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नागर खण्ड · अध्याय 131

ईशान की उत्पत्ति और वररुचि द्वारा स्थापित गणपति की महिमा

अध्याय 130अध्याय-सूचीअध्याय 132

श्लोक 1 (skanda.6.131.1)

॥ देव उवाच ॥ एषा रात्रिः समादिष्टा दानवानां सुरेश्वरि ॥ पिशाचानां च भूतानां राक्षसानां विशेषतः

deva uvāca eṣā rātriḥ samādiṣṭā dānavānāṁ sureśvari piśācānāṁ ca bhūtānāṁ rākṣasānāṁ viśeṣataḥ

देव (शिव) बोले - हे सुरेश्वरि! यह रात्रि दानवों, पिशाचों, भूतों और विशेष रूप से राक्षसों के लिए ही नियत की गई है।

श्लोक 2 (skanda.6.131.2)

यत्किंचित्क्रियते कर्म तत्र स्नानादिकं शुभम्॥ तत्सर्वं जायते तेषां पुरा दत्तं स्वयंभुवा

yatkiṁcitkriyate karma tatra snānādikaṁ śubham tatsarvaṁ jāyate teṣāṁ purā dattaṁ svayaṁbhuvā

उस रात्रि में जो भी शुभ स्नानादि कर्म किया जाता है, वह सब उन्हीं (राक्षसादि) को प्राप्त होता है, क्योंकि यह वर स्वयंभू ब्रह्मा ने प्राचीन काल में उन्हें दिया था।

श्लोक 3 (skanda.6.131.3)

मर्यादा तैः समं येन देवानां च यदा कृता ॥ अर्हाणां यज्ञभागस्य काश्यपानामथाग्रजाम्॥

maryādā taiḥ samaṁ yena devānāṁ ca yadā kṛtā arhāṇāṁ yajñabhāgasya kāśyapānāmathāgrajām

क्योंकि काश्यप के उन ज्येष्ठ पुत्रों के साथ, जो यज्ञभाग के अधिकारी देवताओं के समकक्ष थे, उनकी यह मर्यादा (व्यवस्था) निश्चित की गई थी।

श्लोक 4 (skanda.6.131.4)

तदर्थं दशसाहस्रा दानवा युद्ध दुर्मदाः ॥ कुंतप्रासकरा भानुं रुंधन्त्युद्गतकार्मुकाः

tadarthaṁ daśasāhasrā dānavā yuddha durmadāḥ kuṁtaprāsakarā bhānuṁ ruṁdhantyudgatakārmukāḥ

उसी अधिकार के लिए युद्ध में उन्मत्त, हाथों में भाले और शक्तियाँ धारण किए, धनुष चढ़ाए दस हज़ार दानव सूर्य को रोकने का प्रयत्न करते हैं।

श्लोक 5 (skanda.6.131.5)

तमुद्दिश्य सहस्रांशुं यज्जलं परिक्षिप्यते। सावित्रेण च मन्त्रेण तेषां तज्जायते फलम्

tamuddiśya sahasrāṁśuṁ yajjalaṁ parikṣipyate sāvitreṇa ca mantreṇa teṣāṁ tajjāyate phalam

सहस्ररश्मि सूर्य को लक्ष्य करके जो जल सावित्री मन्त्र के साथ चढ़ाया जाता है, उसका फल भी उन्हीं (दानवादि) को प्राप्त होता है।

श्लोक 6 (skanda.6.131.6)

ते हतास्तेन तोयेन वज्रतुल्येन तत्क्षणात् ॥ प्रमुंचंति सहस्रांशुं नित्यमेव सुरेश्वरि

te hatāstena toyena vajratulyena tatkṣaṇāt pramuṁcaṁti sahasrāṁśuṁ nityameva sureśvari

हे सुरेश्वरि! वे उस वज्र-तुल्य जल से उसी क्षण आहत होकर सहस्रकिरण सूर्य को नित्य ही छोड़ देते हैं।

श्लोक 7 (skanda.6.131.7)

