नागर खण्ड · अध्याय 128
अटेश्वर-उत्पत्ति-माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.128.1)
सूत उवाच । सत्यसन्धोपि हृष्टात्मा सतां दृष्ट्वा सुखान्विताम् । अभीष्टपतिना युक्तां कृतकृत्यो बभूव ह
sūta uvāca satyasandhopi hṛṣṭātmā satāṁ dṛṣṭvā sukhānvitām abhīṣṭapatinā yuktāṁ kṛtakṛtyo babhūva ha
सूत जी ने कहा — सत्यसंध भी अपनी पुत्री को सुख से युक्त, तथा अभीष्ट पति से युक्त देखकर, प्रसन्नचित्त होकर कृतकृत्य हो गया।
श्लोक 2 (skanda.6.128.2)
ततस्तस्यैव लिंगस्य दक्षिणां मूर्तिमाश्रितः । दृढं पद्मासनं कृत्वा सम्यग्ध्यानपरायणः
tatastasyaiva liṁgasya dakṣiṇāṁ mūrtimāśritaḥ dṛḍhaṁ padmāsanaṁ kṛtvā samyagdhyānaparāyaṇaḥ
तत्पश्चात् उस लिंग की दक्षिण मूर्ति का आश्रय लेकर, दृढ़ पद्मासन लगाकर, सम्यक् रूप से ध्यान में तत्पर होकर,
श्लोक 3 (skanda.6.128.3)
आत्मानमात्मनैवाथ ब्रह्मद्वारेण संस्थितः । ततो निःसारयामास पुलकेन समन्वितः
ātmānamātmanaivātha brahmadvāreṇa saṁsthitaḥ tato niḥsārayāmāsa pulakena samanvitaḥ
अपने ही द्वारा अपने आपको ब्रह्मरंध्र के मार्ग से स्थापित करके, तत्पश्चात् रोमांचित होकर उसने अपने प्राणों को बाहर निकाल दिया।
श्लोक 4 (skanda.6.128.4)
अथ ते ब्राह्मणास्तस्य चमत्कारपुरोद्भवाः । देवता दर्शनार्थाय प्राप्ता दृष्ट्वा कलेवरम्
atha te brāhmaṇāstasya camatkārapurodbhavāḥ devatā darśanārthāya prāptā dṛṣṭvā kalevaram
तत्पश्चात् चमत्कारपुर से उत्पन्न वे ब्राह्मण, देवता के दर्शन के लिए वहाँ आए और उस पार्थिव शरीर को देखकर,
श्लोक 5 (skanda.6.128.5)
अप्रियं तेजसा हीनं मृतमस्पृश्यतां गतम् । लिंगस्य नातिदूरस्थं दाह्यार्थं यत्नमास्थिताः
apriyaṁ tejasā hīnaṁ mṛtamaspṛśyatāṁ gatam liṁgasya nātidūrasthaṁ dāhyārthaṁ yatnamāsthitāḥ
जो अप्रिय, तेजोहीन, मृत और अस्पृश्य हो चुका था, उसे लिंग से अधिक दूर न रखते हुए, दाह-संस्कार के लिए यत्नपूर्वक तत्पर हुए।
श्लोक 6 (skanda.6.128.6)
यावद्गुर्वीं चितां कृत्वा तमन्वेष्टुं समुद्यताः । तावन्नष्टं शवं तच्च ज्ञायते नैव कुत्रचित्
yāvadgurvīṁ citāṁ kṛtvā tamanveṣṭuṁ samudyatāḥ tāvannaṣṭaṁ śavaṁ tacca jñāyate naiva kutracit
जब तक वे एक विशाल चिता बनाकर उस शरीर की खोज के लिए तत्पर हुए, तब तक वह शव लुप्त हो गया — उसका पता कहीं भी न चला।
श्लोक 7 (skanda.6.128.7)
ततश्च विस्मयाविष्टास्तं प्रशंसासमन्वितैः । वचनैर्बहुशो भूयो विकथ्य च मुहुर्मुहुः
