नागर खण्ड · अध्याय 122
केदार-उत्पत्ति का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.122.1)
सूत उवाच । एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोस्मि द्विजोत्तमाः । यथा स निहतो देव्या महिषाख्यो दनूत्तमः
sūta uvāca etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭosmi dvijottamāḥ yathā sa nihato devyā mahiṣākhyo danūttamaḥ
सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ द्विजो! जो कुछ भी आपने पूछा था, अर्थात् दानवश्रेष्ठ महिष नामक असुर देवी के हाथों कैसे मारा गया, वह सब मैंने आपको बता दिया।
श्लोक 2 (skanda.6.122.2)
सांप्रतं कीर्तयिष्यामि कथां पातकनाशिनीम् । केदारसंभवां पुण्यां तां शृणुध्वं समाहिताः
sāṁprataṁ kīrtayiṣyāmi kathāṁ pātakanāśinīm kedārasaṁbhavāṁ puṇyāṁ tāṁ śṛṇudhvaṁ samāhitāḥ
अब मैं पापनाशिनी कथा का वर्णन करूँगा — केदार की उत्पत्ति से संबंधित उस पवित्र कथा को एकाग्रचित्त होकर सुनो।
श्लोक 3 (skanda.6.122.3)
ऋषय ऊचुः । केदारः श्रूयते सूत गंगाद्वारे हिमाचले । स कथं चेह संप्राप्तः सर्वं विस्तरतो वद
ṛṣaya ūcuḥ kedāraḥ śrūyate sūta gaṁgādvāre himācale sa kathaṁ ceha saṁprāptaḥ sarvaṁ vistarato vada
ऋषियों ने कहा — हे सूत! हमने सुना है कि केदार गंगाद्वार में हिमाचल पर है; वह यहाँ कैसे प्राप्त हुआ, यह सब विस्तार से बताइए।
श्लोक 4 (skanda.6.122.4)
सूत उवाच । एतत्सत्यं गिरौ तस्मिन्स्वयंभूः संस्थितः प्रभुः । परं तत्र वसेद्देवो यावन्मासाष्टकं द्विजाः
sūta uvāca etatsatyaṁ girau tasminsvayaṁbhūḥ saṁsthitaḥ prabhuḥ paraṁ tatra vaseddevo yāvanmāsāṣṭakaṁ dvijāḥ
सूत जी ने कहा — यह सत्य है कि उस पर्वत पर स्वयंभू प्रभु स्थित हैं; किंतु हे द्विजो! देव वहाँ केवल आठ महीने तक ही निवास करते हैं।
श्लोक 5 (skanda.6.122.5)
यावद्घर्मश्च वर्षा च तावत्तत्र वसेत्प्रभुः । शीतकाले पुनश्चात्र क्षेत्रे संतिष्ठते सदा
yāvadgharmaśca varṣā ca tāvattatra vasetprabhuḥ śītakāle punaścātra kṣetre saṁtiṣṭhate sadā
जब तक ग्रीष्म और वर्षा ऋतु रहती है, तब तक ही प्रभु वहाँ निवास करते हैं; शीतकाल में वे पुनः इसी क्षेत्र में सदा स्थित रहते हैं।
श्लोक 6 (skanda.6.122.6)
ऋषय ऊचुः । किं तत्कार्यं वसेद्येन क्षेत्रे मासचतुष्टयम् । हिमाचले यथैवाष्टौ सूतपुत्र वदस्व नः
ṛṣaya ūcuḥ kiṁ tatkāryaṁ vasedyena kṣetre māsacatuṣṭayam himācale yathaivāṣṭau sūtaputra vadasva naḥ
ऋषियों ने कहा — हे सूतपुत्र! जिस प्रकार आठों महीने हिमाचल में, उसी प्रकार शेष चार महीनों में इस क्षेत्र में रहने का क्या कारण है, हमें बताइए।
श्लोक 7 (skanda.6.122.7)
सूत उवाच । पूर्वं स्वायंभुवस्यादौ मनोर्दैत्यो महाबलः । हिरण्याक्षो महातेजास्तपोवीर्यसमन्वितः
sūta uvāca pūrvaṁ svāyaṁbhuvasyādau manordaityo mahābalaḥ hiraṇyākṣo mahātejāstapovīryasamanvitaḥ
सूत जी ने कहा — पहले, स्वायंभुव मन्वंतर के आरंभ में, हिरण्याक्ष नामक एक महाबली, महातेजस्वी दैत्य था, जो तप और वीर्य से युक्त था।
श्लोक 8 (skanda.6.122.8)
तैर्व्याप्तं जगदेतद्धि निरस्य त्रिदशाधिपम् । यज्ञ भागाश्चदेवानां हृता वीर्यप्रभावतः
tairvyāptaṁ jagadetaddhi nirasya tridaśādhipam yajña bhāgāścadevānāṁ hṛtā vīryaprabhāvataḥ
