नागर खण्ड · अध्याय 124
मुखारतीर्थ-उत्पत्ति (वाल्मीकि) का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.124.1)
सूत उवाच । अथान्यदपि तत्रास्ति मुखारं तीर्थमुत्तमम् । यत्र ते मुनयः श्रेष्ठा विप्राश्चौरेण संगताः
sūta uvāca athānyadapi tatrāsti mukhāraṁ tīrthamuttamam yatra te munayaḥ śreṣṭhā viprāścaureṇa saṁgatāḥ
सूत जी ने कहा — इसके अतिरिक्त वहाँ मुखार नाम का एक और उत्तम तीर्थ है, जहाँ श्रेष्ठ मुनियों का एक चोर से संगम हुआ था।
श्लोक 2 (skanda.6.124.2)
यत्र सिद्धिं समापन्नः स चौरस्तत्प्रभावतः । वाल्मीकिरिति विख्यातो रामायणनिबंधकृत्
yatra siddhiṁ samāpannaḥ sa caurastatprabhāvataḥ vālmīkiriti vikhyāto rāmāyaṇanibaṁdhakṛt
उस तीर्थ के प्रभाव से ही वह चोर सिद्धि को प्राप्त हुआ और वाल्मीकि नाम से विख्यात होकर रामायण का रचयिता बना।
श्लोक 3 (skanda.6.124.3)
चमत्कारपुरे पूर्वं मांडव्यान्वय संभवः । लोहजंघो द्विजो ह्यासीत्पितृमातृपरायणः
camatkārapure pūrvaṁ māṁḍavyānvaya saṁbhavaḥ lohajaṁgho dvijo hyāsītpitṛmātṛparāyaṇaḥ
पूर्वकाल में चमत्कारपुर में मांडव्य वंश में उत्पन्न लोहजंघ नामक एक ब्राह्मण था, जो माता-पिता की सेवा में तत्पर रहता था।
श्लोक 4 (skanda.6.124.4)
तस्यैका चाभवत्पत्नी प्राणेभ्योऽपि गरीयसी । पतिव्रता पतिप्राणा पतिप्रियहिते रता
tasyaikā cābhavatpatnī prāṇebhyo'pi garīyasī pativratā patiprāṇā patipriyahite ratā
उसकी एक पत्नी थी, जो उसे प्राणों से भी अधिक प्रिय थी, पतिव्रता, पति के ही प्राणों को अपना जीवन मानने वाली, और पति के हित तथा प्रियकार्य में सदा रत रहने वाली।
श्लोक 5 (skanda.6.124.5)
अथ तस्य स्थितस्यात्र ब्रह्मवृत्त्याभिवर्ततः । जगाम सुमहान्कालः पितृमातृरतस्य च
atha tasya sthitasyātra brahmavṛttyābhivartataḥ jagāma sumahānkālaḥ pitṛmātṛratasya ca
इस प्रकार ब्राह्मण-वृत्ति से जीवनयापन करते हुए, माता-पिता की सेवा में लगे उस लोहजंघ का बहुत लंबा समय बीत गया।
श्लोक 6 (skanda.6.124.6)
एकदा भगवाञ्छक्रो न ववर्ष धरातले । आनर्तविषये कृत्स्ने यावद्वादशवत्सराः
ekadā bhagavāñchakro na vavarṣa dharātale ānartaviṣaye kṛtsne yāvadvādaśavatsarāḥ
एक बार भगवान इंद्र ने संपूर्ण आनर्त प्रदेश में बारह वर्षों तक पृथ्वी पर वर्षा नहीं की।
श्लोक 7 (skanda.6.124.7)
ततः स कष्टमापन्नो लोहजंघो द्विजोत्तमाः । न प्राप्नोति क्वचिद्भिक्षां न च किंचित्प्रतिग्रहम्
tataḥ sa kaṣṭamāpanno lohajaṁgho dvijottamāḥ na prāpnoti kvacidbhikṣāṁ na ca kiṁcitpratigraham
तब वह लोहजंघ अत्यंत कष्ट में पड़ गया, हे श्रेष्ठ द्विजो! उसे कहीं भी न भिक्षा प्राप्त होती, न कोई दान।
श्लोक 8 (skanda.6.124.8)
ततस्तौ पितरौ द्वौ तु दृष्ट्वा क्षुत्परिपीडितौ । भार्यां च चिंतयामास दुःखेन महतान्वितः
tatastau pitarau dvau tu dṛṣṭvā kṣutparipīḍitau bhāryāṁ ca ciṁtayāmāsa duḥkhena mahatānvitaḥ
तब अपने दोनों वृद्ध माता-पिता को भूख से पीड़ित देखकर, वह महान दुःख से भर उठा और अपनी पत्नी के विषय में भी सोचने लगा।
श्लोक 9 (skanda.6.124.9)
किं करोमि क्व गच्छामि कथं स्याद्दर्शनं मम । एताभ्यामपि वृद्धाभ्यां पत्न्याश्चैव विशेषतः
kiṁ karomi kva gacchāmi kathaṁ syāddarśanaṁ mama etābhyāmapi vṛddhābhyāṁ patnyāścaiva viśeṣataḥ
"मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, इन वृद्ध माता-पिता को तथा विशेष रूप से अपनी पत्नी को कैसे देखूँ (उनका मुख कैसे देखूँ)?"