tataśca vismayāviṣṭāstaṁ praśaṁsāsamanvitaiḥ vacanairbahuśo bhūyo vikathya ca muhurmuhuḥ
तब विस्मय से भरकर, वे प्रशंसापूर्ण वचनों से उसकी बार-बार, अनेक प्रकार से चर्चा करने लगे।
श्लोक 8 (skanda.6.128.8)
ततस्तस्योत्थलिंगस्य सर्वं पूजादिकं च यत् । सर्वे निरूपयामासुः सप्तविंशतिमध्यतः
tatastasyotthaliṁgasya sarvaṁ pūjādikaṁ ca yat sarve nirūpayāmāsuḥ saptaviṁśatimadhyataḥ
तत्पश्चात् उस स्वयं उत्पन्न लिंग की समस्त पूजा-विधि को उन सबने सत्ताईस लिंगों के बीच निर्धारित कर दिया।
श्लोक 9 (skanda.6.128.9)
लिंगानां तद्भवेन्नित्यं सत्यसंधस्य भूपतेः । कामदं भक्तजंतूनां सर्वपातकनाशनम्
liṁgānāṁ tadbhavennityaṁ satyasaṁdhasya bhūpateḥ kāmadaṁ bhaktajaṁtūnāṁ sarvapātakanāśanam
यह राजा सत्यसंध का लिंग सदा भक्त प्राणियों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला और उनके समस्त पापों का नाश करने वाला रहा।
श्लोक 10 (skanda.6.128.10)
ऋषय ऊचुः । चमत्कारनरेंद्रस्य वंशे क्षीणे महामते । आनर्त्ताधिपतिः कोऽन्यस्तत्र राजा बभूव ह
ṛṣaya ūcuḥ camatkāranareṁdrasya vaṁśe kṣīṇe mahāmate ānarttādhipatiḥ ko'nyastatra rājā babhūva ha
ऋषियों ने कहा — हे महामते! राजा चमत्कार के वंश के क्षीण हो जाने पर, वहाँ आनर्त का कौन अन्य राजा हुआ?
श्लोक 11 (skanda.6.128.11)
सूत उवाच । बृहद्बले हते भूपे संग्रामे द्विजसत्तमाः । पुत्रबंधुसमायुक्ताः सर्व लोकाः समाययुः
sūta uvāca bṛhadbale hate bhūpe saṁgrāme dvijasattamāḥ putrabaṁdhusamāyuktāḥ sarva lokāḥ samāyayuḥ
सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ द्विजो! राजा बृहद्बल के युद्ध में मारे जाने पर, उनके पुत्रों और बांधवों सहित सभी लोग,
श्लोक 12 (skanda.6.128.12)
यत्रस्थः स महीपालः सत्यसंधस्तपोन्वितः । शोकोद्विग्नास्ततः प्राहुस्तं भूपं रहसि स्थितम्
yatrasthaḥ sa mahīpālaḥ satyasaṁdhastaponvitaḥ śokodvignāstataḥ prāhustaṁ bhūpaṁ rahasi sthitam
उस राजा सत्यसंध के पास पहुँचे, जो तप में लीन होकर वहीं स्थित थे; तब शोक से व्याकुल होकर उन्होंने एकांत में स्थित उस राजा से कहा।
श्लोक 13 (skanda.6.128.13)
क्षीणोऽयं तावको वंशो न कश्चिद्विद्यते यतः । दायादोऽपि कथं पृथ्वी संप्रतीयं भविष्यति
kṣīṇo'yaṁ tāvako vaṁśo na kaścidvidyate yataḥ dāyādo'pi kathaṁ pṛthvī saṁpratīyaṁ bhaviṣyati
"यह आपका वंश क्षीण हो चुका है, क्योंकि अब कोई भी शेष नहीं है; ऐसी अवस्था में यह पृथ्वी अब किस उत्तराधिकारी को प्राप्त होगी?"
