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नागर खण्ड · अध्याय 135

दीर्घिका का पातिव्रत्य तथा माण्डव्य का शाप और मुक्ति

अध्याय 134अध्याय-सूचीअध्याय 136

श्लोक 1 (skanda.6.135.1)

॥ सूत उवाच ॥ तथान्यापि च तत्रास्ति दीर्घिकाख्या सुशोभना ॥ सरसी लोकविख्याता सर्वपातकनाशनी

sūta uvāca tathānyāpi ca tatrāsti dīrghikākhyā suśobhanā sarasī lokavikhyātā sarvapātakanāśanī

सूत जी ने कहा - वहाँ एक और भी अत्यंत सुन्दर सरोवर है, जो दीर्घिका के नाम से लोक में विख्यात है और सब पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 2 (skanda.6.135.2)

यस्यां स्नातो नरः सम्यग्भास्करस्योदयं प्रति ॥ ज्येष्ठशुक्लचतुर्दश्यां मुच्यते सर्वपातकैः

yasyāṁ snāto naraḥ samyagbhāskarasyodayaṁ prati jyeṣṭhaśuklacaturdaśyāṁ mucyate sarvapātakaiḥ

ज्येष्ठ मास की शुक्ल चतुर्दशी को सूर्योदय के समय जो मनुष्य विधिवत् उसमें स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.6.135.3)

आसीत्पूर्वं द्विजो वीरशर्मनामातिविश्रुतः ॥ वेदविद्याव्रतस्नातो वर्धमाने पुरोत्तमे

āsītpūrvaṁ dvijo vīraśarmanāmātiviśrutaḥ vedavidyāvratasnāto vardhamāne purottame

पूर्वकाल में वर्धमान नामक श्रेष्ठ नगर में वीरशर्मा नाम से अत्यंत विख्यात एक ब्राह्मण था, जो वेद-विद्या और व्रत में स्नातक था।

श्लोक 4 (skanda.6.135.4)

तस्य कन्या समुत्पन्ना कदाचिल्लक्षणाच्च्युता ॥ अतिदीर्घा प्रमाणेन जनहास्यविवर्द्धिनी

tasya kanyā samutpannā kadācillakṣaṇāccyutā atidīrghā pramāṇena janahāsyavivarddhinī

उसके एक कन्या उत्पन्न हुई, जो शुभ लक्षणों से रहित थी, अत्यंत लंबे कद वाली थी, और लोगों की हँसी बढ़ाने वाली थी।

श्लोक 5 (skanda.6.135.5)

ततः सा यौवनं प्राप्ता तद्रूपापि कुमारिका ॥ न कश्चिद्वरयामास शास्त्रवाक्यमनुस्मरन्

tataḥ sā yauvanaṁ prāptā tadrūpāpi kumārikā na kaścidvarayāmāsa śāstravākyamanusmaran

वह कुमारी उस रूप में ही यौवन को प्राप्त हुई, फिर भी शास्त्र-वचन का स्मरण करने वाला कोई भी पुरुष उसे वरण नहीं करता था।

श्लोक 6 (skanda.6.135.6)

अतिसंक्षिप्तकेशा या अतिदीर्घातिवामना ॥ उद्वाहयति यः कन्यां पुरुषः काममोहितः

atisaṁkṣiptakeśā yā atidīrghātivāmanā udvāhayati yaḥ kanyāṁ puruṣaḥ kāmamohitaḥ

जो कन्या अत्यंत छोटे केशों वाली हो या अत्यंत लंबी अथवा अत्यंत बौनी हो, ऐसी कन्या से जो पुरुष काम-मोहित होकर विवाह करता है,

श्लोक 7 (skanda.6.135.7)

षण्मासाभ्यंतरे मृत्युं स प्राप्नोति नरो ध्रुवम् ॥ एतस्मात्कारणात्सर्वे तां त्यजंति कुमारिकाम्

ṣaṇmāsābhyaṁtare mṛtyuṁ sa prāpnoti naro dhruvam etasmātkāraṇātsarve tāṁ tyajaṁti kumārikām

वह पुरुष निश्चय ही छह महीने के भीतर मृत्यु को प्राप्त होता है - इसी कारण सब लोग उस कन्या को त्याग देते थे।

श्लोक 8 (skanda.6.135.8)

पुरुषा अतिदीर्घत्वयुक्तां वीक्ष्य समंततः ॥ ततो वैराग्यमापन्ना तपस्तेपेऽतिदारुणम्॥

puruṣā atidīrghatvayuktāṁ vīkṣya samaṁtataḥ tato vairāgyamāpannā tapastepe'tidāruṇam

पुरुषों को उसके अत्यंत लंबे कद के कारण सब ओर से उसे छोड़ते देखकर, वह वैराग्य को प्राप्त हुई और अत्यंत कठोर तप करने लगी।

श्लोक 9 (skanda.6.135.9)

चांद्रायणानि कृच्छ्राणि तया चीर्णान्यनेकशः ॥ पाराकाणि यथोक्तानि तथा सांतपनानि च

cāṁdrāyaṇāni kṛcchrāṇi tayā cīrṇānyanekaśaḥ pārākāṇi yathoktāni tathā sāṁtapanāni ca

उसने अनेक बार चान्द्रायण व्रत, कृच्छ्र व्रत, यथोक्त पाराक व्रत तथा सांतपन व्रत का पालन किया।

श्लोक 10 (skanda.6.135.10)

व्रतं यद्विद्यते किंचिन्नियमः संयमस्तथा ॥ अन्यच्चापि शुभं कृत्यं तत्सर्वं च तया कृतम्

vrataṁ yadvidyate kiṁcinniyamaḥ saṁyamastathā anyaccāpi śubhaṁ kṛtyaṁ tatsarvaṁ ca tayā kṛtam

जो भी व्रत, नियम और संयम विद्यमान थे, तथा अन्य जो भी शुभ कृत्य थे, वह सब उसने किया।

श्लोक 11 (skanda.6.135.11)

एवं तस्या व्रतस्थाया जरा सम्यगुपस्थिता ॥ तथापि तेजसो वृद्धिर्ववृधे तपसा कृता

evaṁ tasyā vratasthāyā jarā samyagupasthitā tathāpi tejaso vṛddhirvavṛdhe tapasā kṛtā

इस प्रकार व्रत में स्थित रहते-रहते उसे भली-भाँति वृद्धावस्था आ पहुँची, फिर भी तप से उत्पन्न उसके तेज की वृद्धि होती रही।

श्लोक 12 (skanda.6.135.12)

सा च नित्यं महेन्द्रस्य सभां यात्यतिकौतुकात् ॥ देवर्षीणां मतं श्रोतुं देवतानां विशेषतः

sā ca nityaṁ mahendrasya sabhāṁ yātyatikautukāt devarṣīṇāṁ mataṁ śrotuṁ devatānāṁ viśeṣataḥ

वह देवर्षियों और विशेष रूप से देवताओं का मत सुनने के लिए अत्यंत कौतूहलवश नित्य ही इंद्र की सभा में जाया करती थी।

श्लोक 13 (skanda.6.135.13)