श्लोक 10 (skanda.6.124.10)
ततः स दुःखसंयुक्तः फलार्थं प्रययौ वने । न च किंचिदवाप्नोति सर्वे शुष्का महीरुहाः
tataḥ sa duḥkhasaṁyuktaḥ phalārthaṁ prayayau vane na ca kiṁcidavāpnoti sarve śuṣkā mahīruhāḥ
तब दुःख से युक्त होकर वह फलों की खोज में वन को गया, किंतु उसे कुछ भी प्राप्त न हुआ, क्योंकि सभी वृक्ष सूख चुके थे।
श्लोक 11 (skanda.6.124.11)
अथापश्यत्स वृद्धां स्त्रीं स्तोकसस्यसमन्विताम् । गच्छमानां तथा तेन श्रमेण महतान्विताम्
athāpaśyatsa vṛddhāṁ strīṁ stokasasyasamanvitām gacchamānāṁ tathā tena śrameṇa mahatānvitām
तभी उसने एक वृद्ध स्त्री को देखा, जो थोड़े से अनाज के साथ बड़ी कठिनाई से चलती हुई जा रही थी।
श्लोक 12 (skanda.6.124.12)
ततस्तत्सस्यमादाय वस्त्राणि च स निर्दयः । जगाम स्वगृहं हृष्टः पितृभ्यां च न्यवेदयत्
tatastatsasyamādāya vastrāṇi ca sa nirdayaḥ jagāma svagṛhaṁ hṛṣṭaḥ pitṛbhyāṁ ca nyavedayat
तब वह निर्दयी उसका वह अनाज तथा वस्त्र छीनकर, प्रसन्न होकर अपने घर गया और अपने माता-पिता को यह बात बताई।
श्लोक 13 (skanda.6.124.13)
स एवं लब्धलक्षोऽपि दस्युकर्मणि नित्यशः । कृत्वा चौर्यं पुपोषाथ निजमेव कुटुम्बकम्
sa evaṁ labdhalakṣo'pi dasyukarmaṇi nityaśaḥ kṛtvā cauryaṁ pupoṣātha nijameva kuṭumbakam
इस प्रकार अपना लक्ष्य पाकर, वह नित्य ही चोरी का कार्य करने लगा, और चोरी करके ही अपने परिवार का भरण-पोषण करता रहा।
श्लोक 14 (skanda.6.124.14)
सुभिक्षे चापि संप्राप्ते नान्यत्कर्म करोति सः । ब्राह्मीं वृत्तिं परित्यक्त्वा चौर्यकर्म समाचरत्
subhikṣe cāpi saṁprāpte nānyatkarma karoti saḥ brāhmīṁ vṛttiṁ parityaktvā cauryakarma samācarat
सुभिक्ष के समय आ जाने पर भी वह और कोई कार्य नहीं करता था; ब्राह्मण-वृत्ति को पूर्णतः त्यागकर वह चोरी का ही कार्य करने लगा।
श्लोक 15 (skanda.6.124.15)
कस्यचित्त्वथ कालस्य तीर्थयात्राप्रसंगतः । तत्र सप्तर्षयः प्राप्ता मरीचिप्रमुखा द्विजाः
kasyacittvatha kālasya tīrthayātrāprasaṁgataḥ tatra saptarṣayaḥ prāptā marīcipramukhā dvijāḥ
कुछ समय बाद, तीर्थयात्रा के प्रसंग में, मरीचि आदि श्रेष्ठ ब्राह्मण सप्तर्षि वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 16 (skanda.6.124.16)
ततस्तान्विजने दृष्ट्वा द्रोहकोपसमन्वितः । यष्टिमुद्यम्य वेगेन तिष्ठध्वमिति चाब्रवीत्
tatastānvijane dṛṣṭvā drohakopasamanvitaḥ yaṣṭimudyamya vegena tiṣṭhadhvamiti cābravīt
तब उन्हें एकांत में देखकर, द्रोह और क्रोध से भरा हुआ वह डंडा उठाकर वेगपूर्वक बोला, "रुक जाओ!"
श्लोक 17 (skanda.6.124.17)
त्रिशिखां भृकुटीं कृत्वा सत्वरं समुपाद्रवत् । भर्त्समानः स परुषैर्वाक्यैस्तांस्ताडयन्निव
triśikhāṁ bhṛkuṭīṁ kṛtvā satvaraṁ samupādravat bhartsamānaḥ sa paruṣairvākyaistāṁstāḍayanniva
अपनी तीन नुकीली भौंहें चढ़ाकर वह शीघ्रता से उनकी ओर दौड़ा, कठोर वचनों से धमकाता हुआ मानो उन्हें मार ही डालेगा।
श्लोक 18 (skanda.6.124.18)
ततस्ते मुनयो दृष्ट्वा यमदूतोपमं च तम् । यज्ञोपवीतसंयुक्तं प्रोचुस्ते कृपयान्विताः
tataste munayo dṛṣṭvā yamadūtopamaṁ ca tam yajñopavītasaṁyuktaṁ procuste kṛpayānvitāḥ
तब उन मुनियों ने उसे यमदूत के समान देखकर, फिर भी उसे यज्ञोपवीत से युक्त पाकर, करुणा से भरकर उससे कहा —
श्लोक 19 (skanda.6.124.19)
ऋषय ऊचुः । अहो त्वं ब्राह्मणोऽसीति तत्कस्मादतिगर्हितम् । करोषि कर्म चैतद्धि म्लेच्छकृत्यं तु बालिश
ṛṣaya ūcuḥ aho tvaṁ brāhmaṇo'sīti tatkasmādatigarhitam karoṣi karma caitaddhi mlecchakṛtyaṁ tu bāliśa
ऋषियों ने कहा — "अरे! तुम तो ब्राह्मण हो; फिर क्यों, हे मूर्ख, तुम यह अत्यंत निंदनीय, म्लेच्छों जैसा कार्य करते हो?"
श्लोक 20 (skanda.6.124.20)
वयं च मुनयः शांतास्त्यक्ताऽशेषपरिग्रहाः । नास्माकमपि पार्श्वस्थं किंचिद्गृह्णाति यद्भवनान्
vayaṁ ca munayaḥ śāṁtāstyaktā'śeṣaparigrahāḥ nāsmākamapi pārśvasthaṁ kiṁcidgṛhṇāti yadbhavanān
"हम शांत मुनि हैं, जिन्होंने संपूर्ण परिग्रह का त्याग कर दिया है; हमारे पास तो कुछ भी नहीं है, जिससे तुम कुछ छीन सको।"
श्लोक 21 (skanda.6.124.21)
लोहजंघ उवाच । एतानि शुभ्रचीराणि वल्कलान्यजिनानि च । उपानहसमेतानि शीघ्रं यच्छंतु मे द्विजाः
lohajaṁgha uvāca etāni śubhracīrāṇi valkalānyajināni ca upānahasametāni śīghraṁ yacchaṁtu me dvijāḥ
लोहजंघ ने कहा — "हे द्विजो! ये शुभ्र वस्त्र, वल्कल और मृगचर्म तथा जूते — यह सब मुझे शीघ्र सौंप दो।"
श्लोक 22 (skanda.6.124.22)
नो चेद्धत्वाप्रहारेण यष्ट्या वज्रोपमेन च । प्रापयिष्यस्यसंदिग्धं धर्मराजनिवेशनम्
no ceddhatvāprahāreṇa yaṣṭyā vajropamena ca prāpayiṣyasyasaṁdigdhaṁ dharmarājaniveśanam
"अन्यथा मैं तुम्हें वज्र के समान इस दंड से आघात करके निःसंदेह यमराज के निवास तक पहुँचा दूँगा।"
श्लोक 23 (skanda.6.124.23)
ऋषय ऊचुः । सर्वं दास्यामहे तुभ्यं वयं तावन्मलिम्लुच । किंवदन्तीं वदास्माकं यां पृच्छामः कुतूहलात्
ṛṣaya ūcuḥ sarvaṁ dāsyāmahe tubhyaṁ vayaṁ tāvanmalimluca kiṁvadantīṁ vadāsmākaṁ yāṁ pṛcchāmaḥ kutūhalāt
ऋषियों ने कहा — "हे मलिन आचरण वाले! हम तुम्हें सब कुछ दे देंगे; बस हमारे इस कौतूहलवश पूछे गए प्रश्न का उत्तर दो।"
श्लोक 24 (skanda.6.124.24)
किमर्थं कुरुषे चौर्यं त्वं विप्रोऽसि सुनिर्घृणः । किं जितो व्यसनै रौद्रैः किं वा व्याधद्विजो भवान्
kimarthaṁ kuruṣe cauryaṁ tvaṁ vipro'si sunirghṛṇaḥ kiṁ jito vyasanai raudraiḥ kiṁ vā vyādhadvijo bhavān
"तुम क्यों यह चोरी करते हो? तुम तो ब्राह्मण हो, फिर भी अत्यंत निर्दय हो — क्या तुम भयंकर दुर्व्यसनों से पराजित हो, अथवा तुम कोई व्याध-द्विज हो?"