श्लोक 14 (skanda.6.128.14)
अराजके नृपश्रेष्ठ मात्स्यो न्यायः प्रवर्तते । राष्ट्रे चैव पुरे चैव ग्रामे चैव विशेषतः
arājake nṛpaśreṣṭha mātsyo nyāyaḥ pravartate rāṣṭre caiva pure caiva grāme caiva viśeṣataḥ
"हे श्रेष्ठ राजन्! राजा के अभाव में मत्स्य-न्याय (बड़ी मछली द्वारा छोटी मछली को निगलने का नियम) प्रवृत्त हो जाता है, विशेष रूप से राष्ट्र में, नगर में तथा गाँव में भी।"
श्लोक 15 (skanda.6.128.15)
परदाररता ये च ये च तस्करवृत्तयः । सर्वे राजभयाद्राजन्मर्यादां पालयंति वै
paradāraratā ye ca ye ca taskaravṛttayaḥ sarve rājabhayādrājanmaryādāṁ pālayaṁti vai
"जो परस्त्री में आसक्त हैं और जो चोरी की वृत्ति वाले हैं, वे सभी केवल राजा के भय से ही मर्यादा का पालन करते हैं।"
श्लोक 16 (skanda.6.128.16)
तस्मात्त्वं तप उत्सृज्य राज्यं पूर्वक्रमागतम् । कुरु राज्यं तथा दारान्पुत्रार्थं प्राप्य मा चिरम्
tasmāttvaṁ tapa utsṛjya rājyaṁ pūrvakramāgatam kuru rājyaṁ tathā dārānputrārthaṁ prāpya mā ciram
"अतः आप तप त्यागकर, पूर्व-परंपरा से प्राप्त इस राज्य को धारण करें, तथा बिना विलंब किए संतान की प्राप्ति हेतु विवाह भी करें।"
श्लोक 17 (skanda.6.128.17)
राजोवाच । संन्यस्तोऽहं द्विजश्रेष्ठा न राज्यं कर्तुमुत्सहे । न सुतानां न दाराणां संग्रहं च कथंचन
rājovāca saṁnyasto'haṁ dvijaśreṣṭhā na rājyaṁ kartumutsahe na sutānāṁ na dārāṇāṁ saṁgrahaṁ ca kathaṁcana
राजा ने कहा — "हे श्रेष्ठ द्विजो! मैं संन्यासी हूँ, राज्य करने में समर्थ नहीं हूँ, न मैं पुत्रों की और न पत्नियों की व्यवस्था किसी भी प्रकार से कर सकता हूँ।"
श्लोक 18 (skanda.6.128.18)
तत्पुत्रार्थं प्रवक्ष्यामि युष्माकं स्वामिनः कृते । उपायं येन राजा स्यादानर्त्तो लोकपालकः
tatputrārthaṁ pravakṣyāmi yuṣmākaṁ svāminaḥ kṛte upāyaṁ yena rājā syādānartto lokapālakaḥ
"किंतु तुम्हारे स्वामी की प्राप्ति के लिए मैं तुम्हें एक ऐसा उपाय बताऊँगा, जिससे आनर्त में प्रजापालक राजा उत्पन्न हो सके।"
श्लोक 19 (skanda.6.128.19)
जामदग्न्येन रामेण यदा क्षत्रं निपातितम् । गर्भस्थमपि कार्त्स्न्येन कोपोपहतचेतसा
jāmadagnyena rāmeṇa yadā kṣatraṁ nipātitam garbhasthamapi kārtsnyena kopopahatacetasā
"जब जमदग्नि-पुत्र परशुराम ने क्रोध से आहत होकर संपूर्ण क्षत्रिय वंश को, गर्भस्थ शिशुओं सहित, पूर्णतः नष्ट कर दिया था,"
श्लोक 20 (skanda.6.128.20)
ततः क्षत्रियभार्याः प्रागृतुस्नानात्समाययुः । ब्राह्मणान्पुत्रजन्मार्थं न कामार्थं कथंचन
tataḥ kṣatriyabhāryāḥ prāgṛtusnānātsamāyayuḥ brāhmaṇānputrajanmārthaṁ na kāmārthaṁ kathaṁcana
"तब क्षत्रिय स्त्रियाँ ऋतु-स्नान के पश्चात् ब्राह्मणों के पास केवल पुत्र-जन्म हेतु ही जाती थीं, कामवश कभी नहीं।"
श्लोक 21 (skanda.6.128.21)
