नागर खण्ड · अध्याय 136
माण्डव्य का धर्मराज को शाप और दीर्घिका तीर्थ के वरदान
श्लोक 1 (skanda.6.136.1)
॥ मांडव्य उवाच ॥ ग्रहीष्यामि सुरश्रेष्ठा वरं युष्मत्समुद्रवम् ॥ परं मे निर्णयं चैकं धर्मराजः प्रचक्षतु॥
māṁḍavya uvāca grahīṣyāmi suraśreṣṭhā varaṁ yuṣmatsamudravam paraṁ me nirṇayaṁ caikaṁ dharmarājaḥ pracakṣatu
माण्डव्य बोले - हे श्रेष्ठ देवो! मैं तुम्हारे द्वारा दिया गया वर ग्रहण करूँगा, परन्तु पहले धर्मराज मुझे एक निर्णय बताएँ।
श्लोक 2 (skanda.6.136.2)
सर्वेषां प्राणिनां लोके कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥ उपतिष्ठति नान्यत्र सत्यमेतत्सुरोत्तमाः
sarveṣāṁ prāṇināṁ loke kṛtaṁ karma śubhāśubham upatiṣṭhati nānyatra satyametatsurottamāḥ
हे श्रेष्ठ देवो! संसार में सब प्राणियों का किया हुआ शुभ या अशुभ कर्म ही उन्हें प्राप्त होता है, अन्य कुछ नहीं - यह सत्य है।
श्लोक 3 (skanda.6.136.3)
मयाप्यत्र परे चापि किं कृतं पातकं च यत् ॥ ईदृशीं वेदनां प्राप्तो न च मृत्युं कथचन
mayāpyatra pare cāpi kiṁ kṛtaṁ pātakaṁ ca yat īdṛśīṁ vedanāṁ prāpto na ca mṛtyuṁ kathacana
तो फिर इस जन्म में अथवा पिछले जन्म में मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया था, जिसके कारण मुझे इतनी घोर वेदना प्राप्त हुई, और वह भी बिना किसी प्रकार मृत्यु के?
श्लोक 4 (skanda.6.136.4)
॥ धर्मराज उवाच ॥ अन्यदेहे त्वया विप्र बालभावेन वर्तता ॥ शूलाग्रेण सुतीक्ष्णेन काये विद्धो बकः क्षितौ
dharmarāja uvāca anyadehe tvayā vipra bālabhāvena vartatā śūlāgreṇa sutīkṣṇena kāye viddho bakaḥ kṣitau
धर्मराज बोले - हे विप्र! किसी अन्य शरीर में बालक-अवस्था में रहते हुए तुमने एक अत्यंत तीक्ष्ण शूल की नोक से भूमि पर एक बगुले को शरीर में बींध दिया था।
श्लोक 5 (skanda.6.136.5)
नान्यत्कृतमपि स्वल्पं पातकं किंचिदेव हि ॥ एतस्मात्कारणादेषा व्यथा संसेविता द्विज
nānyatkṛtamapi svalpaṁ pātakaṁ kiṁcideva hi etasmātkāraṇādeṣā vyathā saṁsevitā dvija
इसके अतिरिक्त तुमने कोई अन्य पाप, चाहे वह कितना भी छोटा हो, नहीं किया था; हे द्विज! इसी कारण तुमने यह पीड़ा भोगी।
श्लोक 6 (skanda.6.136.6)
॥ सूत उवाच ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भृशं क्रोधसमन्वितः ॥ ततस्तं प्राह मांडव्यो धर्मराजं पुरः स्थितम्
sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā bhṛśaṁ krodhasamanvitaḥ tatastaṁ prāha māṁḍavyo dharmarājaṁ puraḥ sthitam
सूत जी ने कहा - उनका वह वचन सुनकर अत्यंत क्रोध से भरकर माण्डव्य ने अपने सामने खड़े धर्मराज से कहा।
श्लोक 7 (skanda.6.136.7)
अस्य स्वल्पापराधस्य यस्माद्भूयान्विनिग्रहः ॥ कृतस्त्वया सुदुर्बुद्धे तस्माच्छापं गृहाण मे
asya svalpāparādhasya yasmādbhūyānvinigrahaḥ kṛtastvayā sudurbuddhe tasmācchāpaṁ gṛhāṇa me
चूँकि तुमने इस अत्यंत छोटे अपराध के लिए इतना बड़ा दंड दिया है, हे दुर्बुद्धे! इसलिए मेरा यह शाप ग्रहण करो।
