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नागर खण्ड · अध्याय 129

याज्ञवल्क्याश्रम-माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 128अध्याय-सूचीअध्याय 130

श्लोक 1 (skanda.6.129.1)

सूत उवाच । तथान्योऽपि च तत्रास्ति याज्ञवल्क्यसमुद्रवः । आश्रमो लोक विख्यातो मूर्खाणामपि सिद्धिदः

sūta uvāca tathānyo'pi ca tatrāsti yājñavalkyasamudravaḥ āśramo loka vikhyāto mūrkhāṇāmapi siddhidaḥ

सूत जी ने कहा — इसके अतिरिक्त वहाँ एक और भी है — याज्ञवल्क्य से संबंधित आश्रम, जो लोक में विख्यात है और मूर्खों को भी सिद्धि देने वाला है।

श्लोक 2 (skanda.6.129.2)

यत्र तप्त्वा तपस्तीव्रं याज्ञवल्क्येन धीमता । संप्राप्ता निखिला वेदा गुरुणाऽपहृताश्च ये

yatra taptvā tapastīvraṁ yājñavalkyena dhīmatā saṁprāptā nikhilā vedā guruṇā'pahṛtāśca ye

जहाँ बुद्धिमान याज्ञवल्क्य ने तीव्र तप करके, अपने गुरु द्वारा छीने गए समस्त वेदों को पुनः प्राप्त किया।

श्लोक 3 (skanda.6.129.3)

ऋषय ऊचुः । कोऽसौ गुरुरभूत्तस्य याज्ञवल्क्यस्य धीमतः । पाठयित्वा पुनर्येन हृता वेदा महात्मना

ṛṣaya ūcuḥ ko'sau gururabhūttasya yājñavalkyasya dhīmataḥ pāṭhayitvā punaryena hṛtā vedā mahātmanā

ऋषियों ने कहा — बुद्धिमान याज्ञवल्क्य के वे गुरु कौन थे, जिन्होंने पहले उन्हें पढ़ाकर, फिर उस महात्मा के वेदों को छीन लिया था?

श्लोक 4 (skanda.6.129.4)

किमर्थं च समाचक्ष्व सूतपुत्रात्र विस्तरात् । कौतुकं परमं जातं सर्वेषां नो द्विजन्मनाम्

kimarthaṁ ca samācakṣva sūtaputrātra vistarāt kautukaṁ paramaṁ jātaṁ sarveṣāṁ no dvijanmanām

हे सूतपुत्र! यह हमें विस्तारपूर्वक बताइए कि यह किस कारण से हुआ; हम सभी द्विजों को इसमें परम कुतूहल उत्पन्न हो गया है।

श्लोक 5 (skanda.6.129.5)

सूत उवाच । आसीद्ब्राह्मणशार्दूलः शाकल्य इति विश्रुतः । भार्गवान्वयसंभूतो वेद वेदांगपारगः

sūta uvāca āsīdbrāhmaṇaśārdūlaḥ śākalya iti viśrutaḥ bhārgavānvayasaṁbhūto veda vedāṁgapāragaḥ

सूत जी ने कहा — शाकल्य नाम से विख्यात एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, जो भृगुवंश में उत्पन्न हुए थे तथा वेद और वेदांगों में पारंगत थे।

श्लोक 6 (skanda.6.129.6)

बृहत्कल्पे पुरा विप्रा वर्धमाने पुरोत्तमे । बहुशिष्यसमायुक्तो वेदाध्ययनतत्परः

bṛhatkalpe purā viprā vardhamāne purottame bahuśiṣyasamāyukto vedādhyayanatatparaḥ

हे विप्रो! प्राचीन काल में बृहत्कल्प में, समृद्धिशाली श्रेष्ठ नगर में, वे अनेक शिष्यों से युक्त होकर, वेदाध्ययन में सदा तत्पर रहते थे।

श्लोक 7 (skanda.6.129.7)

स सदा प्रातरुत्थाय विद्यादानं प्रयच्छति । शिष्येभ्यश्चानुरूपेभ्यः प्रसादाद्विजसत्तमाः

sa sadā prātarutthāya vidyādānaṁ prayacchati śiṣyebhyaścānurūpebhyaḥ prasādādvijasattamāḥ

वे सदा प्रातःकाल उठकर, हे श्रेष्ठ द्विजो! अपनी कृपा से योग्य शिष्यों को विद्या का दान दिया करते थे।

श्लोक 8 (skanda.6.129.8)

चकार स तदा विप्राः पौरोहित्यं महीपतेः । सूर्यवंशप्रसूतस्य सुप्रियस्य महात्मनः

cakāra sa tadā viprāḥ paurohityaṁ mahīpateḥ sūryavaṁśaprasūtasya supriyasya mahātmanaḥ

उन्होंने उस समय, सूर्यवंश में उत्पन्न, अत्यंत प्रिय, महात्मा राजा के पुरोहित का पद भी ग्रहण किया था।

श्लोक 9 (skanda.6.129.9)

स तस्य धर्मकृत्यानि सर्वाण्येव दिनेदिने । कृत्वा स्वगृहमभ्येति पूजितस्तेन भूभुजा

sa tasya dharmakṛtyāni sarvāṇyeva dinedine kṛtvā svagṛhamabhyeti pūjitastena bhūbhujā

वे उस राजा के समस्त धार्मिक अनुष्ठान प्रतिदिन संपन्न करके, उस राजा द्वारा पूजित होकर अपने घर लौट आया करते थे।

श्लोक 10 (skanda.6.129.10)

