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नागर खण्ड · अध्याय 134

कामदेव का शाप तथा खण्डशिला और सौभाग्यकूप की उत्पत्ति

अध्याय 133अध्याय-सूचीअध्याय 135

श्लोक 1 (skanda.6.134.1)

॥ ऋषय ऊचुः ॥ यदा दक्षेण क्रुद्धेन पुरा शप्तो हिमद्युतिः ॥ तत्सर्वं भवता प्रोक्तं सोमनाथकथानकम्॥

ṛṣaya ūcuḥ yadā dakṣeṇa kruddhena purā śapto himadyutiḥ tatsarvaṁ bhavatā proktaṁ somanāthakathānakam

ऋषि बोले - जब क्रुद्ध दक्ष ने प्राचीनकाल में चन्द्रमा को शाप दिया था, वह सब सोमनाथ की कथा आपने हमें बता दी।

श्लोक 2 (skanda.6.134.2)

सांप्रतं वद कामस्य यथा कुष्ठोऽभवत्पुरा ॥ येन दोषेण शापश्च केन तस्य नियोजितः

sāṁprataṁ vada kāmasya yathā kuṣṭho'bhavatpurā yena doṣeṇa śāpaśca kena tasya niyojitaḥ

अब यह बताइए कि पूर्वकाल में कामदेव को कोढ़ कैसे हुआ, किस दोष के कारण और किसने उसे यह शाप दिया था।

श्लोक 3 (skanda.6.134.3)

शिलाखंडा च या देवी तथा सौभाग्यकूपिका ॥ यथा तत्र समुत्पन्ना तथाऽस्माकं प्रकीर्तय

śilākhaṁḍā ca yā devī tathā saubhāgyakūpikā yathā tatra samutpannā tathā'smākaṁ prakīrtaya

और शिलाखण्डा नामक जो देवी है तथा सौभाग्यकूपिका, वे वहाँ किस प्रकार उत्पन्न हुईं, वह भी हमें सुनाइए।

श्लोक 4 (skanda.6.134.4)

॥ सूत उवाच ॥ पुरासीद्ब्राह्मणो नाम हारीत इति विश्रुतः ॥ स तपस्तत्र संतेपे वानप्रस्थाश्रमे वसन्

sūta uvāca purāsīdbrāhmaṇo nāma hārīta iti viśrutaḥ sa tapastatra saṁtepe vānaprasthāśrame vasan

सूत जी ने कहा - प्राचीनकाल में हारीत नामक एक विख्यात ब्राह्मण थे, जो वानप्रस्थ आश्रम में रहते हुए वहाँ तप करते थे।

श्लोक 5 (skanda.6.134.5)

तस्य भार्याऽभवत्साध्वी रूपौदार्यसमन्विता ॥ त्रैलोक्यसुन्दरी साक्षाल्लक्ष्मीरिव मधुद्विषः

tasya bhāryā'bhavatsādhvī rūpaudāryasamanvitā trailokyasundarī sākṣāllakṣmīriva madhudviṣaḥ

उनकी पत्नी सुशीला, रूप और औदार्य से युक्त, त्रैलोक्य-सुन्दरी, मानो विष्णु की लक्ष्मी का ही साक्षात् स्वरूप थी।

श्लोक 6 (skanda.6.134.6)

ख्याता पूणकलानाम सर्वैः समुदितागुणैः ॥ तां दृष्ट्वा पद्मजोऽप्याशु कामस्य वशगोऽभवत्

khyātā pūṇakalānāma sarvaiḥ samuditāguṇaiḥ tāṁ dṛṣṭvā padmajo'pyāśu kāmasya vaśago'bhavat

वह पूर्णकला नाम से विख्यात थी, और समस्त गुणों से सम्पन्न थी; उसे देखकर कमल-नयन कामदेव भी तत्काल काम के वशीभूत हो गया।

श्लोक 7 (skanda.6.134.7)

कदाचिदपि स प्राप्तस्तस्मिन्क्षेत्रे मनोभवः ॥ सह रत्या तथा प्रीत्या कामेश्वरदिदृक्षया

kadācidapi sa prāptastasminkṣetre manobhavaḥ saha ratyā tathā prītyā kāmeśvaradidṛkṣayā

एक बार वह मनोभव (कामदेव) रति और प्रीति के साथ कामेश्वर के दर्शन की इच्छा से उस क्षेत्र में आया।

श्लोक 8 (skanda.6.134.8)

एतस्मिन्नंतरे सापि स्नानार्थं तत्र चागता ॥ कृत्वा वस्त्रपरित्यागं विवेश जलाशयम्

etasminnaṁtare sāpi snānārthaṁ tatra cāgatā kṛtvā vastraparityāgaṁ viveśa jalāśayam

इसी बीच वह (पूर्णकला) भी स्नान के लिए वहाँ आई, और वस्त्र त्यागकर जलाशय में प्रवेश किया।

श्लोक 9 (skanda.6.134.9)

अथ तां कामदेवोपि समालोक्य शुभाननाम्॥ आत्मीयैरपि निर्विद्धो हृदये पुष्पसायकैः

atha tāṁ kāmadevopi samālokya śubhānanām ātmīyairapi nirviddho hṛdaye puṣpasāyakaiḥ

तब उस शुभमुखी को देखकर कामदेव भी अपने ही पुष्प-बाणों से हृदय में बींध गया।

श्लोक 10 (skanda.6.134.10)

ततो रतिं परित्यक्त्वा प्रीतिं च शरपीडितः॥ विजनं कंचिदासाद्य प्रसुप्तः स तरोरधः

tato ratiṁ parityaktvā prītiṁ ca śarapīḍitaḥ vijanaṁ kaṁcidāsādya prasuptaḥ sa taroradhaḥ

तब बाणों से पीड़ित होकर उसने रति और प्रीति को छोड़ दिया, और किसी सूने स्थान में जाकर एक वृक्ष के नीचे सो गया।

