नागर खण्ड · अध्याय 132
वास्तुपुरुष की उत्पत्ति और वास्तुपद तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.6.132.1)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ त्वया सूतज तत्रस्थं याज्ञवल्क्यस्य कीर्तितम् ॥ तीर्थं वररुचेश्चैव वैनायक्यं प्रविद्यते
ṛṣaya ūcuḥ tvayā sūtaja tatrasthaṁ yājñavalkyasya kīrtitam tīrthaṁ vararuceścaiva vaināyakyaṁ pravidyate
ऋषि बोले - हे सूतपुत्र! तुमने वहाँ स्थित याज्ञवल्क्य के तीर्थ का और वररुचि से संबंधित गणेश-तीर्थ का वर्णन किया है।
श्लोक 2 (skanda.6.132.2)
कात्यायनस्य न प्रोक्तं किञ्चित्तत्र महामते ॥ किं वा तेन कृतं नैव किं वा ते विस्मृतिं गतम्
kātyāyanasya na proktaṁ kiñcittatra mahāmate kiṁ vā tena kṛtaṁ naiva kiṁ vā te vismṛtiṁ gatam
किन्तु हे महामते! कात्यायन के विषय में तुमने वहाँ कुछ भी नहीं कहा; क्या उसने कुछ नहीं किया, अथवा तुम भूल गए?
श्लोक 3 (skanda.6.132.3)
तस्मादाचक्ष्व नः शीघ्रं यदि किंचिन्महात्मना ॥ क्षेत्रेत्र निर्मितं तीर्थं सर्वसिद्धिप्रदायकम्।
tasmādācakṣva naḥ śīghraṁ yadi kiṁcinmahātmanā kṣetretra nirmitaṁ tīrthaṁ sarvasiddhipradāyakam
इसलिए यदि उस महात्मा ने इस क्षेत्र में कोई सर्वसिद्धिप्रद तीर्थ बनाया हो, तो शीघ्र हमें बताओ।
श्लोक 4 (skanda.6.132.4)
॥ सूत उवाच ॥ तेन वास्तुपदंनाम तत्र तीर्थविनिर्मितम् ॥ कात्यायनेन विप्रेण सर्वकामप्रदं नृणाम्
sūta uvāca tena vāstupadaṁnāma tatra tīrthavinirmitam kātyāyanena vipreṇa sarvakāmapradaṁ nṛṇām
सूत जी ने कहा - उस ब्राह्मण कात्यायन ने वहाँ वास्तुपद नामक तीर्थ बनाया था, जो मनुष्यों की सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।
श्लोक 5 (skanda.6.132.5)
चत्वारिंशत्त्रिभिर्युक्ता देवता यत्र पंच च ॥ पूज्यंते पूजिताश्चापि सिद्धिं यच्छंति तत्क्षणात्
catvāriṁśattribhiryuktā devatā yatra paṁca ca pūjyaṁte pūjitāścāpi siddhiṁ yacchaṁti tatkṣaṇāt
वहाँ पैंतालीस देवता स्थापित होकर पूजे जाते हैं, और पूजित होते ही वे तत्काल सिद्धि प्रदान करते हैं।
श्लोक 6 (skanda.6.132.6)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ कस्मात्ता देवताः सूत पूज्यंते तत्र संस्थिताः ॥ नामतश्च विभागेन कीर्तयस्व पृथक्पृथक्
ṛṣaya ūcuḥ kasmāttā devatāḥ sūta pūjyaṁte tatra saṁsthitāḥ nāmataśca vibhāgena kīrtayasva pṛthakpṛthak
ऋषि बोले - हे सूत! वहाँ स्थापित वे देवता किस कारण पूजे जाते हैं? कृपया उनके नाम और विभाग अलग-अलग बताओ।
श्लोक 7 (skanda.6.132.7)