एकं शिष्यं समारोप्य शांत्यर्थं तस्य भूपतेः । कथयित्वा प्रमाणं च विधानं होमसंभवम्

ekaṁ śiṣyaṁ samāropya śāṁtyarthaṁ tasya bhūpateḥ kathayitvā pramāṇaṁ ca vidhānaṁ homasaṁbhavam

एक बार उस राजा की शांति-विधि हेतु उन्होंने एक शिष्य को नियुक्त किया, उसे प्रमाण और होम-विधान समझाकर।

श्लोक 11 (skanda.6.129.11)

शिष्योऽपि सकलं कृत्वा तत्कर्म सुसमाहितः । आशीर्वादं प्रदत्त्वा च भूपतेर्गृहमेति च

śiṣyo'pi sakalaṁ kṛtvā tatkarma susamāhitaḥ āśīrvādaṁ pradattvā ca bhūpatergṛhameti ca

वह शिष्य भी अत्यंत सावधानी से वह संपूर्ण कर्म संपन्न करके, आशीर्वाद देकर उस राजा के घर से लौट आता था।

श्लोक 12 (skanda.6.129.12)

एवं प्रकुर्वतस्तस्य शाकल्यस्य महात्मनः । पौरोहित्यं गतः कालः कियन्मात्रो द्विजोत्तमाः

evaṁ prakurvatastasya śākalyasya mahātmanaḥ paurohityaṁ gataḥ kālaḥ kiyanmātro dvijottamāḥ

इस प्रकार पौरोहित्य करते हुए उन महात्मा शाकल्य का, हे श्रेष्ठ द्विजो! कुछ काल इसी प्रकार बीत गया।

श्लोक 13 (skanda.6.129.13)

तदा वैवाहिके काले शप्तो यः शंभुना स्वयम् । सुनिंद्यां विकृतिं दृष्ट्वा तस्य वेद्यां गतस्य च

tadā vaivāhike kāle śapto yaḥ śaṁbhunā svayam suniṁdyāṁ vikṛtiṁ dṛṣṭvā tasya vedyāṁ gatasya ca

तब विवाह के समय स्वयं शंभु द्वारा शापित किसी व्यक्ति ने, यज्ञवेदी पर आए हुए उस अत्यंत निंदनीय विकृत रूप को देखकर,

श्लोक 14 (skanda.6.129.14)

अथ तं योजयामास शांत्यर्थं नृपमंदिरे । याज्ञवल्क्यं स शाकल्यः प्रतिपद्यागतं तदा

atha taṁ yojayāmāsa śāṁtyarthaṁ nṛpamaṁdire yājñavalkyaṁ sa śākalyaḥ pratipadyāgataṁ tadā

उसकी शांति के लिए उस राजा के निवास में शिष्य नियुक्त करना चाहा; तब शाकल्य ने, तैयार होकर आए हुए याज्ञवल्क्य को उस काम में नियुक्त कर दिया।

श्लोक 15 (skanda.6.129.15)

सोऽपि तारुण्यगर्वेण वेश्याकरजविक्षतः । सर्वांगेषु सुनिर्लज्जः प्रकटांगो जगाम वै

so'pi tāruṇyagarveṇa veśyākarajavikṣataḥ sarvāṁgeṣu sunirlajjaḥ prakaṭāṁgo jagāma vai

किंतु यौवन के मद में, वेश्या के नखों से क्षत-विक्षत, अपने संपूर्ण अंगों को बिना किसी लज्जा के खुला रखे हुए, वह वहाँ गया।

श्लोक 16 (skanda.6.129.16)

ततश्च शांतिकं कृत्वा जपांते भूपतिं च तम् । शांतोदकप्रदानाय हस्यमानो जनैर्ययौ

tataśca śāṁtikaṁ kṛtvā japāṁte bhūpatiṁ ca tam śāṁtodakapradānāya hasyamāno janairyayau

तत्पश्चात् शांति-कर्म तथा जप को संपन्न करके, उस राजा को शांति-जल प्रदान करने के लिए, लोगों द्वारा हँसी उड़ाया जाता हुआ वह चला।

श्लोक 17 (skanda.6.129.17)

पार्थिवोऽपि च तं दृष्ट्वा तादृग्रूपं विटं द्विजम् । नाशीर्जग्राह तेनोक्तां वाक्यमेतदुवाच ह

pārthivo'pi ca taṁ dṛṣṭvā tādṛgrūpaṁ viṭaṁ dvijam nāśīrjagrāha tenoktāṁ vākyametaduvāca ha

राजा भी उस व्यभिचारी-सदृश ब्राह्मण के ऐसे रूप को देखकर, उसके द्वारा दिए गए आशीर्वाद को स्वीकार नहीं किया और यह वचन बोला।

श्लोक 18 (skanda.6.129.18)

उच्छिष्टोऽहं द्विजश्रेष्ठ शय्यारूढो व्यवस्थितः । अत्र शालोद्भवे स्तंभे तस्मादेतज्जलं क्षिप

ucchiṣṭo'haṁ dvijaśreṣṭha śayyārūḍho vyavasthitaḥ atra śālodbhave staṁbhe tasmādetajjalaṁ kṣipa

"हे श्रेष्ठ द्विजो! मैं जूठा हूँ, शय्या पर पड़ा हुआ स्थित हूँ; अतः यह जल यहाँ इस शाला में उत्पन्न स्तंभ पर छिड़क दो।"

श्लोक 19 (skanda.6.129.19)

सोऽपि सावज्ञमाज्ञाय तं भूपं कुपिताननः । तं च स्तंभं समुद्दिश्य ध्यात्वा तद्ब्रह्म शाश्वतम्

so'pi sāvajñamājñāya taṁ bhūpaṁ kupitānanaḥ taṁ ca staṁbhaṁ samuddiśya dhyātvā tadbrahma śāśvatam

