutam
सूत जी ने कहा — देवताओं का वह वचन सुनकर तब उस परमेश्वरी ने कहा, "देवगण! मुझे शीघ्र ही कोई वाहन दो।"
श्लोक 2 (skanda.6.121.2)
ततः सिंहं ददौ गौरी यानार्थं विकृताननम् । तमारुह्य प्रतस्थे सा ततो विंध्यं नगं प्रति
tataḥ siṁhaṁ dadau gaurī yānārthaṁ vikṛtānanam tamāruhya pratasthe sā tato viṁdhyaṁ nagaṁ prati
तब गौरी को विकराल मुख वाला सिंह वाहन के लिए दिया गया; उस पर सवार होकर वे विंध्य पर्वत की ओर चल पड़ीं।
श्लोक 3 (skanda.6.121.3)
तस्यैकं शृंगमास्थाय रम्यं श्रेष्ठद्रुमान्वितम् । फलपुष्पसमाकीर्णं लतामंडपमंडितम्
tasyaikaṁ śṛṁgamāsthāya ramyaṁ śreṣṭhadrumānvitam phalapuṣpasamākīrṇaṁ latāmaṁḍapamaṁḍitam
उस पर्वत के एक रमणीय शिखर पर, जो श्रेष्ठ वृक्षों से युक्त, फल-फूलों से भरा और लता-मंडपों से सुशोभित था, वे जा पहुँचीं।
श्लोक 4 (skanda.6.121.4)
ततस्तपोऽकरोत्साध्वी तीव्रव्रतपरायणा । संयम्येन्द्रियवर्गं स्वं ध्यायमाना महेश्वरम्
tatastapo'karotsādhvī tīvravrataparāyaṇā saṁyamyendriyavargaṁ svaṁ dhyāyamānā maheśvaram
वहाँ उस साध्वी ने तीव्र व्रत में तत्पर होकर, अपनी इंद्रियों को संयमित करके, महेश्वर का ध्यान करते हुए तप किया।
श्लोक 5 (skanda.6.121.5)
यथायथा तपोवृद्धिस्तस्याः सञ्जायते द्विजाः । तथा रूपं च कांतिश्च शरीरे प्रतिवर्धते
yathāyathā tapovṛddhistasyāḥ sañjāyate dvijāḥ tathā rūpaṁ ca kāṁtiśca śarīre prativardhate
हे द्विजो! जैसे-जैसे उनका तप बढ़ता गया, वैसे-वैसे उनके शरीर में रूप और कांति भी बढ़ती गई।
श्लोक 6 (skanda.6.121.6)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्तास्तत्र दैत्येशकिंकराः । ते तां दृष्ट्वा व्रतोपेतामत्यद्भुतवपुर्ध राम् । गत्वा प्रोचुः स्वनाथस्य महिषस्य दुरात्मनः
etasminnaṁtare prāptāstatra daityeśakiṁkarāḥ te tāṁ dṛṣṭvā vratopetāmatyadbhutavapurdha rām gatvā procuḥ svanāthasya mahiṣasya durātmanaḥ
इसी बीच वहाँ दैत्येश्वर के दूत आ पहुँचे; उन्होंने व्रतयुक्त, अत्यंत अद्भुत शरीर वाली उस कन्या को देखकर जाकर अपने दुरात्मा स्वामी महिष को यह समाचार सुनाया।
श्लोक 7 (skanda.6.121.7)
चारा ऊचुः । भ्रममाणैर्धरापृष्ठे दृष्टाऽपूर्वा कुमारिका । विन्ध्याचलेऽद्य चास्माभिर्भुजैर्द्वादशभिर्युता । नानाशस्त्रधरैर्दीप्तैश्चर्मच्छादितगात्रका
cārā ūcuḥ bhramamāṇairdharāpṛṣṭhe dṛṣṭā'pūrvā kumārikā vindhyācale'dya cāsmābhirbhujairdvādaśabhiryutā nānāśastradharairdīptaiścarmacchāditagātrakā
गुप्तचरों ने कहा — "पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए आज हमने विंध्याचल पर एक अपूर्व कुमारी देखी, जो बारह भुजाओं से युक्त थी,"
श्लोक 8 (skanda.6.121.8)
न देवी न च गन्धर्वी नासुरी नागकन्यका । तादृग्रूपा पुराऽस्माभिः काचिद्दृष्टा नितम्बिनी
na devī na ca gandharvī nāsurī nāgakanyakā tādṛgrūpā purā'smābhiḥ kāciddṛṣṭā nitambinī
"नाना प्रकार के देदीप्यमान शस्त्रों को धारण किए हुए, अपने अंगों को कवच से आच्छादित किए हुए।"
श्लोक 9 (skanda.6.121.9)
न विद्मो यन्निमित्तं सा तपश्चक्रे यशस्विनी । स्वर्गकामाऽर्थकामा वा पतिकामाथ वा विभो
na vidmo yannimittaṁ sā tapaścakre yaśasvinī svargakāmā'rthakāmā vā patikāmātha vā vibho
"वह न देवी है, न गंधर्वी, न असुर-कन्या और न नागकन्या; ऐसी विशाल-नितंबिनी स्त्री हमने पहले कभी नहीं देखी।"
श्लोक 10 (skanda.6.121.10)
सूत उवाच । तेषां तद्वचनं श्रुत्वा महिषो दानवाधिपः । कामदेव वशं प्राप्तः श्रवणादपि तत्क्षणात्
sūta uvāca teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā mahiṣo dānavādhipaḥ kāmadeva vaśaṁ prāptaḥ śravaṇādapi tatkṣaṇāt
"हम नहीं जानते कि वह यशस्विनी किस प्रयोजन से तप कर रही है — क्या वह स्वर्ग की कामना से, धन की कामना से, या पति की कामना से यह तप कर रही है, हे प्रभो!"
