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नागर खण्ड · अध्याय 125

सत्यसंध-नृपति-वृत्तांत का वर्णन

अध्याय 124अध्याय-सूचीअध्याय 126

श्लोक 1 (skanda.6.125.1)

सूत उवाच । ततः कर्णोत्पलातीर्थं विख्यातं चास्ति शोभनम् । यत्र स्नातो नरः सम्यङ्न वियोगमवाप्नुयात्

sūta uvāca tataḥ karṇotpalātīrthaṁ vikhyātaṁ cāsti śobhanam yatra snāto naraḥ samyaṅna viyogamavāpnuyāt

सूत जी ने कहा — तत्पश्चात् वहाँ कर्णोत्पला नामक विख्यात और सुंदर तीर्थ है, जहाँ स्नान करने वाला मनुष्य कभी भी अपने प्रियजनों से वियोग नहीं पाता।

श्लोक 2 (skanda.6.125.2)

कथंचिदपि चेष्टेन धनेनालिजनेन च । पराक्रमेण धर्मेण कलत्रेण विशेषतः

kathaṁcidapi ceṣṭena dhanenālijanena ca parākrameṇa dharmeṇa kalatreṇa viśeṣataḥ

चाहे किसी भी प्रकार के प्रयत्न से हो — धन से, मित्रों से, पराक्रम से, धर्म से, और विशेष रूप से पत्नी से — यह उसे कभी वियुक्त नहीं होने देता।

श्लोक 3 (skanda.6.125.3)

सत्यसंध इति ख्यातः पुरासीत्पृथिवीपतिः । इक्ष्वाकुकुलसंभूतः सर्वरूपगुणैर्युतः

satyasaṁdha iti khyātaḥ purāsītpṛthivīpatiḥ ikṣvākukulasaṁbhūtaḥ sarvarūpaguṇairyutaḥ

प्राचीन काल में सत्यसंध नाम से विख्यात एक राजा था, जो इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुआ था और समस्त सुंदर रूप-गुणों से युक्त था।

श्लोक 4 (skanda.6.125.4)

तस्य कर्णोत्पलानाम जाता कन्या सुशोभना । बहुपुत्रस्य चैका सा सर्वलक्षणलक्षिता

tasya karṇotpalānāma jātā kanyā suśobhanā bahuputrasya caikā sā sarvalakṣaṇalakṣitā

उसके अनेक पुत्रों में से एक अत्यंत सुंदर कन्या भी उत्पन्न हुई, जिसका नाम कर्णोत्पला था, और जो समस्त शुभ लक्षणों से युक्त थी।

श्लोक 5 (skanda.6.125.5)

अथ तस्याः पिता नाम चक्रे द्वादशमे दिने । संमंत्र्य ब्राह्मणैः सार्धं भृत्यामात्यैर्मुहुर्मुहुः

atha tasyāḥ pitā nāma cakre dvādaśame dine saṁmaṁtrya brāhmaṇaiḥ sārdhaṁ bhṛtyāmātyairmuhurmuhuḥ

तब उसके पिता ने बारहवें दिन उसका नामकरण संस्कार किया, ब्राह्मणों तथा सेवकों-मंत्रियों से बार-बार परामर्श करके।

श्लोक 6 (skanda.6.125.6)

यस्मात्कर्णोत्पला चेयं जाता मम कुमारिका । तस्मात्कर्णोत्पलानाम जाता कन्या सुशोभना

yasmātkarṇotpalā ceyaṁ jātā mama kumārikā tasmātkarṇotpalānāma jātā kanyā suśobhanā

"चूँकि यह मेरी कन्या कर्णोत्पला (कमल-कर्ण) के समान उत्पन्न हुई है, इसलिए यह सुंदर कन्या 'कर्णोत्पला' नाम से उत्पन्न मानी जाए।"

श्लोक 7 (skanda.6.125.7)

बहु पुत्रस्य चैका सा सर्वलक्षणलक्षिता । तस्मात्कर्णोत्पलानाम जायतां द्विजसत्तमाः

bahu putrasya caikā sā sarvalakṣaṇalakṣitā tasmātkarṇotpalānāma jāyatāṁ dvijasattamāḥ

"अनेक पुत्रों में से एक यह समस्त शुभ लक्षणों से युक्त है; अतः, हे श्रेष्ठ द्विजो! यह 'कर्णोत्पला' नाम से ही जानी जाए।"

श्लोक 8 (skanda.6.125.8)

कृतनामाऽथ सा बाला वृद्धिं याति दिनेदिने । आह्लादकारिणी नित्यं कला चांद्रमसी यथा

kṛtanāmā'tha sā bālā vṛddhiṁ yāti dinedine āhlādakāriṇī nityaṁ kalā cāṁdramasī yathā

इस प्रकार नामकरण होने पर वह बालिका दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी, चंद्रमा की कला के समान सदा सबको आह्लादित करते हुए।

श्लोक 9 (skanda.6.125.9)

अथ सा क्रमशः प्राप्ता यौवनं बंधुलालिता । हस्ताद्धस्तं प्रगच्छंती सर्वेषां द्विजसत्तमाः

atha sā kramaśaḥ prāptā yauvanaṁ baṁdhulālitā hastāddhastaṁ pragacchaṁtī sarveṣāṁ dvijasattamāḥ

फिर वह क्रमशः यौवन को प्राप्त हुई, बांधवों द्वारा दुलारी जाती हुई, हे श्रेष्ठ द्विजो! सबके हाथों-हाथ (प्रशंसा में) बढ़ती हुई।

श्लोक 10 (skanda.6.125.10)

अथ तां यौवनोपेतां दृष्ट्वा स पृथिवीपतिः । चिंतयामास चित्तेन कस्येमां प्रददाम्यहम्

atha tāṁ yauvanopetāṁ dṛṣṭvā sa pṛthivīpatiḥ ciṁtayāmāsa cittena kasyemāṁ pradadāmyaham

तब उसे यौवनयुक्त देखकर उस पृथ्वीपति ने अपने मन में सोचा, "मैं इसे किसे दूँ?"

श्लोक 11 (skanda.6.125.11)

न तस्याः सदृशः कश्चिद्वरोऽत्र धरणीतले । न स्वर्गे न च पाताले किं कृत्यं मेऽधुना भवेत्

na tasyāḥ sadṛśaḥ kaścidvaro'tra dharaṇītale na svarge na ca pātāle kiṁ kṛtyaṁ me'dhunā bhavet

"इस पृथ्वी पर इसके समान कोई वर नहीं है, न स्वर्ग में, न पाताल में — अब मुझे क्या करना चाहिए?"