उनके द्वारा यह संपूर्ण जगत व्याप्त हो गया था; उन्होंने देवराज इंद्र को हटाकर देवताओं के यज्ञभाग को अपने बल के प्रभाव से छीन लिया था।
श्लोक 9 (skanda.6.122.9)
अथ शक्रः सुरैः सार्धं गंगाद्वारं समाश्रितः । तपस्तेपे सुदुःखार्तो राज्यश्रीपरिवर्जितः
atha śakraḥ suraiḥ sārdhaṁ gaṁgādvāraṁ samāśritaḥ tapastepe suduḥkhārto rājyaśrīparivarjitaḥ
तब देवताओं सहित इंद्र गंगाद्वार में जाकर, राज्यलक्ष्मी से वंचित होकर, अत्यंत दुःखी होकर तप करने लगे।
श्लोक 10 (skanda.6.122.10)
तस्यैवं तप्यमानस्य तपस्तीव्रं महात्मनः । माहिषं रूपमास्थाय निश्चक्राम धरातलात्
tasyaivaṁ tapyamānasya tapastīvraṁ mahātmanaḥ māhiṣaṁ rūpamāsthāya niścakrāma dharātalāt
इस प्रकार तीव्र तप करते हुए उस महात्मा इंद्र के तप के प्रभाव से महादेव भैंसे का रूप धारण करके पृथ्वीतल से प्रकट हुए।
श्लोक 11 (skanda.6.122.11)
स्वयमेव महादेवस्ततः शक्रमुवाच ह । केदारयामि मे शीघ्रं ब्रूहि सर्वं सुरोत्तम । दैत्यानामथ सर्वेषां रूपेणानेन वासव
svayameva mahādevastataḥ śakramuvāca ha kedārayāmi me śīghraṁ brūhi sarvaṁ surottama daityānāmatha sarveṣāṁ rūpeṇānena vāsava
स्वयं महादेव ने तब इंद्र से कहा, "हे सुरश्रेष्ठ! मैं शीघ्र ही इसे विदीर्ण करूँगा (केदारयामि); हे वासव! समस्त दैत्यों के इस रूप में मुझे सब कुछ शीघ्र बताओ।"
श्लोक 12 (skanda.6.122.12)
इन्द्र उवाच । हिरण्याक्षो महादैत्यः सुबाहुर्वक्र कन्धरः । त्रिशृंगो लोहिताक्षश्च पंचैतान्दारय प्रभो । हतैरेतैर्हतं सर्वं दानवानामसंशयम्
indra uvāca hiraṇyākṣo mahādaityaḥ subāhurvakra kandharaḥ triśṛṁgo lohitākṣaśca paṁcaitāndāraya prabho hatairetairhataṁ sarvaṁ dānavānāmasaṁśayam
इंद्र ने कहा — "हिरण्याक्ष महादैत्य सुबाहु और टेढ़ी गर्दन वाला है, त्रिशृंग और लोहिताक्ष भी हैं — हे प्रभो! इन पाँचों को विदीर्ण कीजिए। इनके मारे जाने पर निःसंदेह समस्त दानव मारे गए समझे जाएँगे।"
श्लोक 13 (skanda.6.122.13)
किमन्यैः कृपणैर्ध्वस्तैर्यैः किंचिन्नात्र सिध्यति । तस्य तद्वचनश्रुत्वा भगवांस्तूर्णमभ्यगात् । यत्र दानवमुख्योऽसौ हिरण्याक्षो महाबलः
kimanyaiḥ kṛpaṇairdhvastairyaiḥ kiṁcinnātra sidhyati tasya tadvacanaśrutvā bhagavāṁstūrṇamabhyagāt yatra dānavamukhyo'sau hiraṇyākṣo mahābalaḥ
"अन्य तुच्छ दानवों के नष्ट होने से क्या लाभ, जिनसे यहाँ कुछ भी सिद्ध नहीं होता?" उनका यह वचन सुनकर भगवान तुरंत वहाँ गए, जहाँ वह महाबली दानवमुख्य हिरण्याक्ष था।
श्लोक 14 (skanda.6.122.14)
अथ तं दूरतो दृष्ट्वा महिषं पर्वतोपमम् । आयातं रौद्ररूपेण दानवाः सर्वतश्च ते
atha taṁ dūrato dṛṣṭvā mahiṣaṁ parvatopamam āyātaṁ raudrarūpeṇa dānavāḥ sarvataśca te
तब उस पर्वत के समान भैंसे को रौद्र रूप में दूर से आता देखकर, वे दानव सब दिशाओं से एकत्र हो गए।
श्लोक 15 (skanda.6.122.15)
ततो जघ्नुश्च पाषाणैर्लगुडैश्च तथापरे । क्ष्वेडितास्फोटितांश्चक्रुस्तथान्ये बलगर्विताः
tato jaghnuśca pāṣāṇairlaguḍaiśca tathāpare kṣveḍitāsphoṭitāṁścakrustathānye balagarvitāḥ
फिर कुछ ने पत्थरों और लाठियों से उस पर प्रहार किया, तथा अन्य बलगर्वित दानवों ने ललकारते हुए चुनौतियाँ दीं।
