नागर खण्ड · अध्याय 130
पञ्चपिण्डा-गौरी-उत्पत्ति का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.130.1)
ऋषय ऊचुः । याज्ञवल्क्यसुतः सूत यस्त्वया परिकीर्तितः । कतमा तस्य माताभूत्सर्वं नो ब्रूहि विस्तरात्
ṛṣaya ūcuḥ yājñavalkyasutaḥ sūta yastvayā parikīrtitaḥ katamā tasya mātābhūtsarvaṁ no brūhi vistarāt
ऋषियों ने कहा — हे सूत! जिस याज्ञवल्क्य-पुत्र का आपने वर्णन किया, उसकी माता कौन थी? यह सब हमें विस्तारपूर्वक बताइए।
श्लोक 2 (skanda.6.130.2)
सूत उवाच । तस्य भार्याद्वयं श्रेष्ठमासीत्सर्वगुणान्वितम् । एका गुणवती तस्य मैत्रेयीति प्रकीर्तिता
sūta uvāca tasya bhāryādvayaṁ śreṣṭhamāsītsarvaguṇānvitam ekā guṇavatī tasya maitreyīti prakīrtitā
सूत जी ने कहा — उनकी दो श्रेष्ठ पत्नियाँ थीं, दोनों ही समस्त गुणों से युक्त; उनमें एक गुणवती मैत्रेयी नाम से विख्यात थी।
श्लोक 3 (skanda.6.130.3)
ज्येष्ठा चान्याथ कल्याणी ख्याता कात्यायनीति च । यस्याः कात्यायनः पुत्रो वेदार्थानां प्रजल्पकः
jyeṣṭhā cānyātha kalyāṇī khyātā kātyāyanīti ca yasyāḥ kātyāyanaḥ putro vedārthānāṁ prajalpakaḥ
दूसरी, ज्येष्ठा और कल्याणी, कात्यायनी नाम से विख्यात थी, जिसका पुत्र कात्यायन वेदार्थों का विवेचक हुआ।
श्लोक 4 (skanda.6.130.4)
ताभ्यां कुण्डद्वयं तत्र संतिष्ठति सुशोभनम् । यत्र स्नाता नरा यांति लोकांस्तांश्च महोदयान्
tābhyāṁ kuṇḍadvayaṁ tatra saṁtiṣṭhati suśobhanam yatra snātā narā yāṁti lokāṁstāṁśca mahodayān
उन दोनों से संबंधित दो सुंदर कुण्ड वहाँ स्थित हैं, जहाँ स्नान करके मनुष्य महान उदयशाली लोकों को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 5 (skanda.6.130.5)
कात्यायन्याश्च तीर्थस्य शांडिल्यास्तीर्थमुत्तमम् । पतिव्रतात्वयुक्तायास्तथान्यत्तत्र संस्थितम्
kātyāyanyāśca tīrthasya śāṁḍilyāstīrthamuttamam pativratātvayuktāyāstathānyattatra saṁsthitam
कात्यायनी के तीर्थ के साथ ही शांडिली का भी उत्तम तीर्थ है, तथा एक और तीर्थ भी वहाँ स्थित है, जो पतिव्रता-धर्म से रहित स्त्री से संबंधित है।
श्लोक 6 (skanda.6.130.6)
यत्र कात्यायनी प्राप्ता शांडिल्या प्रतिबोधिता । वैराग्यं परमं प्राप्ता सपत्नीदुःखदुःखिता
yatra kātyāyanī prāptā śāṁḍilyā pratibodhitā vairāgyaṁ paramaṁ prāptā sapatnīduḥkhaduḥkhitā
जहाँ कात्यायनी पहुँची और शांडिली द्वारा उसे बोध दिया गया, तथा सपत्नी के दुःख से पीड़ित होकर वह परम वैराग्य को प्राप्त हुई।
श्लोक 7 (skanda.6.130.7)
तत्र या कुरुते स्नानं तृतीयायां समाहिता । नारी मार्गसिते पक्षे सा सौभाग्यवती भवेत् । अथ दौर्भाग्यसंपन्ना काणा वृद्धाऽथ वामना । अभीष्टा जायते सा च तत्प्रभावाद्द्विजोत्तमाः
tatra yā kurute snānaṁ tṛtīyāyāṁ samāhitā nārī mārgasite pakṣe sā saubhāgyavatī bhavet atha daurbhāgyasaṁpannā kāṇā vṛddhā'tha vāmanā abhīṣṭā jāyate sā ca tatprabhāvāddvijottamāḥ
वहाँ जो स्त्री एकाग्रचित्त होकर मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को स्नान करती है, वह सौभाग्यवती हो जाती है। और यदि वह दुर्भाग्यशाली, काणी, वृद्धा या बौनी भी हो, तो भी, हे श्रेष्ठ द्विजो! वह उसी के प्रभाव से इच्छित रूप प्राप्त कर लेती है।
श्लोक 8 (skanda.6.130.8)
ऋषय ऊचुः । कीदृक्सपत्निजं दुःखं कात्यायन्या उपस्थितम् । उपदेशः कथं लब्धः शांडिल्याः सूत कीदृशः
ṛṣaya ūcuḥ kīdṛksapatnijaṁ duḥkhaṁ kātyāyanyā upasthitam upadeśaḥ kathaṁ labdhaḥ śāṁḍilyāḥ sūta kīdṛśaḥ
ऋषियों ने कहा — कात्यायनी को सपत्नी से उत्पन्न कैसा दुःख प्राप्त हुआ था? और, हे सूत, शांडिली से उसे किस प्रकार का उपदेश मिला?