श्लोक 12 (skanda.6.125.12)

स एवं बहुधा ध्यात्वा तदर्थं पृथिवीपतिः । निश्चयं प्राकरोच्चित्ते प्रष्टव्योऽत्र पितामहः

sa evaṁ bahudhā dhyātvā tadarthaṁ pṛthivīpatiḥ niścayaṁ prākaroccitte praṣṭavyo'tra pitāmahaḥ

इस प्रकार उस विषय में बार-बार विचार करके, उस पृथ्वीपति ने मन में निश्चय किया कि यहाँ पितामह ब्रह्मा से ही पूछना चाहिए।

श्लोक 13 (skanda.6.125.13)

मयाद्य विषये चास्मिन्स देवः प्रेरयिष्यति । तस्मै पुत्रीं प्रदास्यामि नान्यस्मै वै कथंचन

mayādya viṣaye cāsminsa devaḥ prerayiṣyati tasmai putrīṁ pradāsyāmi nānyasmai vai kathaṁcana

"मैं आज इस विषय में जिसे भी वह देव निर्दिष्ट करेंगे, उसी को अपनी पुत्री दूँगा, अन्य किसी को कभी नहीं।"

श्लोक 14 (skanda.6.125.14)

स एवं निश्चयं कृत्वा तामादाय ततः परम् । ब्रह्मलोकं जगामाथ प्रष्टुं तस्याः कृते वरम्

sa evaṁ niścayaṁ kṛtvā tāmādāya tataḥ param brahmalokaṁ jagāmātha praṣṭuṁ tasyāḥ kṛte varam

इस प्रकार निश्चय करके, उसे साथ लेकर, तत्पश्चात् वह उसके लिए वर पूछने के निमित्त ब्रह्मलोक को चला गया।

श्लोक 15 (skanda.6.125.15)

अथ यावत्स संप्राप्तो ब्रह्मलोकं नरेश्वरः । तावत्संध्या समुत्पन्ना ब्राह्मी ब्राह्मणसत्तमाः

atha yāvatsa saṁprāpto brahmalokaṁ nareśvaraḥ tāvatsaṁdhyā samutpannā brāhmī brāhmaṇasattamāḥ

जब तक वह राजा ब्रह्मलोक में पहुँचा, तब तक, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, वहाँ ब्राह्मी संध्या उत्पन्न हो चुकी थी।

श्लोक 16 (skanda.6.125.16)

एतस्मिन्नंतरे ब्रह्मा सायंतनक्रियोत्सुकः । उपविष्टः समाधिस्थस्तत्कालं समपद्यत

etasminnaṁtare brahmā sāyaṁtanakriyotsukaḥ upaviṣṭaḥ samādhisthastatkālaṁ samapadyata

इसी बीच सायंकालीन कर्म के लिए उत्सुक ब्रह्मा वहाँ बैठे हुए समाधि में लीन हो गए।

श्लोक 17 (skanda.6.125.17)

सत्यसंधोऽपि तं दृष्ट्वा समाधिस्थं पितामहम् । समाध्यंतं प्रतीक्षन्स उपविष्टः समीपतः

satyasaṁdho'pi taṁ dṛṣṭvā samādhisthaṁ pitāmaham samādhyaṁtaṁ pratīkṣansa upaviṣṭaḥ samīpataḥ

सत्यसंध भी उन्हें समाधिस्थ पितामह के रूप में देखकर, उनकी समाधि समाप्त होने की प्रतीक्षा करते हुए उनके निकट बैठ गया।

श्लोक 18 (skanda.6.125.18)

ततो विलोक्य चात्मानमात्मनि प्रपितामहः । पद्मे प्रवर्तिते सम्यगष्टपत्रे हृदि स्थिते

tato vilokya cātmānamātmani prapitāmahaḥ padme pravartite samyagaṣṭapatre hṛdi sthite

तब उस प्रपितामह ने अपने भीतर ही अपने को देखा — हृदय में स्थित, सम्यक् रूप से प्रकट होते आठ पंखुड़ियों वाले कमल में,

श्लोक 19 (skanda.6.125.19)

कर्णिकामध्यगं दीप्तं बहुवर्णमतिस्थिरम् । आनंदाश्रुपरिक्लिन्नवदनः पुलकांकितः

karṇikāmadhyagaṁ dīptaṁ bahuvarṇamatisthiram ānaṁdāśrupariklinnavadanaḥ pulakāṁkitaḥ

कर्णिका के मध्य में स्थित, देदीप्यमान, अनेक वर्णों वाला, अत्यंत स्थिर वह कमल — जिसे देखकर उनका मुख आनंदाश्रुओं से भीग गया और शरीर में रोमांच हो आया।

श्लोक 20 (skanda.6.125.20)

तत आचम्य प्रक्षाल्य चरणौ सर्वतोदिशम् । अपश्यत्प्रणतः सर्वैर्ब्रह्मलोकनिवासिभिः

tata ācamya prakṣālya caraṇau sarvatodiśam apaśyatpraṇataḥ sarvairbrahmalokanivāsibhiḥ

तत्पश्चात् आचमन करके तथा चारों दिशाओं की ओर अपने चरण धोकर, वे सभी ब्रह्मलोकवासियों द्वारा प्रणाम किए जाते हुए दिखाई दिए।

श्लोक 21 (skanda.6.125.21)

एतस्मिन्नंतरे राजा तामादाय शुभाननाम् । नमस्कृत्य तया सार्धं ततः प्रोवाच सादरम्

etasminnaṁtare rājā tāmādāya śubhānanām namaskṛtya tayā sārdhaṁ tataḥ provāca sādaram

इसी बीच वह राजा, अपनी शुभमुखी पुत्री को साथ लेकर, नमस्कार करके, उनके साथ आदरपूर्वक बोला।

श्लोक 22 (skanda.6.125.22)

अहं देव समायातो मर्त्यलोकात्तवांतिकम् । सत्यसंधो महीपाल आनर्त भुवि विश्रुतः

ahaṁ deva samāyāto martyalokāttavāṁtikam satyasaṁdho mahīpāla ānarta bhuvi viśrutaḥ

"हे देव! मैं मर्त्यलोक से आपके निकट आया हूँ — मैं सत्यसंध नामक राजा हूँ, जो आनर्त भूमि में विख्यात हूँ।"

श्लोक 23 (skanda.6.125.23)

इयं कर्णोत्पलानाम मम कन्या सुशोभना । अस्या भुवि मया लब्धो न समोऽत्र पतिः क्वचित्

iyaṁ karṇotpalānāma mama kanyā suśobhanā asyā bhuvi mayā labdho na samo'tra patiḥ kvacit

"यह मेरी सुंदर कन्या कर्णोत्पला नाम की है; इस पृथ्वी पर इसके योग्य कोई भी वर मुझे कहीं प्राप्त नहीं हुआ।"

श्लोक 24 (skanda.6.125.24)

सदृशस्तेन चायातस्तव पार्श्वे सुरोत्तम । तस्मान्मे ब्रूहि भर्त्तारमस्या येन ददाम्यहम्

sadṛśastena cāyātastava pārśve surottama tasmānme brūhi bharttāramasyā yena dadāmyaham

"अतः उसके योग्य वर की खोज में मैं आपके पास आया हूँ, हे श्रेष्ठ देव! अतः मुझे उसका पति बताइए, जिसे मैं इसे दे सकूँ।"

श्लोक 25 (skanda.6.125.25)

सूत उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ततः प्रोवाच पद्मजः । विहस्य सर्वदेवानां समाजे द्विजसत्तमाः

sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā tataḥ provāca padmajaḥ vihasya sarvadevānāṁ samāje dvijasattamāḥ

