नागर खण्ड · अध्याय 133
अजागृह देवी और रोगनाशक कुण्डों की उत्पत्ति
श्लोक 1 (skanda.6.133.1)
॥ सूत उवाच ॥ तथाऽन्यापि च तत्रास्ति देवता द्विजसत्तमाः ॥ अजागृहेति विख्याता सर्वरोगक्षयावहा
sūta uvāca tathā'nyāpi ca tatrāsti devatā dvijasattamāḥ ajāgṛheti vikhyātā sarvarogakṣayāvahā
सूत जी ने कहा - हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वहाँ एक और भी देवता है, जो 'अजागृह' के नाम से विख्यात है और सब रोगों का नाश करने वाली है।
श्लोक 2 (skanda.6.133.2)
अजापालो यदा राजा सर्वलोकहिते रतः ॥ अजारूपाः प्रयांति स्म व्याधयः सकला द्विजाः ॥ तदा रात्रौ समानीय तस्मिन्स्थाने दधाति सः
ajāpālo yadā rājā sarvalokahite rataḥ ajārūpāḥ prayāṁti sma vyādhayaḥ sakalā dvijāḥ tadā rātrau samānīya tasminsthāne dadhāti saḥ
जब सम्पूर्ण लोक के हित में तत्पर राजा अजपाल राज्य करता था, तब सब व्याधियाँ बकरियों का रूप धारण करके चला करती थीं; वह रात्रि में उन्हें एकत्र करके उस स्थान पर रख देता था।
श्लोक 3 (skanda.6.133.3)
ततस्तदाश्रयात्स्थानमजागृहमिति स्मृतम् ॥ सर्वैर्जनैर्धरा पृष्ठेदर्शनाद्व्याधिनाशनम्
tatastadāśrayātsthānamajāgṛhamiti smṛtam sarvairjanairdharā pṛṣṭhedarśanādvyādhināśanam
उनके वहाँ आश्रय लेने के कारण वह स्थान अजागृह के नाम से जाना गया, और पृथ्वीतल पर सब लोगों के लिए उसका दर्शनमात्र ही व्याधिनाशक है।
श्लोक 4 (skanda.6.133.4)
तत्रैश्वर्यमभूत्पूर्वं यत्तद्ब्राह्मणसत्तमाः ॥ अहं वः कीर्तयिष्यामि श्रोतव्यं सुसमाहितैः
tatraiśvaryamabhūtpūrvaṁ yattadbrāhmaṇasattamāḥ ahaṁ vaḥ kīrtayiṣyāmi śrotavyaṁ susamāhitaiḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो महिमा वहाँ पूर्वकाल में हुई, उसे मैं तुम्हें बताऊँगा; एकाग्रचित्त होकर उसे सुनो।
श्लोक 5 (skanda.6.133.5)
तत्रागतो द्विजः कश्चित्क्षेत्रे तापसरूपधृक् ॥ तीर्थयात्राप्रसंगेन रात्रौ प्राप्तः श्रमान्वितः
tatrāgato dvijaḥ kaścitkṣetre tāpasarūpadhṛk tīrthayātrāprasaṁgena rātrau prāptaḥ śramānvitaḥ
तप का रूप धारण किए हुए कोई ब्राह्मण तीर्थयात्रा के प्रसंग में उस क्षेत्र में आया, थकान से युक्त होकर रात्रि में वहाँ पहुँचा।
श्लोक 6 (skanda.6.133.6)
अजावृंदमथालोक्य निविष्टं सुसुखान्वितम् ॥ रोमंथ कर्मसंयुक्तं विश्वस्तमकुतोभयम्॥
ajāvṛṁdamathālokya niviṣṭaṁ susukhānvitam romaṁtha karmasaṁyuktaṁ viśvastamakutobhayam
वहाँ आराम से बैठे हुए, जुगाली करते हुए, निर्भय और निश्चिंत बकरियों के झुंड को देखकर,
श्लोक 7 (skanda.6.133.7)
स ज्ञात्वा मानुषेणात्र भवितव्यमसंशयम् ॥ न शून्याः पशवो रात्रौ स्थास्यंति विजने वने
sa jñātvā mānuṣeṇātra bhavitavyamasaṁśayam na śūnyāḥ paśavo rātrau sthāsyaṁti vijane vane
उसने यह जानकर कि निश्चय ही यहाँ किसी मनुष्य का होना अवश्यम्भावी है, क्योंकि पशु सुनसान वन में रात्रि में बिना रखवाले के नहीं रहते,
श्लोक 8 (skanda.6.133.8)
ततः फूत्कृत्य फूकृत्य दिवं यावन्न संदधे ॥ कश्चिद्वाचं प्रसुप्तश्च तावत्तत्रैव चिंतयन्
tataḥ phūtkṛtya phūkṛtya divaṁ yāvanna saṁdadhe kaścidvācaṁ prasuptaśca tāvattatraiva ciṁtayan