श्लोक 16 (skanda.6.122.16)
अथवमन्य तान्देवः प्रहारं लीलया ददौ । यत्रास्ते दानवेन्द्रोऽसौ चतुर्भिः सचिवैः सह
athavamanya tāndevaḥ prahāraṁ līlayā dadau yatrāste dānavendro'sau caturbhiḥ sacivaiḥ saha
उन्हें तुच्छ समझकर देव ने लीलामात्र से प्रहार किया, वहाँ जहाँ वह दानवेन्द्र अपने चार मंत्रियों सहित खड़ा था।
श्लोक 17 (skanda.6.122.17)
ततः शस्त्रं समुद्यम्य यावद्धावति सम्मुखः । तावच्छृंगप्रहारेण सोनयद्यमसादनम्
tataḥ śastraṁ samudyamya yāvaddhāvati sammukhaḥ tāvacchṛṁgaprahāreṇa sonayadyamasādanam
फिर जब तक वह शस्त्र उठाकर सामने दौड़ता, तब तक ही सींग के एक ही प्रहार से उसने उसे यमलोक भेज दिया।
श्लोक 18 (skanda.6.122.18)
हत्वा तं सचिवान्पश्चात्सुबाहुप्रमुखांश्च तान् । जघान हन्यमानोऽपि समन्ताद्दानवैः परैः
hatvā taṁ sacivānpaścātsubāhupramukhāṁśca tān jaghāna hanyamāno'pi samantāddānavaiḥ paraiḥ
उसे मारकर, तत्पश्चात् सुबाहु आदि उसके मंत्रियों को भी मारते हुए, वह अन्य दानवों द्वारा चारों ओर से घेरे जाने पर भी उन्हें मारता रहा।
श्लोक 19 (skanda.6.122.19)
न तस्य लगते क्वापि शस्त्रं गात्रे कथंचन । यत्नतोऽपि विसृष्टं च लब्धलक्षैः प्रहारिभिः
na tasya lagate kvāpi śastraṁ gātre kathaṁcana yatnato'pi visṛṣṭaṁ ca labdhalakṣaiḥ prahāribhiḥ
उसके शरीर पर कहीं भी कोई शस्त्र नहीं लगता था, चाहे लक्ष्य साधने में निपुण योद्धा प्रयत्नपूर्वक ही उसे क्यों न चलाते।
श्लोक 20 (skanda.6.122.20)
एवं पंच प्रधानास्तान्हत्वा दैत्यान्महेश्वरः । भूयो जगाम तं देशं यत्र शक्रो व्यवस्थितः । अब्रवीच्च प्रहष्टात्मा ततः शक्रं तपोन्वितम्
evaṁ paṁca pradhānāstānhatvā daityānmaheśvaraḥ bhūyo jagāma taṁ deśaṁ yatra śakro vyavasthitaḥ abravīcca prahaṣṭātmā tataḥ śakraṁ taponvitam
इस प्रकार महेश्वर ने उन पाँचों प्रमुख दैत्यों को मारकर पुनः उसी स्थान पर गमन किया जहाँ इंद्र स्थित थे, और अत्यंत प्रसन्न होकर तप में लीन उस इंद्र से बोले।
श्लोक 21 (skanda.6.122.21)
मया ते निहताः पंच दानवा ये त्वयेरिताः । तस्मात्त्रैलोक्यराज्यं स्वं भूय एव समाचर
mayā te nihatāḥ paṁca dānavā ye tvayeritāḥ tasmāttrailokyarājyaṁ svaṁ bhūya eva samācara
"जिन पाँच दानवों को तुमने बताया था, मैंने उन्हें मार डाला है; अतः अब तुम पुनः अपने त्रैलोक्य के राज्य का संचालन करो।"
श्लोक 22 (skanda.6.122.22)
मत्तोऽन्यदपि देवेश वरं प्रार्थय वांछितम् । कैलासशिखरं येन गच्छामि त्वरयाऽन्वितः
matto'nyadapi deveśa varaṁ prārthaya vāṁchitam kailāsaśikharaṁ yena gacchāmi tvarayā'nvitaḥ
"हे देवेश! इसके अतिरिक्त भी जो तुम्हें अभीष्ट हो, वह वर माँगो, जिससे मैं शीघ्रता के साथ कैलाश शिखर को लौट सकूँ।"
श्लोक 23 (skanda.6.122.23)
इन्द्र उवाच । अनेनैव हि रूपेण तिष्ठ त्वं चात्र शंकर । त्रैलोक्यरक्षणार्थाय धर्माय च शिवाय च
indra uvāca anenaiva hi rūpeṇa tiṣṭha tvaṁ cātra śaṁkara trailokyarakṣaṇārthāya dharmāya ca śivāya ca
इंद्र ने कहा — "हे शंकर! आप इसी रूप में यहीं विराजमान रहें, त्रैलोक्य की रक्षा के लिए, धर्म के लिए तथा कल्याण के लिए।"
श्लोक 24 (skanda.6.122.24)
