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नागर खण्ड · अध्याय 123

शुक्लतीर्थ-माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 122अध्याय-सूचीअध्याय 124

श्लोक 1 (skanda.6.123.1)

सूत उवाच । तथान्यदपि तत्रास्ति शुक्लतीर्थमनुत्तमम् । दर्भैः संसूचितं श्वेतैर्यदद्यापि द्विजोत्तमाः

sūta uvāca tathānyadapi tatrāsti śuklatīrthamanuttamam darbhaiḥ saṁsūcitaṁ śvetairyadadyāpi dvijottamāḥ

सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ द्विजो! वहाँ एक और अनुपम तीर्थ भी है, जिसे शुक्लतीर्थ कहते हैं, जो आज भी श्वेत दर्भों से चिह्नित है।

श्लोक 2 (skanda.6.123.2)

चमत्कारपुरे पूर्वमासीत्कश्चित्सुशल्यवित् । रजकः शुद्धकोनाम पुत्रपौत्रसमन्वितः

camatkārapure pūrvamāsītkaścitsuśalyavit rajakaḥ śuddhakonāma putrapautrasamanvitaḥ

पहले चमत्कारपुर में शुद्धक नाम का एक धोबी रहता था, जो कपड़ों की सफाई में अत्यंत निपुण था और पुत्र-पौत्रों से युक्त था।

श्लोक 3 (skanda.6.123.3)

स सर्वरजकानां च प्राधान्येन व्यवस्थितः । प्रधानब्राह्मणानां च करोत्यंबरशोधनम्

sa sarvarajakānāṁ ca prādhānyena vyavasthitaḥ pradhānabrāhmaṇānāṁ ca karotyaṁbaraśodhanam

वह समस्त धोबियों में प्रधान माना जाता था और प्रमुख ब्राह्मणों के वस्त्र भी वही धोया करता था।

श्लोक 4 (skanda.6.123.4)

कस्यचित्त्वथ कालस्य नीलीकुण्ड्यां समाहितः । प्राक्षिपद्ब्राह्मणेंद्राणां वासो विज्ञातवांश्चिरात्

kasyacittvatha kālasya nīlīkuṇḍyāṁ samāhitaḥ prākṣipadbrāhmaṇeṁdrāṇāṁ vāso vijñātavāṁścirāt

कुछ समय बाद एक दिन नील (रंग) की कुंडी में एकाग्रचित्त होकर वह ब्राह्मणश्रेष्ठों के वस्त्र डालता हुआ, बहुत देर बाद यह जान पाया कि,

श्लोक 5 (skanda.6.123.5)

अथासौ मन्दचित्तश्च स्वामाहूयकुटुम्बिनीम् । पुत्रांश्च वचनं प्राह रहस्ये भयविह्वलः

athāsau mandacittaśca svāmāhūyakuṭumbinīm putrāṁśca vacanaṁ prāha rahasye bhayavihvalaḥ

तब वह मंदबुद्धि धोबी भयविह्वल होकर एकांत में अपनी पत्नी और पुत्रों को बुलाकर कहने लगा,

श्लोक 6 (skanda.6.123.6)

निर्मूल्यानि सुवस्त्राणि ब्राह्मणानां महात्मनाम् । नीलीमध्ये विमोहेन प्रक्षिप्तानि बहूनि च

nirmūlyāni suvastrāṇi brāhmaṇānāṁ mahātmanām nīlīmadhye vimohena prakṣiptāni bahūni ca

"महात्मा ब्राह्मणों के अनेक बहुमूल्य सुंदर वस्त्र मोह से नील की कुंडी में डाल दिए गए हैं।"

श्लोक 7 (skanda.6.123.7)

वधबन्धादिकं कर्म ते करिष्यंत्यसंशयम् । तस्मादन्यत्र गच्छामो गृहीत्वा रजनीमिमाम्

vadhabandhādikaṁ karma te kariṣyaṁtyasaṁśayam tasmādanyatra gacchāmo gṛhītvā rajanīmimām