एतस्मात्कारणात्तोयमस्त्ररूपं क्षिपाम्यहम् ॥ संध्या कालं समुद्दिश्य भानुं संध्यां न पार्वति

etasmātkāraṇāttoyamastrarūpaṁ kṣipāmyaham saṁdhyā kālaṁ samuddiśya bhānuṁ saṁdhyāṁ na pārvati

इसी कारण, हे पार्वती! मैं संध्या-काल में सूर्य को लक्ष्य करके अस्त्र-रूप जल अर्पित करता हूँ, न कि संध्या (देवी) को।

श्लोक 8 (skanda.6.131.8)

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदुत्तरतः स्थितः ॥ उदयार्थं रविं यान्तं निरुन्धन्ति च दारुणाः

yadyadācarati śreṣṭhastattaduttarataḥ sthitaḥ udayārthaṁ raviṁ yāntaṁ nirundhanti ca dāruṇāḥ

जो कुछ श्रेष्ठजन आचरण करते हैं, सामान्यजन भी उसी का अनुसरण करते हैं; इसी प्रकार वे भयंकर दानव उदय होते सूर्य को भी रोकते हैं।

श्लोक 9 (skanda.6.131.9)

तेऽपि संध्याजलैर्देवि निहता ब्राह्मणोत्तमैः ॥ मया च तं विमुञ्चंति मूर्च्छिता निपतन्ति च

te'pi saṁdhyājalairdevi nihatā brāhmaṇottamaiḥ mayā ca taṁ vimuñcaṁti mūrcchitā nipatanti ca

हे देवि! श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा मेरे द्वारा अर्पित संध्या-जल से आहत होकर वे मूर्च्छित होकर गिर पड़ते हैं और सूर्य को छोड़ देते हैं।

श्लोक 10 (skanda.6.131.10)

एतस्मात्कारणाद्देवि सन्ध्ययोरुभयोरपि ॥ अहं चान्ये च विप्रा ये ते नमंति दिवाकरम्॥

etasmātkāraṇāddevi sandhyayorubhayorapi ahaṁ cānye ca viprā ye te namaṁti divākaram

इसी कारण, हे देवि! दोनों संध्याओं (प्रातः तथा सायं) में मैं तथा अन्य जो भी ब्राह्मण हैं, वे सब सूर्यदेव को नमस्कार करते हैं।

श्लोक 11 (skanda.6.131.11)

तस्मात्त्वं गृहमागच्छ त्यक्त्वेर्ष्यां पर्वतात्मजे ॥ प्रशस्यां त्वां परित्यक्त्वा नान्यास्ति हृदये मम

tasmāttvaṁ gṛhamāgaccha tyaktverṣyāṁ parvatātmaje praśasyāṁ tvāṁ parityaktvā nānyāsti hṛdaye mama

इसलिए हे पर्वतात्मजे! ईर्ष्या त्यागकर घर लौट चलो; तुम्हारे समान प्रशंसनीय को छोड़कर मेरे हृदय में और कोई नहीं है।

श्लोक 12 (skanda.6.131.12)

॥ देव्युवाच ॥ निष्कामो वा सकामो वा संध्यां स्त्रीसंज्ञितामिमाम् ॥ यत्त्वं नमसि देवेश तन्मे दुःखं प्रजायते

devyuvāca niṣkāmo vā sakāmo vā saṁdhyāṁ strīsaṁjñitāmimām yattvaṁ namasi deveśa tanme duḥkhaṁ prajāyate

देवी बोलीं - हे देवेश! चाहे निष्काम भाव से हो या सकाम भाव से, तुम इस स्त्री-नामधारी संध्या को जो नमस्कार करते हो, वही मुझे दुःख देता है।

श्लोक 13 (skanda.6.131.13)

तस्माद्गङ्गापरित्यागं सन्ध्यायाश्च विशेषतः ॥ यावन्न कुरुषे देव तावत्तुष्टिर्न मे भवेत्

tasmādgaṅgāparityāgaṁ sandhyāyāśca viśeṣataḥ yāvanna kuruṣe deva tāvattuṣṭirna me bhavet

इसलिए हे देव! जब तक तुम गंगा का तथा विशेषतः संध्या का परित्याग नहीं करते, तब तक मुझे संतोष नहीं होगा।