उस राजा को इस प्रकार अपमानपूर्वक आज्ञा देते देख, कुपित मुख हुआ वह भी उस स्तंभ को लक्ष्य करके, उस शाश्वत ब्रह्म का ध्यान करके,

श्लोक 20 (skanda.6.129.20)

द्यां त्वमालिख्य इत्येव प्रोक्त्वा मंत्रं च याजुषम् । प्राक्षिपच्छांतिकं तोयं तस्य मूर्धनि सत्वरम्

dyāṁ tvamālikhya ityeva proktvā maṁtraṁ ca yājuṣam prākṣipacchāṁtikaṁ toyaṁ tasya mūrdhani satvaram

"तुम आकाश को अंकित करो" — ऐसा कहकर, याजुष मंत्र का उच्चारण करते हुए, उसने वह शांति-जल तत्काल राजा के मस्तक पर ही डाल दिया।

श्लोक 21 (skanda.6.129.21)

ततः स पतिते तोये स्तंभः पल्लवशोभितः । तत्क्षणादेव संजज्ञे फल पुष्पैर्विराजितः

tataḥ sa patite toye staṁbhaḥ pallavaśobhitaḥ tatkṣaṇādeva saṁjajñe phala puṣpairvirājitaḥ

तत्पश्चात् वह जल गिरते ही वह स्तंभ पल्लवों से सुशोभित हो उठा, और उसी क्षण फलों तथा फूलों से सुशोभित होकर प्रकट हो गया।

श्लोक 22 (skanda.6.129.22)

तं दृष्ट्वा पार्थिवः सोऽथ विस्मयोत्फुल्ललोचनः । पश्चात्तापं विधायाथ वाक्यमेतदुवाच ह

taṁ dṛṣṭvā pārthivaḥ so'tha vismayotphullalocanaḥ paścāttāpaṁ vidhāyātha vākyametaduvāca ha

उसे देखकर वह राजा विस्मय से नेत्र फैलाए हुए, तत्पश्चात् पश्चाताप करते हुए यह वचन बोला।

श्लोक 23 (skanda.6.129.23)

अभिषेकं द्विजश्रेष्ठ ममापि त्वं प्रयच्छ भोः । अनेनैव तु मन्त्रेण शुचित्वं मे व्यवस्थितम्

abhiṣekaṁ dvijaśreṣṭha mamāpi tvaṁ prayaccha bhoḥ anenaiva tu mantreṇa śucitvaṁ me vyavasthitam

"हे श्रेष्ठ द्विज! मुझे भी अभिषेक प्रदान कीजिए; इसी मंत्र के प्रभाव से मेरी शुद्धता भी सुनिश्चित हो जाएगी।"

श्लोक 24 (skanda.6.129.24)

याज्ञवल्क्य उवाच । ममाभिषेकदानस्य त्वमनर्होऽसि पार्थिव । तस्माद्यास्याम्यहं सद्यो यत्रस्थः स गुरुर्मम

yājñavalkya uvāca mamābhiṣekadānasya tvamanarho'si pārthiva tasmādyāsyāmyahaṁ sadyo yatrasthaḥ sa gururmama

याज्ञवल्क्य ने कहा — "हे राजन्! मेरे अभिषेक-दान के तुम पात्र नहीं हो; अतः मैं तुरंत वहाँ जाऊँगा जहाँ मेरे गुरु स्थित हैं।"

श्लोक 25 (skanda.6.129.25)

राजोवाच । तव दास्यामि वस्त्राणि वाहनानि वसूनि च । तस्माद्यच्छाभिषेकं मे मन्त्रेणाऽनेन सांप्रतम्

rājovāca tava dāsyāmi vastrāṇi vāhanāni vasūni ca tasmādyacchābhiṣekaṁ me mantreṇā'nena sāṁpratam

राजा ने कहा — "मैं तुम्हें वस्त्र, वाहन तथा धन-संपत्ति दूँगा; अतः इसी मंत्र से अभी मुझे अभिषेक प्रदान करो।"

श्लोक 26 (skanda.6.129.26)

याज्ञवल्क्य उवाच । न होमांतं विना मन्त्रः स्फुरते पार्थिवोत्तम । अभिषेकविधौ प्रोक्तो यः पूर्वं पद्मयोनिना । तस्मान्नाहं करिष्यामि तव यद्वै हृदि स्थितम्

yājñavalkya uvāca na homāṁtaṁ vinā mantraḥ sphurate pārthivottama abhiṣekavidhau prokto yaḥ pūrvaṁ padmayoninā tasmānnāhaṁ kariṣyāmi tava yadvai hṛdi sthitam

याज्ञवल्क्य ने कहा — "हे श्रेष्ठ राजन्! होम के बिना कोई भी मंत्र सिद्ध नहीं होता; अभिषेक-विधि में जो मंत्र पहले पद्मयोनि (ब्रह्मा) द्वारा कहा गया है, वही उपयोग होता है; अतः जो तुम्हारे हृदय में है, वह मैं नहीं करूँगा।"

श्लोक 27 (skanda.6.129.27)

इत्युक्त्वा वचनं भूपं याज्ञवल्क्यः स वै द्विजः । जगाम स्वगृहं तूर्णं निस्पृहत्वं समाश्रितः

ityuktvā vacanaṁ bhūpaṁ yājñavalkyaḥ sa vai dvijaḥ jagāma svagṛhaṁ tūrṇaṁ nispṛhatvaṁ samāśritaḥ

इस प्रकार उस राजा से यह वचन कहकर, वह ब्राह्मण याज्ञवल्क्य, वैराग्य को धारण करते हुए, तुरंत अपने घर चला गया।

श्लोक 28 (skanda.6.129.28)