श्लोक 11 (skanda.6.134.11)

गात्रैः पुलकितैः सर्वैर्निःश्वासान्निःश्वसन्मुहुः ॥ अग्निवर्णान्सुदीर्घांश्च बाष्प पूर्णविलोचनः

gātraiḥ pulakitaiḥ sarvairniḥśvāsānniḥśvasanmuhuḥ agnivarṇānsudīrghāṁśca bāṣpa pūrṇavilocanaḥ

उसका सारा शरीर रोमांचित था, वह बार-बार अग्नि के समान गहरी, लंबी साँसें ले रहा था, और उसके नेत्र अश्रुओं से भरे थे।

श्लोक 12 (skanda.6.134.12)

तिष्ठन्स दर्शने तस्या एकदृष्ट्या व्यलोकयत्॥ योगीव सुसमाधिस्थो ध्यायंस्तद्ब्रह्म संस्थितम्

tiṣṭhansa darśane tasyā ekadṛṣṭyā vyalokayat yogīva susamādhistho dhyāyaṁstadbrahma saṁsthitam

वह वहीं रहकर एकटक दृष्टि से उसे निहारता रहा, मानो कोई योगी सुसमाधि में स्थित होकर स्थित ब्रह्म का ध्यान कर रहा हो।

श्लोक 13 (skanda.6.134.13)

सापि कामं समालोक्य सानुरागं पुरः स्थितम् ॥ जृंभाभंगकृतास्यं च वेपमानशरीरकम्

sāpi kāmaṁ samālokya sānurāgaṁ puraḥ sthitam jṛṁbhābhaṁgakṛtāsyaṁ ca vepamānaśarīrakam

उसने भी कामदेव को अपने सामने स्थित, अनुराग से भरे, उबासी लेते हुए मुख वाले और काँपते शरीर वाले को देखा।

श्लोक 14 (skanda.6.134.14)

सापि तद्बाणनिर्भिन्ना साभिलाषा बभूव ह ॥ कामं प्रति विशेषेण तस्य रूपेण मोहिता

sāpi tadbāṇanirbhinnā sābhilāṣā babhūva ha kāmaṁ prati viśeṣeṇa tasya rūpeṇa mohitā

वह भी उसके बाणों से बिंधकर, उसके रूप से विशेष रूप से मोहित होकर, कामदेव के प्रति अभिलाषा से युक्त हो गई।

श्लोक 15 (skanda.6.134.15)

अथ तस्माज्जलात्कृच्छ्राद्विनिष्क्रम्य शुचिस्मिता ॥ तीरोपांतं समासाद्य स्थिता तद्दृष्टिगोचरे

atha tasmājjalātkṛcchrādviniṣkramya śucismitā tīropāṁtaṁ samāsādya sthitā taddṛṣṭigocare

तब वह शुद्ध-हास्यमयी बड़ी कठिनाई से उस जल से बाहर निकली, और तट के निकट जाकर उसकी दृष्टि के सामने खड़ी हो गई।

श्लोक 16 (skanda.6.134.16)

ततः कामः समुत्थाय शनैस्तदंतिकं ययौ ॥ कृतांजलिपुटो भूत्वा ततः प्रोवाच सादरम्

tataḥ kāmaḥ samutthāya śanaistadaṁtikaṁ yayau kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā tataḥ provāca sādaram

तब कामदेव उठकर धीरे-धीरे उसके निकट गया, और हाथ जोड़कर आदरपूर्वक कहने लगा।

श्लोक 17 (skanda.6.134.17)

का त्वमत्र विशालाक्षि प्राप्ता स्नातुं जलाशये ॥ मम नाशाय चार्वंगि तस्माच्छृणु वचो मम

kā tvamatra viśālākṣi prāptā snātuṁ jalāśaye mama nāśāya cārvaṁgi tasmācchṛṇu vaco mama

हे विशाल-नयनी! तुम कौन हो, जो यहाँ इस जलाशय में स्नान करने आई हो? हे सुन्दरांगी! तुम मेरे नाश के लिए ही आई हो, अतः मेरी बात सुनो।

श्लोक 18 (skanda.6.134.18)

अहं पुष्पशरो लोके प्रसिद्धश्चारुहासिनि ॥ विडंबनां मया नीता देवा अपि निजैः शरैः

ahaṁ puṣpaśaro loke prasiddhaścāruhāsini viḍaṁbanāṁ mayā nītā devā api nijaiḥ śaraiḥ

हे मधुर-हासिनी! मैं संसार में पुष्पशर (कामदेव) के नाम से प्रसिद्ध हूँ; मैंने अपने ही बाणों से बड़े-बड़े देवताओं को भी विडम्बना में डाला है।

श्लोक 19 (skanda.6.134.19)

मद्बाणेनाहतो रुद्रः स्वशरीरे नितंबिनीम् ॥ अर्द्धेन धारयामास त्यक्त्वा लज्जां सुदूरतः

madbāṇenāhato rudraḥ svaśarīre nitaṁbinīm arddhena dhārayāmāsa tyaktvā lajjāṁ sudūrataḥ

मेरे बाण से आहत होकर रुद्र ने भी लज्जा को दूर छोड़कर अपने शरीर के आधे भाग में एक सुन्दरी को धारण कर लिया।

श्लोक 20 (skanda.6.134.20)

ब्रह्मा मच्छरनिर्भिन्नः स्वसुतां चकमे ततः ॥ जनयामास तान्विप्रान्वालखिल्यांस्तथाविधान्

brahmā maccharanirbhinnaḥ svasutāṁ cakame tataḥ janayāmāsa tānviprānvālakhilyāṁstathāvidhān

ब्रह्मा भी मेरे बाण से बिंधकर अपनी ही पुत्री की कामना करने लगे थे, जिससे उन्होंने वालखिल्य नामक उन प्रसिद्ध ऋषियों को उत्पन्न किया।