श्लोक 14 (skanda.6.131.14)

एवमुक्त्वाऽथ सा देवी विशेषव्रतमास्थिता॥ अवमन्य महादेवं प्रार्थयानमपि स्वयम्॥

evamuktvā'tha sā devī viśeṣavratamāsthitā avamanya mahādevaṁ prārthayānamapi svayam

ऐसा कहकर वह देवी विशेष व्रत का पालन करने लगीं, और स्वयं प्रार्थना करते हुए महादेव का अनादर करके चली गईं।

श्लोक 15 (skanda.6.131.15)

ततः स चिन्तयामास किमेतत्कारणं स्थितम्॥ विरक्ताऽपि ममोत्कण्ठां येनैषा प्रकरोति न

tataḥ sa cintayāmāsa kimetatkāraṇaṁ sthitam viraktā'pi mamotkaṇṭhāṁ yenaiṣā prakaroti na

तब वे (शिव) विचार करने लगे कि इसका क्या कारण है कि यह विरक्त होकर भी मेरी उत्कण्ठा को शांत नहीं करती।

श्लोक 16 (skanda.6.131.16)

न च साम्ना व्रजेत्तुष्टिं कथंचिदपि पार्वती ॥ मृषेर्ष्यांधारिणी देवी नैतत्स्वल्पं हि कारणम्

na ca sāmnā vrajettuṣṭiṁ kathaṁcidapi pārvatī mṛṣerṣyāṁdhāriṇī devī naitatsvalpaṁ hi kāraṇam

पार्वती किसी भी प्रकार सामोपचार से संतुष्ट नहीं होतीं; यह देवी व्यर्थ ईर्ष्या धारण किए हुए हैं, और यह कोई छोटा कारण नहीं है।

श्लोक 17 (skanda.6.131.17)

ततो मन्त्रप्रभावं तं विज्ञाय परमेश्वरः ॥ ध्यानं धृत्वा सुसूक्ष्मेण ज्ञानेनाथ स्वयं ततः

tato mantraprabhāvaṁ taṁ vijñāya parameśvaraḥ dhyānaṁ dhṛtvā susūkṣmeṇa jñānenātha svayaṁ tataḥ

तब उस मन्त्र के प्रभाव को जानकर परमेश्वर ने सूक्ष्म ज्ञान के द्वारा ध्यान धारण किया।

श्लोक 18 (skanda.6.131.18)

तमेव मन्त्रं मन्त्रेण न्यासेन च विशेषतः ॥ सम्यगाराधयामास संपूज्यात्मानमात्मना

tameva mantraṁ mantreṇa nyāsena ca viśeṣataḥ samyagārādhayāmāsa saṁpūjyātmānamātmanā

उन्होंने उसी मन्त्र की, मन्त्र और विशेष रूप से न्यास-विधि से, अपने ही द्वारा अपने आपकी भली-भाँति पूजा करके आराधना की।

श्लोक 19 (skanda.6.131.19)

यथा देव्यात्मभूतानि पृथक्कृत्वा च पंच च ॥ पूजितानि तथा देवः सर्वेषामंतरे गतः

yathā devyātmabhūtāni pṛthakkṛtvā ca paṁca ca pūjitāni tathā devaḥ sarveṣāmaṁtare gataḥ

जैसे देवी ने अपने पाँच स्वरूपों को पृथक्-पृथक् करके पूजा था, वैसे ही देव (शिव) भी उन सबके भीतर प्रविष्ट हो गए।

श्लोक 20 (skanda.6.131.20)

तान्येव पूजयामास पृथक्कृत्वा समाधितः ॥ नियोज्य च पुनर्बाह्ये ततः पूजां समाचरत्॥

tānyeva pūjayāmāsa pṛthakkṛtvā samādhitaḥ niyojya ca punarbāhye tataḥ pūjāṁ samācarat

उन्होंने समाधि द्वारा उन्हीं रूपों को पृथक् करके पूजा की, और फिर उन्हें बाह्य रूप में स्थापित करके पुनः पूजा सम्पन्न की।

श्लोक 21 (skanda.6.131.21)