श्लोक 9 (skanda.6.130.9)
कात्यायन्या समाचक्ष्व कौतुकं नो व्यवस्थितम् । सामान्यो भविता नैष उपदेशस्तयेरितः
kātyāyanyā samācakṣva kautukaṁ no vyavasthitam sāmānyo bhavitā naiṣa upadeśastayeritaḥ
कात्यायनी के विषय में हमें यह कुतूहलपूर्ण घटना बताइए; यह उपदेश उसे कोई साधारण उपदेश नहीं दिया गया था।
श्लोक 10 (skanda.6.130.10)
सूत उवाच । मैत्रेय्या सह संसक्तं याज्ञवल्क्यं विलोक्य सा । कात्यायनी सुदुःखार्ता संजाता चेर्ष्यया ततः
sūta uvāca maitreyyā saha saṁsaktaṁ yājñavalkyaṁ vilokya sā kātyāyanī suduḥkhārtā saṁjātā cerṣyayā tataḥ
सूत जी ने कहा — मैत्रेयी के साथ आसक्त याज्ञवल्क्य को देखकर, वह कात्यायनी अत्यंत दुःखी हो उठी और ईर्ष्या से भर गई।
श्लोक 11 (skanda.6.130.11)
सा न स्नाति न भुंक्ते च न हास्यं कुरुते क्वचित् । केवलं बाष्पपूर्णाक्षी निःश्वासाढ्या बभूव ह
sā na snāti na bhuṁkte ca na hāsyaṁ kurute kvacit kevalaṁ bāṣpapūrṇākṣī niḥśvāsāḍhyā babhūva ha
वह न स्नान करती, न भोजन करती, न कहीं भी हँसती; केवल आँसुओं से भरे नेत्रों वाली, दीर्घ निःश्वास लेती हुई ही रह गई।
श्लोक 12 (skanda.6.130.12)
ततः कदाचिदेवाथ फलार्थं निर्गता बहिः । अपश्यच्छांडिलीनाम पतिपार्श्वे व्यवस्थिताम्
tataḥ kadācidevātha phalārthaṁ nirgatā bahiḥ apaśyacchāṁḍilīnāma patipārśve vyavasthitām
तत्पश्चात् एक बार फल की तलाश में बाहर निकली, तो उसने शांडिली नामक स्त्री को अपने पति के पास स्थित देखा,
श्लोक 13 (skanda.6.130.13)
कृतांजलिपुटां साध्वी विनयावनता स्थिताम् । सोऽपि तस्या मुखासक्तः सानुरागः प्रसन्नदृक्
kṛtāṁjalipuṭāṁ sādhvī vinayāvanatā sthitām so'pi tasyā mukhāsaktaḥ sānurāgaḥ prasannadṛk
हाथ जोड़े हुए, विनम्रतापूर्वक झुकी हुई, सती की भाँति स्थित; और वह पति भी उसके मुख पर आसक्त, प्रेमपूर्ण और प्रसन्न दृष्टि वाला था।
श्लोक 14 (skanda.6.130.14)
गुणदोषोद्भवां वार्तामापृच्छ्याकथयत्तथा । सा च तौ दंपती दृष्ट्वा संहृष्टावितरेतरम्
guṇadoṣodbhavāṁ vārtāmāpṛcchyākathayattathā sā ca tau daṁpatī dṛṣṭvā saṁhṛṣṭāvitaretaram
वह उससे गुण-दोष से संबंधित बातें पूछकर बताता था; और वह उन दोनों पति-पत्नी को परस्पर प्रसन्नचित्त देखकर,
श्लोक 15 (skanda.6.130.15)
चित्ते स्वे चिंतयामास सुधन्येयं तपस्विनी । यस्याः पतिर्मुखासक्तो गुणदोषप्रजल्पकः । सानुरागश्च सुस्निग्धो नान्यां नारीं बिभर्त्ति च
citte sve ciṁtayāmāsa sudhanyeyaṁ tapasvinī yasyāḥ patirmukhāsakto guṇadoṣaprajalpakaḥ sānurāgaśca susnigdho nānyāṁ nārīṁ bibhartti ca
अपने मन में सोचने लगी, "यह तपस्विनी कितनी सौभाग्यशाली है, जिसका पति उसके मुख पर आसक्त रहता है, उसी से गुण-दोष की बातें करता है,"
श्लोक 16 (skanda.6.130.16)
एवं संचित्य सा साध्वी भूयोभूयो द्विजोत्तमाः । जगाम स्वाश्रमं पश्चान्निंद्यमाना स्वकं वपुः
evaṁ saṁcitya sā sādhvī bhūyobhūyo dvijottamāḥ jagāma svāśramaṁ paścānniṁdyamānā svakaṁ vapuḥ