सूत जी ने कहा — उसका वह वचन सुनकर, हे श्रेष्ठ द्विजो! तब कमल से उत्पन्न ब्रह्मा ने समस्त देवताओं की सभा में हँसते हुए कहा।

श्लोक 26 (skanda.6.125.26)

यदि पृच्छसि मे भूप कन्याधर्मपतिं प्रति । तन्नैषा कस्यचिद्देया सांप्रतं शृणु कारणम्

yadi pṛcchasi me bhūpa kanyādharmapatiṁ prati tannaiṣā kasyaciddeyā sāṁprataṁ śṛṇu kāraṇam

"हे भूप! यदि तुम मुझसे इस कन्या के धर्मपति के विषय में पूछते हो, तो यह अब किसी को भी देने योग्य नहीं है; इसका कारण सुनो।"

श्लोक 27 (skanda.6.125.27)

आत्मश्रेणिप्रसूताय वयोज्येष्ठाय भूपते । कन्या देया च धर्माय यशसे कुलवृद्धये

ātmaśreṇiprasūtāya vayojyeṣṭhāya bhūpate kanyā deyā ca dharmāya yaśase kulavṛddhaye

"हे भूपते! अपनी ही श्रेणी में उत्पन्न, आयु में ज्येष्ठ वर को ही कन्या देनी चाहिए — धर्म के लिए, यश के लिए, तथा कुल की वृद्धि के लिए।"

श्लोक 28 (skanda.6.125.28)

सेयं तव सुता मर्त्ये ज्येष्ठभावं समाश्रिता । सर्वेषां भूमिपालानां यत्तत्त्वं कारणं शृणु

seyaṁ tava sutā martye jyeṣṭhabhāvaṁ samāśritā sarveṣāṁ bhūmipālānāṁ yattattvaṁ kāraṇaṁ śṛṇu

"यह तुम्हारी पुत्री अब मर्त्यलोक में सभी राजाओं में ज्येष्ठ भाव को प्राप्त कर चुकी है; उसका यह सच्चा कारण सुनो।"

श्लोक 29 (skanda.6.125.29)

ममांतिकं प्रपन्नस्य तव जातं युगत्रयम् । अतीता भूतले मर्त्या ये दृष्टाः प्राक्त्वया नृप

mamāṁtikaṁ prapannasya tava jātaṁ yugatrayam atītā bhūtale martyā ye dṛṣṭāḥ prāktvayā nṛpa

"मेरे पास आने पर तुम्हारे तीन युग बीत चुके हैं; पृथ्वीतल पर जो भी मनुष्य तुमने पहले देखे थे, वे सब अतीत हो चुके हैं।"

श्लोक 30 (skanda.6.125.30)

अन्या सृष्टिः समुत्पन्ना सांप्रतं धरणीतले । न त्वं जानासि माहात्म्यान्मम लोकसमुद्भवात्

anyā sṛṣṭiḥ samutpannā sāṁprataṁ dharaṇītale na tvaṁ jānāsi māhātmyānmama lokasamudbhavāt

"अब पृथ्वीतल पर एक भिन्न सृष्टि उत्पन्न हो चुकी है; तुम मेरे लोक के उद्भव की महिमा को नहीं जानते।"

श्लोक 31 (skanda.6.125.31)

न देवा मानुषीं भार्यां कुर्वन्ति च कथंचन । श्लेष्ममूत्रपुरीषाणां संस्थानं या विगर्हिता

na devā mānuṣīṁ bhāryāṁ kurvanti ca kathaṁcana śleṣmamūtrapurīṣāṇāṁ saṁsthānaṁ yā vigarhitā

"देवता किसी भी प्रकार से मानवी को अपनी पत्नी नहीं बनाते, क्योंकि यह शरीर श्लेष्म, मूत्र और मल का ही निंदनीय आधार है।"

श्लोक 32 (skanda.6.125.32)

तस्मादत्रैव तिष्ठ त्वं सुतया सहितो नृप । हस्त्यश्वादि च यत्किंचित्तत्सर्वं ते क्षयं गतम्

tasmādatraiva tiṣṭha tvaṁ sutayā sahito nṛpa hastyaśvādi ca yatkiṁcittatsarvaṁ te kṣayaṁ gatam

"अतः, हे राजा! तुम अपनी पुत्री सहित यहीं रहो; जो कुछ हाथी-घोड़े आदि तुम्हारे पास थे, वे सब अब नष्ट हो चुके हैं।"

श्लोक 33 (skanda.6.125.33)

पुत्राः पौत्रास्तथा भृत्या ये चान्ये बांधवास्तव । ते सर्वे निधनं प्राप्ता ये चान्ये भवतेक्षिताः

putrāḥ pautrāstathā bhṛtyā ye cānye bāṁdhavāstava te sarve nidhanaṁ prāptā ye cānye bhavatekṣitāḥ

"तुम्हारे पुत्र, पौत्र, सेवक तथा अन्य जो भी बांधव थे, वे सब मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं, साथ ही जिन्होंने तुम्हें देखा था, वे भी।"

श्लोक 34 (skanda.6.125.34)

स तथेति प्रतिज्ञाय स्थितः पार्थिवसत्तमः । यावत्तावत्सुदुःखार्ता रुदतीसाऽब्रवीत्सुता

sa tatheti pratijñāya sthitaḥ pārthivasattamaḥ yāvattāvatsuduḥkhārtā rudatīsā'bravītsutā

"ऐसा ही हो" कहकर वह श्रेष्ठ राजा वहीं ठहर गया; तभी अत्यंत दुःखी होकर रोती हुई उसकी पुत्री यह बोली।

श्लोक 35 (skanda.6.125.35)

नाहं तात वसिष्यामि स्थानेस्मिन्ब्रह्मसंभवे । सखीजनपरित्यक्ता बंधुवर्गविनाकृता

nāhaṁ tāta vasiṣyāmi sthānesminbrahmasaṁbhave sakhījanaparityaktā baṁdhuvargavinākṛtā

"हे तात! मैं इस ब्रह्मा से उत्पन्न स्थान में नहीं रहूँगी, अपनी सखियों से त्यक्त होकर, बांधवों के समूह से रहित होकर।"

श्लोक 36 (skanda.6.125.36)

तस्माद्यास्यामि तत्रैव यत्र सा जननी मम । ताश्च सख्यः कृतानंदा याभिः संक्रीडितं मया

tasmādyāsyāmi tatraiva yatra sā jananī mama tāśca sakhyaḥ kṛtānaṁdā yābhiḥ saṁkrīḍitaṁ mayā

"अतः मैं वहीं जाऊँगी जहाँ मेरी माता है, तथा वे प्रसन्नचित्त सखियाँ भी, जिनके साथ मैंने क्रीड़ा की थी।"

श्लोक 37 (skanda.6.125.37)

भर्त्रा विनाकृता नाहं नयिष्ये कालसंस्थितिम् । तस्मात्तत्र द्रुतं गच्छ यत्र मे जननी स्थिता

bhartrā vinākṛtā nāhaṁ nayiṣye kālasaṁsthitim tasmāttatra drutaṁ gaccha yatra me jananī sthitā

"मैं पति के बिना अपना शेष जीवनकाल व्यतीत नहीं करूँगी; अतः शीघ्र वहाँ चलिए जहाँ मेरी माता स्थित है।"