अपरेऽह्नि समायातं शाकल्यमथ भूपतिः । प्रोवाच प्रांजलिर्भूत्वा विनयावनतः स्थितः

apare'hni samāyātaṁ śākalyamatha bhūpatiḥ provāca prāṁjalirbhūtvā vinayāvanataḥ sthitaḥ

दूसरे दिन आए हुए शाकल्य से वह राजा, हाथ जोड़कर, विनय से झुककर, यह बोला।

श्लोक 29 (skanda.6.129.29)

यस्त्वया प्रेषितः कल्य शिष्यो ब्राह्मणसत्तमः । शांत्यर्थं प्रेषणीयश्च भूयोऽप्येवं गृहे मम

yastvayā preṣitaḥ kalya śiṣyo brāhmaṇasattamaḥ śāṁtyarthaṁ preṣaṇīyaśca bhūyo'pyevaṁ gṛhe mama

"जो श्रेष्ठ ब्राह्मण शिष्य आपने कल भेजा था, वैसा ही एक शिष्य फिर से शांति के लिए मेरे घर भेजा जाए।"

श्लोक 30 (skanda.6.129.30)

बाढमित्येव स प्रोक्त्वा ततो गत्वा निजालयम् । याज्ञवल्क्यं समाहूय ततः प्रोवाच सादरम्

bāḍhamityeva sa proktvā tato gatvā nijālayam yājñavalkyaṁ samāhūya tataḥ provāca sādaram

"बहुत अच्छा" ऐसा कहकर, वह अपने आश्रम को जाकर, याज्ञवल्क्य को बुलाकर, तत्पश्चात् आदरपूर्वक बोले।

श्लोक 31 (skanda.6.129.31)

अद्यापि त्वं नरेंद्रस्य शांत्यर्थं भवने व्रज । विशेषात्पार्थिवेंद्रेण समाहूतोऽसि पुत्रक

adyāpi tvaṁ nareṁdrasya śāṁtyarthaṁ bhavane vraja viśeṣātpārthiveṁdreṇa samāhūto'si putraka

"आज भी, हे पुत्र! तुम राजा के भवन में शांति-कर्म के लिए जाओ; विशेष रूप से उस श्रेष्ठ राजा ने ही तुम्हें बुलाया है।"

श्लोक 32 (skanda.6.129.32)

याज्ञवल्क्य उवाच । नाहं तात गमिष्यामि शांत्यर्थं तस्य मंदिरे । अवलेपेन युक्तस्य शुद्ध्या विरहितस्य च

yājñavalkya uvāca nāhaṁ tāta gamiṣyāmi śāṁtyarthaṁ tasya maṁdire avalepena yuktasya śuddhyā virahitasya ca

याज्ञवल्क्य ने कहा — "हे तात! मैं उसके भवन में शांति-कर्म के लिए नहीं जाऊँगा, क्योंकि वह अहंकार से युक्त है तथा पवित्रता से रहित है।"

श्लोक 33 (skanda.6.129.33)

मया तस्याभिषेकार्थं सलिलं चोद्यतं च यत् । सलिलं तेन तत्काष्ठे समादिष्टं कुबुद्धिना

mayā tasyābhiṣekārthaṁ salilaṁ codyataṁ ca yat salilaṁ tena tatkāṣṭhe samādiṣṭaṁ kubuddhinā

"मैंने उसके अभिषेक के लिए जो जल तैयार किया था, उसे उस दुर्बुद्धि ने उस स्तंभ पर छिड़कने का आदेश दिया।"

श्लोक 34 (skanda.6.129.34)

ततो मयापि तत्रैव तत्क्षणात्सलिलं च यत् । तस्मिन्काष्ठे परिक्षिप्तं नीतं वृद्धिं च तत्क्षणात्

tato mayāpi tatraiva tatkṣaṇātsalilaṁ ca yat tasminkāṣṭhe parikṣiptaṁ nītaṁ vṛddhiṁ ca tatkṣaṇāt

"तब मैंने भी उसी क्षण उसी स्थान पर, जो भी जल था, उस काष्ठ पर छिड़का, और वह तत्क्षण ही (पल्लवित होकर) बढ़ने लगा।"

श्लोक 35 (skanda.6.129.35)

शाकल्य उवाच । अत एव विशेषेण समाहूतोऽसि पुत्रक । तस्मात्तत्र द्रुतं गच्छ नावज्ञेया महीभुजः

śākalya uvāca ata eva viśeṣeṇa samāhūto'si putraka tasmāttatra drutaṁ gaccha nāvajñeyā mahībhujaḥ

शाकल्य ने कहा — "यही कारण है, हे पुत्र! कि वह तुम्हें विशेष रूप से पुनः बुला रहा है। अतः शीघ्र वहाँ जाओ, राजाओं का अनादर नहीं करना चाहिए।"

श्लोक 36 (skanda.6.129.36)

अपमानाद्भवेन्मानं पार्थिवानामसंशयम् । यः करोति पुनस्तत्र मानं न स भवेत्प्रियः

apamānādbhavenmānaṁ pārthivānāmasaṁśayam yaḥ karoti punastatra mānaṁ na sa bhavetpriyaḥ

"अपमान से ही निःसंदेह राजाओं का मान (अभिमान) बढ़ता है; जो कोई पुनः उन्हें (अपने) मान से भी अधिक सम्मान देता है, वह उन्हें प्रिय नहीं होता।"

श्लोक 37 (skanda.6.129.37)

कोपप्रसाद वस्तूनि विचिन्वंतीह ये सदा । आरोहंति शनैर्भृत्या धुन्वंतमपि पार्थिवम्

kopaprasāda vastūni vicinvaṁtīha ye sadā ārohaṁti śanairbhṛtyā dhunvaṁtamapi pārthivam