श्लोक 25 (skanda.6.124.25)
लोहजंघ उवाच । व्यसनार्थं न मे कृत्यमेतच्चौर्यसमुद्भवम् । कुटुम्बार्थं विजानीथ धर्ममेतन्न संशयः
lohajaṁgha uvāca vyasanārthaṁ na me kṛtyametaccauryasamudbhavam kuṭumbārthaṁ vijānītha dharmametanna saṁśayaḥ
लोहजंघ ने कहा — "मेरा यह चोरी का कार्य किसी दुर्व्यसन के लिए नहीं है; यह मैं अपने परिवार के लिए करता हूँ — जानो कि यह मेरा धर्म ही है, इसमें संशय नहीं।"
श्लोक 26 (skanda.6.124.26)
पितरौ मम वार्द्धक्ये वर्तमानौ व्यवस्थितौ । तथा पतिव्रता पत्नी गृहधर्मविचक्षणा
pitarau mama vārddhakye vartamānau vyavasthitau tathā pativratā patnī gṛhadharmavicakṣaṇā
"मेरे माता-पिता वृद्धावस्था में हैं, तथा मेरी पतिव्रता पत्नी भी है, जो गृहस्थ धर्म में अत्यंत निपुण है।"
श्लोक 27 (skanda.6.124.27)
उपार्ज्जयामि यत्किञ्चिदहमेतेन कर्मणा । तत्सर्वं तत्कृते नूनं सत्येनात्मानमालभे
upārjjayāmi yatkiñcidahametena karmaṇā tatsarvaṁ tatkṛte nūnaṁ satyenātmānamālabhe
"मैं इस कार्य से जो कुछ भी अर्जित करता हूँ, वह सब निश्चय ही उनके लिए है — सत्य कहता हूँ, इस बात की शपथ लेता हूँ।"
श्लोक 28 (skanda.6.124.28)
तस्मान्मुंचथ प्राक्सर्वं विभवं किं वृथोक्तिभिः । कृताभिः स्फुरते हस्तो ममायं हन्तुमेव हि
tasmānmuṁcatha prāksarvaṁ vibhavaṁ kiṁ vṛthoktibhiḥ kṛtābhiḥ sphurate hasto mamāyaṁ hantumeva hi
"अतः पहले अपना सारा धन-वैभव छोड़ दो, व्यर्थ की बातों से क्या लाभ? यह मेरा हाथ, जो तैयार है, केवल मारने के लिए ही फड़क रहा है।"
श्लोक 29 (skanda.6.124.29)
ऋषय ऊचुः । यद्येवं चौर तद्गत्वा त्वं पृच्छस्व कुटुम्बकम् । ममपापांशभागी त्वं किं भविष्यसि किं न वा
ṛṣaya ūcuḥ yadyevaṁ caura tadgatvā tvaṁ pṛcchasva kuṭumbakam mamapāpāṁśabhāgī tvaṁ kiṁ bhaviṣyasi kiṁ na vā
ऋषियों ने कहा — "हे चोर! यदि ऐसा है, तो जाकर अपने परिवार से यह पूछो — क्या तुम मेरे पाप के अंश के भागी बनोगे या नहीं?"
श्लोक 30 (skanda.6.124.30)
यदि ते संविभागेन पापस्यांशोऽपि गच्छति । तत्कुरुष्वाथवा पाप दुर्वहं ते भविष्यति
yadi te saṁvibhāgena pāpasyāṁśo'pi gacchati tatkuruṣvāthavā pāpa durvahaṁ te bhaviṣyati
"यदि उनसे साझेदारी में तुम्हारे पाप का अंश भी उन्हें प्राप्त हो जाए, तो यह कार्य करो; अन्यथा हे पापी! यह पाप तुम्हारे लिए दुर्वह होगा।"
श्लोक 31 (skanda.6.124.31)
सकलं रौरवे रौद्रे पतितस्य सुदुर्मते । वयं त्वा ब्राह्मणं मत्वा ब्रूम एतदसंशयम्
sakalaṁ raurave raudre patitasya sudurmate vayaṁ tvā brāhmaṇaṁ matvā brūma etadasaṁśayam
"हे अत्यंत दुर्बुद्धि! तुम्हें ब्राह्मण जानकर हम निःसंदेह यह कहते हैं — इस पाप में गिरे हुए मनुष्य का सारा फल भयंकर रौरव नरक में भोगना पड़ता है।"
श्लोक 32 (skanda.6.124.32)
कृपाविष्टाः सहास्माभिः सञ्जातेऽपि सुदर्शने । मुनीनां यतचित्तानां दर्शनाद्धि शुभं भवेत्
kṛpāviṣṭāḥ sahāsmābhiḥ sañjāte'pi sudarśane munīnāṁ yatacittānāṁ darśanāddhi śubhaṁ bhavet
करुणा से भरकर हमने तुम्हारे साथ यह सुंदर बातचीत की है; क्योंकि संयमित चित्त वाले मुनियों के दर्शन मात्र से ही कल्याण होता है।
श्लोक 33 (skanda.6.124.33)
एकः पापानि कुरुते फलं भुंक्ते महाजनः । भोक्तारो विप्रमुच्यंते कर्ता दोषेण लिप्यते
ekaḥ pāpāni kurute phalaṁ bhuṁkte mahājanaḥ bhoktāro vipramucyaṁte kartā doṣeṇa lipyate
एक ही व्यक्ति पाप करता है, किंतु उसके फल का भोग बड़ा जनसमूह करता है — भोगने वाले तो मुक्त हो जाते हैं, किंतु करने वाला ही दोष से लिप्त होता है।