श्लोक 38 (skanda.6.125.38)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा स्नेहार्द्रेण स चेतसा । तामादाय ततः प्राप्तः स्वं देशं पार्थिवोत्तमः

tasyāstadvacanaṁ śrutvā snehārdreṇa sa cetasā tāmādāya tataḥ prāptaḥ svaṁ deśaṁ pārthivottamaḥ

उसका वह वचन सुनकर, स्नेह से आर्द्र हृदय से युक्त होकर, वह श्रेष्ठ राजा उसे साथ लेकर तत्पश्चात् अपने देश में जा पहुँचा।

श्लोक 39 (skanda.6.125.39)

यावत्पश्यति तावत्स स्थलस्थाने जलाशयान् । जलस्थानेषु संजाताः स्थलसंघाः सुदुर्गमाः

yāvatpaśyati tāvatsa sthalasthāne jalāśayān jalasthāneṣu saṁjātāḥ sthalasaṁghāḥ sudurgamāḥ

जहाँ तक वह देखता, वहाँ स्थल के स्थान पर जलाशय बन गए थे, और जलाशयों के स्थान पर दुर्गम स्थलसमूह उत्पन्न हो गए थे।

श्लोक 40 (skanda.6.125.40)

अन्ये लोकास्तथा धर्मास्तेषां मध्ये व्यवस्थिताः । पृच्छन्नपि न जानाति संबंधं केनचित्सह

anye lokāstathā dharmāsteṣāṁ madhye vyavasthitāḥ pṛcchannapi na jānāti saṁbaṁdhaṁ kenacitsaha

उनके बीच अन्य लोग तथा अन्य धर्म-रीतियाँ स्थापित हो चुकी थीं; पूछने पर भी वह किसी से भी अपना कोई संबंध नहीं पहचान पाता था।

श्लोक 41 (skanda.6.125.41)

तथा मर्त्यानिलस्पृष्टन्द्यतत्त्कणात्स महीपतिः । सा च कन्या जराग्रस्ता संजाता श्वेतमूर्द्धजा

tathā martyānilaspṛṣṭandyatattkaṇātsa mahīpatiḥ sā ca kanyā jarāgrastā saṁjātā śvetamūrddhajā

तब उसी क्षण उस मर्त्यलोक की वायु के स्पर्श से वह राजा और वह कन्या दोनों वृद्धावस्था से ग्रस्त हो गए, उनके बाल श्वेत हो गए,

श्लोक 42 (skanda.6.125.42)

वलिभिः पूर्णितांगी च शीर्णदंता कुचच्युता । अमनोज्ञा विरूपांगी चिपिटाक्षी द्विजोत्तमाः

valibhiḥ pūrṇitāṁgī ca śīrṇadaṁtā kucacyutā amanojñā virūpāṁgī cipiṭākṣī dvijottamāḥ

उनका शरीर झुर्रियों से भर गया, दाँत क्षीण हो गए, स्तन ढल गए — हे श्रेष्ठ द्विजो! वह अत्यंत अरुचिकर, विरूप-अंगों वाली, चपटी आँखों वाली हो गई।

श्लोक 43 (skanda.6.125.43)

सोपि राजा तथाभूतो वेपमानः पदेपदे । पप्रच्छ भूपतिः कोत्र देशः कोयं पुरं च किम्

sopi rājā tathābhūto vepamānaḥ padepade papraccha bhūpatiḥ kotra deśaḥ koyaṁ puraṁ ca kim

इस अवस्था को प्राप्त हुआ वह राजा भी हर कदम पर काँपता हुआ, पूछने लगा, "यह कौन-सा देश है? यह कौन-सा नगर है? यह क्या है?"

श्लोक 44 (skanda.6.125.44)

अथ प्रोचुर्जनास्तस्य देश आनर्त इत्ययम् । अयं भूपोत्र विख्यातः सुधर्मज्ञो बृहद्बलः

atha procurjanāstasya deśa ānarta ityayam ayaṁ bhūpotra vikhyātaḥ sudharmajño bṛhadbalaḥ

तब वहाँ के लोगों ने उससे कहा, "यह देश आनर्त नाम से जाना जाता है; यहाँ के विख्यात राजा सुधर्मज्ञ बृहद्बल हैं।"

श्लोक 45 (skanda.6.125.45)

एतत्प्राप्तिपुरंनाम एषा साभ्रमती नदी । गर्तातीर्थमिदं पुण्यमेतस्याः परिकीर्तितम्

etatprāptipuraṁnāma eṣā sābhramatī nadī gartātīrthamidaṁ puṇyametasyāḥ parikīrtitam

"यह नगर 'प्राप्तिपुर' नाम से जाना जाता है, और यह नदी साभ्रमती है; इसी से संबंधित यह पुण्य गर्तातीर्थ प्रसिद्ध है।"

श्लोक 46 (skanda.6.125.46)

यत्रैते मुनयः शांता दांताश्चाष्टगुणे रताः । तपरता महाभागाः स्नानजप्ययपरायणाः

yatraite munayaḥ śāṁtā dāṁtāścāṣṭaguṇe ratāḥ taparatā mahābhāgāḥ snānajapyayaparāyaṇāḥ

"जहाँ शांत, संयमी, आठ गुणों में रत, तपस्यारत, महाभाग्यशाली मुनिगण सदा स्नान और जप में लीन रहते हैं।"

श्लोक 47 (skanda.6.125.47)

ततः स तु समाकर्ण्य रुरोद कृतनिःस्वनः । स्वसुतां तां समालिंग्य दुःखशोकसमन्वितः

tataḥ sa tu samākarṇya ruroda kṛtaniḥsvanaḥ svasutāṁ tāṁ samāliṁgya duḥkhaśokasamanvitaḥ

यह सब सुनकर वह उच्च स्वर में रोने लगा और अपनी पुत्री को गले लगाकर दुःख-शोक से भर उठा।

श्लोक 48 (skanda.6.125.48)

तौ च वृद्धतमौ दृष्ट्वा रुदतौ कृपयान्विताः । सर्वे लोकाः समाजग्मुः पप्रच्छुश्च सुदुःखिताः

tau ca vṛddhatamau dṛṣṭvā rudatau kṛpayānvitāḥ sarve lokāḥ samājagmuḥ papracchuśca suduḥkhitāḥ

उन दोनों अत्यंत वृद्धों को रोते हुए देखकर, करुणा से भरे हुए सभी लोग वहाँ एकत्र हो गए और अत्यंत दुःखी होकर पूछने लगे।

श्लोक 49 (skanda.6.125.49)

किं त्वं वृद्ध सुदुःखार्तः प्ररोदिषि निरर्गलम् । अनया वृद्धया सार्धं तस्मान्नः कारणं वद

kiṁ tvaṁ vṛddha suduḥkhārtaḥ prarodiṣi nirargalam anayā vṛddhayā sārdhaṁ tasmānnaḥ kāraṇaṁ vada

"हे वृद्ध! तुम अत्यंत दुःख से पीड़ित होकर बिना रुके क्यों रो रहे हो? इस वृद्धा के साथ तुम्हारे रोने का कारण हमें बताओ।"

श्लोक 50 (skanda.6.125.50)