यदा सा स्वासनं त्यक्त्वा प्रयाति स्वगृहोन्मुखी ॥ तदैवाभ्युक्षणं चक्रुस्तत्र शक्रस्य किंकराः

yadā sā svāsanaṁ tyaktvā prayāti svagṛhonmukhī tadaivābhyukṣaṇaṁ cakrustatra śakrasya kiṁkarāḥ

जब वह अपना आसन छोड़कर अपने घर की ओर जाने लगती, तभी इंद्र के सेवक वहाँ उसके आसन पर जल छिड़क दिया करते थे।

श्लोक 14 (skanda.6.135.14)

तथान्यदिवसे दृष्टं क्रियमाणं तया हि तत् ॥ अभ्युक्षणं स्वकीये च आसने द्विजसत्तमाः ॥

tathānyadivase dṛṣṭaṁ kriyamāṇaṁ tayā hi tat abhyukṣaṇaṁ svakīye ca āsane dvijasattamāḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इसी प्रकार दूसरे दिन भी उसने अपने ही आसन पर वह जल-छिड़काव किया जाता हुआ देखा।

श्लोक 15 (skanda.6.135.15)

ततः कोपपरीतांगी दीर्घिका सा कुमारिका ॥ त्रिशाखां भृकुटीं कृत्वा ततः प्राह पुरंदरम्

tataḥ kopaparītāṁgī dīrghikā sā kumārikā triśākhāṁ bhṛkuṭīṁ kṛtvā tataḥ prāha puraṁdaram

तब क्रोध से भर उठी वह दीर्घ कुमारी भौंहें तीन शाखाओं में चढ़ाकर इंद्र से बोली।

श्लोक 16 (skanda.6.135.16)

किं दोषं वीक्ष्य मे शक्र प्रोक्षितं चासनं त्वया ॥ परद्वारकृतं दोषं किं मयैतत्कृतं क्वचित्

kiṁ doṣaṁ vīkṣya me śakra prokṣitaṁ cāsanaṁ tvayā paradvārakṛtaṁ doṣaṁ kiṁ mayaitatkṛtaṁ kvacit

हे शक्र! मुझमें कौन-सा दोष देखकर तुमने मेरा आसन छिड़का है? क्या मैंने कभी परस्त्रीगमन जैसा कोई दोष किया है?

श्लोक 17 (skanda.6.135.17)

तस्मान्मे पातकं ब्रूहि नो चेच्छापं सुदारुणम् ॥ त्वयि दास्याम्यसंदिग्धं सत्ये नात्मानमालभे

tasmānme pātakaṁ brūhi no cecchāpaṁ sudāruṇam tvayi dāsyāmyasaṁdigdhaṁ satye nātmānamālabhe

इसलिए मेरा पाप मुझे बताओ, अन्यथा मैं निःसंदेह तुम्हें अत्यंत भयंकर शाप दूँगी; सत्य में मैं अपने आपको संयत नहीं रख सकूँगी।

श्लोक 18 (skanda.6.135.18)

॥ इन्द्र उवाच ॥ न ते दीर्घेऽस्तिदोषोत्र कश्चिदेकं विना शुभे ॥ तेनाथ क्रियते चैतदासनस्याभिषेचनम्॥

indra uvāca na te dīrghe'stidoṣotra kaścidekaṁ vinā śubhe tenātha kriyate caitadāsanasyābhiṣecanam

इंद्र बोले - हे दीर्घे, हे शुभे! तुझमें एक के अतिरिक्त कोई दोष नहीं है, उसी एक कारण से आसन का यह अभिषेचन किया जाता है।

श्लोक 19 (skanda.6.135.19)

त्वं कुमार्यपि संप्राप्ता ऋतुकालं विगर्हिता ॥ तेन दोषं त्वमापन्ना नान्यदस्तीह कारणम्

tvaṁ kumāryapi saṁprāptā ṛtukālaṁ vigarhitā tena doṣaṁ tvamāpannā nānyadastīha kāraṇam

तुम कुमारी होते हुए भी ऋतुकाल को प्राप्त हो चुकी हो, यह निंदनीय है; उसी दोष को तुमने प्राप्त किया है, इसके अतिरिक्त और कोई कारण नहीं है।

श्लोक 20 (skanda.6.135.20)

तस्मादद्यापि त्वां कश्चिदुद्वाहयति तापसः ॥ त्वं तं वरय भर्त्तारं येन गच्छसि मेध्यताम्

tasmādadyāpi tvāṁ kaścidudvāhayati tāpasaḥ tvaṁ taṁ varaya bharttāraṁ yena gacchasi medhyatām

इसलिए यदि आज भी कोई तपस्वी तुम्हारे साथ विवाह कर ले, तो उसी को अपना पति चुन लो, जिससे तुम पवित्रता को प्राप्त हो सको।

श्लोक 21 (skanda.6.135.21)

ततश्च लज्जया युक्ता सा तदा दीर्घकन्यका ॥ गत्वा भूमितले तूर्णं वर्धमाने पुरोत्तमे

tataśca lajjayā yuktā sā tadā dīrghakanyakā gatvā bhūmitale tūrṇaṁ vardhamāne purottame

तब लज्जा से युक्त होकर वह दीर्घ-कन्या शीघ्र ही पृथ्वी पर श्रेष्ठ नगर वर्धमान को चली गई।

श्लोक 22 (skanda.6.135.22)

ततः फूत्कर्तुमारब्धा चत्वरेषु त्रिकेषु च ॥ उच्छ्रित्य दक्षिणं पाणिं भ्रममाणा इतस्ततः

tataḥ phūtkartumārabdhā catvareṣu trikeṣu ca ucchritya dakṣiṇaṁ pāṇiṁ bhramamāṇā itastataḥ

वहाँ वह चौराहों और तिराहों पर अपना दायाँ हाथ ऊँचा उठाकर, इधर-उधर घूमते हुए ऊँची आवाज़ से पुकारने लगी।

श्लोक 23 (skanda.6.135.23)

यदि कश्चिद्द्विजो जात्या करोति मम सांप्रतम् ॥ पाणिग्राहं तपोऽर्द्धस्य श्रेयो यच्छामि तस्य च

yadi kaściddvijo jātyā karoti mama sāṁpratam pāṇigrāhaṁ tapo'rddhasya śreyo yacchāmi tasya ca

यदि जन्म से कोई ब्राह्मण अभी मेरा पाणिग्रहण कर ले, तो मैं उसे अपने आधे तप का पुण्य दे दूँगी।

श्लोक 24 (skanda.6.135.24)

एवं तां प्रविजल्पन्तीं श्रुत्वा लोका दिवानिशम् ॥ उन्मत्तामिति मन्वाना हास्यं चक्रुः परस्परम्

evaṁ tāṁ pravijalpantīṁ śrutvā lokā divāniśam unmattāmiti manvānā hāsyaṁ cakruḥ parasparam

इस प्रकार दिन-रात यह कहती हुई उसे सुनकर लोग उसे पागल समझकर आपस में उसका उपहास करने लगे।

श्लोक 25 (skanda.6.135.25)

