नागर खण्ड · अध्याय 127
कर्णोत्पला-तीर्थ-माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.127.1)
ऋषय ऊचुः । या सा कर्णोत्पलानाम त्वयास्माकं प्रकीर्तिता । किञ्चिज्जलाश्रयं प्राप्य तपस्तपति संस्थिता । तस्याः सर्वं समाचक्ष्व यथा तपसि सा स्थिता
ṛṣaya ūcuḥ yā sā karṇotpalānāma tvayāsmākaṁ prakīrtitā kiñcijjalāśrayaṁ prāpya tapastapati saṁsthitā tasyāḥ sarvaṁ samācakṣva yathā tapasi sā sthitā
ऋषियों ने कहा — जिस कर्णोत्पला का आपने हमसे वर्णन किया, जो किसी जलाशय को प्राप्त कर वहाँ स्थित होकर तप कर रही है, उसका सारा वृत्तांत हमें बताइए, कि वह किस प्रकार तप में स्थित हुई।
श्लोक 2 (skanda.6.127.2)
सूत उवाच । गौरीपादकृतस्थाना श्रद्धया परया युता । तावत्तुष्टिं गता देवी गिरिजा शंकरप्रिया
sūta uvāca gaurīpādakṛtasthānā śraddhayā parayā yutā tāvattuṣṭiṁ gatā devī girijā śaṁkarapriyā
सूत जी ने कहा — गौरी के चरणों में अपना स्थान बनाकर, परम श्रद्धा से युक्त उस कर्णोत्पला पर पर्वत-पुत्री, शंकर की प्रिया देवी गिरिजा प्रसन्न हो गईं।
श्लोक 3 (skanda.6.127.3)
ततः प्रोवाच ते पुत्रि तुष्टाहं वांछितं वद । येन यच्छाम्यसंदिग्धं यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्
tataḥ provāca te putri tuṣṭāhaṁ vāṁchitaṁ vada yena yacchāmyasaṁdigdhaṁ yadyapi syātsudurlabham
तत्पश्चात् उन्होंने कहा, "हे पुत्री! मैं प्रसन्न हूँ, अपनी वांछित वस्तु माँगो; मैं वह दूँगी, इसमें कोई संदेह नहीं, चाहे वह अत्यंत दुर्लभ ही क्यों न हो।"
श्लोक 4 (skanda.6.127.4)
कर्णोत्पलोवाच । मम पत्युः कृते देवि मम तातः सुदुःखितः । राज्याद्भ्रष्टः सुखाच्चापि कुटुंबेन विवर्जितः
karṇotpalovāca mama patyuḥ kṛte devi mama tātaḥ suduḥkhitaḥ rājyādbhraṣṭaḥ sukhāccāpi kuṭuṁbena vivarjitaḥ
कर्णोत्पला ने कहा — "हे देवि! मेरे पति के कारण मेरे पिता अत्यंत दुःखी हुए, राज्य से भ्रष्ट हुए, सुख से तथा परिवार से भी वंचित हो गए।"
श्लोक 5 (skanda.6.127.5)
ततश्चैव तपस्तेपे वैराग्यं परमं गतः । अहं वार्द्धक्यमापन्ना कौमार्येऽपि च संस्थिता
tataścaiva tapastepe vairāgyaṁ paramaṁ gataḥ ahaṁ vārddhakyamāpannā kaumārye'pi ca saṁsthitā
"तत्पश्चात् उन्होंने परम वैराग्य को प्राप्त होकर तप किया; मैं भी वृद्धावस्था को प्राप्त हो चुकी हूँ, यद्यपि कौमार्य में ही स्थित हूँ।"
श्लोक 6 (skanda.6.127.6)
तस्माद्भवतु मे भर्त्ता कश्चिद्रूपोत्कटः स्मृतः । सर्वेषां देवमर्त्यानां त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि
tasmādbhavatu me bharttā kaścidrūpotkaṭaḥ smṛtaḥ sarveṣāṁ devamartyānāṁ tvatprasādātsureśvari