"तथा प्रेमपूर्ण और अत्यंत स्नेहशील होकर किसी अन्य स्त्री को नहीं रखता।" इस प्रकार बार-बार यह सोचकर, हे श्रेष्ठ द्विजो! वह साध्वी, अपने ही शरीर की निंदा करती हुई,
श्लोक 17 (skanda.6.130.17)
ततः कदाचिदेकांते स्थितां तां शांडिलीं द्विजाः । बहिर्गते भर्तरि च तस्याः कार्येण केनचित्
tataḥ kadācidekāṁte sthitāṁ tāṁ śāṁḍilīṁ dvijāḥ bahirgate bhartari ca tasyāḥ kāryeṇa kenacit
तत्पश्चात् अपने ही आश्रम को लौट गई। फिर एक बार जब वह शांडिली अकेली स्थित थी, अपने पति के किसी कार्य से बाहर चले जाने पर,
श्लोक 18 (skanda.6.130.18)
कात्यायनी समागम्य ततः पप्रच्छ सादरम् । वद कल्याणि मे कंचिदुपदेशं महोदयम्
kātyāyanī samāgamya tataḥ papraccha sādaram vada kalyāṇi me kaṁcidupadeśaṁ mahodayam
कात्यायनी उसके पास आकर आदरपूर्वक पूछने लगी, "हे कल्याणी! मुझे कोई महान उपदेश बताओ,"
श्लोक 19 (skanda.6.130.19)
मुखप्रेक्षः सदा भर्त्ता येन स्त्रीणां प्रजायते । नापमानं करोत्येव दुरुक्तवचनैः क्वचित्
mukhaprekṣaḥ sadā bharttā yena strīṇāṁ prajāyate nāpamānaṁ karotyeva duruktavacanaiḥ kvacit
"जिससे कि पति सदा अपनी पत्नी के मुख को ही देखने वाला हो, कठोर वचनों से कभी उसका अपमान न करे,"
श्लोक 20 (skanda.6.130.20)
नान्यां संगच्छते नारीं चित्तेनापि कथंचन । अहं भर्तुः कृतैर्दुःखैरतीव परिपीडिता । सपत्नीजैर्विशेषेण तस्मान्मे त्वं प्रकीर्तय
nānyāṁ saṁgacchate nārīṁ cittenāpi kathaṁcana ahaṁ bhartuḥ kṛtairduḥkhairatīva paripīḍitā sapatnījairviśeṣeṇa tasmānme tvaṁ prakīrtaya
"और मन से भी किसी अन्य स्त्री की ओर कभी न झुके। मैं अपने पति द्वारा दिए गए दुःखों से, विशेष रूप से सपत्नियों के कारण, अत्यंत पीड़ित हूँ; अतः तुम मुझे यह बताओ,"
श्लोक 21 (skanda.6.130.21)
यथा ते वशगो भर्त्ता संजातः कामदः सदा । मनसापि न संदध्यान्नारीमेष कथंचन
yathā te vaśago bharttā saṁjātaḥ kāmadaḥ sadā manasāpi na saṁdadhyānnārīmeṣa kathaṁcana
"जिससे तुम्हारा पति सदा तुम्हारे वश में रहकर, तुम्हारी सभी इच्छाएँ पूर्ण करने वाला बन गया है — मन से भी वह किसी अन्य स्त्री का चिंतन कभी नहीं करता।"
श्लोक 22 (skanda.6.130.22)
शांडिल्युवाच । शृणु साध्वि प्रवक्ष्यामि तवाहं गुह्यमुत्तमम् । यथा ममाभवद्वश्यो मुखप्रेक्षस्तथा पतिः
śāṁḍilyuvāca śṛṇu sādhvi pravakṣyāmi tavāhaṁ guhyamuttamam yathā mamābhavadvaśyo mukhaprekṣastathā patiḥ
शांडिली ने कहा — "हे साध्वी! सुनो, मैं तुम्हें अपना यह परम गुह्य रहस्य बताती हूँ — किस प्रकार मेरा पति मेरे वश में हुआ और सदा मेरे ही मुख को देखने वाला बना।"
श्लोक 23 (skanda.6.130.23)
मम तातः कुरुक्षेत्रे शांडिल्यो मुनिसत्तमः । वानप्रस्थाश्रमेऽतिष्ठत्पूर्वे वयसि संस्थितः
mama tātaḥ kurukṣetre śāṁḍilyo munisattamaḥ vānaprasthāśrame'tiṣṭhatpūrve vayasi saṁsthitaḥ
"मेरे पिता कुरुक्षेत्र में शांडिल्य नामक श्रेष्ठ मुनि थे, जो वानप्रस्थ आश्रम में जीवन के पूर्व भाग में ही रहते थे।"
श्लोक 24 (skanda.6.130.24)
तत्रैकाहं समुत्पन्ना कन्या तस्य महात्मनः । वृद्धिं गता क्रमेणाथ तस्मिन्नेव तपोवने