ततः पुत्राः समुत्पन्नास्तेजोवीर्यसमन्विताः । क्षेत्रजा भूमिपालानां संजाताश्च महीक्षितः
tataḥ putrāḥ samutpannāstejovīryasamanvitāḥ kṣetrajā bhūmipālānāṁ saṁjātāśca mahīkṣitaḥ
"उससे तेज और वीर्य से युक्त पुत्र उत्पन्न हुए, जो राजाओं के क्षेत्रज (क्षेत्र में उत्पन्न) संतान बनकर पृथ्वी के शासक हुए।"
श्लोक 22 (skanda.6.128.22)
तस्माद्बृहद्बलस्यैता भार्यास्तिष्ठंति या जनाः । ब्राह्मणांस्ता उपागम्य ऋतुस्नाता यथोचितान्
tasmādbṛhadbalasyaitā bhāryāstiṣṭhaṁti yā janāḥ brāhmaṇāṁstā upāgamya ṛtusnātā yathocitān
"अतः बृहद्बल की जो भी पत्नियाँ अब जीवित हैं, वे उचित ब्राह्मणों के पास ऋतु-स्नात होकर जाएँ,"
श्लोक 23 (skanda.6.128.23)
लभिष्यंति च पुत्रांस्तास्तेभ्यः क्षत्रियपुंगवान् । ये भूमिं पालयिष्यंति पालयिष्यंति च प्रजाः
labhiṣyaṁti ca putrāṁstāstebhyaḥ kṣatriyapuṁgavān ye bhūmiṁ pālayiṣyaṁti pālayiṣyaṁti ca prajāḥ
"और वे उनसे श्रेष्ठ क्षत्रिय पुत्रों को प्राप्त करेंगी, जो पृथ्वी की रक्षा करेंगे और प्रजा का पालन करेंगे।"
श्लोक 24 (skanda.6.128.24)
तथाऽत्रास्ति शुभं कुण्डं वासिष्ठं पुत्रजन्मदम् । यत्र स्नाता ऋतौ नारी सद्यो गर्भवती भवेत् । अमोघरेताः कांता च स्नानादत्र प्रजायते
tathā'trāsti śubhaṁ kuṇḍaṁ vāsiṣṭhaṁ putrajanmadam yatra snātā ṛtau nārī sadyo garbhavatī bhavet amogharetāḥ kāṁtā ca snānādatra prajāyate
"इसी प्रकार यहाँ एक शुभ वासिष्ठ कुण्ड भी है, जो पुत्र-जन्म देने वाला है; जहाँ ऋतुकाल में स्नान करने वाली स्त्री तत्क्षण गर्भवती हो जाती है — यहाँ स्नान करने से बांझ स्त्री भी संतानवती हो जाती है।"
श्लोक 25 (skanda.6.128.25)
ये पूर्वं क्षत्रिया जाता ब्राह्मणैः क्षत्रिणीषु च । ते सर्वे तत्प्रभावेन संजाता नात्र संशयः
ye pūrvaṁ kṣatriyā jātā brāhmaṇaiḥ kṣatriṇīṣu ca te sarve tatprabhāvena saṁjātā nātra saṁśayaḥ
"जो भी पहले क्षत्रिय, ब्राह्मणों द्वारा क्षत्रिय स्त्रियों में उत्पन्न हुए, वे सब निश्चय ही इसी के प्रभाव से उत्पन्न हुए थे।"
श्लोक 26 (skanda.6.128.26)
ययायया द्विजो यश्च क्षत्रिण्याऽभूद्वृतः पुरा । तया सह समागत्य स्नातं मन्त्रपुरस्कृतम्
yayāyayā dvijo yaśca kṣatriṇyā'bhūdvṛtaḥ purā tayā saha samāgatya snātaṁ mantrapuraskṛtam
"जिस-जिस ब्राह्मण को जो-जो क्षत्रिय स्त्री पूर्वकाल में चुनती थी, उसी के साथ आकर, मंत्रपूर्वक स्नान करती थी,"
श्लोक 27 (skanda.6.128.27)
सकृन्मैधुनसंसर्गात्ततस्तीर्थप्रभावतः । सर्वासां यत्सुता जाता दुहिता न कथंचन
sakṛnmaidhunasaṁsargāttatastīrthaprabhāvataḥ sarvāsāṁ yatsutā jātā duhitā na kathaṁcana
"और उस तीर्थ के प्रभाव से ही, एक ही बार के संगम से, उन सभी स्त्रियों को जो संतान प्राप्त होती थी, वह पुत्र ही होता था, कभी भी पुत्री नहीं।"
श्लोक 28 (skanda.6.128.28)
