नागर खण्ड · अध्याय 126
सत्यसंधेश्वर-माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.126.1)
सूत उवाच । एवं तस्य तपस्थस्य पुत्र्या सह द्विजोत्तमाः । आजग्मुर्ब्राह्मणाः सर्वे चमत्कारपुरोद्भवाः
sūta uvāca evaṁ tasya tapasthasya putryā saha dvijottamāḥ ājagmurbrāhmaṇāḥ sarve camatkārapurodbhavāḥ
सूत जी ने कहा — इस प्रकार तप में स्थित उस राजा के पास, अपनी पुत्री सहित, हे श्रेष्ठ द्विजो! चमत्कारपुर से उत्पन्न सभी ब्राह्मण आ पहुँचे।
श्लोक 2 (skanda.6.126.2)
ब्राह्मणा ऊचुः । सन्देहेषु च सर्वेषु विवादेषु विशेषतः । अभावात्पार्थिवेन्द्रस्य संजातश्च पराभवः
brāhmaṇā ūcuḥ sandeheṣu ca sarveṣu vivādeṣu viśeṣataḥ abhāvātpārthivendrasya saṁjātaśca parābhavaḥ
ब्राह्मणों ने कहा — "समस्त संदेहों में तथा विशेष रूप से विवादों में, राजा के अभाव के कारण हमारा अनादर होने लगा है।"
श्लोक 3 (skanda.6.126.3)
ततश्च द्विजवर्यैः स संन्यस्तः पृथिवीपतिः । पृष्टश्च प्रार्थितश्चैव निजराज्यस्य रक्षणे । अन्यस्मिन्दिवसे प्राह कृतांजलिपुटः स्थितः
tataśca dvijavaryaiḥ sa saṁnyastaḥ pṛthivīpatiḥ pṛṣṭaśca prārthitaścaiva nijarājyasya rakṣaṇe anyasmindivase prāha kṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ
तत्पश्चात् श्रेष्ठ द्विजों ने उस संन्यासी राजा से पूछा और अपने राज्य की रक्षा करने की प्रार्थना की; दूसरे दिन वह हाथ जोड़कर बोला।
श्लोक 4 (skanda.6.126.4)
राजोवाच । अनर्होऽहं द्विजश्रेष्ठाः संदेहं हर्तुमेव वः । रक्षां कर्तुं विशेषेण त्यक्तशस्त्रोऽस्मि चाधुना
rājovāca anarho'haṁ dvijaśreṣṭhāḥ saṁdehaṁ hartumeva vaḥ rakṣāṁ kartuṁ viśeṣeṇa tyaktaśastro'smi cādhunā
राजा ने कहा — "हे श्रेष्ठ द्विजो! मैं तुम्हारे इस संदेह को दूर करने के योग्य नहीं हूँ; विशेष रूप से रक्षा करने में तो अब मैं शस्त्र त्याग चुका हूँ।"
श्लोक 5 (skanda.6.126.5)
ब्राह्मणा ऊचुः । सर्वे वयं महाराज भूपस्याप्यधिका यतः । अहंकारेण दर्पेण निजं स्थानं समाश्रिताः
brāhmaṇā ūcuḥ sarve vayaṁ mahārāja bhūpasyāpyadhikā yataḥ ahaṁkāreṇa darpeṇa nijaṁ sthānaṁ samāśritāḥ
ब्राह्मणों ने कहा — "हे महाराज! हम सब राजा से भी बढ़कर हैं, क्योंकि हम अहंकार और गर्व के कारण अपने ही स्थान का आश्रय लेते हैं।"
श्लोक 6 (skanda.6.126.6)
न कस्यचिन्महाराज कदापि च कथंचन । वर्तनायाश्च सन्देहः स्थानकृत्येऽपि संस्थितः
na kasyacinmahārāja kadāpi ca kathaṁcana vartanāyāśca sandehaḥ sthānakṛtye'pi saṁsthitaḥ
"हे महाराज! किसी को भी कभी किसी प्रकार भी जीविका के संबंध में संदेह नहीं होना चाहिए, यहाँ तक कि पद-कार्य में भी नहीं।"
श्लोक 7 (skanda.6.126.7)
असंख्याता कृता वृत्तिः पुराऽस्माकं महात्मना । ततः सा वृद्धिमानीता तत्परैः पार्थिवोत्तमैः