ततः कतिपयाहस्य प्रकुर्वंती च दीर्घिका ॥ कुष्ठव्याधिगृहीतेन ब्राह्मणेन परिश्रुता

tataḥ katipayāhasya prakurvaṁtī ca dīrghikā kuṣṭhavyādhigṛhītena brāhmaṇena pariśrutā

फिर कुछ दिनों तक ऐसा करती रहने वाली दीर्घिका को कोढ़-रोग से ग्रस्त एक ब्राह्मण ने सुना।

श्लोक 26 (skanda.6.135.26)

ततः प्रोवाच मन्दं स समाहूय सुदुःखिताम्

tataḥ provāca mandaṁ sa samāhūya suduḥkhitām

तब उसने अत्यंत दुःखी उस स्त्री को बुलाकर धीरे से कहा।

श्लोक 27 (skanda.6.135.27)

अहं त्वामुद्वहाम्यद्य कृत्वा पाणिग्रहं तव ॥ यदि मद्वचनं सर्वं सर्वदैवानुतिष्ठसि

ahaṁ tvāmudvahāmyadya kṛtvā pāṇigrahaṁ tava yadi madvacanaṁ sarvaṁ sarvadaivānutiṣṭhasi

मैं आज तुम्हारा पाणिग्रहण करके तुम्हारे साथ विवाह करूँगा, यदि तुम सदा मेरी हर बात का पालन करती रहो।

श्लोक 28 (skanda.6.135.28)

॥ कुमारिकोवाच ॥ करिष्यामि न संदेहस्तव वाक्यं द्विजाधिप ॥ कुरु पाणिग्रहं मेऽद्य विधिदृष्टेन कर्मणा

kumārikovāca kariṣyāmi na saṁdehastava vākyaṁ dvijādhipa kuru pāṇigrahaṁ me'dya vidhidṛṣṭena karmaṇā

कुमारी बोली - हे द्विजाधिप! मैं निःसंदेह आपकी हर बात का पालन करूँगी; आज विधिपूर्वक मेरा पाणिग्रहण कीजिए।

श्लोक 29 (skanda.6.135.29)

॥ सूत उवाच ॥ ततस्तस्याः कुमार्याः स पाणिं जग्राह दक्षिणम् ॥ गृह्योक्तेन विधानेन देवाग्निगुरुसंनिधौ

sūta uvāca tatastasyāḥ kumāryāḥ sa pāṇiṁ jagrāha dakṣiṇam gṛhyoktena vidhānena devāgnigurusaṁnidhau

सूत जी ने कहा - तब उसने देवता, अग्नि और गुरु की उपस्थिति में गृह्यसूत्रोक्त विधि से उस कुमारी का दाहिना हाथ ग्रहण किया।

श्लोक 30 (skanda.6.135.30)

अथ सा प्राह भूयोऽपि विवाहकृतमंगला ॥ आदेशं देहि मे नाथ यं करोमि तवाधुना

atha sā prāha bhūyo'pi vivāhakṛtamaṁgalā ādeśaṁ dehi me nātha yaṁ karomi tavādhunā

विवाह से मंगलमयी हुई वह फिर बोली - हे नाथ! अब मुझे आदेश दीजिए, जो मैं इस समय आपके लिए करूँ।

श्लोक 31 (skanda.6.135.31)

॥ पतिरुवाच ॥ अष्टषष्टिषु तीर्थेषु स्नातुमिच्छामि सुन्दरि ॥ साहाय्येन त्वदीयेन यदि शक्नोषि तत्कुरु

patiruvāca aṣṭaṣaṣṭiṣu tīrtheṣu snātumicchāmi sundari sāhāyyena tvadīyena yadi śaknoṣi tatkuru

पति बोला - हे सुन्दरी! मैं अड़सठ तीर्थों में स्नान करना चाहता हूँ; यदि तुम्हारी सहायता से यह संभव हो सके, तो ऐसा करो।

श्लोक 32 (skanda.6.135.32)

बाढमित्येव सा प्रोच्य ततस्तूर्णं पतिव्रता ॥ तत्प्रमाणं दृढं कृत्वा रम्यं वंशकुटीरकम्

bāḍhamityeva sā procya tatastūrṇaṁ pativratā tatpramāṇaṁ dṛḍhaṁ kṛtvā ramyaṁ vaṁśakuṭīrakam

'बहुत अच्छा' यह कहकर उस पतिव्रता ने तुरंत ही उसके शरीर के अनुरूप एक सुदृढ़ और सुन्दर बाँस की टोकरी बनाई।

श्लोक 33 (skanda.6.135.33)

मृदु तूलसमायुक्तं ततः प्राह निजं पतिम् ॥ कृतांजलिपुटा भूत्वा प्रहृष्टेनान्तरात्मना

mṛdu tūlasamāyuktaṁ tataḥ prāha nijaṁ patim kṛtāṁjalipuṭā bhūtvā prahṛṣṭenāntarātmanā

उसे मुलायम रुई से युक्त बनाकर, हर्षित हृदय से हाथ जोड़कर, उसने अपने पति से कहा।

श्लोक 34 (skanda.6.135.34)

एतत्तव कृते रम्यं कृतं वंशकुटीरकम् ॥ मम नाथारुहाशु त्वं येन कृत्वाथ मूर्धनि ॥ नयामि सर्वतीर्थेषु क्षेत्रेषु सुशुभेषु च

etattava kṛte ramyaṁ kṛtaṁ vaṁśakuṭīrakam mama nāthāruhāśu tvaṁ yena kṛtvātha mūrdhani nayāmi sarvatīrtheṣu kṣetreṣu suśubheṣu ca

हे नाथ! आपके लिए यह सुन्दर बाँस की टोकरी बनाई है; इसमें शीघ्र चढ़ जाइए, जिसे मैं अपने सिर पर रखकर सब तीर्थों और शुभ क्षेत्रों में ले जाऊँ।

श्लोक 35 (skanda.6.135.35)

ततः कुष्ठी प्रहृष्टात्मा शनैरुत्थाय भूतलात् ॥ तया चोद्धृतदेहः सन्सुप्तो वंशकुटीरके

tataḥ kuṣṭhī prahṛṣṭātmā śanairutthāya bhūtalāt tayā coddhṛtadehaḥ sansupto vaṁśakuṭīrake

तब वह कुष्ठी हर्षित होकर धीरे-धीरे भूतल से उठा, और उसके द्वारा उठाया जाकर उस बाँस की टोकरी में लेट गया।

श्लोक 36 (skanda.6.135.36)

ततस्तं मस्तके कृत्वा सर्वतीर्थे यथासुखम् ॥ सर्वक्षेत्रेषु बभ्राम स्नापयन्ती निजं पतिम्

tatastaṁ mastake kṛtvā sarvatīrthe yathāsukham sarvakṣetreṣu babhrāma snāpayantī nijaṁ patim

तब उसे अपने सिर पर रखकर, यथासुख सब तीर्थों और सब क्षेत्रों में घूमती हुई, वह अपने पति को स्नान कराती रही।

श्लोक 37 (skanda.6.135.37)