श्लोक 34 (skanda.6.124.34)
सूत उवाच । स तेषां तद्वचः श्रुत्वा चौरः किंचिद्भयान्वितः । सत्यमेतन्न संदेहो यदेतैर्व्याहृतं वचः
sūta uvāca sa teṣāṁ tadvacaḥ śrutvā cauraḥ kiṁcidbhayānvitaḥ satyametanna saṁdeho yadetairvyāhṛtaṁ vacaḥ
सूत जी ने कहा — उनका यह वचन सुनकर वह चोर कुछ भयभीत हो गया और सोचने लगा, "यह सत्य है, इसमें कोई संदेह नहीं, जो इन्होंने कहा है।"
श्लोक 35 (skanda.6.124.35)
तस्मात्पृच्छामि तद्गत्वा निजमेव कुटुम्बकम् । यदि स्यात्संविभागो मे पापांशस्य करोमि वै
tasmātpṛcchāmi tadgatvā nijameva kuṭumbakam yadi syātsaṁvibhāgo me pāpāṁśasya karomi vai
"अतः मैं अपने ही परिवार के पास जाकर यह पूछता हूँ; यदि मेरे पाप के अंश में उनकी साझेदारी हो, तो मैं यह कार्य करूँगा।"
श्लोक 36 (skanda.6.124.36)
एतत्कर्म न गृह्णंति यदि वा संत्यजाम्यहम् । महद्भयं समुत्पन्नं मम चेतसि सांप्रतम्
etatkarma na gṛhṇaṁti yadi vā saṁtyajāmyaham mahadbhayaṁ samutpannaṁ mama cetasi sāṁpratam
"यदि वे इस कार्य को स्वीकार न करें, तो मैं इसे त्याग दूँगा; अभी मेरे मन में इस बारे में महान भय उत्पन्न हो गया है।"
श्लोक 37 (skanda.6.124.37)
यदि यूयं न चान्यत्र प्रयास्यथ मुनीश्वराः । पलायनपरा भूत्वा तद्गत्वा निजमंदिरम्
yadi yūyaṁ na cānyatra prayāsyatha munīśvarāḥ palāyanaparā bhūtvā tadgatvā nijamaṁdiram
"हे मुनीश्वरो! यदि आप कहीं और नहीं जाएँगे, बल्कि भागने का विचार त्यागकर, तो मैं अपने घर जाकर,"
श्लोक 38 (skanda.6.124.38)
पृच्छामि पोष्यवर्गं च युष्मद्वाक्यं विशेषतः । यदि तत्पातकांशं मे ग्रहीष्यति कुटुम्बकम् । तद्युष्माकं ग्रहीष्यामि यत्किंचित्पार्श्वसंस्थितम्
pṛcchāmi poṣyavargaṁ ca yuṣmadvākyaṁ viśeṣataḥ yadi tatpātakāṁśaṁ me grahīṣyati kuṭumbakam tadyuṣmākaṁ grahīṣyāmi yatkiṁcitpārśvasaṁsthitam
"अपने आश्रित परिवार से आपकी बात, विशेष रूप से यह पूछूँगा; यदि मेरा परिवार मेरे पाप के अंश को स्वीकार कर ले, तो मैं तुम्हारे पास जो कुछ भी हो, वह ले लूँगा।"
श्लोक 39 (skanda.6.124.39)
अथवा प्रतिषेधं मे पापस्यास्य करिष्यति । तत्त्यजिष्याम्यसंदिग्धं सर्वान्वः सपरिच्छदान्
athavā pratiṣedhaṁ me pāpasyāsya kariṣyati tattyajiṣyāmyasaṁdigdhaṁ sarvānvaḥ saparicchadān
"अन्यथा, यदि वे मुझे इस पाप को करने से रोक दें, तो मैं निःसंदेह यह कार्य त्याग दूँगा, और तुम सबको तुम्हारे सामान सहित छोड़ दूँगा।"
श्लोक 40 (skanda.6.124.40)
ततस्ते शपथान्कृत्वा तस्य प्रत्ययकारणात् । तस्योपरि दयां कृत्वा मुमुचुस्तं गृहं प्रति
tataste śapathānkṛtvā tasya pratyayakāraṇāt tasyopari dayāṁ kṛtvā mumucustaṁ gṛhaṁ prati
तब उन्होंने उसके विश्वास के लिए शपथ ली, और उस पर दया करके उसे उसके घर जाने के लिए छोड़ दिया।
श्लोक 41 (skanda.6.124.41)
सोऽपि गत्वाऽथ पप्रच्छ प्रगत्वा पितरं निजम् । शृणु तात वचोऽस्माकं ततः प्रत्युत्तरं कुरु
so'pi gatvā'tha papraccha pragatvā pitaraṁ nijam śṛṇu tāta vaco'smākaṁ tataḥ pratyuttaraṁ kuru
वह भी जाकर, पहले अपने पिता के पास जाकर पूछने लगा — "हे तात! हमारी बात सुनिए, फिर उत्तर दीजिए।"
श्लोक 42 (skanda.6.124.42)
यत्कृत्वाहमकृत्यानि चौर्यादीनि सहस्रशः । पुष्टिं करोमि ते नित्यस् तद्भागस्तेऽस्ति वा न वा
yatkṛtvāhamakṛtyāni cauryādīni sahasraśaḥ puṣṭiṁ karomi te nityas tadbhāgaste'sti vā na vā
"जो चोरी आदि हजारों अकृत्य करके मैं तुम्हारा नित्य भरण-पोषण करता हूँ, उसमें तुम्हारा भाग है या नहीं?"