"अतः हे सुरेश्वरि! आपकी कृपा से, समस्त देवताओं और मनुष्यों में स्मरणीय, अत्यंत सुंदर रूप वाला कोई पति मुझे प्राप्त हो।"
श्लोक 7 (skanda.6.127.7)
तथा स्यात्परमं रूपं तारुण्यं त्वत्प्रसादतः । यथास्य जायते सौख्यं तापसस्यापि मे पितुः
tathā syātparamaṁ rūpaṁ tāruṇyaṁ tvatprasādataḥ yathāsya jāyate saukhyaṁ tāpasasyāpi me pituḥ
"तथा आपकी ही कृपा से मुझे परम रूप और तारुण्य भी प्राप्त हो, जिससे मेरे तपस्वी पिता को भी सुख प्राप्त हो सके।"
श्लोक 8 (skanda.6.127.8)
देव्युवाच । माघमासतृतीयायां शनैश्चरदिने शुभे । नक्षत्रे वसुदैवत्ये रूपं ध्यात्वाथ यौवनम्
devyuvāca māghamāsatṛtīyāyāṁ śanaiścaradine śubhe nakṣatre vasudaivatye rūpaṁ dhyātvātha yauvanam
देवी ने कहा — "माघ मास की तृतीया को, शनिवार के शुभ दिन, वसु-देवता वाले नक्षत्र (धनिष्ठा) में, रूप और यौवन का ध्यान करके,"
श्लोक 9 (skanda.6.127.9)
त्वया स्नानं प्रकर्तव्यं सुपुण्येऽत्र जलाशये । ततो दिव्य वपुर्भूत्वा यौवनेन समन्विता । भविष्यसि न संदेहः सत्यमेतन्मयोदितम्
tvayā snānaṁ prakartavyaṁ supuṇye'tra jalāśaye tato divya vapurbhūtvā yauvanena samanvitā bhaviṣyasi na saṁdehaḥ satyametanmayoditam
"तुम इस अत्यंत पवित्र जलाशय में स्नान करना; तत्पश्चात् तुम दिव्य शरीर और यौवन से युक्त हो जाओगी — इसमें संदेह नहीं, यह मैंने सत्य कहा है।"
श्लोक 10 (skanda.6.127.10)
अन्यापि या महाभागे नारी स्नानं करिष्यति । तस्मिन्नहनि साप्येवं रूपयुक्ता भविष्यति
anyāpi yā mahābhāge nārī snānaṁ kariṣyati tasminnahani sāpyevaṁ rūpayuktā bhaviṣyati
"हे महाभागे! जो भी अन्य स्त्री उस दिन यहाँ स्नान करेगी, वह भी उसी प्रकार रूपयुक्त हो जाएगी।"
श्लोक 11 (skanda.6.127.11)
सूत उवाच । एवमुक्त्वाथ सा देवी गता चादर्शनं ततः । सापि चान्वेषयामास तृतीयां शनिना सह
sūta uvāca evamuktvātha sā devī gatā cādarśanaṁ tataḥ sāpi cānveṣayāmāsa tṛtīyāṁ śaninā saha
सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर वह देवी वहाँ से अदृश्य हो गईं; तब उसने भी शनि सहित उस तृतीया की प्रतीक्षा करनी आरंभ कर दी।
श्लोक 12 (skanda.6.127.12)
वसुदेवात्मकेनैव नक्षत्रेण प्रयत्नतः । ध्यायमाना च तां देवीं सर्वकामप्रदायिनीम्
vasudevātmakenaiva nakṣatreṇa prayatnataḥ dhyāyamānā ca tāṁ devīṁ sarvakāmapradāyinīm
वसुदेव-आत्मक (धनिष्ठा) नक्षत्र के साथ, प्रयत्नपूर्वक, सर्वकामप्रदायिनी उस देवी का ध्यान करते हुए,
श्लोक 13 (skanda.6.127.13)
ततः कतिपयाहस्य जाता सा योगसंयुता । तृतीया या यथोक्ता च तया देव्या पुरा द्विजाः
tataḥ katipayāhasya jātā sā yogasaṁyutā tṛtīyā yā yathoktā ca tayā devyā purā dvijāḥ