तस्मान्नास्ति परः कश्चित्पूज्यपूज्यः स एव च ॥ ऐश्वर्यात्सर्वदेवानामीशानस्तेन निर्मितः

tasmānnāsti paraḥ kaścitpūjyapūjyaḥ sa eva ca aiśvaryātsarvadevānāmīśānastena nirmitaḥ

इसलिए उनसे बढ़कर कोई अन्य पूज्य नहीं है, वे ही स्वयं पूज्य हैं; इसी उपासना के प्रभाव से उन्होंने सब देवों के ऐश्वर्य से युक्त 'ईशान' रूप का निर्माण किया।

श्लोक 22 (skanda.6.131.22)

एवं यावत्स ईशानः समाराधयति प्रभुः ॥ तावद्देवी समायाता मन्त्राकृष्टा च यत्र सः

evaṁ yāvatsa īśānaḥ samārādhayati prabhuḥ tāvaddevī samāyātā mantrākṛṣṭā ca yatra saḥ

जब तक वह प्रभु ईशान-रूप में आराधना करते रहे, तब तक ही मन्त्र से आकृष्ट होकर देवी वहाँ आ गईं, जहाँ वे थे।

श्लोक 23 (skanda.6.131.23)

ततः प्रोवाच तं देवं प्रणिपत्यकृतांजलिः ॥ ज्ञातं मया विभो सर्वं न मां त्यज तव प्रियाम्

tataḥ provāca taṁ devaṁ praṇipatyakṛtāṁjaliḥ jñātaṁ mayā vibho sarvaṁ na māṁ tyaja tava priyām

तब उन्होंने प्रणाम करके, हाथ जोड़कर देव से कहा - हे विभो! मैंने सब जान लिया है, अपनी प्रिया मुझको मत त्यागिए।

श्लोक 24 (skanda.6.131.24)

तस्मादागच्छ गच्छावो यत्र त्वं वाञ्छसि प्रभो ॥ क्षम्यतां देव मे सर्वं न कृतं यद्वचस्तव

tasmādāgaccha gacchāvo yatra tvaṁ vāñchasi prabho kṣamyatāṁ deva me sarvaṁ na kṛtaṁ yadvacastava

इसलिए आइए, हम वहीं चलें जहाँ आप चाहें, हे प्रभो! हे देव, मेरा सब कुछ क्षमा कीजिए जो मैंने आपकी बात नहीं मानी।

श्लोक 25 (skanda.6.131.25)

ततस्तुष्टो महादेवस्तामालिङ्ग्य शुचिस्मिताम् ॥ इदमूचे विहस्योच्चैर्मेघगम्भीरया गिरा

tatastuṣṭo mahādevastāmāliṅgya śucismitām idamūce vihasyoccairmeghagambhīrayā girā

तब प्रसन्न होकर महादेव ने उस मृदुहासिनी को आलिंगन में लेकर बादल के समान गंभीर वाणी में उच्च स्वर से हँसते हुए यह कहा।

श्लोक 26 (skanda.6.131.26)

यैषा त्वयाऽऽत्मभूतोत्था निर्मिता परमा तनुः ॥ एतां या कामिनी काचित्पूजयिष्यति भक्तितः ॥ अनेनैव विधानेन तस्या भर्ता भविष्यति

yaiṣā tvayā''tmabhūtotthā nirmitā paramā tanuḥ etāṁ yā kāminī kācitpūjayiṣyati bhaktitaḥ anenaiva vidhānena tasyā bhartā bhaviṣyati

तुमने अपने ही स्वरूप से जो यह परम मूर्ति गढ़ी है, इसी विधि से जो भी स्त्री भक्तिपूर्वक इसकी पूजा करेगी, उसे इसी प्रकार पति की प्राप्ति होगी।

श्लोक 27 (skanda.6.131.27)

तृतीयायां विशेषेण यावत्संवत्सरं शुभे ॥ सा लभिष्यति सत्कान्तं पुत्रदं सर्वकामदम्

tṛtīyāyāṁ viśeṣeṇa yāvatsaṁvatsaraṁ śubhe sā labhiṣyati satkāntaṁ putradaṁ sarvakāmadam