"वे प्रातःकाल जानकर निःसंदेह वध-बंधन आदि दंड देंगे; अतः इस रात्रि को ही हमें कहीं अन्यत्र चले जाना चाहिए।"

श्लोक 8 (skanda.6.123.8)

एवं स निश्चयं कृत्वा सारमादाय मंदिरात् । प्रस्थितो भार्यया सार्द्धं कांदिशीको द्विजोत्तमाः

evaṁ sa niścayaṁ kṛtvā sāramādāya maṁdirāt prasthito bhāryayā sārddhaṁ kāṁdiśīko dvijottamāḥ

ऐसा निश्चय करके, हे श्रेष्ठ द्विजो! वह घर से जो कुछ सारभूत था लेकर, भयभीत होकर पत्नी सहित वहाँ से चल पड़ा।

श्लोक 9 (skanda.6.123.9)

तावत्तस्य सुता गत्वा स्वां सखीं दाशसंभवाम् । उवाच क्षम्यतां भद्रे यन्मया कुकृतं कृतम्

tāvattasya sutā gatvā svāṁ sakhīṁ dāśasaṁbhavām uvāca kṣamyatāṁ bhadre yanmayā kukṛtaṁ kṛtam

इतने में उसकी पुत्री अपनी मछुआरे-कन्या सखी के पास जाकर बोली, "हे भद्रे! मुझे क्षमा करो, मैंने जो कुछ बुरा किया है,"

श्लोक 10 (skanda.6.123.10)

अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि प्रक्रीडंत्या त्वया सह । प्रणयाद्बाल्यभावाच्च क्रोधाद्वाथ महेर्ष्यया

ajñānājjñānato vāpi prakrīḍaṁtyā tvayā saha praṇayādbālyabhāvācca krodhādvātha maherṣyayā

"चाहे वह अनजाने में हुआ हो या जानबूझकर, तुम्हारे साथ खेलते समय, स्नेह से, बालसुलभता से, क्रोध से या ईर्ष्या से।"

श्लोक 11 (skanda.6.123.11)

अथ सा सहसा श्रुत्वा बाष्पपर्याकुलेक्षणा । उवाच किमिदं भद्रे यन्मामित्थं प्रभाषसे

atha sā sahasā śrutvā bāṣpaparyākulekṣaṇā uvāca kimidaṁ bhadre yanmāmitthaṁ prabhāṣase

उसकी बात अचानक सुनकर वह आँसुओं से भरे नेत्रों वाली सखी बोली, "हे भद्रे! यह क्या है कि तुम मुझसे इस प्रकार बोल रही हो?"

श्लोक 12 (skanda.6.123.12)

सख्युवाच । मम तातेन नीलायां प्रक्षिप्तान्यंबराणि च । ब्राह्मणानां महार्हाणि विभ्रमेण सुलोचने

sakhyuvāca mama tātena nīlāyāṁ prakṣiptānyaṁbarāṇi ca brāhmaṇānāṁ mahārhāṇi vibhrameṇa sulocane

सखी ने कहा — "हे सुलोचने! मेरे पिता ने मोहवश ब्राह्मणों के अत्यंत बहुमूल्य वस्त्र नील की कुंडी में डाल दिए हैं।"

श्लोक 13 (skanda.6.123.13)

तत्प्रभाते परिज्ञाय दंडं धास्यंति दारुणम् । एवं चित्ते समास्थाय तातः संप्रस्थितोऽधुना

tatprabhāte parijñāya daṁḍaṁ dhāsyaṁti dāruṇam evaṁ citte samāsthāya tātaḥ saṁprasthito'dhunā

"प्रातःकाल यह जानकर वे कठोर दंड देंगे; ऐसा सोचकर मेरे पिता अभी प्रस्थान कर चुके हैं।"

श्लोक 14 (skanda.6.123.14)

अहं तवातिकं प्राप्ता दर्शनार्थमनिन्दिते । अनुज्ञाता प्रयास्यामि त्वया तस्मात्प्रमुच्यताम्

ahaṁ tavātikaṁ prāptā darśanārthamanindite anujñātā prayāsyāmi tvayā tasmātpramucyatām