tatraikāhaṁ samutpannā kanyā tasya mahātmanaḥ vṛddhiṁ gatā krameṇātha tasminneva tapovane
"वहाँ मैं उस महात्मा की एकमात्र कन्या के रूप में उत्पन्न हुई, और उसी तपोवन में क्रमशः बड़ी होती गई।"
श्लोक 25 (skanda.6.130.25)
करोमि तत्र शुश्रूषां होमकाले यथोचिताम् । नीवारादीनि धान्यानि नित्यं चैवानयाम्यहम्
karomi tatra śuśrūṣāṁ homakāle yathocitām nīvārādīni dhānyāni nityaṁ caivānayāmyaham
"मैं वहाँ होम के समय उचित सेवा करती थी, तथा नीवार आदि अनाज नित्य लाया करती थी।"
श्लोक 26 (skanda.6.130.26)
कस्यचित्त्वथ कालस्य नारदो मुनिसत्तमः । आश्रमे मम तातस्य सुश्रांतः समुपागतः
kasyacittvatha kālasya nārado munisattamaḥ āśrame mama tātasya suśrāṁtaḥ samupāgataḥ
"कुछ समय बाद देवर्षि नारद अत्यंत थके हुए मेरे पिता के आश्रम में आ पहुँचे।"
श्लोक 27 (skanda.6.130.27)
तातादेशात्ततस्तत्र मया स विश्रमः कृतः । पादशौचादिभिः कृत्यैः स्नानाद्यैश्च तथापरैः
tātādeśāttatastatra mayā sa viśramaḥ kṛtaḥ pādaśaucādibhiḥ kṛtyaiḥ snānādyaiśca tathāparaiḥ
"पिता की आज्ञा से मैंने वहाँ उनका विश्राम-प्रबंध किया, पैर धोने आदि कार्यों से तथा स्नान आदि अन्य क्रियाओं से।"
श्लोक 28 (skanda.6.130.28)
ततो भुक्तावसानेऽथ निविष्टः मुखसंस्थित । मम मात्रा परिपृष्टो विनयाद्वरवर्णिनि
tato bhuktāvasāne'tha niviṣṭaḥ mukhasaṁsthita mama mātrā paripṛṣṭo vinayādvaravarṇini
"तत्पश्चात् भोजन के अंत में, मुख के निकट बैठे हुए उन्होंने मेरी माता से विनयपूर्वक पूछा, हे वरवर्णिनि,"
श्लोक 29 (skanda.6.130.29)
एकेयं कन्यकास्माकं जाते वयसि संस्थिते । संजाता मुनिशार्दूल प्राणेभ्योऽपि गरीयसी
ekeyaṁ kanyakāsmākaṁ jāte vayasi saṁsthite saṁjātā muniśārdūla prāṇebhyo'pi garīyasī
"'यह हमारी अकेली कन्या, अब उचित आयु को प्राप्त हो चुकी, हे मुनिश्रेष्ठ! हमारे प्राणों से भी अधिक प्रिय है।'"
श्लोक 30 (skanda.6.130.30)
तदस्याः कीर्तय क्षिप्रं सुखोपायं सुखोदयम् । व्रतं वा नियमं वा त्वं होमं वा मन्त्रमेव वा
tadasyāḥ kīrtaya kṣipraṁ sukhopāyaṁ sukhodayam vrataṁ vā niyamaṁ vā tvaṁ homaṁ vā mantrameva vā
"'अतः शीघ्र इसके लिए सुख का ऐसा साधन बताओ, जो सुख उत्पन्न करने वाला हो — व्रत हो, नियम हो, होम हो, या फिर कोई मंत्र ही क्यों न हो,'"
श्लोक 31 (skanda.6.130.31)
येन चीर्णेन भर्त्ता स्यात्सुसौम्यः सद्गुणान्वितः । प्रियंवदो मुखप्रेक्षः परनारीपराङ्मुखः
yena cīrṇena bharttā syātsusaumyaḥ sadguṇānvitaḥ priyaṁvado mukhaprekṣaḥ paranārīparāṅmukhaḥ
"'जिसके पालन से इसका पति अत्यंत सौम्य, सद्गुणों से युक्त, मधुरभाषी, इसके मुख को ही देखने वाला और परायी स्त्री से विमुख हो जाए।'"
श्लोक 32 (skanda.6.130.32)
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा स मुनिस्तदनंतरम् । चिरं ध्यात्वा वचः प्राह प्रसन्नवदनस्ततः
tasyāstadvacanaṁ śrutvā sa munistadanaṁtaram ciraṁ dhyātvā vacaḥ prāha prasannavadanastataḥ
"उसका वह वचन सुनकर, वे मुनि उसके पश्चात् बहुत देर तक ध्यानमग्न रहकर, तत्पश्चात् प्रसन्न मुख से यह वचन बोले।"