किं ते नष्टः प्रियः कश्चित्किं वा जातो धनक्षयः । पराभूतोसि वा किं त्वं केनापि वद मा चिरम्

kiṁ te naṣṭaḥ priyaḥ kaścitkiṁ vā jāto dhanakṣayaḥ parābhūtosi vā kiṁ tvaṁ kenāpi vada mā ciram

"क्या तुम्हारा कोई प्रियजन खो गया है, या तुम्हारा धन नष्ट हो गया है? या क्या तुम किसी से पराजित हुए हो? विलंब किए बिना बताओ।"

श्लोक 51 (skanda.6.125.51)

धर्मज्ञो दुष्टहंता च साधूनां पालने रतः । राजा बृहद्बलोस्माकं येन ते कुरुते सुखम्

dharmajño duṣṭahaṁtā ca sādhūnāṁ pālane rataḥ rājā bṛhadbalosmākaṁ yena te kurute sukham

"हमारे राजा बृहद्बल धर्मज्ञ हैं, दुष्टों के संहारक हैं, सज्जनों की रक्षा में तत्पर रहते हैं — वे ही तुम्हें सुख प्रदान करेंगे।"

श्लोक 52 (skanda.6.125.52)

सत्यसंध उवाच । आनर्त्ताधिपतिश्चाहं सत्यसंध इति स्मृतः । मम कर्णोत्पलानाम सुतेयं दयिता सदा । सोहमस्याः प्रदानार्थं ब्रह्मलोकमितो गतः । प्रष्टुं पितामहं देवं स्थितस्तत्र मुहूर्तवत्

satyasaṁdha uvāca ānarttādhipatiścāhaṁ satyasaṁdha iti smṛtaḥ mama karṇotpalānāma suteyaṁ dayitā sadā sohamasyāḥ pradānārthaṁ brahmalokamito gataḥ praṣṭuṁ pitāmahaṁ devaṁ sthitastatra muhūrtavat

सत्यसंध ने कहा — "मैं आनर्त का अधिपति हूँ, सत्यसंध नाम से स्मरण किया जाता हूँ। यह मेरी सदा प्रिय कर्णोत्पला नाम की पुत्री है। इसके विवाह हेतु ही मैं यहाँ से ब्रह्मलोक गया था, वहाँ पितामह देव से पूछने के लिए मैं केवल एक मुहूर्त भर ही ठहरा।"

श्लोक 53 (skanda.6.125.53)

ततो भूयः समायातो यावत्पश्यामि भूतलम् । तावद्विलोमतां प्राप्तं सर्वं नो वेद्मि किञ्चन

tato bhūyaḥ samāyāto yāvatpaśyāmi bhūtalam tāvadvilomatāṁ prāptaṁ sarvaṁ no vedmi kiñcana

"तत्पश्चात् मैं पुनः लौट आया, किंतु ज्यों ही मैंने पृथ्वीतल को देखा, त्यों ही सब कुछ विपरीत हो चुका पाया — मैं अब कुछ भी नहीं जानता।"

श्लोक 54 (skanda.6.125.54)

तच्छ्रुत्वा ते जना गत्वा विस्मयोत्फुल्ललोचनाः । बृहद्बलाय तत्सर्वमाचख्युस्तुष्टिसंयुताः

tacchrutvā te janā gatvā vismayotphullalocanāḥ bṛhadbalāya tatsarvamācakhyustuṣṭisaṁyutāḥ

यह सुनकर वे लोग विस्मय से आँखें फैलाए हुए वहाँ से जाकर बृहद्बल को यह सारा वृत्तांत हर्षपूर्वक बताने लगे।

श्लोक 55 (skanda.6.125.55)

सोऽपि तत्सर्वमाकर्ण्य ततः शीघ्रतरं गतः । पद्भ्यामेव स्थितो यत्र सत्यसन्धो महीपतिः

so'pi tatsarvamākarṇya tataḥ śīghrataraṁ gataḥ padbhyāmeva sthito yatra satyasandho mahīpatiḥ

यह सब सुनकर वह भी अत्यंत शीघ्रता से, पैदल ही, वहाँ गया जहाँ राजा सत्यसंध खड़े थे।

श्लोक 56 (skanda.6.125.56)

ततस्तं प्रणिपत्योच्चैः कृतांजलिपुटः स्थितः । स्वागतं ते महीपाल भूयः सुस्वागतं च ते

tatastaṁ praṇipatyoccaiḥ kṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ svāgataṁ te mahīpāla bhūyaḥ susvāgataṁ ca te

तत्पश्चात् उन्हें ऊँची आवाज़ में प्रणाम करके, हाथ जोड़कर खड़े होकर वह बोला, "हे राजन! स्वागत है, आपका पुनः सुस्वागत है।"

श्लोक 57 (skanda.6.125.57)

इदं राज्यं निजं भूयो मया भृत्येन सादरम् । कुरुष्व स्वेच्छया देहि दानानि विविधानि च

idaṁ rājyaṁ nijaṁ bhūyo mayā bhṛtyena sādaram kuruṣva svecchayā dehi dānāni vividhāni ca

"यह अपना ही राज्य है — इसे मैं, आपका सेवक, आदरपूर्वक पुनः आपको समर्पित करता हूँ; अपनी इच्छा से इसका पालन कीजिए तथा विविध प्रकार के दान दीजिए।"

श्लोक 58 (skanda.6.125.58)

ततस्तं च समालिंग्य शिरस्याधाय चासकृत् । उवाचाश्रुपरिक्लिन्नवदनो गद्गदाक्षरम्

tatastaṁ ca samāliṁgya śirasyādhāya cāsakṛt uvācāśrupariklinnavadano gadgadākṣaram

तत्पश्चात् उसे गले लगाकर, बार-बार अपने सिर पर रखकर, आँसुओं से भीगे मुख से गद्गद स्वर में उसने कहा।

श्लोक 59 (skanda.6.125.59)

वत्स चीर्णं मया राज्यं दानं दत्तं पृथग्विधम् । वाजिमेधमुखैर्यज्ञैरिष्टं संपूर्णदक्षिणैः

vatsa cīrṇaṁ mayā rājyaṁ dānaṁ dattaṁ pṛthagvidham vājimedhamukhairyajñairiṣṭaṁ saṁpūrṇadakṣiṇaiḥ

"हे वत्स! मैंने राज्य का पालन कर लिया, विविध प्रकार के दान दिए, अश्वमेध आदि यज्ञों को पूर्ण दक्षिणाओं सहित संपन्न किया।"

श्लोक 60 (skanda.6.125.60)

तस्मात्तपश्चरिष्यामि सुतया चानया सह । यथैषा लभते भूयस्तारुण्यं प्राक्तनं शुभम्

tasmāttapaścariṣyāmi sutayā cānayā saha yathaiṣā labhate bhūyastāruṇyaṁ prāktanaṁ śubham

"अतः अब मैं इस पुत्री के साथ तपस्या करूँगा, जिससे यह पुनः अपना पूर्व शुभ तारुण्य प्राप्त कर सके।"

श्लोक 61 (skanda.6.125.61)