श्लोक 11 (skanda.6.121.11)
ततस्तानग्रतः कृत्वा सैन्येन महता न्वितः । जगाम कौतुकाविष्टो यत्रास्ते सा तु कन्यका
tatastānagrataḥ kṛtvā sainyena mahatā nvitaḥ jagāma kautukāviṣṭo yatrāste sā tu kanyakā
सूत जी ने कहा — उनका वह वचन सुनते ही दानवाधिपति महिष केवल श्रवण मात्र से ही कामदेव के वश में हो गया।
श्लोक 12 (skanda.6.121.12)
यथा मृत्युकृते मन्दः शृगालः सिंहवल्लभाम् । वने सुप्तां सुविश्वस्तां सर्वथाप्य कुतोभयाम्
yathā mṛtyukṛte mandaḥ śṛgālaḥ siṁhavallabhām vane suptāṁ suviśvastāṁ sarvathāpya kutobhayām
तब उन्हें आगे करके, विशाल सेना के साथ कौतूहल से भरा हुआ वह वहाँ गया जहाँ वह कन्या विराजमान थी।
श्लोक 13 (skanda.6.121.13)
तस्याः संदर्शनादेव ततः कामशरैर्हतः । स दानवप्रधानश्च तत्क्षणादेव सद्द्विजाः
tasyāḥ saṁdarśanādeva tataḥ kāmaśarairhataḥ sa dānavapradhānaśca tatkṣaṇādeva saddvijāḥ
जैसे कोई मूर्ख सियार मृत्यु के वशीभूत होकर वन में सोई हुई, पूर्णतः निश्चिंत, निर्भय सिंहनी की ओर बढ़े,
श्लोक 14 (skanda.6.121.14)
अथ प्राह प्रियं वाक्यमेकाकी तत्पुरःस्थितः । धृत्वा दूरतरेसैन्यं तस्या रूपेण मोहितः
atha prāha priyaṁ vākyamekākī tatpuraḥsthitaḥ dhṛtvā dūrataresainyaṁ tasyā rūpeṇa mohitaḥ
उस देवी के दर्शन मात्र से ही, हे श्रेष्ठ द्विजो, वह दानवप्रधान उसी क्षण कामबाणों से आहत हो गया।
श्लोक 15 (skanda.6.121.15)
विरुद्धं यौवनस्यैतद्व्रतं ते चारुहासिनि । तस्मादेतत्परित्यक्त्वा त्रैलोक्यस्वामिनी भव
viruddhaṁ yauvanasyaitadvrataṁ te cāruhāsini tasmādetatparityaktvā trailokyasvāminī bhava
फिर सेना को दूर रखकर वह अकेला उनके सामने खड़ा हुआ और उनके रूप से मोहित होकर प्रिय वचन बोलने लगा।
श्लोक 16 (skanda.6.121.16)
अहं हि महिषो नाम दानवेन्द्रो यदि श्रुतः । मया येन सहस्राक्षो द्वन्द्वयुद्धे विनिर्जितः
ahaṁ hi mahiṣo nāma dānavendro yadi śrutaḥ mayā yena sahasrākṣo dvandvayuddhe vinirjitaḥ
"हे सुहासिनि! यह व्रत तुम्हारे यौवन के विपरीत है; अतः इसे त्यागकर तुम त्रैलोक्य की स्वामिनी बन जाओ।"
श्लोक 17 (skanda.6.121.17)
त्रेलोक्यं सकलं मह्यं सांप्रतं च वशे स्थितम् । तस्मात्त्वं भव सुश्रोणि भार्या मम सुवल्लभा
trelokyaṁ sakalaṁ mahyaṁ sāṁprataṁ ca vaśe sthitam tasmāttvaṁ bhava suśroṇi bhāryā mama suvallabhā
"यदि तुमने सुना हो तो मैं महिष नामक दानवेन्द्र हूँ, जिसने द्वंद्वयुद्ध में सहस्राक्ष इंद्र को भी परास्त किया है।"
श्लोक 18 (skanda.6.121.18)
सहस्रं मम भार्याणामन्यदस्ति सुशोभनम् । तत्सर्वं तेऽद्य भृत्यत्वं सांप्रतं प्रक रिष्यति
sahasraṁ mama bhāryāṇāmanyadasti suśobhanam tatsarvaṁ te'dya bhṛtyatvaṁ sāṁprataṁ praka riṣyati
"संपूर्ण त्रिलोक अभी मेरे वश में स्थित है; अतः हे सुश्रोणि! तुम मेरी प्रिय और सुंदर पत्नी बन जाओ।"
श्लोक 19 (skanda.6.121.19)
अहं चापि तवात्यंतं दासभावं समाश्रितः । वर्तयिष्यामि सुश्रोणि प्रदत्त्वाऽशेषसंपदः
ahaṁ cāpi tavātyaṁtaṁ dāsabhāvaṁ samāśritaḥ vartayiṣyāmi suśroṇi pradattvā'śeṣasaṁpadaḥ
"मेरी हजार अन्य सुंदर पत्नियाँ हैं; वे सब आज से तुम्हारी सेविका हो जाएँगी।"
श्लोक 20 (skanda.6.121.20)
सूत उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ततः सा परमेश्वरी । प्रोवाच भर्त्समाना तं कोपसंरक्तलोचना
sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā tataḥ sā parameśvarī provāca bhartsamānā taṁ kopasaṁraktalocanā
"और मैं भी, हे सुश्रोणि, अपनी संपूर्ण संपदा तुम्हें अर्पित करके तुम्हारे प्रति अत्यंत दासभाव धारण करके रहूँगा।"
श्लोक 21 (skanda.6.121.21)
धिग्धिक्पापसमाचार कुमारव्रतधारिणीम् । कामोपहतचित्तात्मा किं मामित्थं प्रभा षसे
dhigdhikpāpasamācāra kumāravratadhāriṇīm kāmopahatacittātmā kiṁ māmitthaṁ prabhā ṣase
सूत जी ने कहा — उसका वह वचन सुनकर वह परमेश्वरी क्रोध से रक्त नेत्र किए हुए उसे धिक्कारते हुए बोलीं।
श्लोक 22 (skanda.6.121.22)
अहं तव वधार्थाय निर्मिता विबुधोत्तमैः । तस्मात्त्वां नाशयिष्यामि स्मरेष्टं यद्धृदि स्थितम्
ahaṁ tava vadhārthāya nirmitā vibudhottamaiḥ tasmāttvāṁ nāśayiṣyāmi smareṣṭaṁ yaddhṛdi sthitam
"धिक्कार है, धिक्कार है, हे पापाचारी! कुमारी-व्रत धारण करने वाली से — काम से आहत चित्तवाले! तू मुझसे इस प्रकार क्यों बोल रहा है?"