asaṁkhyātā kṛtā vṛttiḥ purā'smākaṁ mahātmanā tataḥ sā vṛddhimānītā tatparaiḥ pārthivottamaiḥ
"पहले महात्मा (आपके पूर्वज) द्वारा असंख्य जीविका-व्यवस्था की गई थी; तत्पश्चात् उन्हीं में तत्पर श्रेष्ठ राजाओं द्वारा उसे और भी बढ़ाया गया।"
श्लोक 8 (skanda.6.126.8)
त्वया चैव विशेषेण यावद्राजा बृहद्बलः । आनर्तविषये राजा यो यः स्यात्स प्रयच्छति
tvayā caiva viśeṣeṇa yāvadrājā bṛhadbalaḥ ānartaviṣaye rājā yo yaḥ syātsa prayacchati
"और आपके द्वारा भी विशेष रूप से, तथा राजा बृहद्बल तक — आनर्त प्रदेश में जो भी राजा हुआ, उसने यह जीविका प्रदान की।"
श्लोक 9 (skanda.6.126.9)
सर्वां वृत्तिं गृहस्थानां यथायोग्यं प्रयत्नतः । तवाग्रे किं वयं ब्रूमस्त्वं वेत्सि सकलं यतः
sarvāṁ vṛttiṁ gṛhasthānāṁ yathāyogyaṁ prayatnataḥ tavāgre kiṁ vayaṁ brūmastvaṁ vetsi sakalaṁ yataḥ
"गृहस्थों की समस्त जीविका यथायोग्य, प्रयत्नपूर्वक व्यवस्थित की गई; आपके सामने हम क्या कहें, क्योंकि आप ही सब कुछ जानते हैं।"
श्लोक 10 (skanda.6.126.10)
यथा वृत्तिः पुरा दत्ता यथा संरक्षिता त्वया । तस्माच्चिन्तय राजेन्द्र स्थानं वर्तनसंभवम् । उपायं येन मर्यादा वृत्तिस्तस्मात्सुखेन तु
yathā vṛttiḥ purā dattā yathā saṁrakṣitā tvayā tasmāccintaya rājendra sthānaṁ vartanasaṁbhavam upāyaṁ yena maryādā vṛttistasmātsukhena tu
"जिस प्रकार पहले जीविका दी गई थी, जिस प्रकार आपने उसकी रक्षा की थी — हे राजेंद्र! उसी प्रकार अब जीविका के निर्वाह के उस स्थान और उपाय के विषय में विचार कीजिए, जिससे यह मर्यादा और जीविका सुखपूर्वक चलती रहे।"
श्लोक 11 (skanda.6.126.11)
ततः स सुचिरं ध्यात्वा गर्तातीर्थसमुद्भवान् । आकार्योपमन्युवंशस्य संभवान्वेदपारगान्
tataḥ sa suciraṁ dhyātvā gartātīrthasamudbhavān ākāryopamanyuvaṁśasya saṁbhavānvedapāragān
तत्पश्चात् वह बहुत देर तक चिंतन करके, गर्तातीर्थ में उत्पन्न, उपमन्यु वंश में जन्मे, वेदपारंगत विद्वानों को बुलाकर,
श्लोक 12 (skanda.6.126.12)
प्रणिपातं प्रकृत्वाथ ततः प्रोवाच सादरम् । मदीयस्थान संस्थानां ब्राह्मणानां विशेषतः
praṇipātaṁ prakṛtvātha tataḥ provāca sādaram madīyasthāna saṁsthānāṁ brāhmaṇānāṁ viśeṣataḥ
उन्हें प्रणाम करके, तत्पश्चात् उसने आदरपूर्वक कहा — विशेष रूप से मेरे अपने स्थान (राज्य) में स्थित ब्राह्मणों के विषय में,
श्लोक 13 (skanda.6.126.13)
सर्वकृत्यानि कार्याणि भृत्यवद्विनयान्वितैः । नित्यं रक्षा विधातव्या युष्मदीयं वचोखिलम्
sarvakṛtyāni kāryāṇi bhṛtyavadvinayānvitaiḥ nityaṁ rakṣā vidhātavyā yuṣmadīyaṁ vacokhilam
"आप विनयपूर्वक सेवकों की भाँति उनके समस्त कार्य संपन्न करें; आपकी संपूर्ण वाणी को नित्य आदर की रक्षा प्राप्त होनी चाहिए।"
श्लोक 14 (skanda.6.126.14)