बृहद्बल उवाच । पारंपर्येण राजेंद्र मयैतत्सकलं श्रुतम् । सत्यसंधो महीपालः कन्यामादाय निर्गतः

bṛhadbala uvāca pāraṁparyeṇa rājeṁdra mayaitatsakalaṁ śrutam satyasaṁdho mahīpālaḥ kanyāmādāya nirgataḥ

बृहद्बल ने कहा — "हे राजेंद्र! मैंने यह सब वंश-परंपरा से सुना है, कि राजा सत्यसंध अपनी कन्या को लेकर यहाँ से चले गए थे।"

श्लोक 62 (skanda.6.125.62)

कुत्रचिन्न समायातः स भूयोऽपि पुरोत्तमे । ततस्तत्सचिवै राज्यं प्रतिपाल्य चिरं नृप । अभिषिक्तस्ततः पुत्रः सुहयोनाम विश्रुतः

kutracinna samāyātaḥ sa bhūyo'pi purottame tatastatsacivai rājyaṁ pratipālya ciraṁ nṛpa abhiṣiktastataḥ putraḥ suhayonāma viśrutaḥ

"वे इस श्रेष्ठ नगर में कहीं भी पुनः नहीं लौटे। तत्पश्चात् उनके मंत्रियों ने बहुत काल तक राज्य की रक्षा की, हे राजन! और फिर उनके पुत्र, जो सुहय नाम से विख्यात हुए, राज्याभिषिक्त हुए।"

श्लोक 63 (skanda.6.125.63)

तस्याहं क्रमशो जातः सप्तसप्ततिमो विभो । पुरुषस्तव वंशस्य समुद्भूतो महापतिः

tasyāhaṁ kramaśo jātaḥ saptasaptatimo vibho puruṣastava vaṁśasya samudbhūto mahāpatiḥ

"हे प्रभो! उन्हीं से क्रमशः मैं आपके वंश का सतहत्तरवाँ महान राजा उत्पन्न हुआ हूँ।"

श्लोक 64 (skanda.6.125.64)

तस्मादत्रैव कल्याणे स्थानेऽस्मिन्मेध्यतां गते । गर्तातीर्थे कुरु विभो तपस्त्वमनया सह

tasmādatraiva kalyāṇe sthāne'sminmedhyatāṁ gate gartātīrthe kuru vibho tapastvamanayā saha

"अतः, हे प्रभो! इस पवित्र स्थान पर, जो अब पूर्णतः शुद्ध हो चुका है, गर्तातीर्थ में आप इस पुत्री सहित तपस्या कीजिए,"

श्लोक 65 (skanda.6.125.65)

येन ते चरणौ नित्यं प्रणिपत्य त्रिसंधिजम् । श्रेयः प्राप्नोम्यसंदिग्धं प्रसादः क्रियतामिति

yena te caraṇau nityaṁ praṇipatya trisaṁdhijam śreyaḥ prāpnomyasaṁdigdhaṁ prasādaḥ kriyatāmiti

"जिससे मैं सदा आपके चरणों में प्रणाम करके, तीनों संध्याओं में, निःसंदेह कल्याण प्राप्त करूँ — कृपया यह अनुग्रह कीजिए।"

श्लोक 66 (skanda.6.125.66)

सत्यसंध उवाच । हाटकेश्वरजे क्षेत्रे मयासीत्स्थापितं पुरा । लिंगं वृषभनाथस्य तावदस्ति सुपुत्रक

satyasaṁdha uvāca hāṭakeśvaraje kṣetre mayāsītsthāpitaṁ purā liṁgaṁ vṛṣabhanāthasya tāvadasti suputraka

सत्यसंध ने कहा — "हाटकेश्वर क्षेत्र में मैंने पूर्वकाल में वृषभनाथ (शिव) का एक लिंग स्थापित किया था, जो अब तक विद्यमान है, हे पुत्र!"

श्लोक 67 (skanda.6.125.67)

तत्तस्याराधनं नित्यं करिष्यामि दिवानिशम् । तस्मात्प्रापय मां तत्र अनया सुतया सह

tattasyārādhanaṁ nityaṁ kariṣyāmi divāniśam tasmātprāpaya māṁ tatra anayā sutayā saha

"मैं वहाँ नित्य दिन-रात उसकी आराधना करूँगा; अतः मुझे इस पुत्री सहित वहीं पहुँचा दो।"

श्लोक 68 (skanda.6.125.68)

एवं तयोः प्रवदतोरन्योन्यं भूमिपालयोः । गर्त्तातीर्थात्समायाता ब्राह्मणाः कौतुकान्विताः । श्रुत्वा भूमिपतिं प्राप्तं चिरंतनगुरुं शुभम्

evaṁ tayoḥ pravadatoranyonyaṁ bhūmipālayoḥ garttātīrthātsamāyātā brāhmaṇāḥ kautukānvitāḥ śrutvā bhūmipatiṁ prāptaṁ ciraṁtanaguruṁ śubham

इस प्रकार परस्पर वार्तालाप करते हुए उन दोनों राजाओं को देखकर, गर्तातीर्थ से कुतूहलपूर्वक आए हुए ब्राह्मणों ने, यह सुनकर कि उनका प्राचीन शुभ गुरु वहाँ आया है,

श्लोक 69 (skanda.6.125.69)

ततः स पार्थिवस्तेषां दत्त्वार्घं प्रांजलिः स्थितः । प्रोवाच स्वर्गवृत्तांतमास्यतामिति सादरम्

tataḥ sa pārthivasteṣāṁ dattvārghaṁ prāṁjaliḥ sthitaḥ provāca svargavṛttāṁtamāsyatāmiti sādaram

तब उस राजा (सत्यसंध) ने उन्हें अर्घ्य देकर, हाथ जोड़कर आदरपूर्वक कहा, "आप सब आसन ग्रहण करें।"

श्लोक 70 (skanda.6.125.70)

अथ ते ब्राह्मणाः सर्वे यथाज्येष्ठं यथासुखम् । उपविष्टा नरेंद्रस्य चतुर्दिक्षु सुविस्मिताः । पप्रच्छुस्तं च भूपालं वार्तां ब्रह्मगृहोद्भवाम्

atha te brāhmaṇāḥ sarve yathājyeṣṭhaṁ yathāsukham upaviṣṭā nareṁdrasya caturdikṣu suvismitāḥ papracchustaṁ ca bhūpālaṁ vārtāṁ brahmagṛhodbhavām

तत्पश्चात् वे सभी ब्राह्मण यथाज्येष्ठ, यथासुख उस राजा के चारों ओर बैठे, अत्यंत विस्मित होकर, और उससे ब्रह्मलोक से संबंधित समाचार पूछने लगे।

श्लोक 71 (skanda.6.125.71)

यथा स तत्र निर्यात आगतश्च यथा पुरा । आलापाः पद्मयोनेश्च यथा जातास्त्वनेकशः

yathā sa tatra niryāta āgataśca yathā purā ālāpāḥ padmayoneśca yathā jātāstvanekaśaḥ

"वे वहाँ कैसे गए और कैसे लौटे, तथा उस कमलयोनि (ब्रह्मा) की जो बातचीत अनेक बार हुई, वह सब सुनाइए।"

श्लोक 72 (skanda.6.125.72)