श्लोक 23 (skanda.6.121.23)
महिष उवाच । यद्येवं तद्वरारोहे युक्ता स्याच्च कुमारिका । प्रार्थनीया भवेदत्र सर्वेषां प्राणिनां यतः
mahiṣa uvāca yadyevaṁ tadvarārohe yuktā syācca kumārikā prārthanīyā bhavedatra sarveṣāṁ prāṇināṁ yataḥ
"मैं तेरे वध के लिए ही श्रेष्ठ देवताओं द्वारा रची गई हूँ; अतः जो कामना तेरे हृदय में स्थित है, उसी सहित मैं तेरा विनाश करूँगी।"
श्लोक 24 (skanda.6.121.24)
स्वर्गार्थं क्रियते धर्मस्तपश्च वरवर्णिनि । येन भोगाः प्रभुञ्जंति ये दिव्या ये च मानुषाः
svargārthaṁ kriyate dharmastapaśca varavarṇini yena bhogāḥ prabhuñjaṁti ye divyā ye ca mānuṣāḥ
महिष ने कहा — "हे वरारोहे! यदि ऐसा है, तो यह कन्या तो सभी प्राणियों द्वारा वांछनीय होने योग्य है, क्योंकि"
श्लोक 25 (skanda.6.121.25)
तस्माद्देहि ममात्मानं गांधर्वेण सुशोभने । विवाहेन यतोऽन्येषां स प्रधानः प्रकीर्तितः
tasmāddehi mamātmānaṁ gāṁdharveṇa suśobhane vivāhena yato'nyeṣāṁ sa pradhānaḥ prakīrtitaḥ
"हे वरवर्णिनि! धर्म और तप स्वर्ग के लिए ही किए जाते हैं, जिनसे दिव्य तथा मानव दोनों प्रकार के जीव भोगों का उपभोग करते हैं।"
श्लोक 26 (skanda.6.121.26)
एवं प्रवदतस्तस्य सा देवी क्रोधमूर्छिता । तद्वक्त्रांतं समुद्दिश्य शरं चिक्षेप स क्षणात्
evaṁ pravadatastasya sā devī krodhamūrchitā tadvaktrāṁtaṁ samuddiśya śaraṁ cikṣepa sa kṣaṇāt
"अतः हे सुशोभने! गांधर्व विवाह द्वारा अपने को मुझे समर्पित करो, क्योंकि यही विवाह अन्य सभी विवाहों में प्रधान कहा गया है।"
श्लोक 27 (skanda.6.121.27)
विवेश वदनं तस्य वल्मीकं पन्नगो यथा । अथ तैर्मार्गगणैर्विद्धः स वक्त्रांतान्नदंस्ततः
viveśa vadanaṁ tasya valmīkaṁ pannago yathā atha tairmārgagaṇairviddhaḥ sa vaktrāṁtānnadaṁstataḥ
उसके ऐसा कहते ही वह देवी क्रोध से मूर्च्छित-सी हो उठीं और तत्क्षण उसके मुख के अंतिम भाग को लक्ष्य करके एक बाण छोड़ा।
श्लोक 28 (skanda.6.121.28)
सुस्राव रुधिरं भूरि गैरिकं पर्वतो यथा । ततः कोपपरीतात्मा निवृत्त्याथ शनैः शनैः
susrāva rudhiraṁ bhūri gairikaṁ parvato yathā tataḥ kopaparītātmā nivṛttyātha śanaiḥ śanaiḥ
वह उसके मुख में वैसे ही घुस गया जैसे सर्प बांबी में घुसता है; तब उन तीक्ष्ण बाणों से बिंधा हुआ वह अपने मुख से गरजने लगा।
श्लोक 29 (skanda.6.121.29)
स्वसैन्यं त्वरितो भेजे कामेन च वशी कृतः । प्रोवाच सैनिकान्सर्वान्दुष्टा स्त्रीयं प्रगृह्यताम् । यथा न त्यजति प्राणान्प्रहारैर्जर्जरीकृता
svasainyaṁ tvarito bheje kāmena ca vaśī kṛtaḥ provāca sainikānsarvānduṣṭā strīyaṁ pragṛhyatām yathā na tyajati prāṇānprahārairjarjarīkṛtā
जैसे पर्वत गेरू बहाता है वैसे ही उसने प्रचुर रक्त बहाया; तब क्रोध से भरा वह धीरे-धीरे पीछे हटकर,
श्लोक 30 (skanda.6.121.30)
एषा मम न सन्देहः प्रिया भार्या भविष्यति । यदि नो शस्त्रपातेन पंचत्वमुपयास्यति
eṣā mama na sandehaḥ priyā bhāryā bhaviṣyati yadi no śastrapātena paṁcatvamupayāsyati
काम के वश में हुआ वह शीघ्रता से अपनी सेना में जा पहुँचा और सैनिकों से बोला, "इस दुष्ट स्त्री को पकड़ लो," "ऐसे कि प्रहारों से चोट खाकर भी वह अपने प्राण न त्यागे। निःसंदेह यह मेरी प्रिय पत्नी बनेगी — यदि शस्त्रों के प्रहार से वह पंचत्व को प्राप्त न हो जाए।"
श्लोक 31 (skanda.6.121.31)
एवमुक्तास्तदा तेन दानवा युद्धदुर्मदाः । दुद्रुवुः सम्मुखास्तस्या मुञ्चन्तो निशिताञ्छरान्
evamuktāstadā tena dānavā yuddhadurmadāḥ dudruvuḥ sammukhāstasyā muñcanto niśitāñcharān
उसके इस प्रकार आदेश देने पर युद्ध में उन्मत्त वे दानव तीक्ष्ण बाण छोड़ते हुए उसकी ओर दौड़ पड़े।
श्लोक 32 (skanda.6.121.32)
एतस्मिन्नंतरे देवी सा दृष्ट्वा तानुपस्थितान् । युद्धाय कृतसंकल्पांस्तर्जतश्च मुहुर्मुहुः
etasminnaṁtare devī sā dṛṣṭvā tānupasthitān yuddhāya kṛtasaṁkalpāṁstarjataśca muhurmuhuḥ
इसी बीच उन्हें युद्ध के लिए संकल्पित होकर बार-बार ललकारते हुए सामने खड़ा देखकर वह देवी सतर्क हो गईं।
श्लोक 33 (skanda.6.121.33)