ये केचित्पुत्रदा मंत्राश्चातुश्चरणासंभवाः । ते सर्वेऽत्र वसिष्ठेन प्रयुक्ताः क्षत्त्रमिच्छता
ye kecitputradā maṁtrāścātuścaraṇāsaṁbhavāḥ te sarve'tra vasiṣṭhena prayuktāḥ kṣattramicchatā
"जो भी पुत्र-प्रदायक मंत्र चारों वर्णों से उत्पन्न होकर विद्यमान हैं, वे सभी यहाँ, क्षत्रिय-वंश की इच्छा रखने वाले वसिष्ठ द्वारा, प्रयोग किए गए थे।"
श्लोक 29 (skanda.6.128.29)
दंपत्योः स्नानमात्रेण जातेऽत्र स्यात्सुपुत्रकः । तस्मात्सुपुत्रदंनाम कुण्डमेतन्निगद्यते
daṁpatyoḥ snānamātreṇa jāte'tra syātsuputrakaḥ tasmātsuputradaṁnāma kuṇḍametannigadyate
"दंपति के केवल स्नान मात्र से ही यहाँ उत्तम पुत्र उत्पन्न हो जाता है; इसीलिए यह कुण्ड 'सुपुत्रद' नाम से कहा जाता है।"
श्लोक 30 (skanda.6.128.30)
तस्माद्भार्याः समस्तास्ता बृहद्बलसमुद्भवाः । अत्र स्नानं प्रकुर्वंतु यथोक्तविधिना जनाः
tasmādbhāryāḥ samastāstā bṛhadbalasamudbhavāḥ atra snānaṁ prakurvaṁtu yathoktavidhinā janāḥ
"अतः बृहद्बल से उत्पन्न वे समस्त पत्नियाँ यहाँ शास्त्रोक्त विधि के अनुसार स्नान करें।"
श्लोक 31 (skanda.6.128.31)
नैव किंचिदसत्यं स्यान्न च निंदाकरं तथा । श्रूयते च यतः श्लोकः पूर्वाचार्यैरुदाहृतः
naiva kiṁcidasatyaṁ syānna ca niṁdākaraṁ tathā śrūyate ca yataḥ ślokaḥ pūrvācāryairudāhṛtaḥ
"इसमें कुछ भी असत्य नहीं है और न ही यह किसी प्रकार की निंदा का कारण है, क्योंकि इस विषय में पूर्वाचार्यों द्वारा कहा गया एक श्लोक भी सुना जाता है —"
श्लोक 32 (skanda.6.128.32)
अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्त्रमश्मनो लोहमुच्छ्रितम् । तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति
adbhyo'gnirbrahmataḥ kṣattramaśmano lohamucchritam teṣāṁ sarvatragaṁ tejaḥ svāsu yoniṣu śāmyati
"जल से अग्नि उत्पन्न होती है, ब्रह्मा से क्षत्रिय उत्पन्न होता है, पत्थर से लोहा उत्पन्न होता है; उनका सर्वत्र व्याप्त तेज अपने ही मूल स्रोत में लौटकर शांत होता है।"
श्लोक 33 (skanda.6.128.33)
तच्छ्रुत्वा जनाः सर्वे सचिवानां वचोखिलम् । तदाचख्युर्द्रुतं गत्वा सत्यसंधस्य भूपतेः
tacchrutvā janāḥ sarve sacivānāṁ vacokhilam tadācakhyurdrutaṁ gatvā satyasaṁdhasya bhūpateḥ
यह सुनकर सभी लोगों ने मंत्रियों की यह संपूर्ण बात सुनकर, शीघ्र जाकर राजा सत्यसंध को यह सब बताया।
श्लोक 34 (skanda.6.128.34)
ततस्ताः सर्वशो दारा ब्राह्मणानतिसुन्दरान् । ऋतुस्नाताः समाजग्मुर्नृपपत्न्यः सुहर्षिताः
tatastāḥ sarvaśo dārā brāhmaṇānatisundarān ṛtusnātāḥ samājagmurnṛpapatnyaḥ suharṣitāḥ
तत्पश्चात् उन राजा की समस्त पत्नियाँ, अत्यंत हर्षित होकर, ऋतु-स्नात होकर उन अत्यंत सुंदर ब्राह्मणों के पास गईं।
श्लोक 35 (skanda.6.128.35)