श्रीभगवानुवाच । एतद्रूपं मया शक्र कृतं तस्य वधाय वै । अवध्यः सर्वभूतानां यतोन्येषां मया हतः
śrībhagavānuvāca etadrūpaṁ mayā śakra kṛtaṁ tasya vadhāya vai avadhyaḥ sarvabhūtānāṁ yatonyeṣāṁ mayā hataḥ
श्री भगवान ने कहा — "हे शक्र! मैंने यह रूप उसी के वध के लिए धारण किया था; चूँकि दूसरों (उपायों) से वह अवध्य था, इसलिए मैंने उसे इसी रूप में मारा।"
श्लोक 25 (skanda.6.122.25)
तस्मादत्रैव ते वाक्यात्स्थास्यामि सुर सत्तम । अनेनैव तु रूपेण मोक्षदः सर्वदेहिनाम्
tasmādatraiva te vākyātsthāsyāmi sura sattama anenaiva tu rūpeṇa mokṣadaḥ sarvadehinām
"अतः तुम्हारे ही वचन से मैं यहीं स्थित रहूँगा, हे श्रेष्ठ देव; और इसी रूप में समस्त प्राणियों को मोक्ष देने वाला बनूँगा।"
श्लोक 26 (skanda.6.122.26)
एवमुक्त्वा विरूपाक्षश्चक्रे कुंडं ततः परम् । शुद्धस्फटिकसंकाशं सुस्वादुक्षीरवत्प्रियम्
evamuktvā virūpākṣaścakre kuṁḍaṁ tataḥ param śuddhasphaṭikasaṁkāśaṁ susvādukṣīravatpriyam
ऐसा कहकर विरूपाक्ष ने वहाँ एक श्रेष्ठ कुण्ड बनाया, जो शुद्ध स्फटिक के समान स्वच्छ और सुस्वादु दूध के समान प्रिय था।
श्लोक 27 (skanda.6.122.27)
ततः प्रोवाच देवेन्द्रं मेघगंभीरया गिरा । शृण्वतां सर्वदेवानां भगवांस्त्रिपुरातकः
tataḥ provāca devendraṁ meghagaṁbhīrayā girā śṛṇvatāṁ sarvadevānāṁ bhagavāṁstripurātakaḥ
फिर, समस्त देवताओं के सुनते हुए, त्रिपुरांतक भगवान ने मेघ के समान गंभीर वाणी में इंद्र से कहा।
श्लोक 28 (skanda.6.122.28)
यो मां दृष्ट्वा शुचिर्भूत्वा कुंडमेतत्प्रपश्यति । त्रिः पीत्वा वामसव्येन द्वाभ्यां चैव ततो जलम्
yo māṁ dṛṣṭvā śucirbhūtvā kuṁḍametatprapaśyati triḥ pītvā vāmasavyena dvābhyāṁ caiva tato jalam
"जो कोई मुझे देखकर शुद्ध होकर इस कुण्ड को देखता है, और तीन बार बाएँ तथा दाएँ हाथ से जल पीता है,"
श्लोक 29 (skanda.6.122.29)
कराभ्यां स पुमान्नूनं तारयेच्च कुलत्रयम् । अपि पापसमाचारं नरकेऽपि व्यव स्थितम्
karābhyāṁ sa pumānnūnaṁ tārayecca kulatrayam api pāpasamācāraṁ narake'pi vyava sthitam
"वह पुरुष निश्चय ही अपनी तीन पीढ़ियों को तार देता है — चाहे वे नरक में पड़े हुए पापाचारी ही क्यों न हों।"
श्लोक 30 (skanda.6.122.30)
वामेन मातृकं पक्षं दक्षिणेनाथ पैतृकम् । उभाभ्यामथ चात्मानं कराभ्यां मद्वचो यथा
vāmena mātṛkaṁ pakṣaṁ dakṣiṇenātha paitṛkam ubhābhyāmatha cātmānaṁ karābhyāṁ madvaco yathā
"बाएँ हाथ से माता के कुल के लिए, दाएँ हाथ से पिता के कुल के लिए, और दोनों हाथों से स्वयं अपने लिए — यह मेरा वचन है।"
श्लोक 31 (skanda.6.122.31)
इन्द्र उवाच । अहमागत्य नित्यं त्वां स्वर्गाद्वृषभवाहन । अत्रस्थं पूजयिष्यामि पास्यामि च तथोदकम्
indra uvāca ahamāgatya nityaṁ tvāṁ svargādvṛṣabhavāhana atrasthaṁ pūjayiṣyāmi pāsyāmi ca tathodakam
इंद्र ने कहा — "हे वृषभवाहन! मैं स्वर्ग से आकर सदा यहाँ विराजमान आपकी पूजा करूँगा और उसी प्रकार जल भी पिऊँगा।"
श्लोक 32 (skanda.6.122.32)
के दारयामि यत्प्रोक्तं त्वया महिषरूपिणा । केदार इति नाम्ना त्वं ततः ख्यातो भविष्यसि
ke dārayāmi yatproktaṁ tvayā mahiṣarūpiṇā kedāra iti nāmnā tvaṁ tataḥ khyāto bhaviṣyasi
"चूँकि आपने भैंसे के रूप में कहा, 'मैं विदीर्ण करता हूँ' (केदारयामि), इसलिए आप 'केदार' नाम से विख्यात होंगे।"