॥ सूत उवाच ॥ पूर्वं किंचिन्महद्भूतं निर्गतं धरणीतलात् ॥ अपूर्वं रौद्रमत्युग्रं कृष्ण दंतं भयानकम्
sūta uvāca pūrvaṁ kiṁcinmahadbhūtaṁ nirgataṁ dharaṇītalāt apūrvaṁ raudramatyugraṁ kṛṣṇa daṁtaṁ bhayānakam
सूत जी ने कहा - पूर्वकाल में पृथ्वीतल से एक विचित्र महाभूत प्रकट हुआ, जो अभूतपूर्व, रौद्र, अत्यंत उग्र, काले दाँतों वाला और भयानक था।
श्लोक 8 (skanda.6.132.8)
शंकुकर्णं कृशास्यं च ऊर्ध्वकेशं भयानकम् ॥ देवानां नाशनार्थाय मानुषाणां विशेषतः ॥
śaṁkukarṇaṁ kṛśāsyaṁ ca ūrdhvakeśaṁ bhayānakam devānāṁ nāśanārthāya mānuṣāṇāṁ viśeṣataḥ
वह शंकु के समान कानों वाला, दुबले मुख वाला, ऊर्ध्व केशों वाला और भयानक था, जो देवताओं तथा विशेष रूप से मनुष्यों के विनाश के लिए था।
श्लोक 9 (skanda.6.132.9)
आकृष्टं दानवेंद्रेण मंत्रैः शुक्रप्रदर्शितैः ॥ अवध्यं सर्वशस्त्राणामस्त्राणां च विशेषतः
ākṛṣṭaṁ dānaveṁdreṇa maṁtraiḥ śukrapradarśitaiḥ avadhyaṁ sarvaśastrāṇāmastrāṇāṁ ca viśeṣataḥ
वह दानवों के राजा ने शुक्राचार्य द्वारा दिखाए गए मन्त्रों से आकृष्ट किया था, और सब शस्त्रों तथा विशेष रूप से सब अस्त्रों से अवध्य था।
श्लोक 10 (skanda.6.132.10)
अथ देवाः समालोक्य तत्तादृक्सुभयावहम् ॥ जघ्नुः शस्त्रैः शितैश्चित्रैः कोपेन महतान्विताः
atha devāḥ samālokya tattādṛksubhayāvaham jaghnuḥ śastraiḥ śitaiścitraiḥ kopena mahatānvitāḥ
तब देवगण उस अत्यंत भयंकर प्राणी को देखकर, अत्यंत क्रोध से भरकर, तीक्ष्ण और विचित्र शस्त्रों से उस पर प्रहार करने लगे।
श्लोक 11 (skanda.6.132.11)
नैव शेकुस्तदंगेषु प्रहर्तुं यत्नमास्थिताः ॥ भक्ष्यंते केवलं तेन शतशोऽथ सहस्रशः
naiva śekustadaṁgeṣu prahartuṁ yatnamāsthitāḥ bhakṣyaṁte kevalaṁ tena śataśo'tha sahasraśaḥ
प्रयत्न करते हुए भी वे उसके अंगों पर प्रहार नहीं कर सके, और वह उन्हें सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में निगलता ही रहा।
श्लोक 12 (skanda.6.132.12)
अथ ते यत्नमास्थाय सर्वे देवाः सवासवाः ॥ ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा तद्भूतमभिदुद्रुवुः
atha te yatnamāsthāya sarve devāḥ savāsavāḥ brahmāṇamagrataḥ kṛtvā tadbhūtamabhidudruvuḥ
तब इंद्र सहित सब देवगण प्रयत्नपूर्वक ब्रह्मा को आगे करके उस महाभूत की ओर दौड़े।
श्लोक 13 (skanda.6.132.13)
ततः संगृह्य यत्नेन सर्वगात्रेषु सर्वतः ॥ तच्च पंचगुणैर्देवैः पातितं धरणीतले॥
tataḥ saṁgṛhya yatnena sarvagātreṣu sarvataḥ tacca paṁcaguṇairdevaiḥ pātitaṁ dharaṇītale