वह ऊँची फूँकार भरता रहा; परन्तु जब तक दिन नहीं हुआ, तब तक कोई भी वहाँ बोलता हुआ नहीं मिला, और वह सोया हुआ भी वहीं विचार करता रहा।
श्लोक 9 (skanda.6.133.9)
अवश्यं मानुषेणात्र पशूनां रक्षणाय च ॥ आगंतव्यं कुतोऽप्याशु तस्मात्तिष्ठामि निर्भयः
avaśyaṁ mānuṣeṇātra paśūnāṁ rakṣaṇāya ca āgaṁtavyaṁ kuto'pyāśu tasmāttiṣṭhāmi nirbhayaḥ
वह सोचता रहा - इन पशुओं की रक्षा के लिए निश्चय ही कोई मनुष्य शीघ्र ही कहीं से आएगा, अतः मैं निर्भय होकर यहीं ठहरता हूँ।
श्लोक 10 (skanda.6.133.10)
एवं तस्य प्रसुप्तस्य गता सा रजनी ततः ॥ ततस्त्वरितवत्तस्य सुश्रांतस्य द्विजोत्तमाः
evaṁ tasya prasuptasya gatā sā rajanī tataḥ tatastvaritavattasya suśrāṁtasya dvijottamāḥ
हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकार सोए हुए उस अत्यंत थके हुए ब्राह्मण की वह रात्रि शीघ्रता से बीत गई।
श्लोक 11 (skanda.6.133.11)
अथ यावत्प्रभाते स प्रपश्यति निजां तनुम् ॥ तावत्कुष्ठादिभी रोगैः समंतात्परिवारिताम्
atha yāvatprabhāte sa prapaśyati nijāṁ tanum tāvatkuṣṭhādibhī rogaiḥ samaṁtātparivāritām
फिर प्रातःकाल होने पर जैसे ही उसने अपने शरीर को देखा, वैसे ही उसे कोढ़ आदि रोगों से सब ओर से घिरा हुआ पाया।
श्लोक 12 (skanda.6.133.12)
अशक्तश्चलितुं स्थानादपि चैकं पदं क्वचित् ॥ तेजो हीनोऽपि रौद्रेण चिन्तयामास वै ततः
aśaktaścalituṁ sthānādapi caikaṁ padaṁ kvacit tejo hīno'pi raudreṇa cintayāmāsa vai tataḥ
वह उस स्थान से एक कदम भी हिलने में असमर्थ था, और भयंकर रोग से तेजहीन होकर भी सोचने लगा।
श्लोक 13 (skanda.6.133.13)
किमिदं कारणं येन ममैषा संस्थिता तनुः ॥ अकस्मादेव रोगोऽयं चलितुं नैव च क्षमः
kimidaṁ kāraṇaṁ yena mamaiṣā saṁsthitā tanuḥ akasmādeva rogo'yaṁ calituṁ naiva ca kṣamaḥ
क्या कारण है कि मेरा शरीर इस अवस्था को प्राप्त हो गया? यह रोग अकस्मात् ही आ गया है, और मैं चलने में भी समर्थ नहीं हूँ।
श्लोक 14 (skanda.6.133.14)
एवं चिन्तयमानस्य तस्य विप्रस्य तत्क्षणात्॥ द्वादशार्कप्रतीकाशः पुरुषः समुपागतः
evaṁ cintayamānasya tasya viprasya tatkṣaṇāt dvādaśārkapratīkāśaḥ puruṣaḥ samupāgataḥ
इस प्रकार विचार करते हुए उस ब्राह्मण के पास उसी क्षण बारह सूर्यों के समान तेजस्वी एक पुरुष आ गया।
श्लोक 15 (skanda.6.133.15)
तं यूथं कालयामास ततः संज्ञाभिराह्वयन् ॥ पृथक्त्वेन समादाय यष्टिं सव्येन पाणिना
taṁ yūthaṁ kālayāmāsa tataḥ saṁjñābhirāhvayan pṛthaktvena samādāya yaṣṭiṁ savyena pāṇinā
वह उस झुंड को हाँकते हुए, संकेतों से उन्हें अलग-अलग बुलाते हुए, बाएँ हाथ में एक लाठी लिए हुए था।
श्लोक 16 (skanda.6.133.16)
अथापश्यत्स तं विप्रं व्याधिभिः सर्वतो वृतम्॥ अशक्तं चलितुं क्वापि ततः प्रोवाच सादरम्॥
athāpaśyatsa taṁ vipraṁ vyādhibhiḥ sarvato vṛtam aśaktaṁ calituṁ kvāpi tataḥ provāca sādaram
तब उसने उस ब्राह्मण को व्याधियों से सब ओर से घिरा हुआ और कहीं भी चलने में असमर्थ देखा, और आदरपूर्वक कहा।
श्लोक 17 (skanda.6.133.17)
कस्त्वमेवंविधः प्राप्तः स्थाने चात्र द्विजोत्तम ॥ नास्ति राज्ये मम व्याधिः कस्यचित्कुत्रचित्स्फुटम्
kastvamevaṁvidhaḥ prāptaḥ sthāne cātra dvijottama nāsti rājye mama vyādhiḥ kasyacitkutracitsphuṭam