श्लोक 21 (skanda.6.134.21)

अहिल्यां चकमे शक्रो गौतमस्य प्रियां सतीम् ॥ मद्बाणैः पीडितोऽतीव स्वर्गादेत्य धरातलम्

ahilyāṁ cakame śakro gautamasya priyāṁ satīm madbāṇaiḥ pīḍito'tīva svargādetya dharātalam

इंद्र भी मेरे बाणों से अत्यंत पीड़ित होकर स्वर्ग से पृथ्वीतल पर आकर गौतम की प्रिय सती अहल्या की कामना करने लगे।

श्लोक 22 (skanda.6.134.22)

एवं देवा अपि क्षुण्णा मच्छरैर्ये महत्तराः ॥ किं पुनर्मानवाः सुभ्रूः कृमिप्रायाः सुचंचलाः

evaṁ devā api kṣuṇṇā maccharairye mahattarāḥ kiṁ punarmānavāḥ subhrūḥ kṛmiprāyāḥ sucaṁcalāḥ

हे सुभ्रु! इस प्रकार जो महान देवता भी मेरे बाणों से पराजित हो गए, फिर कृमि के समान चंचल मनुष्यों की तो बात ही क्या?

श्लोक 23 (skanda.6.134.23)

आकीटांतं जगत्सर्वमाब्रह्मांतं तथैव च ॥ विडंबनां परां प्राप्तं मच्छरैश्चारुहासिनि

ākīṭāṁtaṁ jagatsarvamābrahmāṁtaṁ tathaiva ca viḍaṁbanāṁ parāṁ prāptaṁ maccharaiścāruhāsini

हे मधुर-हासिनी! कीट से लेकर ब्रह्मा तक यह सारा जगत मेरे बाणों से ही परम विडम्बना को प्राप्त हुआ है।

श्लोक 24 (skanda.6.134.24)

अहं पुनस्त्वया भीरु नीतोऽवस्थामिमां शुभे

ahaṁ punastvayā bhīru nīto'vasthāmimāṁ śubhe

हे भीरु, हे शुभे! और मैं स्वयं तुम्हारे द्वारा ही इस अवस्था को पहुँचाया गया हूँ।

श्लोक 25 (skanda.6.134.25)

तस्माद्देहि महाभागे ममाद्य रतदक्षिणाम् ॥ यावन्न यांति संत्यज्य मम प्राणाः कलेवरात्॥

tasmāddehi mahābhāge mamādya ratadakṣiṇām yāvanna yāṁti saṁtyajya mama prāṇāḥ kalevarāt

इसलिए हे महाभागे! मुझे आज रति की दक्षिणा दो, इससे पहले कि मेरे प्राण इस शरीर को छोड़कर चले जाएँ।

श्लोक 26 (skanda.6.134.26)

॥ सूत उवाच ॥ सापि तद्वचनं श्रुत्वा पतिव्रतपरायणा ॥ हन्यमाना विशेषेण तद्बाणैर्हृदये भृशम्

sūta uvāca sāpi tadvacanaṁ śrutvā pativrataparāyaṇā hanyamānā viśeṣeṇa tadbāṇairhṛdaye bhṛśam

सूत जी ने कहा - पतिव्रता-धर्म में तत्पर वह स्त्री यह वचन सुनकर, उसके बाणों से हृदय में विशेष रूप से अत्यंत आहत होकर,

श्लोक 27 (skanda.6.134.27)

अनभिज्ञा च सा साध्वी कामधर्मस्य केवलम् ॥ तापसैः सह संवृद्धा नान्यं जानाति किंचन

anabhijñā ca sā sādhvī kāmadharmasya kevalam tāpasaiḥ saha saṁvṛddhā nānyaṁ jānāti kiṁcana

वह सती केवल काम-धर्म से अनभिज्ञ थी, क्योंकि वह तपस्वियों के साथ पली-बढ़ी थी और इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं जानती थी।

श्लोक 28 (skanda.6.134.28)

वक्तुं तद्विषये यच्च प्रोच्यते कामपीडितैः ॥ अधोमुखाऽलिखद्भूमिमंगुष्ठेन स्थिता चिरम्

vaktuṁ tadviṣaye yacca procyate kāmapīḍitaiḥ adhomukhā'likhadbhūmimaṁguṣṭhena sthitā ciram

काम से पीड़ित लोग इस विषय में जो कुछ कहते हैं, उसका उत्तर देने में असमर्थ होकर, वह मुँह नीचा किए, अंगूठे से धरती को कुरेदती हुई देर तक खड़ी रही।

श्लोक 29 (skanda.6.134.29)

एतस्मिन्नन्तरे भानुः प्राप्तश्चास्तं गिरिं प्रति ॥ विहारसमये प्राप्त आहिताग्निर्निवेशने

etasminnantare bhānuḥ prāptaścāstaṁ giriṁ prati vihārasamaye prāpta āhitāgnirniveśane

इसी बीच सूर्य अस्ताचल की ओर पहुँच गया; यह वह समय था जब अग्निहोत्री अपने घर में विहार के लिए आ जाता है।

श्लोक 30 (skanda.6.134.30)

हारीतोऽपि चिरं वीक्ष्य तन्मार्गं चाकृताशनः ॥ ततः स चिंतयामास कस्मात्सा चात्र नागता

hārīto'pi ciraṁ vīkṣya tanmārgaṁ cākṛtāśanaḥ tataḥ sa ciṁtayāmāsa kasmātsā cātra nāgatā

हारीत भी बिना भोजन किए देर तक उसके मार्ग को देखते रहे, और फिर सोचने लगे कि वह अब तक यहाँ क्यों नहीं आई।

श्लोक 31 (skanda.6.134.31)