तब प्रयत्नपूर्वक उसके समस्त अंगों को सब ओर से पकड़कर, पाँच गुना अधिक बल वाले देवताओं ने उसे पृथ्वी पर गिरा दिया।
श्लोक 14 (skanda.6.132.14)
उपविष्टास्ततस्तस्य सर्वे भूत्वा समंततः ॥ प्रहारान्संप्रयच्छंति न लगंति च तस्य ते
upaviṣṭāstatastasya sarve bhūtvā samaṁtataḥ prahārānsaṁprayacchaṁti na lagaṁti ca tasya te
तब सब देवगण उसके चारों ओर बैठकर उस पर प्रहार करने लगे, परंतु वे प्रहार उस पर लगते ही नहीं थे।
श्लोक 15 (skanda.6.132.15)
आथर्वणेन सूक्तेन जातं चामृतबिंदुना ॥ तद्भूतं प्रेषितं दैत्यैर्मुंडेन च तदंतिकम्॥
ātharvaṇena sūktena jātaṁ cāmṛtabiṁdunā tadbhūtaṁ preṣitaṁ daityairmuṁḍena ca tadaṁtikam
वह भूत अथर्ववेद के सूक्त और अमृतबिन्दु से उत्पन्न हुआ था, और दैत्यों ने उसे मुण्ड नामक (दैत्य) के पास भेजा था।
श्लोक 16 (skanda.6.132.16)
एवं वर्षसहस्रांतं तत्तथैव व्यवस्थितम्। न मुंचंति भयात्ते तु न हंतुं शक्नुवंति च
evaṁ varṣasahasrāṁtaṁ tattathaiva vyavasthitam na muṁcaṁti bhayātte tu na haṁtuṁ śaknuvaṁti ca
इस प्रकार वह हज़ार वर्षों तक उसी अवस्था में पड़ा रहा; देवगण भय के कारण उसे न छोड़ पाते थे, न मार पाते थे।
श्लोक 17 (skanda.6.132.17)
तस्योदरे स्थितो ब्रह्मा शक्राद्या अमराश्च ये ॥ चतुर्दिक्षु स्थिताः क्रुद्धा महद्यत्नेन संस्थिताः ॥ ततस्ते दानवाः सर्वे मंत्रं चक्रुः परस्परम्
tasyodare sthito brahmā śakrādyā amarāśca ye caturdikṣu sthitāḥ kruddhā mahadyatnena saṁsthitāḥ tataste dānavāḥ sarve maṁtraṁ cakruḥ parasparam
ब्रह्मा उसके पेट पर बैठे रहे, और इंद्र आदि अन्य देवगण क्रुद्ध होकर बड़े प्रयत्न से उसके चारों दिशाओं में डटे रहे; तब वे सब दानव आपस में मंत्रणा करने लगे।
श्लोक 18 (skanda.6.132.18)
अस्य भूतस्य रौद्रस्य शुक्रसृष्टस्य तत्क्षणात् ॥ एक एवात्र निर्दिष्ट उपायो देवसंक्षयः।
asya bhūtasya raudrasya śukrasṛṣṭasya tatkṣaṇāt eka evātra nirdiṣṭa upāyo devasaṁkṣayaḥ
वे बोले - इस शुक्राचार्य द्वारा सृष्ट भयंकर भूत के लिए तत्काल एक ही उपाय बताया गया है - देवताओं का विनाश।
श्लोक 19 (skanda.6.132.19)
ततः शस्त्राणि तीक्ष्णानि दानवास्ते महाबलाः ॥ मुंचंतो विविधान्नादान्समाजग्मुः सहस्रशः
tataḥ śastrāṇi tīkṣṇāni dānavāste mahābalāḥ muṁcaṁto vividhānnādānsamājagmuḥ sahasraśaḥ
तब वे महाबली दानव तीक्ष्ण शस्त्र चलाते हुए और विविध प्रकार के गर्जन करते हुए हज़ारों की संख्या में एकत्र हो गए।
श्लोक 20 (skanda.6.132.20)
एतस्मिन्नंतरे विष्णुरागतस्तत्र तत्क्षणात् ॥ आह भूतं तदा विष्णुर्वचसा ह्लादयन्निव