"मैं तुमसे मिलने के लिए यहाँ आई हूँ, हे निर्दोष सखी; अब तुमसे आज्ञा लेकर मैं भी चली जाऊँगी, अतः मुझे विदा दो।"

श्लोक 15 (skanda.6.123.15)

अथ सा तद्वचः श्रुत्वा प्रसन्नवदनाऽब्रवीत् । यद्येवं मा सरोजाक्षि कुत्रचित्संप्रयास्यसि

atha sā tadvacaḥ śrutvā prasannavadanā'bravīt yadyevaṁ mā sarojākṣi kutracitsaṁprayāsyasi

उसकी यह बात सुनकर वह प्रसन्नमुख होकर बोली, "हे कमलनयनी! यदि ऐसा है, तो तुम कहीं मत जाओ।"

श्लोक 16 (skanda.6.123.16)

निवारय द्रुतं गत्वा तातं नो गम्यतामिति । अस्ति पूर्वोत्तरे भागे स्थानादस्माज्जलाशयः

nivāraya drutaṁ gatvā tātaṁ no gamyatāmiti asti pūrvottare bhāge sthānādasmājjalāśayaḥ

"शीघ्र जाकर अपने पिता को रोको, कि हमें कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है; इस स्थान के पूर्वोत्तर भाग में एक जलाशय है।"

श्लोक 17 (skanda.6.123.17)

तत्रैकदा विनिक्षिप्तं मम तातेन जालकम् । अतीवकृष्णकेशोत्थं तावच्छुक्लत्वमागतम्

tatraikadā vinikṣiptaṁ mama tātena jālakam atīvakṛṣṇakeśotthaṁ tāvacchuklatvamāgatam

"वहाँ एक बार मेरे पिता ने अत्यंत काले बालों से बना एक जाल डाला था, और वह उसी क्षण श्वेत हो गया।"

श्लोक 18 (skanda.6.123.18)

ततः स विस्मयाविष्टः स्वयं सस्नौ कुतूहलात् । यावच्छुक्लत्वमापन्नस्तादृक्कृष्णवपुर्धरः

tataḥ sa vismayāviṣṭaḥ svayaṁ sasnau kutūhalāt yāvacchuklatvamāpannastādṛkkṛṣṇavapurdharaḥ

"तब वे विस्मय से भरकर कुतूहलवश स्वयं भी उसमें स्नान कर बैठे, और यद्यपि वे पहले काले वर्ण वाले थे,"

श्लोक 19 (skanda.6.123.19)

सुश्वेतमूर्धजः सद्यः स्त्रीणां वैराग्यकारकः । ततःप्रभृति नो ज्ञात्वा कश्चित्तत्र प्रगच्छति

suśvetamūrdhajaḥ sadyaḥ strīṇāṁ vairāgyakārakaḥ tataḥprabhṛti no jñātvā kaścittatra pragacchati

"वे तुरंत अत्यंत सफेद बालों वाले हो गए, जिससे स्त्रियों को वैराग्य होने लगा; तभी से यह जानकर कोई भी वहाँ नहीं जाता।"

श्लोक 20 (skanda.6.123.20)

तस्मात्तत्रैव वस्त्राणि प्रक्षालयतु सत्वरम् । तातः स तव यास्यंति विशुद्धिं परमां शुभे

tasmāttatraiva vastrāṇi prakṣālayatu satvaram tātaḥ sa tava yāsyaṁti viśuddhiṁ paramāṁ śubhe

"अतः वहीं जाकर शीघ्र वे वस्त्र धो लें; हे शुभे! तुम्हारे पिता उससे परम विशुद्धि को प्राप्त होंगे।"

श्लोक 21 (skanda.6.123.21)

अथ सा सत्वरं गत्वा निजतातस्य तद्वचः । सत्वरं कथयामास प्रहृष्टवदना सती

atha sā satvaraṁ gatvā nijatātasya tadvacaḥ satvaraṁ kathayāmāsa prahṛṣṭavadanā satī

तब वह शीघ्रता से जाकर अपने पिता के पास अपनी सखी की वह बात प्रसन्न मुख से बताने लगी, सती होकर,