यथा यथा स चक्रेऽथ स्नानं तीर्थेषु कुष्ठभाक् ॥ तथातथास्य गात्रेषु तेजो वृद्धिं प्रगच्छति

yathā yathā sa cakre'tha snānaṁ tīrtheṣu kuṣṭhabhāk tathātathāsya gātreṣu tejo vṛddhiṁ pragacchati

वह कोढ़ी जैसे-जैसे तीर्थों में स्नान करता जाता था, वैसे-वैसे उसके अंगों में तेज बढ़ता जाता था।

श्लोक 38 (skanda.6.135.38)

ततः क्रमेण सा साध्वी भ्रममाणा महीतले ॥ हाटकेश्वरजे क्षेत्रे संप्राप्ता रजनी मुखे

tataḥ krameṇa sā sādhvī bhramamāṇā mahītale hāṭakeśvaraje kṣetre saṁprāptā rajanī mukhe

फिर पृथ्वीतल पर क्रमशः घूमती हुई वह साध्वी रात्रि के आरम्भ में हाटकेश्वर क्षेत्र में जा पहुँची।

श्लोक 39 (skanda.6.135.39)

क्लान्ता वैक्लव्यमापन्ना भाराक्रान्ता पतिव्रता ॥ निद्रान्धा निश्वसन्ती च प्रस्खलन्ती पदेपदे

klāntā vaiklavyamāpannā bhārākrāntā pativratā nidrāndhā niśvasantī ca praskhalantī padepade

वह पतिव्रता थककर व्याकुल हो गई थी, भार से दबी हुई थी, नींद से अंधी हो रही थी, हाँफती हुई और पग-पग पर लड़खड़ाती हुई चल रही थी।

श्लोक 40 (skanda.6.135.40)

अथ तत्र प्रदेशे तु माण्डव्यो मुनिपुंगवः ॥ शूलारोपितगात्रस्तु संतिष्ठति सुदुःखितः

atha tatra pradeśe tu māṇḍavyo munipuṁgavaḥ śūlāropitagātrastu saṁtiṣṭhati suduḥkhitaḥ

वहाँ उसी स्थान पर, शूल पर चढ़ाए गए शरीर वाले, मुनिश्रेष्ठ माण्डव्य अत्यंत दुःखी होकर विद्यमान थे।

श्लोक 41 (skanda.6.135.41)

अथ सा तं समासाद्य शूलं रात्रौ पतिव्रता ॥ निजगात्रेण भारार्त्ता गच्छमाना महासती

atha sā taṁ samāsādya śūlaṁ rātrau pativratā nijagātreṇa bhārārttā gacchamānā mahāsatī

रात्रि में उस शूल के निकट पहुँचकर, भार से पीड़ित शरीर से चलती हुई वह महासती पतिव्रता,

श्लोक 42 (skanda.6.135.42)

तया संचालितः सोऽथ मांडव्यो मुनिपुंगवः ॥ परां पीडां समासाद्य ततः प्राह सुदुःखितः

tayā saṁcālitaḥ so'tha māṁḍavyo munipuṁgavaḥ parāṁ pīḍāṁ samāsādya tataḥ prāha suduḥkhitaḥ

उससे टकरा जाने पर वह मुनिश्रेष्ठ माण्डव्य अत्यंत पीड़ा को प्राप्त होकर अत्यंत दुःखित होकर बोला।

श्लोक 43 (skanda.6.135.43)

केनेदं पाप्मना शल्यं ममांतः परिचालितम् ॥ येनाहं दुःखयुक्तोऽपि भूयो दुःखास्पदीकृतः

kenedaṁ pāpmanā śalyaṁ mamāṁtaḥ paricālitam yenāhaṁ duḥkhayukto'pi bhūyo duḥkhāspadīkṛtaḥ

किस पापी ने मेरे भीतर के इस शूल को हिला दिया, जिससे मैं पहले से ही दुःखी होते हुए भी और अधिक दुःख में डाल दिया गया हूँ?

श्लोक 44 (skanda.6.135.44)

॥ दीर्घिकोवाच ॥ न मया त्वं महाभाग निद्रोपहतया दृशा ॥ दृष्टस्तेन परिस्पृष्टो ह्यस्पृश्यः पापकृत्तमः

dīrghikovāca na mayā tvaṁ mahābhāga nidropahatayā dṛśā dṛṣṭastena parispṛṣṭo hyaspṛśyaḥ pāpakṛttamaḥ

दीर्घिका बोली - हे महाभाग! निद्रा से आच्छन्न दृष्टि होने के कारण मैंने आपको देखा ही नहीं, इसीलिए मुझसे स्पर्श हो गया - क्या आप इसीलिए अस्पृश्य और महापापी हैं?

श्लोक 45 (skanda.6.135.45)

न त्वया सदृशश्चान्यः पापात्मास्ति धरातले ॥ शिरस्युद्भूतशूलोऽपि यो मृत्युं नाधिगच्छति

na tvayā sadṛśaścānyaḥ pāpātmāsti dharātale śirasyudbhūtaśūlo'pi yo mṛtyuṁ nādhigacchati

पृथ्वी पर तुम्हारे समान पापी दूसरा कोई नहीं है, जो सिर में शूल उठने पर भी मृत्यु को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 46 (skanda.6.135.46)

अहं पतिव्रता मूढ वहामि शिरसा धृतम् ॥ तीर्थयात्राकृते कांतं विकलांगं सुवल्लभम्

ahaṁ pativratā mūḍha vahāmi śirasā dhṛtam tīrthayātrākṛte kāṁtaṁ vikalāṁgaṁ suvallabham

हे मूढ! मैं पतिव्रता स्त्री, तीर्थयात्रा के लिए अपने विकलांग और अत्यंत प्रिय पति को अपने सिर पर धारण करके ले जा रही हूँ।

श्लोक 47 (skanda.6.135.47)

कस्मात्तस्यास्तिरस्कारं मम यच्छसि निष्ठुरम्॥ अज्ञातां मूढबुद्धिः सन्विशेषान्मानुषोद्भवाम्

kasmāttasyāstiraskāraṁ mama yacchasi niṣṭhuram ajñātāṁ mūḍhabuddhiḥ sanviśeṣānmānuṣodbhavām

तुम मूढबुद्धि होकर, विशेष रूप से मानवोचित अज्ञान से युक्त मुझे क्यों निष्ठुरतापूर्वक यह तिरस्कार दे रहे हो?