स्नात्वा तीर्थवरे तस्मिन्दृष्ट्वा तां चन्द्रकूपिकाम्॥ कामेश्वरं च देवेशं कामदं सुखदं नृणाम्

snātvā tīrthavare tasmindṛṣṭvā tāṁ candrakūpikām kāmeśvaraṁ ca deveśaṁ kāmadaṁ sukhadaṁ nṛṇām

वे उस श्रेष्ठ तीर्थ में स्नान करके, उस चन्द्रकूपिका को और मनुष्यों को कामना तथा सुख देने वाले देवेश कामेश्वर को दर्शन देकर,

श्लोक 32 (skanda.6.134.32)

ततः शिष्यसमायुक्तो वीक्षमाण इतस्ततः ॥ तं देशं समनुप्राप्तो यत्र तौ द्वावपि स्थितौ

tataḥ śiṣyasamāyukto vīkṣamāṇa itastataḥ taṁ deśaṁ samanuprāpto yatra tau dvāvapi sthitau

फिर शिष्यों के साथ इधर-उधर देखते हुए उसी स्थान पर पहुँच गए जहाँ वे दोनों (काम और पूर्णकला) खड़े थे।

श्लोक 33 (skanda.6.134.33)

आलपन्बहुधा कामो हन्यमानो निजैः शरैः ॥ सापि चैव विशेषेण व्रीडयाऽधोमुखी स्थिता

ālapanbahudhā kāmo hanyamāno nijaiḥ śaraiḥ sāpi caiva viśeṣeṇa vrīḍayā'dhomukhī sthitā

कामदेव अपने ही बाणों से आहत होकर बहुत प्रकार से बोल रहा था, और वह (पूर्णकला) भी लज्जा से विशेष रूप से मुँह नीचा किए खड़ी थी।

श्लोक 34 (skanda.6.134.34)

स गुल्मांतरितः सर्वं तच्छ्रुत्वा कामजल्पितम् ॥ तस्याश्च तद्गतं भावं ततः कोपादुवाच सः

sa gulmāṁtaritaḥ sarvaṁ tacchrutvā kāmajalpitam tasyāśca tadgataṁ bhāvaṁ tataḥ kopāduvāca saḥ

वे एक झाड़ी की ओट में छिपे हुए कामदेव की सारी बातें सुनकर, और उसके भाव को भी जानकर, क्रोध से बोले।

श्लोक 35 (skanda.6.134.35)

यस्मात्पाप त्वया पत्नी ममैवं शरपीडिता ॥ अनभिज्ञा तथा साध्वी पतिधर्मपरायणा ॥ कुष्ठव्याधिसमायुक्तस्तस्माद्विप्रियदर्शनः

yasmātpāpa tvayā patnī mamaivaṁ śarapīḍitā anabhijñā tathā sādhvī patidharmaparāyaṇā kuṣṭhavyādhisamāyuktastasmādvipriyadarśanaḥ

हे पापी! जिस कारण तुमने मेरी इस साध्वी और पतिधर्मपरायण पत्नी को, जो इस विषय में अनभिज्ञ थी, अपने बाणों से इस प्रकार पीड़ित किया है, उसी कारण तुम कुष्ठव्याधि से युक्त होकर देखने में अप्रिय हो जाओगे।

श्लोक 36 (skanda.6.134.36)

त्वं भविष्यसि पापात्मन्मुक्तो दारैः स्वकैरपि ॥ साऽपि चैव विशेषेण व्रीडयाऽधोमुखी स्थिता

tvaṁ bhaviṣyasi pāpātmanmukto dāraiḥ svakairapi sā'pi caiva viśeṣeṇa vrīḍayā'dhomukhī sthitā

हे पापात्मन्! तुम अपनी ही पत्नियों से भी वंचित हो जाओगे; और वह (पूर्णकला) भी लज्जा से विशेष रूप से मुँह नीचा किए खड़ी रही।

श्लोक 37 (skanda.6.134.37)

एषापि च शिलाप्राया भविष्यति विचेतना ॥ त्वां दृष्ट्वा या सरागाऽभून्निजधर्मबहिष्कृता

eṣāpi ca śilāprāyā bhaviṣyati vicetanā tvāṁ dṛṣṭvā yā sarāgā'bhūnnijadharmabahiṣkṛtā

और यह स्त्री भी, जो तुम्हें देखकर अनुराग से युक्त होकर अपने धर्म से विचलित हुई, शिला के समान चेतनाहीन हो जाएगी।

श्लोक 38 (skanda.6.134.38)

ततः प्रसादयामास तं कामः प्रणिपत्य च ॥ न ज्ञातेयं मया विप्र तव भार्येति सुन्दरी

tataḥ prasādayāmāsa taṁ kāmaḥ praṇipatya ca na jñāteyaṁ mayā vipra tava bhāryeti sundarī

तब कामदेव ने प्रणाम करके उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न किया - हे विप्र! मैं नहीं जानता था कि यह सुन्दरी तुम्हारी पत्नी है।

श्लोक 39 (skanda.6.134.39)

तेन प्रोक्ता विरुद्धानि वाक्यानि विविधानि च ॥ एतस्या नास्ति दोषोऽत्र मद्बाणैः पीडिता भृशम्

tena proktā viruddhāni vākyāni vividhāni ca etasyā nāsti doṣo'tra madbāṇaiḥ pīḍitā bhṛśam

मैंने ही इससे विविध और अनुचित वचन कहे थे; इसमें कोई दोष नहीं है, यह तो मेरे ही बाणों से अत्यंत पीड़ित हुई थी।

श्लोक 40 (skanda.6.134.40)

सानुरागा परं जाता नोक्तं किंचिद्वचो मुने ॥ तस्मान्नार्हसि शापं त्वं दातुमस्याः कथंचन

sānurāgā paraṁ jātā noktaṁ kiṁcidvaco mune tasmānnārhasi śāpaṁ tvaṁ dātumasyāḥ kathaṁcana