श्लोक 22 (skanda.6.123.22)

मम सख्या समादिष्टं नातिदूरे जलाशयः । तत्र श्वेतत्वमायाति सर्वं क्षिप्तं सितेतरम्

mama sakhyā samādiṣṭaṁ nātidūre jalāśayaḥ tatra śvetatvamāyāti sarvaṁ kṣiptaṁ sitetaram

"मेरी सखी ने बताया है कि निकट ही एक जलाशय है, जिसमें जो भी काली वस्तु डाली जाए, वह सब वहाँ श्वेत हो जाती है।"

श्लोक 23 (skanda.6.123.23)

तस्मात्प्रक्षालय प्रातस्तत्र गत्वा जलाशये । वस्त्राण्यमूनि शुक्लत्वं संप्रयास्यंत्यसंशयम्

tasmātprakṣālaya prātastatra gatvā jalāśaye vastrāṇyamūni śuklatvaṁ saṁprayāsyaṁtyasaṁśayam

"अतः प्रातःकाल वहाँ जाकर वस्त्र धो लो; ये वस्त्र निःसंदेह श्वेतता को प्राप्त हो जाएँगे।"

श्लोक 24 (skanda.6.123.24)

रजक उवाच । नैतत्संपत्स्यते पुत्रि यन्नीलस्य परिक्षयः । वस्त्रलग्नस्य जायेत यतः प्रोक्तं पुरातनैः

rajaka uvāca naitatsaṁpatsyate putri yannīlasya parikṣayaḥ vastralagnasya jāyeta yataḥ proktaṁ purātanaiḥ

धोबी ने कहा — "हे पुत्री! यह संभव नहीं है कि वस्त्र में लगे नील का पूर्णतः क्षय हो जाए, क्योंकि प्राचीन काल के विद्वानों ने कहा है,"

श्लोक 25 (skanda.6.123.25)

वज्रलेपस्य मूर्खस्य नारीणां कर्कटस्य च । एको ग्रहस्तु मीनानां नीलीमद्यपयोस्तथा

vajralepasya mūrkhasya nārīṇāṁ karkaṭasya ca eko grahastu mīnānāṁ nīlīmadyapayostathā

"वज्रलेप का, मूर्ख का, स्त्रियों का, कर्कट (केकड़े) का, मीन (मछली) की पकड़ का, तथा नील और मद्य पीने वाले का — इनका एक ही स्वभाव-दोष होता है (कभी न छूटना)।"

श्लोक 26 (skanda.6.123.26)

कन्योवाच । तत्र ह्यागम्यतां तावद्वस्त्रणयादाय यत्नतः । तोयाच्छुद्धिं प्रयास्यंति तदाऽऽगंतव्यमेव हि

kanyovāca tatra hyāgamyatāṁ tāvadvastraṇayādāya yatnataḥ toyācchuddhiṁ prayāsyaṁti tadā''gaṁtavyameva hi

कन्या ने कहा — "तो भी वहाँ जाकर, प्रयत्नपूर्वक वस्त्र लेकर, वे जल से शुद्धि को प्राप्त होंगे; अतः वहाँ अवश्य जाना चाहिए।"

श्लोक 27 (skanda.6.123.27)

भूयोऽपि मंदिरे वाऽथ तस्मात्स्थानाद्दिगंतरम् । गंतव्यं सकलैरेव ममैतद्धृदि संस्थितम्

bhūyo'pi maṁdire vā'tha tasmātsthānāddigaṁtaram gaṁtavyaṁ sakalaireva mamaitaddhṛdi saṁsthitam

"अथवा फिर घर में या इस स्थान से अन्यत्र दिशांतर में जाना पड़ेगा — यही बात मेरे हृदय में स्थित है, इसलिए सभी को वहीं जाना चाहिए।"

श्लोक 28 (skanda.6.123.28)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा साधुसाध्विति तेऽसकृत् । प्रोच्य बांधवभृत्याश्च रात्रावेव प्रजग्मिरे

tasyāstadvacanaṁ śrutvā sādhusādhviti te'sakṛt procya bāṁdhavabhṛtyāśca rātrāveva prajagmire