श्लोक 8 (skanda.6.136.8)
त्वं प्राप्य मानुषं देहं शूद्रयोनौ व्यवस्थितः ॥ जातिक्षयकृतं दुःखं प्रभूतं सेवयिष्यसि
tvaṁ prāpya mānuṣaṁ dehaṁ śūdrayonau vyavasthitaḥ jātikṣayakṛtaṁ duḥkhaṁ prabhūtaṁ sevayiṣyasi
तुम मनुष्य-देह प्राप्त करके शूद्र-योनि में स्थित होकर, अपनी जाति के क्षय से उत्पन्न होने वाला अत्यंत दुःख भोगोगे।
श्लोक 9 (skanda.6.136.9)
तथा कृता मयैषाद्य व्यवस्था सर्वदेहिनाम् ॥ अष्टमाद्वत्सरादूर्ध्यं कर्मणा गर्हितेन च ॥ प्रग्रहीष्यति वै जंतुः पुरुषो योषिदेव वा
tathā kṛtā mayaiṣādya vyavasthā sarvadehinām aṣṭamādvatsarādūrdhyaṁ karmaṇā garhitena ca pragrahīṣyati vai jaṁtuḥ puruṣo yoṣideva vā
और आज मैंने यह भी व्यवस्था कर दी है कि आठ वर्ष की आयु के बाद ही कोई भी प्राणी, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, अपने निंदनीय कर्म का फल ग्रहण करेगा।
श्लोक 10 (skanda.6.136.10)
एवमुक्त्वा स मांडव्यो धर्मराजं ततः परम् ॥ प्रस्थितो रोषनिर्मुक्तो वांछिताशां प्रति द्विजाः
evamuktvā sa māṁḍavyo dharmarājaṁ tataḥ param prasthito roṣanirmukto vāṁchitāśāṁ prati dvijāḥ
हे द्विजो! ऐसा कहकर वह माण्डव्य धर्मराज को छोड़कर, क्रोध से मुक्त होकर अपनी इच्छित दिशा की ओर चल पड़ा।
श्लोक 11 (skanda.6.136.11)
अथ तं प्रस्थितं दृष्ट्वा प्रोचुः सर्वे दिवौकसः ॥ धर्मराजकृते व्यग्राः श्रुत्वा शापं तथाविधम्
atha taṁ prasthitaṁ dṛṣṭvā procuḥ sarve divaukasaḥ dharmarājakṛte vyagrāḥ śrutvā śāpaṁ tathāvidham
तब उसे जाते हुए देखकर, ऐसा भीषण शाप सुनकर धर्मराज के लिए व्याकुल हुए सब देवगण बोले।
श्लोक 12 (skanda.6.136.12)
॥ देवा ऊचुः ॥ भगवन्पापसक्तस्य धर्मराजस्य केवलम्॥ न त्वमर्हसि शापेन शूद्रं कर्तुं कथंचन
devā ūcuḥ bhagavanpāpasaktasya dharmarājasya kevalam na tvamarhasi śāpena śūdraṁ kartuṁ kathaṁcana
देवगण बोले - हे भगवन्! धर्मराज पाप में आसक्त नहीं हैं, वे केवल अपने कर्तव्य का पालन करते हैं; इसलिए आपको उन्हें शाप देकर किसी भी प्रकार शूद्र बनाना उचित नहीं है।
श्लोक 13 (skanda.6.136.13)
प्रसादं कुरु तस्मात्त्वमस्य धर्मपतेर्द्विज ॥ अस्माकं वचनात्सद्यः प्रार्थयस्व तथा वरम्
prasādaṁ kuru tasmāttvamasya dharmapaterdvija asmākaṁ vacanātsadyaḥ prārthayasva tathā varam
इसलिए हे द्विज! इन धर्मपति (धर्मराज) पर कृपा करो; हमारे कहने पर तुम इसके बदले तुरंत कोई और वर माँग लो।
श्लोक 14 (skanda.6.136.14)
॥ मांडव्य उवाच ॥ नान्यथा जायते वाणी या मयोक्ता सुरोत्तमाः ॥ अवश्यं धर्मराजोऽयं शूद्रयोनौ प्रयास्यति
māṁḍavya uvāca nānyathā jāyate vāṇī yā mayoktā surottamāḥ avaśyaṁ dharmarājo'yaṁ śūdrayonau prayāsyati
माण्डव्य बोले - हे श्रेष्ठ देवो! मेरे द्वारा कहा गया वचन अन्यथा नहीं हो सकता; यह धर्मराज अवश्य ही शूद्र-योनि को प्राप्त होंगे।
श्लोक 15 (skanda.6.136.15)
परं नैवास्य संतानं तस्यां योनौ भविष्यति ॥ संप्राप्स्यति च भूयोऽपि धर्मराजत्वमुत्तमम्