यत्र तत्पुत्रदं तीर्थं वसिष्ठेन विनिर्मितम् । तत्र स्नात्वा सकृत्संगं समासाद्य द्विजोद्भवम्
yatra tatputradaṁ tīrthaṁ vasiṣṭhena vinirmitam tatra snātvā sakṛtsaṁgaṁ samāsādya dvijodbhavam
जहाँ वसिष्ठ द्वारा निर्मित वह पुत्र-प्रदायक तीर्थ था, वहाँ स्नान करके एक बार के संगम को उन ब्राह्मणों से प्राप्त करके,
श्लोक 36 (skanda.6.128.36)
सर्वास्ताः पुत्रवत्यश्च संजाता द्विजसत्तमाः । आसीत्तस्य नरेंद्रस्य शतं पंचभिरन्वितम्
sarvāstāḥ putravatyaśca saṁjātā dvijasattamāḥ āsīttasya nareṁdrasya śataṁ paṁcabhiranvitam
वे सभी हे श्रेष्ठ द्विजो! पुत्रवती हो गईं; उस राजा के सौ के साथ पाँच अन्य — इस प्रकार कुल एक सौ पाँच पत्नियाँ थीं।
श्लोक 37 (skanda.6.128.37)
तासां समभवद्विप्राः शतं पंचाधिकं तथा
tāsāṁ samabhavadviprāḥ śataṁ paṁcādhikaṁ tathā
उन सबसे भी उसी प्रकार एक सौ पाँच श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए,
श्लोक 38 (skanda.6.128.38)
प्रत्येकं वरपुत्राणां वंशवृद्धिकरं परम् । आनंदजननं सम्यक्सर्वेषां राष्ट्रवासिनाम्
pratyekaṁ varaputrāṇāṁ vaṁśavṛddhikaraṁ param ānaṁdajananaṁ samyaksarveṣāṁ rāṣṭravāsinām
जो प्रत्येक श्रेष्ठ पुत्र वंश की परम वृद्धि करने वाले थे, तथा संपूर्ण राष्ट्रवासियों के लिए सम्यक् आनंद उत्पन्न करने वाले थे।
श्लोक 39 (skanda.6.128.39)
तत्र श्रेष्ठोऽभवत्पुत्रो य आनर्तपतिर्भुवि । अटोनाम सुविख्यातः सर्वशत्रुनिबर्हणः
tatra śreṣṭho'bhavatputro ya ānartapatirbhuvi aṭonāma suvikhyātaḥ sarvaśatrunibarhaṇaḥ
उनमें भी जो पुत्र सबसे श्रेष्ठ हुआ और आनर्त का अधिपति बना, वह पृथ्वी पर 'अट' नाम से सुविख्यात, समस्त शत्रुओं का संहारक हुआ।
श्लोक 40 (skanda.6.128.40)
अटेश्वरइति ख्यातो येन देवोऽत्र निर्मितः । सुभक्त्या येन दृष्टेन वंशोच्छित्तिर्न जायते
aṭeśvaraiti khyāto yena devo'tra nirmitaḥ subhaktyā yena dṛṣṭena vaṁśocchittirna jāyate
वे 'अटेश्वर' नाम से विख्यात हुए, जिनके द्वारा यहाँ यह देव स्थापित किया गया, जिनके सच्ची भक्ति से दर्शन करने पर वंश का उच्छेद कभी नहीं होता।
श्लोक 41 (skanda.6.128.41)
ऋषय ऊचुः । कस्मात्तस्य कृतं नाम एतच्चाऽट इति स्मृतम् । अन्वयेन परित्यक्तं तस्मात्कीर्तय सूतज
ṛṣaya ūcuḥ kasmāttasya kṛtaṁ nāma etaccā'ṭa iti smṛtam anvayena parityaktaṁ tasmātkīrtaya sūtaja
ऋषियों ने कहा — किस कारण से उसका यह 'अट' नाम रखा गया, जो वंश-परंपरा से भिन्न प्रतीत होता है? हे सूतपुत्र! यह हमें बताइए।
श्लोक 42 (skanda.6.128.42)
सचिवैर्ब्राह्मणैर्वापि तस्यैतन्नाम निर्मितम् । मात्रा वा तत्समाचक्ष्व परं कौतूहलं हि नः
sacivairbrāhmaṇairvāpi tasyaitannāma nirmitam mātrā vā tatsamācakṣva paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ
"क्या यह नाम मंत्रियों या ब्राह्मणों द्वारा रखा गया था, अथवा माता द्वारा? यह हमें बताइए — इसमें हमें अत्यंत कुतूहल है।"