etasminnaṁtare viṣṇurāgatastatra tatkṣaṇāt āha bhūtaṁ tadā viṣṇurvacasā hlādayanniva
इसी बीच विष्णु तत्काल वहाँ आ गए, और उन्होंने उस भूत को मानो अपने वचनों से शांत करते हुए यह कहा।
श्लोक 21 (skanda.6.132.21)
यो यस्मिन्संस्थितो गात्रे देवस्तव समुद्भवे ॥ तत्र पूजां समादाय तस्मात्त्वां तर्पयिष्यति॥
yo yasminsaṁsthito gātre devastava samudbhave tatra pūjāṁ samādāya tasmāttvāṁ tarpayiṣyati
जो देवता तुम्हारे शरीर के जिस अंग पर स्थित है, वह वहाँ पूजा ग्रहण करके तुम्हें तृप्त करेगा।
श्लोक 22 (skanda.6.132.22)
नैवंविधा तु लोकेऽस्मिन्पूजा देवस्य संस्थिता ॥ कस्यचिद्यादृशी तेऽद्य मया संप्रतिपादिता
naivaṁvidhā tu loke'sminpūjā devasya saṁsthitā kasyacidyādṛśī te'dya mayā saṁpratipāditā
इस लोक में किसी भी देवता की ऐसी पूजा पहले प्रचलित नहीं थी, जैसी आज मैंने तुम्हारे लिए प्रतिपादित की है।
श्लोक 23 (skanda.6.132.23)
ततस्तेन प्रतिज्ञातमविकल्पेन चेतसा॥ एवं तेऽहं करिष्यामि परं मे वचनं शृणु
tatastena pratijñātamavikalpena cetasā evaṁ te'haṁ kariṣyāmi paraṁ me vacanaṁ śṛṇu
तब उसने निश्चित चित्त से प्रतिज्ञा की - मैं वैसा ही करूँगा, परंतु आप मेरी भी एक बात सुनें।
श्लोक 24 (skanda.6.132.24)
यदि कश्चिन्न मे पूजां करिष्यति कदाचन ॥ कथंचिन्मानवः कश्चित्स मे भक्ष्यो भविष्यति
yadi kaścinna me pūjāṁ kariṣyati kadācana kathaṁcinmānavaḥ kaścitsa me bhakṣyo bhaviṣyati
यदि कभी कोई मनुष्य किसी भी प्रकार मेरी पूजा नहीं करेगा, तो वह मेरा भक्ष्य होगा।
श्लोक 25 (skanda.6.132.25)
॥ सूत उवाच ॥ बाढमित्येव च प्रोक्ते ततो देवेन चक्रिणा ॥ तद्भूतं निश्चलं जातं हर्षेण महतान्वितम्
sūta uvāca bāḍhamityeva ca prokte tato devena cakriṇā tadbhūtaṁ niścalaṁ jātaṁ harṣeṇa mahatānvitam
सूत जी ने कहा - चक्रधारी देव (विष्णु) द्वारा 'बहुत अच्छा' कहे जाने पर वह भूत महान हर्ष से युक्त होकर निश्चल हो गया।
श्लोक 26 (skanda.6.132.26)
ततो देवाः समुत्थाय तत्त्यक्त्वा शस्त्रपाणयः ॥ जघ्नुश्च निशितैः शस्त्रैः पलायनसमुत्सुकान् ॥ लज्जाहीनान्गतामर्षान्दीनवाक्यप्रजल्पकान्
tato devāḥ samutthāya tattyaktvā śastrapāṇayaḥ jaghnuśca niśitaiḥ śastraiḥ palāyanasamutsukān lajjāhīnāngatāmarṣāndīnavākyaprajalpakān
तब देवगण उठकर, शस्त्र छोड़कर, भाग खड़े होने को उतावले, निर्लज्ज, क्रोधरहित और दीन वचन बोलते हुए दानवों को तीक्ष्ण शस्त्रों से मारने लगे।
श्लोक 27 (skanda.6.132.27)
ततः स्वस्थः स भूत्वा तु हरिर्दैत्यैर्निपातितैः ॥ प्रोवाच पद्मजं नाम भूतस्यास्य कुरुष्व भोः