ततः कथांतमासाद्य सत्यसंधो महीपतिः । किंचिदासाद्य तं प्राह समीपस्थं बृहद्बलम्

tataḥ kathāṁtamāsādya satyasaṁdho mahīpatiḥ kiṁcidāsādya taṁ prāha samīpasthaṁ bṛhadbalam

तत्पश्चात् कथा के अंत में पहुँचकर राजा सत्यसंध ने, पास ही बैठे बृहद्बल के कुछ निकट आकर उससे कहा।

श्लोक 73 (skanda.6.125.73)

मया इष्टं मखैश्चित्रैरनेकैर्भूरिदक्षिणैः । दानानि च विचित्राणि येषां संख्या न विद्यते

mayā iṣṭaṁ makhaiścitrairanekairbhūridakṣiṇaiḥ dānāni ca vicitrāṇi yeṣāṁ saṁkhyā na vidyate

"मैंने विभिन्न अद्भुत यज्ञों से, प्रचुर दक्षिणाओं सहित, यज्ञ किए हैं, तथा ऐसे अनगिनत विचित्र दान भी दिए हैं जिनकी कोई संख्या नहीं है।"

श्लोक 74 (skanda.6.125.74)

एकदाहं गतः पुत्र चमत्कारपुरोत्तमे । दृष्टं मया पुरं तच्च समंताद्ब्राह्मणैवृतम्

ekadāhaṁ gataḥ putra camatkārapurottame dṛṣṭaṁ mayā puraṁ tacca samaṁtādbrāhmaṇaivṛtam

"हे पुत्र! एक बार मैं श्रेष्ठ चमत्कारपुर नगर गया था; वहाँ मैंने वह नगर देखा, जो चारों ओर से ब्राह्मणों से घिरा हुआ था,"

श्लोक 75 (skanda.6.125.75)

जपस्वाध्यायसंपन्नैरग्निहोत्रपरायणैः । गृहस्थधर्मसंपन्नैर्लोकद्वयफलान्वितैः

japasvādhyāyasaṁpannairagnihotraparāyaṇaiḥ gṛhasthadharmasaṁpannairlokadvayaphalānvitaiḥ

"जो जप-स्वाध्याय में निपुण, अग्निहोत्र में तत्पर, गृहस्थधर्म से युक्त, तथा दोनों लोकों के फलों से संपन्न थे।"

श्लोक 76 (skanda.6.125.76)

ततश्च चिंतितं चित्ते स वन्यो मम पूर्वजः । येनैषोपार्जिता कीर्तिः शाश्वती क्षयवर्जिता

tataśca ciṁtitaṁ citte sa vanyo mama pūrvajaḥ yenaiṣopārjitā kīrtiḥ śāśvatī kṣayavarjitā

"तब मेरे मन में यह विचार आया कि मेरे उस वनवासी पूर्वज ने ही यह शाश्वत, अक्षय कीर्ति अर्जित की है।"

श्लोक 77 (skanda.6.125.77)

तस्मादहमपि स्थाप्य पुरमीदृक्समुच्छ्रितम् । ब्राह्मणेभ्यः प्रदास्यामि तत्कीर्तिपरिवृद्धये

tasmādahamapi sthāpya puramīdṛksamucchritam brāhmaṇebhyaḥ pradāsyāmi tatkīrtiparivṛddhaye

"अतः मैं भी इस प्रकार का एक उन्नत नगर स्थापित करके ब्राह्मणों को समर्पित करूँगा, जिससे उस कीर्ति की और भी वृद्धि हो।"

श्लोक 78 (skanda.6.125.78)

एवं चितयमानस्य मम नित्यं महीपते । अवांतरेण संजातं ब्रह्मलोकप्रयाणकम्

evaṁ citayamānasya mama nityaṁ mahīpate avāṁtareṇa saṁjātaṁ brahmalokaprayāṇakam

"इस प्रकार, हे राजन! जब मैं सदा यही सोच रहा था, तभी बीच में मेरा ब्रह्मलोक-गमन हो गया।"

श्लोक 79 (skanda.6.125.79)

एतदेकं हि मे चित्ते पश्चात्तापकरं स्थितम् । नान्यत्किंचिन्महीपाल कृतकृत्यस्य सर्वतः

etadekaṁ hi me citte paścāttāpakaraṁ sthitam nānyatkiṁcinmahīpāla kṛtakṛtyasya sarvataḥ

"यही एक बात मेरे मन में पश्चाताप का कारण बनकर स्थित है, हे राजन! अन्यथा कृतकृत्य हुए मुझे किसी भी ओर से कोई और चिंता नहीं है।"

श्लोक 80 (skanda.6.125.80)

तस्मात्प्रार्थय विप्रेंद्रान्कांश्चिदेषां महात्मनाम् । येन यच्छामि सुस्थानं कृत्वा तेभ्यस्तवाज्ञया

tasmātprārthaya vipreṁdrānkāṁścideṣāṁ mahātmanām yena yacchāmi susthānaṁ kṛtvā tebhyastavājñayā

"अतः इनमें से कुछ महात्मा श्रेष्ठ ब्राह्मणों से निवेदन करो, जिससे मैं तुम्हारी आज्ञा से उनके लिए उचित स्थान बनवाकर उन्हें दे सकूँ।"

श्लोक 81 (skanda.6.125.81)

ततः स प्रार्थयामास तदर्थं ब्राह्मणोत्तमान् । ममोपरि दयां कृत्वा क्रियतां भोः परिग्रहः

tataḥ sa prārthayāmāsa tadarthaṁ brāhmaṇottamān mamopari dayāṁ kṛtvā kriyatāṁ bhoḥ parigrahaḥ

तत्पश्चात् उसने उस प्रयोजन के लिए उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से प्रार्थना की, "मुझ पर दया करके यह दान स्वीकार कीजिए, हे भगवन्तो!"

श्लोक 82 (skanda.6.125.82)

अस्य भूपस्य सद्भक्त्या यच्छतः पुरमुत्तमम् । अहं वः पालयिष्यामि सर्वे मद्वंशजाश्च ते

asya bhūpasya sadbhaktyā yacchataḥ puramuttamam ahaṁ vaḥ pālayiṣyāmi sarve madvaṁśajāśca te

"इस राजा द्वारा सच्ची भक्ति से दिए जा रहे इस उत्तम नगर को — मैं तुम सबकी, तथा मेरे वंशजों की भी, रक्षा करूँगा।"

श्लोक 83 (skanda.6.125.83)

ततः कांश्चित्सुकृच्छ्रेण समानीय बृहद्बलः । राज्ञे निवेदयामास एतेभ्यो दीयतामिति

tataḥ kāṁścitsukṛcchreṇa samānīya bṛhadbalaḥ rājñe nivedayāmāsa etebhyo dīyatāmiti

तत्पश्चात् बृहद्बल ने बड़ी कठिनाई से कुछ ब्राह्मणों को एकत्र करके राजा से निवेदन किया, "इन्हें यह दान दिया जाए।"

श्लोक 84 (skanda.6.125.84)

ततः प्रक्षाल्य सर्वेषां पादान्स पृथिवीपतिः । सत्यसंधो ददौ तेभ्यः पुरार्थं भूमिमुत्तमाम्

tataḥ prakṣālya sarveṣāṁ pādānsa pṛthivīpatiḥ satyasaṁdho dadau tebhyaḥ purārthaṁ bhūmimuttamām