तत्पश्चात् कुछ दिनों के बाद, हे द्विजो! वह तृतीया, जैसा उस देवी ने पहले कहा था, वैसे ही योग से युक्त होकर आ पहुँची।
श्लोक 14 (skanda.6.127.14)
ततः सा रूपसौभाग्यं यौवनं वांछितं पतिम् । ध्यायमाना जले तस्मिन्नर्द्धरात्रे विवेश च
tataḥ sā rūpasaubhāgyaṁ yauvanaṁ vāṁchitaṁ patim dhyāyamānā jale tasminnarddharātre viveśa ca
तत्पश्चात् वह अपने वांछित रूप, सौभाग्य, यौवन और पति का ध्यान करती हुई, आधी रात्रि को उस जल में प्रवेश कर गई।
श्लोक 15 (skanda.6.127.15)
ततो दिव्यवपुर्भूत्वा यौवनेन समन्विता । निष्क्रांता सलिलात्तस्माज्जनविस्मयकारिणी
tato divyavapurbhūtvā yauvanena samanvitā niṣkrāṁtā salilāttasmājjanavismayakāriṇī
तत्पश्चात् वह दिव्य शरीर तथा यौवन से युक्त होकर, जनों को विस्मित करती हुई, उस जल से बाहर निकली।
श्लोक 16 (skanda.6.127.16)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो गौरीवाक्यप्रबोधितः । तदर्थं भगवान्कामः पत्न्यर्थं प्रीतिसंयुतः । अब्रवीच्च महाभागे कामोहं स्वयमागतः
etasminnaṁtare prāpto gaurīvākyaprabodhitaḥ tadarthaṁ bhagavānkāmaḥ patnyarthaṁ prītisaṁyutaḥ abravīcca mahābhāge kāmohaṁ svayamāgataḥ
इसी बीच, गौरी के वचन से प्रेरित होकर, भगवान कामदेव उसके लिए, पत्नी की प्राप्ति हेतु प्रेमपूर्ण भाव से युक्त होकर वहाँ आ पहुँचे और बोले, "हे महाभागे! मैं स्वयं कामदेव यहाँ आया हूँ।"
श्लोक 17 (skanda.6.127.17)
पार्वत्यादेशिता भार्या तस्मान्मे भव मा चिरम्
pārvatyādeśitā bhāryā tasmānme bhava mā ciram
"पार्वती ने ही मुझे तुम्हारी पत्नी बनने का आदेश दिया है; अतः बिना विलंब किए तुम मेरी बन जाओ।"
श्लोक 18 (skanda.6.127.18)
यस्मात्प्रीत्या समायातस्तवांतिकमहं शुभे । तस्मात्प्रीतिरिति ख्याता मम भार्या भविष्यसि
yasmātprītyā samāyātastavāṁtikamahaṁ śubhe tasmātprītiriti khyātā mama bhāryā bhaviṣyasi
"हे शुभे! चूँकि मैं प्रेमपूर्वक तुम्हारे निकट आया हूँ, इसलिए तुम 'प्रीति' नाम से विख्यात होकर मेरी पत्नी बनोगी।"
श्लोक 19 (skanda.6.127.19)
कर्णोत्पलोवाच । यद्येवं स्मर मत्तातं तं गत्वा प्रार्थय स्वयम् । स्वच्छंदा स्याद्यतः कन्या न कथंचित्प्रवर्तिता
karṇotpalovāca yadyevaṁ smara mattātaṁ taṁ gatvā prārthaya svayam svacchaṁdā syādyataḥ kanyā na kathaṁcitpravartitā
कर्णोत्पला ने कहा — "यदि ऐसा है, तो मेरे पिता को स्मरण कीजिए और स्वयं जाकर उनसे प्रार्थना कीजिए; क्योंकि कन्या स्वच्छंद नहीं होती, वह अपनी इच्छा से कभी प्रवृत्त नहीं होती।"
श्लोक 20 (skanda.6.127.20)
य एष दृश्यते रम्यः प्रासादो नाति दूरतः । अस्यांते तिष्ठतेऽस्माकं तातस्तपसि संस्थितः