हे शुभे! विशेष रूप से तृतीया तिथि को एक वर्ष तक पूजा करने वाली स्त्री पुत्र देने वाले और सब कामनाएँ पूरी करने वाले उत्तम पति को प्राप्त करेगी।

श्लोक 28 (skanda.6.131.28)

तथैतां मामकीं मूर्तिमीशानाख्यां च ये नराः ॥ तेषां दुष्टापि या कान्ता सौम्या चैव भविष्यति

tathaitāṁ māmakīṁ mūrtimīśānākhyāṁ ca ye narāḥ teṣāṁ duṣṭāpi yā kāntā saumyā caiva bhaviṣyati

जो पुरुष मेरी इस ईशान नामक मूर्ति की पूजा करेंगे, उनकी दुष्ट स्वभाव वाली पत्नी भी सौम्य स्वभाव की हो जाएगी।

श्लोक 29 (skanda.6.131.29)

ये पुनः कन्यकाहेतोः पूजयिष्यंति भक्तितः ॥ यां कन्यां मनसि स्थाप्य तां लभिष्यन्त्यसंशयम्॥

ye punaḥ kanyakāhetoḥ pūjayiṣyaṁti bhaktitaḥ yāṁ kanyāṁ manasi sthāpya tāṁ labhiṣyantyasaṁśayam

और जो कन्या की प्राप्ति के लिए मन में किसी कन्या को रखकर भक्तिपूर्वक पूजा करेंगे, वे निःसंदेह उसी कन्या को प्राप्त करेंगे।

श्लोक 30 (skanda.6.131.30)

निष्कामाश्चापि ये मर्त्या पूजयिष्यंति सर्वदा ॥ ते यास्यंति परां सिद्धिं जरामरणवर्जिताम्

niṣkāmāścāpi ye martyā pūjayiṣyaṁti sarvadā te yāsyaṁti parāṁ siddhiṁ jarāmaraṇavarjitām

और जो मनुष्य निष्काम भाव से सदा इसकी पूजा करेंगे, वे जरा-मरण से रहित परम सिद्धि को प्राप्त करेंगे।

श्लोक 31 (skanda.6.131.31)

एवमुक्त्वा महादेवो वृषमारोप्य तां प्रियाम् ॥ स्वयमारुह्य पश्चाच्च कैलासं पर्वतं गतः

evamuktvā mahādevo vṛṣamāropya tāṁ priyām svayamāruhya paścācca kailāsaṁ parvataṁ gataḥ

ऐसा कहकर महादेव ने अपनी प्रिया को वृषभ पर बिठाया और स्वयं भी उस पर चढ़कर कैलास पर्वत को चले गए।

श्लोक 32 (skanda.6.131.32)

॥ नारद उवाच ॥ तस्मात्तव सुतेयं या तामाराधयतु द्रुतम् ॥ पञ्चपिण्डमया गौरीं यावत्संवत्सरं शुभाम्

nārada uvāca tasmāttava suteyaṁ yā tāmārādhayatu drutam pañcapiṇḍamayā gaurīṁ yāvatsaṁvatsaraṁ śubhām

नारद बोले - इसलिए तुम्हारी जो यह पुत्री है, वह शीघ्र ही उस पंचपिण्डमयी शुभ गौरी की एक वर्ष तक आराधना करे।

श्लोक 33 (skanda.6.131.33)

तृतीयायां विशेषेण ततः प्राप्स्यति सत्पतिम् ॥ मुखप्रेक्षमतिप्रीतं रूपादिभिर्गुणैर्युतम्

tṛtīyāyāṁ viśeṣeṇa tataḥ prāpsyati satpatim mukhaprekṣamatiprītaṁ rūpādibhirguṇairyutam

विशेष रूप से तृतीया के दिन पूजा करने से वह देखने में अत्यंत प्रीतिकर, रूप आदि गुणों से युक्त उत्तम पति को प्राप्त करेगी।

श्लोक 34 (skanda.6.131.34)

॥ शांडिल्युवाच ॥ एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठो नारदः प्रययौ ततः ॥ तीर्थयात्रां प्रति प्रीत्या मम मात्रा विसर्जितः