श्लोक 48 (skanda.6.135.48)

॥ माण्डव्य उवाच ॥ अहं यादृक्त्वया प्रोक्तस्तादृगेव न संशयः ॥ पापात्मा मूढबुद्धिश्च अस्पृश्यः सर्वदेहिनाम्

māṇḍavya uvāca ahaṁ yādṛktvayā proktastādṛgeva na saṁśayaḥ pāpātmā mūḍhabuddhiśca aspṛśyaḥ sarvadehinām

माण्डव्य बोले - तुमने जैसा मुझे कहा है, मैं निःसंदेह वैसा ही हूँ - पापात्मा, मूढबुद्धि और सब प्राणियों के लिए अस्पृश्य।

श्लोक 49 (skanda.6.135.49)

यदि प्रातस्तवायं च भर्त्ता जीवति निष्ठुरे ॥ येन मे जनिता पीडा प्राणांतकरणी दृढा

yadi prātastavāyaṁ ca bharttā jīvati niṣṭhure yena me janitā pīḍā prāṇāṁtakaraṇī dṛḍhā

हे निष्ठुरे! यदि तुम्हारा यह पति, जिसने मुझे प्राणान्तकारी घोर पीड़ा दी है, प्रातःकाल भी जीवित रहा,

श्लोक 50 (skanda.6.135.50)

तस्मादेष तवाभीष्टः स्पृष्टः सूर्यस्य रश्मिभिः ॥ मया शप्तः परित्यागं जीवितस्य करिष्यति

tasmādeṣa tavābhīṣṭaḥ spṛṣṭaḥ sūryasya raśmibhiḥ mayā śaptaḥ parityāgaṁ jīvitasya kariṣyati

तो जान लो कि यह तुम्हारा प्रिय पति, सूर्य की किरणों से स्पर्शित होते ही, मेरे शाप से अपने जीवन का त्याग कर देगा।

श्लोक 51 (skanda.6.135.51)

॥ दीर्घिकोवाच ॥ यद्येवं मरणं पत्युः प्रभाते संभविष्यति ॥ मदीयस्य ततः प्रातर्नोद्गमिष्यति भास्करः

dīrghikovāca yadyevaṁ maraṇaṁ patyuḥ prabhāte saṁbhaviṣyati madīyasya tataḥ prātarnodgamiṣyati bhāskaraḥ

दीर्घिका बोली - यदि ऐसा है कि प्रातःकाल मेरे पति की मृत्यु होगी, तो फिर प्रातःकाल सूर्य ही उदय नहीं होगा।

श्लोक 52 (skanda.6.135.52)

एवमुक्त्वा ततः साथ निषसाद धरातले ॥ भूमौ तद्भर्तृसंयुक्तं मुक्त्वा वंशकुटीरकम्

evamuktvā tataḥ sātha niṣasāda dharātale bhūmau tadbhartṛsaṁyuktaṁ muktvā vaṁśakuṭīrakam

ऐसा कहकर वह अपने पति सहित उस बाँस की टोकरी को भूमि पर रखकर स्वयं भी धरती पर बैठ गई।

श्लोक 53 (skanda.6.135.53)

अथ तां प्राह कुष्ठी स पिपासा संप्रवर्तते ॥ तस्मात्तोयं समानेहि पानार्थमतिशीतलम्

atha tāṁ prāha kuṣṭhī sa pipāsā saṁpravartate tasmāttoyaṁ samānehi pānārthamatiśītalam

तब उस कोढ़ी ने उससे कहा - मुझे प्यास लग रही है, इसलिए पीने के लिए अत्यंत शीतल जल ले आओ।

श्लोक 54 (skanda.6.135.54)

तथैव सा समाकर्ण्य भर्तुरादेशमुत्सुका ॥ इतस्ततश्च बभ्राम जलार्थं न प्रपश्यति ॥ न च निर्याति दूरं सा त्यक्त्वारण्ये तथाविधम्

tathaiva sā samākarṇya bharturādeśamutsukā itastataśca babhrāma jalārthaṁ na prapaśyati na ca niryāti dūraṁ sā tyaktvāraṇye tathāvidham

पति की आज्ञा सुनकर वह उत्सुकतापूर्वक जल की खोज में इधर-उधर घूमी, परंतु उसे कहीं जल दिखाई नहीं दिया; और उस निर्जन वन में अपने ऐसे पति को छोड़कर वह दूर भी नहीं जाना चाहती थी।

श्लोक 55 (skanda.6.135.55)

भर्तारं श्वापदोत्थं च भयं हृदि वितन्वती ॥ उपविश्य ततो भूमौ स्पृष्ट्वा पादौ पतेस्तदा ॥ प्रोवाच दीर्घिका वाक्यं तारवाक्येन दुःखिता

bhartāraṁ śvāpadotthaṁ ca bhayaṁ hṛdi vitanvatī upaviśya tato bhūmau spṛṣṭvā pādau patestadā provāca dīrghikā vākyaṁ tāravākyena duḥkhitā

हृदय में हिंसक पशुओं का भय धारण करती हुई, वह वहीं भूमि पर बैठ गई, और अपने पति के दोनों चरणों का स्पर्श करके, दुःखित होकर दीर्घिका ने ऊँचे स्वर में यह वचन कहा।

श्लोक 56 (skanda.6.135.56)

पतिव्रता त्वमाचीर्णं यदि सम्यङ्मया स्फुटम् ॥ तेन सत्येन भूपृष्ठान्निर्गच्छतु जलं शुभम्

pativratā tvamācīrṇaṁ yadi samyaṅmayā sphuṭam tena satyena bhūpṛṣṭhānnirgacchatu jalaṁ śubham

यदि मैंने पतिव्रत-धर्म का पालन सचमुच भली-भाँति और स्पष्ट रूप से किया हो, तो उसी सत्य के प्रभाव से पृथ्वीतल से शुभ जल निकल आए।

श्लोक 57 (skanda.6.135.57)

एवमुक्त्वा जघानाथ पादाघातेन मेदिनीम् ॥ कान्तभक्तिं पुरस्कृत्य तस्य जीवितवांछया

evamuktvā jaghānātha pādāghātena medinīm kāntabhaktiṁ puraskṛtya tasya jīvitavāṁchayā

ऐसा कहकर, अपने पति के प्रति भक्ति को आगे रखकर और उसके जीवन की कामना से, उसने पैर की चोट से पृथ्वी पर प्रहार किया।

श्लोक 58 (skanda.6.135.58)

एतस्मिन्नन्तरे तोयं पादाघातादनन्ततरम् ॥ निष्क्रांतं निर्मलं स्वादु माण्डव्यस्य च पश्यतः

etasminnantare toyaṁ pādāghātādanantataram niṣkrāṁtaṁ nirmalaṁ svādu māṇḍavyasya ca paśyataḥ

इसी क्षण उस पद-प्रहार से माण्डव्य के देखते-देखते अनंत, स्वच्छ और मीठा जल निकल पड़ा।

श्लोक 59 (skanda.6.135.59)

ततस्तं स्नापयामास तस्मिंस्तोये श्रमातुरम् ॥ अपाययत्ततः पश्चात्स्वयं स्नात्वा पपौ जलम्

tatastaṁ snāpayāmāsa tasmiṁstoye śramāturam apāyayattataḥ paścātsvayaṁ snātvā papau jalam

तब उसने उस जल से थके हुए अपने पति को स्नान कराया, फिर उसे पिलाया, और उसके बाद स्वयं भी स्नान करके जल पिया।

श्लोक 60 (skanda.6.135.60)

एतस्मिन्नंतरे सूर्यः पतिव्रतकृताद्भयात् ॥ नाभ्युदेति समुत्पन्नस्ततः कालात्ययो महान्

etasminnaṁtare sūryaḥ pativratakṛtādbhayāt nābhyudeti samutpannastataḥ kālātyayo mahān