एते संपालयिष्यन्ति मर्यादाकारमुत्तमम् । सन्देहेषु च सर्वेषु विवादेषु विशेषतः
ete saṁpālayiṣyanti maryādākāramuttamam sandeheṣu ca sarveṣu vivādeṣu viśeṣataḥ
"ये सभी संदेहों में और विशेष रूप से विवादों में उत्तम मर्यादा का पालन करेंगे।"
श्लोक 15 (skanda.6.126.15)
राजकार्येषु चान्येषु एते दास्यन्ति निर्णयम् । युष्मदीयं वचः श्रुत्वा शुभं वा यदि वाऽशुभम्
rājakāryeṣu cānyeṣu ete dāsyanti nirṇayam yuṣmadīyaṁ vacaḥ śrutvā śubhaṁ vā yadi vā'śubham
"अन्य राजकार्यों में भी ये ही निर्णय देंगे; आपकी बात सुनकर, चाहे वह शुभ हो या अशुभ,"
श्लोक 16 (skanda.6.126.16)
एते पाल्याः प्रसादेन पुष्टिं नेयाश्च शक्तितः । ईर्ष्यां सर्वां परित्यज्य मदीयस्थानवृद्धये
ete pālyāḥ prasādena puṣṭiṁ neyāśca śaktitaḥ īrṣyāṁ sarvāṁ parityajya madīyasthānavṛddhaye
"इनका पालन कृपापूर्वक किया जाए और शक्ति के अनुसार इनका पोषण किया जाए, समस्त ईर्ष्या त्यागकर, मेरे इस स्थान की वृद्धि के लिए।"
श्लोक 17 (skanda.6.126.17)
बाढमित्येव तैः प्रोक्तः स राजा ब्राह्मणोत्तमान् । चमत्कापुरोद्भूतान्भूयः प्रोवाच सादरम्
bāḍhamityeva taiḥ proktaḥ sa rājā brāhmaṇottamān camatkāpurodbhūtānbhūyaḥ provāca sādaram
उन विद्वानों द्वारा "स्वीकार है" ऐसा कहे जाने पर, उस राजा ने पुनः चमत्कारपुर से उत्पन्न श्रेष्ठ ब्राह्मणों से आदरपूर्वक कहा।
श्लोक 18 (skanda.6.126.18)
युष्माकं वर्तनार्थाय सर्वकृत्येषु सर्वदा । एते विप्रा मया दत्ता गर्तातीर्थसमुद्भवाः
yuṣmākaṁ vartanārthāya sarvakṛtyeṣu sarvadā ete viprā mayā dattā gartātīrthasamudbhavāḥ
"तुम्हारी जीविका के लिए, सभी कार्यों में, सदा — मैंने गर्तातीर्थ में उत्पन्न इन विद्वानों को नियुक्त किया है।"
श्लोक 19 (skanda.6.126.19)
एतेषां वचनात्सर्वं युष्मदीयं प्रजायताम् । प्रतिष्ठा जायते नूनं चातुश्चरणसूचिता
eteṣāṁ vacanātsarvaṁ yuṣmadīyaṁ prajāyatām pratiṣṭhā jāyate nūnaṁ cātuścaraṇasūcitā
"इनके वचन के अनुसार ही तुम्हारा समस्त कार्य संपन्न हो; निःसंदेह चारों वर्णों द्वारा सूचित प्रतिष्ठा इसी प्रकार उत्पन्न होगी।"
श्लोक 20 (skanda.6.126.20)
नान्यथा ब्राह्मणश्रेष्ठाः स्वल्पं वा यदि वा बहु । प्रोक्तं लक्षमितैरन्यैर्युष्मदीयपुरोद्भवैः
nānyathā brāhmaṇaśreṣṭhāḥ svalpaṁ vā yadi vā bahu proktaṁ lakṣamitairanyairyuṣmadīyapurodbhavaiḥ
"हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! अन्यथा नहीं — चाहे थोड़ा हो या बहुत, यही तुम्हारे अपने ही नगर से उत्पन्न अन्य लाखों जनों द्वारा भी कहा गया है।"
श्लोक 21 (skanda.6.126.21)
सूत उवाच । ततस्ते ब्राह्मणा हृष्टास्तानादाय द्विजोत्तमान् । तेषां मतेन चक्रुश्च सर्वकृत्यानि सर्वदा
sūta uvāca tataste brāhmaṇā hṛṣṭāstānādāya dvijottamān teṣāṁ matena cakruśca sarvakṛtyāni sarvadā