śāṁḍilyuvāca evamuktvā muniśreṣṭho nāradaḥ prayayau tataḥ tīrthayātrāṁ prati prītyā mama mātrā visarjitaḥ

शाण्डिल्य-पुत्री बोलीं - ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ नारद वहाँ से तीर्थयात्रा के लिए चले गए, मेरी माता ने उन्हें प्रेमपूर्वक विदा किया।

श्लोक 35 (skanda.6.131.35)

मयापि च तदादेशात्कौमार्येपि च संस्थया ॥ पूजया वत्सरं यावत्पूजिता पतिकाम्यया

mayāpi ca tadādeśātkaumāryepi ca saṁsthayā pūjayā vatsaraṁ yāvatpūjitā patikāmyayā

मैंने भी उसी आदेश के अनुसार, कुमारी-अवस्था में ही, पति की कामना से एक वर्ष तक विधिवत् उस देवी की पूजा की।

श्लोक 36 (skanda.6.131.36)

तृतीयायां विशेषेण मार्गमासादितः शुभे ॥ नैवेद्यैर्विविधैर्दानैर्गंधमाल्यानुलेपनैः

tṛtīyāyāṁ viśeṣeṇa mārgamāsāditaḥ śubhe naivedyairvividhairdānairgaṁdhamālyānulepanaiḥ

हे शुभे! विशेष रूप से तृतीया के दिन विविध नैवेद्यों, दानों, गंध, माला और अनुलेपन के द्वारा मार्ग का अनुसरण किया।

श्लोक 37 (skanda.6.131.37)

तत्प्रभावादयं प्राप्तो जैमिनिर्नाम सद्द्विजः ॥ कात्यायनि यथा दृष्टस्त्वया किं कीर्तितैः परैः

tatprabhāvādayaṁ prāpto jaiminirnāma saddvijaḥ kātyāyani yathā dṛṣṭastvayā kiṁ kīrtitaiḥ paraiḥ

हे कात्यायनी! उसी के प्रभाव से जैमिनि नामक यह सत्पुरुष ब्राह्मण मुझे प्राप्त हुआ, जैसा कि तुमने स्वयं देखा है, अन्य कथन से क्या प्रयोजन?

श्लोक 38 (skanda.6.131.38)

तस्मात्त्वमपि कल्याणि पूजयैनां समाहिता ॥ संप्राप्स्यसि सुसौभाग्यं मैत्रेय्या सदृशं शुभे

tasmāttvamapi kalyāṇi pūjayaināṁ samāhitā saṁprāpsyasi susaubhāgyaṁ maitreyyā sadṛśaṁ śubhe

इसलिए हे कल्याणी! तुम भी एकाग्रचित्त होकर इसकी पूजा करो; हे शुभे! तुम मैत्रेयी के समान सुसौभाग्य को प्राप्त करोगी।

श्लोक 39 (skanda.6.131.39)

त्वया न पूजिता चेयं कौमार्ये वर्तमानया ॥ यावत्संवत्सरं गौरी तृतीयायां न चाधिकम्

tvayā na pūjitā ceyaṁ kaumārye vartamānayā yāvatsaṁvatsaraṁ gaurī tṛtīyāyāṁ na cādhikam

यदि तुमने कुमारी-अवस्था में रहते हुए इस गौरी की एक वर्ष तक तृतीया के दिन पूजा नहीं की,

श्लोक 40 (skanda.6.131.40)

सापत्न्यं तेन संजातं सौभाग्येपि निरर्गले ॥ यथोक्तविधिना देवी सत्यमेतन्मयोदितम्॥

sāpatnyaṁ tena saṁjātaṁ saubhāgyepi nirargale yathoktavidhinā devī satyametanmayoditam

तो सौभाग्य पूर्ण होते हुए भी सौत का दुख उत्पन्न होगा, यह मैंने जो कहा है सत्य ही कहा है - यह देवी की यथोक्त विधि है।

श्लोक 41 (skanda.6.131.41)