tataḥ svasthaḥ sa bhūtvā tu harirdaityairnipātitaiḥ provāca padmajaṁ nāma bhūtasyāsya kuruṣva bhoḥ
तब स्वस्थ होकर, दैत्यों के गिरा दिए जाने पर, हरि ने कमलज ब्रह्मा से कहा - हे देव! अब इस भूत के लिए (व्यवस्था) करो।
श्लोक 28 (skanda.6.132.28)
॥ ब्रह्मोवाच ॥ अनेन तव वाक्यस्य प्रोक्तं वाक्यं हरे यतः ॥ वास्त्वेतदिति यस्माच्च तस्माद्वास्तु भविष्यति
brahmovāca anena tava vākyasya proktaṁ vākyaṁ hare yataḥ vāstvetaditi yasmācca tasmādvāstu bhaviṣyati
ब्रह्मा बोले - हे हरि! चूँकि इसने तुम्हारी बात के उत्तर में 'यह वास्तु है' ऐसा वचन कहा है, इसलिए यह 'वास्तु' नाम से प्रसिद्ध होगा।
श्लोक 29 (skanda.6.132.29)
एवमुक्त्वा हृषीकेश आहूय विश्वकर्मणे ॥ विधानं कथयामास पूजार्थं विस्तरान्वितम्
evamuktvā hṛṣīkeśa āhūya viśvakarmaṇe vidhānaṁ kathayāmāsa pūjārthaṁ vistarānvitam
ऐसा कहकर हृषीकेश (विष्णु) ने विश्वकर्मा को बुलाकर उसकी पूजा की विस्तृत विधि बतलाई।
श्लोक 30 (skanda.6.132.30)
एतस्मिन्नंतरे प्राह याज्ञवल्क्यसुतः सुधीः ॥ विश्वकर्माणमाहूय प्रथमं द्विजसत्तमाः
etasminnaṁtare prāha yājñavalkyasutaḥ sudhīḥ viśvakarmāṇamāhūya prathamaṁ dvijasattamāḥ
इसी बीच, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! बुद्धिमान याज्ञवल्क्य-पुत्र (कात्यायन) ने भी सबसे पहले विश्वकर्मा को बुलाकर कहा।
श्लोक 31 (skanda.6.132.31)
हाटकेश्वरजे क्षेत्रे ममाश्रमपदं कुरु ॥ अनेनैव विधानेन प्रोक्तेन तु महामते
hāṭakeśvaraje kṣetre mamāśramapadaṁ kuru anenaiva vidhānena proktena tu mahāmate
हे महामते! तुमने जो विधि अभी बताई है, उसी विधि से हाटकेश्वर क्षेत्र में मेरे आश्रम-स्थल का निर्माण करो।
श्लोक 32 (skanda.6.132.32)
ततोहं सकलं बुद्ध्वा वृद्धिं नेष्यामि भूतले ॥ बालावबोधनार्थाय तस्मादागच्छ सत्वरम्
tatohaṁ sakalaṁ buddhvā vṛddhiṁ neṣyāmi bhūtale bālāvabodhanārthāya tasmādāgaccha satvaram
तब मैं इस समस्त विधि को जानकर, बालकों के ज्ञानवर्धन के लिए, पृथ्वीतल पर इसका प्रसार करूँगा; इसलिए शीघ्र आओ।
श्लोक 33 (skanda.6.132.33)
ततः संप्रेषयामास तं ब्रह्मापि तदंतिकम् ॥ विश्वकर्माणमाहूय स्वसुतस्य हिते स्थितः
tataḥ saṁpreṣayāmāsa taṁ brahmāpi tadaṁtikam viśvakarmāṇamāhūya svasutasya hite sthitaḥ
तब ब्रह्मा ने भी, अपने पुत्र (कात्यायन) के हित में तत्पर होकर, विश्वकर्मा को बुलाकर उसे उसके पास भेजा।
श्लोक 34 (skanda.6.132.34)
विश्वकर्मापि तत्रैत्य वास्तुपूजां यथोदिताम् ॥ चकार ब्रह्मणा प्रोक्तां यादृशीं सकलां ततः