ततस्तु लीलया देवी मुक्ता तीक्ष्णान्महाशरान् । तान्सर्वांस्ताडयामास सर्वमर्मसु तत्क्षणात्
tatastu līlayā devī muktā tīkṣṇānmahāśarān tānsarvāṁstāḍayāmāsa sarvamarmasu tatkṣaṇāt
तब उस देवी ने लीलामात्र से तीक्ष्ण महाबाण छोड़े और तत्क्षण उन सबको सभी मर्मस्थलों में बींध डाला।
श्लोक 34 (skanda.6.121.34)
अथ तीक्ष्णैः शरैर्दैत्या निहता दानवास्तथा । एके पंचत्वमापन्ना गताश्चान्य इतस्ततः
atha tīkṣṇaiḥ śarairdaityā nihatā dānavāstathā eke paṁcatvamāpannā gatāścānya itastataḥ
उन तीक्ष्ण बाणों से आहत होकर वे दैत्य-दानव मारे गए; कुछ पंचत्व को प्राप्त हो गए और अन्य इधर-उधर भाग गए।
श्लोक 35 (skanda.6.121.35)
ततः सैन्यं समालोक्य तद्भग्नं च तया रणे । कोपाविष्टस्ततो दैत्यः स्वयं तां समुपाद्रवत्
tataḥ sainyaṁ samālokya tadbhagnaṁ ca tayā raṇe kopāviṣṭastato daityaḥ svayaṁ tāṁ samupādravat
तब युद्ध में उस देवी द्वारा अपनी सेना को भग्न देखकर वह दैत्य क्रोध से भरकर स्वयं ही उन पर टूट पड़ा।
श्लोक 36 (skanda.6.121.36)
यच्छञ्छृंगप्रहारांश्च तस्याः शतसहस्रशः । गर्जितं विदधच्चोग्रं शारदाभ्रसमं मुहुः
yacchañchṛṁgaprahārāṁśca tasyāḥ śatasahasraśaḥ garjitaṁ vidadhaccograṁ śāradābhrasamaṁ muhuḥ
वह उन्हें अपने सींगों से सैकड़ों-हज़ारों प्रहार करता हुआ, शरद ऋतु के मेघ के समान भयंकर गर्जना बार-बार करता रहा।
श्लोक 37 (skanda.6.121.37)
एतस्मिन्नंतरे देवी साट्टहासकृतस्वना । त्रैलोक्यविवरं सर्वं यच्छब्देन प्रपूरितम्
etasminnaṁtare devī sāṭṭahāsakṛtasvanā trailokyavivaraṁ sarvaṁ yacchabdena prapūritam
इसी बीच वह देवी अट्टहास करने लगीं, जिसकी ध्वनि से समस्त त्रैलोक्य का सारा अंतराल भर गया।
श्लोक 38 (skanda.6.121.38)
एवं तस्या हसंत्याश्च वक्त्रान्तादथ निर्ययुः । पुलिंदाः शबरा म्लेछास्तथान्येऽरण्यवासिनः
evaṁ tasyā hasaṁtyāśca vaktrāntādatha niryayuḥ puliṁdāḥ śabarā mlechāstathānye'raṇyavāsinaḥ
इस प्रकार हँसती हुई उनके मुख से पुलिंद, शबर, म्लेच्छ तथा अन्य वनवासी गण निकल पड़े,
श्लोक 39 (skanda.6.121.39)
शकाश्च यवनाश्चैव शतशश्तु वपुर्धरा । वर्म स्थगितगात्राश्च यमदूता इवापरे
śakāśca yavanāścaiva śataśaśtu vapurdharā varma sthagitagātrāśca yamadūtā ivāpare
तथा शक और यवन भी सैकड़ों की संख्या में शरीरधारी होकर निकले, कवच से ढके अंगों वाले, मानो यमदूतों के समान अन्य लोग।
श्लोक 40 (skanda.6.121.40)
ते प्रोचुर्देवि नो ब्रूहि येन सृष्टा वयं क्षितौ । कार्येण क्रियते कृत्स्नं येन शीघ्रं वरानने
te procurdevi no brūhi yena sṛṣṭā vayaṁ kṣitau kāryeṇa kriyate kṛtsnaṁ yena śīghraṁ varānane
उन्होंने कहा — "हे देवि! हमें बताओ, हम किसलिए इस पृथ्वी पर उत्पन्न किए गए हैं? हे वरानने! शीघ्र बताओ कि किस कार्य से यह सब संपन्न करना है।"
श्लोक 41 (skanda.6.121.41)
देव्युवाच । एतानस्य सुदुष्टस्य सैनिकान्बलगर्वितान् । सूदयध्वं द्रुतं वाक्यादस्मदीयाद्यथेच्छया
devyuvāca etānasya suduṣṭasya sainikānbalagarvitān sūdayadhvaṁ drutaṁ vākyādasmadīyādyathecchayā
देवी ने कहा — "बल के अभिमान में डूबे इस अत्यंत दुष्ट के इन सैनिकों का अपनी इच्छानुसार मेरे इस वचन से शीघ्र संहार करो।"
श्लोक 42 (skanda.6.121.42)
अथ ते तद्वचः श्रुत्वा वल्गंतोऽसिधनुर्द्धराः । दैतेयबलमुद्दिश्य दुद्रुवुर्वेगमाश्रिताः
atha te tadvacaḥ śrutvā valgaṁto'sidhanurddharāḥ daiteyabalamuddiśya dudruvurvegamāśritāḥ
तब उसका वह वचन सुनकर, तलवार-धनुष धारण करते हुए उछलते-कूदते वे दैत्यों की सेना की ओर वेगपूर्वक दौड़ पड़े।
श्लोक 43 (skanda.6.121.43)
ततस्तेषां महद्युद्धं मिथो जज्ञे सुदारुणम् । नात्मीयं न परं तत्र केनचिज्ज्ञा यते क्वचित्
tatasteṣāṁ mahadyuddhaṁ mitho jajñe sudāruṇam nātmīyaṁ na paraṁ tatra kenacijjñā yate kvacit
तब उनके बीच परस्पर अत्यंत भयंकर महायुद्ध छिड़ गया, जिसमें कहीं भी कोई यह न पहचान पाता था कि कौन अपना है और कौन शत्रु।
श्लोक 44 (skanda.6.121.44)