श्लोक 33 (skanda.6.122.33)
श्रीभगवानुवाच । यद्येवं कुरुषे शक्र ततो दैत्यभयं न ते । भविष्यति परं तेजो गात्रे संपत्स्यतेऽखिलम्
śrībhagavānuvāca yadyevaṁ kuruṣe śakra tato daityabhayaṁ na te bhaviṣyati paraṁ tejo gātre saṁpatsyate'khilam
श्री भगवान ने कहा — "हे शक्र! यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम्हें दैत्यों का भय नहीं होगा, और तुम्हारे शरीर में सर्वोत्कृष्ट तेज सम्पन्न होगा।"
श्लोक 34 (skanda.6.122.34)
एवमुक्तः सहस्राक्षस्ततः प्रासादमुत्तमम् । तदर्थं निर्मयामास साध्वालोकं मनोहरम्
evamuktaḥ sahasrākṣastataḥ prāsādamuttamam tadarthaṁ nirmayāmāsa sādhvālokaṁ manoharam
ऐसा कहे जाने पर सहस्राक्ष (इंद्र) ने उसके लिए एक रमणीय और दर्शनीय उत्तम प्रासाद का निर्माण कराया।
श्लोक 35 (skanda.6.122.35)
ततः प्रणम्य तं देवमनुमन्त्र्य ततः परम् । जगाम निजमावासं मेरुशृंगाग्रसंस्थितम्
tataḥ praṇamya taṁ devamanumantrya tataḥ param jagāma nijamāvāsaṁ meruśṛṁgāgrasaṁsthitam
फिर उस देव को प्रणाम करके तथा उनकी अनुमति लेकर, वे मेरु पर्वत के शिखर पर स्थित अपने निवास को चले गए।
श्लोक 36 (skanda.6.122.36)
ततश्चागत्य नित्यं स स्वर्गाद्देवस्य शूलिनः । केदारस्य सुभक्त्याढ्यां पूजां चक्रे समाहितः
tataścāgatya nityaṁ sa svargāddevasya śūlinaḥ kedārasya subhaktyāḍhyāṁ pūjāṁ cakre samāhitaḥ
तत्पश्चात् वे नित्य स्वर्ग से वहाँ आकर, शूलधारी उस केदार-देव की अत्यंत भक्तिपूर्ण पूजा किया करते थे।
श्लोक 37 (skanda.6.122.37)
मन्त्रोदकं च त्रिः पीत्वा ययौ ब्राह्मणसत्तमाः । कस्यचित्त्वथ कालस्य यावत्तत्र समाययौ
mantrodakaṁ ca triḥ pītvā yayau brāhmaṇasattamāḥ kasyacittvatha kālasya yāvattatra samāyayau
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मंत्रयुक्त जल तीन बार पीकर वे लौट जाते थे। कुछ समय बीत जाने पर, एक बार जब वे वहाँ आ पहुँचे,
श्लोक 38 (skanda.6.122.38)
तावद्धिमेन तत्सर्वं गिरेः शृंगं प्रपूरितम् । तच्च कुण्डं स देवश्च प्रासादेन समन्वितः
tāvaddhimena tatsarvaṁ gireḥ śṛṁgaṁ prapūritam tacca kuṇḍaṁ sa devaśca prāsādena samanvitaḥ
तब तक पर्वत का वह शिखर सर्वत्र हिम से आच्छादित हो चुका था, और वह कुण्ड तथा वह देव उनके प्रासाद सहित बर्फ से ढक गए थे।
श्लोक 39 (skanda.6.122.39)
ततो दुःखपरीतात्मा भक्त्या परमया युतः । तां दिशं प्रणिपत्योच्चैर्जगाम निजमंदिरम्
tato duḥkhaparītātmā bhaktyā paramayā yutaḥ tāṁ diśaṁ praṇipatyoccairjagāma nijamaṁdiram
तब दुःख से व्याकुल होकर, परम भक्तिभाव से युक्त होकर, उस दिशा को प्रणाम करके इंद्र अपने निवास को उच्चस्वर में विलाप करते हुए चले गए।
श्लोक 40 (skanda.6.122.40)
एवमागच्छतस्तस्य गतं मासचतुष्टयम् । अपश्यतो महादेवं दिदृक्षागतचेतसः
evamāgacchatastasya gataṁ māsacatuṣṭayam apaśyato mahādevaṁ didṛkṣāgatacetasaḥ
इस प्रकार बार-बार वहाँ आते हुए उनके चार महीने बीत गए, बिना महादेव के दर्शन के, फिर भी उनके मन में दर्शन की इच्छा बनी रही।
श्लोक 41 (skanda.6.122.41)
ततः प्राप्ते पुनर्विप्रा घर्मकाले हिमालये । संयातो दृक्पथं देवः स तथारूपसंस्थितः