ya eṣa dṛśyate ramyaḥ prāsādo nāti dūrataḥ asyāṁte tiṣṭhate'smākaṁ tātastapasi saṁsthitaḥ
"जो यह मनोहर प्रासाद कुछ ही दूरी पर दिखाई दे रहा है, उसके अंतिम भाग में तप में स्थित मेरे पिता विराजमान हैं।"
श्लोक 21 (skanda.6.127.21)
अत्राहं पूर्वतो गत्वा तस्य तिष्ठामि चांतिके । भवानागत्य पश्चाच्च प्रार्थयिष्यति मां ततः
atrāhaṁ pūrvato gatvā tasya tiṣṭhāmi cāṁtike bhavānāgatya paścācca prārthayiṣyati māṁ tataḥ
"मैं यहाँ से पहले जाकर उनके निकट रहूँगी; आप बाद में आकर मेरे लिए उनसे प्रार्थना करना, तभी वे मुझे आपको सौंपेंगे।"
श्लोक 22 (skanda.6.127.22)
बाढमित्येव कामोक्ते गता सा तत्समीपतः । प्रणिपत्य ततः प्राह दिष्ट्या तात मया पुनः
bāḍhamityeva kāmokte gatā sā tatsamīpataḥ praṇipatya tataḥ prāha diṣṭyā tāta mayā punaḥ
काम के द्वारा "अच्छा" कहे जाने पर, वह उनके निकट चली गई और प्रणाम करके तत्पश्चात् बोली, "हे तात! सौभाग्य से, मेरे द्वारा पुनः,"
श्लोक 23 (skanda.6.127.23)
संप्राप्तं यौवनं कांतं समाराध्य हरप्रियाम् । तस्मात्कुरु विवाहं मे हृत्स्थं सुखमवाप्नुहि
saṁprāptaṁ yauvanaṁ kāṁtaṁ samārādhya harapriyām tasmātkuru vivāhaṁ me hṛtsthaṁ sukhamavāpnuhi
"हरप्रिया देवी की आराधना करके मनोहर यौवन प्राप्त किया गया है; अतः अब मेरा विवाह संपन्न कीजिए, अपने हृदय में स्थित सुख को प्राप्त कीजिए।"
श्लोक 24 (skanda.6.127.24)
मदर्थे प्रेषितो भर्त्ता तया देव्याऽतिसुन्दरः । पुष्प चापः स्वयं प्राप्तः सोऽपि तात तवांतिकम्
madarthe preṣito bharttā tayā devyā'tisundaraḥ puṣpa cāpaḥ svayaṁ prāptaḥ so'pi tāta tavāṁtikam
"मेरे लिए ही उस देवी ने अत्यंत सुंदर पति भेजा है — वे पुष्प-धनुष धारण करने वाले स्वयं, हे तात! आपके निकट आ पहुँचे हैं।"
श्लोक 25 (skanda.6.127.25)
अथ तां स समालोक्य स्वां सुतां यौवनान्विताम् । हर्षेण महता युक्तां कांतयुक्तां विशेषतः । अब्रवीदद्य मे पुत्रि संजातं तपसः फलम्
atha tāṁ sa samālokya svāṁ sutāṁ yauvanānvitām harṣeṇa mahatā yuktāṁ kāṁtayuktāṁ viśeṣataḥ abravīdadya me putri saṁjātaṁ tapasaḥ phalam
तत्पश्चात् अपनी यौवनयुक्त पुत्री को, अत्यंत हर्ष से युक्त तथा विशेष रूप से सौंदर्ययुक्त देखकर, उसने कहा, "हे पुत्री! आज मुझे मेरे तप का फल प्राप्त हुआ है,"
श्लोक 26 (skanda.6.127.26)
जीवितस्य च कल्याणि यत्वं प्राप्ता नवं वयः । भर्तारं च तथाभीष्टं देव्या दत्तं मनोभवम्
jīvitasya ca kalyāṇi yatvaṁ prāptā navaṁ vayaḥ bhartāraṁ ca tathābhīṣṭaṁ devyā dattaṁ manobhavam
"तथा जीवन के लिए, हे कल्याणी! तुमने जो नवीन आयु प्राप्त की है, और साथ ही देवी द्वारा प्रदत्त वह अभीष्ट पति, कामदेव भी।"