अथ ते दानवाः सर्वे योधैर्देवीसमुद्भवैः । भग्ना व्यापादिताश्चान्ये प्रहारैर्जर्जरीकृताः
atha te dānavāḥ sarve yodhairdevīsamudbhavaiḥ bhagnā vyāpāditāścānye prahārairjarjarīkṛtāḥ
तब देवी से उत्पन्न उन योद्धाओं के प्रहार से वे सभी दानव भग्न, संहारित तथा तीक्ष्ण प्रहारों से जर्जरित हो गए।
श्लोक 45 (skanda.6.121.45)
ततो भग्नं बलं दृष्ट्वा महिषः क्रोधमूर्छितः । तामुवाच क्रुधा देवीं वचनैः परुषाक्षरैः
tato bhagnaṁ balaṁ dṛṣṭvā mahiṣaḥ krodhamūrchitaḥ tāmuvāca krudhā devīṁ vacanaiḥ paruṣākṣaraiḥ
तब अपनी सेना को भग्न देखकर, क्रोध से मूर्च्छित हुआ महिष क्रोधपूर्वक कठोर वचनों में उस देवी से बोला।
श्लोक 46 (skanda.6.121.46)
आः पापे स्त्रीति मत्वाद्य न हतासि मया युधि । तस्मात्पश्य प्रहारं मे तत्त्वं बुध्यसि नान्यथा
āḥ pāpe strīti matvādya na hatāsi mayā yudhi tasmātpaśya prahāraṁ me tattvaṁ budhyasi nānyathā
"अरे पापिनी! स्त्री समझकर ही मैंने अब तक तुझे युद्ध में नहीं मारा है; अतः अब मेरे प्रहार को देख, तभी तू सच्चाई समझेगी, अन्यथा नहीं।"
श्लोक 47 (skanda.6.121.47)
एवमुक्त्वा विशेषेण प्रहारान्स विचिक्षिपे । विषाणाभ्यां महावेगो भर्त्सयानो मुहुर्मुहुः
evamuktvā viśeṣeṇa prahārānsa vicikṣipe viṣāṇābhyāṁ mahāvego bhartsayāno muhurmuhuḥ
ऐसा कहकर वह अपने दोनों सींगों से बार-बार धमकाते हुए, अत्यंत वेग से विशेष प्रहार करने लगा।
श्लोक 48 (skanda.6.121.48)
ततोऽभ्याशगतं दृष्ट्वा सा देवी दानवं च तम् । आरुरोहाथ वेगेन पृष्ठिदेशेन कोपतः
tato'bhyāśagataṁ dṛṣṭvā sā devī dānavaṁ ca tam ārurohātha vegena pṛṣṭhideśena kopataḥ
तब उस दानव को अपने निकट आया देख देवी ने क्रोधपूर्वक वेगपूर्वक उसकी पीठ पर चढ़ाई कर दी।
श्लोक 49 (skanda.6.121.49)
ततश्चुक्रोश दैत्योऽसौ व्योममार्गं समाश्रितः । पृष्ठ्यास्तलेन निर्भिन्नो रुधिरौघपरिप्लुतः
tataścukrośa daityo'sau vyomamārgaṁ samāśritaḥ pṛṣṭhyāstalena nirbhinno rudhiraughapariplutaḥ
तब आकाश-मार्ग का सहारा लेकर वह दैत्य चीत्कार करने लगा, क्योंकि वह उनके पैरों के तलवों से बिंध गया था और रक्त की धारा से लथपथ हो गया था।
श्लोक 50 (skanda.6.121.50)
एतस्मिन्नंतरे सिंहः स तस्या ज्योतिसंभवः । जग्राह पश्चिमे भागे दंष्ट्राग्रैर्निशितैः क्रुधा
etasminnaṁtare siṁhaḥ sa tasyā jyotisaṁbhavaḥ jagrāha paścime bhāge daṁṣṭrāgrairniśitaiḥ krudhā
इसी बीच उनके तेज से उत्पन्न उस सिंह ने क्रोधपूर्वक अपने तीक्ष्ण दाँतों के अग्रभाग से उसे पिछले भाग से पकड़ लिया।
श्लोक 51 (skanda.6.121.51)
ततो निश्चलतां प्राप्तः पादाक्रांतश्च दानवः । अकरोद्भैरवान्नादान्न शक्तश्चलितुं पदम्
tato niścalatāṁ prāptaḥ pādākrāṁtaśca dānavaḥ akarodbhairavānnādānna śaktaścalituṁ padam
तब पैरों से दबा हुआ वह दानव निश्चल हो गया और एक कदम भी चलने में असमर्थ होकर भयंकर चीत्कार करने लगा।
श्लोक 52 (skanda.6.121.52)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्ताः सर्वे देवाः सवासवाः । व्योमस्थास्तां तदा प्रोचुर्देवीं हर्षसमन्विताः
etasminnaṁtare prāptāḥ sarve devāḥ savāsavāḥ vyomasthāstāṁ tadā procurdevīṁ harṣasamanvitāḥ
इसी बीच इंद्र सहित सभी देवगण वहाँ आ पहुँचे और आकाश में स्थित होकर हर्षपूर्वक उस देवी से बोले।
श्लोक 53 (skanda.6.121.53)
एतस्य शिरसश्छेदं शीघ्रं कुरु सुरेश्वरि । खङ्गेनानेन तीक्ष्णेन यावन्नो याति चान्यतः
etasya śirasaśchedaṁ śīghraṁ kuru sureśvari khaṅgenānena tīkṣṇena yāvanno yāti cānyataḥ
"हे सुरेश्वरि! इस तीक्ष्ण खड्ग से इसका सिर शीघ्र काट डालो, इससे पहले कि यह अन्यत्र चला जाए।"
श्लोक 54 (skanda.6.121.54)
सा श्रुत्वा वचनं तेषां देवी कोपसमन्विता । खड्गं व्यापारयामास कंठे तस्यातिपीवरे
sā śrutvā vacanaṁ teṣāṁ devī kopasamanvitā khaḍgaṁ vyāpārayāmāsa kaṁṭhe tasyātipīvare
उनका यह वचन सुनकर क्रोध से भरी वह देवी उसके अत्यंत मोटे कंठ पर अपनी तलवार चलाने लगीं।
श्लोक 55 (skanda.6.121.55)
स तेन खड्गघातेन कंठः पीनोऽपि निष्ठुरः । द्विधा जज्ञेऽथ दैत्यस्य दधत्तुष्टिं दिवौकसाम्