श्लोक 33 (skanda.6.130.33)
हाटकेश्वरजे क्षेत्रे पञ्चपिंडा व्यवस्थिता । गौरी गौर्या स्वयं तत्र स्थापिता परमेश्वरी
hāṭakeśvaraje kṣetre pañcapiṁḍā vyavasthitā gaurī gauryā svayaṁ tatra sthāpitā parameśvarī
"'हाटकेश्वर क्षेत्र में पंचपिंडा नाम से एक देवी स्थापित हैं — गौरी ने स्वयं वहाँ अपने ही रूप में परमेश्वरी की स्थापना की है।'"
श्लोक 34 (skanda.6.130.34)
तामेषा वत्सरं यावच्छ्रद्धया परया युता । सदा पूजयतु प्रीत्या तृतीयायां विशेषतः
tāmeṣā vatsaraṁ yāvacchraddhayā parayā yutā sadā pūjayatu prītyā tṛtīyāyāṁ viśeṣataḥ
"'इसे यह कन्या एक वर्ष तक परम श्रद्धा से युक्त होकर, विशेष रूप से तृतीया के दिन, प्रेमपूर्वक सदा पूजा करे।'"
श्लोक 35 (skanda.6.130.35)
ततो वर्षांतमासाद्य संप्राप्स्यति यथोचितम् । भर्त्तारं नात्र संदेहो यादृग्रूपं यथोचितम्
tato varṣāṁtamāsādya saṁprāpsyati yathocitam bharttāraṁ nātra saṁdeho yādṛgrūpaṁ yathocitam
"'तत्पश्चात् वर्ष के पूर्ण होने पर वह उचित रूप वाला वैसा ही पति निःसंदेह प्राप्त कर लेगी।'"
श्लोक 36 (skanda.6.130.36)
तत्र पूर्वं गता गौरी परित्यज्य महेश्वरम् । गंगेर्ष्यया महाभागे ज्ञात्वा क्षेत्रं सुसिद्धिदम्
tatra pūrvaṁ gatā gaurī parityajya maheśvaram gaṁgerṣyayā mahābhāge jñātvā kṣetraṁ susiddhidam
"पहले वहाँ गौरी ही महेश्वर को त्यागकर पहुँची थीं, गंगा के प्रति ईर्ष्या के कारण, यह जानकर कि वह क्षेत्र अत्यंत सिद्धिदायक है।"
श्लोक 37 (skanda.6.130.37)
ततः सा चिंतयामास कां देवीं पूजयाम्यहम् । सौभाग्यार्थं यतोऽन्या मां पूजयंति सुरस्त्रियः
tataḥ sā ciṁtayāmāsa kāṁ devīṁ pūjayāmyaham saubhāgyārthaṁ yato'nyā māṁ pūjayaṁti surastriyaḥ
"तब उन्होंने सोचा, 'मैं किस देवी की पूजा करूँ, क्योंकि सौभाग्य के लिए तो अन्य देवियाँ मेरी ही पूजा करती हैं।'"
श्लोक 38 (skanda.6.130.38)
तस्मादहं प्रभक्त्याढ्या स्वयमात्मानमेव च । आत्मनैव कृतोत्साहा पूजयिष्यामि सिद्धये
tasmādahaṁ prabhaktyāḍhyā svayamātmānameva ca ātmanaiva kṛtotsāhā pūjayiṣyāmi siddhaye
"'अतः मैं ही, भक्ति से युक्त होकर, स्वयं अपनी ही आराधना करूँगी, अपने ही उत्साह से सिद्धि के लिए स्वयं को पूजूँगी।'"
श्लोक 39 (skanda.6.130.39)
ततः प्राणाग्निहोत्रोत्थैर्मंत्रैराथर्वणैः शुभैः । मृत्पिंडान्पंच संयोज्य ह्येकस्थाने समाहिता
tataḥ prāṇāgnihotrotthairmaṁtrairātharvaṇaiḥ śubhaiḥ mṛtpiṁḍānpaṁca saṁyojya hyekasthāne samāhitā
"तत्पश्चात् प्राणाग्निहोत्र से उत्पन्न शुभ आथर्वण मंत्रों से, पाँच मिट्टी के पिंडों को एक स्थान पर स्थापित करके, एकाग्रचित्त होकर,"
श्लोक 40 (skanda.6.130.40)
पृथ्वीमपश्च तेजश्च वायुमाकाशमेव च । तेषु संयोजयामास मृत्पिंडेषु निधाय सा
pṛthvīmapaśca tejaśca vāyumākāśameva ca teṣu saṁyojayāmāsa mṛtpiṁḍeṣu nidhāya sā
"उन्होंने पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश — इन पाँच महाभूतों को उन मिट्टी के पिंडों में स्थापित करके उनसे जोड़ दिया।"
श्लोक 41 (skanda.6.130.41)