हे मुने! यह केवल अनुराग से भर गई थी, इसने कोई वचन तक नहीं कहा; इसलिए तुम्हें इसे किसी भी प्रकार शाप देना उचित नहीं है।

श्लोक 41 (skanda.6.134.41)

ममास्त्येषो ऽपराधोऽत्र तस्मान्मे निग्रहं कुरु ॥ भूयोऽपि ब्राह्मणश्रेष्ठ अस्याः शापसमुद्भवम्

mamāstyeṣo 'parādho'tra tasmānme nigrahaṁ kuru bhūyo'pi brāhmaṇaśreṣṭha asyāḥ śāpasamudbhavam

इसमें अपराध मेरा ही है, इसलिए मुझे ही दण्ड दो; हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! इसके शाप को फिर से (हटा दो)।

श्लोक 42 (skanda.6.134.42)

अपि रुद्रादयो देवा मद्बाणेभ्यो द्विजोत्तम ॥ सोढुं शक्ता न ते यस्मात्तत्कथं स्यादियं शिला

api rudrādayo devā madbāṇebhyo dvijottama soḍhuṁ śaktā na te yasmāttatkathaṁ syādiyaṁ śilā

हे श्रेष्ठ द्विज! जब रुद्र आदि देवता भी मेरे बाणों को सहन करने में समर्थ नहीं हुए, तो यह स्त्री उन्हें कैसे सह सकती थी - अतः यह पत्थर कैसे बन सकती है?

श्लोक 43 (skanda.6.134.43)

तथात्र त्रिविधं पापं प्रवदंति मनीषिणः ॥ मानसं वाचिकं चैव कर्मजं च तृतीयकम्॥ तदस्माकं द्विधा जातमेकं चास्या मुनीश्वर।

tathātra trividhaṁ pāpaṁ pravadaṁti manīṣiṇaḥ mānasaṁ vācikaṁ caiva karmajaṁ ca tṛtīyakam tadasmākaṁ dvidhā jātamekaṁ cāsyā munīśvara

हे मुनीश्वर! विद्वज्जन तीन प्रकार का पाप बताते हैं - मानसिक, वाचिक और तीसरा कर्मज; हमारे लिए इनमें से दो प्रकार का पाप हुआ है, और इसके लिए केवल एक ही।

श्लोक 44 (skanda.6.134.44)

भार्यायास्ते सुरूपायास्तस्मात्संपूर्णनिग्रहम् ॥ करिष्यसि न ते भीतिः काचिदस्ति परत्रजा

bhāryāyāste surūpāyāstasmātsaṁpūrṇanigraham kariṣyasi na te bhītiḥ kācidasti paratrajā

इसलिए तुम अपनी सुन्दर पत्नी को पूर्ण दण्ड मत दो; तुम्हें परलोक के विषय में कोई भय नहीं है।

श्लोक 45 (skanda.6.134.45)

मनस्तापाद्व्रजेत्पापं मानसं वाचिकं च यत् ॥ तस्य प्रसादनेनैव यस्योपरि विजल्पितम्

manastāpādvrajetpāpaṁ mānasaṁ vācikaṁ ca yat tasya prasādanenaiva yasyopari vijalpitam

जो मानसिक और वाचिक पाप है, वह मन के पश्चाताप से ही, जिसके प्रति वह किया गया है उसकी प्रसन्नता मात्र से ही नष्ट हो जाता है।

श्लोक 46 (skanda.6.134.46)

प्रायश्चित्तैर्यथोक्तैश्च कर्मजं पातकं व्रजेत्। धर्मशास्त्रैः परिप्रोक्तं यतः सर्वैर्महामुने

prāyaścittairyathoktaiśca karmajaṁ pātakaṁ vrajet dharmaśāstraiḥ pariproktaṁ yataḥ sarvairmahāmune

हे महामुने! कर्म से उत्पन्न पाप शास्त्रोक्त प्रायश्चित्तों से नष्ट होता है, क्योंकि यह सब धर्मशास्त्रों में विस्तार से कहा गया है।

श्लोक 47 (skanda.6.134.47)

॥ हारीत उवाच ॥ अन्यत्र विषये तस्याः पातकं कामदेवते ॥ एतस्य तव धर्मस्य प्राधान्यं मनसः स्मृतम्

hārīta uvāca anyatra viṣaye tasyāḥ pātakaṁ kāmadevate etasya tava dharmasya prādhānyaṁ manasaḥ smṛtam

हारीत बोले - हे कामदेव! अन्य विषय में तो तुम्हारे इस पाप की बात होती, परंतु तुम्हारे इस कथन में मन की ही प्रधानता मानी गई है।

श्लोक 48 (skanda.6.134.48)

तस्मादेवंविधा चेयं सदा स्थास्यति चाधम ॥ किं पुनः कुरु यत्कृत्यं नाहं वक्ष्यामि किंचन

tasmādevaṁvidhā ceyaṁ sadā sthāsyati cādhama kiṁ punaḥ kuru yatkṛtyaṁ nāhaṁ vakṣyāmi kiṁcana

इसलिए हे नीच! यह इसी अवस्था में सदा रहेगी; अब जो करना हो वह तुम करो, मैं इस विषय में और कुछ नहीं कहूँगा।

श्लोक 49 (skanda.6.134.49)

प्रथमं मनसा सर्वं चिंत्यते तदनंतरम् ॥ ततः प्रजल्पते वाचा क्रियते कर्मणा ततः

prathamaṁ manasā sarvaṁ ciṁtyate tadanaṁtaram tataḥ prajalpate vācā kriyate karmaṇā tataḥ

सर्वप्रथम सब कुछ मन से सोचा जाता है, उसके बाद वाणी से कहा जाता है, और फिर कर्म से किया जाता है।

श्लोक 50 (skanda.6.134.50)