तत्पश्चात् उन सबके चरण धोकर, उस पृथ्वीपति सत्यसंध ने नगर बनाने के लिए उन्हें एक उत्तम भूमि प्रदान की।

श्लोक 85 (skanda.6.125.85)

बृहद्बलस्य चादेशं ददौ संप्रस्थितः स्वयम् । त्वयैतद्योग्यतां नेयं पुरं परपुरंजय

bṛhadbalasya cādeśaṁ dadau saṁprasthitaḥ svayam tvayaitadyogyatāṁ neyaṁ puraṁ parapuraṁjaya

उसने स्वयं प्रस्थान करते हुए बृहद्बल को यह आदेश भी दिया, "हे शत्रुनगर-विजयी! तुम्हीं इस नगर को उपयुक्त स्वरूप में विकसित करना।"

श्लोक 86 (skanda.6.125.86)

गत्वा च स तया सार्धं तत्क्षेत्रं हाटकेश्वरम् । तल्लिंगं प्राप्य संहृष्टश्चिरं तेपे तपस्ततः

gatvā ca sa tayā sārdhaṁ tatkṣetraṁ hāṭakeśvaram talliṁgaṁ prāpya saṁhṛṣṭaściraṁ tepe tapastataḥ

तत्पश्चात् वह उस पुत्री सहित उस हाटकेश्वर क्षेत्र में जाकर, उस लिंग को प्राप्त कर, अत्यंत प्रसन्न होकर वहाँ दीर्घकाल तक तप करने लगा।

श्लोक 87 (skanda.6.125.87)

सापि कर्णोत्पला प्राप्य किंचित्पुण्यं जलाशयम् । तपस्तेपे प्रतिष्ठाप्य गौरीं श्रद्धासमन्विता

sāpi karṇotpalā prāpya kiṁcitpuṇyaṁ jalāśayam tapastepe pratiṣṭhāpya gaurīṁ śraddhāsamanvitā

वह कर्णोत्पला भी एक पवित्र जलाशय प्राप्त करके, वहाँ गौरी की प्रतिष्ठा करके, श्रद्धापूर्वक तप करने लगी।

श्लोक 88 (skanda.6.125.88)

एतस्मिन्नंतरे राजा कालधर्ममुपागतः । आनर्ताधिपतिर्युद्धे हतः पुत्रैः समन्वितः

etasminnaṁtare rājā kāladharmamupāgataḥ ānartādhipatiryuddhe hataḥ putraiḥ samanvitaḥ

इसी बीच वह राजा (बृहद्बल), आनर्त का अधिपति, अपने पुत्रों सहित युद्ध में मारा गया और कालधर्म को प्राप्त हो गया।

श्लोक 89 (skanda.6.125.89)

ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे गर्तातीर्थसमुद्भवाः । सत्यसंधं समभ्येत्य प्रोचुर्दुःखसमन्विताः

tataste brāhmaṇāḥ sarve gartātīrthasamudbhavāḥ satyasaṁdhaṁ samabhyetya procurduḥkhasamanvitāḥ

तत्पश्चात् गर्तातीर्थ में उत्पन्न वे सभी ब्राह्मण, सत्यसंध के पास जाकर, अत्यंत दुःखी होकर बोले।

श्लोक 90 (skanda.6.125.90)

परिग्रहः कृतोऽस्माभिः केवलं पृथिवीपते । न च किंचित्फलं जातं वृत्तिजं नः पुरोद्भवम्

parigrahaḥ kṛto'smābhiḥ kevalaṁ pṛthivīpate na ca kiṁcitphalaṁ jātaṁ vṛttijaṁ naḥ purodbhavam

"हे पृथ्वीपते! हमने केवल यह दान स्वीकार कर लिया है, किंतु हमें नगर से उत्पन्न जीविका का कोई फल प्राप्त नहीं हुआ है।"

श्लोक 91 (skanda.6.125.91)

तस्मात्कुरु स्थितिं त्वं च स्वधर्मपरिवृद्धये । येन तद्वर्तनोपायो ह्यस्माकं नृपसत्तम

tasmātkuru sthitiṁ tvaṁ ca svadharmaparivṛddhaye yena tadvartanopāyo hyasmākaṁ nṛpasattama

"अतः, हे श्रेष्ठ राजन! आप हमारे धर्म की वृद्धि के लिए ऐसी व्यवस्था कीजिए, जिससे हमारे लिए जीविका का कोई साधन हो सके।"

श्लोक 92 (skanda.6.125.92)

राजा बृहद्बलो युद्धे कालधर्ममुपागतः । यस्त्वया दर्शितोऽस्माकं वृत्त्यर्थं नृपसत्तम

rājā bṛhadbalo yuddhe kāladharmamupāgataḥ yastvayā darśito'smākaṁ vṛttyarthaṁ nṛpasattama

"राजा बृहद्बल, जिन्होंने हमें यह जीविका दिखाई थी, हे श्रेष्ठ राजन, वे युद्ध में कालधर्म को प्राप्त हो गए हैं।"

श्लोक 93 (skanda.6.125.93)

सत्यसन्ध उवाच । संन्यस्तोऽहं द्विजश्रेष्ठा वृत्तिं कर्तुं न च क्षमः । यदि मे स्यात्पुमान्कश्चिदन्वयेऽपि न संशयः

satyasandha uvāca saṁnyasto'haṁ dvijaśreṣṭhā vṛttiṁ kartuṁ na ca kṣamaḥ yadi me syātpumānkaścidanvaye'pi na saṁśayaḥ

सत्यसंध ने कहा — "हे श्रेष्ठ द्विजो! मैं तो संन्यासी हूँ, अब जीविका का प्रबंध करने में समर्थ नहीं हूँ; यदि मेरे वंश में कोई पुरुष होता, तो निःसंदेह अलग बात होती।"

श्लोक 94 (skanda.6.125.94)

तस्माद्व्रजथ हर्म्यं स्वं प्रसादः क्रियतां मम । अभाग्यैर्भवदीयैश्च हतो राजा बृहद्बलः

tasmādvrajatha harmyaṁ svaṁ prasādaḥ kriyatāṁ mama abhāgyairbhavadīyaiśca hato rājā bṛhadbalaḥ

"अतः तुम सब अपने-अपने घरों को जाओ; मुझ पर यह कृपा करो — राजा बृहद्बल तुम्हारे ही दुर्भाग्य से मारे गए हैं।"

श्लोक 95 (skanda.6.125.95)

एवमुक्ताश्च ते विप्रा मत्वा तथ्यं च तद्वचः । स्वस्थानं त्वरिता जग्मुः सोऽपि चक्रे तपश्चिरम्

evamuktāśca te viprā matvā tathyaṁ ca tadvacaḥ svasthānaṁ tvaritā jagmuḥ so'pi cakre tapaściram

इस प्रकार कहे जाने पर वे ब्राह्मण उसके वचन को सत्य मानकर शीघ्रता से अपने-अपने स्थान को चले गए; और वह भी दीर्घकाल तक तप करता रहा।

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