श्लोक 43 (skanda.6.124.43)
पापस्य मम प्रब्रूहि पृच्छतोऽत्र यथातथम् । अत्र मे संशयो जातस्तस्माच्छीघ्रं प्रकीर्तय
pāpasya mama prabrūhi pṛcchato'tra yathātatham atra me saṁśayo jātastasmācchīghraṁ prakīrtaya
"मेरे इस पाप के बारे में, हे पिता, जो मैं पूछ रहा हूँ, उसे यथार्थ रूप से मुझे बताइए; मुझे इस विषय में संदेह उत्पन्न हो गया है, अतः शीघ्र बताइए।"
श्लोक 44 (skanda.6.124.44)
पितोवाच । बाल्ये पुत्र मया नीतस्त्वं पुष्टिं व्याकुलात्मना । शुभाऽशुभानि कृत्यानि कृत्वा स्निग्धेन चेतसा
pitovāca bālye putra mayā nītastvaṁ puṣṭiṁ vyākulātmanā śubhā'śubhāni kṛtyāni kṛtvā snigdhena cetasā
पिता ने कहा — "हे पुत्र! बचपन में तुम्हें व्याकुल चित्त से मैंने पाला, शुभ-अशुभ कार्य करते हुए, स्नेहयुक्त हृदय से।"
श्लोक 45 (skanda.6.124.45)
एतदर्थं पुनर्येन वार्धक्ये समुपस्थिते
etadarthaṁ punaryena vārdhakye samupasthite
"इसी उद्देश्य से, जिससे कि वृद्धावस्था आने पर पुनः,"
श्लोक 46 (skanda.6.124.46)
गां पालयसि भूयोऽपि कृत्वा कर्म शुभाऽशुभम्
gāṁ pālayasi bhūyo'pi kṛtvā karma śubhā'śubham
"तुम मेरा पालन करो, चाहे शुभ या अशुभ कर्म करके ही क्यों न हो।"
श्लोक 47 (skanda.6.124.47)
न तस्य विद्यते भागस्तव स्वल्पोऽपि पुत्रक । शुभस्य वाऽथ पापस्य सांप्रतं च तथा मम
na tasya vidyate bhāgastava svalpo'pi putraka śubhasya vā'tha pāpasya sāṁprataṁ ca tathā mama
"हे पुत्र! उसमें तुम्हारा थोड़ा भी भाग नहीं है — न शुभ का, न पाप का — और अभी भी वैसा ही है, मेरा भी।"
श्लोक 48 (skanda.6.124.48)
आत्मनैव कृतं कर्म स्वयमेवोपभुज्यते । शुभं वा यदि वा पापं भोक्तारोन्यजनाः स्मृताः
ātmanaiva kṛtaṁ karma svayamevopabhujyate śubhaṁ vā yadi vā pāpaṁ bhoktāronyajanāḥ smṛtāḥ
जो कर्म मनुष्य स्वयं करता है, उसका फल भी वह स्वयं ही भोगता है; शुभ हो या पाप, फल भोगने वाले अन्य कहे जाते हैं (जिन्हें उसका भोग प्राप्त होता है)।
श्लोक 49 (skanda.6.124.49)
साधुत्वेनाथ चौर्येण कृष्या वा वाणिजेन वा । त्वमुपानयसे भोज्यं न मे चिन्ता प्रजायते
sādhutvenātha cauryeṇa kṛṣyā vā vāṇijena vā tvamupānayase bhojyaṁ na me cintā prajāyate
साधुता से, चोरी से, खेती से या व्यापार से — जिस भी उपाय से तुम भोजन लाते हो, मुझे उसकी कोई चिंता नहीं है।
श्लोक 50 (skanda.6.124.50)
तस्मान्नैतद्धृदि स्थाप्यं कर्मनिंद्यं करिष्यसि । यत्तस्यांशं प्रभोक्ता त्वं वयं सर्वे प्रभुंजकाः
tasmānnaitaddhṛdi sthāpyaṁ karmaniṁdyaṁ kariṣyasi yattasyāṁśaṁ prabhoktā tvaṁ vayaṁ sarve prabhuṁjakāḥ
अतः इस निंद्य कार्य को हृदय में मत बसाओ — जिस कर्म का फल तुम्हीं भोगोगे, हम सब तो केवल उसके परिणाम का उपभोग करने वाले हैं।
श्लोक 51 (skanda.6.124.51)
सूत उवाच । स एतद्वचनं श्रुत्वा व्याकुलेनान्त्तरात्मना । पप्रच्छ मातरं गत्वा तमेवार्थं प्रयत्नतः
sūta uvāca sa etadvacanaṁ śrutvā vyākulenānttarātmanā papraccha mātaraṁ gatvā tamevārthaṁ prayatnataḥ
सूत जी ने कहा — यह वचन सुनकर, व्याकुल अंतरात्मा से युक्त होकर, वह जाकर अपनी माता से भी उसी बात को प्रयत्नपूर्वक पूछने लगा।
श्लोक 52 (skanda.6.124.52)
ततस्तयापि तच्चोक्तं यत्पित्रा तस्य जल्पितम् । असामान्यं शुभे पापे कृत्ये तस्य द्विजोत्तमाः
tatastayāpi taccoktaṁ yatpitrā tasya jalpitam asāmānyaṁ śubhe pāpe kṛtye tasya dvijottamāḥ
तब उसने भी वही कहा जो उसके पिता ने कहा था — हे श्रेष्ठ द्विजो! शुभ या पाप कर्म में उसका (माता-पिता का) कोई विशेष भागीदारी नहीं है।
श्लोक 53 (skanda.6.124.53)
ततः पप्रच्छ तां भार्यां गत्वा दुःखसमन्वितः । साऽप्युवाच ततस्तादृक्पापं गुरुजनोद्भवम्
tataḥ papraccha tāṁ bhāryāṁ gatvā duḥkhasamanvitaḥ sā'pyuvāca tatastādṛkpāpaṁ gurujanodbhavam
तत्पश्चात् दुःख से भरा हुआ वह अपनी पत्नी के पास जाकर पूछने लगा; उसने भी वैसा ही कहा — कि गुरुजनों से उत्पन्न वह पाप उन्हीं का होता है।
श्लोक 54 (skanda.6.124.54)
ततः स शोकसंतप्तः पश्चात्तापेन संयुतः । गर्हयन्नेव चात्मानं ययौ ते यत्र तापसाः
tataḥ sa śokasaṁtaptaḥ paścāttāpena saṁyutaḥ garhayanneva cātmānaṁ yayau te yatra tāpasāḥ
तब वह शोक से संतप्त और पश्चाताप से युक्त होकर, स्वयं की निंदा करता हुआ वहाँ गया, जहाँ वे तपस्वी थे।
श्लोक 55 (skanda.6.124.55)
ततः प्रणम्य तान्सर्वान्कृतांजलिपुटः स्थितः । गम्यतां गम्यतां विप्राः क्षम्यतां क्षम्यतां मम
tataḥ praṇamya tānsarvānkṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ gamyatāṁ gamyatāṁ viprāḥ kṣamyatāṁ kṣamyatāṁ mama
तब उन सबको प्रणाम करके, हाथ जोड़कर खड़ा होकर वह बोला, "हे विप्रो! जाइए, जाइए; मुझे क्षमा करें, मुझे क्षमा करें।"
श्लोक 56 (skanda.6.124.56)