हे श्रेष्ठ द्विज! इस स्थान पर इस अवस्था में तुम कौन आए हो? मेरे राज्य में तो किसी को भी कहीं भी स्पष्ट रूप से कोई रोग नहीं होता।
श्लोक 18 (skanda.6.133.18)
अजोनाम नरेन्द्रोऽहं यदि ते श्रोत्रमागतः॥ व्याधींश्च च्छागरूपेण रक्षामि जनकारणात्
ajonāma narendro'haṁ yadi te śrotramāgataḥ vyādhīṁśca cchāgarūpeṇa rakṣāmi janakāraṇāt
यदि तुमने सुना हो, तो मैं अज नामक राजा हूँ, और लोगों की भलाई के लिए व्याधियों को बकरी का रूप देकर उनकी रक्षा करता हूँ।
श्लोक 19 (skanda.6.133.19)
तस्माद्ब्रूहि शरीरस्थो यस्ते व्याधिर्व्यवस्थितः ॥ येनाऽहं निग्रहं तस्य करोमि द्विजसत्तम
tasmādbrūhi śarīrastho yaste vyādhirvyavasthitaḥ yenā'haṁ nigrahaṁ tasya karomi dvijasattama
इसलिए हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! बताओ कि तुम्हारे शरीर में कौन-सी व्याधि स्थित है, जिससे मैं उसका निग्रह कर सकूँ।
श्लोक 20 (skanda.6.133.20)
॥ ब्राह्मण उवाच ॥ तीर्थयात्रापरोऽहं च भ्रमामि क्षितिमंडले॥ क्रमेणाऽत्र समायातः क्षेत्रेऽस्मिन्हाटकेश्वरे
brāhmaṇa uvāca tīrthayātrāparo'haṁ ca bhramāmi kṣitimaṁḍale krameṇā'tra samāyātaḥ kṣetre'sminhāṭakeśvare
ब्राह्मण बोला - मैं तीर्थयात्रा में लगा हुआ पृथ्वीमंडल में घूमता हूँ, और क्रमशः इस हाटकेश्वर क्षेत्र में आ पहुँचा।
श्लोक 21 (skanda.6.133.21)
निशावक्त्रे नृपश्रेष्ठ वासः संचिंतितो मया ॥ दृष्ट्वाऽमूंश्च पशून्भूप मानुषं भाव्यमेव हि
niśāvaktre nṛpaśreṣṭha vāsaḥ saṁciṁtito mayā dṛṣṭvā'mūṁśca paśūnbhūpa mānuṣaṁ bhāvyameva hi
हे श्रेष्ठ राजन्! रात्रि के प्रारम्भ में मैंने यहाँ रहने का विचार किया; हे भूप! इन पशुओं को देखकर मुझे लगा कि यहाँ मनुष्य का होना अवश्यंभावी है।
श्लोक 22 (skanda.6.133.22)
ततश्चात्र प्रसुप्तोऽहं पशूनामंतिके नृप
tataścātra prasupto'haṁ paśūnāmaṁtike nṛpa
हे राजन्! तब मैं यहाँ इन पशुओं के निकट सो गया।
श्लोक 23 (skanda.6.133.23)
अथ यावत्प्रभातेऽहं प्रपश्यामि निजां तनुम्॥ तावत्कुष्ठादिरोगैश्च समंतात्परिवारिताम्
atha yāvatprabhāte'haṁ prapaśyāmi nijāṁ tanum tāvatkuṣṭhādirogaiśca samaṁtātparivāritām
फिर प्रातः होने पर जैसे ही मैंने अपने शरीर को देखा, वैसे ही उसे कोढ़ आदि रोगों से सब ओर से घिरा हुआ पाया।
श्लोक 24 (skanda.6.133.24)
नान्यत्किंचिन्नृपश्रेष्ठ कारणं वेद्मि तत्त्वतः ॥ किमेतेन नृपश्रेष्ठ भूयोभूयः प्रजल्पता ॥ बहुत्वात्कुरु तस्मान्मे यथा स्यान्नीरुजा तनुः॥
nānyatkiṁcinnṛpaśreṣṭha kāraṇaṁ vedmi tattvataḥ kimetena nṛpaśreṣṭha bhūyobhūyaḥ prajalpatā bahutvātkuru tasmānme yathā syānnīrujā tanuḥ
हे श्रेष्ठ राजन्! इसके अतिरिक्त मैं वास्तव में और कोई कारण नहीं जानता; हे राजन्! बार-बार बोलने से क्या लाभ - बहुत कहने के बदले तुम ऐसा करो जिससे मेरा शरीर रोगमुक्त हो जाए।
श्लोक 25 (skanda.6.133.25)
ततस्ते व्याधयः प्रोक्ता अजापालेन भूभुजा ॥ केनाज्ञा खंडिता मेऽद्य को वध्यः सांप्रतं मम
tataste vyādhayaḥ proktā ajāpālena bhūbhujā kenājñā khaṁḍitā me'dya ko vadhyaḥ sāṁprataṁ mama
तब राजा अजपाल ने उन व्याधियों से कहा - आज किसने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है? इस समय मेरे द्वारा वध्य कौन है?
