नागर खण्ड · अध्याय 137
मुनि माण्डव्य के शूली पर चढ़ाए जाने की कथा
श्लोक 1 (skanda.6.137.1)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ केनासौ मुनिशार्दूलो मांडव्यः सुमहातपाः ॥ शूलायां स्थापितः केन कारणेन च नो वद
ṛṣaya ūcuḥ kenāsau muniśārdūlo māṁḍavyaḥ sumahātapāḥ śūlāyāṁ sthāpitaḥ kena kāraṇena ca no vada
ऋषि बोले - वह मुनिश्रेष्ठ, महातपस्वी माण्डव्य किसके द्वारा और किस कारण से शूली पर चढ़ाया गया था, हमें बताइए।
श्लोक 2 (skanda.6.137.2)
॥ सूत उवाच ॥ स मांडव्यो मुनिः पूर्वं तीर्थयात्रां समाचरन् ॥ अस्मिन्क्षेत्रे समायातः श्रद्धया परया युतः
sūta uvāca sa māṁḍavyo muniḥ pūrvaṁ tīrthayātrāṁ samācaran asminkṣetre samāyātaḥ śraddhayā parayā yutaḥ
सूत जी ने कहा - वह माण्डव्य मुनि पहले तीर्थयात्रा करते हुए, अत्यंत श्रद्धा से युक्त होकर इस क्षेत्र में आए थे।
श्लोक 3 (skanda.6.137.3)
विश्वामित्रीयमासाद्य सत्तीर्थं पावनं महत् ॥ पितॄणां तर्पणं चक्रे भास्करं प्रति स व्रती
viśvāmitrīyamāsādya sattīrthaṁ pāvanaṁ mahat pitṝṇāṁ tarpaṇaṁ cakre bhāskaraṁ prati sa vratī
वे विश्वामित्र-तीर्थ नामक उस महान पवित्र तीर्थ में पहुँचकर, व्रतधारी होकर सूर्य के सम्मुख पितरों का तर्पण करने लगे।
श्लोक 4 (skanda.6.137.4)
जपन्विभ्राडिति श्रेष्ठं सूक्तं भास्करवल्लभम् ॥ एतस्मिन्नंतरे चौरो लोप्त्रमादाय कस्यचित्
japanvibhrāḍiti śreṣṭhaṁ sūktaṁ bhāskaravallabham etasminnaṁtare cauro loptramādāya kasyacit
वे 'विभ्राट्' नामक सूर्य के अत्यंत प्रिय श्रेष्ठ सूक्त का जप कर रहे थे; इसी बीच कोई चोर किसी का चुराया हुआ माल लेकर वहाँ आया।
श्लोक 5 (skanda.6.137.5)
कोपि तत्र समायातः पृष्ठे लग्नैर्जनैर्द्विजाः ॥ ततश्चौरोऽपि तं दृष्ट्वा मौनस्थं मुनिसत्तमम्
kopi tatra samāyātaḥ pṛṣṭhe lagnairjanairdvijāḥ tataścauro'pi taṁ dṛṣṭvā maunasthaṁ munisattamam
हे द्विजो! उसके पीछे कुछ लोग भी उसका पीछा करते हुए वहाँ आ पहुँचे थे; तब उस चोर ने भी मौनव्रत में स्थित उस मुनिश्रेष्ठ को देखा।
श्लोक 6 (skanda.6.137.6)
लोप्त्रं मुक्त्वा तदग्रेऽथ प्रविवेश गुहांतरे ॥ एतस्मिन्नंतरे प्राप्तास्ते जना लोप्त्रहेतवे
loptraṁ muktvā tadagre'tha praviveśa guhāṁtare etasminnaṁtare prāptāste janā loptrahetave
अपना चुराया हुआ माल उनके सामने छोड़कर एक गुफा में जा घुसा; इसी बीच वे लोग उस चुराए हुए माल की खोज में वहाँ पहुँचे।
श्लोक 7 (skanda.6.137.7)
दृष्ट्वा लोप्त्रं तदग्रस्थं तमूचुर्मुनिपुंगवम् ॥ मार्गेणानेन चायातो लोप्त्रहस्तो मलिम्लुचः ॥ ब्रूहि शीघ्रं महाभाग केन मार्गेण निर्गतः
dṛṣṭvā loptraṁ tadagrasthaṁ tamūcurmunipuṁgavam mārgeṇānena cāyāto loptrahasto malimlucaḥ brūhi śīghraṁ mahābhāga kena mārgeṇa nirgataḥ
उनके सामने पड़े माल को देखकर उन्होंने उस मुनिश्रेष्ठ से कहा - चोरी का माल हाथ में लिए हुए चोर इसी रास्ते से आया था; हे महाभाग! शीघ्र बताओ, वह किस रास्ते से गया?