महद्भूतानि चैतानि पञ्च देवी यतव्रता । ततः संपूजयामास पुष्पधूपानुलेपनैः
mahadbhūtāni caitāni pañca devī yatavratā tataḥ saṁpūjayāmāsa puṣpadhūpānulepanaiḥ
"इस प्रकार व्रतपरायण उस देवी ने इन पाँच महाभूतों की, तत्पश्चात् पुष्प, धूप और चंदन-लेपन से पूजा की।"
श्लोक 42 (skanda.6.130.42)
अथ तां तत्र विज्ञाय तपःस्थां गिरजां भवः । तन्मंत्राकृष्टचित्तश्च सत्वरं समुपागतः
atha tāṁ tatra vijñāya tapaḥsthāṁ girajāṁ bhavaḥ tanmaṁtrākṛṣṭacittaśca satvaraṁ samupāgataḥ
इसी बीच तपस्या में लीन उस गिरिजा को वहाँ जानकर, शिव भी उसके उस मंत्र से आकर्षित चित्त होकर, शीघ्रता से वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 43 (skanda.6.130.43)
प्रोवाच च प्रहृष्टात्मा कस्मात्त्वमिह चागता । मां मुक्त्वा दोषनिर्मुक्तं मुखप्रेक्षं सदा रतम्
provāca ca prahṛṣṭātmā kasmāttvamiha cāgatā māṁ muktvā doṣanirmuktaṁ mukhaprekṣaṁ sadā ratam
अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने कहा, "तुम यहाँ किसलिए आई हो, मुझे छोड़कर, जो सर्वदोष-रहित है और सदा तुम्हारे ही मुख को देखने वाला है?"
श्लोक 44 (skanda.6.130.44)
तस्मादागच्छ कैलासं वृषारूढा मया सह । अथवा कारणं ब्रूहि यदि दोषोऽस्ति मे क्वचित्
tasmādāgaccha kailāsaṁ vṛṣārūḍhā mayā saha athavā kāraṇaṁ brūhi yadi doṣo'sti me kvacit
"अतः मेरे साथ वृषभ पर आरूढ़ होकर कैलास चलो; अथवा यदि मुझमें कहीं कोई दोष है, तो उसका कारण मुझे बताओ।"
श्लोक 45 (skanda.6.130.45)
देव्युवाच । त्वं मूर्ध्ना जाह्नवीं धत्से मूर्तां पदजलात्मिकाम् । तस्मान्नाहं गमिष्यामि मंदिरं ते कथंचन
devyuvāca tvaṁ mūrdhnā jāhnavīṁ dhatse mūrtāṁ padajalātmikām tasmānnāhaṁ gamiṣyāmi maṁdiraṁ te kathaṁcana
देवी ने कहा — "आप अपने मस्तक पर मूर्तिमती गंगा को, जो जल के रूप में आपके ही चरणों से उत्पन्न है, धारण करते हैं; अतः मैं आपके भवन में किसी भी प्रकार से नहीं जाऊँगी।"
श्लोक 46 (skanda.6.130.46)
यावन्न त्यजसि व्यक्तं मम सापत्न्यतां गताम् । तथा नित्यं प्रणामं त्वं करोषि वृषभध्वज
yāvanna tyajasi vyaktaṁ mama sāpatnyatāṁ gatām tathā nityaṁ praṇāmaṁ tvaṁ karoṣi vṛṣabhadhvaja
"जब तक आप स्पष्ट रूप से मेरी सौत बनी हुई उसे त्याग नहीं देते, तब तक भी, हे वृषभध्वज! आप उसे नित्य प्रणाम करते रहते हैं।"
श्लोक 47 (skanda.6.130.47)
प्रत्यक्षमपि मे नित्यं संध्यायाश्च न लज्जसे । तस्मादेतत्परित्यज्य कर्म लज्जाकरं परम्
pratyakṣamapi me nityaṁ saṁdhyāyāśca na lajjase tasmādetatparityajya karma lajjākaraṁ param
"आप मेरे सामने नित्य ही उससे संध्या करते हुए भी लज्जित नहीं होते; अतः इस अत्यंत लज्जाजनक कार्य को त्यागकर,"
श्लोक 48 (skanda.6.130.48)
आकारयसि मां देव तत्स्याद्यदि मतं मम । अन्यथाहं न यास्यामि तव हर्म्ये कथंचन । एतच्छ्रुत्वा यदिष्टं ते कुरुष्व वृषभध्वज
ākārayasi māṁ deva tatsyādyadi mataṁ mama anyathāhaṁ na yāsyāmi tava harmye kathaṁcana etacchrutvā yadiṣṭaṁ te kuruṣva vṛṣabhadhvaja