"जो लोग यहाँ सदा क्रोध और प्रसन्नता के अवसरों को खोजते रहते हैं, वे ही सेवक धीरे-धीरे उस राजा पर, चाहे वह क्रुद्ध ही क्यों न हो, अपना अधिकार जमा लेते हैं।"

श्लोक 38 (skanda.6.129.38)

समौ मानापमानौ च चित्तज्ञः कालवित्तथा । सर्वंसहः क्षमी विज्ञः स भवेद्राजवल्लभः

samau mānāpamānau ca cittajñaḥ kālavittathā sarvaṁsahaḥ kṣamī vijñaḥ sa bhavedrājavallabhaḥ

"जो मान और अपमान को समान समझता है, जो चित्त और काल दोनों को जानता है, जो सब कुछ सहन करने वाला, क्षमाशील और बुद्धिमान है — वही राजा को प्रिय होता है।"

श्लोक 39 (skanda.6.129.39)

अपमानमनादृत्य तस्माद्गच्छ नृपालयम् । ममाज्ञापि न लंघ्या त एष धर्मः सनातनः

apamānamanādṛtya tasmādgaccha nṛpālayam mamājñāpi na laṁghyā ta eṣa dharmaḥ sanātanaḥ

"अतः अपमान की परवाह न करते हुए राजभवन जाओ; मेरी आज्ञा का भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए — यही सनातन धर्म है।"

श्लोक 40 (skanda.6.129.40)

याज्ञवल्क्य उवाच । आज्ञाभंगो ध्रुवं भावी परिपाटीव्यतिक्रमात् । करोषि यदि शिष्याणां ये त्वया तत्र योजिताः

yājñavalkya uvāca ājñābhaṁgo dhruvaṁ bhāvī paripāṭīvyatikramāt karoṣi yadi śiṣyāṇāṁ ye tvayā tatra yojitāḥ

याज्ञवल्क्य ने कहा — "यदि आप शिष्यों के लिए यह प्रचलित परंपरा भंग करते हुए, बलपूर्वक मुझे उसकी ओर नियुक्त करते हैं,"

श्लोक 41 (skanda.6.129.41)

तस्माद्यदि बलान्मां त्वं योजयिष्यसि तं प्रति । त्वां त्यक्त्वाऽन्यत्र यास्यामि यतः प्रोक्तं महर्षिभिः

tasmādyadi balānmāṁ tvaṁ yojayiṣyasi taṁ prati tvāṁ tyaktvā'nyatra yāsyāmi yataḥ proktaṁ maharṣibhiḥ

"तो निश्चय ही यह आपकी आज्ञा का भंग सिद्ध होगा; अतः यदि आप बलपूर्वक मुझे उसके पास नियुक्त करते हैं, तो मैं आपको त्यागकर अन्यत्र चला जाऊँगा — क्योंकि महर्षियों ने कहा है,"

श्लोक 42 (skanda.6.129.42)

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथे वर्तमानस्य परित्यागो विधीयते

gurorapyavaliptasya kāryākāryamajānataḥ utpathe vartamānasya parityāgo vidhīyate

"जो गुरु भी अहंकारी है, कर्तव्य और अकर्तव्य को नहीं जानता, और कुमार्ग पर चलता है — ऐसे गुरु का भी परित्याग विधान द्वारा अनुमत है।"

श्लोक 43 (skanda.6.129.43)

सूत उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शाकल्यः क्रोधमूर्छितः । ततः प्रोवाच तं भूयो भर्त्समानो मुहुर्मुहुः

sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā śākalyaḥ krodhamūrchitaḥ tataḥ provāca taṁ bhūyo bhartsamāno muhurmuhuḥ

सूत जी ने कहा — उसका वह वचन सुनकर शाकल्य क्रोध से मूर्च्छित-सा हो उठे, तत्पश्चात् बार-बार डाँटते हुए उससे फिर से बोले।

श्लोक 44 (skanda.6.129.44)

एकमप्यक्षरं यत्र गुरुः शिष्ये निवेदयेत् । पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद्दत्त्वा ह्यनृणी भवेत्

ekamapyakṣaraṁ yatra guruḥ śiṣye nivedayet pṛthivyāṁ nāsti taddravyaṁ yaddattvā hyanṛṇī bhavet

"जिस भी एक अक्षर का ज्ञान गुरु शिष्य को प्रदान करता है, पृथ्वी पर ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे देकर उसका ऋण चुकाया जा सके।"

श्लोक 45 (skanda.6.129.45)

तस्माद्गच्छ द्रुतं दत्त्वा मदध्ययनमालयम् । त्यक्त्वा विद्यां मया दत्तां नो चेच्छप्स्याम्यहं तव

tasmādgaccha drutaṁ dattvā madadhyayanamālayam tyaktvā vidyāṁ mayā dattāṁ no cecchapsyāmyahaṁ tava

"अतः शीघ्र यहाँ से चले जाओ, मेरे अध्ययन-आश्रम को छोड़कर; मेरे द्वारा दी गई विद्या को त्यागो, अन्यथा मैं तुम्हें शाप दूँगा।"

श्लोक 46 (skanda.6.129.46)

एवमुक्त्वाभिमंत्र्याथ नादबिंदुसमुद्भवैः । मंत्रैराथर्वणैस्तोयं पानार्थं चार्पयत्ततः

evamuktvābhimaṁtryātha nādabiṁdusamudbhavaiḥ maṁtrairātharvaṇaistoyaṁ pānārthaṁ cārpayattataḥ

ऐसा कहकर, नाद-बिंदु से उत्पन्न आथर्वण मंत्रों से अभिमंत्रित करके, तत्पश्चात् उन्होंने उसे पीने के लिए जल दे दिया।