श्लोक 8 (skanda.6.137.8)
स च जानन्नपि प्राज्ञो गुहासंस्थं मलिम्लुचम् ॥ न किंचिदपि चोवाच मौनव्रत परायणः
sa ca jānannapi prājño guhāsaṁsthaṁ malimlucam na kiṁcidapi covāca maunavrata parāyaṇaḥ
वे बुद्धिमान मुनि, गुफा में छिपे हुए उस चोर को जानते हुए भी, मौनव्रत में तत्पर होने के कारण कुछ भी नहीं बोले।
श्लोक 9 (skanda.6.137.9)
असकृत्प्रोच्यमानोऽपि परचिंतासमन्वितः ॥ यदा प्रोवाच नो किंचित्स रक्षंश्चौरजीवितम्
asakṛtprocyamāno'pi paraciṁtāsamanvitaḥ yadā provāca no kiṁcitsa rakṣaṁścaurajīvitam
बार-बार पूछे जाने पर भी, दूसरे (चोर) की चिंता में लीन होकर, उस चोर के जीवन की रक्षा करते हुए उन्होंने कुछ भी नहीं कहा।
श्लोक 10 (skanda.6.137.10)
ततस्तैर्मंत्रितं सर्वैरेष नूनं मलिम्लुचः ॥ संप्राप्तः पृष्ठतोऽस्माभिर्मुनिरूपो बभूव ह
tatastairmaṁtritaṁ sarvaireṣa nūnaṁ malimlucaḥ saṁprāptaḥ pṛṣṭhato'smābhirmunirūpo babhūva ha
तब उन सबने आपस में विचार किया - निश्चय ही यह वही चोर है, जो हमारे द्वारा पीछा किए जाने पर मुनि का रूप धारण करके यहाँ आ पहुँचा है।
श्लोक 11 (skanda.6.137.11)
अविचार्य ततः सर्वैराभीरैस्तैर्दुरात्मभिः॥ शूलीमारोपितः सद्यो नीत्वा किंचिद्वनांतरम्
avicārya tataḥ sarvairābhīraistairdurātmabhiḥ śūlīmāropitaḥ sadyo nītvā kiṁcidvanāṁtaram
तब बिना कुछ विचार किए, उन सब दुष्ट-हृदय आभीरों (गोपों) ने उन्हें तत्काल कुछ दूर वन के भीतर ले जाकर शूली पर चढ़ा दिया।
श्लोक 12 (skanda.6.137.12)
एवं प्राप्ता तदा शूली मुनिना तेन दारुणा ॥ पूर्वकर्मविपाकेन दोषहीनेन धीमता
evaṁ prāptā tadā śūlī muninā tena dāruṇā pūrvakarmavipākena doṣahīnena dhīmatā
इस प्रकार वह निर्दोष और बुद्धिमान मुनि, अपने ही पूर्वजन्म के कर्म-फल के परिपाक से, उस भयंकर शूली को प्राप्त हुआ।