tataḥ prāpte punarviprā gharmakāle himālaye saṁyāto dṛkpathaṁ devaḥ sa tathārūpasaṁsthitaḥ
फिर, हे विप्रो! जब हिमालय में पुनः ग्रीष्म ऋतु आई, तब वह देव उसी रूप में स्थित होकर पुनः दृष्टिपथ में आ गए।
श्लोक 42 (skanda.6.122.42)
ततः पूजां विधायोच्चैश्चातुर्मास्यसमुद्भवाम् । गीतवाद्यादिकं चक्रे तत्पुरः श्रद्धयान्वितः
tataḥ pūjāṁ vidhāyoccaiścāturmāsyasamudbhavām gītavādyādikaṁ cakre tatpuraḥ śraddhayānvitaḥ
तब चातुर्मास्य से उत्पन्न विधिपूर्वक उनकी पूजा करके, उन्होंने उनके सामने श्रद्धापूर्वक संगीत-वाद्य आदि भी संपन्न किए।
श्लोक 43 (skanda.6.122.43)
अथ देवः समालोक्य तां श्रद्धां तस्य गोपतेः । प्रोवाच दर्शनं गत्वा भगवांस्त्रिपुरांतकः
atha devaḥ samālokya tāṁ śraddhāṁ tasya gopateḥ provāca darśanaṁ gatvā bhagavāṁstripurāṁtakaḥ
तब उस गोपति (इंद्र) की वह श्रद्धा देखकर, त्रिपुरांतक भगवान ने उन्हें दर्शन देकर कहा —
श्लोक 44 (skanda.6.122.44)
परितुष्टोऽस्मि देवेश भक्त्या चानन्ययाऽनया । तस्मात्प्रार्थय दास्यामि यं कामं हृदिसंस्थितम्
parituṣṭo'smi deveśa bhaktyā cānanyayā'nayā tasmātprārthaya dāsyāmi yaṁ kāmaṁ hṛdisaṁsthitam
"हे देवेश! मैं तुम्हारी इस अनन्य भक्ति से अत्यंत संतुष्ट हूँ; अतः जो कामना तुम्हारे हृदय में स्थित है, वह माँगो, मैं उसे दूँगा।"
श्लोक 45 (skanda.6.122.45)
शक्र उवाच । तव प्रसादात्संजातं ममैश्वर्यमनुत्तमम् । यत्किंचित्त्रिषु लोकेषु तत्सर्वं गृहसंस्थितम्
śakra uvāca tava prasādātsaṁjātaṁ mamaiśvaryamanuttamam yatkiṁcittriṣu lokeṣu tatsarvaṁ gṛhasaṁsthitam
इंद्र ने कहा — "आपकी कृपा से ही मेरा यह अनुपम ऐश्वर्य उत्पन्न हुआ है; तीनों लोकों में जो कुछ भी है, वह सब मेरे घर में ही स्थित है।"
श्लोक 46 (skanda.6.122.46)
तस्माद्यदि प्रसादं मे करोषि वृषभध्वज । वरं वा यच्छसि प्रीतस्तत्कुरुष्व वचो मम
tasmādyadi prasādaṁ me karoṣi vṛṣabhadhvaja varaṁ vā yacchasi prītastatkuruṣva vaco mama
"अतः हे वृषभध्वज! यदि आप मुझ पर प्रसन्न होकर वर देना चाहें, तो मेरी यह विनती स्वीकार करें —"
श्लोक 47 (skanda.6.122.47)
पर्वतोऽयं भवेद्गम्यो मासानष्टौ सुरेश्वर । यावन्मीनस्थितो भानुः प्रगच्छति श्रुतं मया
parvato'yaṁ bhavedgamyo māsānaṣṭau sureśvara yāvanmīnasthito bhānuḥ pragacchati śrutaṁ mayā
"यह पर्वत, हे सुरेश्वर, केवल आठ महीने ही सुगम्य होता है, जब तक सूर्य मीन राशि में गमन करता रहता है, ऐसा मैंने सुना है।"
श्लोक 48 (skanda.6.122.48)
ततः परमगम्यश्च हिमपूरेण संवृतः । यदा स्याच्चतुरो मासान्यावत्कुम्भगतो रविः
tataḥ paramagamyaśca himapūreṇa saṁvṛtaḥ yadā syāccaturo māsānyāvatkumbhagato raviḥ
"उसके बाद वह अत्यंत दुर्गम्य हो जाता है, हिमराशि से आच्छादित रहता है, जब तक कि चार महीने बीतकर सूर्य कुंभ राशि में न आ जाए।"
श्लोक 49 (skanda.6.122.49)
संजायतेऽप्यगम्यश्च ममापि त्रिपुरांतक । किं पुनः स्वल्पसत्त्वानां नरादीनां सुरेश्वर
saṁjāyate'pyagamyaśca mamāpi tripurāṁtaka kiṁ punaḥ svalpasattvānāṁ narādīnāṁ sureśvara
"हे त्रिपुरांतक! उस काल में यह मेरे लिए भी अगम्य हो जाता है, फिर अल्पशक्ति वाले मनुष्यों आदि की तो बात ही क्या है, हे सुरेश्वर!"