यन्मया मौर्ख्यमास्थाय युष्मन्निर्भर्त्सना कृता । सुपाप्मना विमूढेन तस्मात्कार्या क्षमाद्य मे
yanmayā maurkhyamāsthāya yuṣmannirbhartsanā kṛtā supāpmanā vimūḍhena tasmātkāryā kṣamādya me
"मैंने जो मूर्खतावश आपकी निर्भर्त्सना की, वह अत्यंत पापी और मूढ़ होने के कारण थी; अतः आज आप मुझे क्षमा करें।"
श्लोक 57 (skanda.6.124.57)
युष्मदीयं वचः कृत्स्नं मद्गुरुभ्यां प्रजल्पितम् । भार्यया च द्विजश्रेष्ठास्तेन मे दुःखमागतम्
yuṣmadīyaṁ vacaḥ kṛtsnaṁ madgurubhyāṁ prajalpitam bhāryayā ca dvijaśreṣṭhāstena me duḥkhamāgatam
"हे श्रेष्ठ द्विजो! आपका संपूर्ण वचन मेरे माता-पिता तथा पत्नी ने भी दोहराया; इसी से मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ है।"
श्लोक 58 (skanda.6.124.58)
तस्मात्कुर्वंतु मे सर्वे प्रसादं मुनिसत्तमाः । उपदेशप्रदानेन येन पापं क्षपाम्यहम्
tasmātkurvaṁtu me sarve prasādaṁ munisattamāḥ upadeśapradānena yena pāpaṁ kṣapāmyaham
"अतः, हे श्रेष्ठ मुनियो! आप सब मुझ पर प्रसन्न होइए, किसी उपदेश के प्रदान से, जिससे मैं अपने पापों का क्षय कर सकूँ।"
श्लोक 59 (skanda.6.124.59)
मया कर्म कृतं निंद्यं सदैव द्विजसत्तमाः । स्त्रियोऽपि च द्विजेंद्राश्च तापसाश्च विशेषतः
mayā karma kṛtaṁ niṁdyaṁ sadaiva dvijasattamāḥ striyo'pi ca dvijeṁdrāśca tāpasāśca viśeṣataḥ
"हे श्रेष्ठ द्विजो! मैंने सदा निंद्य कार्य ही किए हैं — विशेष रूप से स्त्रियों, श्रेष्ठ ब्राह्मणों और तपस्वियों के प्रति।"
श्लोक 60 (skanda.6.124.60)
ये ये दीनतरा लोका न समर्थाः प्रयोधितुम् । ते मया मुषिताः सर्वे न समर्थाः कदाचन
ye ye dīnatarā lokā na samarthāḥ prayodhitum te mayā muṣitāḥ sarve na samarthāḥ kadācana
"जो भी दीन-हीन लोग हैं, जो अपनी रक्षा में समर्थ नहीं हैं, वे सब मेरे द्वारा लूटे गए हैं — जो कभी भी प्रतिरोध करने में समर्थ नहीं थे।"
श्लोक 61 (skanda.6.124.61)
कुटुम्बार्थं विमूढेन साधुसंगविवर्जिना । यथैव पठता शास्त्रं तन्मेऽद्य पतितं हृदि
kuṭumbārthaṁ vimūḍhena sādhusaṁgavivarjinā yathaiva paṭhatā śāstraṁ tanme'dya patitaṁ hṛdi
"परिवार के लिए, मूढ़ होकर, सज्जनों के संग से रहित होकर, मैंने ऐसा किया, मानो शास्त्र पढ़ते हुए भी — यह सब बात आज मेरे हृदय में गिरी है (मुझे समझ में आई है)।"
श्लोक 62 (skanda.6.124.62)
यदि न स्याद्भवद्भिर्मे दर्शनं चाद्य सत्तमाः । तदन्यान्यपि पापानि कर्ताहं स्यां न संशयः
yadi na syādbhavadbhirme darśanaṁ cādya sattamāḥ tadanyānyapi pāpāni kartāhaṁ syāṁ na saṁśayaḥ
"हे उत्तम मुनियो! यदि आज आपका यह दर्शन मुझे प्राप्त न होता, तो निःसंदेह मैं और भी बहुत से पाप करता रहता।"
श्लोक 63 (skanda.6.124.63)
तेषां मध्यगतश्चासीत्पुलहो नाम सन्मुनिः । हास्यशीलः स तं प्राह विप्लवार्थं द्विजोत्तमम्
teṣāṁ madhyagataścāsītpulaho nāma sanmuniḥ hāsyaśīlaḥ sa taṁ prāha viplavārthaṁ dvijottamam
उनके बीच पुलह नामक एक सत्पुरुष मुनि थे, जो हास्यशील स्वभाव के थे; उन्होंने उस ब्राह्मण के उद्धार के लिए कहा।
श्लोक 64 (skanda.6.124.64)
अहं ते कीर्तयिष्यामि मन्त्रमेकं सुशोभनम् । यं ध्यायञ्जप्यमानस्त्वं सिद्धिं यास्यसि शाश्वतीम्
ahaṁ te kīrtayiṣyāmi mantramekaṁ suśobhanam yaṁ dhyāyañjapyamānastvaṁ siddhiṁ yāsyasi śāśvatīm
"मैं तुम्हें एक अत्यंत शुभ मंत्र बताऊँगा, जिसका ध्यान करते हुए जप करने से तुम शाश्वत सिद्धि को प्राप्त होगे।"
श्लोक 65 (skanda.6.124.65)
जाटघोटेतिमन्त्रोऽयं सर्वसिद्धिप्रदायकः । तमेनं जप विप्र त्वं दिवारात्रमतंद्रितः
jāṭaghoṭetimantro'yaṁ sarvasiddhipradāyakaḥ tamenaṁ japa vipra tvaṁ divārātramataṁdritaḥ
"यह 'जाटघोट' नामक मंत्र समस्त सिद्धियों को देने वाला है; हे विप्र! तुम इसे दिन-रात बिना आलस्य के जपते रहो।"
श्लोक 66 (skanda.6.124.66)
ततो यास्यसि संसिद्धिं दुर्लभां त्रिदशैरपि
tato yāsyasi saṁsiddhiṁ durlabhāṁ tridaśairapi
"उससे तुम उस सिद्धि को प्राप्त होगे, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।"
श्लोक 67 (skanda.6.124.67)
एवमुक्त्वाथ ते विप्रास्तीर्थयात्रां ततो ययुः । सोऽपि तत्रैव चौरस्तु स्थितो जपपरायणः
evamuktvātha te viprāstīrthayātrāṁ tato yayuḥ so'pi tatraiva caurastu sthito japaparāyaṇaḥ
ऐसा कहकर वे ब्राह्मण अपनी तीर्थयात्रा पर आगे बढ़ गए; और वह चोर भी उसी स्थान पर रहकर जप में लीन हो गया।
श्लोक 68 (skanda.6.124.68)
अनन्यमनसा तेन प्रारब्धः स तदा जपः । यथाऽभवत्समाधिस्थो येनावस्थां परां गतः
ananyamanasā tena prārabdhaḥ sa tadā japaḥ yathā'bhavatsamādhistho yenāvasthāṁ parāṁ gataḥ
एकाग्रचित्त होकर उसने वह जप आरंभ किया, ऐसा कि वह समाधि में स्थित हो गया, जिससे वह परम अवस्था को प्राप्त हुआ।
श्लोक 69 (skanda.6.124.69)