उसकी यह बात सुनकर वे सब बार-बार "साधु-साधु" कहकर, बांधवों और सेवकों सहित रात्रि में ही वहाँ के लिए प्रस्थान कर गए।

श्लोक 29 (skanda.6.123.29)

दाशकन्यां पुरः कृत्वा संशयं परमं गताः । विभवेन समायुक्ता निजेन द्विजसत्तमाः

dāśakanyāṁ puraḥ kṛtvā saṁśayaṁ paramaṁ gatāḥ vibhavena samāyuktā nijena dvijasattamāḥ

उस मछुआरे की कन्या को आगे करके, अपने सामान से युक्त वे श्रेष्ठ ब्राह्मण-सेवक अत्यंत संशय में पड़े हुए चले।

श्लोक 30 (skanda.6.123.30)

ततः सा दर्शयामास दाशकन्या जलाशयम् । बहुवीरुधसंछन्नं दुष्प्रवेशं च देहिनाम्

tataḥ sā darśayāmāsa dāśakanyā jalāśayam bahuvīrudhasaṁchannaṁ duṣpraveśaṁ ca dehinām

तब उस मछुआरे-कन्या ने उन्हें वह जलाशय दिखाया, जो बहुत सी लताओं-बेलों से ढका हुआ था और लोगों के लिए प्रवेश करना कठिन था।

श्लोक 31 (skanda.6.123.31)

ततः स रजकस्तत्र वस्त्राण्यादाय सर्वशः । प्रविष्टः सलिले तस्मिन्क्षालयामास वै द्विजाः

tataḥ sa rajakastatra vastrāṇyādāya sarvaśaḥ praviṣṭaḥ salile tasminkṣālayāmāsa vai dvijāḥ

तब वह धोबी वहाँ सभी वस्त्रों को लेकर, उस जल में प्रवेश करके, हे द्विजो! उन्हें धोने लगा।

श्लोक 32 (skanda.6.123.32)

अथ तानि सुवस्त्राणि मेचकाभानि तत्क्षणात् । जातानि स्फटिकाभानि तत्क्षणादेव कृत्स्नशः

atha tāni suvastrāṇi mecakābhāni tatkṣaṇāt jātāni sphaṭikābhāni tatkṣaṇādeva kṛtsnaśaḥ

तब वे अच्छे वस्त्र, जो पहले काले रंग के थे, उसी क्षण संपूर्णतः स्फटिक के समान शुभ्र और चमकीले हो गए।

श्लोक 33 (skanda.6.123.33)

ततस्तुष्टिसमायुक्तः साधुसाध्विति चाऽब्रवीत् । समालिंग्य सुतां प्राह दाशकन्यां च सादरम्

tatastuṣṭisamāyuktaḥ sādhusādhviti cā'bravīt samāliṁgya sutāṁ prāha dāśakanyāṁ ca sādaram

तब अत्यंत संतुष्ट होकर वह "साधु-साधु" कहने लगा और अपनी पुत्री तथा उस मछुआरे-कन्या को आदरपूर्वक गले लगाकर बोला,

श्लोक 34 (skanda.6.123.34)

सुवस्त्राणि द्विजेंद्राणामर्पयामो यथाक्रमम्

suvastrāṇi dvijeṁdrāṇāmarpayāmo yathākramam

"अब हम इन उत्तम वस्त्रों को यथाक्रम श्रेष्ठ द्विजों को अर्पित करेंगे।"

श्लोक 35 (skanda.6.123.35)

ततः स स्वगृहं गत्वा तानि वस्त्राणि कृत्स्नशः । यथाक्रमेण संहृष्टः प्रददौ द्विजसत्तमाः

tataḥ sa svagṛhaṁ gatvā tāni vastrāṇi kṛtsnaśaḥ yathākrameṇa saṁhṛṣṭaḥ pradadau dvijasattamāḥ

तत्पश्चात् वह अपने घर जाकर उन सभी वस्त्रों को यथाक्रम अत्यंत हर्षित होकर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दे आया।

श्लोक 36 (skanda.6.123.36)