श्लोक 47 (skanda.6.129.47)

सोऽपिबत्तत्क्षणात्तोयं तत्पीत्वा व्याकुलेंद्रियः । उद्गिरद्वांतिधर्मेण तत्त्वविद्याविमिश्रितम्

so'pibattatkṣaṇāttoyaṁ tatpītvā vyākuleṁdriyaḥ udgiradvāṁtidharmeṇa tattvavidyāvimiśritam

उसने भी तत्क्षण वह जल पी लिया; किंतु उसे पीते ही, इंद्रियाँ व्याकुल होने पर, उलटी की विधि से वह समस्त तत्त्व-विद्या को उगल दिया।

श्लोक 48 (skanda.6.129.48)

ततः प्रोवाच तं भूयः शाकल्यं कुपिताननः । एकमप्यक्षरं नास्ति तावकीयं ममोदरे

tataḥ provāca taṁ bhūyaḥ śākalyaṁ kupitānanaḥ ekamapyakṣaraṁ nāsti tāvakīyaṁ mamodare

तत्पश्चात् कुपित मुख हुए उस याज्ञवल्क्य ने शाकल्य से पुनः यह कहा — "अब मेरे उदर में तुम्हारा दिया हुआ एक भी अक्षर शेष नहीं है।"

श्लोक 49 (skanda.6.129.49)

तस्माच्छिष्योऽस्मि ते नाहं न च मे त्वं गुरुः स्थितः । सांप्रतं स्वेच्छयाऽन्यत्र प्रयास्यामि करोषि किम्

tasmācchiṣyo'smi te nāhaṁ na ca me tvaṁ guruḥ sthitaḥ sāṁprataṁ svecchayā'nyatra prayāsyāmi karoṣi kim

"अतः अब मैं तुम्हारा शिष्य नहीं हूँ, और न ही तुम अब मेरे गुरु हो; अब मैं अपनी इच्छा से अन्यत्र जाऊँगा — तुम क्या कर सकते हो?"

श्लोक 50 (skanda.6.129.50)

एवमुक्त्वाऽथ निर्गत्य तस्मात्स्थानाच्चिरंतनात् । पप्रच्छ मानवान्भूयः सिद्धिक्षेत्राणि चासकृत्

evamuktvā'tha nirgatya tasmātsthānācciraṁtanāt papraccha mānavānbhūyaḥ siddhikṣetrāṇi cāsakṛt

ऐसा कहकर, उस चिरपरिचित स्थान से निकलकर, वह पुनः-पुनः मनुष्यों से सिद्धि-प्रदायक क्षेत्रों के विषय में पूछने लगा।

श्लोक 51 (skanda.6.129.51)

ततस्तस्य समादिष्टं क्षेत्रमेतन्मनीषिभिः । सिद्धिदं सर्वजंतूनां न वृथा स्यात्कथंचन

tatastasya samādiṣṭaṁ kṣetrametanmanīṣibhiḥ siddhidaṁ sarvajaṁtūnāṁ na vṛthā syātkathaṁcana

तत्पश्चात् विद्वानों ने उसे यह क्षेत्र बताया, जो सभी प्राणियों को सिद्धि प्रदान करने वाला है और किसी भी प्रकार व्यर्थ नहीं होता।

श्लोक 52 (skanda.6.129.52)

आस्तां तावत्तपस्तप्त्वा व्रतं नियममेव वा । हाटकेश्वरजे क्षेत्रे सिद्धिः संवसतोऽपि च

āstāṁ tāvattapastaptvā vrataṁ niyamameva vā hāṭakeśvaraje kṣetre siddhiḥ saṁvasato'pi ca

"तप, व्रत या नियम के पालन की तो बात ही क्या — हाटकेश्वर क्षेत्र में तो केवल निवास करने मात्र से ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है।"

श्लोक 53 (skanda.6.129.53)

येनयेन च भावेन तत्र क्षेत्रे वसेज्जनः । तस्यानुरूपिणी सिद्धिः शुभा स्याद्यदि वाऽशुभा

yenayena ca bhāvena tatra kṣetre vasejjanaḥ tasyānurūpiṇī siddhiḥ śubhā syādyadi vā'śubhā

"जिस-जिस भाव से मनुष्य उस क्षेत्र में निवास करता है, उसे उसी के अनुरूप सिद्धि प्राप्त होती है, चाहे वह शुभ हो या अशुभ।"

श्लोक 54 (skanda.6.129.54)

तच्छ्रुत्वा च द्रुतं प्राप्य क्षेत्रमेतद्द्विजोत्तमाः । भानुमाराधयामास स्थापयित्वा ततः परम्

tacchrutvā ca drutaṁ prāpya kṣetrametaddvijottamāḥ bhānumārādhayāmāsa sthāpayitvā tataḥ param

यह सुनकर, हे श्रेष्ठ द्विजो! वह शीघ्रता से उस क्षेत्र में पहुँचकर, वहाँ भगवान सूर्य की स्थापना करके, तत्पश्चात् उनकी आराधना करने लगा।

श्लोक 55 (skanda.6.129.55)

नियतो नियताहारो ब्रह्मचर्यपरायणः । गायत्रं न्यासमासाद्य निर्विकल्पेन चेतसा

niyato niyatāhāro brahmacaryaparāyaṇaḥ gāyatraṁ nyāsamāsādya nirvikalpena cetasā

नियमपूर्वक, नियमित आहार करते हुए, ब्रह्मचर्य में परायण होकर, गायत्री-न्यास को धारण करके, संकल्पहीन चित्त से,

श्लोक 56 (skanda.6.129.56)