श्लोक 50 (skanda.6.122.50)
तस्मात्स्वर्गेऽथ पाताले मर्त्ये वा त्रिदशेश्वर । कुरुष्वानेनरूपेण स्थितिं मासचतुष्टयम् । येन न स्यात्प्रतिज्ञाया हानिर्मम सुरेश्वर
tasmātsvarge'tha pātāle martye vā tridaśeśvara kuruṣvānenarūpeṇa sthitiṁ māsacatuṣṭayam yena na syātpratijñāyā hānirmama sureśvara
"अतः हे त्रिदशेश्वर! आप स्वर्ग में, पाताल में अथवा मर्त्यलोक में — इसी रूप में चार महीनों तक निवास कीजिए, जिससे मेरी प्रतिज्ञा की कोई हानि न हो, हे सुरेश्वर!"
श्लोक 51 (skanda.6.122.51)
सूत उवाच । ततो देवश्चिरं ध्यात्वा प्रोवाच बलसूदनम् । परं संतोषमापन्नो मेघनिर्घोषनिःस्वनम्
sūta uvāca tato devaściraṁ dhyātvā provāca balasūdanam paraṁ saṁtoṣamāpanno meghanirghoṣaniḥsvanam
सूत जी ने कहा — तब देव बहुत देर तक ध्यानमग्न रहकर, अत्यंत संतुष्ट होकर, मेघगर्जन के समान गंभीर स्वर में इंद्र से बोले।
श्लोक 52 (skanda.6.122.52)
आनर्तविषये क्षेत्रं हाटकेश्वरसंज्ञितम् । अस्मदीयं सहस्राक्ष विद्यते धरणीतले
ānartaviṣaye kṣetraṁ hāṭakeśvarasaṁjñitam asmadīyaṁ sahasrākṣa vidyate dharaṇītale
"हे सहस्राक्ष! आनर्त प्रदेश में हाटकेश्वर नामक क्षेत्र है, जो पृथ्वीतल पर हमारा ही (स्थान) है।"
श्लोक 53 (skanda.6.122.53)
तत्राहं वृश्चिकस्थेऽर्के सदा स्थास्यामि वासव । यावत्कुम्भस्य पर्यंतं तव वाक्यादसंशयम्
tatrāhaṁ vṛścikasthe'rke sadā sthāsyāmi vāsava yāvatkumbhasya paryaṁtaṁ tava vākyādasaṁśayam
"वहाँ, हे वासव! जब सूर्य वृश्चिक राशि में स्थित हो, तब से लेकर कुम्भ राशि के अंत तक — तुम्हारे ही वचन से, निःसंदेह — मैं सदा वहीं रहूँगा।"
श्लोक 54 (skanda.6.122.54)
तस्मात्तत्र द्रुतं गत्वा कृत्वा प्रासादमुत्तमम् । मम रूपं प्रतिष्ठाप्य कुरुपूजा यथोचिताम् । येन तत्र निजं तेजो धारयामि तवार्थतः
tasmāttatra drutaṁ gatvā kṛtvā prāsādamuttamam mama rūpaṁ pratiṣṭhāpya kurupūjā yathocitām yena tatra nijaṁ tejo dhārayāmi tavārthataḥ
"अतः तुम शीघ्र ही वहाँ जाकर एक उत्तम प्रासाद बनवाओ, मेरे रूप की वहाँ प्रतिष्ठा करके यथोचित पूजा कराओ, जिससे मैं वहाँ अपना तेज तुम्हारे ही निमित्त धारण कर सकूँ।"
श्लोक 55 (skanda.6.122.55)
सूत उवाच । एतच्छ्रुत्वा सहस्राक्षो देवदेवस्य शूलिनः । गत्वा तत्र ततश्चक्रे यद्देवेनेरितं वचः
sūta uvāca etacchrutvā sahasrākṣo devadevasya śūlinaḥ gatvā tatra tataścakre yaddeveneritaṁ vacaḥ
सूत जी ने कहा — यह सुनकर शूलधारी देवाधिदेव के इस वचन को सुनकर सहस्राक्ष इंद्र ने वहाँ जाकर वही किया जो उस देव ने कहा था।
श्लोक 56 (skanda.6.122.56)
प्रासादं निर्मयित्वाथ रूपं संस्थाप्य शूलिनः । कुण्डं चक्रे च तद्रूपं स्वच्छोदकसमावृतम्
prāsādaṁ nirmayitvātha rūpaṁ saṁsthāpya śūlinaḥ kuṇḍaṁ cakre ca tadrūpaṁ svacchodakasamāvṛtam
प्रासाद बनवाकर, शूलधारी उस देव के रूप को वहाँ स्थापित करके, उसी रूप वाला एक कुण्ड भी बनवाया, जो स्वच्छ जल से भरा हुआ था।
श्लोक 57 (skanda.6.122.57)
ततश्चाराधयामास पुष्पधूपानुलेपनैः । स्नात्वा कुण्डेऽपिबत्तोयं त्रिःकृत्वा च यथापुरा
tataścārādhayāmāsa puṣpadhūpānulepanaiḥ snātvā kuṇḍe'pibattoyaṁ triḥkṛtvā ca yathāpurā
तत्पश्चात् उन्होंने पुष्प, धूप और चंदन आदि से उनकी आराधना की, तथा स्नान करके पहले की भाँति उस कुण्ड में तीन बार जल पिया।
श्लोक 58 (skanda.6.122.58)
एवं स भगवांस्तत्र शक्रेणाराधितः पुरा । समायातोऽत्र विप्रेंद्राः सुरम्यात्तु हिमाचलात्
evaṁ sa bhagavāṁstatra śakreṇārādhitaḥ purā samāyāto'tra vipreṁdrāḥ suramyāttu himācalāt
इस प्रकार वे भगवान वहाँ पूर्व में इंद्र द्वारा आराधित होकर, उस सुरम्य हिमालय से यहाँ (हाटकेश्वर) आए, हे श्रेष्ठ द्विजो!