प्रमाणं हि मनस्तस्मात्सर्वकृत्येषु सर्वदा ॥ एतस्मात्कारणात्पूर्णो मयाऽस्या निग्रहः कृतः

pramāṇaṁ hi manastasmātsarvakṛtyeṣu sarvadā etasmātkāraṇātpūrṇo mayā'syā nigrahaḥ kṛtaḥ

इसलिए सब कार्यों में सदा मन ही प्रमाण होता है; इसी कारण मैंने इसे पूर्ण दण्ड दिया है।

श्लोक 51 (skanda.6.134.51)

॥ सूत उवाच ॥ एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठो हारीतः स्वाश्रमं ययौ ॥ सापि पूर्णकला जाता शिलारूपा च तत्क्षणात्

sūta uvāca evamuktvā muniśreṣṭho hārītaḥ svāśramaṁ yayau sāpi pūrṇakalā jātā śilārūpā ca tatkṣaṇāt

सूत जी ने कहा - ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ हारीत अपने आश्रम को चले गए, और वह पूर्णकला उसी क्षण शिला-रूप हो गई।

श्लोक 52 (skanda.6.134.52)

कामदेवोऽपि कुष्ठेन ग्रस्तो रौद्रेण च द्विजाः ॥ शीर्णनासांघ्रिपाणिश्च नेत्राणामप्रियोऽभवत्॥

kāmadevo'pi kuṣṭhena grasto raudreṇa ca dvijāḥ śīrṇanāsāṁghripāṇiśca netrāṇāmapriyo'bhavat

हे द्विजो! कामदेव भी उस भयंकर कोढ़ से ग्रस्त हो गया; उसकी नाक, पैर और हाथ गल गए, और वह देखने में अप्रिय हो गया।

श्लोक 53 (skanda.6.134.53)

अथ कामे निरुत्साहे संजाते द्विजसत्तमाः ॥ व्याधिग्रस्ते जगत्यस्मिन्सृष्टिरोधो व्यजायत

atha kāme nirutsāhe saṁjāte dvijasattamāḥ vyādhigraste jagatyasminsṛṣṭirodho vyajāyata

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जब काम व्याधिग्रस्त होकर उत्साहहीन हो गया, तब इस जगत में सृष्टि का अवरोध उत्पन्न हो गया।

श्लोक 54 (skanda.6.134.54)

केवलं क्षीयते लोको नैव वृद्धिं प्रगच्छति ॥ स्वेदजा येऽपि जीवाः स्युस्तेपि याताः परिक्षयम्

kevalaṁ kṣīyate loko naiva vṛddhiṁ pragacchati svedajā ye'pi jīvāḥ syustepi yātāḥ parikṣayam

संसार केवल क्षीण ही होने लगा, वृद्धि को प्राप्त नहीं हो रहा था; यहाँ तक कि जो जीव पसीने से उत्पन्न होते हैं, वे भी क्षीण होने लगे।

श्लोक 55 (skanda.6.134.55)

एतस्मिन्नंतरे देवाः सर्वे चिंतासमाकुलाः ॥ किमिदं क्षीयते लोको जलस्थैः स्थलजैः सह

etasminnaṁtare devāḥ sarve ciṁtāsamākulāḥ kimidaṁ kṣīyate loko jalasthaiḥ sthalajaiḥ saha

इसी बीच सब देवगण चिंता से व्याकुल होकर सोचने लगे - यह क्या हो रहा है, जल के और स्थल के जीवों सहित समस्त संसार क्षीण हो रहा है?

श्लोक 56 (skanda.6.134.56)

न दृश्यते क्वचिद्बालः कोऽपि कश्चित्कथंचन ॥ न च गर्भवती नारी कच्चित्क्षेमं स्मरस्य च

na dṛśyate kvacidbālaḥ ko'pi kaścitkathaṁcana na ca garbhavatī nārī kaccitkṣemaṁ smarasya ca

अब कहीं भी किसी भी प्रकार किसी बालक का दर्शन नहीं होता, न ही कोई स्त्री गर्भवती है - क्या कामदेव कुशल तो है?

श्लोक 57 (skanda.6.134.57)

ततस्तं व्याधिना ग्रस्तं ज्ञात्वात्र क्षेत्रसंश्रयम् ॥ आजग्मुस्त्वरिताः सर्वे व्याकुलेनांतरात्मना॥

tatastaṁ vyādhinā grastaṁ jñātvātra kṣetrasaṁśrayam ājagmustvaritāḥ sarve vyākulenāṁtarātmanā

तब उसे व्याधिग्रस्त और इस क्षेत्र में शरण लिए हुए जानकर, सब देवगण व्याकुल हृदय से शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 58 (skanda.6.134.58)

कामेश्वरपुरस्थं च तं दृष्ट्वा कुसुमायुधम्॥ अत्यंतविकृताकारं चिंतयानं महेश्वरम्

kāmeśvarapurasthaṁ ca taṁ dṛṣṭvā kusumāyudham atyaṁtavikṛtākāraṁ ciṁtayānaṁ maheśvaram

कामेश्वर के मन्दिर के सामने बैठे हुए, अत्यंत विकृत रूप वाले, महेश्वर का ध्यान करते हुए उस पुष्पबाण-धारी कामदेव को देखकर,

श्लोक 59 (skanda.6.134.59)

ततः प्रोचुः सुदुःखार्ताः किमिदं कुसुमायुध ॥ निरुत्साहः समुत्पन्नः कुष्ठव्याधिसमाकुलः

tataḥ procuḥ suduḥkhārtāḥ kimidaṁ kusumāyudha nirutsāhaḥ samutpannaḥ kuṣṭhavyādhisamākulaḥ

वे अत्यंत दुःखित होकर बोले - हे कुसुमायुध! यह क्या हो गया? तुम उत्साहहीन और कुष्ठव्याधि से पीड़ित कैसे हो गए?