इसी बीच पतिव्रता के द्वारा दिए गए भय के कारण सूर्य उदित नहीं हुआ, जिससे काल का महान अतिक्रमण उत्पन्न हो गया।

श्लोक 61 (skanda.6.135.61)

अथ रात्रिं समालोक्य दीर्घां ये कामुका जनाः ॥ ते सर्वे तुष्टिमापन्नास्तथा च कुल स्त्रियः

atha rātriṁ samālokya dīrghāṁ ye kāmukā janāḥ te sarve tuṣṭimāpannāstathā ca kula striyaḥ

तब उस दीर्घ रात्रि को देखकर जो कामी लोग थे, वे सब संतुष्ट हो गए, और साथ ही कुलटा स्त्रियाँ भी।

श्लोक 62 (skanda.6.135.62)

कौशिका राक्षसाश्चापि चोरा जाराश्च ये नराः ॥ ते सर्वे प्रोचुः संहृष्टाः समालिंग्य परस्परम्

kauśikā rākṣasāścāpi corā jārāśca ye narāḥ te sarve procuḥ saṁhṛṣṭāḥ samāliṁgya parasparam

उल्लू, राक्षस, चोर तथा जो व्यभिचारी पुरुष थे, वे सब हर्षित होकर एक-दूसरे को गले लगाकर बोले।

श्लोक 63 (skanda.6.135.63)

अद्यास्माकं विधिस्तुष्टो भगवान्मन्मथस्तथा ॥ येन दीर्घा कृता रात्रिर्नाशं नीतश्च भास्करः

adyāsmākaṁ vidhistuṣṭo bhagavānmanmathastathā yena dīrghā kṛtā rātrirnāśaṁ nītaśca bhāskaraḥ

आज हमारे लिए विधाता प्रसन्न हुए हैं, और भगवान मन्मथ भी, जिनके प्रभाव से यह रात्रि लंबी कर दी गई है और सूर्य को नष्ट कर दिया गया है।

श्लोक 64 (skanda.6.135.64)

ये पुनर्ब्राह्मणाः शांता यज्ञकर्मसमुद्यताः ॥ ते सर्वे दुःखमापन्नाः सूर्योदयविनाकृताः

ye punarbrāhmaṇāḥ śāṁtā yajñakarmasamudyatāḥ te sarve duḥkhamāpannāḥ sūryodayavinākṛtāḥ

किन्तु जो शान्त ब्राह्मण यज्ञकर्म में तत्पर रहते थे, वे सब सूर्योदय न होने के कारण दुःख को प्राप्त हुए।

श्लोक 65 (skanda.6.135.65)

न कश्चिद्यजनं चक्रे याजनं न च सद्द्विजः ॥ न श्राद्धं न च संकल्पं न स्वाध्यायं कथंचन

na kaścidyajanaṁ cakre yājanaṁ na ca saddvijaḥ na śrāddhaṁ na ca saṁkalpaṁ na svādhyāyaṁ kathaṁcana

कोई भी सत्पुरुष ब्राह्मण न तो यजन कर सका, न याजन, न श्राद्ध, न संकल्प और न ही किसी भी प्रकार स्वाध्याय।

श्लोक 66 (skanda.6.135.66)

न स्नानं न च दानं च लोकयात्रां विशेषतः ॥ व्यवहारं न कृत्यं च किंचिद्धर्मसमुद्भवम्

na snānaṁ na ca dānaṁ ca lokayātrāṁ viśeṣataḥ vyavahāraṁ na kṛtyaṁ ca kiṁciddharmasamudbhavam

न स्नान हो सका, न दान, न विशेष रूप से लोक-व्यवहार, न कोई लेन-देन, और न ही धर्म से उत्पन्न कोई भी कृत्य।

श्लोक 67 (skanda.6.135.67)

एतस्मिन्नन्तरे देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः। परं दौःस्थ्यं समापन्ना यज्ञभागविवर्जिताः

etasminnantare devāḥ sarve śakrapurogamāḥ paraṁ dauḥsthyaṁ samāpannā yajñabhāgavivarjitāḥ

इसी बीच इंद्र आदि सब देवगण भी अपने यज्ञ-भाग से वंचित होकर अत्यंत दुर्दशा को प्राप्त हो गए।

श्लोक 68 (skanda.6.135.68)

ततो भास्करमासाद्य ऊचुर्दुःखसमन्विताः ॥ कस्मान्नोद्गमनं देव प्रकरोषि दिवाकर॥

tato bhāskaramāsādya ūcurduḥkhasamanvitāḥ kasmānnodgamanaṁ deva prakaroṣi divākara

तब दुःख से युक्त होकर वे सूर्य के पास पहुँचे और बोले - हे दिवाकर देव! तुम उदय क्यों नहीं करते?

श्लोक 69 (skanda.6.135.69)

एतत्त्वया विना सर्वं जगद्व्याकुलतां गतम्

etattvayā vinā sarvaṁ jagadvyākulatāṁ gatam

तुम्हारे बिना यह सारा जगत व्याकुलता को प्राप्त हो गया है।

श्लोक 70 (skanda.6.135.70)

तस्माल्लोकहितार्थाय त्वमुद्गच्छ यथापुरा ॥ अग्निष्टोमादिका यज्ञा वर्तंते येन भूतले

tasmāllokahitārthāya tvamudgaccha yathāpurā agniṣṭomādikā yajñā vartaṁte yena bhūtale

इसलिए लोक के हित के लिए तुम पहले की भाँति उदय हो, जिससे पृथ्वीतल पर अग्निष्टोम आदि यज्ञ फिर से चलते रहें।

श्लोक 71 (skanda.6.135.71)

॥ सूर्य उवाच ॥ पतिव्रतासमादेशात्त्यक्तश्चाभ्युदयो मया ॥ तस्माद्गत्वा सुराः सर्वे तां वदंतु कृते मम

sūrya uvāca pativratāsamādeśāttyaktaścābhyudayo mayā tasmādgatvā surāḥ sarve tāṁ vadaṁtu kṛte mama

सूर्य बोले - एक पतिव्रता के आदेश से मैंने अपना उदय त्याग दिया है; इसलिए तुम सब देवगण जाकर मेरी ओर से उसी से बात करो।

श्लोक 72 (skanda.6.135.72)

येन तद्वाक्यमासाद्य प्रवर्त्तामि यथासुखम् ॥ अन्यथा मां शपेत्क्रुद्धा नूनं सा हि पतिव्रता

yena tadvākyamāsādya pravarttāmi yathāsukham anyathā māṁ śapetkruddhā nūnaṁ sā hi pativratā

जिससे मैं उसकी अनुमति पाकर सुखपूर्वक फिर से चलने लगूँ; अन्यथा वह पतिव्रता क्रुद्ध होकर निश्चय ही मुझे शाप दे देगी।

श्लोक 73 (skanda.6.135.73)

एवं सा तपसा युक्ता प्रोत्कृष्टं हि सुरोत्तमाः ॥ पतिव्रतात्वमाधत्ते तथान्यदपरं महत्

evaṁ sā tapasā yuktā protkṛṣṭaṁ hi surottamāḥ pativratātvamādhatte tathānyadaparaṁ mahat