श्लोक 26 (skanda.6.133.26)
॥ व्याधय ऊचुः ॥ मा कोपं कुरु भूपाल कृत्येऽस्मिंस्त्वं कथंचन ॥ यस्मादेष द्विजो विष्टः सांप्रतं व्याधिभिस्त्रिभिः
vyādhaya ūcuḥ mā kopaṁ kuru bhūpāla kṛtye'smiṁstvaṁ kathaṁcana yasmādeṣa dvijo viṣṭaḥ sāṁprataṁ vyādhibhistribhiḥ
व्याधियाँ बोलीं - हे राजन्! इस विषय में तुम किसी भी प्रकार क्रोध मत करो, क्योंकि यह ब्राह्मण इस समय तीन व्याधियों से ग्रस्त हुआ है।
श्लोक 27 (skanda.6.133.27)
राजयक्ष्मा च कुष्ठं च पामा च द्विजसत्तम ॥ एते संसर्गजा दोषास्त्रयोऽद्यापि प्रकीर्तिताः
rājayakṣmā ca kuṣṭhaṁ ca pāmā ca dvijasattama ete saṁsargajā doṣāstrayo'dyāpi prakīrtitāḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! राजयक्ष्मा (क्षय), कुष्ठ और पामा (खाज) - ये तीन दोष स्पर्श से उत्पन्न होने वाले कहे गए हैं।
श्लोक 28 (skanda.6.133.28)
एतेषां प्रथमौ यौ द्वौ निवृत्तिरहितौ स्मृतौ ॥ औषधैश्चैव मंत्रैश्च शेषा नाशं व्रजंति च
eteṣāṁ prathamau yau dvau nivṛttirahitau smṛtau auṣadhaiścaiva maṁtraiśca śeṣā nāśaṁ vrajaṁti ca
इनमें से जो प्रथम दो हैं, वे निवृत्ति-रहित कहे गए हैं; शेष सब औषधियों और मन्त्रों से नाश को प्राप्त हो जाते हैं।
श्लोक 29 (skanda.6.133.29)
आभ्यां च ब्रह्मशापोस्ति येन नास्ति निवर्तनम् ॥ तस्मादत्र नृपश्रेष्ठ कुरु यत्ते क्षमं भवेत्
ābhyāṁ ca brahmaśāposti yena nāsti nivartanam tasmādatra nṛpaśreṣṭha kuru yatte kṣamaṁ bhavet
इन दोनों के मूल में ब्रह्मशाप है, जिससे इनकी निवृत्ति नहीं होती; इसलिए हे श्रेष्ठ राजन्! इस विषय में जो तुम्हें उचित लगे वही करो।
श्लोक 30 (skanda.6.133.30)
एतेन ब्राह्मणेनैते स्पृष्टा राजंस्त्रयोपि च॥ तस्मात्तावत्तनुं चास्याविशतां तावसंशयम्॥
etena brāhmaṇenaite spṛṣṭā rājaṁstrayopi ca tasmāttāvattanuṁ cāsyāviśatāṁ tāvasaṁśayam
हे राजन्! इस ब्राह्मण के द्वारा ये तीनों ही स्पर्श किए गए हैं, इसलिए वे निःसंदेह इसके शरीर में प्रविष्ट हो गए हैं।
श्लोक 31 (skanda.6.133.31)
अपरं शृणु भूपाल वचनं नो मुखाच्च्युतम्॥ हिताय सर्वजंतूनां तव श्रेयोविवृद्धये॥
aparaṁ śṛṇu bhūpāla vacanaṁ no mukhāccyutam hitāya sarvajaṁtūnāṁ tava śreyovivṛddhaye
हे राजन्! हमारे मुख से निकला हुआ एक और वचन सुनो, जो सब प्राणियों के हित और तुम्हारे कल्याण की वृद्धि के लिए है।
श्लोक 32 (skanda.6.133.32)
यत्र स्थानं चिरं तत्र मेदिन्यां विहितं नृप। पुरीषं च समाविद्धा तेनैषा मेदिनी द्रुतम्॥
yatra sthānaṁ ciraṁ tatra medinyāṁ vihitaṁ nṛpa purīṣaṁ ca samāviddhā tenaiṣā medinī drutam
हे राजन्! जहाँ भी हमारा स्थान इस पृथ्वी पर चिरकाल तक बना रहा है, और मल से युक्त रहा है, उससे यह पृथ्वी शीघ्र ही (दूषित हो जाती है)।
श्लोक 33 (skanda.6.133.33)
कालांतरेपि ये मर्त्या भूम्यामस्यां समागताः। भूमेः स्पर्शं करिष्यंति ते भविष्यंति चेदृशाः॥
kālāṁtarepi ye martyā bhūmyāmasyāṁ samāgatāḥ bhūmeḥ sparśaṁ kariṣyaṁti te bhaviṣyaṁti cedṛśāḥ
आगे किसी भी समय जो भी मनुष्य इस भूमि पर आकर इस मिट्टी का स्पर्श करेंगे, वे भी ऐसे ही (रोगग्रस्त) हो जाएँगे।