तस्यैवं स्मरमाणस्य तं मन्त्रं ब्राह्मणस्य च । निश्चलत्वं गतः कायः कार्ये च निश्चलः स्थितः
tasyaivaṁ smaramāṇasya taṁ mantraṁ brāhmaṇasya ca niścalatvaṁ gataḥ kāyaḥ kārye ca niścalaḥ sthitaḥ
इस प्रकार उस ब्राह्मण के उस मंत्र का बार-बार स्मरण करने से उसका शरीर स्थिर हो गया, और वह अपने ही कार्य (जप) में अचल होकर बैठ गया।
श्लोक 70 (skanda.6.124.70)
ततः कालेन महता वल्मीकेन समावृतः । समंताद्ब्राह्मणश्रेष्ठा ध्यानस्थस्य महात्मनः
tataḥ kālena mahatā valmīkena samāvṛtaḥ samaṁtādbrāhmaṇaśreṣṭhā dhyānasthasya mahātmanaḥ
तब बहुत समय बीत जाने पर, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, ध्यानमग्न उस महात्मा के चारों ओर वल्मीक (बांबी) उग आई और उसे पूरी तरह ढक दिया।
श्लोक 71 (skanda.6.124.71)
तौ मातापितरौ तस्य सा च भार्या मनस्विनी । याता मृत्युवशं सर्वे तमन्वेष्य प्रयत्नतः
tau mātāpitarau tasya sā ca bhāryā manasvinī yātā mṛtyuvaśaṁ sarve tamanveṣya prayatnataḥ
उसके वे माता-पिता तथा वह मनस्विनी पत्नी, प्रयत्नपूर्वक उसे ढूँढ़कर भी न पाकर, सभी मृत्यु के वश में हो गए।
श्लोक 72 (skanda.6.124.72)
न विज्ञातश्च तत्रस्थः संन्यस्तः स महाव्रतः । संसारभावनिर्मुक्तस्तस्मान्मुनिसमागमात्
na vijñātaśca tatrasthaḥ saṁnyastaḥ sa mahāvrataḥ saṁsārabhāvanirmuktastasmānmunisamāgamāt
उस महान व्रतधारी संन्यासी को कोई नहीं पहचान सका, जो वहीं समाधि में स्थित रहा, संसार-भाव से मुक्त होकर, उन मुनियों के संग के प्रभाव से।
श्लोक 73 (skanda.6.124.73)
कस्यचित्त्वथ कालस्य तेन मार्गेण ते पुनः । तीर्थयात्राप्रसंगेन मुनयः समुपस्थिताः
kasyacittvatha kālasya tena mārgeṇa te punaḥ tīrthayātrāprasaṁgena munayaḥ samupasthitāḥ
कुछ समय बीतने पर, वे ही मुनि पुनः उसी मार्ग से, तीर्थयात्रा के प्रसंग में, वहाँ पहुँचे।
श्लोक 74 (skanda.6.124.74)
प्रोचुश्चैतद्द्विजाः स्थानं यत्र चौरेण संगमः । आसीद्वस्तेन रौद्रेण ब्राह्मणच्छद्मधारिणा
procuścaitaddvijāḥ sthānaṁ yatra caureṇa saṁgamaḥ āsīdvastena raudreṇa brāhmaṇacchadmadhāriṇā
तब उन ब्राह्मणों ने कहा, "यही वह स्थान है जहाँ हमारा उस भयंकर चोर से संगम हुआ था, जो ब्राह्मण के वेश में था।"
श्लोक 75 (skanda.6.124.75)
ततो वल्मीकमध्यस्थं शुश्रुवुर्निस्वनं च ते । जाटघोटेतिमंत्रस्य तस्यैव च महात्मनः
tato valmīkamadhyasthaṁ śuśruvurnisvanaṁ ca te jāṭaghoṭetimaṁtrasya tasyaiva ca mahātmanaḥ
तभी उन्होंने उस वल्मीक (बांबी) के भीतर से आती हुई ध्वनि सुनी — उसी महात्मा द्वारा जपे जा रहे 'जाटघोट' मंत्र की।
श्लोक 76 (skanda.6.124.76)
अथ भूम्यां प्रहारास्ते सस्वनुः सर्वतोदिशम् । ते वल्मीकं ततो दृष्ट्वा तं चौरं तस्य मध्यगम्
atha bhūmyāṁ prahārāste sasvanuḥ sarvatodiśam te valmīkaṁ tato dṛṣṭvā taṁ cauraṁ tasya madhyagam
तब उन्होंने भूमि पर सब दिशाओं में प्रहार किए, जिनकी ध्वनि गूँज उठी; तब उस बांबी को देखकर उन्होंने उसके बीच में स्थित उस चोर को पहचाना,
श्लोक 77 (skanda.6.124.77)
जपमानं तु तं मन्त्रं पुलहेन निवेदितः । हास्यरूपेण यस्तस्य सिद्धिं च द्विजसत्तमाः
japamānaṁ tu taṁ mantraṁ pulahena niveditaḥ hāsyarūpeṇa yastasya siddhiṁ ca dvijasattamāḥ
जो पुलह द्वारा हास्य में दिए गए उस मंत्र का जप कर रहा था; हे श्रेष्ठ द्विजो! उसकी वह सिद्धि —
श्लोक 78 (skanda.6.124.78)
यद्वा सत्यमिदं प्रोक्तमाचार्यैः शास्त्रदृष्टिभिः । स्तोकं सिद्धिकृते तस्य यस्मात्सिद्धिरुपस्थिता
yadvā satyamidaṁ proktamācāryaiḥ śāstradṛṣṭibhiḥ stokaṁ siddhikṛte tasya yasmātsiddhirupasthitā
यह अवश्य ही सत्य है, जो शास्त्रज्ञानी आचार्यों ने कहा है — भले ही मंत्र तुच्छ हो, उसके सिद्ध होने के लिए इतना ही पर्याप्त है, क्योंकि उससे उसे सिद्धि प्राप्त हो गई।
श्लोक 79 (skanda.6.124.79)
मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ । यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी
mantre tīrthe dvije deve daivajñe bheṣaje gurau yādṛśī bhāvanā yasya siddhirbhavati tādṛśī
मंत्र में, तीर्थ में, ब्राह्मण में, देवता में, ज्योतिषी में, औषधि में, गुरु में — जिसकी जैसी भावना होती है, उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है।
श्लोक 80 (skanda.6.124.80)
अथ तं वीक्ष्य संसिद्धं कुमन्त्रेणापि तस्करम् । ते विप्रा विस्मयाविष्टाः कृपाविष्टा विशेषतः
atha taṁ vīkṣya saṁsiddhaṁ kumantreṇāpi taskaram te viprā vismayāviṣṭāḥ kṛpāviṣṭā viśeṣataḥ
तब उस चोर को, कुमंत्र से भी सिद्धि प्राप्त हुआ देखकर, वे ब्राह्मण विस्मय से भर गए, और विशेष रूप से करुणा से भी युक्त हो गए।
श्लोक 81 (skanda.6.124.81)
समाध्यर्हैस्ततो द्रव्यैस्तैलैस्तद्भेषजैरपि
samādhyarhaistato dravyaistailaistadbheṣajairapi