श्लोक 43 (skanda.6.128.43)
सूत उवाच । न मात्रा तत्कृतं नाम न विप्रैः सचिवैर्नृप । तत्कृतं देवदूतेन व्योमस्थेन द्विजोत्तमाः
sūta uvāca na mātrā tatkṛtaṁ nāma na vipraiḥ sacivairnṛpa tatkṛtaṁ devadūtena vyomasthena dvijottamāḥ
सूत जी ने कहा — हे राजन्! वह नाम न तो माता ने रखा और न ब्राह्मणों या मंत्रियों ने; हे श्रेष्ठ द्विजो! वह नाम आकाशस्थ देवदूत ने रखा था।
श्लोक 44 (skanda.6.128.44)
यथा तथा प्रवक्ष्यामि श्रोतव्यं सुसमाहितैः । यया स भूपतिर्जातो दशार्णाधिपतेः सुता
yathā tathā pravakṣyāmi śrotavyaṁ susamāhitaiḥ yayā sa bhūpatirjāto daśārṇādhipateḥ sutā
जैसा हुआ, वैसा ही मैं बताऊँगा; एकाग्रचित्त होकर सुनो — जिस स्त्री से वह राजा उत्पन्न हुआ, वह दशार्ण के अधिपति की पुत्री थी।
श्लोक 45 (skanda.6.128.45)
सा रूपयौवनोपेता रूपाढ्यं प्राप्य सद्द्विजम् । प्रस्थिता स्नातुकामाथ पुत्रतीर्थे मृगेक्षणा
sā rūpayauvanopetā rūpāḍhyaṁ prāpya saddvijam prasthitā snātukāmātha putratīrthe mṛgekṣaṇā
वह रूप और यौवन से युक्त, मृगनयनी स्त्री, एक रूपसंपन्न श्रेष्ठ ब्राह्मण को प्राप्त कर, पुत्र-तीर्थ में स्नान की इच्छा से चल पड़ी।
श्लोक 46 (skanda.6.128.46)
सहिता तेन विप्रेण कंदर्पप्रतिमेन च । अथ ताभ्यां महान्रामो मिथः संदर्शनात्स्थितः
sahitā tena vipreṇa kaṁdarpapratimena ca atha tābhyāṁ mahānrāmo mithaḥ saṁdarśanātsthitaḥ
कामदेव के समान उस ब्राह्मण के साथ जाते हुए, वे दोनों परस्पर एक-दूसरे को देखकर अत्यंत मुग्ध हो गए।
श्लोक 47 (skanda.6.128.47)
तादृङ्मात्रं सुकृच्छ्रेण प्राप्तं तीर्थं सुतप्रदम् । ततः स्नात्वा जले तस्मिन्निष्क्रांतौ तौ सुकामुकौ
tādṛṅmātraṁ sukṛcchreṇa prāptaṁ tīrthaṁ sutapradam tataḥ snātvā jale tasminniṣkrāṁtau tau sukāmukau
बड़ी कठिनाई से वे उस पुत्र-प्रदायक तीर्थ तक पहुँचे; तत्पश्चात् उस जल में स्नान करके वे दोनों प्रेमी बाहर निकले।
श्लोक 48 (skanda.6.128.48)
व्रजमानौ च मार्गेऽपि कामधर्ममुपागतौ । अत्यौत्सुक्यात्सुसंहृष्टौ लज्जां त्यक्त्वा सुदूरतः
vrajamānau ca mārge'pi kāmadharmamupāgatau atyautsukyātsusaṁhṛṣṭau lajjāṁ tyaktvā sudūrataḥ
मार्ग में ही चलते हुए वे कामधर्म के वशीभूत हो गए, अत्यंत उत्सुकता और उल्लास से भरकर, लज्जा को दूर ही त्यागकर,
श्लोक 49 (skanda.6.128.49)
निंदमानस्य लोकस्य विच्छेदवचनैस्तदा । वीर्योत्सर्गेऽथ संजाते यावदुत्तिष्ठते द्विजः
niṁdamānasya lokasya vicchedavacanaistadā vīryotsarge'tha saṁjāte yāvaduttiṣṭhate dvijaḥ
लोगों के निंदा-भरे वियोग-वचनों के बीच भी; तब जब वीर्य का स्खलन हो चुका था, और ज्यों ही वह ब्राह्मण उठने लगा,
श्लोक 50 (skanda.6.128.50)
तावदाकाशगा वाणी सहसा देवनिर्मिता । अटताराजमार्गेण विप्रेणानेन वै यतः