अथ ते ब्राह्मणा दृष्ट्वा तां शुद्धिं वस्त्रसंभवाम् । तं च श्वेतीकृतं चेदृग्रजकं विस्मयान्विताः

atha te brāhmaṇā dṛṣṭvā tāṁ śuddhiṁ vastrasaṁbhavām taṁ ca śvetīkṛtaṁ cedṛgrajakaṁ vismayānvitāḥ

तब वे ब्राह्मण उस वस्त्रों की शुद्धता तथा उस धोबी को इस प्रकार श्वेत हुआ देखकर विस्मय से भर गए,

श्लोक 37 (skanda.6.123.37)

पप्रच्छुः किमिदं चित्रं वस्त्रमूर्धजसंभवम् । अनौपम्यं च संजातं वदस्व यदि मन्यसे

papracchuḥ kimidaṁ citraṁ vastramūrdhajasaṁbhavam anaupamyaṁ ca saṁjātaṁ vadasva yadi manyase

और पूछने लगे, "यह वस्त्रों में बालों से उत्पन्न विचित्र और अनुपम परिवर्तन क्या है? यदि तुम जानते हो तो हमें बताओ।"

श्लोक 38 (skanda.6.123.38)

रजक उवाच । एतानि विप्रा वस्त्राणि मया क्षिप्तानि मोहतः । नीलीमध्ये सुवस्त्राणि विनष्टानि च कृत्स्नशः

rajaka uvāca etāni viprā vastrāṇi mayā kṣiptāni mohataḥ nīlīmadhye suvastrāṇi vinaṣṭāni ca kṛtsnaśaḥ

धोबी ने कहा — "हे विप्रो! ये वस्त्र मैंने भूलवश डाल दिए थे, और वे नील की कुंडी के भीतर पूर्णतः बिगड़ गए थे।"

श्लोक 39 (skanda.6.123.39)

ततो भयं महद्भूतं कुटुम्बेन समन्वितः । चलितो रजनीवक्त्रे दिगंते ब्राह्मणोत्तमाः

tato bhayaṁ mahadbhūtaṁ kuṭumbena samanvitaḥ calito rajanīvaktre digaṁte brāhmaṇottamāḥ

"तब मुझे और मेरे परिवार को बहुत भय हुआ, और हम रात्रि के मुख में ही अन्य दिशा की ओर चल पड़े, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो।"

श्लोक 40 (skanda.6.123.40)

अथैषा तनयाऽस्माकं गता निजसखीं प्रति । दाशात्मजां सुदुःखार्ता पुनर्दर्शनलालसा

athaiṣā tanayā'smākaṁ gatā nijasakhīṁ prati dāśātmajāṁ suduḥkhārtā punardarśanalālasā

"तभी मेरी यह पुत्री, अत्यंत दुःखी होकर, पुनः दर्शन की लालसा से अपनी मछुआरे-सखी के पास गई।"

श्लोक 41 (skanda.6.123.41)

तया सर्वमभिप्रायं ज्ञात्वा मे दुःखहेतुकम् । ततः संदर्शयामास स्थिताग्रे स्वजलाशयम्

tayā sarvamabhiprāyaṁ jñātvā me duḥkhahetukam tataḥ saṁdarśayāmāsa sthitāgre svajalāśayam

"उसने मेरे दुःख का सारा कारण जानकर, तब हमें अपने सामने खड़े होकर वह जलाशय दिखाया।"

श्लोक 42 (skanda.6.123.42)

तस्मिन्प्रक्षिप्तमात्राणि वस्त्राणीमानि तत्क्षणात् । ईदृग्वर्णानि जातानि विस्मयस्य हि कारणम्

tasminprakṣiptamātrāṇi vastrāṇīmāni tatkṣaṇāt īdṛgvarṇāni jātāni vismayasya hi kāraṇam

"उसी क्षण उसमें डाले गए ये वस्त्र इस प्रकार के वर्ण को प्राप्त हो गए, जो विस्मय का कारण है।"

श्लोक 43 (skanda.6.123.43)