viśvakarmāpi tatraitya vāstupūjāṁ yathoditām cakāra brahmaṇā proktāṁ yādṛśīṁ sakalāṁ tataḥ
विश्वकर्मा भी वहाँ आकर, ब्रह्मा द्वारा बताई गई संपूर्ण वास्तुपूजा को यथावत् उसी प्रकार संपन्न करने लगे।
श्लोक 35 (skanda.6.132.35)
कात्यायनोऽपि तां सर्वां दृष्ट्वा चक्रे सहस्रशः ॥ तदा विश्वहितार्थाय शालाकर्मादि पूर्विकाम्
kātyāyano'pi tāṁ sarvāṁ dṛṣṭvā cakre sahasraśaḥ tadā viśvahitārthāya śālākarmādi pūrvikām
कात्यायन ने भी वह सब देखकर, संसार के हित के लिए, गृह-निर्माण आदि से पहले (की जाने वाली) उसी विधि को हज़ारों बार संपन्न कराया।
श्लोक 36 (skanda.6.132.36)
एवं वास्तुपदं जातं तस्मिन्क्षेत्रे द्विजोत्तमाः ॥ अस्मिन्क्षेत्रे नरः पापात्स्पृष्टो मुच्येत कर्मणा
evaṁ vāstupadaṁ jātaṁ tasminkṣetre dvijottamāḥ asminkṣetre naraḥ pāpātspṛṣṭo mucyeta karmaṇā
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इस प्रकार उस क्षेत्र में वास्तुपद उत्पन्न हुआ; इस क्षेत्र में जो मनुष्य पाप से स्पृष्ट है, वह इस कर्म से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 37 (skanda.6.132.37)
तथा न प्राप्नुयाद्दोषं गृहजातं कथंचन ॥ शिल्पोत्थं कुपदोत्थं च कुवास्तुजमथापि च
tathā na prāpnuyāddoṣaṁ gṛhajātaṁ kathaṁcana śilpotthaṁ kupadotthaṁ ca kuvāstujamathāpi ca
इसी प्रकार वह घर से उत्पन्न, शिल्प से उत्पन्न, कुपद से उत्पन्न, तथा कुवास्तु से उत्पन्न दोष को भी कभी नहीं प्राप्त करता।
श्लोक 38 (skanda.6.132.38)
वैशाखस्य तृतीयायां शुक्लायां रोहिणीषु च ॥ तत्पदं निहितं तत्र वास्तोस्तेन महात्मना
vaiśākhasya tṛtīyāyāṁ śuklāyāṁ rohiṇīṣu ca tatpadaṁ nihitaṁ tatra vāstostena mahātmanā
वैशाख मास की शुक्ल तृतीया को, रोहिणी नक्षत्र में, उस महात्मा ने वहाँ वास्तु का वह पद स्थापित किया था।
श्लोक 39 (skanda.6.132.39)
तस्मिन्नपि च यः पूजां तेनैव विधिना नरः ॥ तस्य यः कुरुते सम्यक्स भूपत्वमवाप्नुयात्
tasminnapi ca yaḥ pūjāṁ tenaiva vidhinā naraḥ tasya yaḥ kurute samyaksa bhūpatvamavāpnuyāt
वहाँ भी जो मनुष्य उसी विधि से भली-भाँति पूजा करता है, वह राजपद को प्राप्त करता है।
श्लोक 40 (skanda.6.132.40)
गृहं दोषान्वितं प्राप्य शिल्पादिभिरुपद्रुतम् ॥ तस्योपसंगमं प्राप्य समृद्धिं याति तद्दिने
gṛhaṁ doṣānvitaṁ prāpya śilpādibhirupadrutam tasyopasaṁgamaṁ prāpya samṛddhiṁ yāti taddine
दोषयुक्त और शिल्प आदि दोषों से पीड़ित घर भी उस (देवता) का सान्निध्य पाकर उसी दिन समृद्धि को प्राप्त कर लेता है।