सूत जी ने कहा — तत्पश्चात् वे प्रसन्नचित्त ब्राह्मण उन श्रेष्ठ द्विजों को साथ लेकर, उन्हीं के मत के अनुसार सदा समस्त कार्यों को संपन्न करने लगे।
श्लोक 22 (skanda.6.126.22)
ततस्तत्र पुरे जाता मर्यादा धर्मवर्द्धिनी । सर्वकृत्येषु सर्वेषां तथा वृद्धिः पुरस्य च
tatastatra pure jātā maryādā dharmavarddhinī sarvakṛtyeṣu sarveṣāṁ tathā vṛddhiḥ purasya ca
तत्पश्चात् उस नगर में धर्म को बढ़ाने वाली मर्यादा उत्पन्न हुई, और सभी के समस्त कार्यों में वृद्धि हुई, तथा उस नगर की भी वृद्धि हुई।
श्लोक 23 (skanda.6.126.23)
तेऽपि तेषां प्रसादेन गर्त्तातीर्थभवा द्विजाः । परां विभूतिमास्थाय मोदन्ते सुखसंयुताः
te'pi teṣāṁ prasādena garttātīrthabhavā dvijāḥ parāṁ vibhūtimāsthāya modante sukhasaṁyutāḥ
उन्हीं की कृपा से गर्तातीर्थ में उत्पन्न वे ब्राह्मण भी परम वैभव को प्राप्त होकर, सुख से युक्त होकर आनंदित रहने लगे।
श्लोक 24 (skanda.6.126.24)
कस्यचित्त्वथ कालस्य स राजा तत्पुरोत्तमम् । समभ्येत्य द्विजान्सर्वांस्ततः प्रोवाच सादरम्
kasyacittvatha kālasya sa rājā tatpurottamam samabhyetya dvijānsarvāṁstataḥ provāca sādaram
कुछ समय बीत जाने पर, वह राजा उस श्रेष्ठ नगर में जाकर, सभी ब्राह्मणों से मिलकर, तत्पश्चात् आदरपूर्वक बोला।
श्लोक 25 (skanda.6.126.25)
युष्मदीयप्रसादेन क्षेत्रेऽत्र सुमहत्तपः । कृतं स्वर्गं प्रयास्यामि सांप्रतं तु द्विजोत्तमाः
yuṣmadīyaprasādena kṣetre'tra sumahattapaḥ kṛtaṁ svargaṁ prayāsyāmi sāṁprataṁ tu dvijottamāḥ
"तुम्हारी ही कृपा से इस क्षेत्र में मैंने अत्यंत महान तप किया है; हे श्रेष्ठ द्विजो! अब मैं स्वर्ग को प्रस्थान करूँगा।"
श्लोक 26 (skanda.6.126.26)
नास्माकमन्वये कश्चित्सांप्रतं वर्तते नृपः । तस्याहं लिंगमेतद्वै दर्शयामि द्विजोत्तमाः
nāsmākamanvaye kaścitsāṁprataṁ vartate nṛpaḥ tasyāhaṁ liṁgametadvai darśayāmi dvijottamāḥ
"मेरे वंश में अब कोई भी राजा शेष नहीं है; अतः, हे श्रेष्ठ द्विजो! मैं तुम्हें अपना यह लिंग दिखाता हूँ।"
श्लोक 27 (skanda.6.126.27)
पूजार्थं चापि वृत्त्यर्थं भोगार्थं च विशेषतः । तस्माद्युष्माभिरेवास्य पूजा कार्या प्रयत्नतः । रथयात्रा विशेषेण दयां कृत्वा ममोपरि
pūjārthaṁ cāpi vṛttyarthaṁ bhogārthaṁ ca viśeṣataḥ tasmādyuṣmābhirevāsya pūjā kāryā prayatnataḥ rathayātrā viśeṣeṇa dayāṁ kṛtvā mamopari
"पूजा के लिए, जीविका के लिए, तथा विशेष रूप से भोग के लिए, अतः तुम सब ही इसकी पूजा प्रयत्नपूर्वक करना, और मुझ पर दया करके विशेष रूप से रथयात्रा भी आयोजित करना।"
श्लोक 28 (skanda.6.126.28)
ब्राह्मणा ऊचुः । सप्त विंशतिलिंगानि यथेष्टानि महीतले । चमत्कारसुतानां च पूज्यंते सर्वदैव तु