हे श्रेष्ठ देवो! वह इतनी तपस्या से युक्त है और उसका पातिव्रत्य भी इतना उत्कृष्ट है, तथा उसमें और भी बहुत कुछ महान है।

श्लोक 74 (skanda.6.135.74)

कस्तस्या वचनं शक्तः कर्तुमेवमतोऽन्यथा ॥ एतस्मात्कारणाद्भीतो नोद्गच्छामि कथंचन॥

kastasyā vacanaṁ śaktaḥ kartumevamato'nyathā etasmātkāraṇādbhīto nodgacchāmi kathaṁcana

उसकी बात को इस प्रकार अन्यथा करने में कौन समर्थ है? इसी कारण भयभीत होकर मैं किसी भी प्रकार उदय नहीं होता।

श्लोक 75 (skanda.6.135.75)

न तत्क्रतुसहस्रेण यजंतः प्राप्नुयुः फलम् ॥ पतिव्रतात्वमापन्ना यत्स्त्री विंदति केवलम्

na tatkratusahasreṇa yajaṁtaḥ prāpnuyuḥ phalam pativratātvamāpannā yatstrī viṁdati kevalam

हज़ारों यज्ञ करने वाले भी वह फल प्राप्त नहीं कर सकते, जो केवल पतिव्रत-धर्म को प्राप्त हुई स्त्री अकेले ही पा लेती है।

श्लोक 76 (skanda.6.135.76)

ततस्ते विबुधाः सर्वे गत्वा तत्क्षेत्रमुत्तमम् ॥ प्रोचुस्तां दीर्घिकां वाक्यैर्मृदुभिः पुरतः स्थिताः

tataste vibudhāḥ sarve gatvā tatkṣetramuttamam procustāṁ dīrghikāṁ vākyairmṛdubhiḥ purataḥ sthitāḥ

तब वे सब देवगण उस उत्तम क्षेत्र में जाकर, उसके सामने खड़े होकर, कोमल वचनों से दीर्घिका से बोले।

श्लोक 77 (skanda.6.135.77)

त्वया पतिव्रते सूर्यो यन्निषिद्धो न तत्कृतम् ॥ शुभं यतो हताः सर्वा भूतले शोभनाः क्रियाः

tvayā pativrate sūryo yanniṣiddho na tatkṛtam śubhaṁ yato hatāḥ sarvā bhūtale śobhanāḥ kriyāḥ

हे पतिव्रते! तुमने जो सूर्य को रोक दिया है, वह अच्छा नहीं किया, क्योंकि इससे पृथ्वी पर सब शुभ क्रियाएँ नष्ट हो गई हैं।

श्लोक 78 (skanda.6.135.78)

तस्मादुद्गच्छतु प्राज्ञे त्वद्वाक्यात्तीक्ष्णदीधितिः ॥ यज्ञक्रिया विशेषेण येन वर्तंति भूतले

tasmādudgacchatu prājñe tvadvākyāttīkṣṇadīdhitiḥ yajñakriyā viśeṣeṇa yena vartaṁti bhūtale

हे बुद्धिमती! इसलिए तुम्हारी अनुमति से तीक्ष्ण किरणों वाला सूर्य उदित हो, जिससे पृथ्वी पर विशेष रूप से यज्ञ-क्रियाएँ चलती रहें।

श्लोक 79 (skanda.6.135.79)

॥ पतिव्रतोवाच ॥ अयं च मे पतिः सद्यः प्राणेभ्योऽपि च यः प्रियः ॥ सोऽभ्येति निधनं देवाः प्रोद्गते रविमंडले

pativratovāca ayaṁ ca me patiḥ sadyaḥ prāṇebhyo'pi ca yaḥ priyaḥ so'bhyeti nidhanaṁ devāḥ prodgate ravimaṁḍale

पतिव्रता बोली - हे देवो! यह मेरा पति, जो मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है, सूर्यमण्डल के उदित होते ही तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा।

श्लोक 80 (skanda.6.135.80)

शप्तश्चानेन दुष्टेन मांडव्येन सुपाप्मना ॥ कार्यं विनापि निर्दिष्टस्तद्ब्रूयां भास्करं कथम्

śaptaścānena duṣṭena māṁḍavyena supāpmanā kāryaṁ vināpi nirdiṣṭastadbrūyāṁ bhāskaraṁ katham

इस दुष्ट, महापापी माण्डव्य के द्वारा उसे बिना कारण ही शाप दिया गया है - तब मैं सूर्य से (उदय होने को) कैसे कहूँ?

श्लोक 81 (skanda.6.135.81)

उदयार्थं न मे यज्ञैः कार्यं किंचिन्न चापरैः ॥ श्राद्धदानादिकैः कृत्यैः संजातैर्दर्यितं विना

udayārthaṁ na me yajñaiḥ kāryaṁ kiṁcinna cāparaiḥ śrāddhadānādikaiḥ kṛtyaiḥ saṁjātairdaryitaṁ vinā

मेरे प्रिय पति की हानि के बिना, मुझे सूर्य के उदय के लिए यज्ञों से, न ही श्राद्ध-दान आदि किसी अन्य कृत्य से कुछ भी प्रयोजन नहीं है।

श्लोक 82 (skanda.6.135.82)

॥ सूत उवाच ॥ ततस्ते विबुधाः सर्वे समालोक्य परस्परम् ॥ चिरकालं सुदुःखार्तास्तामूचुर्विनयान्विताः

sūta uvāca tataste vibudhāḥ sarve samālokya parasparam cirakālaṁ suduḥkhārtāstāmūcurvinayānvitāḥ

सूत जी ने कहा - तब वे सब देवगण आपस में देखकर, बहुत देर तक अत्यंत दुःखी रहकर, विनयपूर्वक उससे बोले।

श्लोक 83 (skanda.6.135.83)

उद्गच्छतु रविर्भद्रे तवायं दयितः पतिः ॥ प्रयातु निधनं सद्यो भूयादेष मुनीश्वर

udgacchatu ravirbhadre tavāyaṁ dayitaḥ patiḥ prayātu nidhanaṁ sadyo bhūyādeṣa munīśvara

हे भद्रे! सूर्य को उदय होने दो; तुम्हारा यह प्रिय पति भले ही तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाए, और यह मुनीश्वर (माण्डव्य) भी।

श्लोक 84 (skanda.6.135.84)

पुनर्जीवापयिष्यामो वयमेनमपि द्रुतम् ॥ मृत्युमार्गमनुप्राप्तं त्वत्कृते पतिवत्सले

punarjīvāpayiṣyāmo vayamenamapi drutam mṛtyumārgamanuprāptaṁ tvatkṛte pativatsale

हे पतिव्रते! हम उसे भी शीघ्र फिर से जीवित कर देंगे, यद्यपि वह मृत्यु के मार्ग को प्राप्त हो गया हो, केवल तुम्हारे ही लिए।

श्लोक 85 (skanda.6.135.85)