sa tena khaḍgaghātena kaṁṭhaḥ pīno'pi niṣṭhuraḥ dvidhā jajñe'tha daityasya dadhattuṣṭiṁ divaukasām
उस तलवार के प्रहार से मोटा और कठोर होते हुए भी उसका कंठ दो भागों में विभक्त हो गया, जिससे स्वर्गवासियों को संतोष हुआ।
श्लोक 56 (skanda.6.121.56)
द्वादशार्कप्रतीकाशो वक्त्रांतश्चर्मखड्गधृक् । भर्त्सयंस्तां महादेवीं खड्गोद्यतकरां तदा । खड्गं व्यापारयन्गात्रे तस्या बालार्कसन्निभम्
dvādaśārkapratīkāśo vaktrāṁtaścarmakhaḍgadhṛk bhartsayaṁstāṁ mahādevīṁ khaḍgodyatakarāṁ tadā khaḍgaṁ vyāpārayangātre tasyā bālārkasannibham
बारह सूर्यों के समान तेजस्वी मुखवाला, चर्मयुक्त तलवार धारण किए हुए, वह उस महादेवी को खड्ग उठाकर धमकाते हुए, बालसूर्य के समान तेजस्वी उस खड्ग को उनके शरीर पर चलाने लगा।
श्लोक 57 (skanda.6.121.57)
ततः केशेषु चाधाय यावत्तस्यापि चिक्षिपे । प्रहारं गात्रनाशाय तावदूचे स दानवः
tataḥ keśeṣu cādhāya yāvattasyāpi cikṣipe prahāraṁ gātranāśāya tāvadūce sa dānavaḥ
तब उसके बालों को पकड़कर, ज्यों ही उसने अंग-नाश हेतु प्रहार के लिए उठाया, त्यों ही उस दानव ने कहा —
श्लोक 58 (skanda.6.121.58)
दानव उवाच । जय देवि जयाचिंत्ये जय सर्वसुरेश्वरि । जय सर्वगते देवि जय सर्वजनप्रिये
dānava uvāca jaya devi jayāciṁtye jaya sarvasureśvari jaya sarvagate devi jaya sarvajanapriye
दानव ने कहा — "हे देवि, जय हो! हे अचिंत्ये, जय हो! हे सर्वसुरेश्वरि, जय हो! हे सर्वगते देवि, जय हो! हे सर्वजनप्रिये, जय हो!"
श्लोक 59 (skanda.6.121.59)
जय कामप्रदे नित्यं जय त्रैलोक्यसुन्दरि । जय त्रैलोक्य रक्षार्थमुद्यते ह्यकुतोभये
jaya kāmaprade nityaṁ jaya trailokyasundari jaya trailokya rakṣārthamudyate hyakutobhaye
"हे नित्य कामप्रदे, जय हो! हे त्रैलोक्यसुंदरि, जय हो! हे त्रैलोक्य की रक्षा हेतु उठी हुई निर्भया देवि, जय हो!"
श्लोक 60 (skanda.6.121.60)
जय देवि कृतानंदे जय दैत्यविनाशिनि । जय क्लेशच्छिदे कांते जयाभक्तविमोहदे
jaya devi kṛtānaṁde jaya daityavināśini jaya kleśacchide kāṁte jayābhaktavimohade
"हे आनंदकारिणी देवि, जय हो! हे दैत्यविनाशिनि, जय हो! हे क्लेशहारिणी प्रिये, जय हो! हे अभक्तों को मोहित करने वाली, जय हो!"
श्लोक 61 (skanda.6.121.61)
त्वं सृष्टिस्त्वं वरा देवी त्वं लक्ष्मीस्त्वं सरस्वती । त्वं स्वाहा त्वं स्वधा तुष्टिः पुष्टिर्मेधा धृतिः क्षमा
tvaṁ sṛṣṭistvaṁ varā devī tvaṁ lakṣmīstvaṁ sarasvatī tvaṁ svāhā tvaṁ svadhā tuṣṭiḥ puṣṭirmedhā dhṛtiḥ kṣamā
"तुम ही सृष्टि हो, तुम ही श्रेष्ठ देवी हो, तुम ही लक्ष्मी और तुम ही सरस्वती हो; तुम ही स्वाहा हो, तुम ही स्वधा हो, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, धृति और क्षमा भी तुम्हीं हो।"
श्लोक 62 (skanda.6.121.62)
तस्मात्कुरु प्रसादं मे प्राणान्रक्ष दयां कुरु । प्रणतस्य सुदीनस्य हीनस्य च विशेषतः
tasmātkuru prasādaṁ me prāṇānrakṣa dayāṁ kuru praṇatasya sudīnasya hīnasya ca viśeṣataḥ
"अतः मुझ पर प्रसन्न हो जाओ, मेरे प्राणों की रक्षा करो, विशेष रूप से इस विनम्र, अत्यंत दीन तथा हीन प्राणी पर दया करो।"
श्लोक 63 (skanda.6.121.63)
अहं दुर्वाससा शप्तो हिरण्याक्षसुतो बली । महिषत्वं समानीतस्त्वया देवी विमोक्षितः
ahaṁ durvāsasā śapto hiraṇyākṣasuto balī mahiṣatvaṁ samānītastvayā devī vimokṣitaḥ
"मैं हिरण्याक्ष का बलशाली पुत्र दुर्वासा के शाप से महिष हो गया था; हे देवि! अब तुमने मुझे इस अवस्था से मुक्त किया है।"
श्लोक 64 (skanda.6.121.64)
तस्माद्दर्पः प्रमुक्तोऽद्य मया दानवसंभवः । किंकरत्वं प्रयास्यामि सांप्रतं ते सुरेश्वरि
tasmāddarpaḥ pramukto'dya mayā dānavasaṁbhavaḥ kiṁkaratvaṁ prayāsyāmi sāṁprataṁ te sureśvari
"अतः हे सुरेश्वरि! अब मैंने अपना दानव-जन्मजात दर्प त्याग दिया है; अब मैं तुम्हारा किंकर बनकर रहूँगा।"
श्लोक 65 (skanda.6.121.65)
जय सर्वगते देवि सर्वदुष्टविनाशिनि
jaya sarvagate devi sarvaduṣṭavināśini
"हे सर्वगते देवि, समस्त दुष्टों की विनाशिनी, जय हो!"