श्लोक 59 (skanda.6.122.59)
यस्तमाराधयेत्सम्यक्सदा मासचतुष्टयम् । हिमपातोद्भवे मर्त्यः स शिवाय प्रपद्यते
yastamārādhayetsamyaksadā māsacatuṣṭayam himapātodbhave martyaḥ sa śivāya prapadyate
जो कोई पूर्ण श्रद्धा से हिमपात के समय (चार महीनों तक) सदा उनकी उचित आराधना करता है, वह मर्त्य शिव को प्राप्त होता है।
श्लोक 60 (skanda.6.122.60)
शेषकालेऽपि यः पूजां करोत्येव सुभक्तितः । स पापं क्षालयेत्प्राज्ञ आजन्ममरणांतिकम्
śeṣakāle'pi yaḥ pūjāṁ karotyeva subhaktitaḥ sa pāpaṁ kṣālayetprājña ājanmamaraṇāṁtikam
शेष काल में भी जो भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, हे विद्वान, वह जन्म से लेकर मृत्यु तक के अपने समस्त पापों को धो डालता है।
श्लोक 61 (skanda.6.122.61)
तत्र गीतं प्रशंसंति नृत्यं चैव पृथग्विधम् । देवस्य पुरतः प्राज्ञाः सर्वशास्त्रविशारदाः
tatra gītaṁ praśaṁsaṁti nṛtyaṁ caiva pṛthagvidham devasya purataḥ prājñāḥ sarvaśāstraviśāradāḥ
वहाँ शास्त्रों के ज्ञाता विद्वान उस देव के सम्मुख विभिन्न प्रकार के संगीत और नृत्य की प्रशंसा करते हैं।
श्लोक 62 (skanda.6.122.62)
अत्र श्लोकः पुरा गीतो नारदेन सुरर्षिणा । तद्वोऽहं कीर्तयिष्यामि श्रूयतां ब्राह्मणोत्तमाः
atra ślokaḥ purā gīto nāradena surarṣiṇā tadvo'haṁ kīrtayiṣyāmi śrūyatāṁ brāhmaṇottamāḥ
यहाँ पूर्वकाल में देवर्षि नारद द्वारा गाया हुआ एक श्लोक है, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उसे मैं तुम्हें बताऊँगा, सुनो।
श्लोक 63 (skanda.6.122.63)
केदारे सलिलं पीत्वा गयापिडं प्रदाय च । ब्रह्मज्ञानमथासाद्य पुनर्जन्म न विद्यते
kedāre salilaṁ pītvā gayāpiḍaṁ pradāya ca brahmajñānamathāsādya punarjanma na vidyate
"केदार में जल पीकर तथा गया में पिंडदान करके, ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर मनुष्य को पुनर्जन्म प्राप्त नहीं होता।"
श्लोक 64 (skanda.6.122.64)
एतद्वः सर्वमाख्यातं केदारस्य च संभवम् । आख्यानं ब्राह्मणश्रेष्ठाः सर्वपातकनाशनम्
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ kedārasya ca saṁbhavam ākhyānaṁ brāhmaṇaśreṣṭhāḥ sarvapātakanāśanam
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! यह मैंने तुम्हें केदार की उत्पत्ति का संपूर्ण आख्यान बताया है, जो सभी पापों का नाश करने वाला है।
श्लोक 65 (skanda.6.122.65)
यश्चैतत्छृणुयात्सम्यक्पठेद्वा तस्य चाग्रतः । श्रावयेद्वापि वा विप्राः सर्वपातकनानम् । केदारस्य स पापौघैर्मुच्यते तत्क्षणान्नरः
yaścaitatchṛṇuyātsamyakpaṭhedvā tasya cāgrataḥ śrāvayedvāpi vā viprāḥ sarvapātakanānam kedārasya sa pāpaughairmucyate tatkṣaṇānnaraḥ
जो कोई इसे भली-भाँति सुनता है या पढ़ता है, या हे विप्रो, दूसरों को सुनाता है, वह मनुष्य केदार के प्रभाव से उसी क्षण अपने समस्त पापों के समूह से मुक्त हो जाता है।