पञ्चविंशतिवर्षीयं कामदेवमिवापरम् ॥ त्वं द्रक्ष्यसि सुदीप्तांगं सर्वलक्षणलक्षितम्

pañcaviṁśativarṣīyaṁ kāmadevamivāparam tvaṁ drakṣyasi sudīptāṁgaṁ sarvalakṣaṇalakṣitam

तुम उसे पच्चीस वर्ष की आयु वाला, कामदेव के समान तेजस्वी अंगों वाला और सब शुभ लक्षणों से युक्त फिर से देखोगी।

श्लोक 86 (skanda.6.135.86)

भूत्वा पंचदशाब्दीया पद्मपत्रायतेक्षणा ॥ मर्त्यलोके सुखं सम्यक्त्वेच्छया साधयिष्यसि

bhūtvā paṁcadaśābdīyā padmapatrāyatekṣaṇā martyaloke sukhaṁ samyaktvecchayā sādhayiṣyasi

और तुम भी पंद्रह वर्ष की, कमल-दल के समान विस्तृत नेत्रों वाली बनकर, मनुष्यलोक में इच्छानुसार सम्यक् सुख का उपभोग करोगी।

श्लोक 87 (skanda.6.135.87)

एषोऽपि मुनिशार्दूलो विपाप्मा सांप्रतं शुभे ॥ शूलवेधेन निर्मुक्तः सुखभागी भवत्क्लम॥

eṣo'pi muniśārdūlo vipāpmā sāṁprataṁ śubhe śūlavedhena nirmuktaḥ sukhabhāgī bhavatklama

हे शुभे! यह मुनिश्रेष्ठ (माण्डव्य) भी अब निष्पाप होकर, शूल-वेध से मुक्त होकर, तुम्हारे कष्ट का फल सुखपूर्वक भोगने वाला होगा।

श्लोक 88 (skanda.6.135.88)

॥ सूत उवाच ॥ बाढमित्येव च प्रोक्ते तया स द्विजसत्तमाः ॥ उद्गतो भगवान्सूर्यस्तत्क्षणादेव वेगतः

sūta uvāca bāḍhamityeva ca prokte tayā sa dvijasattamāḥ udgato bhagavānsūryastatkṣaṇādeva vegataḥ

सूत जी ने कहा - हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उसके 'बहुत अच्छा' कहते ही उसी क्षण भगवान सूर्य वेगपूर्वक उदित हो गए।

श्लोक 89 (skanda.6.135.89)

ततः सूर्यांशुसंस्पृष्टः स मृतश्च सुकुष्ठभाक् ॥ विबुधानां करैः स्पृष्टः पुनरेव समुत्थितः

tataḥ sūryāṁśusaṁspṛṣṭaḥ sa mṛtaśca sukuṣṭhabhāk vibudhānāṁ karaiḥ spṛṣṭaḥ punareva samutthitaḥ

तब सूर्य की किरणों से स्पर्शित होते ही वह घोर कुष्ठी पति मर गया, किन्तु देवताओं के हाथों से स्पर्शित होकर वह पुनः उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 90 (skanda.6.135.90)

पंचविंशतिवर्षीयः कामदेव इवापरः ॥ संस्मरन्पूर्विकां जातिं सर्वा हर्ष समन्वितः

paṁcaviṁśativarṣīyaḥ kāmadeva ivāparaḥ saṁsmaranpūrvikāṁ jātiṁ sarvā harṣa samanvitaḥ

वह पच्चीस वर्ष की आयु वाला, मानो दूसरा कामदेव हो गया, और अपने पूर्व जन्म को स्मरण करते हुए वह पूर्णतः हर्ष से भर उठा।

श्लोक 91 (skanda.6.135.91)

दीर्घिकापि परिस्पृष्टा स्वयं देवेन शंभुना। संजाता यौवनोपेता दिव्यलक्षणलक्षिता

dīrghikāpi parispṛṣṭā svayaṁ devena śaṁbhunā saṁjātā yauvanopetā divyalakṣaṇalakṣitā

दीर्घिका भी स्वयं भगवान शम्भु के द्वारा स्पर्शित होकर यौवन से युक्त और दिव्य लक्षणों से चिह्नित हो गई।

श्लोक 92 (skanda.6.135.92)

पद्मपत्रेक्षणा रम्या चन्द्रबिम्बसमानना ॥ मध्ये क्षामा सुगौरांगी पीनोन्नतपयोधरा

padmapatrekṣaṇā ramyā candrabimbasamānanā madhye kṣāmā sugaurāṁgī pīnonnatapayodharā

वह कमल-दल के समान नेत्रों वाली, अत्यंत रमणीय, चन्द्रमा के समान मुख वाली, कटि में क्षीण, गौर अंगों वाली और उन्नत स्तनों वाली हो गई।

श्लोक 93 (skanda.6.135.93)

ततस्तं मुनिशार्दूलं शूलाग्रादवतार्य च ॥ प्रोचुश्च विबुधश्रेष्ठाः सादरं हर्षसंयुताः

tatastaṁ muniśārdūlaṁ śūlāgrādavatārya ca procuśca vibudhaśreṣṭhāḥ sādaraṁ harṣasaṁyutāḥ

तब उस मुनिश्रेष्ठ को शूल के अग्रभाग से नीचे उतारकर, वे श्रेष्ठ देवगण हर्ष से युक्त होकर आदरपूर्वक बोले।

श्लोक 94 (skanda.6.135.94)

एतत्सत्यं कृतं वाक्यं मुने तव यथोदितम्॥ मृतोऽपि ब्राह्मणः कुष्ठी संस्पृष्टो रविरश्मिभिः॥

etatsatyaṁ kṛtaṁ vākyaṁ mune tava yathoditam mṛto'pi brāhmaṇaḥ kuṣṭhī saṁspṛṣṭo raviraśmibhiḥ

हे मुने! आपका जो वचन कहा गया था, वह सत्य ही हुआ - वह कुष्ठी ब्राह्मण सूर्य की किरणों से स्पर्शित होकर मर भी गया।

श्लोक 95 (skanda.6.135.95)

पुनरुत्थापितोऽस्माभिः कृतश्च तरुणः पुनः॥ अनया भार्यया सार्धं तस्मात्त्वं स्वाश्रमं व्रज

punarutthāpito'smābhiḥ kṛtaśca taruṇaḥ punaḥ anayā bhāryayā sārdhaṁ tasmāttvaṁ svāśramaṁ vraja

किन्तु उसे हमने फिर से उठाकर पुनः युवा बना दिया है; इसलिए अब आप अपनी इस पत्नी के साथ अपने आश्रम को जाइए।

श्लोक 96 (skanda.6.135.96)

नास्माकं दर्शनं व्यर्थं कथंचिदपि जायते ॥ तस्मात्प्रार्थय यच्चित्ते तव नित्यं समाश्रितम्

nāsmākaṁ darśanaṁ vyarthaṁ kathaṁcidapi jāyate tasmātprārthaya yaccitte tava nityaṁ samāśritam

हमारा दर्शन किसी भी प्रकार व्यर्थ नहीं होता; इसलिए जो कुछ तुम्हारे मन में सदा से बसा हो, वह वर माँग लो।

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