ततश्च भगवांस्तुष्टो वर्षांते तमुवाच सः । दर्शने तस्य संस्थित्वा तेजः संयम्य दारुणम्

tataśca bhagavāṁstuṣṭo varṣāṁte tamuvāca saḥ darśane tasya saṁsthitvā tejaḥ saṁyamya dāruṇam

तत्पश्चात् भगवान सूर्य, वर्ष के अंत में प्रसन्न होकर, अपने भयंकर तेज को संयमित करके, उनके सामने प्रकट होकर उससे बोले।

श्लोक 57 (skanda.6.129.57)

याज्ञवल्क्य वरं ब्रूहि यत्ते मनसि रोचते । सर्वमेव प्रदास्यामि नादेयं विद्यते त्वयि

yājñavalkya varaṁ brūhi yatte manasi rocate sarvameva pradāsyāmi nādeyaṁ vidyate tvayi

"हे याज्ञवल्क्य! जो कुछ भी तुम्हारे मन को भाए, वह वर माँगो; मैं तुम्हें सब कुछ दूँगा, तुम्हारे लिए कुछ भी अदेय नहीं है।"

श्लोक 58 (skanda.6.129.58)

याज्ञवल्क्य उवाच । यदि तुष्टः सुरश्रेष्ठ वेदाध्ययनसंभवे । गुरुर्भव ममाद्यैव ममैतद्वांछितं हृदि

yājñavalkya uvāca yadi tuṣṭaḥ suraśreṣṭha vedādhyayanasaṁbhave gururbhava mamādyaiva mamaitadvāṁchitaṁ hṛdi

याज्ञवल्क्य ने कहा — "हे देवश्रेष्ठ! यदि आप वेदाध्ययन के विषय में मुझ पर प्रसन्न हैं, तो आज ही मेरे गुरु बन जाइए — मेरे हृदय में यही अभिलाषा है।"

श्लोक 59 (skanda.6.129.59)

भास्कर उवाच । अहं तव कृपाविष्टस्तेजः संहृत्य तत्परम् । ततश्चात्र समायातस्तेन नो दह्यसे द्विज

bhāskara uvāca ahaṁ tava kṛpāviṣṭastejaḥ saṁhṛtya tatparam tataścātra samāyātastena no dahyase dvija

सूर्यदेव ने कहा — "मैं तुम पर करुणा से भरा हुआ हूँ; अपने उस परम तेज को संहरण करके ही मैं यहाँ आया हूँ, जिससे तुम इससे दग्ध न हो सको, हे द्विज!"

श्लोक 60 (skanda.6.129.60)

तस्मादत्रैव कुंडे च मंत्रान्सारस्वताञ्छुभान् । वेदोक्तान्क्षेपयिष्यामि स्वयमेव द्विजोत्तम

tasmādatraiva kuṁḍe ca maṁtrānsārasvatāñchubhān vedoktānkṣepayiṣyāmi svayameva dvijottama

"अतः, हे श्रेष्ठ द्विज! मैं स्वयं ही यहाँ इस कुण्ड में वेदोक्त शुभ सारस्वत मंत्रों का निक्षेप करूँगा।"

श्लोक 61 (skanda.6.129.61)

तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा यत्किंचिद्वेदसंभवम् । पठिष्यसि सकृत्तत्ते कंठस्थं संभविष्यति

tatra snātvā śucirbhūtvā yatkiṁcidvedasaṁbhavam paṭhiṣyasi sakṛttatte kaṁṭhasthaṁ saṁbhaviṣyati

"वहाँ स्नान करके, शुद्ध होकर, वेद से संबंधित जो भी कुछ तुम एक बार पढ़ोगे, वह तुम्हारे कंठ में स्थिर हो जाएगा।"

श्लोक 62 (skanda.6.129.62)

तत्त्वार्थं प्रकटं कृत्स्नं विदितं ते भविष्यति । मत्प्रसादान्न संदेहः सत्यमेतन्मयोदितम्

tattvārthaṁ prakaṭaṁ kṛtsnaṁ viditaṁ te bhaviṣyati matprasādānna saṁdehaḥ satyametanmayoditam

"तत्त्व का संपूर्ण अर्थ तुम्हें स्पष्ट रूप से ज्ञात हो जाएगा; मेरी कृपा से इसमें कोई संदेह नहीं, यह मैंने सत्य ही कहा है।"

श्लोक 63 (skanda.6.129.63)

अद्यादि मानवः प्रातः स्नात्वा त्वत्र ह्रदे च यः । सावित्रेण च सूक्तेन मां दृष्ट्वा प्रपठिष्यति । तस्मै तत्स्यादसंदिग्धं यत्तवोक्तं मया द्विज

adyādi mānavaḥ prātaḥ snātvā tvatra hrade ca yaḥ sāvitreṇa ca sūktena māṁ dṛṣṭvā prapaṭhiṣyati tasmai tatsyādasaṁdigdhaṁ yattavoktaṁ mayā dvija

"आज से जो भी मनुष्य प्रातःकाल यहाँ इस सरोवर में स्नान करके, सावित्री सूक्त के द्वारा मुझे देखकर पाठ करेगा, उसके लिए भी, हे द्विज! निःसंदेह वही सब कुछ सिद्ध होगा जो मैंने तुमसे कहा है।"

श्लोक 64 (skanda.6.129.64)

याज्ञवल्क्य उवाच । एवं भवतु देवेश यत्त्वयोक्तं वचोऽखिलम् । परं मम वचोऽन्यच्च तच्छृणुष्व ब्रवीमि ते

yājñavalkya uvāca evaṁ bhavatu deveśa yattvayoktaṁ vaco'khilam paraṁ mama vaco'nyacca tacchṛṇuṣva bravīmi te