तथा मे मूर्धजाः कृष्णास्तत्र स्नातस्य तत्क्षणात् । परं शुक्लत्वमापन्ना एतत्प्रोक्तं मया स्फुटम्

tathā me mūrdhajāḥ kṛṣṇāstatra snātasya tatkṣaṇāt paraṁ śuklatvamāpannā etatproktaṁ mayā sphuṭam

"वैसे ही मेरे बाल भी काले थे, किंतु वहाँ स्नान करने के तत्क्षण ही अत्यंत श्वेत हो गए — यह मैंने स्पष्ट रूप से बताया है।"

श्लोक 44 (skanda.6.123.44)

एवं ते ब्राह्मणाः श्रुत्वा कौतूहलसमन्विताः । तत्र जग्मुः परीक्षार्थं विक्षिप्य तदनंतरम्

evaṁ te brāhmaṇāḥ śrutvā kautūhalasamanvitāḥ tatra jagmuḥ parīkṣārthaṁ vikṣipya tadanaṁtaram

यह सुनकर वे ब्राह्मण कुतूहल से भरकर, उसके पश्चात् परीक्षा के लिए वहाँ गए और वस्तुएँ उसमें फेंकीं,

श्लोक 45 (skanda.6.123.45)

कृष्णद्रव्याणि भूरीणि केशादीनि सहस्रशः । सर्वं तच्छुक्लतां याति त्यक्त्वा वर्णं मलीमसम्

kṛṣṇadravyāṇi bhūrīṇi keśādīni sahasraśaḥ sarvaṁ tacchuklatāṁ yāti tyaktvā varṇaṁ malīmasam

हजारों की संख्या में काले द्रव्य, बाल आदि — वह सब मलिन वर्ण त्यागकर श्वेतता को प्राप्त हो गया।

श्लोक 46 (skanda.6.123.46)

ततो वृद्धतया ये च विशेषाच्छ्वेतमूर्धजाः । ते सस्नुः श्रद्धया युक्तास्तरुणाश्चापि धर्मिणः

tato vṛddhatayā ye ca viśeṣācchvetamūrdhajāḥ te sasnuḥ śraddhayā yuktāstaruṇāścāpi dharmiṇaḥ

तब वृद्धावस्था के कारण जिनके बाल विशेष रूप से श्वेत हो चुके थे, वे भी श्रद्धापूर्वक वहाँ स्नान करने लगे, और वे युवा धर्मात्मा भी।

श्लोक 47 (skanda.6.123.47)

ततः शुक्लत्वमापन्नास्तेजोवीर्यसमन्विताः । भवंति तत्प्रभावेन प्रयांति च परां गतिम्

tataḥ śuklatvamāpannāstejovīryasamanvitāḥ bhavaṁti tatprabhāvena prayāṁti ca parāṁ gatim

तत्पश्चात् वे तेज और वीर्य से युक्त होकर श्वेतता को प्राप्त होते हैं, और उसके प्रभाव से ही परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 48 (skanda.6.123.48)

अथ तद्वासवो दृष्ट्वा शुक्लतीर्थं प्रमुक्तिदम् । पूरयामास रजसा मानुषोत्थभयेन च

atha tadvāsavo dṛṣṭvā śuklatīrthaṁ pramuktidam pūrayāmāsa rajasā mānuṣotthabhayena ca

तब वासव (इंद्र) ने उस मोक्षदायक शुक्लतीर्थ को देखकर, मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले भय के कारण उसे धूल से भर दिया।

श्लोक 49 (skanda.6.123.49)

अद्यापि तत्र यत्किंचिज्जायतेऽथ तृणादिकम् । तत्सर्वं शुक्लतामेति तत्तोयस्य प्रभावतः

adyāpi tatra yatkiṁcijjāyate'tha tṛṇādikam tatsarvaṁ śuklatāmeti tattoyasya prabhāvataḥ

आज भी वहाँ जो कुछ भी उगता है — घास आदि — वह सब उस जल के प्रभाव से श्वेतता को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 50 (skanda.6.123.50)