"हे देव! यदि यह मेरी बात आपको स्वीकार हो, तभी आप मुझे बुलाइए; अन्यथा मैं आपके भवन में किसी भी प्रकार नहीं जाऊँगी।" यह सुनकर, हे वृषभध्वज! जो आपको उचित लगे, वही कीजिए।
श्लोक 49 (skanda.6.130.49)
देव उवाच । नाहं सौख्येन तां गंगां धारयामि सुरेश्वरि
deva uvāca nāhaṁ saukhyena tāṁ gaṁgāṁ dhārayāmi sureśvari
देव ने कहा — "हे सुरेश्वरि! मैं सुखपूर्वक अपनी इच्छा से उस गंगा को धारण नहीं करता।"
श्लोक 50 (skanda.6.130.50)
भगीरथेन भूपेन प्रार्थितो ज्ञाति कारणात् । दिव्यं वर्षसहस्रं तु तपस्तप्त्वा सुदारुणम्
bhagīrathena bhūpena prārthito jñāti kāraṇāt divyaṁ varṣasahasraṁ tu tapastaptvā sudāruṇam
"भगीरथ राजा ने अपने कुल के उद्धार के कारण मुझसे यह प्रार्थना की थी, और तत्पश्चात् उसने दिव्य सहस्र वर्षों तक अत्यंत भीषण तप किया था,"
श्लोक 51 (skanda.6.130.51)
येन नो याति पातालं गंगा स्वर्गपरिच्युता । तस्मात्त्वं देव मद्वाक्यात्स्वमूर्ध्ना वह जाह्नवीम्
yena no yāti pātālaṁ gaṁgā svargaparicyutā tasmāttvaṁ deva madvākyātsvamūrdhnā vaha jāhnavīm
"जिससे स्वर्ग से च्युत हुई वह गंगा पाताल तक न पहुँच जाए; अतः, हे देवि! तुम मेरे ही वचन से यह जान लो कि मैं अपने मस्तक पर जाह्नवी को धारण करता हूँ,"
श्लोक 52 (skanda.6.130.52)
मया तस्य प्रतिज्ञातं धारयिष्याम्यसंशयम् । आकाशाज्जाह्नवीवेगं पतंतं धरणीतले
mayā tasya pratijñātaṁ dhārayiṣyāmyasaṁśayam ākāśājjāhnavīvegaṁ pataṁtaṁ dharaṇītale
"क्योंकि मैंने उससे यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं निःसंदेह उसे धारण करूँगा — जिससे आकाश से पृथ्वीतल पर गिरती हुई जाह्नवी की वह वेगवती धारा,"
श्लोक 53 (skanda.6.130.53)
नो चेद्व्रजेत पातालं यदत्र विषये स्थितम् । ततोऽहं संप्रवक्ष्यामि तदिहैकमनाः शृणु
no cedvrajeta pātālaṁ yadatra viṣaye sthitam tato'haṁ saṁpravakṣyāmi tadihaikamanāḥ śṛṇu
"पाताल में न चली जाए — जो इस विषय में यहाँ स्थित सत्य कारण है। अतः अब मैं तुम्हें वह कारण एकाग्रचित्त होकर बताता हूँ, सुनो।"
श्लोक 54 (skanda.6.130.54)
एषा गंगा वरारोहे मम मूर्ध्नो विनिर्गता । हिमवंतं नगं भित्त्वा द्विधा जाता ततः परम्
eṣā gaṁgā varārohe mama mūrdhno vinirgatā himavaṁtaṁ nagaṁ bhittvā dvidhā jātā tataḥ param
"हे वरारोहे! यह गंगा मेरे ही मस्तक से निकली है; हिमवान पर्वत को भेदकर वह तत्पश्चात् दो भागों में विभक्त हो गई।"
श्लोक 55 (skanda.6.130.55)
ततः सिंध्वभिधाना सा पश्चिमं सागरं गता । शतानि नव संगृह्य नदीनां परमेश्वरि
tataḥ siṁdhvabhidhānā sā paścimaṁ sāgaraṁ gatā śatāni nava saṁgṛhya nadīnāṁ parameśvari
"तत्पश्चात्, हे परमेश्वरि! वह सिंधु नाम धारण करके, नौ सौ नदियों को अपने साथ मिलाकर, पश्चिम समुद्र की ओर गई।"
श्लोक 56 (skanda.6.130.56)
तथा गंगाभिधाना च सैव प्राक्सागरं गता । तावतीश्च समादाय नदीः पर्वतनन्दिनि
tathā gaṁgābhidhānā ca saiva prāksāgaraṁ gatā tāvatīśca samādāya nadīḥ parvatanandini
"हे पर्वत-नंदिनी! उसी प्रकार वही गंगा नाम धारण करके, उतनी ही नदियों को साथ लेकर, पूर्व समुद्र की ओर गई।"