श्लोक 34 (skanda.6.133.34)
वयं शेषा महाराज व्याधयो ये व्यवस्थिताः। त्वया मुक्त्वा भविष्यामो मन्त्रौषधवशानुगाः ॥
vayaṁ śeṣā mahārāja vyādhayo ye vyavasthitāḥ tvayā muktvā bhaviṣyāmo mantrauṣadhavaśānugāḥ
हे महाराज! हम शेष जो भी व्याधियाँ यहाँ स्थित हैं, तुम्हारे द्वारा छोड़े जाने पर मन्त्र और औषधि के वश में रहने वाली हो जाएँगी।
श्लोक 35 (skanda.6.133.35)
नैतौ पुनस्तु दुर्ग्राह्यौ ब्रह्मशाप समुद्भवौ ॥
naitau punastu durgrāhyau brahmaśāpa samudbhavau
किन्तु ब्रह्मशाप से उत्पन्न वे दोनों दुर्ग्राह्य रोग इससे मुक्त नहीं होंगे।
श्लोक 36 (skanda.6.133.36)
तच्छ्रुत्वा पार्थिवः सोऽपि तस्मिन्स्थाने व्यवस्थितः ॥ तं ब्राह्मणं पुनः प्राह न भेतव्यं त्वया द्विज
tacchrutvā pārthivaḥ so'pi tasminsthāne vyavasthitaḥ taṁ brāhmaṇaṁ punaḥ prāha na bhetavyaṁ tvayā dvija
यह सुनकर उस स्थान पर स्थित उस राजा ने फिर उस ब्राह्मण से कहा - हे द्विज! तुम्हें भयभीत नहीं होना चाहिए।
श्लोक 37 (skanda.6.133.37)
अहं त्वां रक्षयिष्यामि व्याधेरस्मात्सुदारुणात् ॥ अत्र तस्मात्प्रतीक्षस्व कञ्चित्कालं ममाज्ञया
ahaṁ tvāṁ rakṣayiṣyāmi vyādherasmātsudāruṇāt atra tasmātpratīkṣasva kañcitkālaṁ mamājñayā
मैं इस अत्यंत भयंकर व्याधि से तुम्हारी रक्षा करूँगा; इसलिए मेरी आज्ञा से यहीं कुछ समय प्रतीक्षा करो।
श्लोक 38 (skanda.6.133.38)
एवमुक्त्वा ततश्चक्रे तदर्थं सुमहत्तपः ॥ आराधयन्प्रभक्त्या च सम्यक्तां क्षेत्रदेवताम्
evamuktvā tataścakre tadarthaṁ sumahattapaḥ ārādhayanprabhaktyā ca samyaktāṁ kṣetradevatām
ऐसा कहकर उसने उसी उद्देश्य से महान तप किया, और उस क्षेत्रदेवता की भक्तिपूर्वक भली-भाँति आराधना की।
श्लोक 39 (skanda.6.133.39)
मुंडेनाथर्वशीर्षेण दिवारात्रमतंद्रितः॥ क्षेत्रपालोत्थसूक्तेन वास्तुसूक्तेन च द्विजाः॥
muṁḍenātharvaśīrṣeṇa divārātramataṁdritaḥ kṣetrapālotthasūktena vāstusūktena ca dvijāḥ
हे ब्राह्मणो! वह दिन-रात बिना आलस्य के मुण्ड नामक अथर्वशीर्ष सूक्त, क्षेत्रपाल-सूक्त और वास्तु-सूक्त के द्वारा (आराधना करता रहा)।
श्लोक 40 (skanda.6.133.40)
सिद्धार्थै रक्तपुष्पैश्च गुग्गुलेन सुधूपितैः॥ होमं कुर्वन्नृपः पश्चान्नीलरुद्रान्विशेषतः॥
siddhārthai raktapuṣpaiśca guggulena sudhūpitaiḥ homaṁ kurvannṛpaḥ paścānnīlarudrānviśeṣataḥ
वह राजा सफेद सरसों, लाल पुष्पों और गूगल की सुगंधित धूप के साथ, विशेष रूप से नीलरुद्र-मन्त्रों से हवन करता रहा।
श्लोक 41 (skanda.6.133.41)
अथ नक्तावसानेन तस्य होमस्य चोत्थिता॥ भित्त्वा धरातलं देवी मन्त्राकृष्टा विनिर्गता॥
atha naktāvasānena tasya homasya cotthitā bhittvā dharātalaṁ devī mantrākṛṣṭā vinirgatā
फिर रात्रि के अंत में उस हवन से आकृष्ट होकर वह देवी पृथ्वीतल को भेदकर प्रकट हुई।
श्लोक 42 (skanda.6.133.42)
देवता तस्य क्षेत्रस्य ततः प्रोवाच तं नृपम्॥
devatā tasya kṣetrasya tataḥ provāca taṁ nṛpam
उस क्षेत्र की वह देवता तब उस राजा से बोली।
श्लोक 43 (skanda.6.133.43)
एकाहं तव भूपाल होमस्यास्य प्रभावतः ॥ विनिर्गता धरापृष्ठात्क्षेत्रस्यास्याधिपा स्मृता