paraṁ naivāsya saṁtānaṁ tasyāṁ yonau bhaviṣyati saṁprāpsyati ca bhūyo'pi dharmarājatvamuttamam
किन्तु उस योनि में उनकी कोई संतान नहीं होगी, और वे फिर से अपने उत्तम धर्मराज-पद को प्राप्त करेंगे।
श्लोक 16 (skanda.6.136.16)
आराधयतु चाव्यग्रः क्षेत्रेऽत्रैव त्रिलोचनम् ॥ प्रसादात्तस्य देवस्य शीघ्रं मृत्युमवाप्स्यति
ārādhayatu cāvyagraḥ kṣetre'traiva trilocanam prasādāttasya devasya śīghraṁ mṛtyumavāpsyati
वे शांतचित्त होकर इसी क्षेत्र में त्रिलोचन शिव की आराधना करें; उन देव की कृपा से वे शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त करेंगे।
श्लोक 17 (skanda.6.136.17)
तथा देयो वरो मह्यं भवद्भिर्यदि स्वर्गपाः ॥ तदेषा शूलिकाऽस्माकं स्पर्शाद्भूयात्सुधर्मदा
tathā deyo varo mahyaṁ bhavadbhiryadi svargapāḥ tadeṣā śūlikā'smākaṁ sparśādbhūyātsudharmadā
हे स्वर्गपतियो! और यदि आप मुझे भी वर देना चाहते हैं, तो यह हमारी शूली भी स्पर्शमात्र से महान धर्म देने वाली हो जाए।
श्लोक 18 (skanda.6.136.18)
॥ देवा ऊचुः ॥ एनां यः प्रातरुत्थाय स्पर्शयिष्यति शूलिकाम् ॥ पातकात्स विमुक्तो वा इह लोके भविष्यति
devā ūcuḥ enāṁ yaḥ prātarutthāya sparśayiṣyati śūlikām pātakātsa vimukto vā iha loke bhaviṣyati
देवगण बोले - जो कोई भी प्रातःकाल उठकर इस शूली का स्पर्श करेगा, वह इस लोक में पाप से मुक्त हो जाएगा।
श्लोक 19 (skanda.6.136.19)
एवमुक्त्वा मुनिं तं ते देवाः शक्रपुरोगमाः ॥ ततस्तां सादरं प्राहुः सह भर्त्रा पतिव्रताम्
evamuktvā muniṁ taṁ te devāḥ śakrapurogamāḥ tatastāṁ sādaraṁ prāhuḥ saha bhartrā pativratām
उस मुनि से ऐसा कहकर इंद्र-प्रमुख वे देवगण फिर उस पतिव्रता स्त्री और उसके पति से आदरपूर्वक बोले।
श्लोक 20 (skanda.6.136.20)
त्वमपि प्रार्थयाभीष्टमस्मत्तो वरवर्णिनि ॥ यत्ते चित्ते स्थितं नित्यं नादेयं विद्यतेऽत्र नः
tvamapi prārthayābhīṣṭamasmatto varavarṇini yatte citte sthitaṁ nityaṁ nādeyaṁ vidyate'tra naḥ
हे वरवर्णिनी! तुम भी हमसे अपनी अभीष्ट वस्तु माँग लो; जो कुछ सदा से तुम्हारे मन में बसा हो, वह हमारे लिए अदेय नहीं है।
श्लोक 21 (skanda.6.136.21)
॥ पतिव्रतोवाच ॥ येयं मयाकृता गर्ता स्थानेऽत्र त्रिदशेश्वराः ॥ मन्नाम्ना ख्यातिमायातु दीर्घिकेति जगत्त्रये
pativratovāca yeyaṁ mayākṛtā gartā sthāne'tra tridaśeśvarāḥ mannāmnā khyātimāyātu dīrghiketi jagattraye
पतिव्रता बोली - हे त्रिदशेश्वरो! मैंने इस स्थान पर जो यह गड्ढा बनाया है, वह तीनों लोकों में मेरे ही नाम से 'दीर्घिका' के नाम से विख्यात हो।
श्लोक 22 (skanda.6.136.22)
॥ देवा ऊचुः ॥ अद्यप्रभृति लोकेऽत्र गर्त्तेयं तव शोभने ॥ दीर्घिकेति सुविख्याता भविष्यति जगत्त्रये
devā ūcuḥ adyaprabhṛti loke'tra gartteyaṁ tava śobhane dīrghiketi suvikhyātā bhaviṣyati jagattraye
देवगण बोले - हे शोभने! आज से इस लोक में तुम्हारा यह गड्ढा तीनों लोकों में 'दीर्घिका' नाम से भली-भाँति विख्यात होगा।