श्लोक 27 (skanda.6.127.27)
एतस्मिन्नंतरे कामस्तस्यांतिकमुपाद्रवत् । अब्रवीद्देहि मे भूप स्वां कन्यां चारुहासिनीम्
etasminnaṁtare kāmastasyāṁtikamupādravat abravīddehi me bhūpa svāṁ kanyāṁ cāruhāsinīm
इसी बीच कामदेव उसके निकट आ पहुँचे और बोले, "हे राजन! अपनी सुंदर हास्ययुक्त कन्या मुझे दे दीजिए।"
श्लोक 28 (skanda.6.127.28)
अस्या अर्थेऽहमादिष्टः स्वयं गौर्या नृपोत्तम । कामदेव इति ख्यातस्त्रैलोक्यं येन मोहितम्
asyā arthe'hamādiṣṭaḥ svayaṁ gauryā nṛpottama kāmadeva iti khyātastrailokyaṁ yena mohitam
"हे श्रेष्ठ राजन्! इसके लिए मुझे स्वयं गौरी ने आदेश दिया है — मैं वही कामदेव नाम से विख्यात हूँ, जिसने संपूर्ण त्रैलोक्य को मोहित कर रखा है।"
श्लोक 29 (skanda.6.127.29)
ततस्तामर्पयामास तां कन्यां स महीपतिः । कृत्वाग्निं साक्षिणं वाक्याद्ब्राह्मणानां द्विजोत्तमाः
tatastāmarpayāmāsa tāṁ kanyāṁ sa mahīpatiḥ kṛtvāgniṁ sākṣiṇaṁ vākyādbrāhmaṇānāṁ dvijottamāḥ
तत्पश्चात् उस राजा ने अग्नि को साक्षी बनाकर तथा ब्राह्मणों के वचन के अनुसार, हे श्रेष्ठ द्विजो! वह कन्या उन्हें समर्पित कर दी।
श्लोक 30 (skanda.6.127.30)
सा चास्य चाभवत्प्रीतिस्थानं यस्मात्सुलोचना । रतेरनंतरा तस्मात्प्रीतिनामाऽभवच्छुभा
sā cāsya cābhavatprītisthānaṁ yasmātsulocanā rateranaṁtarā tasmātprītināmā'bhavacchubhā
चूँकि वह सुनयना उनके प्रेम का स्थान बन गई थी, इसलिए रति के अनंतर वह शुभ नाम 'प्रीति' से विख्यात हुई।
श्लोक 31 (skanda.6.127.31)
एवं तया तपस्तप्तं तस्मात्तत्र जलाशये । तन्नाम्ना ख्यातिमायातं समस्तेऽत्र महीतले
evaṁ tayā tapastaptaṁ tasmāttatra jalāśaye tannāmnā khyātimāyātaṁ samaste'tra mahītale
इस प्रकार उसने वहाँ उस जलाशय में तप किया था; इसी कारण से वह अब इस संपूर्ण पृथ्वीतल पर उसी के नाम से विख्यात हो गया है।
श्लोक 32 (skanda.6.127.32)
सकलं माघमासं च या स्त्री स्नानं समाचरेत् । पुमान्वा प्रातरुत्थाय स प्रयागफलं लभेत्
sakalaṁ māghamāsaṁ ca yā strī snānaṁ samācaret pumānvā prātarutthāya sa prayāgaphalaṁ labhet
जो भी स्त्री संपूर्ण माघ मास में वहाँ स्नान करती है, अथवा जो पुरुष प्रातःकाल उठकर स्नान करता है, वह प्रयाग-स्नान के समान फल प्राप्त करता है।
श्लोक 33 (skanda.6.127.33)
रूपवाञ्जायते दक्षः सदा जन्मनि जन्मनि । न वियोगमवाप्नोति कदात्रिद्बांधवैः सह
rūpavāñjāyate dakṣaḥ sadā janmani janmani na viyogamavāpnoti kadātridbāṁdhavaiḥ saha
वह जन्म-जन्मांतर में सदा रूपवान और निपुण उत्पन्न होता है, और कभी भी अपने बांधवों से वियोग को प्राप्त नहीं होता।