tāvadākāśagā vāṇī sahasā devanirmitā aṭatārājamārgeṇa vipreṇānena vai yataḥ
तभी अचानक देवताओं द्वारा रची गई एक आकाशवाणी हुई, कि इस ब्राह्मण के द्वारा राजमार्ग पर ही घूमते हुए (अटन करते हुए),
श्लोक 51 (skanda.6.128.51)
उत्पादितस्तु पुत्रोऽयमौत्सुक्याद्ब्राह्मणेन तु । अटाख्यो भूपतिस्तस्माल्लोके ख्यातो भविष्यति
utpāditastu putro'yamautsukyādbrāhmaṇena tu aṭākhyo bhūpatistasmālloke khyāto bhaviṣyati
"उत्सुकतावश उस ब्राह्मण द्वारा जो यह पुत्र उत्पन्न किया गया है, वह इसी कारण से 'अट' नामक राजा के रूप में संसार में विख्यात होगा।"
श्लोक 52 (skanda.6.128.52)
दीर्घायुर्बहुपुत्रश्च शत्रुंपक्षक्षयावहः । एतस्मात्कारणाद्विप्रा अटाख्यः स बभूव ह
dīrghāyurbahuputraśca śatruṁpakṣakṣayāvahaḥ etasmātkāraṇādviprā aṭākhyaḥ sa babhūva ha
"वह दीर्घायु, बहुपुत्रवान तथा शत्रुपक्ष का संहारक होगा — इसी कारण से, हे विप्रो! वह 'अट' नाम से विख्यात हुआ।"
श्लोक 53 (skanda.6.128.53)
स्ववंशोद्धरचंद्रोऽत्र वांछितार्थप्रदोऽर्थिनाम् । तेनैतत्क्षेत्रमासाद्य स्थापितं लिंगमुत्तमम् । स्वनाम्ना ब्राह्मणश्रेष्ठाः सर्वदेष्टप्रदं नृणाम्
svavaṁśoddharacaṁdro'tra vāṁchitārthaprado'rthinām tenaitatkṣetramāsādya sthāpitaṁ liṁgamuttamam svanāmnā brāhmaṇaśreṣṭhāḥ sarvadeṣṭapradaṁ nṛṇām
अपने ही वंश का उद्धारक चंद्रमा के समान वह, याचकों को उनकी वांछित वस्तु देने वाला था; उसने ही इस क्षेत्र में आकर अपने ही नाम से यह उत्तम लिंग स्थापित किया, जो मनुष्यों की सभी अभीष्ट वस्तुएँ सदा प्रदान करने वाला है, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो!
श्लोक 54 (skanda.6.128.54)
यस्तन्माघचतुर्दश्यां पूजयेच्छ्रद्धयान्वितः । न तस्य जायते किंचिद्दुःखं संतानसंभवम्
yastanmāghacaturdaśyāṁ pūjayecchraddhayānvitaḥ na tasya jāyate kiṁcidduḥkhaṁ saṁtānasaṁbhavam
जो व्यक्ति माघ मास की चतुर्दशी को श्रद्धापूर्वक उसकी पूजा करता है, उसे संतान से संबंधित कोई भी दुःख कभी नहीं होता।
श्लोक 55 (skanda.6.128.55)
अपि वर्षशतानारी स्नात्वा कुण्डे सुतप्रदे । अटेश्वरं ततः पश्येच्छिवभक्तिपरायणा
api varṣaśatānārī snātvā kuṇḍe sutaprade aṭeśvaraṁ tataḥ paśyecchivabhaktiparāyaṇā
यदि सौ वर्ष की वृद्धा स्त्री भी उस पुत्र-प्रदायक कुण्ड में स्नान करके शिवभक्ति में परायण होकर तत्पश्चात् अटेश्वर का दर्शन करती है,
श्लोक 56 (skanda.6.128.56)
सद्यः पुत्रमवाप्नोति वंशवृद्धिकरं परम् ॥ तत्प्रसादान्न संदेहः कार्तिकेय वचो यथा
sadyaḥ putramavāpnoti vaṁśavṛddhikaraṁ param tatprasādānna saṁdehaḥ kārtikeya vaco yathā
तो वह तत्काल ही ऐसा पुत्र प्राप्त करती है, जो वंश की परम वृद्धि करने वाला होता है — उनकी कृपा से इसमें कोई संदेह नहीं, जैसा कार्तिकेय का वचन है।