॥ सूत उवाच ॥ श्रुत्वा कात्यायनी सर्वं शांडिल्या यत्प्रकीर्तितम् ॥ ततः प्रणम्य तां पृष्ट्वा स्वमेव भवनं ययौ

sūta uvāca śrutvā kātyāyanī sarvaṁ śāṁḍilyā yatprakīrtitam tataḥ praṇamya tāṁ pṛṣṭvā svameva bhavanaṁ yayau

सूत जी ने कहा - शाण्डिल्य-पुत्री ने जो कुछ कहा था, वह सब सुनकर कात्यायनी ने उन्हें प्रणाम किया, उनसे अनुमति माँगी और अपने ही घर को चली गई।

श्लोक 42 (skanda.6.131.42)

मार्गशीर्षेऽथ संप्राप्ते तृतीयादिवसे सिते ॥ तां देवीं पूजयामास वर्षं यावकृतक्षणा

mārgaśīrṣe'tha saṁprāpte tṛtīyādivase site tāṁ devīṁ pūjayāmāsa varṣaṁ yāvakṛtakṣaṇā

तब मार्गशीर्ष मास आने पर, शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन, एक वर्ष तक बिना विश्राम किए उसने उस देवी की पूजा की।

श्लोक 43 (skanda.6.131.43)

गौरिणीर्भोजयामास मृष्टान्नैर्भोजनै रसैः ॥ तैलक्षारपरित्यक्तैर्गन्धैः कुंकुमपूर्वकैः

gauriṇīrbhojayāmāsa mṛṣṭānnairbhojanai rasaiḥ tailakṣāraparityaktairgandhaiḥ kuṁkumapūrvakaiḥ

उसने गौरी-रूपिणी स्त्रियों (सुहागिनों) को स्वादिष्ट अन्न और रसों से युक्त भोजन कराया, जो तेल-क्षार से रहित तथा कुंकुम आदि गंधों से युक्त था।

श्लोक 44 (skanda.6.131.44)

ततस्तु वत्सरे पूर्णे याज्ञवल्क्यस्तदन्तिकम् ॥ गत्वा प्रोवाच किं कष्टं त्वं करोषि शुचिस्मिते

tatastu vatsare pūrṇe yājñavalkyastadantikam gatvā provāca kiṁ kaṣṭaṁ tvaṁ karoṣi śucismite

तब वर्ष पूरा होने पर याज्ञवल्क्य उसके पास पहुँचे और बोले - हे शुचिस्मिते! तुम यह कष्ट क्यों उठा रही हो?

श्लोक 45 (skanda.6.131.45)

मया कांतेन रक्तेन कामदेन सदैव तु ॥ तस्मादागच्छ गच्छाव स्वमेव भवनं शुभे

mayā kāṁtena raktena kāmadena sadaiva tu tasmādāgaccha gacchāva svameva bhavanaṁ śubhe

मैं ही तुम्हारा अनुरागी और सर्वदा तुम्हारी कामना पूर्ण करने वाला पति हूँ; इसलिए हे शुभे! आओ, हम अपने ही घर चलें।

श्लोक 46 (skanda.6.131.46)

एवमुक्त्वा तु तां हृष्टां गृहीत्वा दक्षिणे करे ॥ जगाम भवनं पश्चात्पुलकांकितगात्रजाम्॥

evamuktvā tu tāṁ hṛṣṭāṁ gṛhītvā dakṣiṇe kare jagāma bhavanaṁ paścātpulakāṁkitagātrajām

ऐसा कहकर उन्होंने हर्ष से रोमांचित शरीर वाली उस प्रसन्न स्त्री का दाहिना हाथ पकड़कर उसे घर ले गए।

श्लोक 47 (skanda.6.131.47)

ततः परं तया सार्धं वर्तते हर्षिताननः ॥ मैत्रेय्या सहितो यद्वदविशेषेण सर्वदा

tataḥ paraṁ tayā sārdhaṁ vartate harṣitānanaḥ maitreyyā sahito yadvadaviśeṣeṇa sarvadā

तब से वे प्रसन्नमुख होकर उसके साथ, जैसे मैत्रेयी के साथ रहते थे वैसे ही, सदा बिना भेदभाव के रहने लगे।

श्लोक 48 (skanda.6.131.48)