श्लोक 23 (skanda.6.136.23)
येऽस्यां स्नानं करिष्यंति प्रातरुत्थाय मानवाः ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तास्ते भविष्यंति तत्क्षणात्
ye'syāṁ snānaṁ kariṣyaṁti prātarutthāya mānavāḥ sarvapāpavinirmuktāste bhaviṣyaṁti tatkṣaṇāt
जो भी मनुष्य प्रातःकाल उठकर इसमें स्नान करेंगे, वे उसी क्षण सब पापों से मुक्त हो जाएँगे।
श्लोक 24 (skanda.6.136.24)
कन्याराशिगते सूर्ये संप्राप्ते पंचमीदिने ॥ येऽत्र स्नानं करिष्यंति श्रद्धया सहिता नराः
kanyārāśigate sūrye saṁprāpte paṁcamīdine ye'tra snānaṁ kariṣyaṁti śraddhayā sahitā narāḥ
सूर्य के कन्या राशि में स्थित होने पर, पंचमी तिथि आने पर, जो मनुष्य श्रद्धासहित यहाँ स्नान करेंगे,
श्लोक 25 (skanda.6.136.25)
अपुत्रास्ते भविष्यंति सपुत्रा वंशवर्धनाः ॥ एवमुक्त्वाऽथ तां देवा जग्मुः स्वर्गं द्विजोत्तमाः॥
aputrāste bhaviṣyaṁti saputrā vaṁśavardhanāḥ evamuktvā'tha tāṁ devā jagmuḥ svargaṁ dvijottamāḥ
वे संतानहीन होते हुए भी संतान से युक्त होकर अपने वंश की वृद्धि करने वाले हो जाएँगे; हे श्रेष्ठ द्विजो! ऐसा कहकर वे देवगण स्वर्गलोक को चले गए।
श्लोक 26 (skanda.6.136.26)
पतिव्रतापि तेनैव सह कांतेन सुन्दरी ॥ सेवयामास कल्याणी स्मरसौख्यमनुत्तमम्
pativratāpi tenaiva saha kāṁtena sundarī sevayāmāsa kalyāṇī smarasaukhyamanuttamam
वह पतिव्रता, कल्याणी, सुन्दरी स्त्री भी अपने उसी प्रिय पति के साथ काम-सुख का सर्वोत्तम भोग करने लगी।
श्लोक 27 (skanda.6.136.27)
पर्वतेषु सुरम्येषु नदीनां पुलिनेषु च ॥ उद्यानेषु विचित्रेषु वनेषूपवनेषु च
parvateṣu suramyeṣu nadīnāṁ pulineṣu ca udyāneṣu vicitreṣu vaneṣūpavaneṣu ca
वे सुरम्य पर्वतों पर, नदियों के तटों पर, विचित्र उद्यानों में, तथा वनों और उपवनों में विचरण करते रहे।
श्लोक 28 (skanda.6.136.28)
ततो वयसि संप्राप्ते पश्चिमे कालपर्ययात्। तदेवात्मीयसत्तीर्थं सेवयामास सादरम्
tato vayasi saṁprāpte paścime kālaparyayāt tadevātmīyasattīrthaṁ sevayāmāsa sādaram
फिर काल के व्यतीत होने से जीवन की अंतिम अवस्था प्राप्त होने पर, वह उसी अपने पवित्र तीर्थ की आदरपूर्वक सेवा करने लगी।
श्लोक 29 (skanda.6.136.29)
ततो देहं परित्यक्त्वा स्वकांतं वीक्ष्य तं मृतम् ॥ तत्र तोये जगामाथ ब्रह्मलोकं पतिव्रता।
tato dehaṁ parityaktvā svakāṁtaṁ vīkṣya taṁ mṛtam tatra toye jagāmātha brahmalokaṁ pativratā
फिर अपने प्रिय पति को मृत हुआ देखकर, वह पतिव्रता स्त्री भी वहीं उस जल में अपने शरीर का त्याग करके ब्रह्मलोक को चली गई।
श्लोक 30 (skanda.6.136.30)
एतद्वः सर्वमाख्यातं दीर्घिकाख्यानमुत्तमम् ॥ यस्य संश्रवणादेव नरः पापात्प्रमुच्यते
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ dīrghikākhyānamuttamam yasya saṁśravaṇādeva naraḥ pāpātpramucyate
यह दीर्घिका की सर्वोत्तम कथा मैंने तुम्हें पूरी सुना दी है, जिसे सुनने मात्र से ही मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।