ekāhaṁ tava bhūpāla homasyāsya prabhāvataḥ vinirgatā dharāpṛṣṭhātkṣetrasyāsyādhipā smṛtā
हे राजन्! मैं तुम्हारे इस हवन के प्रभाव से पृथ्वीपृष्ठ से प्रकट हुई हूँ, और मुझे इस क्षेत्र की स्वामिनी कहा जाता है।
श्लोक 44 (skanda.6.133.44)
तस्माद्वद महाभाग यत्ते कृत्यं करोम्यहम् ॥ परां तुष्टिमनुप्राप्ता तस्माद्ब्रूहि यदीप्सितम्
tasmādvada mahābhāga yatte kṛtyaṁ karomyaham parāṁ tuṣṭimanuprāptā tasmādbrūhi yadīpsitam
इसलिए हे महाभाग! तुम्हारे लिए मैं जो कार्य करूँ, वह कहो; तुम्हारी भक्ति से मैं परम संतुष्ट हुई हूँ, अतः जो चाहते हो वह कहो।
श्लोक 45 (skanda.6.133.45)
॥ राजोवाच ॥ अत्र स्थाने सदा स्थेयं त्वया देवि विशेषतः ॥ व्याधिसंसर्गजो दोषो भूमेरस्या यथा व्रजेत्॥
rājovāca atra sthāne sadā stheyaṁ tvayā devi viśeṣataḥ vyādhisaṁsargajo doṣo bhūmerasyā yathā vrajet
राजा बोला - हे देवि! तुम इसी स्थान पर सदा विशेष रूप से निवास करो, जिससे इस भूमि से व्याधि-संसर्ग से उत्पन्न दोष दूर हो जाए।
श्लोक 46 (skanda.6.133.46)
अद्यप्रभृति देवेशि तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ नो चेदस्याः प्रसंगेन प्रभविष्यंति मानवाः
adyaprabhṛti deveśi tathā nītirvidhīyatām no cedasyāḥ prasaṁgena prabhaviṣyaṁti mānavāḥ
हे देवेशि! आज से वैसी ही व्यवस्था करो, अन्यथा इसके प्रभाव से मनुष्य (रोगग्रस्त) होते रहेंगे।
श्लोक 47 (skanda.6.133.47)
व्याधिग्रस्ता यथा विप्रो योऽयं संदृश्यते पुरः ॥ मयात्र व्याधयः कालं चिरं संस्थापिता यतः ॥ भविष्यति च मे दोषो नो चेद्देवि न संशयः
vyādhigrastā yathā vipro yo'yaṁ saṁdṛśyate puraḥ mayātra vyādhayaḥ kālaṁ ciraṁ saṁsthāpitā yataḥ bhaviṣyati ca me doṣo no ceddevi na saṁśayaḥ
जैसे यह ब्राह्मण अभी मेरे सामने रोगग्रस्त दिखाई दे रहा है, क्योंकि मैंने ही यहाँ इन व्याधियों को चिरकाल तक स्थापित रखा है, यदि तुम ऐसा नहीं करोगी तो हे देवि! निःसंदेह इसका दोष मुझे ही लगेगा।
श्लोक 48 (skanda.6.133.48)
तथायं ब्राह्मणो रोगात्त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि ॥ मुक्तो भवतु मेदिन्यामत्र स्थेयं सदा त्वया
tathāyaṁ brāhmaṇo rogāttvatprasādātsureśvari mukto bhavatu medinyāmatra stheyaṁ sadā tvayā
हे सुरेश्वरि! तुम्हारी कृपा से यह ब्राह्मण रोग से मुक्त हो, और तुम इस भूमि पर सदा यहीं निवास करो।
श्लोक 49 (skanda.6.133.49)
॥ क्षेत्रदेवतोवाच ॥ एतत्स्थानं मया सर्वं व्याधिदोषविवर्जितम् ॥ विहितं सर्वदैवात्र स्थास्येऽहमिह सर्वदा
kṣetradevatovāca etatsthānaṁ mayā sarvaṁ vyādhidoṣavivarjitam vihitaṁ sarvadaivātra sthāsye'hamiha sarvadā
क्षेत्रदेवता बोलीं - मैंने इस पूरे स्थान को व्याधि-दोष से रहित कर दिया है, और मैं सदा-सर्वदा यहीं निवास करूँगी।
श्लोक 50 (skanda.6.133.50)
सांप्रतं योऽत्र मे स्थाने व्याधिग्रस्तः समेष्यति ॥ पूजयिष्यति मां भक्त्या नीरोगः स भविष्यति
sāṁprataṁ yo'tra me sthāne vyādhigrastaḥ sameṣyati pūjayiṣyati māṁ bhaktyā nīrogaḥ sa bhaviṣyati
अब यहाँ मेरे इस स्थान पर जो भी रोगग्रस्त व्यक्ति आएगा और भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करेगा, वह नीरोग हो जाएगा।