श्लोक 66 (skanda.6.121.66)
इति तस्य वचः श्रुत्वा कृपणं सा सुरेश्वरी । कृपाविष्टाऽब्रवीद्वाक्यं ततो व्योमस्थितान्सुरान्
iti tasya vacaḥ śrutvā kṛpaṇaṁ sā sureśvarī kṛpāviṣṭā'bravīdvākyaṁ tato vyomasthitānsurān
उसके इस दीन वचन को सुनकर वह करुणामयी सुरेश्वरी तब आकाश में स्थित देवताओं से बोलीं।
श्लोक 67 (skanda.6.121.67)
किं करोमि दया जाता ममैनं प्रति हे सुराः । तस्मान्नाहं हनिष्यामि दानवं दीनजल्पकम्
kiṁ karomi dayā jātā mamainaṁ prati he surāḥ tasmānnāhaṁ haniṣyāmi dānavaṁ dīnajalpakam
"हे सुरगण! मैं क्या करूँ, मुझे इस पर दया आ गई है; अतः मैं इस दीन वाणी बोलने वाले दानव को नहीं मारूँगी।"
श्लोक 68 (skanda.6.121.68)
विमुखं खड्गशस्त्रं च तवास्मीति प्रवादिनम् । अपि मे पितृहंतारं न हन्यां रिपुमाहवे
vimukhaṁ khaḍgaśastraṁ ca tavāsmīti pravādinam api me pitṛhaṁtāraṁ na hanyāṁ ripumāhave
"जो कहता है कि अब उसका खड्ग-शस्त्र तुम्हारे विरुद्ध नहीं होगा और वह तुम्हारा ही है — अपने पिता के हत्यारे शत्रु को भी मैं युद्ध में नहीं मारूँगी।"
श्लोक 69 (skanda.6.121.69)
देवा ऊचुः । न चेदसि च देवेशि त्वमेनं दानवाधमम् । नाशयिष्यति तत्कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम्
devā ūcuḥ na cedasi ca deveśi tvamenaṁ dānavādhamam nāśayiṣyati tatkṛtsnaṁ trailokyaṁ sacarācaram
देवताओं ने कहा — "हे देवेशि! यदि तुम इस नीच दानव को नष्ट नहीं करोगी, तो यह चराचर सहित संपूर्ण त्रैलोक्य को नष्ट कर देगा।"
श्लोक 70 (skanda.6.121.70)
एष व्यर्थःश्रमः सर्वस्तथास्माकं भविष्यति । तव संभूतिसंभूतस्तव क्लेशस्तथाऽखिलः
eṣa vyarthaḥśramaḥ sarvastathāsmākaṁ bhaviṣyati tava saṁbhūtisaṁbhūtastava kleśastathā'khilaḥ
"तब हमारा यह सारा परिश्रम व्यर्थ हो जाएगा और तुम्हारा भी वह सारा कष्ट, जो तुम्हारे ही उद्भव से उत्पन्न हुआ था, व्यर्थ चला जाएगा।"
श्लोक 71 (skanda.6.121.71)
देव्युवाच । नाहमेनं हनिष्यामि त्यजिष्यामि तथाऽमराः । एनं कचग्रहं कृत्वा धारयिष्यामि सर्वदा
devyuvāca nāhamenaṁ haniṣyāmi tyajiṣyāmi tathā'marāḥ enaṁ kacagrahaṁ kṛtvā dhārayiṣyāmi sarvadā
देवी ने कहा — "हे अमरगण! मैं इसे न तो मारूँगी और न ही छोड़ूँगी; इसके बालों को पकड़े हुए ही मैं इसे सदा धारण किए रहूँगी।"
श्लोक 72 (skanda.6.121.72)
देवा ऊचुः । साधुसाधु महाभागे युक्तमुक्तं त्वया वचः । एतद्धि युज्यते कर्तुं कालेऽस्मिंस्त्रिदशेश्वरि
devā ūcuḥ sādhusādhu mahābhāge yuktamuktaṁ tvayā vacaḥ etaddhi yujyate kartuṁ kāle'smiṁstridaśeśvari
देवताओं ने कहा — "साधु, साधु, हे महाभागे! तुमने जो युक्तियुक्त वचन कहा है, वह उचित ही है; हे त्रिदशेश्वरि! इस समय ऐसा करना ही योग्य है।"
श्लोक 73 (skanda.6.121.73)
सांप्रतं मर्त्यलोके त्वं रूपमेतत्समाश्रिता । शस्त्रोद्यतकरा रौद्रा महिषोपरि संस्थिता
sāṁprataṁ martyaloke tvaṁ rūpametatsamāśritā śastrodyatakarā raudrā mahiṣopari saṁsthitā
"अभी इस मर्त्यलोक में तुमने यह रूप धारण किया है, हाथ में शस्त्र उठाए हुए रौद्ररूपिणी, महिष के ऊपर स्थित हुई,"
श्लोक 74 (skanda.6.121.74)
अवाप्स्यसि परां पूजां दुर्लभा ममरैरपि । यस्त्वामेतेन रूपेण संस्थितां पूजयिष्यति
avāpsyasi parāṁ pūjāṁ durlabhā mamarairapi yastvāmetena rūpeṇa saṁsthitāṁ pūjayiṣyati
"तुम इस रूप में स्थित होकर तुम्हारी पूजा करने वाले से देवताओं के लिए भी दुर्लभ ऐसी परम पूजा प्राप्त करोगी।"
श्लोक 75 (skanda.6.121.75)
त्वमस्य संगतो भावि विख्याता विंध्यवासिनी । किं ते वा बहुनोक्तेन शृणु संक्षेपतो वचः
tvamasya saṁgato bhāvi vikhyātā viṁdhyavāsinī kiṁ te vā bahunoktena śṛṇu saṁkṣepato vacaḥ
"इस महिष के साथ संबद्ध रहकर तुम विंध्यवासिनी नाम से विख्यात होगी। अधिक कहने से क्या लाभ — संक्षेप में हमारा वचन सुनो।"
श्लोक 76 (skanda.6.121.76)
अस्मदीयं परं तथ्यं सर्वलोकहितावहम् । पार्थिवानां त्वदायत्तं बलं देवि भविष्यति
asmadīyaṁ paraṁ tathyaṁ sarvalokahitāvaham pārthivānāṁ tvadāyattaṁ balaṁ devi bhaviṣyati
"हे देवि! यह हमारा परम और सत्य वचन है, जो संपूर्ण जगत के हित के लिए है — राजाओं का बल तुम पर ही निर्भर रहेगा।"