brāhmaṇā ūcuḥ sapta viṁśatiliṁgāni yatheṣṭāni mahītale camatkārasutānāṁ ca pūjyaṁte sarvadaiva tu
ब्राह्मणों ने कहा — "पृथ्वीतल पर चमत्कार के पुत्रों द्वारा स्थापित सत्ताईस लिंग यथेच्छ पूजे जाते हैं, सदैव ही।"
श्लोक 29 (skanda.6.126.29)
अष्टाविंशतिमं तद्वदेतल्लिंगं तवोद्भवम् । सर्वदा पूजयिष्यामो निश्चिन्तो भव पार्थिव
aṣṭāviṁśatimaṁ tadvadetalliṁgaṁ tavodbhavam sarvadā pūjayiṣyāmo niścinto bhava pārthiva
"उसी प्रकार यह अट्ठाईसवाँ लिंग, आपके द्वारा उत्पन्न, हम सदा पूजते रहेंगे; हे राजन! आप निश्चिंत रहें।"
श्लोक 30 (skanda.6.126.30)
अस्य यात्रां करिष्यामः कार्तिके मासि सर्वदा । बलिपूजोपहारांश्च गीतवाद्यानि शक्तितः
asya yātrāṁ kariṣyāmaḥ kārtike māsi sarvadā balipūjopahārāṁśca gītavādyāni śaktitaḥ
"हम सदा कार्तिक मास में इसकी यात्रा करेंगे, बलि, पूजा और उपहार, तथा गीत-वाद्य आदि भी अपनी शक्ति के अनुसार आयोजित करेंगे।"
श्लोक 31 (skanda.6.126.31)
एवमुक्तः स तैर्हृष्टो गत्वात्मीयं तदाश्रमम् । स्नापयित्वाथ तल्लिंगं पूजां चक्रे प्रभक्तितः
evamuktaḥ sa tairhṛṣṭo gatvātmīyaṁ tadāśramam snāpayitvātha talliṁgaṁ pūjāṁ cakre prabhaktitaḥ
इस प्रकार उनके द्वारा कहे जाने पर, वह प्रसन्न होकर अपने ही आश्रम को गया और उस लिंग को स्नान कराकर, अत्यंत भक्तिपूर्वक उसकी पूजा की।
श्लोक 32 (skanda.6.126.32)
सूत उवाच । एवं समर्पितं लिंगं तेन तद्धरसंभवम् । सर्वेषां ब्राह्मणेंद्राणां वंशोच्छेदे स्थिते द्विजाः
sūta uvāca evaṁ samarpitaṁ liṁgaṁ tena taddharasaṁbhavam sarveṣāṁ brāhmaṇeṁdrāṇāṁ vaṁśocchede sthite dvijāḥ
सूत जी ने कहा — इस प्रकार उसके द्वारा शिव-उत्पन्न वह लिंग समर्पित किया गया; हे द्विजो! समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों के वंश के लुप्त हो जाने पर भी,
श्लोक 33 (skanda.6.126.33)
सकलं कार्तिकं मर्त्यो यस्तच्छ्रद्धासमन्वितः । स्नापयेत्पूजयेच्चापि स नूनं मुक्तिमाप्नुयात्
sakalaṁ kārtikaṁ martyo yastacchraddhāsamanvitaḥ snāpayetpūjayeccāpi sa nūnaṁ muktimāpnuyāt
जो भी मनुष्य श्रद्धापूर्वक संपूर्ण कार्तिक मास में इसे स्नान कराता है और पूजा करता है, वह निश्चय ही मुक्ति को प्राप्त होता है।
श्लोक 34 (skanda.6.126.34)
सोमस्य दिवसे प्राप्ते वर्षं यावत्कृतक्षणः । तस्य पूजां करोत्येवं स्नापयित्वा विधानतः । सोऽपि मुक्तिं व्रजेन्मर्त्य एतत्तातान्मया श्रुतम्
somasya divase prāpte varṣaṁ yāvatkṛtakṣaṇaḥ tasya pūjāṁ karotyevaṁ snāpayitvā vidhānataḥ so'pi muktiṁ vrajenmartya etattātānmayā śrutam
सोमवार का दिन आने पर, वर्ष भर तक जो अवसर निकालकर विधिपूर्वक स्नान कराकर इस प्रकार इसकी पूजा करता है, वह मनुष्य भी मुक्ति को प्राप्त होता है — हे तात! यह मैंने स्वयं सुना है।