श्लोक 51 (skanda.6.133.51)
तस्मादद्य द्विजेंद्रोऽयं मां पूजयतु सादरम् ॥ भक्त्या परमया युक्तः शुचिर्भूत्वा समाहितः॥
tasmādadya dvijeṁdro'yaṁ māṁ pūjayatu sādaram bhaktyā paramayā yuktaḥ śucirbhūtvā samāhitaḥ
इसलिए यह श्रेष्ठ ब्राह्मण आज परम भक्ति से युक्त, पवित्र और एकाग्रचित्त होकर आदरपूर्वक मेरी पूजा करे।
श्लोक 52 (skanda.6.133.52)
अत्र क्षेत्रे पराऽन्यास्ति विख्याता चंद्रकूपिका।॥ तस्यां स्नातु यथान्यायं नित्यमेव महीपते
atra kṣetre parā'nyāsti vikhyātā caṁdrakūpikā tasyāṁ snātu yathānyāyaṁ nityameva mahīpate
हे राजन्! इस क्षेत्र में एक और परम विख्यात चन्द्रकूपिका है; उसमें यह विधिपूर्वक नित्य ही स्नान करे।
श्लोक 53 (skanda.6.133.53)
दक्षशापप्रशप्तेन या चंद्रेण पुरा कृता ॥ स्वस्नानार्थं क्षयव्याधिप्रग्रस्तेन महात्मना।
dakṣaśāpapraśaptena yā caṁdreṇa purā kṛtā svasnānārthaṁ kṣayavyādhipragrastena mahātmanā
जिसे प्राचीनकाल में दक्ष के शाप से शापित, क्षय-रोग से ग्रस्त महात्मा चन्द्रमा ने अपने स्नान के लिए बनाया था।
श्लोक 54 (skanda.6.133.54)
तथा खण्डशिलानाम देवता चात्र तिष्ठति ॥ सौभाग्यकूपिकास्नानं कृत्वा तां च प्रपश्यतु
tathā khaṇḍaśilānāma devatā cātra tiṣṭhati saubhāgyakūpikāsnānaṁ kṛtvā tāṁ ca prapaśyatu
इसी प्रकार यहाँ खण्डशिला नाम की एक और देवता भी विराजमान है; वह सौभाग्यकूपिका में स्नान करके उसका भी दर्शन करे।
श्लोक 55 (skanda.6.133.55)
या कृता कामदेवेन कुष्ठग्रस्तेन वै पुरा। स्नपनार्थं च कुष्ठस्य विनाशाय च सादरम्॥
yā kṛtā kāmadevena kuṣṭhagrastena vai purā snapanārthaṁ ca kuṣṭhasya vināśāya ca sādaram
जिसे प्राचीनकाल में कोढ़ से ग्रस्त कामदेव ने अपने स्नान के लिए और कोढ़ के नाश के लिए आदरपूर्वक बनाया था।
श्लोक 56 (skanda.6.133.56)
तथा चाप्सरसां कुण्डमत्रास्ति नृपसत्तम ॥ तत्र स्नात्वा रवेरह्नि ततः पामा प्रशाम्यति
tathā cāpsarasāṁ kuṇḍamatrāsti nṛpasattama tatra snātvā raverahni tataḥ pāmā praśāmyati
हे श्रेष्ठ राजन्! इसी प्रकार यहाँ अप्सराओं का एक कुण्ड भी है; उसमें रविवार के दिन स्नान करने से पामा (खाज) रोग शांत हो जाता है।
श्लोक 57 (skanda.6.133.57)
॥ सूत उवाच ॥ ततः स ब्राह्मणः प्राप्य सुपुण्यां चन्द्रकूपिकाम् ॥ स्नानं कृत्वा च तां देवीं पूजयामास भक्तितः ॥ यावन्मासं ततो मुक्तः सत्वरं राजयक्ष्मणा
sūta uvāca tataḥ sa brāhmaṇaḥ prāpya supuṇyāṁ candrakūpikām snānaṁ kṛtvā ca tāṁ devīṁ pūjayāmāsa bhaktitaḥ yāvanmāsaṁ tato muktaḥ satvaraṁ rājayakṣmaṇā
सूत जी ने कहा - तब वह ब्राह्मण उस अत्यंत पवित्र चन्द्रकूपिका में पहुँचकर, स्नान करके, भक्तिपूर्वक उस देवी की पूजा करने लगा, और एक मास के भीतर ही शीघ्र राजयक्ष्मा से मुक्त हो गया।
श्लोक 58 (skanda.6.133.58)
ततः सौभाग्यकूपीं तां दृष्ट्वा कामविनिर्मिताम् ॥ तथा स्नानं विधायाथ पश्यन्खंडशिलां च ताम्
tataḥ saubhāgyakūpīṁ tāṁ dṛṣṭvā kāmavinirmitām tathā snānaṁ vidhāyātha paśyankhaṁḍaśilāṁ ca tām