तत्रोत्थैर्यः कुशैः श्राद्धं कुरुते श्रद्धयान्वितः । श्वैतैस्तैस्तारयेत्सर्वान्पितॄन्नरकगानपि

tatrotthairyaḥ kuśaiḥ śrāddhaṁ kurute śraddhayānvitaḥ śvaitaistaistārayetsarvānpitṝnnarakagānapi

जो श्रद्धापूर्वक वहाँ उगे कुशों से श्राद्ध करता है, वह उन श्वेत कुशों से नरक में पड़े हुए भी अपने समस्त पितरों को तार देता है।

श्लोक 51 (skanda.6.123.51)

तत्तीर्थोत्थां मृदं गात्रे योजयित्वा नरोत्तमः । स्नानं करोति तीर्थानां सर्वेषां लभते फलम्

tattīrthotthāṁ mṛdaṁ gātre yojayitvā narottamaḥ snānaṁ karoti tīrthānāṁ sarveṣāṁ labhate phalam

जो श्रेष्ठ पुरुष उस तीर्थ की मिट्टी अपने शरीर पर लगाता है, वह सभी तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 52 (skanda.6.123.52)

यस्तैर्दर्भैर्नरो भक्त्या तिलैश्चारण्यसंभवैः । करोति तर्पणं विप्राः स प्रीणाति पितामहान्

yastairdarbhairnaro bhaktyā tilaiścāraṇyasaṁbhavaiḥ karoti tarpaṇaṁ viprāḥ sa prīṇāti pitāmahān

हे विप्रो! जो मनुष्य भक्तिपूर्वक उन दर्भों और वन में उगे तिलों से तर्पण करता है, वह अपने पितामहों को प्रसन्न कर देता है।

श्लोक 53 (skanda.6.123.53)

अथाश्वमेधात्संप्राप्यं गयाश्राद्धेन यत्फलम् । नीलसंज्ञगवोत्सर्गे तथात्रापि द्विजोत्तमाः

athāśvamedhātsaṁprāpyaṁ gayāśrāddhena yatphalam nīlasaṁjñagavotsarge tathātrāpi dvijottamāḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! अश्वमेध यज्ञ से तथा गया में श्राद्ध करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल यहाँ नील नामक गाय के दान से भी प्राप्त होता है।

श्लोक 54 (skanda.6.123.54)

ऋषय ऊचुः । शुक्लतीर्थं कथं जातं तत्र त्वं सूतनंदन । विस्तरेण समाचक्ष्व परं कौतूहलं हि नः

ṛṣaya ūcuḥ śuklatīrthaṁ kathaṁ jātaṁ tatra tvaṁ sūtanaṁdana vistareṇa samācakṣva paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ

ऋषियों ने कहा — हे सूतनंदन! वहाँ यह शुक्लतीर्थ कैसे उत्पन्न हुआ, यह हमें विस्तारपूर्वक बताइए, हमें इसमें अत्यंत कुतूहल है।

श्लोक 55 (skanda.6.123.55)

सूत उवाच । श्वेतद्वीपः समानीतो विष्णुना प्रभविष्णुना । तत्क्षेत्रे कलिभीतेन यथा शौक्ल्यं न संत्यजेत्

sūta uvāca śvetadvīpaḥ samānīto viṣṇunā prabhaviṣṇunā tatkṣetre kalibhītena yathā śauklyaṁ na saṁtyajet

सूत जी ने कहा — प्रभावशाली विष्णु ने कलियुग के भय से उस क्षेत्र में श्वेतद्वीप को इस प्रकार ले आए कि उसकी श्वेतता कभी नष्ट न हो।

श्लोक 56 (skanda.6.123.56)

कलिकालेन संस्पृष्टः श्वेतद्वीपोऽपि श्यामताम् । न प्रयाति द्विजश्रेष्ठास्ततस्तत्र निवेशितः

kalikālena saṁspṛṣṭaḥ śvetadvīpo'pi śyāmatām na prayāti dvijaśreṣṭhāstatastatra niveśitaḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! कलिकाल के स्पर्श से भी वह श्वेतद्वीप कभी कालेपन को प्राप्त नहीं होता; इसीलिए उसे वहाँ स्थापित किया गया।

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