श्लोक 60 (skanda.6.134.60)

ततश्चाधोमुखो जातो लज्जया परया वृतः ॥ प्रोवाच शापजं सर्वं हारीतस्य विचेष्टितम्

tataścādhomukho jāto lajjayā parayā vṛtaḥ provāca śāpajaṁ sarvaṁ hārītasya viceṣṭitam

तब वह लज्जा से अत्यंत आच्छादित होकर मुँह नीचा किए हुए, हारीत के शाप से उत्पन्न सारा वृत्तांत बता दिया।

श्लोक 61 (skanda.6.134.61)

ततस्ते विबुधाः प्रोचुः पातकं यद्गिरा कृतम् ॥३ तत्तस्याराधनात्सर्वं संक्षयं यात्यसंशयम्

tataste vibudhāḥ procuḥ pātakaṁ yadgirā kṛtam 3 tattasyārādhanātsarvaṁ saṁkṣayaṁ yātyasaṁśayam

तब उन देवगणों ने कहा - जो पाप वाणी से किया गया है, वह सब उसी (हारीत की पत्नी) की आराधना से निःसंदेह नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 62 (skanda.6.134.62)

तस्मादेतां शिलारूपां त्वमाराधय चित्तज ॥ येन कुष्ठः क्षयं याति ततस्तेजोऽभिवर्धते

tasmādetāṁ śilārūpāṁ tvamārādhaya cittaja yena kuṣṭhaḥ kṣayaṁ yāti tatastejo'bhivardhate

हे चित्तज! इसलिए तुम इस शिला-रूपिणी की आराधना करो, जिससे कोढ़ नष्ट हो जाए और तुम्हारा तेज फिर से बढ़ने लगे।

श्लोक 63 (skanda.6.134.63)

जगति स्यान्महासृष्टिर्देवकृत्यं कृतं भवेत् ॥ न तेऽस्ति कायजं पापं यतो मुक्त्वा प्रवाचिकम्

jagati syānmahāsṛṣṭirdevakṛtyaṁ kṛtaṁ bhavet na te'sti kāyajaṁ pāpaṁ yato muktvā pravācikam

इससे जगत में महासृष्टि पुनः संभव होगी, और देवताओं का कार्य भी सिद्ध होगा; तुम्हारे लिए वाचिक पाप के अतिरिक्त कोई शारीरिक पाप है भी नहीं।

श्लोक 64 (skanda.6.134.64)

अत्र कुण्डे त्वदीयेऽन्यो यः स्नात्वा श्रद्धयान्वितः ॥ एनां पापविनिर्मुक्तां शिलां वै मानवः स्पृशेत्

atra kuṇḍe tvadīye'nyo yaḥ snātvā śraddhayānvitaḥ enāṁ pāpavinirmuktāṁ śilāṁ vai mānavaḥ spṛśet

यहाँ तुम्हारे इस कुण्ड में जो भी अन्य मनुष्य श्रद्धापूर्वक स्नान करके पाप से मुक्त हुई इस शिला का स्पर्श करेगा,

श्लोक 65 (skanda.6.134.65)

कुष्ठव्याधिसमोपेतः कायोत्थेनापि कर्मणा ॥ सोऽपि व्याधिविनिर्मुक्तो भविष्यति गतज्वरः

kuṣṭhavyādhisamopetaḥ kāyotthenāpi karmaṇā so'pi vyādhivinirmukto bhaviṣyati gatajvaraḥ

वह भी, चाहे शरीर से उत्पन्न कर्म के कारण कुष्ठव्याधि से युक्त हो, व्याधि से मुक्त होकर ज्वर-रहित हो जाएगा।

श्लोक 66 (skanda.6.134.66)

एतत्सौभाग्यकूपं च लोके ख्यातं जलाशयम् ॥ भविष्यति न संदेहः सर्वरोगक्षयावहम्

etatsaubhāgyakūpaṁ ca loke khyātaṁ jalāśayam bhaviṣyati na saṁdehaḥ sarvarogakṣayāvaham

यह सौभाग्यकूप लोक में विख्यात जलाशय होगा, और निःसंदेह सब रोगों का नाश करने वाला होगा।

श्लोक 67 (skanda.6.134.67)

दद्रूणि दुर्विभूतानि तथान्याश्च विचर्चिकाः ॥ अत्र स्नातस्य यास्यंति दृष्ट्वैतां सद्य एव हि

dadrūṇi durvibhūtāni tathānyāśca vicarcikāḥ atra snātasya yāsyaṁti dṛṣṭvaitāṁ sadya eva hi

यहाँ स्नान करने वाले के दाद, कुष्ठादि विकार तथा अन्य त्वचा-रोग भी इसका दर्शन करते ही तत्काल नष्ट हो जाएँगे।

श्लोक 68 (skanda.6.134.68)

एवमुक्त्वाथ ते देवाः प्रजग्मुस्त्रिदशालयम् ॥ कामदेवोऽपि तत्रस्थस्तस्याः पूजामथ व्यधात्

evamuktvātha te devāḥ prajagmustridaśālayam kāmadevo'pi tatrasthastasyāḥ pūjāmatha vyadhāt

ऐसा कहकर वे देवगण अपने-अपने स्वर्गलोक को चले गए; कामदेव भी वहीं रहकर उस देवी की पूजा करने लगा।

श्लोक 69 (skanda.6.134.69)

ततश्च समतिक्रांते मासमात्रे द्विजोत्तमाः ॥ तादृग्रूपः स संजातो यादृगासीत्पुरा स्मरः

tataśca samatikrāṁte māsamātre dvijottamāḥ tādṛgrūpaḥ sa saṁjāto yādṛgāsītpurā smaraḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! फिर मात्र एक मास बीतने पर वह फिर से वैसा ही रूपवान् हो गया जैसा वह पहले, कामदेव के रूप में था।

श्लोक 70 (skanda.6.134.70)