श्लोक 57 (skanda.6.130.57)
एवमष्टादशैतानि नदीनां पर्वतात्मजे । शतानि सागरे यांति तेन नित्यं स तिष्ठति
evamaṣṭādaśaitāni nadīnāṁ parvatātmaje śatāni sāgare yāṁti tena nityaṁ sa tiṣṭhati
"हे पर्वतात्मजे! इस प्रकार अठारह सौ नदियाँ समुद्र में जा मिलती हैं; इसी कारण से वह (समुद्र) सदा उन्हीं से भरा-पूरा बना रहता है।"
श्लोक 58 (skanda.6.130.58)
सततं शोष्यमाणोऽपि वाडवेन दिवानिशम् । समुद्रसलिलं मेघाः समादाय ततः परम्
satataṁ śoṣyamāṇo'pi vāḍavena divāniśam samudrasalilaṁ meghāḥ samādāya tataḥ param
"दिन-रात निरंतर वडवाग्नि द्वारा सुखाए जाने पर भी, मेघ उस समुद्र के जल को ग्रहण करके, तत्पश्चात्,"
श्लोक 59 (skanda.6.130.59)
मर्त्यलोके प्रवर्षंति ततः सस्यं प्रजायते । सस्येन जीवते लोकः प्रभवन्ति मखास्तथा । मखांशेन सुराः सर्वे तृप्तिं यांति ततः परम्
martyaloke pravarṣaṁti tataḥ sasyaṁ prajāyate sasyena jīvate lokaḥ prabhavanti makhāstathā makhāṁśena surāḥ sarve tṛptiṁ yāṁti tataḥ param
"मर्त्यलोक में उसकी वर्षा करते हैं, जिससे अन्न उत्पन्न होता है; अन्न से ही जगत जीवित रहता है, और उसी से यज्ञ भी संपन्न होते हैं; यज्ञ के भाग से ही सभी देवता तृप्ति को प्राप्त होते हैं।"
श्लोक 60 (skanda.6.130.60)
एतस्मात्कारणान्मूर्ध्नि देवि गंगां दधाम्यहम् । न स्नेहात्कामतो नैव जगद्येन प्रवर्तते
etasmātkāraṇānmūrdhni devi gaṁgāṁ dadhāmyaham na snehātkāmato naiva jagadyena pravartate
"इसी कारण से, हे देवि! मैं अपने मस्तक पर गंगा को धारण करता हूँ — न तो स्नेह के कारण और न ही काम के कारण; इसी से यह जगत गतिशील बना रहता है।"
श्लोक 61 (skanda.6.130.61)
अथवा सन्त्यजाम्येनां यदि मूर्ध्नः कथंचन । तद्दूरं वेगतो भित्त्वा पृथ्वीं याति रसातलम्
athavā santyajāmyenāṁ yadi mūrdhnaḥ kathaṁcana taddūraṁ vegato bhittvā pṛthvīṁ yāti rasātalam
"अथवा यदि मैं अपने मस्तक से उसे किसी भी प्रकार त्याग दूँ, तो वह दूर तक वेगपूर्वक पृथ्वी को भेदती हुई रसातल में चली जाएगी।"
श्लोक 62 (skanda.6.130.62)
ततः शोषं व्रजेदाशु समुद्रः सरितां पतिः । और्वेण पीयमानोऽत्र ततो वृष्टिर्न जायते । वृष्ट्यभावाज्जगन्नाशः सत्यमेतन्मयोदितम्
tataḥ śoṣaṁ vrajedāśu samudraḥ saritāṁ patiḥ aurveṇa pīyamāno'tra tato vṛṣṭirna jāyate vṛṣṭyabhāvājjagannāśaḥ satyametanmayoditam
"तत्पश्चात् नदियों का स्वामी समुद्र भी शीघ्र ही सूख जाएगा, अगस्त्य (और्व) द्वारा पिया जाता हुआ; तब वर्षा उत्पन्न नहीं होगी, और वर्षा के अभाव में समस्त जगत का नाश हो जाएगा — यह मैंने सत्य ही कहा है।"
श्लोक 63 (skanda.6.130.63)
एवं गंगाकृते प्रोक्तं मया तव सुरेश्वरि । शृणु सन्ध्याकृतेऽन्यच्च येन तां प्रणमाम्यहम्
evaṁ gaṁgākṛte proktaṁ mayā tava sureśvari śṛṇu sandhyākṛte'nyacca yena tāṁ praṇamāmyaham
"इस प्रकार गंगा के विषय में, हे सुरेश्वरि! मैंने तुम्हें यह सब बताया है; अब संध्या के विषय में एक और बात सुनो, जिस कारण से मैं उसे भी प्रणाम करता हूँ।"