याज्ञवल्क्य ने कहा — "हे देवेश! जो कुछ भी आपने कहा है, वह सब वैसा ही हो; किंतु मेरी एक और बात भी है, उसे सुनिए, मैं आपसे कहता हूँ।"

श्लोक 65 (skanda.6.129.65)

नाहं मनुष्यधर्माणमुपाध्यायं कथंचन । करिष्यामि जगन्नाथ कृपां कुरु ममोपरि

nāhaṁ manuṣyadharmāṇamupādhyāyaṁ kathaṁcana kariṣyāmi jagannātha kṛpāṁ kuru mamopari

"मैं किसी भी प्रकार से किसी मनुष्य-धर्मी उपाध्याय को अपना गुरु नहीं बनाऊँगा, हे जगन्नाथ! मुझ पर कृपा कीजिए।"

श्लोक 66 (skanda.6.129.66)

ततस्तस्या ददौ सूर्यो लघिमा नाम शोभनाम् । विद्यां हि तत्प्रभावाय सुतुष्टेनांतरात्मना

tatastasyā dadau sūryo laghimā nāma śobhanām vidyāṁ hi tatprabhāvāya sutuṣṭenāṁtarātmanā

तत्पश्चात् सूर्यदेव ने उसे, अत्यंत संतुष्ट अंतःकरण से, अपनी शक्ति के प्रभाव के लिए 'लघिमा' नामक सुंदर विद्या प्रदान की।

श्लोक 67 (skanda.6.129.67)

ततस्तं प्राह कर्णांते ममाश्वानां प्रविश्य वै । अभ्यासं कुरु विद्यानां वेदाध्ययनमाचर

tatastaṁ prāha karṇāṁte mamāśvānāṁ praviśya vai abhyāsaṁ kuru vidyānāṁ vedādhyayanamācara

तत्पश्चात् उन्होंने उससे कहा, "मेरे अश्व के कान में प्रवेश करके, विद्याओं का अभ्यास करो, वेद का अध्ययन करो।"

श्लोक 68 (skanda.6.129.68)

मन्मुखाद्ब्राह्मणश्रेष्ठ यद्येतत्तव वांछितम् । न ते स्याद्येन दोषोऽयं मम रश्मिसमुद्भवः

manmukhādbrāhmaṇaśreṣṭha yadyetattava vāṁchitam na te syādyena doṣo'yaṁ mama raśmisamudbhavaḥ

"हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! यदि यह तुम्हारी इच्छा है कि यह मेरे ही मुख से हो — तो ऐसा करो कि मेरी किरणों से उत्पन्न यह दोष तुम्हें कभी बाधित न करे।"

श्लोक 69 (skanda.6.129.69)

एवमुक्तः स तेनाथ वाजिकर्णं समाश्रितः । लघुर्भूत्वाऽपठद्वेदान्भास्करस्य मुखात्ततः

evamuktaḥ sa tenātha vājikarṇaṁ samāśritaḥ laghurbhūtvā'paṭhadvedānbhāskarasya mukhāttataḥ

इस प्रकार उनके द्वारा कहे जाने पर, वह उनके अश्व के कान का आश्रय लेकर, लघु रूप धारण करके, तत्पश्चात् भास्कर के मुख से वेदों का अध्ययन करने लगा।

श्लोक 70 (skanda.6.129.70)

एवं सिद्धिं समापन्नो याज्ञवल्क्यो द्विजोत्तमाः । कृत्वोपनिषदं चारु वेदार्थैः सकलैर्युतम्

evaṁ siddhiṁ samāpanno yājñavalkyo dvijottamāḥ kṛtvopaniṣadaṁ cāru vedārthaiḥ sakalairyutam

इस प्रकार सिद्धि को प्राप्त हुए याज्ञवल्क्य ने, हे श्रेष्ठ द्विजो! समस्त वेदार्थों से युक्त एक सुंदर उपनिषद की रचना की,

श्लोक 71 (skanda.6.129.71)

जनकाय नरेंद्राय व्याख्याय च ततः परम् । कात्यायनं सुतं प्राप्य वेदसूत्रस्य कारकम्

janakāya nareṁdrāya vyākhyāya ca tataḥ param kātyāyanaṁ sutaṁ prāpya vedasūtrasya kārakam

और तत्पश्चात् राजा जनक को उसका उपदेश देकर, फिर वेदसूत्र के रचयिता कात्यायन नामक पुत्र को प्राप्त कर,

श्लोक 72 (skanda.6.129.72)

त्यक्त्वा कलेवरं तत्र ब्रह्मद्वारि विनिर्मिते । तत्तेजो ब्रह्मणो गात्रे योजयामास शक्तितः

tyaktvā kalevaraṁ tatra brahmadvāri vinirmite tattejo brahmaṇo gātre yojayāmāsa śaktitaḥ

वहीं ब्रह्मद्वार में निर्मित उस स्थान में अपना शरीर त्याग दिया, और अपने उस तेज को अपनी शक्ति के अनुसार ब्रह्मा के शरीर में मिला दिया।

श्लोक 73 (skanda.6.129.73)

तस्य तीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा तं च दिवाकरम् । नादबिंदुं पठित्वा च तदग्रे मुक्तिमाप्नुयात्

tasya tīrthe naraḥ snātvā dṛṣṭvā taṁ ca divākaram nādabiṁduṁ paṭhitvā ca tadagre muktimāpnuyāt

उनके उस तीर्थ में जो मनुष्य स्नान करके, उन भगवान सूर्य का दर्शन करके, नाद-बिंदु का पाठ करता है, वह उनके समक्ष ही मुक्ति को प्राप्त हो जाता है।

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