तत्पश्चात् समाधि के योग्य विभिन्न द्रव्यों, तेलों और औषधियों से,
श्लोक 82 (skanda.6.124.82)
ममर्दुस्तस्य तद्गात्रं समाधिस्थं चिरं द्विजाः । ततः स चेतनां लब्धा आलोक्य च मुहुर्मुहुः । प्रोवाच विस्मयाविष्टस्तान्मुनीन्प्रकृतानिति
mamardustasya tadgātraṁ samādhisthaṁ ciraṁ dvijāḥ tataḥ sa cetanāṁ labdhā ālokya ca muhurmuhuḥ provāca vismayāviṣṭastānmunīnprakṛtāniti
हे द्विजो! उन्होंने बहुत देर तक समाधिस्थ उसके शरीर की मालिश की। तब वह चेतना को प्राप्त होकर, बार-बार देखकर, विस्मय से भरकर उन मुनियों से बोला, जिन्हें उसने पहचान लिया था।
श्लोक 83 (skanda.6.124.83)
लोहजंघ उवाच । किमर्थं न गता यूयं मया मुक्ता द्विजोत्तमाः । नाहं किंचिद्ग्रहीष्यामि युष्मदीयं कथंचन । कुटुंबार्थं यतस्तस्माद्व्रजध्वं स्वेच्छयाऽधुना
lohajaṁgha uvāca kimarthaṁ na gatā yūyaṁ mayā muktā dvijottamāḥ nāhaṁ kiṁcidgrahīṣyāmi yuṣmadīyaṁ kathaṁcana kuṭuṁbārthaṁ yatastasmādvrajadhvaṁ svecchayā'dhunā
लोहजंघ ने कहा — "हे श्रेष्ठ द्विजो! मेरे द्वारा छोड़े जाने पर आप क्यों नहीं गए? मैं अब आपकी कोई भी वस्तु किसी भी प्रकार से नहीं लूँगा। चूँकि यह सब मैं परिवार के लिए करता था, इसलिए अब आप अपनी इच्छा से यहाँ से प्रस्थान करें।"
श्लोक 84 (skanda.6.124.84)
मुनय ऊचुः । चिरकालाद्वयं प्राप्ताः पुनर्भ्रांत्वाऽत्र कानने । समाधिस्थेन न ज्ञातः कालोऽतीतस्त्वया बहु
munaya ūcuḥ cirakālādvayaṁ prāptāḥ punarbhrāṁtvā'tra kānane samādhisthena na jñātaḥ kālo'tītastvayā bahu
मुनियों ने कहा — "हम बहुत लंबे समय बाद यहाँ पुनः पहुँचे हैं, इस वन में फिर से भटकते हुए; समाधि में स्थित होने के कारण तुम्हें ज्ञात नहीं कि तुम्हारा कितना समय बीत चुका है।"
श्लोक 85 (skanda.6.124.85)
तौ मातापितरौ वृद्धौ त्वया मुक्तौ क्षयं गतौ । त्वं च संसिद्धिमापन्नः परामस्मत्प्रसादतः
tau mātāpitarau vṛddhau tvayā muktau kṣayaṁ gatau tvaṁ ca saṁsiddhimāpannaḥ parāmasmatprasādataḥ
"तुम्हारे वे वृद्ध माता-पिता, जिन्हें तुमने छोड़ दिया था, नष्ट हो चुके हैं; और तुमने हमारी ही कृपा से परम सिद्धि को प्राप्त कर लिया है।"
श्लोक 86 (skanda.6.124.86)
वल्मीकांतः स्थितो यस्मात्संसिद्धिं परमां गतः । वल्मीकिर्नाम विख्यातस्तस्माल्लोके भविष्यसि
valmīkāṁtaḥ sthito yasmātsaṁsiddhiṁ paramāṁ gataḥ valmīkirnāma vikhyātastasmālloke bhaviṣyasi
"चूँकि तुम बांबी के भीतर स्थित होकर परम सिद्धि को प्राप्त हुए हो, इसलिए तुम संसार में 'वाल्मीकि' नाम से विख्यात होगे।"
श्लोक 87 (skanda.6.124.87)
अत्रस्थेन यतो मुष्टास्त्वया लोकाः पुरा द्विज । मुखाराख्यं ततस्तीर्थमेतत्ख्यातिं गमिष्यति
atrasthena yato muṣṭāstvayā lokāḥ purā dvija mukhārākhyaṁ tatastīrthametatkhyātiṁ gamiṣyati
"और, हे द्विज, चूँकि तुमने पहले इसी स्थान पर रहकर लोगों को लूटा था, इसलिए यह तीर्थ 'मुखार' नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त होगा।"
श्लोक 88 (skanda.6.124.88)
येऽत्र स्नानं करिष्यंति श्रावण्यां श्रद्धया द्विजाः । क्षालयिष्यंति ते पापं चौर्य कर्मसमुद्भवम्
ye'tra snānaṁ kariṣyaṁti śrāvaṇyāṁ śraddhayā dvijāḥ kṣālayiṣyaṁti te pāpaṁ caurya karmasamudbhavam
"जो द्विजगण श्रावण मास में श्रद्धापूर्वक यहाँ स्नान करेंगे, वे चोरी के कार्य से उत्पन्न अपने पाप को धो डालेंगे।"
श्लोक 89 (skanda.6.124.89)
सूत उवाच । एवमुक्त्वाथ ते विप्रास्तमामंत्र्य मुनिं ततः । प्रणतास्तेन संजग्मुर्वांछिताशां ततः परम्
sūta uvāca evamuktvātha te viprāstamāmaṁtrya muniṁ tataḥ praṇatāstena saṁjagmurvāṁchitāśāṁ tataḥ param
सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर वे ब्राह्मण उस मुनि से विदा लेकर, उसे प्रणाम करके अपनी वांछित दिशा में आगे चले गए।
श्लोक 90 (skanda.6.124.90)
तपःस्थः सोऽपि तत्रैव वाल्मीकिरिति यः स्मृतः
tapaḥsthaḥ so'pi tatraiva vālmīkiriti yaḥ smṛtaḥ
वे तपस्वी भी वहीं स्थित रहे, जो वाल्मीकि नाम से स्मरण किए जाते हैं।
श्लोक 91 (skanda.6.124.91)
मुनीनां प्रवरः श्रेष्ठः संजातश्च ततः परम् । अद्यापि तिष्ठते मूर्तः स तत्रस्थो मुनीश्वरः
munīnāṁ pravaraḥ śreṣṭhaḥ saṁjātaśca tataḥ param adyāpi tiṣṭhate mūrtaḥ sa tatrastho munīśvaraḥ
वे मुनियों में सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम हो गए; आज भी वे मुनीश्वर वहाँ मूर्तिमान रूप में विराजमान हैं।
श्लोक 92 (skanda.6.124.92)
यस्तं प्रपूजयेद्भक्त्या स कविर्जायते भुवम् । अष्टम्यां च विशेषेण सम्यक्छ्रद्धासमन्वितः
yastaṁ prapūjayedbhaktyā sa kavirjāyate bhuvam aṣṭamyāṁ ca viśeṣeṇa samyakchraddhāsamanvitaḥ
जो भक्तिपूर्वक, विशेष रूप से अष्टमी को, सम्यक् श्रद्धा से युक्त होकर उनकी पूजा करता है, वह इस पृथ्वी पर एक महाकवि के रूप में जन्म लेता है।