ततश्चायतनं तस्याः कृत्वा श्रद्धासमन्वितः ॥ जगाम वांछितं देशं सृष्ट्यर्थं यत्नमास्थितः

tataścāyatanaṁ tasyāḥ kṛtvā śraddhāsamanvitaḥ jagāma vāṁchitaṁ deśaṁ sṛṣṭyarthaṁ yatnamāsthitaḥ

तब उसने श्रद्धापूर्वक उस देवी का मन्दिर बनाकर, सृष्टि-कार्य में प्रवृत्त होने के लिए, अपने इच्छित स्थान को प्रस्थान किया।

श्लोक 71 (skanda.6.134.71)

सापि नम्रमुखी तादृक्तेन शप्ता तथैव च ॥ संजाता खण्डकाकारा तेन खण्डशिला स्मृता

sāpi namramukhī tādṛktena śaptā tathaiva ca saṁjātā khaṇḍakākārā tena khaṇḍaśilā smṛtā

वह मुख नीचा किए हुए स्त्री भी, उस (हारीत) के द्वारा शापित होकर, खण्ड के आकार वाली हो गई, और इसीलिए वह खण्डशिला कहलाई।

श्लोक 72 (skanda.6.134.72)

यस्तां पूजयते भक्त्या त्रयोदश्यां तथैव च ॥ नापवादो भवेत्तस्य परदारसमुद्भवः

yastāṁ pūjayate bhaktyā trayodaśyāṁ tathaiva ca nāpavādo bhavettasya paradārasamudbhavaḥ

जो कोई भी त्रयोदशी के दिन भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करता है, उसे परस्त्री-गमन से उत्पन्न कोई कलंक नहीं लगता।

श्लोक 73 (skanda.6.134.73)

कामिन्याश्च विशेषेण प्राहैतच्छंकरात्मजः ॥ कार्तिकेयो द्विजश्रेष्ठाः सत्यमेतन्मयोदितम्

kāminyāśca viśeṣeṇa prāhaitacchaṁkarātmajaḥ kārtikeyo dvijaśreṣṭhāḥ satyametanmayoditam

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! विशेष रूप से किसी कामिनी के संदर्भ में शंकर-पुत्र कार्तिकेय ने यह कहा है, जो मैंने सत्य ही तुम्हें बताया है।

श्लोक 74 (skanda.6.134.74)

तथा कामेश्वरं देवं कामदेवप्रतिष्ठितम् ॥ त्रयोदश्यां समाराध्य सर्वान्कामानवाप्नुयात्

tathā kāmeśvaraṁ devaṁ kāmadevapratiṣṭhitam trayodaśyāṁ samārādhya sarvānkāmānavāpnuyāt

इसी प्रकार कामदेव द्वारा प्रतिष्ठापित कामेश्वर देव की त्रयोदशी के दिन भली-भाँति आराधना करके मनुष्य अपनी सब कामनाएँ प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 75 (skanda.6.134.75)

रतिप्रीतिसमायुक्तः स्थितस्तत्र स्मरस्तथा ॥ मूर्तो ब्राह्मणशार्दूलाः श्रेष्ठं प्रासादमाश्रितः।

ratiprītisamāyuktaḥ sthitastatra smarastathā mūrto brāhmaṇaśārdūlāḥ śreṣṭhaṁ prāsādamāśritaḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! रति और प्रीति के साथ वहाँ मूर्तिमान् कामदेव भी उस श्रेष्ठ प्रासाद में विराजमान है।

श्लोक 76 (skanda.6.134.76)

विरूपो दुर्भगो यो वा त्रयोदश्यां समाहितः ॥ यस्तं कुंकुमजैः पुष्पैः संपूजयति मानवः

virūpo durbhago yo vā trayodaśyāṁ samāhitaḥ yastaṁ kuṁkumajaiḥ puṣpaiḥ saṁpūjayati mānavaḥ

जो कुरूप या दुर्भाग्यशाली मनुष्य त्रयोदशी के दिन एकाग्रचित्त होकर उन्हें कुंकुम-रंजित पुष्पों से पूजता है,

श्लोक 77 (skanda.6.134.77)

स सौभाग्यसमायुक्तो रूपवांश्च प्रजायते ॥ या नारी पतिना त्यक्ता सपत्नीजनसंवृता

sa saubhāgyasamāyukto rūpavāṁśca prajāyate yā nārī patinā tyaktā sapatnījanasaṁvṛtā

वह सौभाग्य से युक्त और रूपवान् हो जाता है; और जो स्त्री अपने पति द्वारा त्यागी गई हो और सौतों से घिरी हो,

श्लोक 78 (skanda.6.134.78)

तं देवं सुकलत्राढ्यं तथैव परिपूजयेत् ॥ त्रयोदश्यां द्विजश्रेष्ठाः केसरैः कुंकुमोद्भवैः

taṁ devaṁ sukalatrāḍhyaṁ tathaiva paripūjayet trayodaśyāṁ dvijaśreṣṭhāḥ kesaraiḥ kuṁkumodbhavaiḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! वह भी सुन्दर पत्नी वाले उस देव की त्रयोदशी के दिन कुंकुम से उत्पन्न केसरों से इसी प्रकार पूजा करे।

श्लोक 79 (skanda.6.134.79)

सा सौभाग्यवती विप्रा जायते च प्रजावती ॥ धनधान्यसमृद्धा च दुःखशोकविवर्जिता ॥ दोषैः सर्वैर्विनिर्मुक्ता शंसिता धरणीतले

sā saubhāgyavatī viprā jāyate ca prajāvatī dhanadhānyasamṛddhā ca duḥkhaśokavivarjitā doṣaiḥ sarvairvinirmuktā śaṁsitā dharaṇītale

तब वह सौभाग्यवती और संतानवती हो जाती है, धन-धान्य से समृद्ध होती है, दुःख-शोक से रहित होती है, और सब दोषों से मुक्त होकर पृथ्वी पर प्रशंसित होती है।

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