ततः संजनयामास तस्यां पुत्रं गुणान्वितम् ॥ कात्यायनाभिधानं च यज्ञ विद्याविचक्षणम्॥

tataḥ saṁjanayāmāsa tasyāṁ putraṁ guṇānvitam kātyāyanābhidhānaṁ ca yajña vidyāvicakṣaṇam

तब उनसे उन्होंने गुणवान, यज्ञ-विद्या में निपुण, कात्यायन नामक एक पुत्र उत्पन्न किया।

श्लोक 49 (skanda.6.131.49)

पुत्रो वररुचिर्यस्य बभूव गुणसागरः॥ सर्वज्ञः सर्वकृत्येषु वेदवेदांगपारगः

putro vararuciryasya babhūva guṇasāgaraḥ sarvajñaḥ sarvakṛtyeṣu vedavedāṁgapāragaḥ

उस कात्यायन का पुत्र वररुचि हुआ, जो गुणों का सागर, सर्वज्ञ, सब कार्यों में निपुण और वेद-वेदांगों में पारंगत था।

श्लोक 50 (skanda.6.131.50)

स्थापितोऽत्र शुभे क्षेत्रे येन विद्यार्थिनां कृते ॥ समाराध्य विशेषेण चतुर्थ्यां शुक्लवासरे

sthāpito'tra śubhe kṣetre yena vidyārthināṁ kṛte samārādhya viśeṣeṇa caturthyāṁ śuklavāsare

विद्यार्थियों के हित के लिए, विशेष रूप से शुक्ल चतुर्थी के दिन भली-भाँति आराधना करके, उन्होंने इसी शुभ क्षेत्र में जिसे स्थापित किया,

श्लोक 51 (skanda.6.131.51)

महागणपतिर्भक्त्या सर्वविद्याप्रदायकः ॥ यस्तस्य पुरतो विप्राः शांतिपाठविधानतः

mahāgaṇapatirbhaktyā sarvavidyāpradāyakaḥ yastasya purato viprāḥ śāṁtipāṭhavidhānataḥ

वह भक्तिपूर्वक स्थापित महागणपति सर्वविद्या प्रदान करने वाले हैं; हे ब्राह्मणो! जो उनके सामने शांतिपाठ की विधि से,

श्लोक 52 (skanda.6.131.52)

गृह्णाति पुष्पमालां यः पठेच्छक्त्या द्विजोत्तमाः ॥ वेदांतकृत्स विप्रः स्यात्सदा जन्मनिजन्मनि

gṛhṇāti puṣpamālāṁ yaḥ paṭhecchaktyā dvijottamāḥ vedāṁtakṛtsa vipraḥ syātsadā janmanijanmani

पुष्पमाला ग्रहण करके यथाशक्ति पाठ करता है, हे श्रेष्ठ द्विजो! वह ब्राह्मण जन्म-जन्मांतर में सदा वेदांत का पारंगत विद्वान होता है।

श्लोक 53 (skanda.6.131.53)

अशक्त्या चाथ पाठस्य यो गृह्णाति धनेन च ॥ स विशेषाद्भवेद्विप्रो वेदवेदांगपारगः

aśaktyā cātha pāṭhasya yo gṛhṇāti dhanena ca sa viśeṣādbhavedvipro vedavedāṁgapāragaḥ

और यदि कोई पाठ करने में असमर्थ होकर धन के द्वारा (वह अधिकार) ग्रहण करता है, तो वह विशेष रूप से वेद-वेदांगों में पारंगत ब्राह्मण होता है।

श्लोक 54 (skanda.6.131.54)

विदुषां स गृहे जन्म याज्ञिकानां सदा लभेत्॥ न कदाचित्तु मूर्खार्णां निन्दितानां कथञ्चन

viduṣāṁ sa gṛhe janma yājñikānāṁ sadā labhet na kadācittu mūrkhārṇāṁ ninditānāṁ kathañcana

वह सदा विद्वानों और याज्ञिकों के घर में ही जन्म पाता है, और किसी भी प्रकार कभी भी मूर्खों तथा निन्दितों के घर में जन्म नहीं लेता।

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