श्लोक 77 (skanda.6.121.77)
युद्धकाले समुत्पन्ने भक्तानां नात्र संशयः । प्रस्थानं वा प्रवेशं च यः करिष्यति मानवः
yuddhakāle samutpanne bhaktānāṁ nātra saṁśayaḥ prasthānaṁ vā praveśaṁ ca yaḥ kariṣyati mānavaḥ
"युद्ध का समय आने पर भक्तों के लिए इसमें कोई संशय नहीं — जो भी मनुष्य प्रस्थान करते समय या प्रवेश करते समय,"
श्लोक 78 (skanda.6.121.78)
त्वां स्मृत्वा प्रणिपत्याथ पूजयित्वा विशेषतः । तस्य संपत्स्यते सिद्धिः सर्वकृत्येषु सर्वदा । इह कापुरुषस्यापि किं पुनः सुभटस्य च
tvāṁ smṛtvā praṇipatyātha pūjayitvā viśeṣataḥ tasya saṁpatsyate siddhiḥ sarvakṛtyeṣu sarvadā iha kāpuruṣasyāpi kiṁ punaḥ subhaṭasya ca
"तुम्हारा स्मरण करके, प्रणाम करके तथा विशेष रूप से पूजा करके, उसे सभी कार्यों में सदा सिद्धि प्राप्त होगी — यहाँ तो कायर पुरुष की भी यह गति है, फिर वीर योद्धा की तो बात ही क्या।"
श्लोक 79 (skanda.6.121.79)
आश्विनस्य सिते पक्षे नवम्यां चाष्टमीदिने । पूजयिष्यति यो मर्त्त्यस्त्वां सद्भक्तिसमन्वितः
āśvinasya site pakṣe navamyāṁ cāṣṭamīdine pūjayiṣyati yo marttyastvāṁ sadbhaktisamanvitaḥ
"आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में, नवमी और अष्टमी के दिन जो मनुष्य सच्ची भक्ति से युक्त होकर तुम्हारी पूजा करेगा,"
श्लोक 80 (skanda.6.121.80)
तस्य संवत्सरं यावत्समग्रं सुरसुन्दरि । न भविष्यति वै रोगो न भयं न पराभवः । नापमृत्युर्न चौरादि समुद्भूत उपद्रवः
tasya saṁvatsaraṁ yāvatsamagraṁ surasundari na bhaviṣyati vai rogo na bhayaṁ na parābhavaḥ nāpamṛtyurna caurādi samudbhūta upadravaḥ
"हे देवसुंदरि! उसे पूरे एक वर्ष तक न कोई रोग होगा, न भय, न पराभव, न अकाल मृत्यु और न चोरों आदि से उत्पन्न कोई उपद्रव होगा।"
श्लोक 81 (skanda.6.121.81)
सूत उवाच । एवमुक्त्वाथ ते देवास्तां देवीं हर्षसंयुताः । अनुज्ञातास्तया जग्मुः स्वां पुरीममरावतीम्
sūta uvāca evamuktvātha te devāstāṁ devīṁ harṣasaṁyutāḥ anujñātāstayā jagmuḥ svāṁ purīmamarāvatīm
सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर हर्षित हुए वे देवगण उस देवी से आज्ञा लेकर अपनी नगरी अमरावती को चले गए।
श्लोक 82 (skanda.6.121.82)
तत्र गत्वा चिरात्प्राप्य स्वं राज्यं पाकशासनः । पालयामास संहृष्टस्त्रैलोक्यं हतकटकम्
tatra gatvā cirātprāpya svaṁ rājyaṁ pākaśāsanaḥ pālayāmāsa saṁhṛṣṭastrailokyaṁ hatakaṭakam
वहाँ जाकर बहुत समय बाद अपने राज्य को प्राप्त कर, इंद्र संतुष्ट होकर उस त्रैलोक्य का पालन करने लगे, जिसकी शत्रु-सेना नष्ट हो चुकी थी।
श्लोक 83 (skanda.6.121.83)
लोकाश्च सुखसंपन्नाः सर्वे जाता स्ततः परम् । यज्ञभागभुजो देवा भूयो जाता जगत्त्रये
lokāśca sukhasaṁpannāḥ sarve jātā stataḥ param yajñabhāgabhujo devā bhūyo jātā jagattraye
तत्पश्चात् समस्त लोक सुख-संपन्न हो गए, और यज्ञ-भाग का उपभोग करने वाले देवगण पुनः तीनों लोकों में उत्पन्न हुए।
श्लोक 84 (skanda.6.121.84)
ततः परं च सा देवी त्रैलोक्ये ख्यातिमागता । सर्वक्षेत्रेषु तीर्थेषु स्थानेषु च विशेषतः
tataḥ paraṁ ca sā devī trailokye khyātimāgatā sarvakṣetreṣu tīrtheṣu sthāneṣu ca viśeṣataḥ
इसके पश्चात् वह देवी त्रैलोक्य में, विशेष रूप से समस्त क्षेत्रों, तीर्थों और स्थानों में, प्रसिद्धि को प्राप्त हुईं।
श्लोक 85 (skanda.6.121.85)
एतस्मिन्नंतरे जातः सुरथोनाम भूपतिः । आनर्तस्तेन सद्भक्त्या क्षेत्रेऽत्रैव विनिर्मिता
etasminnaṁtare jātaḥ surathonāma bhūpatiḥ ānartastena sadbhaktyā kṣetre'traiva vinirmitā
इसी बीच सुरथ नामक एक राजा उत्पन्न हुआ, जिसने सच्ची भक्ति से इस क्षेत्र में ही आनर्त (देवी के मंदिर) का निर्माण कराया।
श्लोक 86 (skanda.6.121.86)
यस्तां पश्यति सद्भक्त्या चैत्राष्टम्यां सितेऽहनि । स पुमान्वत्सरं यावत्कृतार्थः स्यान्न संशयः
yastāṁ paśyati sadbhaktyā caitrāṣṭamyāṁ site'hani sa pumānvatsaraṁ yāvatkṛtārthaḥ syānna saṁśayaḥ
जो व्यक्ति चैत्र मास की शुक्ल अष्टमी को सच्ची भक्ति से उनका दर्शन करता है, वह पुरुष निःसंदेह पूरे वर्ष भर कृतार्थ रहता है।