फिर काम द्वारा निर्मित उस सौभाग्यकूपिका को देखकर तथा वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके, वह उस खण्डशिला का भी दर्शन करने लगा।
श्लोक 59 (skanda.6.133.59)
तद्वन्मासेन निर्मुक्तः कुष्ठेन द्विजसत्तमाः ॥ तस्या देव्याः प्रभावेन कूपिकायां विशेषतः।
tadvanmāsena nirmuktaḥ kuṣṭhena dvijasattamāḥ tasyā devyāḥ prabhāvena kūpikāyāṁ viśeṣataḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उसी प्रकार वह एक मास में ही उस देवी के प्रभाव से, विशेष रूप से उस कूपिका में, कोढ़ से मुक्त हो गया।
श्लोक 60 (skanda.6.133.60)
ततश्चाप्सरसां कुंडे स्नात्वैकं रविवासरम् ॥ पामया संपरित्यक्तो बुद्ध्येव विषयात्मकः
tataścāpsarasāṁ kuṁḍe snātvaikaṁ ravivāsaram pāmayā saṁparityakto buddhyeva viṣayātmakaḥ
फिर एक रविवार को अप्सराओं के कुंड में स्नान करके, जैसे विषयासक्त बुद्धि (सत्संग से) मुक्त हो जाती है, वैसे ही वह पामा रोग से मुक्त हो गया।
श्लोक 61 (skanda.6.133.61)
ततः स ब्राह्मणो जातो द्वादशार्कसमप्रभः ॥ तोषेण महता युक्तो दत्ताशीस्तस्य भूपतेः
tataḥ sa brāhmaṇo jāto dvādaśārkasamaprabhaḥ toṣeṇa mahatā yukto dattāśīstasya bhūpateḥ
तब वह ब्राह्मण बारह सूर्यों के समान तेजस्वी हो गया, और महान संतोष से युक्त होकर उस राजा से आशीर्वाद प्राप्त किया।
श्लोक 62 (skanda.6.133.62)
प्रययौ वांछितं देशमनुज्ञातश्च भूभुजा ॥ देवतायां प्रणामं च ताभ्यां कृत्वा पुनःपुनः
prayayau vāṁchitaṁ deśamanujñātaśca bhūbhujā devatāyāṁ praṇāmaṁ ca tābhyāṁ kṛtvā punaḥpunaḥ
राजा से अनुमति पाकर वह उस देवता को उन दोनों (राजा और देवी) को बार-बार प्रणाम करके अपने वांछित देश को चला गया।
श्लोक 63 (skanda.6.133.63)
सोपि राजा सदोषांस्तानजारूपान्विलोक्य च ॥ स्वस्यैव ब्राह्मणं दृष्ट्वा तं तथा संप्रहर्षितः
sopi rājā sadoṣāṁstānajārūpānvilokya ca svasyaiva brāhmaṇaṁ dṛṣṭvā taṁ tathā saṁpraharṣitaḥ
वह राजा भी उन दोष-रहित बकरी-रूपी व्याधियों को देखकर, और अपने ही उस ब्राह्मण को इस प्रकार (नीरोग) देखकर अत्यंत हर्षित हुआ।
श्लोक 64 (skanda.6.133.64)
स्वयं च प्रययौ तत्र यत्रस्थो हाटकेश्वरः ॥ तेनैव च शरीरेण निजकांतासमन्वितः
svayaṁ ca prayayau tatra yatrastho hāṭakeśvaraḥ tenaiva ca śarīreṇa nijakāṁtāsamanvitaḥ
वह स्वयं भी अपनी पत्नी के साथ उसी शरीर से वहाँ गया, जहाँ हाटकेश्वर विराजमान थे।
श्लोक 65 (skanda.6.133.65)
अजागृहे स्थिता यस्मात्सा देवी क्षेत्रदेवता ॥ अजागृहा ततः ख्याता सर्वत्रैव द्विजोत्तमाः
ajāgṛhe sthitā yasmātsā devī kṣetradevatā ajāgṛhā tataḥ khyātā sarvatraiva dvijottamāḥ
हे श्रेष्ठ द्विजो! क्योंकि वह क्षेत्रदेवी अजागृह में विराजमान हुई, इसलिए वह सर्वत्र 'अजागृहा' के नाम से विख्यात हो गई।
श्लोक 66 (skanda.6.133.66)
अद्यापि यक्ष्मणा ग्रस्तो यस्तां पूजयते नरः ॥ तैनैव विधिना सम्यक्स नीरोगो द्रुतं भवेत्॥
adyāpi yakṣmaṇā grasto yastāṁ pūjayate naraḥ tainaiva vidhinā samyaksa nīrogo drutaṁ bhavet
आज भी जो मनुष्य यक्ष्मा (क्षय-रोग) से ग्रस्त होकर उसी विधि से भली-भाँति उसकी पूजा करता है, वह शीघ्र ही नीरोग हो जाता है।